
13 जनवरी, 1911 को देहरादून में जन्में कवि शमशेर बहादुर सिंह प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि सम्मानों से सम्मानित शमशेर के रचनाकर्म और विचारधारा पर युवा आलोचक और जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण का आलेख-
“What about my dear Shamsher, that Angelic spirit?”। नागपुर से 3.5.49 को इलाहाबाद में रह रहे नेमि बाबू को लिख पत्र में मुक्तिबोध पूछते हैं। शमशेर उनके लिए देवदूत जैसी आत्मा रखने वाले इंसान हैं। “शमशेर की आस्था ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली महल अपने हाथों तैय्यार किया है। उस भवन में जाने से डर लगता है- उसकी गंभीर प्रयत्नवसाध्य गम्भीरता के कारण’’, मुक्तिबोध ने लिखा। जिस तरह ‘चांद का मुंह टेढा है’ की भूमिका में शमशेर ने मुक्तिबोध पर जो कुछ लिखा और ‘गजानन मुक्तिबोध’ शीर्षक गज़ल में उनका जैसा चित्र खींचा, वैसा फिर हिंदी में संभव नहीं हुआ, ठीक यही बात मुक्तिबोध द्वारा शमशेर पर लिखे उनके लेख, ‘शमशेरः मेरी दृष्टि में’ के बारे में भी कही जा सकती है। मुक्तिबोध ने शमशेर के ‘मौलिक, विशेष आत्मचेतस’ के दो आयाम यानी मनोरचना और मनस्तत्व या उन्हीं के शब्दों में ‘आत्मा का भूगोल’ और ‘आत्मा का इतिहास’ को उनके शिल्प के विकास का कारण माना और उनके काव्य-व्यक्तित्व और शिल्प् के अटूट जुड़ाव को रेखांकित किया। उनके ही शब्दों में, “इस शिल्प में व्यक्तित्व की क्षमता और सीमा; भाव और अभाव, सामर्थ्य़ और कमज़ोरी, ज्ञान और भ्रम सभी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं।’’
शमशेर के संदर्भ में ऐंजलिक स्पिरिट, पवित्रता, आत्मा का भूगोल और इतिहास जैसे पदों का इस्तेमाल, ज़ाहिर है कि शीतयुद्धकालीन यथार्थवाद की समझ रखनेवाले आलोचकों के लिए अबूझ ही रहा होगा। कहीं आत्मा का भी कोई भूगोल या इतिहास होता है? और होता भी हो तो क्या उसे यथार्थ कहा जा सकता है? शायद इन प्रश्नों में निहित यथार्थवाद की धारणा को ध्यान में रखते हुए ही नेरुदा ने लिखा होगा कि, “ मैं कविता में यथार्थवाद को पसंद नहीं करता..उसके यथार्थवाद-विरोधी होने के हज़ार कारण हैं।’’
रामविलास जी को शमशेर का गद्य पसंद था, कविताओं में एक भुवनेश्वर पर लिखी कविता खास पसंद थी, मार्क्सवाद और पार्टी से उनके समर्पित, सक्रिय जुड़ाव, पार्टी आफिस में रहकर उनके द्वारा जनयुग के संपादन और आफिस पर हुए हमले में शमशेर के घायल होने को अत्यंत सम्मान और आत्मीयता के साथ वे याद करते हैं अपने एक इंटरव्यू में। लेकिन रामविलास जी उनकी वैचारिक निष्ठा और कला-कौशल (जो उनकी निगाह में पश्चिम के क्षयिश्णु बिम्बवाद से प्रभावित है) के बीच संघर्ष से शमशेर की कविता को विकसित होता नहीं, बल्कि बाधाग्रस्त होता देखते हैं। रामविलास जी के अनुसार वे जनता़ को लक्ष्य करके नागार्जुन या केदार की तरह नहीं लिख सके, उनकी कला उनकी वैचारिक निष्ठा का साथ नहीं दे सकी। दरअसल हिंदी आलोचना में विचारधारा को प्रायः राजनीतिक विचारधारा ही समझा जाता है। विचारधारा के सौन्दर्यबोधी रूप जो कि साहित्य और कला में अत्यंत महत्व का होता है, उसकी शिनाख्त कम ही होती रही है। फिर सौन्दर्यबोधी विचारधारा की अन्य विचारधारात्मक रूपों से विशिष्टता भी अलक्षित ही रही।
मैनेजर पाण्डेय ने हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना की इस विडम्बना को उचित ही रेखांकित किया है। शमशेर ऐसे कवि हैं जिनकी सही पहचान इस विडम्बना से पार पाए बगैर सम्भव ही नहीं है। क्या है ‘शमशेर के कवि की आत्मा का इतिहास और भूगोल?’
‘अमन का राग’ (1945) देखिए-
“ये पूरब-पच्छिम मेरी आत्मा के ताने बाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया है
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आंच की धूप-छांव पर
बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूं
सब संस्कृतियां मेरे संगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूं
बहुत आदिम, बहुत अभिनवहम
एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे
सुलग उठे हैं
सब एक साथ ढाई अरब धडकनों में बज उठे हैं
सिम्फोनिक आनंद की तरह’’
मनोरचना या आत्मा का भूगोल इससे ज़्यादा क्या स्पष्ट होगा, वह जो सारी संस्कृतियों का संगम है, जिसका मानचित्र है कविता, जिसके शब्दों में रंग और ध्वनि की खास घुलावट ‘शमशेरियत’ की पहचान बनाती है। इस महान कविता के तीसरे हिस्से में वैसी ही स्पष्टे पहचान है ‘आत्मा के इतिहास’ की-
“मेरी देहली में प्रह्लाद की तपस्याएं दोनों दुनियाओं की
चौखट पर
युद्ध के हिरण्यकश्यप को चीर रही हैं
यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर कुर्बान
हो गया है
अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी
यह एक विशाल अनुभव की चीनी दीवार
उठती ही बढ़ती आ रही है
उसकी ईंटें धडकते हुए सुर्ख दिल हैं,
यह सच्चाइयां बहुत गहरी नीवों में जाग रही हैं
यह इतिहास की अनुभूतियां हैं
मैंने सोवियत यूसुफ के सीने पर कान रखकर सुना है।’’
शमशेर के काव्य की आत्मा के भूगोल और इतिहास में एक नए इंसान के जन्मने की आहटें हैं, भविष्य के उस मनुष्यत के जन्म का परिवेश और उसके चेहरे मोहरे को यह आत्मा की कला इतिहास के अनुभव से समृद्ध हो, महसूस तो कर सकती है, उनका वर्णन नहीं कर सकती, सिर्फ उन्हें रंग और ध्वनि संवलित शब्दों में इंगित कर सकती है। यह नया इंसान धर्म, जाति, देश और नस्ल की चहारदीवारियों, खटाने वाले श्रम से आज़ाद होगा, वह शांति, सुख और प्यार को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही पा जाएगा। वह न अतिमानव होगा, न लघु-मानव, वह नया इंसान ही होगा। मानव के इतिहास की सारी उपलब्धियां उसकी निजी होंगी। पाल राब्सन की सिंफनी और उदयशंकर का नृत्य सबका एक साथ और निजी भी होगा-
“यह महान नृत्य, यह महान स्वर, कला और संगीत
मेरा है यानी हर अदना से अदना इंसान का
बिलकुल अपना निजी।’’
कितनी अलग है निजता का यह तसव्वुर उस निजता से जो कि नयी कविता के नेता अज्ञेय की थी।
‘एक आदमी दो पहाडों को कुहनियों से ठेलता’ (1956) में यह ‘एक आदमी’ यूनिवर्सल मनुष्य है, जो किसी खास देश-काल का आदमी नहीं है, लेकिन देश-कालातीत भी नहीं है। बल्कि वह इतिहास में अपनी जययात्रा तय करती मनुष्यता का प्रतीक है। बादलों के तार उसे ‘महज’ उलझा रहे हैं। कवि शमशेर के यहां विचार और यथार्थ का आसव है जो बहुत छनने के बाद कविता में ढलता है, यों कहें कि उनके ज्ञानात्मक संवेदन की विशेषता यह है कि वे अनूभूत वास्तविकता को काफी गलाते और संघनित करके कविता में फिर से मूर्त करते हैं, अपनी ही कल्पना में फिर फिर उसे सिरजते हैं। कभी-कभी यह भी लगता है कि शमशेर व्यक्ति रूप में खुद को भी समग्र मनुष्यता के प्रतीक की तरह बरतने की कोशिश करते हैं, मानो किसी अनागत आदर्श को, भविष्यि के मनुष्य को वर्तमान में जी रहे हों। ऐसा वे कविता में भी करते हैं और अपने हठी समझौताविहीन जीवन में भी। ज़ाहिर है कि उसे कविता में जीना अधिक सुंदर, भव्य और उदात्त जीना है। कविता और कला में उन तमाम भव-बाधाओं के अतिक्रमण के भाव-कल्पनात्मक साधन अधिक हैं, जो मनुष्य को वह नहीं बनने दे रहीं जो वह सारतः है और इतिहासतः होना चाहता है। कवि का जिस्मानी जीवन उस खयाली जीवन से अलग है भी और नहीं भी-
“खयाल भी है मेरा जिस्म, गो नहीं वह मैं
या ज़िंदगी की है इक किस्म, गो नहीं वह मैं
जो होने होने को हो, वो मैं हूं-यकीन करो
खुदा भी है मेरा इस्म-गो नहीं वह मैं।’’
यह नया इंसान विश्व- मानव ही हो सकता है, अंतरराष्ट्रीय ही हो सकता है। प्रगतिशील कविता में अगर त्रिलोचन और नागार्जुन में देशज, स्थानीय, ग्रामीण संदर्भ अधिक मुखर हैं, तो शमशेर में वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय। शमशेर की कविता जिस सार्वभौम मनु्ष्यता को बिम्बवत धारण करती है, उसमें, अमूर्तन उनकी मदद करता है, बात चाहे भाषाओं, लिपियों, ललित कलाओं, संस्कृतियों की हो या फिर प्रकृति और प्रेम की।
शमशेर चाहते हैं नागार्जुन की तरह सामाजिक और राजनीतिक कविताएं लिखना, वे चाहते हैं त्रिलोचन की तरह किसान मन को अपनी कविताओं में टटोलना, लेकिन उनका कवि-व्यक्तित्व विश्व-मानवतावाद की सुदीर्घ परम्परा से जिन तत्वों को ग्रहण करता है, वे मिट्टी की देशजता से अधिक सागर और आसमान की विराट सार्वभौमता से संघटित होते हैं। शमशेर के बगैर प्रतिशील कविता का आकाश नहीं बनता। ‘गवालियर की शाम’ में मज़दूरों के लयबद्ध जुलूस का चित्र हो या जन-संघर्षों की उनकी अन्य कविताएं, हर जगह आकाश से नाता है, मुक्ति की चेतना की विराटता हर कहीं है।
शमशेर और मुक्तिबोध का सामना जिस मार्क्सवादी आलोचना से हुआ उसके पास काव्य में विचारधारा और सौंदर्यबोध के प्रश्न को समझने का कोई विकसित ढांचा न था, लेकिन उन दोनों ने एक दूसरे के बारे में जो कुछ लिखा, वह इस दिशा में विकास के महत्वपूर्ण संकेत देने वाला आलोचनात्मक लेखन है। अज्ञेय ने शमशेर के बारे में लिखा, “वह प्रगतिवादी आंदोलन के साथ रहे लेकिन उसके सिद्धांतों का प्रतिपादन करनेवाले कभी नहीं रहे… उन्होंने मान लिया कि हम उस आंदोलन के साथ हैं, और स्वयं उनकी कविता है, उसका जो बुनियादी संवेदन है, वह लगातार उसके बाहर और उसके विरुद्ध भी जाता रहा और अब भी है…. हम चाहें तो उन्हें रूमानी और बिम्बवादी कवि भी कह सकते हैं।’’ नयी कविता के मार्क्सवाद-विरोधी आलोचकों खासकर साही ने उन्हें ऐसा ही प्रमाणित किया। आश्च र्य लेकिन यह है कि मार्क्सवादी आलोचना भी जाने-अनजाने अपनी न्यूनताओं के चलते बहुधा उनकी कविता के बारे में कुछ किंतु, परंतु लगाकर लगभग ऐसा ही कामनसेंस निर्मित करती रही। उधर ‘काल तुझसे होड है मेरी’ (1988) में भी शमशेर ने जीवन के आखीरी पड़ाव पर भी यही लिखा-
….जो मैं हूं
कि मैं जिसमें सबकुछ है
क्रांतियां, कम्यून
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैंमैं,
जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है।
शमशेर जी की कविताओं को जटिल, दुरूह आदि कहे जाने के संदर्भ में खुद उनके ही एक व्याख्यान में अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में कही बात याद आती है, “बच्चे अपनी सब बातें समझा लेते हैं- बावजूद इसके कि वो शब्द बहुत से नहीं इस्तेमाल करते लेकिन इतनी अच्छी तरह से समझा लेते हैं, नन्हें-नन्हें बच्चे, कि उनकी बात सब स्पष्ट होती है। ठीक है। इसी तरह से मेरी भी बहुत सी कविताएं बच्चों जैसी अटपटी हैं। बहुत अटपटी है। लेकिन उसमें वो फोर्स बच्चों जैसा है। यानी कोई बात मैं कहना चाहता हूं और वो उन इमेजेज़ के ज़रिए आती है जो मेरे सामने आ जाते हैं।’’ शायद बच्चों जैसा होना ही ‘एंजेलिक स्पिरिट’ का होना है। मुक्तिबोध कैसे न जानते भला यह बात शमशेर की ?
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