
प्रेमचंद को उनकी जयंती पर याद कर रहे हैं वरिष्ठ कवि और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी-
जो साहित्य बड़ा होता है, वह निजी भी होता है। प्रेमचंद हर पाठक के आत्मीय हैं। जैसे- पिताजी या मां हैं। सबके लिए हैं, लेकिन तुम्हारे निजी हैं। बड़ा रचनाकार अपने प्रशंसक और पाठक का आत्मीय होता है। जैसे- तुलसी के राम हैं। उत्तरी भारत की सामान्य जनता के राम वैसे हैं, जैसे तुलसी ने प्रतिष्ठित कर दिया। मेरे लिए मेरा गांव है या गांव का किसान है या जो वहां की प्रकृति है या जो पशु-पक्षी हैं, वो वही हैं, जैसा प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दिखाया है। जो हमारा ग्रामीण जगत है, उसकी प्रेमचंद ने अपने साहित्य में मानों पूर्ण रचना की है। मुझे प्रेमचंद के साहित्य का अनुभव एक स्वाद की तरह होता है। तो इसका परिणाम है कि प्रेमचंद एक लेखक के रूप में तो जाने जाते ही हैं, प्रेमचंद हमारी जातीय संस्कृति या जो हमारा परिवार है, सांस्कृतिक परिवार है, उसके जैसे बुजुर्ग सदस्य की तरह लगते हैं।
मैंने प्रेमचंद पर कविता लिखी थी। यह कविता मेरे एक आत्मीय लेखक शेखर जोशी को बहुत पसंद आई थी। इसकी पंक्तियां इस तरह थीं-
बात उन्नीस सौ चौंतीस-पैंतीस की होगी
मैं पांच-छह साल का रहा होऊंगा
तो प्रेमचंद मेरे गांव आए थे
उस समय मेरे पिताजी बैलों की सानी-पानी कर रहे थे
उन्होंने प्रेमचंद को रस-पानी पिलाया
और पता नहीं क्या-क्या बातें कीं
मेरे पिताजी ने उन दिनों मेरी बड़ी बहन की शादी के लिए
कुछ जमीन रहन रखी थी।
प्रेमचंद ने मुझे और मेरे छोटे भाई को
गुड़-पट्टी खाने को दी।
वो मुझे कंधे पर बिठाकर
पूरा गांव देख आए
प्रेमचंद ने होरी और धनिया को
मेरे गांव में ही देखा था
हलकू और जाबरा को भी।
दो-तीन दिन मेरे गांव में रहकर
फिर प्रेमचंद लमही गए
वो मुझे अब देखें तो भी पहचान लेंगे
बोलेंगे- ‘अरे तेजबहादुर तिवारी के पूत बिसनाथ, तुम इत्ते बड़े हो गए। बुढ़ाए गए।’
हमारे लिए और हमारे जैसे पाठकों के लिए, जिनकी अपार संख्या है, प्रेमचंद का रूप ऐसा है। हम उनके निष्पक्ष या तटस्थ पाठक या आलोचक नहीं हो सकते।
मेरे पिताजी दर्जा एक तक पढ़े थे। खेत में कुदाल चलाते थे। ब्राह्मणवादी थे। कर्मकांड पर विश्वास करते थे। जवाहर लाल नेहरू उनकी तुलना में बहुत बड़े आदमी थे। लेकिन मैं जवाहर लाल नेहरू को पिता नहीं कह सकता। ऐसा ही समझिए।
यह बात मैं पहले भी कई जगह कह चुका हूं कि प्रेमचंद का शायद ही कोई प्रसिद्ध पात्र हो जो कानपुर के पश्चिम और बनारस के पूर्व का हो। उनका रचना संसार ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश का है। उनकी अधिकांश रचनाओं का काल 1910 के आसपास से 1936 तक है। ‘कर्बला’ जैसी कुछ रचनाएं ही ऐतिहासिक या पौराणिक हैं। यानी प्रेमचंद के रचना संसार का देशकाल बहुत सीमित है। लेकिन इसी सीमित देशकाल का चित्रण प्रेमचंद ने इस तरह किया है कि वे भारतीय साहित्य के या कम से कम हिंदी क्षेत्र के सर्वाधिक अंतरराष्टरीय ख्याति के कथाकार हैं। वस्तुत: यह देशीयता रचनाकार की अपनी आधारभूमि है, जिससे वो कालजयी होता है। यह वह इतिहास है, जिसके आधार पर वह साहित्य कालबिद्ध होकर कालजयी या कालातीत होता है। और यह बात स्वाधीनता आंदोलन के दौर में सिर्फ रचनाकार पर घटित नहीं होती। वह लेखकों और राजनीतिज्ञों दोनों पर लगभग समान रूप से लागू होती है। गांधी जी ठेठ गुजराती थे। ‘स’ को ‘श’ ही बोलते थे। हिंदी खड़ी बोली अपने ढंग से बोलते थे। गुजराती भाषा और साहित्य को उनका ऐतिहासिक योगदान है। और वे हमारे सबसे बड़े विश्व नागरिक हैं। जवाहर लाल नेहरू इतना-उतना नहीं, हमेशा इत्ता-उत्ता बोलते थे। ठेठ इलाहाबादी बोली है। लेकिन उनकी अंतरराष्टरीयता जगजाहिर है। यही बात आप रवींद्रनाथ ठाकुर, राजगोपालाचार्य, कम्युनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महामंत्री पी.सी. जोशी आदि के बारे में भी कह सकते हैं।
प्रेमचंद ने अपने समय का अंतरराष्टरीय कथा साहित्य पढ़ रखा था। वे मोपासा, ओ हेनरी, चेखव को आदर्श कहानीकार मानते थे। ताल्सताय, मैक्सिम गोर्की, नगुची उनके बहुत प्रिय थे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इनमें से किसी का प्रभाव उनके लेखन पर नहीं पड़ा। यह बात हमारे समकालीन विशेषकर उदित और उदीयमान कथाकारों को विशेष रूप से नोट करनी चाहिए कि गहरे तौर पर और रचनात्मक तौर पर प्रभावित होने की उपलब्धि रचनात्मक तौर पर प्रभाव मुक्त और निजी होने में है। किसी के जैसा होने में नहीं। रचनात्मक दृष्टि से किसी के जैसा होने का मतलब व्यर्थ, अनावश्यक होना होता है।
कुछ लोगों ने जहां तक मुझे याद पड़ता है, निर्मल वर्मा ने कहा है कि भारतीय उपन्यास लिखे ही नहीं गए। नामवर जी ने इस कथन को समर्थित किया। निर्मल वर्मा और नामवर जी बड़े नाम हैं (नाम तो प्रेमचंद का भी बड़ा है)। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का शिल्प कैसा है? उन पर ‘चंद्रकांता संतति’, ‘तिलिस्म होशरूबा’, ‘पंचतंत्र’, ‘जातक’ अदि का प्रभाव है। कथा प्राय: ऐसे शुरू होती है, जैसे कोई जानकार बुजुर्ग गांव के चौपाल में या अलाव के आसपास हाथ तापते हुए लोगों को कहानियां सुना रहा हो। प्रेमचंद का कथा शिल्प ठेठ भारतीय है। और फिर उनकी कथावस्तु क्या अभारतीय है? इसलिए प्रेमचंद के रहते हुए भारतीय उपन्यास को नकारना समझ में न आने वाली बात है। प्रेमचंद की तो बात छोडि़ए, जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है, वह भी गैरभारतीय नहीं है। वस्तुत: जादुई यथार्थवाद यथार्थ को ही और अधिक प्रभावी बनाने के लिए होता है। मुझे मार्खेज पढ़ते समय कई स्थानों पर पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘चारू चंद्रलेख’ के कई प्रसंग याद आते हैं। प्रेमचंद की कई कहानियों में यह जादुई यथार्थ मिलता है। जैसे- ‘आत्मराम’ में महादेव सुनार और उनके प्रिय तोते की आवाज के वर्तमान में भी आधी रात को सुनाई पड़ती है। जादुई यथार्थवाद कोई किताबी चीज नहीं है। यह निरक्षर और अशिक्षित जनता के सामान्य जीवन में व्यवहारित होता है। विधवा औरत अपने सुख-दुख में दिवंगत पति से ऐसे बात करती है, मानों वह जीवित हो और सामने बैठा हो, ‘देखा टहल के बप्पा, तुम्हारा लड़का हमसे क्या कह रहा है?’ बिल्कुल इसी तरह की स्थिति ‘वन हंडरेड इयर्स ऑफ साल्यूटेड’ में है। इसी उपन्यास का घनघोर वर्षा या दृश्य मुझे ‘कामायनी’ के ‘चिंता’ सर्ग की याद दिलाता है। इसलिए भारतीय और अभारतीय का निर्णय जरा देर से करना चाहिए।
प्रारंभिक दौर में हिंदी के अनेक वरिष्ठ आलोचकों ने प्रेमचंद को द्वितीय श्रेणी का रचनाकार कहा। उनके अनुसार प्रेमचंद उत्कृष्ट कथाकार नहीं, वह उपदेशक का सिद्धांत प्रचारक अधिक हैं। हिंदी पाठकों को बताने की जरूरत नहीं कि यह आरोप कबीर और तुलसी पर भी लगाया जाता है। वस्तुत: श्रेष्ठ रचना चमत्कृत नहीं करती, प्रभावित करती है। कलावादियों के पात्र सहज और सामान्य नहीं होते। वे प्रभावित कम करते हैं, चौंकाते ज्यादा हैं। जिस तरह अपेक्षाकृत अधिक संपन्न वर्ग अपने खान-पान और जीवन व्यवहार में विशिष्ट होता है, इसी तरह संपन्न वर्ग की मानसिकता या कुलीनतावादी लेखकों के पात्र और उनका शिल्प असामान्य और असहज होता है। शेखर एक पेड़ की डाल को काटकर उसे एस (स्) आकार देता है क्योंकि उसकी पे्रमिका का नाम शशि है। यानी उसके नाम की स्पेलिंग ‘एस’ से शुरू होती है। प्रेमचंद के पात्र ऐसा नहीं कर सकते। निर्मल वर्मा के साहित्य में शायद ही कभी कोई पात्र जोर से बोलता हो, हवा तेजी से चलती हो, दरवाजा जोर से खुलता हो। परसाई ने लिखा है कि मैं रिक्शे वालों पर भी लिखता हूं, मैं भिखमंगों पर भी लिखता हूं तो मैं सिर्फ चीड़ों की चांदनी पर कैसे लिख सकता हूं। मुझे लगता है, यदि मैं जोर से बोला तो निर्मल का रचना संसार फूं से उड़ जाएगा या बिखर जाएगा।
जीवन और संसार में ऐसा भी है, जहां अज्ञेय और निर्मल के पात्र यथार्थ हैं। लेकिन जो इनसे भिन्न हैं, वे कहीं बहुत ज्यादा और व्यापक हैं। और दुर्भाग्यवश भारत का यथार्थ बेरोजगारों, अशिक्षितों, दलितों, पराधीन नारियों, रोगियों, दहेज के लोभियों, शोषितों और शोषकों का यथार्थ है। इन पात्रों का शिल्प और उनकी भाषा चीख और चिल्लाहट की होगी, कानाफूसी या धीमी नहीं।
प्रेमचंद की रचनात्मक कला के एक उदाहरण पर गौर करें। उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास का नाम ‘गोदान’ है। उर्दू वाले उसे ‘गऊदान’ पढ़ते हैं। कमल किशोर गोयनका कह सकते हैं कि वह प्रेमचंद के हिंदुत्ववाद का प्रमाण है कि इस महाकाव्यात्मक उपन्यास के केंद्र में गो माता है। दूसरी तरफ अति वामपंथी (नाम लेना खतरनाक है) कमल किशोर गोयनका का विरोध करते हुए भी सारत: उनसे सहमत होंगे कि यह प्रेमचंद की प्रतिक्रियावादिता है। गो होरी का स्वप्न है। जैसा कि एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान का स्वप्न होता है या था। होरी का यह स्वप्न पूरा नहीं होता। मृत्यु के समय यह गऊ होरी की अंतिम मूर्छा में फिर आती है-
‘फिर एक गाय का चित्र सामने आया, बिल्कुल कामधेनु-सी। उसने उसका दूध दुहा और मंगल को पिला रहा था कि गाय एक देवी बन गई और…।’
होरी की मृत्यु हो रही है।
हीरा ने रोते हुए कहा- ‘भाभी, दिल कड़ा करो, गो-दान करा दो, दादा चले।’
धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आंखों से देखा। अब वह दिल को और कितना कठोर करे? अपने पति के प्रति उसका जो कर्म है, क्या वह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था, उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है?
और कई आवाजें आयीं- ‘हां, गो-दान करा दो, अब यही समय है।’
धनिया यंत्र की भांति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली, ‘महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है।’ और पछाड़ खाकर गिर गई।
यह कैसा गोदान है? और यह कैसी गऊ है? यहां कर्मकांड के प्रति चित्रित जीवन स्थितियों के कारण कितनी घृणा और विरक्ति है। ब्राह्मणवादी कर्मकांड के प्रति ऐसी घृणा, संवेदना आज भी किसी दलित लेखक ने नहीं पैदा की है। यहां प्रेमचंद सिद्धांतवादी नहीं, नारेबाज नहीं, आदर्शवादी नहीं, ऐतिहासिक नैतिकता को सौंदर्यबोध के आस्वाद में परिणित कर सकने वाले महान भारतीय रचनाकार के रूप में देखे जा सकते हैं।
प्रेमचंद को आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचनाकार कहा जाता है। इस विषय में पहली बात तो ध्यान में रखने की यह हैै कि यह आदर्शवादी वातावरण प्रेमचंद की सिर्फ रचनाओं में नहीं है, वह प्रेमचंद के राजनीतिक और सांस्कृतिक वातावरण में भी है। प्रेमचंद के अनेक पात्रों का हृदय परिवर्तन होता है, वे सरकारी नौकरी से इस्तीफा देते हैं, विदेशी वस्त्र पहनना छोड़ देते हैं, शराब पीना छोड़ देते हैं, जेल चले जाते हैं लेकिन यह सब प्रेमचंद के युग में सिर्फ काल्पनिक और किताबी बातें नहीं थी; उस समय जगह-जगह यह सब होता था। इसलिए यह केवल आदर्शवाद नहीं था बल्कि यथार्थ का चित्रण भी था। जिसे हम आज आदर्श समझते हैं, वह पे्रमचंद के युग में आंशिक तौर पर ही सही यथार्थ भी था। दूसरी बात यह कि प्रेमचंद यथार्थ और आदर्श को द्वंद्व का ताना-बाना अतीव विश्वसनीयता के साथ बुनते हैं। प्रेमचंद के पात्र सहसा कोई निर्णय शायद ही कभी लेते हों। वे गलत या सही निर्णय लेने के पूर्व काफी सोच-विचार करते हैं। ‘गबन’ उपन्यास में रमानाथ अपनी पत्नी के जेवर चुराने के पूर्व कितने विकल्पों पर विचार करता है, कितने पशोपेश में पड़ता है। प्रेमचंद की एक विख्यात किंतु अल्पचर्चित कहानी है ‘आत्माराम’। उसके नायक महादेव सुनार अपने तोते को बहुत प्यार करते हैं। वह तोता ही उनके जीने का सहारा है। एक बार वह उड़ जाता है तो पिंजरा लेकर महादेव सुनार रात भर उसकी तलाश करते हैं। उसी दौरान अशर्फियों से भरा घड़ा हाथ लग जाता है। अब महादेव सुनार की जो चेष्टाएं चित्रित की गई हैं, वे चाहे जितनी अजीब लगें, हैं परम स्वाभाविक। महादेव सुनार सोचते हैं कि अगर चोर लौटकर आ गए तो इस घड़े को कैसे बचाएंगे। वे कुछ अशर्फियां अपनी गांठ में बांधते हैं, जेब में भरते हैं। फिर उसे जमीन में गाडऩे का उद्यम करते हैं। एक बार उस घड़े को सिर पर रखकर तेजी से भागने का रिहर्सल करते हैं कि वे इतनी तेजी से भाग सकते हैं या नहीं कि चोर उन्हें पकड़ न पाएं। और इन्हीं सब विकल्पों में रात बीत जाती है और सवेरा हो जाता है। यानी चोरों के लौट आने का भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है। प्रेमचंद ने एक स्थल पर लगभग तात्कालिक मुद्रा में दो पात्रों को एक ही निर्णय लेने का चित्रण किया है। वह है- ‘कफनÓ के घीसू-माधव का। कफन के लिए चंदा इकट्ठा करने के बाद पैसा मिला कि रास्ते में ताड़ीखाना दिखलाई पड़ा। दोनों थोड़ी देर तक चुप रहे फिर एकसाथ ताड़ीखाने में प्रवेश कर गए। वस्तुत: यह निर्णय भी इतना आकस्मिक नहीं है, यह आकस्मिकता तो लक्षण या अनुभाव है उनकी दीर्घकालीन और संस्कारी मदिरा पर आसक्ति का। और यह आसक्ति ऐसी तीव्र और असहाय कर देने वाली है कि यहां सोच-विचार और विकल्प के सभी रास्ते बंद हैं। ऐसी तात्कालिक विकल्पहीनता मामूली रचनाकार नहीं दिखा सकता। जो लोग प्रेमचंद के साहित्य में मनोवैज्ञानिक गहराई और मनोवैज्ञानिकता का अभाव पाते हैं उन्हें ऐसे स्थलों पर ध्यान देना चाहिए।
वस्तुत: प्रेमचंद यथार्थ से आदर्श का जो रास्ता अपने पात्रों के लिए तैयार करते हैं वह बहुत स्वाभाविक यानी टेढ़ा-मेढ़ा, ऊबड़-खाबड़, जटिल और विकल्पों से भरा हुआ है। यानी उतना विश्वसनीय है जितना कि जीवन। प्रेमचंद के यहां कथानक का विकास सिर्फ प्रलंब रैखिक या हॉरिजेन्टल ही नहीं होता, प्रलंबात्मक विकास आक्षांशिक जटिलता की पारस्परिक रगड़ का परिणाम होती है। पे्रमचंद की रचनाओं का कथानक सिर्फ अपने लक्ष्य का ही ध्यान नहीं रखता, उसमें पर्याप्त समवर्तिता होती है। पे्रमचंद की रचनाओं का उद्देश्य सामान्य विवरणों से निर्मित होता है। निर्मिति या कथानक का ताना-बाना प्रेमचंद के यहां केंद्रीय महत्व का है। पे्रमचंद छलांग मारने वाले या स्वाभाविकता को कूदकर लांघ जाने वाले या अपनी कला से चौंकाने वाले रचनाकार नहीं हैं। रचनात्मक आतुरता की बहुत बड़ी कमी होती है कि रचनाकार डिटेल्स का चित्रण या तो नहीं करते या उसे महत्वहीन समझते हैं। जबकि रचनाएं डिटेल्स में भरपूर होकर ही सिद्धि प्राप्त करती हैं। गोबर, झुनिया के पेट में बच्चा रोपकर लखनऊ गया था। वहां से लौटा तो झुनिया की गोद भरी थी। गोबर को इसकी खबर मिल गई थी। वह बच्चे के लिए गोटे की चमकदार टोपी लाया। जब गोबर और झुनिया की मुलाकात हुई तो झुनिया रूठी हुई थी। गोबर बच्चे को गोटे की टोपी पहनाता है। बच्चा वह टोपी उतारकर फेंक देता है। महान रचनाकार पे्रमचंद ने लिखा, बच्चा टोपी को पहनने की नहीं, खेलने की चीज समझता था। इसी तरह घर से लखनऊ जाते समय गोबर को एक युवा दंपती आपस में झगड़ा करते हुए मिलते हैं। उनका आपस में झगड़ा करना, गोबर का बीच में पडऩा, फिर पत्नी की डांट कि ये हमारा आपसी मामला है, तुम कौन होते हो बीच में पडऩे वाले आदि। ऐसे डिटेल्स हैं जो ‘गोदान’ के कथानक को विश्वसनीय भरपूर ओर समृद्ध बनाते हैं। कहते हैं कि गुलगुला गुड़ डालने से मीठा होता है। गोदान का पाठकीय आस्वाद ऐसे डिटेल्स से निर्मित होता है।
और प्रेमचंद की भाषा कैसी है? फिराक गोरखपुरी ने कहीं लिखा है कि उर्दू के महान आलोचक शिबली सर धुनते थे कि हाय! हिन्दुस्तान में एक भी मुसलमान नहीं जो प्रेमचंद जैसी उर्दू लिख सकता हो। यह उर्दू कैसी थी? यह सिर्फ उर्दू नहीं थी, सिर्फ हिंदी भी नहीं थी। प्रेमचंद की हिंदी और उर्दू में अवधी की तरावट थी जो उसे अद्वितीय ही नहीं, पाठक की आत्मीयता प्रदान करती थी और प्रेमचंद की कोई विशिष्ट भाषा-शैली नहीं थी। शेक्सपियर की भाषा-शैली के बारे में कहा जाता है कि अंगे्रजी बोलने वालों की सारी शैलियां शेक्सपियर की शैलियां हैं। इसी तरह हिंदी भाषा-भाषियों की सारी शैलियां प्रेमचंद की हैं।
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