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शिक्षा की परीक्षा : प्रेमपाल शर्मा

examination

दसवीं-बारहवीं की बोर्ड परीक्षा शुरू होते ही पूरे देश में घर से लेकर स्‍कूल तक सभी जगह तनाव का माहौल हो जाता है। माता-पि‍ता तो तानाशाह की सी भूमि‍का में आ जाते हैं। इससे होने वाले दुष्‍परि‍णामों पर लेखक-चिंतक प्रेमपाल शर्मा का लेख-

पूरा देश परीक्षाओं में डूबा होता है मार्च-अप्रैल में ।  दसवीं, बारहवीं, बी.ए., एम.ए., आई.आई.टी., मेडिकल, एंट्रेंस । सही मायनों में देश के सामने ‘परीक्षा की घड़ी’ इसे ही कहना चाहिए । ज्‍यादा शिद्दत से एहसास इसलिए भी हुआ कि मेरा बेटा भी दसवीं की परीक्षा दे रहा हैं। महीनों से बच्‍चे की मम्‍मी के आदेश कानों में गूँजते रहे हैं– ‘किसी को आने को नहीं कह देना! सारी उम्र पड़ी है दोस्‍तों के लिये। तुम कहाँ जा रहे हो? बाद में नहीं जा सकते? दसवीं क्‍या बार-बार आयेगी ? कैसे क्‍या करना है ?…. ट्यूशन ? किस के पास जायेगा ? कैसे जायेगा ? स्‍कूटी तो दूँगी नहीं ।  इस उम्र में बच्‍चे बड़ी लापरवाही से चलाते हैं।

पड़ोस के बच्‍चों को चिकन पॉक्‍स हो गया तो उन्‍होंने जान खा ली– ‘क्‍या कोई प्रिवेंटिव इंजेक्‍शन नहीं होते ? पता तो लगाओ । शायद होम्‍योपैथी में होते हों ।  हे राम! मैं प्रसाद बाँटूँगी ।’

पेपर शुरू होने से दो दिन पहले फोन की घंटी घनघनाने लगी ।  दिल्‍ली में मौसी ने ‘बैस्‍ट विशेज’ कहा, नानी ने गायत्री मंत्र फोन पर बच्‍चे के कान में पढ़ा। चाचा ने अहमदाबाद से पीठ ठोंकी । कॉलोनी में सभी ने एक-दूसरे के बच्‍चों को शुभकामनाएं दीं, जैसे सभी बाँकुरे रणक्षेत्र में जा रहे हों । सदा फैशन, सेल, ब्‍यूटी-सैलून की बातें छोड़-छाड़कर मम्मियों की बात सिर्फ बच्‍चों की परीक्षा तक सिमट गई– ‘फिल्‍म बाद में देखेंगे । परीक्षा के बाद ।  घर आना सभी लोग । हर चीज, हर उत्‍सव परीक्षा के बाद ।’

‘मुझसे परीक्षा के बाद एक महीने तक पूछना भी नहीं कि मैं कहाँ जा रहा  हूँ, क्‍या कर रहा हूँ ।’ बेटे ने कहा और माँ ने पुचकारा– ‘हाँ, नहीं पूछूँगी । तू बस फर्स्‍ट आकर दिखा दे ।’

उम्‍मीदों, आशाओं, आकांक्षाओं के इतने दबावों में किसकी नसें नहीं चटक जाएंगी । इसी  फर्स्‍ट-सैकंड की दौड़ से बचने-बचाने के लिये माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड ने इस वर्ष ग्रेड प्रणाली शुरू करनी चाही थी, जिसका इन सभी ने विरोध किया । इसी तनाव में रहने को अभिशप्‍त जो हैं ।

पी.के. रिचर्डसन मेनचैस्‍टर बिजनेस स्‍कूल में प्रोफेसर हैं । शिक्षण-प्रशिक्षण के आदान-प्रदान में कभी-कभी भारत आते रहते हैं । इसलिये भारतीय शिक्षा-पद्धतियों से बेखबर नहीं हैं । बोले, ‘मार्च-अप्रैल के महीनों में जिस घर में जाना होता है, वहाँ एक आतंक, कर्फ्यू का माहौल होता है । बच्‍चे पढ़ाई में डूबे, माँ-बाप उनके भविष्‍य की चिंता में । जितना पढ़ते मैंने भारतीय बच्‍चों को देखा है, उतना दुनिया में कहीं नहीं । उनका कहना था कि इंग्‍लैंड में यदि रात्रि 9 बजे के बाद कोई माँ-बाप बच्‍चे को जबरन पढ़ाने की कोशिश करे तो उनके खिलाफ पुलिस-कार्रवाई हो सकती हैं ।’ क्‍या वहाँ के नागरिक कम बुद्धिमान, कम जिम्‍मेदार हैं और हमारे यहाँ ज्‍यादा ? बल्कि शिक्षा की व्‍यावहारिकता और उपादेयता के अर्थो में स्थिति उलट कही जा सकती है ।

क्‍या यह परीक्षा अंतिम परीक्षा है ? क्‍या इसके बाद कोई नहीं होगी ? न जाने कितनी होंगी । तो क्‍या हर बार ऐसा ही माहौल रहेगा ।  जब यह बारहवीं में होगा, इंजीनियरिंग की प्रवेश-परीक्षा देगा और एम.ए., बी.ए. या प्रतियागिताएं होंगी ? कब तक कोई दिमाग इतनी अपेक्षाओं का भार वहन कर सकता है और वह भी सालोंसाल ?  बेरोजगारी, गलाकाट प्रतियोगिता को देखते हुए हो सकता है दशकों तक । फिर भी खाली हाथ । यही बिंदु इन दिमागों को नौकरशाही में प्रवेश करते ही एक अलग दुनिया में धकेलकर ले जाता है, जिसे ‘हाल्‍ट’ कह सकते हैं– चैन, आराम, इतनी देर तक दौड़ने के बाद सुस्‍ताने की जिंदगी की शुरूआत, जिम्‍मेदारी को परे ठेलती हुई। मुझे याद आ रहा है केंद्रीय सेवा का प्रशिक्षार्थी ज्‍यादातर क्‍लास में सोता रहता था । भयानक किस्‍म की लापरवाही उनके व्‍यक्तित्‍व में समा गई थी । खोदने पर उसके बताया- ‘सच बताऊँ, पिछले तीन वर्ष से तो रात-दिन लगातार इसी परीक्षा की तैयारी में लगा हूँ । उससे पहले भी कुछ-न-कुछ चलता रहता था । मैंने सोच लिया था कि ‘सेलेक्‍ट होते ही सालभर किताबों की तरफ या और कहीं देखूँगा तक नहीं ।

शिक्षा-परीक्षा की ये पद्धतियाँ जिम्‍मेदार नागरिक, लोकसेवक बना रही हैं या उनके व्‍यक्तित्‍व को समाप्‍त कर रही हैं- ‘एक से एक नए बोझ, डर, आतंक से ? प्रशि‍क्षण की ऐसी ही एक विभागीय परीक्षा में पर्यवेक्षक बनना पड़ा । फुसफुसाहट शुरू हुई तो मैंने टोका।  बोले- ‘सर ! यदि फेल हो गये तो अमुक ने सभी को चेतावनी दे रखी है कि वे सी.आर. खराब कर देंगे।’ दूसरे ने जोड़ा- ‘सर ! वे कहते हैं कि मैं बार-बार बुलाऊँगा और आपके विभागीय हैड को लिखूँगा। ऐसा सबक सिखाऊँगा कि सारी उम्र याद रखोगे। बहुत बेइज्‍जती होगी ।’ क्‍या ऐसा आतंक हममें किसी भी मिशन, उद्देश्‍य के प्रति पवित्रता, निष्‍ठा का भाव भर सकता है ?  क्‍या जानना ही किसी उद्देश्‍य की प्राप्ति है, और वह भी कुछ घंटे की कवायद द्वारा ? क्‍या लगातार परीक्षा का पीछा करते-करते हम उस उद्देश्‍य से ही दूर नहीं होते जाते, जिसके लिए परीक्षा का उपक्रम किया जाता है ? परीक्षक इस बात को कब समझेंगे कि परीक्षा आतंक के पर्याय की बजाय कुछ और विकल्‍प भी दे सकती है ।

इस आतंक की अपनी–अपनी स्‍टेज हैं- शुरू में माता-पिता, फिर अध्‍यापक, फिर बॉस । माँ-बाप को अपनी नाक कटने का डर है, यदि उनके चिराग की रोशनी पड़ोसी से कम रहे तो । अध्‍यापक इस मकसद से इस आतंक को बढ़ाता है, जिससे उसकी गिनती अनुशासन के पहरुए के रूप में हो । बॉस सी.आर. का आतंक अपने नेतृत्‍व की असफलता को ढाँपने के लिए। इन साँचों में कोई व्‍यक्तित्‍व सकारात्‍मक रहे,  समाज-सापेक्ष संवेदनशील बyना रहे,  यह असंभव-सी बात लगती है ।

मेरे लिए भी और देश के लिए भी, इससे बड़ी राष्‍ट्रीय शर्म क्‍या होगी, जब इस परीक्षा के डर से हर वर्ष सैकड़ों मासूम बच्‍चे आत्‍महत्‍या करें । मानें न माने, माँ-बाप, शिक्षक, परीक्षक के नाते हम सब भी इस अपराध में शामिल हैं । अगर इस वर्ष फिर कोई ऐसी खबर मिली तो उसकी जिम्‍मेदारी लगता है, मेरी ही होगी ।

‘पढ़ने का आनंद’, प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरि‍यागंज, नई दिल्‍ली से साभार। मूल्‍य- 120 रुपये (पेपरबैक)

शिक्षा को परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाने की जरूरत : महेश चंद्र पुनेठा

 

आज की शि‍क्षा विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल है जि‍सका मूल्‍यों से कुछ लेना-देना नहीं है। इसके कारणों, घातक दुष्‍परि‍णामों और सही शि‍क्षा पद्धति‍ को लेकर युवा लेखक-कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख-

आज शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है उसका जीवनोन्मुखी न होकर परीक्षोन्मुखी होना।आज सभी का सारा जोर परीक्षा पास करने या परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त करने में है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिक्षा परीक्षा के लिये है न कि जीवन के लिये। शिक्षक हों या अभिवावक या फिर विद्यार्थी सभी का परम लक्ष्य परीक्षा में बेहतर से बेहतर परिणाम प्राप्त करना मात्र रह गया है। पूरी शिक्षा परीक्षा केन्‍द्रि‍त हो चुकी है जिसके कारण पूरा वातावरण घोर गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भर गया है। शिक्षक शिक्षण इस तरीके से करते हैं जिससे कि बच्चे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त कर सकें। यही चाह अभिभावकों की भी रहती है। बच्चे तो फिर बच्चे हैं, अध्यापकों और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं के हाथों कैद। परीक्षा के अलावा किसी अन्य चीज के बारे में सोचना बच्चों के लिए सम्‍भव ही नहीं। परीक्षा ने बच्चों को महज किताबी कीड़े बना दिया है।

शिक्षा का मतलब किताबी ज्ञान हो गया है। किताब भी केवल वह जो पाठ्यपुस्तक के रूप में लागू हो। पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य पुस्तक पढ़ना समय की बर्बादी मानी जाती है। शिक्षक और छात्र दोनों के लिये पाठ्यपुस्तक ही पाठ्यचर्या हो गयी है। शिक्षक वही पढ़ाते हैं और विद्यार्थी वही पढ़ना चाहते हैं जो परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हो। परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर ही शिक्षा तथा शैक्षिक संप्राप्ति का मूल्यांकन किया जा रहा है, जिसमें सबसे अधिक बल लिखित परीक्षा को दिया जा रहा है। सभी परीक्षा को साधने में लगे हैं। बच्चे को विषय की समझ कितनी गहरी है, वह सीखी हुई विषयवस्तु को अपने जीवन की बदली परिस्थितियों  में कितना क्रियान्वित कर सकता है, विषयवस्तु को सीखने के बाद उसके व्यक्तित्व में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता है, वह कितना बेहतर इंसान या नागरिक बन पाता है, इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जानकारियों को रटना और परीक्षा में उन्हें हू-ब-हू उतार देना सीखने का पर्याय होता चला गया है, फलस्वरूप शिक्षा जीवन से कट चुकी है। जबकि जरूरी यह है कि बच्चे चीजों को समझें। चीजों को करने के रचनात्मक और नये तरीके सोचें। उनमें क्षमता होनी चाहिये कि अपनी समझ और ज्ञान को नई समस्यायें सुलझाने में इस्तेमाल कर पायें। किसी घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से आँककर उसके बारे में मन बना पायें और समस्याओं का विश्‍लेषण करके उन्हें हल करने के लिये नए रचनात्मक तरीके सोच पायें। लेकिन अधिकांश परीक्षाओं में इस क्षमता को नहीं जाँचा जाता।

शिक्षा सम्‍बन्‍धी दस्तावेजों में निहित ‘जीवन के लिए शिक्षा’ एक मुहावरा मात्र बन कर रह गया है। ज्ञान की दो दुनिया बना दी गयी हैं एक स्कूली ज्ञान और दूसरा बाहरी जीवन का ज्ञान। ऐसा वातावरण तैयार कर दिया गया है जैसे कि स्कूल का ज्ञान बाहरी जीवन के ज्ञान से श्रेष्ठ और अलग है। स्कूली ज्ञान से ही जीवन की सफलता-असफलता निर्धारित होती है तथा स्कूली ज्ञान परीक्षा से नियंत्रित है। बच्चों के पास खेलने का समय ही नहीं है। उनकी जिन्‍दगी तो यूनिट टेस्ट, वार्षिक परीक्षा और जैसे कि ये काफी न हो, बोर्ड परीक्षा के आतंक एवं अन्य अनगिनत प्रतियोगी परीक्षाओं से नियंत्रित रहती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे जीवन प्रतियोगिता के लिये ही बना है। बस दौड़ते रहे हो कहीं कोई दूसरा आपसे आगे नहीं निकल जाये। साथ-साथ आगे बढ़ने की तो कहीं कोई बात ही नहीं। बच्चे का परीक्षाओं में प्रदर्शन माँ-बाप से मिलने वाले प्यार की कसौटी बन गई है।

परीक्षा का इतना महत्वपूर्ण होना शिक्षा का नौकरी के हित होने से जुड़ा है। जहाँ से यह सोच विकसित हुई कि शिक्षा इसलिये प्राप्त की जाये ताकि पढ़-लिखकर आने वाले समय में अच्छी नौकरी मिल सके। वहीं से शिक्षा का उद्देश्‍य संकुचित हो गया। अच्छी नौकरी का मतलब भी ऐसी नौकरी से है जिसमें वेतन ऊँचा हो और शारीरिक श्रम कम से कम। आज प्रत्येक अभिभावक की जद्दोजहद है कि वह अपने पाल्य को ऐसी शिक्षा दिलवा सके जिससे उसे ऊँचे वेतन वाली नौकरी मिल सके। जब पढ़ने-लिखने के बाद ऐसा नहीं हो पाता है तो वे शिक्षा को गरियाने लगते हैं । उनको लगता है उन्होंने अपने पाल्य को शिक्षा दिलवाकर समय और धन का अपव्यय किया। औपनिवेशक काल में लिखित परीक्षा में फेल हो जाने का मतलब था सरकारी नौकरी के साथ जुड़े सामाजिक रुतबे और वेतन के साथ आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित जीवन जीने से वंचित हो जाना, आज भी वही मानसिकता हावी है। यह ठीक है कि शिक्षा रोजगार का जरिया बने, पर शिक्षा केवल रोजगार के लिये हो यह बात कुछ गले नहीं उतरती।

शिक्षा का नौकरी के हित होना और परीक्षा में प्राप्त अंकों के द्वारा उसकी गुणवत्ता का निर्धारण होना ही वे कारण हैं जिनके चलते बाजार ने शिक्षा को मुनाफे का माध्यम बना लिया है। आज बाजार अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा को लेकर उपस्थित हो रहा है। कम पैसे वालों के लिये अलग शिक्षा है और अधिक पैसों वालों के लिये अलग तरह की। ‘जिसकी आर्थिक हैसियत जैसी है वैसी शिक्षा खरीद ले’, यह बाजार का अघोषि‍त ऐलान है। ट्यूशन या कोचिंग नए धंधे के रूप में अस्तित्व में आया है। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इनसे जुड़े संस्थान विद्यार्थियों और अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।‘कुंजी’ और ‘गाइड’ छापने वालों का धंधा खूब फल-फूल रहा है। सभी का जोर एक ही बिन्‍दु पर है कि कैसे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त किये जा सकते हैं, सभी यही तरकीब बताने में लगे हुये हैं। बच्चों को साँस लेने की फुरसत नहीं है। एक अंधी दौड़ में सभी दौड़ रहे हैं। जो सफल हो गये वे अपने आप को सिकंदर समझ रहे हैं और जो पीछे रह जा रहे हैं वे कुंठा, तनाव, अवसाद से ग्रस्त हो आत्महत्या कर रहे हैं या मानसिक संतुलन खो रहे हैं। यदि शिक्षा परीक्षोन्मुख नहीं होती और उसको प्राप्त करने का  एकमात्र उद्देश्‍य नौकरी की प्राप्ति न होता तब क्या बाजार इसका इतना लाभ उठा पाता, यह विचारणीय प्रश्‍न है।

बाजार में बिक रही शिक्षा का मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल शिक्षा है। इसका उद्देश्‍य अर्थ मानव तथा व्यवस्था की मशीन में फिट होने वाले पुर्जे तैयार करना है। शिक्षा की दुकानों में वही शिक्षा बेची जा रही है जिसकी कॉरपोरेट जगत को जरूरत है। बाजार को ऐसा मानव संसाधन चाहिये जो उसकी कंपनियों में लगी अत्याधुनिक तकनीक की मशीनों को सही ढंग से परिचालित कर सके । उसके उत्पादों को खरीदने वाले उपभोक्ताओं को मानसिक रूप तैयार कर सके। ऐसे उत्पादों को भी बेच सके जो उपभोक्ता की आवश्‍यक आवश्‍यकता न हो। बाजार सोचने-समझने वाला संवेदनशील मानव नहीं चाहता। ऐसा मानव उसके किसी काम का नहीं। इसलिये आज की शिक्षा एक कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या प्रशासक तो तैयार कर रही है, पर उसे एक संवेदनशील इंसान नहीं बना रही है। न ही शिक्षा सृजनशीलता को बढ़ाने में सफल हो पा रही है। सृजनशीलता के अवसर इस बाजार-निर्भर शिक्षा ने निगल दिये हैं। इस शिक्षा में ऐसी क्षमता नहीं है कि यह किसी को साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक या चिंतक बना सके। यह उसकी न मंशा है और न ही जरूरत।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी लोककल्याणकारी, समाजवादी तथा लोकतांत्रिक सरकारें इसी शिक्षा की पैरोकार हैं। आजादी के बाद से लेकर आज तक चल रही दोहरी शिक्षा जो आज बहुपरती शिक्षा में बदल गयी है, इसका प्रमाण है। हाल ही में पारित शिक्षा अधिनियम 2009 ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी है। इस अधिनियम के द्वारा तो एक तरह से शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। जनता के पैंसों से विद्यालयों का आधारभूत ढाँचा विकसित कर प्रबंधन के नाम पर उन्हें निजी हाथों को देने की योजना बन चुकी है। प्रथम चरण में देश भर में स्थापित होने वाले छह हजार मॉडल स्कूलों में से दो हजार पाँच सौ स्कूलों को ‘सार्वजनिक-निजी साझेदारी’ के अंतर्गत किसी कॉरपोरेट क्षेत्र, स्वयंसेवी संगठन, स्वयं सहायता समूह, साझेदारी कंपनी, व्यक्ति और समुदाय आधारित संगठनों को सौंपा जायेगा। भविष्य में इस भागीदारी का बढ़ना निश्‍चि‍त है। इसी तरह कम से कम पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने के बहाने निजी स्कूलों को वाउचर प्रदान कर आने वाले समय में सरकारें नये विद्यालय खोलने के अपने दायित्व से भी बचना चाहती है। एक तरह से धीरे-धीरे शिक्षा को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। वाउचर योजना निजी क्षेत्र को लाभ पहुँचाने की योजना है। जिस दिन शिक्षा पूरी तरह निजी हाथों में चली जायेगी और विदेशी संस्थायें हमारे देश में शिक्षण संस्थायें संचालित करने लगेंगी, सोचा जा सकता है शिक्षा का उद्देश्‍य क्या रह जायेगा। शिक्षा में कितनी मूल्यों की बात रह जायेगी और कितनी जीवन की। तब शिक्षा का सम्‍बन्‍ध चेतना से नहीं रह जायेगा। शिक्षा जकड़न को तोड़े इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं की जायेगी। बच्चों में विवेकशीलता का विकास शिक्षा का कोई सरोकार नहीं रह जायेगा क्योंकि बाजार की दृष्टि से इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। जैसा कि हम अभी भी देख रहे हैं निजी स्वामित्व वाले शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के नाम पर पाठ्यचर्या में उन्हीं चीजों को शामिल किया जा रहा है जो उद्योगों के विस्तार और संचालन के लिए जरूरी हैं। वहाँ विज्ञान, भाषा व मानविकी जैसे चेतना विकसित करने व समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले विषयों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। उनके स्थान पर प्रबंधन व तकनीकी विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बच्चा जो पढ़ना चाह रहा है उसे वह नहीं पढ़ने दिया जा रहा है, बल्कि बाजार उसे जो पढ़ाना चाह रहा है उसे वह पढ़ना है। बच्चे की सृजनात्मकता और रुचि का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा छात्र-अभिभावकों का मन तैयार किया जा रहा है। उन्हें हसीन सपने दिखाये जा रहे हैं। इतने बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं कि उन्हें लगता है कि  अमुक पाठ्यक्रम पढ़ने से उनकी किस्मत ही बदल जायेगी। पर पिछले कुछ सालों में अन्य कुछ हुआ हो या नहीं लेकिन यह जरूर देखने में आया है कि जहाँ भी शिक्षा में बाजार का हस्तक्षेप बढ़ा है वहाँ आज्ञाकारिता, बौद्धिकता और व्यक्तिगत उपलब्धियों को बहुत ही महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में मानने की प्रवृत्ति स्थापित हुई है। साथ ही एक खतरा और बढ़ा है संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की अनेक शिक्षण संस्थाओं ने खूब धज्जियाँ उड़ायी हैं। शिक्षा को कट्टतरता, धर्मान्धता, जातिवाद, भाषाई दुराग्रह एवं क्षेत्रवाद फैलाने का माध्यम बनाया गया है। वि‍शेषरूप से साम्‍प्रदायिक मानसिकता को बोया और विकसित किया जा रहा है। जैसा कि प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल का मानना भी है, ‘शिक्षा के जरिये वर्ग-भेद, जाति-भेद, धार्मिक कट्टता, नस्लवाद, पितृसत्ता, सामंती व गैर-तार्किक सोच, पिछडे़पन आदि विकृतियों के खिलाफ लड़ाई आगे बढ़ाने के सरोकार गौण हो रहे हैं। शिक्षा वैश्‍वि‍क बाजार की ताकतों के हाथ में वर्चस्ववाद, शोषण, साम्‍प्रदायि‍कता व विषमता फैलाने का हथियार बनती जा रही है।’

दरअसल इसका सम्‍बन्‍ध इस बात से है कि हम कैसा समाज चाहते हैं। यदि हम ऐसा समाज चाहते हैं जो रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच से लैस हो, जहाँ चीजों का वितरण सम्यक एवं न्यायपूर्ण हो तथा सभी को अच्छी शिक्षा-स्वास्थ्य एवं भोजन की गारंटी हो तो शिक्षा प्रणाली भी ऐसी होनी चाहिये जो रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे और लोकव्यापी तथा समतामूलक हो । यदि आज ऐसा नहीं है तो यह कहीं न कहीं सत्ताधारियों के हित में है क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि जनता रचनात्मक एवं विवेकशील हो और उनके काम-काज पर प्रश्‍न खड़े करे ।

इधर बच्चों में परीक्षा के बोझ को कम करने की बात की जा रही है। कहा जा रहा है कि परीक्षा को ‘चाइल्ड फ्रेंडली’ बनाया जाये। इस दिशा में एक कदम के रूप में सी.बी.एस.सी. द्वारा हाई स्कूल की परीक्षा में बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक तथा अंकों के स्थान पर ग्रेड पद्धति को लागू किया गया है। पाठ आधारित और क्विज परीक्षा की विधि को बदलने की बात की जा रही है। यह माना जा रहा है कि इससे बच्चों पर परीक्षा का तनाव कम होगा। पर यहाँ एक सवाल खड़ा होता है कि जब तक परीक्षा से बच्चे के स्तर का निर्धारण होता रहेगा या फिर उसे वर्गीकृत किया जाता रहेगा और यह स्तर या वर्गीकरण उसके जीवन को पग-पग पर प्रभावित करता रहेगा, यही जीवन में सफलता असफलता का मानक बना रहेगा, तब तक भला बच्चा उससे निरपेक्ष कैसे रह सकता है। फिर यह स्तर का निर्धारण या वर्गीकरण अंकों के द्वारा हो या ग्रेड द्वारा इससे क्या अंतर पड़ता है। परीक्षा जहाँ होगी वहाँ तनाव अवश्‍य होगा। परीक्षा प्रतिस्पर्द्धा को भी जन्म देती है । प्रतिस्पर्द्धा तनाव का कारण बनती है। एन.सी.एफ. 2005 में स्कूलों में प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करने की बात कही गई है, पर जब तक समाज में यह प्रतिस्पर्द्धा समाप्त न हो जाये तब तक स्कूलों में कैसे हो सकती है।

प्रतिस्पर्द्धा  पूँजीवादी व्यवस्था का मूल्य है। यह माना जाता है कि शिक्षा को अपनी प्रक्रिया और मूल्याँकन में सफलता और प्रतिस्पर्धा के बजाय सहभागिता, सार्थकता और आत्मावलोकन को महत्व देना चाहिये और यह तभी हो सकेगा जब ज्ञान की प्रतिष्ठा उपयोगिता के कारण नहीं, बल्कि आनन्‍द तथा सामाजिक प्रतिबद्धता की वजह से हो। पर जिस व्यवस्था का मूल मंत्र ही प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत सफलता हो, क्या उससे आशा की जा सकती है कि वह सहभागिता, सार्थकता, आत्मावलोकन तथा आनन्‍द को महत्व देगी, इस पर समय रहते सोचे जाने की जरूरत है । शिक्षा को यदि बाजार के मकड़जाल से मुक्त करना है तो जरूरी लगता है कि इसे परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाया जाये। शिक्षा परीक्षा के लिये न हो, बल्कि परीक्षा शिक्षा के लिये हो जैसे कि परीक्षण स्वास्थ्य के लिए होता है न की स्वास्थ्य परीक्षण के लिये। परीक्षा बच्चे के मूल्याँकन के लिये न होकर शिक्षण पद्धति के मूल्याँकन एवं उसमें सुधार के लिये होनी चाहिये। परीक्षा से प्राप्त परिणामों से बच्चों को वर्गीकृत न किया जाये बल्कि सीखने के कठिन स्थलों का पता लगाया जाये ताकि उन पद्धतियों को विकसित किया जा सके जिससे सीखने की प्रक्रिया सरल और रोचक हो सके जिससे अंततः बच्चा ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सके । परीक्षा लिये जाने का तरीका कुछ ऐसा होना चाहिए कि बच्चे को इस बात का पता भी न चले कि उसकी परीक्षा ली जा रही है।

मौजूदा व्यवस्था में ऐसा सम्‍भव नहीं दिखता कि‍ परीक्षा को समाप्त किया जा सके या फिर कभी-कभी लगता है कि परीक्षा की उपयोगिता है बच्चों को खुद को जानने तथा आगे की योजना बनाने की दृष्टि से इसलिए ऐसे उपाय किये जाने चाहिये कि इसके तनाव को कम किया जा सके। इस दृष्टि से एन.सी.एफ. 2005 के सुझाव उल्लेखनीय हैं- परीक्षा हॉल में कागज कलम से ली गई परीक्षा के अलावा मूल्याँकन के बहुविध रूप होने चाहिये। मौखिक परीक्षा और समूह कार्य मूल्याँकन को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। खुली-पुस्तक परीक्षा और लचीली समय सीमा परीक्षा को देश भर में प्रायोगिक तौर पर लागू किये जाने की जरूरत है। इस तरह की शुरुआत से स्मृति आधारित परीक्षा से कुछ उच्च योग्यताओं की परीक्षा का मार्ग प्रशस्‍त होगा, जैसे-व्याख्या, मूल्याँकन और समस्या सुलझाना। विद्यार्थियों को उतने ही पत्रों की परीक्षा देने का अधिकार हो जितने की तैयारी हो । तीन साल के दौरान परीक्षा पूरी हो सके। इसको माँग पर परीक्षा प्रणाली के रूप में विकसित किया जा सकता है जिसमें छात्र तभी परीक्षा दे जब वे समझें कि उसके लिये तैयार है।