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शमशेर, केदार और नागार्जुन जन्‍मशती पर आयोजन 27 को

नई दि‍ल्‍ली : कवि‍ शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की जन्‍मशती के अवसर जन संस्‍कृति‍ मंच, लखनऊ की ओर 27 फरवरी, 2011 को उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान, हजरतगंज, लखनऊ में कार्यक्रम काल से होड़ करती कवि‍ता का आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम में मुख्‍य अति‍थि‍ मैनेजर पाण्‍डेय और वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ राजेन्‍द्र कुमार व बलराज पाण्‍डेय होंगे। कार्यक्रम का पहला सत्र दोपहर 3.30 शुरू होगा। इसकी अध्‍यक्षता नरेश सक्‍सेना करेंगे। इसमें शमशेर, केदार और नागार्जुन की कवि‍ताओं का पाठ कि‍या जाएगा। साथ ही चंद्रशेखर के कवि‍ता संग्रह अब भी का लोकार्पण कि‍या जाएगा। इनके अलावा हमारे वक्‍त शमशेर का महत्‍व व प्रासंगि‍कता पर मैनेजर पाण्‍डेय, हमारे अपने व जरूरी नागार्जुन पर राजेन्‍द्र कुमार और समय के महत्‍वसि‍द्ध कवि‍ केदार पर बलराज पाण्‍डेय का व्‍याख्‍यान होगा।

दूसरा सत्र शाम 7.00 बजे शुरू होगा। इसमें हमारे सम्‍मुख शमशेर के तहत उनके कवि‍ता पाठ की वीडि‍यो फि‍ल्‍म का प्रदर्शन कि‍या जाएगा।

शमशेर की कवि‍ता में प्राइवेट-पब्‍लि‍क के बीच अंतराल नहीं : डंगवाल

नई दि‍ल्‍ली: शमशेर अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। उनसे हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से वाबस्ता रहने की सीख मिली। 21 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय शमशेर जन्मशती समारोह में ‘शमशेर और मेरा कविकर्म’ नामक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चर्चित कवि वीरेन डंगवाल ने यह बात कही। इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया, जिसमें उनके समकालीन कई कवियों ने उनकी कविता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे।

कवि अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छुने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। कवि मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी प्रेम कविताओं में अमूर्तन है। त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को संवेदना को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर बेहद उदार और जनपक्षधर थे। स्वप्न और यथार्थ की उनकी कविताओं में गहरा मेल दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी पक्षधरता थी और स्त्री की स्वतंत्र बनाने पर उनका जोर था। उनके प्रभाव से उनका कविता,  मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है,  उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। इसके साथ ही पार्टी और व्यक्ति का द्वंद्व भी। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। यद्यपि नागार्जुन के बाद उनकी कविता के सर्वाधिक पोस्टर बने, लेकिन वे जनसंघर्षों के नहीं, बल्कि संघर्षों के बाद की मुक्ति के आनंद के कवि हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत शमशेर द्वारा पढ़ी गई उनकी कविताओं के वीडियो के प्रदर्शन से हुई। काव्यपाठ की अध्यक्षता इब्बार रब्बी और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दि‍न 22 जनवरी को आयोजि‍त कार्यक्रम कर अध्‍यक्षता करते हुए चर्चित मार्क्सवादी आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि‍ शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं,  जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि‍ प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैरप्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है।

साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी़ विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे। गद्य ही सीमाएं को तोड़ता हैं। इसे मुक्ति का माध्यम समझना चाहिए।

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है।

इलाहाबाद से आए आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। कवि-आलोचक सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

युवा कथाकार अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है,  इस ओर वह बार-बार संकेत करते हैं। युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानीयत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है,  जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। कवि-पत्रकार अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया। हालिया प्रकाशित दूधनाथ सिंह द्वारा संपादित संस्मरणों की किताब के फ्लैप पर अज्ञेय की टिप्पणी को उन्होंने इसी तरह की प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। उन्होंने शमशेर की कुछ कम चर्चित कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनमें आत्मालोचना, द्वंद्व और मोह भी है।

आयोजन में कला आलोचक रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। यह व्याख्यान उनके चित्रों और कविताओं को समझने के लिहाज से काफी जानकारीपूर्ण था। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। शमशेर का गद्य भी महत्वपूर्ण है जो उनके चित्र और कविता को समझने में मदद करता है और उसी तरह चित्रकला उनकी कविता को समझने में मददगार है।

सुप्रसिद्ध चित्रकार-साहित्यकार अशोक भौमिक ने चित्रकला के जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं। इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।

शमशेर: वह ‘एंजेलिक स्पिरिट’ : प्रणय कृष्ण

13 जनवरी, 1911 को देहरादून में जन्‍में कवि‍ शमशेर बहादुर सिंह प्रगति‍शील त्रयी के एक स्‍तंभ हैं। साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कार आदि‍ सम्‍मानों से सम्‍मानि‍त शमशेर के रचनाकर्म और वि‍चारधारा पर युवा आलोचक और जन संस्‍कृति‍ मंच के महासचि‍व प्रणय कृष्‍ण का आलेख-

“What about my dear Shamsher, that Angelic spirit?”। नागपुर से 3.5.49 को इलाहाबाद में रह रहे नेमि बाबू को लिख पत्र में मुक्तिबोध पूछते हैं। शमशेर उनके लिए देवदूत जैसी आत्मा रखने वाले इंसान हैं। “शमशेर की आस्था ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली महल अपने हाथों तैय्यार किया है। उस भवन में जाने से डर लगता है- उसकी गंभीर प्रयत्नवसाध्य गम्भीरता के कारण’’, मुक्तिबोध ने लिखा। जिस तरह ‘चांद का मुंह टेढा है’ की भूमिका में शमशेर ने मुक्तिबोध पर जो कुछ लिखा और ‘गजानन मुक्तिबोध’ शीर्षक गज़ल में उनका जैसा चित्र खींचा, वैसा फिर हिंदी में संभव नहीं हुआ, ठीक यही बात मुक्तिबोध द्वारा शमशेर पर लिखे उनके लेख, ‘शमशेरः मेरी दृष्टि ‍ में’ के बारे में भी कही जा सकती है। मुक्तिबोध ने शमशेर के ‘मौलिक, विशेष आत्मचेतस’ के दो आयाम यानी मनोरचना और मनस्तत्व या उन्हीं के शब्दों में ‘आत्मा का भूगोल’ और ‘आत्मा का इतिहास’ को उनके शि‍ल्प के विकास का कारण माना और उनके काव्य-व्यक्तित्व और शि‍ल्प् के अटूट जुड़ाव को रेखांकित किया। उनके ही शब्दों में, “इस शि‍ल्प में व्यक्तित्व की क्षमता और सीमा; भाव और अभाव, सामर्थ्य़ और कमज़ोरी, ज्ञान और भ्रम सभी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं।’’
शमशेर के संदर्भ में ऐंजलिक स्पिरिट, पवित्रता, आत्मा का भूगोल और इतिहास जैसे पदों का इस्तेमाल, ज़ाहिर है कि शीतयुद्धकालीन यथार्थवाद की समझ रखनेवाले आलोचकों के लिए अबूझ ही रहा होगा। कहीं आत्मा का भी कोई भूगोल या इतिहास होता है? और होता भी हो तो क्या उसे यथार्थ कहा जा सकता है? शायद इन प्रश्‍नों में निहित यथार्थवाद की धारणा को ध्यान में रखते हुए ही नेरुदा ने लिखा होगा कि, “ मैं कविता में यथार्थवाद को पसंद नहीं करता..उसके यथार्थवाद-विरोधी होने के हज़ार कारण हैं।’’
रामविलास जी को शमशेर का गद्य पसंद था, कविताओं में एक भुवनेश्वर पर लिखी कविता खास पसंद थी, मार्क्सवाद और पार्टी से उनके समर्पित, सक्रिय जुड़ाव, पार्टी आफिस में रहकर उनके द्वारा जनयुग के संपादन और आफिस पर हुए हमले में शमशेर के घायल होने को अत्यंत सम्मान और आत्मीयता के साथ वे याद करते हैं अपने एक इंटरव्यू में। लेकिन रामविलास जी उनकी वैचारिक निष्ठा और कला-कौशल (जो उनकी निगाह में पश्चिम‍ के क्षयिश्णु बिम्बवाद से प्रभावित है) के बीच संघर्ष से शमशेर की कविता को विकसित होता नहीं, बल्कि बाधाग्रस्त होता देखते हैं। रामविलास जी के अनुसार वे जनता़ को लक्ष्य करके नागार्जुन या केदार की तरह नहीं लिख सके, उनकी कला उनकी वैचारिक निष्ठा  का साथ नहीं दे सकी। दरअसल हिंदी आलोचना में विचारधारा को प्रायः राजनीतिक विचारधारा ही समझा जाता है। विचारधारा के सौन्दर्यबोधी रूप जो कि साहित्य और कला में अत्यंत महत्व का होता है, उसकी शि‍नाख्त कम ही होती रही है। फिर सौन्दर्यबोधी विचारधारा की अन्य विचारधारात्मक रूपों से विशि‍ष्टता भी अलक्षित ही रही।
मैनेजर पाण्डेय ने हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना की इस विडम्बना को उचित ही रेखांकित किया है। शमशेर ऐसे कवि हैं जिनकी सही पहचान इस विडम्बना से पार पाए बगैर सम्भव ही नहीं है। क्या है ‘शमशेर के कवि की आत्मा का इतिहास और भूगोल?’
‘अमन का राग’ (1945) देखिए-
“ये पूरब-पच्छिम मेरी आत्मा के ताने बाने हैं
मैंने एशि‍या की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया है
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आंच की धूप-छांव पर
बहुत हौले-हौले से नाच रहा हूं
सब संस्कृतियां मेरे संगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूं
बहुत आदिम, बहुत अभिनवहम
एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे
सुलग उठे हैं
सब एक साथ ढाई अरब धडकनों में बज उठे हैं
सिम्फोनिक आनंद की तरह’’
मनोरचना या आत्मा का भूगोल इससे ज़्यादा क्या स्पष्ट होगा, वह जो सारी संस्कृतियों का संगम है, जिसका मानचित्र है कविता, जिसके शब्दों में रंग और ध्वनि की खास घुलावट ‘शमशेरियत’ की पहचान बनाती है। इस महान कविता के तीसरे हिस्से में वैसी ही स्पष्टे पहचान है ‘आत्मा के इतिहास’ की-
“मेरी देहली में प्रह्लाद की तपस्याएं दोनों दुनियाओं की
चौखट पर
युद्ध के हिरण्यकश्यप को चीर रही हैं
यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर कुर्बान
हो गया है
अभी सत्य की खोज तो बाकी ही थी
यह एक विशाल अनुभव की चीनी दीवार
उठती ही बढ़ती आ रही है
उसकी ईंटें धडकते हुए सुर्ख दिल हैं,
यह सच्चाइयां बहुत गहरी नीवों में जाग रही हैं
यह इतिहास की अनुभूतियां हैं
मैंने सोवियत यूसुफ के सीने पर कान रखकर सुना है।’’
शमशेर के काव्य की आत्मा के भूगोल और इतिहास में एक नए इंसान के जन्मने की आहटें हैं, भविष्य के उस मनुष्यत के जन्म का परिवेश और उसके चेहरे मोहरे को यह आत्मा की कला इतिहास के अनुभव से समृद्ध हो, महसूस तो कर सकती है, उनका वर्णन नहीं कर सकती, सिर्फ उन्हें रंग और ध्वनि संवलित शब्दों में इंगित कर सकती है। यह नया इंसान धर्म, जाति, देश और नस्ल की चहारदीवारियों, खटाने वाले श्रम से आज़ाद होगा, वह शांति, सुख और प्यार को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही पा जाएगा। वह न अतिमानव होगा, न लघु-मानव, वह नया इंसान ही होगा। मानव के इतिहास की सारी उपलब्धियां उसकी निजी होंगी। पाल राब्सन की सिंफनी और उदयशंकर का नृत्य सबका एक साथ और निजी भी होगा-
“यह महान नृत्य, यह महान स्वर, कला और संगीत
मेरा है यानी हर अदना से अदना इंसान का
बिलकुल अपना निजी।’’
कितनी अलग है निजता का यह तसव्वुर उस निजता से जो कि नयी कविता के नेता अज्ञेय की थी।
‘एक आदमी दो पहाडों को कुहनियों से ठेलता’ (1956) में यह ‘एक आदमी’ यूनिवर्सल मनुष्य है, जो किसी खास देश-काल का आदमी नहीं है, लेकिन देश-कालातीत भी नहीं है। बल्कि वह इतिहास में अपनी जययात्रा तय करती मनुष्यता का प्रतीक है। बादलों के तार उसे ‘महज’ उलझा रहे हैं। कवि शमशेर के यहां विचार और यथार्थ का आसव है जो बहुत छनने के बाद कविता में ढलता है, यों कहें कि उनके ज्ञानात्मक संवेदन की विशेषता यह है कि वे अनूभूत वास्तविकता को काफी गलाते और संघनित करके कविता में फिर से मूर्त करते हैं, अपनी ही कल्पना में फिर फिर उसे सिरजते हैं। कभी-कभी यह भी लगता है कि शमशेर व्यक्ति रूप में खुद को भी समग्र मनुष्यता के प्रतीक की तरह बरतने की कोशि‍श करते हैं, मानो किसी अनागत आदर्श को, भविष्यि के मनुष्य को वर्तमान में जी रहे हों। ऐसा वे कविता में भी करते हैं और अपने हठी समझौताविहीन जीवन में भी। ज़ाहिर है कि उसे कविता में जीना अधिक सुंदर, भव्य और उदात्त जीना है। कविता और कला में उन तमाम भव-बाधाओं के अतिक्रमण के भाव-कल्पनात्मक साधन अधिक हैं, जो मनुष्य  को वह नहीं बनने दे रहीं जो वह सारतः है और इतिहासतः होना चाहता है। कवि का जिस्मानी जीवन उस खयाली जीवन से अलग है भी और नहीं भी-
“खयाल भी है मेरा जिस्म, गो नहीं वह मैं
या ज़िंदगी की है इक किस्म, गो नहीं वह मैं
जो होने होने को हो, वो मैं हूं-यकीन करो
खुदा भी है मेरा इस्म-गो नहीं वह मैं।’’
यह नया इंसान विश्व- मानव ही हो सकता है, अंतरराष्ट्रीय ही हो सकता है। प्रगतिशील कविता में अगर त्रिलोचन और नागार्जुन में देशज, स्थानीय, ग्रामीण संदर्भ अधिक मुखर हैं, तो शमशेर में वैश्‍वि‍क और अंतरराष्ट्रीय। शमशेर की कविता जिस सार्वभौम मनु्ष्यता को बिम्बवत धारण करती है, उसमें, अमूर्तन उनकी मदद करता है, बात चाहे भाषाओं, लिपियों, ललित कलाओं, संस्कृतियों की हो या फिर प्रकृति और प्रेम की।
शमशेर चाहते हैं नागार्जुन की तरह सामाजिक और राजनीतिक कविताएं लिखना, वे चाहते हैं त्रिलोचन की तरह किसान मन को अपनी कविताओं में टटोलना, लेकिन उनका कवि-व्यक्तित्व विश्व-मानवतावाद की सुदीर्घ परम्परा से जिन तत्वों को ग्रहण करता है, वे मिट्टी की देशजता से अधिक सागर और आसमान की विराट सार्वभौमता से संघटित होते हैं। शमशेर के बगैर प्रतिशील कविता का आकाश नहीं बनता। ‘गवालियर की शाम’ में मज़दूरों के लयबद्ध जुलूस का चित्र हो या जन-संघर्षों की उनकी अन्य कविताएं, हर जगह आकाश से नाता है, मुक्ति की चेतना की विराटता हर कहीं है।
शमशेर और मुक्तिबोध का सामना जिस मार्क्सवादी आलोचना से हुआ उसके पास काव्य में विचारधारा और सौंदर्यबोध के प्रश्न  को समझने का कोई विकसित ढांचा न था, लेकिन उन दोनों ने एक दूसरे के बारे में जो कुछ लिखा, वह इस दिशा में विकास के महत्वपूर्ण संकेत देने वाला आलोचनात्मक लेखन है। अज्ञेय ने शमशेर के बारे में लिखा, “वह प्रगतिवादी आंदोलन के साथ रहे लेकिन उसके सिद्धांतों का प्रतिपादन करनेवाले कभी नहीं रहे… उन्होंने मान लिया कि हम उस आंदोलन के साथ हैं, और स्वयं उनकी कविता है, उसका जो बुनियादी संवेदन है, वह लगातार उसके बाहर और उसके विरुद्ध भी जाता रहा और अब भी है…. हम चाहें तो उन्हें रूमानी और बिम्बवादी कवि भी कह सकते हैं।’’ नयी कविता के मार्क्सवाद-विरोधी आलोचकों खासकर साही ने उन्हें ऐसा ही प्रमाणित किया। आश्च र्य लेकिन यह है कि मार्क्सवादी आलोचना भी जाने-अनजाने अपनी न्यूनताओं के चलते बहुधा उनकी कविता के बारे में कुछ किंतु, परंतु लगाकर लगभग ऐसा ही कामनसेंस निर्मित करती रही। उधर ‘काल तुझसे होड है मेरी’ (1988) में भी शमशेर ने जीवन के आखीरी पड़ाव पर भी यही लिखा-
….जो मैं हूं
कि मैं जिसमें सबकुछ है
क्रांति‍यां, कम्यून
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैंमैं,
जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है।
शमशेर जी की कविताओं को जटिल, दुरूह आदि कहे जाने के संदर्भ में खुद उनके ही एक व्याख्यान में अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में कही बात याद आती है, “बच्चे अपनी सब बातें समझा लेते हैं- बावजूद इसके कि वो शब्द बहुत से नहीं इस्तेमाल करते लेकिन इतनी अच्छी तरह से समझा लेते हैं, नन्हें-नन्हें बच्चे, कि उनकी बात सब स्पष्ट होती है। ठीक है। इसी तरह से मेरी भी बहुत सी कविताएं बच्चों जैसी अटपटी हैं। बहुत अटपटी है। लेकिन उसमें वो फोर्स बच्चों जैसा है। यानी कोई बात मैं कहना चाहता हूं और वो उन इमेजेज़ के ज़रिए आती है जो मेरे सामने आ जाते हैं।’’ शायद बच्चों जैसा होना ही ‘एंजेलिक स्पिरिट’ का होना है। मुक्तिबोध कैसे न जानते भला यह बात शमशेर की ?

शमेशर की जन्मशती पर 21 और 22 जनवरी को वि‍शेष आयोजन

नई दि‍ल्ली: हिंदी के अप्रति‍म कवि‍ और गद्य शि‍ल्पी‍ शमशेर बहादुर सिंह के जन्मशती के अवसर पर जन संस्कृ्ति‍ मंच की ओर से 21 और 22 जनवरी को गांधी शांति‍ प्रति‍ष्ठान, नई दि‍ल्‍ली में दो दि‍वसीय आयोजन कि‍या जा रहा है। पहले दि‍न 21 जनवरी को कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर 2 बजे अशोक भौमि‍क द्वारा बनाए गए कवि‍ता पोस्टरों के लोकार्पण से होगी।
इस अवसर पर जनकवि‍ रमाशंकर यादव ‘वि‍द्राही’ की पहली कवि‍ता पुस्तक ‘नयी खेती’ का लोकार्पण कि‍या जाएगा। वि‍द्रोही का परि‍चय शेफालि‍का शेखर द्वारा दि‍या जाएगा। शमशेर और मेरा कवि‍ कर्म वि‍षय पर कवि‍ गि‍रधर राठी, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, इब्बार रब्बी, असद जैदी, शोभा सिंह, त्रि‍नेत्र जोशी, अनामि‍का, मनमोहन, मदन कश्यप, शुभा, पंकज चतुर्वेदी वि‍चार रखेंगे। इस सत्र की अध्य क्षता कुंवर नारायण और संचालन अच्युतानंद मि‍श्र करेंगे। दूसरा सत्र शाम 5.30 बजे शुरू होगा। इसमें गि‍रधर राठी, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, दि‍नेश कुमार शुक्‍ल, नि‍र्मला गर्ग, कुबेर दत्त , शोभा सिंह, लीलाधर मंडलोई, अनामि‍का, मनमोहन, मदन कश्याप, शुभा, देवीप्रसाद मि‍श्र, रमाशंकर यादव ‘वि‍द्रोही’, मंगलेश डबराल, कृष्ण  कल्पित, रंजीत वर्मा और पंकज चतुर्वेदी काव्य पाठ करेंगे। इसकी अध्यक्षता इब्बार रब्बी  और संचालन आशुतोष कुमार करेंगे।
दूसरे दि‍न 22 जनवरी को कार्यक्रम 11 बजे शुरू होगा। पहले सत्र का वि‍षय है- शमशेर की कवि‍ता। अध्यक्षता वि‍श्व नाथ त्रि‍पाठी करेंगे। इस वि‍षय पर राजेन्द्र  कुमार, अजय सिंह, आशुतोष कुमार और सुरेश सलि‍ल वि‍चार रखेंगे। संचालन भाषा सिंह करेंगी। दूसरा सत्र 1.30 बजे शुरू होगा। इसमें शमशेर का गद्य वि‍षय पर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, गोपाल प्रधान, अल्पना मि‍श्र और योगेंद्र आहूजा वक्तव्य देंगे। इसकी अध्यक्षता नि‍त्यानंद ति‍वारी और संचालन सुधीर सुमन करेंगे। तीसरा सत्र 3.15 बजे शुरू होगा। इसके वि‍षय-  शमशेर: हिंदी-उर्दू के दो’आब पर जानकी प्रसाद शर्मा, जुबैर रि‍जवी, असगर वजाहत और नूर जहीर वि‍चार रखेंगे। इसकी अध्यक्षता मैनेजर पाण्डेय और संचालन गोपाल प्रधान करेंगे।
चौथा सत्र 4.30 बजे शुरू होगा। इसका वि‍षय है- शमशेर की कवि‍ता और चि‍त्रकला। इसकी अध्यक्षता अनि‍ल सि‍न्हा करेंगे। रमण सि‍न्हा द्वारा शमशेर के चि‍त्रों पर पावर प्वा‍इंट प्रस्तुति‍ की जाएगी। अशोक भौमि‍क ओर धर्मेंद्र सुशांत वक्तगय  देंगे। इसके साथ ही ब्रजेश यादव द्वारा शमशेर की मुक्ति‍‍बोध पर लि‍खी गजल का गायन कि‍या जाएगा। इस सत्र का संचालन संजय जोशी करेंगे।

शमशेर जन्मशताब्दी समारोह 25-26 सितंबर को

दिल्ली: जन संस्कृति मंच 25-26 सितंबर को कवि शमशेर बहादुर सिंह के जन्मशताब्दी के मौके पर दिल्ली में समारोह का आयोजन करेगा। पिछले दिनों साउथ एक्सटेंशन में आयोजित जसम, दिल्ली की बैठक में यह निर्णय लिया गया। जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय, जसम दिल्ली की सचिव भाषा, चित्राकार अशोक भौमिक, कवि मदन कश्यप और रंजीत वर्मा समेत जसम के कई सदस्य मौजूद थे। कवि व पत्रकार मंगलेश डबराल को शमशेर जन्मशताब्दी समारोह समिति का संयोजक बनाया गया।
समारोह में एक सत्र उन कवियों के वक्तव्य पर केंद्रित होगा जो अपने काव्य-कर्म पर शमशेर का प्रभाव मानते हैं। शमशेर की कविता, गद्य और चित्रकला पर केंद्रित सत्र भी होंगे। आखिरी सत्र उर्दू और हिंदी के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के बतौर उनकी भूमिका पर केंद्रित होगा। उनकी कविता पर केंद्रित पोस्टर प्रदर्शनी लगाई जाएगी तथा उनके जीवन और रचनाकर्म पर केंद्रित किताब का प्रकाशन भी किया जाएगा।
बैठक में सुप्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध की जीवन संगिनी शांता मुक्तिबोध के निधन पर शोक प्रकट किया गया। राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार हेमचंद्र पांडेय की फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्या की न्यायिक जांच किए जाने संबंधी क्रांतिकारी कवि वरवर राव की मांग के समर्थन में भी प्रस्ताव लिया गया।