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सार्थक हस्तक्षेप करता ‘वांग्‍मय’ का शानी अंक : रमाकान्‍त राय

‘वांग्‍मय’ के शानी अंक पर आलोचक रमाकान्‍त राय की टिप्‍पणी-

लघु पत्रिकायें निकालना बेहद चुनौती पूर्ण काम है और उनकी निरन्‍तराता बनाये रखना और भी कठिन। ऐसे में अलीगढ़ से निकलने वाली लघु पत्रिका ‘वांग्‍मय’ का निरन्‍तर प्रकाशित होना न सिर्फ हिन्दी के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करता है अपितु सम्पादक डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद के जीवट व्यक्तित्व का परिचायक भी है। ‘वांग्‍मय’ समय-समय पर विशेषांकों का आयोजन सफलतापूर्वक करता रहा है जिनमें ‘राही मासूम रजा़ विशेषांक’, ‘नासिरा शर्मा पर केन्द्रित अंक’, ‘कुसुम अंसल पर विशेषांक’ और ‘कबीर अंक’ ने विशेष ध्यान आकृष्ट किया था। ‘वांग्‍मय’ का अद्यतन अंक ‘गुलशेर खान शानी’ पर केन्द्रित है। शानी हिन्दी साहित्य का जाना-पहचाना नाम है और ‘काला जल’ उनकी अप्रतिम कृति। शानी का नाम हिन्दी में ‘मुस्लिम विमर्शकार’ के रूप में भी जाना जाता है।

अपने सुचिन्तित सम्पादकीय में डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद ने शानी के अब तक हुए मूल्यांकन को असंतोषजनक बताया है और उनके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने पूर्ववर्ती आलोचकों द्वारा शानी की उपेक्षा किये जाने की ओर ध्यान आकृष्ट कि‍या है और उन पर एकाग्र निकालने के दौरान उत्पन्न संकट का भी उल्लेख किया है।

‘वांग्‍मय’ का शानी अंक दो खण्डों में एकाग्र हुआ है। प्रथम खण्ड में एक पूर्वप्रकाशित आलेख धनंजय वर्मा का है जिन्होंने भावपरक तरीके से शानी के जीवन-वृत्त को समेटने की कोशिश की है। नासिरा शर्मा ने शानी से हुई विविध मुलाकातों का वर्णन किया है जिससे शानी के व्यक्तित्व के कई पहलू उभरे हैं। मधुरेश, रोहिताश्‍व, डॉक्‍टर शिवचन्द प्रसाद, डॉक्‍टर तारिक असलम, डॉक्‍टर नीरू, डॉक्‍टर नगमा जावेद, मूलचंद सोनकर, खान अहमद फारुख, डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद, सगीर अशरफ, डॉक्‍टर रमाकान्त राय और डॉक्‍टर अवध बिहारी पाठक ने ‘काला जल’ को विविध पहुलओं में मूल्यांकित करने का प्रयास किया है। इन आलेखों में खान अहमद फारुख का आलेख ‘शानी के काला जल का काले पानी से निकलने का अधूरा वृत्‍तांत’ विशेष ध्यान आकृष्ट करता है जिसमें इस प्रश्‍न को मजबूती से उठाया गया है कि हिन्दी उपन्यासों में मुस्लिम उपन्यासकारों के अलावा मुसलमान पात्र क्यों गायब होते जा रहे हैं।

शानी के उपन्‍यास ‘एक लड़की की डायरी’ पर इकरार अहमद ने लि‍खा है और रेहाना परवीन ने ‘नदी और सीपि‍याँ’ उपन्‍यास का अध्‍ययन कि‍या है। डॉक्‍टर अरुण कुमार ति‍वारी ने ‘साँप और सीढ़ी’ उपन्‍यास पर अपना शोध आलेख दि‍या है।

द्वि‍तीय भाग में शानी की कहानि‍यों पर मेराज अहमद ने परि‍चयात्‍मक वि‍वरण प्रस्‍तुत कि‍या है। अमि‍त भारती, अहमद अदील और डॉक्‍टर परमेश्‍वरी शर्मा ने भी कहानि‍यों पर लि‍खा है तो आदि‍त्‍य प्रचण्‍डि‍या और मोहम्‍मद आसि‍फ खान ने उनके वि‍वि‍ध साहि‍त्‍य पर लेखनी चलाई है। इसी भाग में सूफि‍या शानी जो शानी की सुपुत्री हैं, से बातचीत की गई है। इस बातचीत में सूफि‍या शानी ने शानी के व्‍यक्‍ति‍व के वि‍वि‍ध-पहलुओं पर प्रकाश डाला है। इसी भाग में एक परि‍चर्चा ‘हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य ने मुसलमानों को अनदेखा क्‍यों कि‍या’ भी छपी है जि‍समें शानी, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, केदरानाथ सिंह के बीच गम्‍भीर बातचीत है। इन आलेखों की मौजूदगी में शानी पर केन्‍द्रि‍त यह अंक अत्‍यन्‍त संग्रहणीय बन गया है और उम्‍मीद जगाता है कि‍ हि‍न्‍दी जगत इसका स्‍वागत करेगा और डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद को इस प्रशंसनीय कार्य के लि‍ये साधुवाद देगा।

सम्‍पादकीय पता- डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद, सम्‍पादक, 205, ओहद रेजीडेंसी, नि‍यर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, अलीगढ़-202002

इस अंक का मूल्‍य- 100 रुपये