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कवि‍ के साथ का आयोजन 8 को

नई दि‍ल्‍ली: इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा शुरू की गई काव्य-पाठ की श्रृंखला ‘कवि के साथ’ का चौथा आयोजन 8 अप्रैल को गुलमोहर हॉल, इंडि‍या हैबि‍टैट सेंटर, लोधी रोड, नई दि‍ल्‍ली में शाम 7 बजे से 8 बजे तक कि‍या जायेगा। इस बार वरिष्ठ कवि अनामिका के साथ युवा कवि‍ संजय कुंदन और  मृत्युंजय  अपनी कवि‍ताओं का पाठ करेंगे।

कवि और कविता से कविताप्रेमी हिन्‍दी समाज का सीधा सम्‍पर्क-संवाद बढ़े, यही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसमें हर बार हिन्‍दी कविता की दो पीढ़ियाँ एक साथ काव्यपाठ करती हैं। पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत करते हैं।

तीनों कवि‍यों की एक-एक कवि‍ता-

जुएँ : अनामि‍का

किसी सोचते हुए आदमी की आँखों-सा
नम और सुंदर था दिन।

पंडुक
बहुत ख़ुश थे
उनके पंखों के रोएँ
उतरते हुए जाड़े की हल्की-सी सिहरन में

सड़क पर निकल आए थे खटोले।

पिटे हुए दो बच्चे गले-गले मिल सोए थे
एक पर
–दोनों के गाल पर ढलके आए थे
एक-दूसरे के आँसू।

‘‘औरतें इतना काटती क्यों हैं ?’’
कूड़े के कैलाश के पार
गुड्डी चिपकाती हुई लड़की से
मंझा लगाते हुए लड़के ने पूछा
–‘‘जब देखो, काट-कूट, छील-छाल, झाड़-झूड़
गोभी पर, कपड़ों पर, दीवार पर
किसका उतारती हैं गुस्सा?’’

हर घर के आगे हैं कूड़ा
–फेंकी हुई चीजें भी
खूब फोड़ देती हैं भांडा
घर की असल हैसियत का !

लड़की ने कुछ जवाब देने की ज़रूरत नहीं समझी
और झट से दौड़ कर, बैठ गई उधर
जहाँ जुएँ चुन रही थीं सखियाँ
एक-दूसरे के छितराए हुए केशों से
नारियल-तेल चपचपाकर।

दरअसल–जो चुनी जा रही थीं
–सिर्फ़ जुएँ नहीं थीं
घर के वे सारे खटराग थे
जिनसे भन्नाया पड़ा था उनका माथा।

क्या जाने कितनी शताब्दियों से चल रहा है यह सिलसिला
और एक आदि स्त्री
दूसरी उतनी ही पुरानी सखी के
छितराए हुए केशों से चुन रही हैं जुएँ, सितारे और चमकुल!

एक लड़का मिलने आता है : संजय कुंदन

एक लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

कुछ ऐसी कशिश इस शाम में है
इस फितरत के इनआम में है
ये हल्का अँधेरा, हल्की ख़लिश
जिसमें जज़्बों का राज़ पले
एक लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

वो बन्द कमरे में होते हैं
वो हँसते हैं या रोते हैं
उनकी बातों की शाहिद है
जो एक लरज़ती शम्‍अ जले
एक लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

बातें करते खो जाता है
लड़का ग़मगीं हो जाता है
लड़की डरती है मुस्तक़बिल
शायद गहरी इक चाल चले
एक लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

क़स्बे के शरीफ़ इन हल्क़ों में
ग़ुस्सा है मगर इन लोगों में
इनके भी घर में लड़की है
क्यूँ इश्क़ का ये व्योपार चले
एक लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

अब कैसे कहूँ इन दोनों से
एक प्यार में डूबे पगलों से
बस्ती से बाहर इश्क़ करें
बस्ती के दिल में खोट पले
एक लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

जो कुछ भी है दुनिया का है
फिर दिल का क्यूँ ये धंधा है
क्यूँ सदियों से मिलते हैं दिल
दुनिया में जब-जब शाम ढले
क्यूँ लड़का मिलने आता है
उस लड़की से कुछ शाम ढले

कश्मीर : मृत्‍युंजय

1.
कौन है यह राष्ट्र
यह धृतराष्ट्र
यहाँ अंधी नाचती है योगमाया,
कठपुतली सी
धागे बांधे अँगुलियों में हुक्मरान ने

कुटिल भुजंगिनी भारत क़ी सरकार
-एक समूची सभ्य जाति क़ी बलि लेकर भीदांत दिखाती,
लालकिले से करती जाये टनों मसखरी
बांटे रेवड़ियाँ अपने कश्मीरी चेलों को
ज़री-काम करती भाषण में,
चाक करे है दिल दिमाग।

2.
सस्ती मौत,
सस्ती मौत
बेहद सस्ती मौत!
गोली से लाठी से चाकू-संगीनों से
आँसू गैस से बम से छर्रों से वाटर पाइप से
तन से मन से धन से मारो,
मारो मारो लालकिले से मारो
भूख गरीबी महंगाई सब चंडूखाने क़ी गप्पें हैं!
मारो, इस्लामाबाद से मारो
घर में घुस कर मारो
गली गली में मारो
बाढ़ लगी है
घर-दुआर औ पशू-परानी, गल्ला-गेहूँ, छाता-जूता नाश हो गए!
जनता को यह चिल्लाने दो !

भाई अब्दुल्ला जी आओ
हाथ मिलाओ
पैसा लाओ
पैसा खाओ
पैसे से बारूद खरीदो
पैसे फेंक तमाशा देखो
हत्या कर दो रोजगार क़ी
बेचो नफरत
हिंसा क़ी दूकान चलाओ
अर्थी काढो
दफ़न करो आज़ाद सोच को
रोज़ नहाओ टटके टटके रक्त कुंड में
माँस और हड्डी से फिर से नक्शा भर दो
इसके भी भीतर गर हो आत्मा साली
पकड़ खींच लो बड़े कैम्प में
याद दिलाओ मनोरमा क़ी
बच्चों क़ी चीखों के बंदनवार सजा लो
फिर भाषण दो आज़ादी पर
फिर भाषण दो समाधान पर
फिर भाषण दो लोकतंत्र पर
फिर भाषण दो

‘‘गर फिरदौस…
मर फिरदौस

AFSPA के नीचे
संगीनों क़ी हरी दरी पर
मर फिरदौस

3.
फिरदौस,
बच्चों का कफ़न दफ़न घर में करो
फुसफुसाते हुए बात करो
चुप्पी में चिल्लाओ चीखो
बाहर मत निकलो
सड़क का नाम मत लेना
न ही साँस लो जोर से

ये मुल्क एक जेल बना दिया गया है
और कश्मीर उस जेल क़ी कालकोठरी
और तुम्हारा घरकत्लगाह

रोना भी नहीं
क्यूंकि पाकिस्तानी बता दिए जाओगे
हँसना भी नहीं
अब्दुल्ला हँसी क़ि प्रदर्शनी दिल्ली में लगाने वाला है
साँस लेना बंद कर दो
और दिल निकाल कर रख लो अपनी मुट्ठी में
आँखे जेबों में दफ्न करो
कान काट दो
त्वचा क़ी केंचुल छुपा दो जमीन में
और अपने प्राण…
किसी बूढ़े बरगद क़ी खोखल में चुन दो

4.

कभी तो कोई आयेगा
जो सब कुछ इकट्ठा करेगा