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नयी पीढ़ी के हौसलों को देखकर लगता है, भारत स्‍वप्‍नहीन नहीं हुआ : वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका 'साझा' के पहले अंक का लोकार्पण करते अति‍थि‍गण।

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका ‘साझा’ के पहले अंक के लोकार्पण समारोह की रि‍पोर्ट-

नई दि‍ल्‍ली : नयी पीढ़ी के रचनात्मक प्रयासों को देखकर पुरानी पीढी़ को जो खुशी मिलती है, उसे अभी नयी पीढी़ अनुभव नहीं कर सकती, लेकिन नयी पीढी के हौसलों को देखकर लगता है कि भारत अभी स्वप्नहीन नहीं हुआ है। यह बात 09 जनवरी, 2012 को गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में उर्दू-हिन्दी की वीडियो पत्रिका ‘साझा’ के पहले अंक का लोकार्पण करते हुए हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी ने कही। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर असगर वजाहत ने और संचालन ‘संवेद’ के संपादक किशन कालजयी ने किया। उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका ‘साझा’ जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय के ‘कर्मेंदु शिशिर शोधागर’ द्वारा निर्मित की गई है। ‘साझा’ के पहले अंक का निर्देशन संजय जोशी ने और उसका संपादन किशन कालजयी ने किया है। किशन कालजयी ने बताया कि उर्दू और हिन्‍दी की यह छमाही साझी वीडियो पत्रिका दोनों भाषाओं के दर्शकों से रूबरू होगी।

युवा आलोचक विभास कुमार ने ‘साझा’ वीडियो पत्रिका की पृष्ठभूमि व ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय, जर्मनी द्वारा स्थापित ‘कर्मेंदु शिशिर शोधागर’ का परिचय देते हुए बताया कि यह शोधागार मूलतः कर्मेंदु शिशिर द्वारा ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय को उपलब्ध करवाई गई अत्यंत ही दुर्लभ और ऐतिहासिक लघु पत्रिकाओं के संकलन और उनके डिजीटलीकरण की विजनरी योजना का परिणाम है। इस सन्‍दर्भ में आने वाले समय में यह शोधागार हिन्दी साहित्य के शोधार्थियों के लिये बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। इसकी स्थापना में आलोचक कर्मेंदु शिशिर की सक्रिय भूमिका रही है। कर्मेंदु शिशिर के इस अमूल्य योगदान का प्रतिदान करने के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय ने अपने इस शोधागार का नाम कर्मेंदु शिशिर के नाम पर रखने का निश्चय किया, जो कि अपने आप में एक सराहनीय कदम है। ‘कर्मेंदु शिशिर शोधागार’ के माध्यम से हिन्‍दी की लघु पत्रिकाओं को डिजिटल रूप में तब्दील करके उन्हें संरक्षित करने और इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों को सुलभ कराने की अत्यंत महत्ती परियाजना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है।

कर्मेंदु शिशिर के सहायक और कवि मित्र मदन कश्यप ने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि कर्मेन्दु शिशिर ने दिन-रात एक करके हिन्दी की लघु पत्रिकाओं के अंक एकत्रित किए थे और हिन्दी के शोधार्थियों के लिए इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय के साथ मिलकर इनके संरक्षण की योजना बनाई। इस सन्‍दर्भ में उन्होंने संस्कृत के विकास में जर्मन विद्वानों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा संस्थाओं की निष्क्रियता और लालफीताशाही के कारण हमें विदेशी शिक्षा संस्थानों की सहायता लेनी पड़ती है। उन्होंने हिन्‍दी भाषा और साहित्य के प्रति संवेदनशीलता के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय की सराहना की और बताया कि यह कितना विडम्‍बनापूर्ण है कि हमें अपनी भाषाओं और अपनी विरासत के संरक्षण के लिए विदेशों की ओर देखना पड़ता है।

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका ‘साझा’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत ने कहा कि वह ऐसे प्रयासों को उम्मीद की एक ऐसी किरण के रूप में देखते हैं जो भविष्य को रोशनी देगी। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हमारी भाषा और संस्कृति की जो दुर्गति हुई है, उसके लिए सबसे ज्यादा हमारी सरकारी संस्थायें जिम्मेदार हैं। आजादी मिलने से हमारे नागरिक समाज में अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर एक प्रकार की शिथिलता सी आ गई थी। हमने खुद कुछ करने की बजाये सरकारी प्रयासों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास किया और सरकारों ने हमें निराश किया है लेकिन ऐसे प्रयास उम्मीद जगाते है। समारोह में लेखकों और साहित्य प्रेमियों के साथ-साथ कर्मेंदु शिशिर की बेटी भी उपस्थित थीं।

प्रस्‍तुति‍ : प्रमोद मीणा, हि‍न्‍दी , सहायक प्रोफेसर, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, कालापेट, पुडुच्चेरी – 605014

साहित्य में क्लासिक क्या है, यह नागार्जुन से सीखना होगा : वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

नई दि‍ल्‍ली : राजधानी के कस्बाई गाँव सादतपुर विस्तार स्थित जीवन ज्योति हा. सै. स्कूल के हरे-भरे प्रांगण में 21 नवंबर को  बाबा नागार्जुन का जन्मशती समारोह मनाया गया। बाबा गहरे जन-सरोकारों वाले कवि थे और समारोह भी इसकी गवाही दे रहा था। उसमें न सिर्फ नागार्जुन के रचनात्मक अवदान पर गंभीर चर्चा हुई, बल्कि उनकी रचनाओं को कला, संगीत, फिल्म, पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से भी उपस्थित किया गया। सुबह प्रभातफेरी से लेकर शाम को फिल्म-प्रदर्शन तक चले इस शताब्दी समारोह का आयोजन ‘सादतपुर साहित्य समाज’ ने किया था। इसमें सादतपुर के नागरिकों तथा दिल्ली और दिल्ली के बाहर से आए अनेक सुप्रतिष्ठ लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत चित्रकार हरिपाल त्यागी, द्वारा बनाए नागार्जुन के भव्य तैलचित्र और उनकी कविताओं के 28 पोस्टरों के उद्घाटन-अनावरण से हुई। अनावरण कमलिनी दत्त,. कणिका,.विश्‍वनाथ त्रिपाठी, भगवानसिंह, वाचस्पति, उमेश वर्मा, कुबेरदत्त आदि के हाथों हुआ।

इसके बाद नागार्जुन की कुछ कविताओं की स्वरबद्ध प्रस्तुति इस समारोह की विशेष उपलब्धि रही। प्रस्तोता थीं लेडी श्रीराम कॉलेज में हिंदी व्याख्याता डॉ. प्रीति प्रकाश प्रजापति। उनका काव्य-गायन सभी के लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा। इसके बाद सादतपुर के कुछ वरिष्ठ और युवा नागरिकों ने बाबा के साथ जुड़ी अपनी यादों को ताजा किया।

अगला सत्र था नागार्जुन का महत्त्व-मूल्यांकन। सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि नागार्जुन की जन्मशती सारे देश में मनाई जा रही है, लेकिन सादतपुर में इसका मनाया जाना विशेष महत्व रखता है। यह समारोह तरौनी में मनाए गए समारोह से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करना आज की जरूरत है। बाबा का फोटो आपने किसी राजनेता के साथ नहीं देखा होगा। यहाँ आप यह विचार कीजिए कि आज जो प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं,  वे किनसे मिलते हैं और नागार्जुन किनसे मिलते थे। बाबा को हिंदी में साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला। यह पुरस्कार की परंपरा और मान्यता पर गहरा व्यंग्य और कटाक्ष है। वे वंचितों के कवि थे। डॉ. त्रिपाठी ने ‘अकाल और उसके बाद’ शीर्षक कविता के हवाले से कहा कि ‘सामयिक’ को ‘कालजयी’ कैसे बनाया जाता है, यह बाबा से सीखा जा सकता है। आज ऐसी कविता की बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि जनवादी संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए जनवादी शिल्प की जरूरत होती है। उसे साधना कठिन है, लेकिन इसे साधे बिना क्लासिक कविता नहीं रची जा सकती। जनवादी साहित्य में क्लासिक क्या है, यह नागार्जुन से सीखना होगा।

वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने ‘नागार्जुन’ शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया। सुप्रसिद्ध समालोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने बाबा के कुछ संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक बार दिनकर जी ने मुझसे कहा कि बाबा उनसे मिल लें। मैंने बाबा से जब यह कहा तो वे बहुत नाराज हुए और पूछा कि तुमने दिनकर को क्या जवाब दिया? मैं चुप। बाद में जब दिनकर जी ने बाबा की नाराजगी के बारे में जाना तो वे खुद उनसे मिलने आए और उनसे माफी माँगी। उन्होंने कहा कि यह एक जनकवि का स्वाभिमान था। मुरली बाबू ने बाबा की कविता में विविधता पर भी प्रकाश डाला और उनकी प्रगतिशील प्रयोगवादिता पर भी। रेखा अवस्थी का कहना था कि वर्ग चेतना के नाते बाबा ने जो रास्ता दिखाया है, उस पर हमें ध्यान देना चाहिए। वरिष्ठ व्यंग्य लेखक प्रदीप पंत ने कहा कि ‘अज्ञेय’ जहाँ अपने लेखन और साहित्य में अभिजात हैं, वहीं नागार्जुन उनसे एकदम दूर खड़े दिखाई देते हैं। यह एक ही समय में मौजूद दो कवियों का ध्यान देने योग्य अंतर है।

क्रांतिकारी आंदोलन की शोध-खोज करनेवाले सुपरिचित लेखक सुधीर विद्यार्थी ने अपने मार्मिक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि बाबा में दूसरी भाषाओं और दूसरों से सीखने की जो अद्भुत ललक थी, उसमें वे बच्चों से भी सीखते थे। उन्होंने जो कुछ रचा, वह बंद कमरों में बैठकर नहीं रचा। सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ और कथाकार भगवानसिंह ने नागार्जुन की कविताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें हमारे काव्येतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण कवि कहा। बाबा के परम आत्मीय रहे लेखक-प्राध्यापक वाचस्पति ने उनकी घुमक्कड़ी के कुछ दिलचस्प संस्मरण सुनाए। वरिष्ठ कथाकार संजीव ने बाबा के वात्सल्य भाव और उनकी जीवंतता को लेकर संस्मरण सुनाए। कहा कि बाबा सबको डाँटते जरूर थे, पर स्वयं भी डाँट खाने का अवसर जुटा लेते थे। लेकिन इसके पीछे उनके व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ ही थीं। धन्नासेठों की तो परछाईं तक से वे बचते थे।

समारोह के अंतिम चरण में नागार्जुन केंद्रित दो महत्वपूर्ण फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इनमें से एक का निर्माण साहित्य अकादेमी और दूसरी का एन.सी.ई.आर.टी. ने किया है। समारोह के विभिन्न सत्रों का संचालन क्रमशः वरिष्ठ कवि और ‘अलाव’ के संपादक रामकुमार कृषक, सुपरिचित कथाकार महेश दर्पण और हीरालाल नागर ने किया।

उल्लेखनीय है कि सादतपुर में बाबा नागार्जुन करीब दस-ग्यारह साल रहे और उसकी गलियों में उनकी आत्मीय उपस्थिति को अब भी महसूस किया जा सकता है। समारोह में दिनेश कुमार शुक्ल, रमेश उपाध्याय, गिरधर राठी, सुरेश सलिल, बली सिंह, भारत भारद्वाज, त्रिनेत्र जोशी, प्रकाश मनु, दिविक रमेश, रूपसिंह चंदेल, भारतेंदु मिश्र, रमेश प्रजापति, दरवेश भारती, अरविंद कुमार सिंह, सुधीर सुमन, प्रेम जनमेजय, श्याम सुशील, वीरेंद्र जैन, रामनारायण स्वामी, वरुण कुमार तिवारी, क्षितिज शर्मा, संजीव ठाकुर, विजय श्रीवास्तव, रमेश आज़ाद, राधेश्याम तिवारी, आचार्य सारथी, मणिकांत ठाकुर, प्रकाश प्रजापति, आशीष, पूर्वा दत्त, सीमा ओझा, जितेंद्र जीत, रेखा व्यास, दिलीप मंडल और कनुप्रिया आदि‍ लेखकों ने उपस्थिति दर्ज कराई।

-प्रस्तुति: मधुवेश

अलाव-चौपाल पर कथा सुनाते हुए : विश्वनाथ त्रिपाठी

प्रेमचंद को उनकी जयंती पर याद कर रहे हैं वरिष्ठ कवि और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी-

जो साहित्य बड़ा होता है, वह निजी भी होता है। प्रेमचंद हर पाठक के आत्मीय हैं। जैसे- पिताजी या मां हैं। सबके लिए हैं, लेकिन तुम्हारे निजी हैं। बड़ा रचनाकार अपने प्रशंसक और पाठक का आत्मीय होता है। जैसे- तुलसी के राम हैं। उत्तरी भारत की सामान्य जनता के राम वैसे हैं, जैसे तुलसी ने प्रतिष्ठित कर दिया। मेरे लिए मेरा गांव है या गांव का किसान है या जो वहां की प्रकृति है या जो पशु-पक्षी हैं, वो वही हैं, जैसा प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दिखाया है। जो हमारा ग्रामीण जगत है, उसकी प्रेमचंद ने अपने साहित्य में मानों पूर्ण रचना की है। मुझे प्रेमचंद के साहित्य का अनुभव एक स्वाद की तरह होता है। तो इसका परिणाम है कि प्रेमचंद एक लेखक के रूप में तो जाने जाते ही हैं, प्रेमचंद हमारी जातीय संस्कृति या जो हमारा परिवार है, सांस्कृतिक परिवार है, उसके जैसे बुजुर्ग सदस्य की तरह लगते हैं।
मैंने प्रेमचंद पर कविता लिखी थी। यह कविता मेरे एक आत्मीय लेखक शेखर जोशी को बहुत पसंद आई थी। इसकी पंक्तियां इस तरह थीं-
बात उन्नीस सौ चौंतीस-पैंतीस की होगी
मैं पांच-छह साल का रहा होऊंगा
तो प्रेमचंद मेरे गांव आए थे
उस समय मेरे पिताजी बैलों की सानी-पानी कर रहे थे
उन्होंने प्रेमचंद को रस-पानी पिलाया
और पता नहीं क्या-क्या बातें कीं
मेरे पिताजी ने उन दिनों मेरी बड़ी बहन की शादी के लिए
कुछ जमीन रहन रखी थी।
प्रेमचंद ने मुझे और मेरे छोटे भाई को
गुड़-पट्टी खाने को दी।
वो मुझे कंधे पर बिठाकर
पूरा गांव देख आए
प्रेमचंद ने होरी और धनिया को
मेरे गांव में ही देखा था
हलकू और जाबरा को भी।
दो-तीन दिन मेरे गांव में रहकर
फिर प्रेमचंद लमही गए
वो मुझे अब देखें तो भी पहचान लेंगे
बोलेंगे- ‘अरे तेजबहादुर तिवारी के पूत बिसनाथ, तुम इत्ते बड़े हो गए। बुढ़ाए गए।’
हमारे लिए और हमारे जैसे पाठकों के लिए, जिनकी अपार संख्या है, प्रेमचंद का रूप ऐसा है। हम उनके निष्पक्ष या तटस्थ पाठक या आलोचक नहीं हो सकते।
मेरे पिताजी दर्जा एक तक पढ़े थे। खेत में कुदाल चलाते थे। ब्राह्मणवादी थे। कर्मकांड पर विश्वास करते थे। जवाहर लाल नेहरू उनकी तुलना में बहुत बड़े आदमी थे। लेकिन मैं जवाहर लाल नेहरू को पिता नहीं कह सकता। ऐसा ही समझिए।
यह बात मैं पहले भी कई जगह कह चुका हूं कि प्रेमचंद का शायद ही कोई प्रसिद्ध पात्र हो जो कानपुर के पश्चिम और बनारस के पूर्व का हो। उनका रचना संसार ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश का है। उनकी अधिकांश रचनाओं का काल 1910 के आसपास से 1936 तक है। ‘कर्बला’ जैसी कुछ रचनाएं ही ऐतिहासिक या पौराणिक हैं। यानी प्रेमचंद के रचना संसार का देशकाल बहुत सीमित है। लेकिन इसी सीमित देशकाल का चित्रण प्रेमचंद ने इस तरह किया है कि वे भारतीय साहित्य के या कम से कम हिंदी क्षेत्र के सर्वाधिक अंतरराष्टरीय ख्याति के कथाकार हैं। वस्तुत: यह देशीयता रचनाकार की अपनी आधारभूमि है, जिससे वो कालजयी होता है। यह वह इतिहास है, जिसके आधार पर वह साहित्य कालबिद्ध होकर कालजयी या कालातीत होता है। और यह बात स्वाधीनता आंदोलन के दौर में सिर्फ रचनाकार पर घटित नहीं होती। वह लेखकों और राजनीतिज्ञों दोनों पर लगभग समान रूप से लागू होती है। गांधी जी ठेठ गुजराती थे। ‘स’ को ‘श’ ही बोलते थे। हिंदी खड़ी बोली अपने ढंग से बोलते थे। गुजराती भाषा और साहित्य को उनका ऐतिहासिक योगदान है। और वे हमारे सबसे बड़े विश्व नागरिक हैं। जवाहर लाल नेहरू इतना-उतना नहीं, हमेशा इत्ता-उत्ता बोलते थे। ठेठ इलाहाबादी बोली है। लेकिन उनकी अंतरराष्टरीयता जगजाहिर है। यही बात आप रवींद्रनाथ ठाकुर, राजगोपालाचार्य, कम्युनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महामंत्री पी.सी. जोशी आदि के बारे में भी कह सकते हैं।
प्रेमचंद ने अपने समय का अंतरराष्टरीय कथा साहित्य पढ़ रखा था। वे मोपासा, ओ हेनरी, चेखव को आदर्श कहानीकार मानते थे। ताल्सताय, मैक्सिम गोर्की, नगुची उनके बहुत प्रिय थे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इनमें से किसी का प्रभाव उनके लेखन पर नहीं पड़ा। यह बात हमारे समकालीन विशेषकर उदित और उदीयमान कथाकारों को विशेष रूप से नोट करनी चाहिए कि गहरे तौर पर और रचनात्मक तौर पर प्रभावित होने की उपलब्धि रचनात्मक तौर पर प्रभाव मुक्त और निजी होने में है। किसी के जैसा होने में नहीं। रचनात्मक दृष्टि से किसी के जैसा होने का मतलब व्यर्थ, अनावश्यक होना होता है।
कुछ लोगों ने जहां तक मुझे याद पड़ता है, निर्मल वर्मा ने कहा है कि भारतीय उपन्यास लिखे ही नहीं गए। नामवर जी ने इस कथन को समर्थित किया। निर्मल वर्मा और नामवर जी बड़े नाम हैं (नाम तो प्रेमचंद का भी बड़ा है)। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का शिल्प कैसा है? उन पर ‘चंद्रकांता संतति’, ‘तिलिस्म होशरूबा’, ‘पंचतंत्र’, ‘जातक’ अदि का प्रभाव है। कथा प्राय: ऐसे शुरू होती है, जैसे कोई जानकार बुजुर्ग गांव के चौपाल में या अलाव के आसपास हाथ तापते हुए लोगों को कहानियां सुना रहा हो। प्रेमचंद का कथा शिल्प ठेठ भारतीय है। और फिर उनकी कथावस्तु क्या अभारतीय है? इसलिए प्रेमचंद के रहते हुए भारतीय उपन्यास को नकारना समझ में न आने वाली बात है। प्रेमचंद की तो बात छोडि़ए, जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है, वह भी गैरभारतीय नहीं है। वस्तुत: जादुई यथार्थवाद यथार्थ को ही और अधिक प्रभावी बनाने के लिए होता है। मुझे मार्खेज पढ़ते समय कई स्थानों पर पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘चारू चंद्रलेख’ के कई प्रसंग याद आते हैं। प्रेमचंद की कई कहानियों में यह जादुई यथार्थ मिलता है। जैसे- ‘आत्मराम’ में महादेव सुनार और उनके प्रिय तोते की आवाज के वर्तमान में भी आधी रात को सुनाई पड़ती है। जादुई यथार्थवाद कोई किताबी चीज नहीं है। यह निरक्षर और अशिक्षित जनता के सामान्य जीवन में व्यवहारित होता है। विधवा औरत अपने सुख-दुख में दिवंगत पति से ऐसे बात करती है, मानों वह जीवित हो और सामने बैठा हो, ‘देखा टहल के बप्पा, तुम्हारा लड़का हमसे क्या कह रहा है?’ बिल्कुल इसी तरह की स्थिति ‘वन हंडरेड इयर्स ऑफ साल्यूटेड’ में है। इसी उपन्यास का घनघोर वर्षा या दृश्य मुझे ‘कामायनी’ के ‘चिंता’ सर्ग की याद दिलाता है। इसलिए भारतीय और अभारतीय का निर्णय जरा देर से करना चाहिए।
प्रारंभिक दौर में हिंदी के अनेक वरिष्ठ आलोचकों ने  प्रेमचंद को द्वितीय श्रेणी का रचनाकार कहा। उनके अनुसार  प्रेमचंद उत्कृष्ट कथाकार नहीं, वह उपदेशक का सिद्धांत प्रचारक अधिक हैं। हिंदी पाठकों को बताने की जरूरत नहीं कि यह आरोप कबीर और तुलसी पर भी लगाया जाता है। वस्तुत: श्रेष्ठ रचना चमत्कृत नहीं करती, प्रभावित करती है। कलावादियों के पात्र सहज और सामान्य नहीं होते। वे प्रभावित कम करते हैं, चौंकाते ज्यादा हैं। जिस तरह अपेक्षाकृत अधिक संपन्न वर्ग अपने खान-पान और जीवन व्यवहार में विशिष्ट होता है, इसी तरह संपन्न वर्ग की मानसिकता या कुलीनतावादी लेखकों के पात्र और उनका शिल्प असामान्य और असहज होता है। शेखर एक पेड़ की डाल को काटकर उसे एस (स्) आकार देता है क्योंकि उसकी पे्रमिका का नाम शशि है। यानी उसके नाम की स्पेलिंग ‘एस’ से शुरू होती है। प्रेमचंद के पात्र ऐसा नहीं कर सकते। निर्मल वर्मा के साहित्य में शायद ही कभी कोई पात्र जोर से बोलता हो, हवा तेजी से चलती हो, दरवाजा जोर से खुलता हो। परसाई ने लिखा है कि मैं रिक्शे वालों पर भी लिखता हूं, मैं भिखमंगों पर भी लिखता हूं तो मैं सिर्फ चीड़ों की चांदनी पर कैसे लिख सकता हूं। मुझे लगता है, यदि मैं जोर से बोला तो निर्मल का रचना संसार फूं से उड़ जाएगा या बिखर जाएगा।
जीवन और संसार में ऐसा भी है, जहां अज्ञेय और निर्मल के पात्र यथार्थ हैं। लेकिन जो इनसे भिन्न हैं, वे कहीं बहुत ज्यादा और व्यापक हैं। और दुर्भाग्यवश भारत का यथार्थ बेरोजगारों, अशिक्षितों, दलितों, पराधीन नारियों, रोगियों, दहेज के लोभियों, शोषितों और शोषकों का यथार्थ है। इन पात्रों का शिल्प और उनकी भाषा चीख और चिल्लाहट की होगी, कानाफूसी या धीमी नहीं।
प्रेमचंद की रचनात्मक कला के एक उदाहरण पर गौर करें। उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास का नाम ‘गोदान’ है। उर्दू वाले उसे ‘गऊदान’ पढ़ते हैं। कमल किशोर गोयनका कह सकते हैं कि वह प्रेमचंद के हिंदुत्ववाद का प्रमाण है कि इस महाकाव्यात्मक उपन्यास के केंद्र में गो माता है। दूसरी तरफ अति वामपंथी (नाम लेना खतरनाक है) कमल किशोर गोयनका का विरोध करते हुए भी सारत: उनसे सहमत होंगे कि यह प्रेमचंद की प्रतिक्रियावादिता है। गो होरी का स्वप्न है। जैसा कि एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान का स्वप्न होता है या था। होरी का यह स्वप्न पूरा नहीं होता। मृत्यु के समय यह गऊ होरी की अंतिम मूर्छा में फिर आती है-
‘फिर एक गाय का चित्र सामने आया, बिल्कुल कामधेनु-सी। उसने उसका दूध दुहा और मंगल को पिला रहा था कि गाय एक देवी बन गई और…।’
होरी की मृत्यु हो रही है।
हीरा ने रोते हुए कहा- ‘भाभी, दिल कड़ा करो, गो-दान करा दो, दादा चले।’
धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आंखों से देखा। अब वह दिल को और कितना कठोर करे? अपने पति के प्रति उसका जो कर्म है, क्या वह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था, उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है?
और कई आवाजें आयीं- ‘हां, गो-दान करा दो, अब यही समय है।’
धनिया यंत्र की भांति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली, ‘महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है।’ और पछाड़ खाकर गिर गई।
यह कैसा गोदान है? और यह कैसी गऊ है? यहां कर्मकांड के प्रति चित्रित जीवन स्थितियों के कारण कितनी घृणा और विरक्ति है। ब्राह्मणवादी कर्मकांड के प्रति ऐसी घृणा, संवेदना आज भी किसी दलित लेखक ने नहीं पैदा की है। यहां प्रेमचंद सिद्धांतवादी नहीं, नारेबाज नहीं, आदर्शवादी नहीं, ऐतिहासिक नैतिकता को सौंदर्यबोध के आस्वाद में परिणित कर सकने वाले महान भारतीय रचनाकार के रूप में देखे जा सकते हैं।
प्रेमचंद को आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचनाकार कहा जाता है। इस विषय में पहली बात तो ध्यान में रखने की यह हैै कि यह आदर्शवादी वातावरण प्रेमचंद की सिर्फ रचनाओं में नहीं है, वह प्रेमचंद के राजनीतिक और सांस्कृतिक वातावरण में भी है। प्रेमचंद के अनेक पात्रों का हृदय परिवर्तन होता है, वे सरकारी नौकरी से इस्तीफा देते हैं, विदेशी वस्त्र पहनना छोड़ देते हैं, शराब पीना छोड़ देते हैं, जेल चले जाते हैं लेकिन यह सब प्रेमचंद के युग में सिर्फ काल्पनिक और किताबी बातें नहीं थी; उस समय जगह-जगह यह सब होता था। इसलिए यह केवल आदर्शवाद नहीं था बल्कि यथार्थ का चित्रण भी था। जिसे हम आज आदर्श समझते हैं, वह पे्रमचंद के युग में आंशिक तौर पर ही सही यथार्थ भी था। दूसरी बात यह कि प्रेमचंद यथार्थ और आदर्श को द्वंद्व का ताना-बाना अतीव विश्वसनीयता के साथ बुनते हैं। प्रेमचंद के पात्र सहसा कोई निर्णय शायद ही कभी लेते हों। वे गलत या सही निर्णय लेने के पूर्व काफी सोच-विचार करते हैं। ‘गबन’ उपन्यास में रमानाथ अपनी पत्नी के जेवर चुराने के पूर्व कितने विकल्पों पर विचार करता है, कितने पशोपेश में पड़ता है। प्रेमचंद की एक विख्यात किंतु अल्पचर्चित कहानी है ‘आत्माराम’। उसके नायक महादेव सुनार अपने तोते को बहुत प्यार करते हैं। वह तोता ही उनके जीने का सहारा है। एक बार वह उड़ जाता है तो पिंजरा लेकर महादेव सुनार रात भर उसकी तलाश करते हैं। उसी दौरान अशर्फियों से भरा घड़ा हाथ लग जाता है। अब महादेव सुनार की जो चेष्टाएं चित्रित की गई हैं, वे चाहे जितनी अजीब लगें, हैं परम स्वाभाविक। महादेव सुनार सोचते हैं कि अगर चोर लौटकर आ गए तो इस घड़े को कैसे बचाएंगे। वे कुछ अशर्फियां अपनी गांठ में बांधते हैं, जेब में भरते हैं। फिर उसे जमीन में गाडऩे का उद्यम करते हैं। एक बार उस घड़े को सिर पर रखकर तेजी से भागने का रिहर्सल करते हैं कि वे इतनी तेजी से भाग सकते हैं या नहीं कि चोर उन्हें पकड़ न पाएं। और इन्हीं सब विकल्पों में रात बीत जाती है और सवेरा हो जाता है। यानी चोरों के लौट आने का भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है। प्रेमचंद ने एक स्थल पर लगभग तात्कालिक मुद्रा में दो पात्रों को एक ही निर्णय लेने का चित्रण किया है। वह है- ‘कफनÓ के घीसू-माधव का। कफन के लिए चंदा इकट्ठा करने के बाद पैसा मिला कि रास्ते में ताड़ीखाना दिखलाई पड़ा। दोनों थोड़ी देर तक चुप रहे फिर एकसाथ ताड़ीखाने में प्रवेश कर गए। वस्तुत: यह निर्णय भी इतना आकस्मिक नहीं है, यह आकस्मिकता तो लक्षण या अनुभाव है उनकी दीर्घकालीन और संस्कारी मदिरा पर आसक्ति का। और यह आसक्ति ऐसी तीव्र और असहाय कर देने वाली है कि यहां सोच-विचार और विकल्प के सभी रास्ते बंद हैं। ऐसी तात्कालिक विकल्पहीनता मामूली रचनाकार नहीं दिखा सकता। जो लोग प्रेमचंद के साहित्य में मनोवैज्ञानिक गहराई और मनोवैज्ञानिकता का अभाव पाते हैं उन्हें ऐसे स्थलों पर ध्यान देना चाहिए।
वस्तुत: प्रेमचंद यथार्थ से आदर्श का जो रास्ता अपने पात्रों के लिए तैयार करते हैं वह बहुत स्वाभाविक यानी टेढ़ा-मेढ़ा, ऊबड़-खाबड़, जटिल और विकल्पों से भरा हुआ है। यानी उतना विश्वसनीय है जितना कि जीवन। प्रेमचंद के यहां कथानक का विकास सिर्फ प्रलंब रैखिक या हॉरिजेन्टल ही नहीं होता, प्रलंबात्मक विकास आक्षांशिक जटिलता की पारस्परिक रगड़ का परिणाम होती है। पे्रमचंद की रचनाओं का कथानक सिर्फ अपने लक्ष्य का ही ध्यान नहीं रखता, उसमें पर्याप्त समवर्तिता होती है। पे्रमचंद की रचनाओं का उद्देश्य सामान्य विवरणों से निर्मित होता है। निर्मिति या कथानक का ताना-बाना प्रेमचंद के यहां केंद्रीय महत्व का है। पे्रमचंद छलांग मारने वाले या स्वाभाविकता को कूदकर लांघ जाने वाले या अपनी कला से चौंकाने वाले रचनाकार नहीं हैं। रचनात्मक आतुरता की बहुत बड़ी कमी होती है कि रचनाकार डिटेल्स का चित्रण या तो नहीं करते या उसे महत्वहीन समझते हैं। जबकि रचनाएं डिटेल्स में भरपूर होकर ही सिद्धि प्राप्त करती हैं। गोबर, झुनिया के पेट में बच्चा रोपकर लखनऊ गया था। वहां से लौटा तो झुनिया की गोद भरी थी। गोबर को इसकी खबर मिल गई थी। वह बच्चे के लिए गोटे की चमकदार टोपी लाया। जब गोबर और झुनिया की मुलाकात हुई तो झुनिया रूठी हुई थी। गोबर बच्चे को गोटे की टोपी पहनाता है। बच्चा वह टोपी उतारकर फेंक देता है। महान रचनाकार पे्रमचंद ने लिखा, बच्चा टोपी को पहनने की नहीं, खेलने की चीज समझता था। इसी तरह घर से लखनऊ जाते समय गोबर को एक युवा दंपती आपस में झगड़ा करते हुए मिलते हैं। उनका आपस में झगड़ा करना, गोबर का बीच में पडऩा, फिर पत्नी की डांट कि ये हमारा आपसी मामला है, तुम कौन होते हो बीच में पडऩे वाले आदि। ऐसे डिटेल्स हैं जो ‘गोदान’ के कथानक को विश्वसनीय भरपूर ओर समृद्ध बनाते हैं। कहते हैं कि गुलगुला गुड़ डालने से मीठा होता है। गोदान का पाठकीय आस्वाद ऐसे डिटेल्स से निर्मित होता है।
और प्रेमचंद की भाषा कैसी है? फिराक गोरखपुरी ने कहीं लिखा है कि उर्दू के महान आलोचक शिबली सर धुनते थे कि हाय! हिन्दुस्तान में एक भी मुसलमान नहीं जो प्रेमचंद जैसी उर्दू लिख सकता हो। यह उर्दू कैसी थी? यह सिर्फ उर्दू नहीं थी, सिर्फ हिंदी भी नहीं थी। प्रेमचंद की हिंदी और उर्दू में अवधी की तरावट थी जो उसे अद्वितीय ही नहीं, पाठक की आत्मीयता प्रदान करती थी और प्रेमचंद की कोई विशिष्ट भाषा-शैली नहीं थी। शेक्सपियर की भाषा-शैली के बारे में कहा जाता है कि अंगे्रजी बोलने वालों की सारी शैलियां शेक्सपियर की शैलियां हैं। इसी तरह हिंदी भाषा-भाषियों की सारी शैलियां प्रेमचंद की हैं।

अनभै सांचा का कवि : विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी

विगत 25 जून को नागार्जुन के जन्म स्थान तरौनी गांव में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में उनके जन्मशताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। मिथिलांचल बिहार प्रदेश के अंतर्गत है। इसमें बिहार के अनेक प्रगतिशील साहित्यकारों ने भाग लिया। बाहर से भी अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार पहुंचे। आयोजन बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। वहां से लौटकर बाबा को याद कर रहे हैं- 
समारोह में शामिल होने के लिए तरौनी की यह यात्रा वस्तुत: तीर्थयात्रा थी। नागार्जुन को बाबा के नाम से कहा और जाना जाता था। हिंदी में बाबा नाम से केवल एक और साहित्यकार को जाना जाता है। वे हैं बाबा तुलसीराम। तुलसीदास ने घर और परिवार छोड़ दिया था। बाबा ने घर-परिवार से संबंध तो नहीं तोड़ा, लेकिन वे अधिकांशत बाहर ही रहते थे।
गृहस्थ से ज्यादा यात्री थे। तुलसीदास की कविता के बारे में समालोचकों का विचार है कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य रूपों का उपयोग किया। नागार्जुन ने आधुनिक समय में प्रचलित शायद ही कोई ऐसा छंद हो जिसमें कविता न की हो- केवल शिष्ट साहित्यिक छंद ही नहीं, लोक गानों और लोक धुनों में भी। लेकिन तुलसीदास और नागार्जुन में केवल समानता ढूंढना गलत तो होगा ही अनर्थक भी। बाबा नागार्जुन सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के वर्णाश्रम व्यवस्थावादी रामभक्त नहीं, बीसवीं शताब्दी के समाजवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। उन्होंने ‘हरिजन गाथा’ नामक महाकाव्यात्मक कविता लिखी, जिसमें नए युग के नायक का हरिजनावतार कराया। नागार्जुन ने इस हरिजन शिशु को वराह अवतार कहा है। वराह का अवतार अर्थात् वह धरती का उद्धार करने वाला होगा। नागार्जुन की कविता हिंदी साहित्य में एक नए बोध और शिल्प का आविष्कार करती है। दलितों और हरिजनों को सहानुभूति देने वाली कवितायें तो इसके पहले लिखी गई थीं, लेकिन हरिजन का यह सशक्त रूप हिंदी साहित्य में पहले नहीं दिखलायी पड़ा था। हरिजन शिशु की छोटी हथेलियों में- आड़ी तिरछी रेखाओं में हथियारों के ही निशान हैं खुखरी है, बम है, अस्ति भी है, गंड़ासा माला प्रधान है।
नागार्जुन के रचनाकार में कबीर और तुलसीदास का मणि कांचन योग है। नागार्जुन का व्यक्तित्व भी कालजयी लगता है। नागार्जुन दिल्ली प्राय: आते रहते थे। पूर्वी दिल्ली में सादतपुर में एक छोटा सा मकान था। उसमें अपने पुत्र श्रीकांत के साथ ठहरते थे। अगर आप यह पता लगाएं कि दिल्ली आकर वे किन लोगों से मिलते थे तो आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। मैंने उनकी कोई ऐसी फोटो नहीं देखी जिसमें वे किसी मंत्री, उद्योगपति, नेता या गुंडे के साथ दिखलाई पड़े। वे अज्ञात या अल्प-अज्ञात निम्न वर्गीय नवयुवक साहित्यकारों या उपेक्षित अधेड़ या वृद्ध मित्र साहित्यकारों के यहां बिन बुलाये पहुंच जाते थे। जिस घर पहुंचते थे कुछ दिनों के लिए उस घर के हो जाते थे। कभी-कभी तो अतीव मनोरंजक तनाव की स्थितियां पैदा हो जाती थीं। सो एक बार नागार्जुन ने मेरे घर पर भी आने की कृपा की।
मैं सादतपुर से उन्हें रिक्शे पर बिठाकर अपने घर लाया। रास्ते भर बाबा भुनभुनाते रहे ऑटो नहीं कर सकते थे। खैर किसी तरह घर पहुंचे। आते ही फरमाइश की दलिया खिलाओ। पत्नी ने दलिया बनाया। चखा, तो बोले, कैसी दलिया बनायी है? इसमें नमक ही नहीं है। पत्नी ने कहा कि इन्हें ब्लड प्रेशर है इसलिए हम नमक कम खाते हैं। अतिथि को इतना तेज गुस्सा आया कि दलिया का कटोरा लेकर चौके में जा पहुंचे। बोले- दलिया ऐसे बनाया जाता है? दलिया को पहले घी में भूना जाता है। फिर दूध या पानी से पकाया जाता है। तब दलिया खिलता है। पत्नी चुप रहीं। अकेले में मुझसे बोली, यह तुम मेरी सास को कहां से पकड़ लाए? लेकिन चार-पांच दिनों के बाद जब नागार्जुन जाने लगे तो पत्नी रोने लगी। मां-बाप की तरह ऐसे लोग बड़े भाग्य से घर आते हैं। इन्हीं दिनों मैंने नागार्जुन के रचना धर्मी रूप की एक झलक भी देखी। मेरी बड़ी नातिन चार-पांच साल की थी। उससे नागार्जुन की सबसे ज्यादा पटती। एक दिन तीसरे पहर भोजनोपरांत शयन के बाद उठा तो देखा नागार्जुन बहुत देर तक फर्श पर पड़ी किसी चीज को बड़ी गंभीरता से देखने में तन्मय हैं। समाधि लगी हो मानो। जब उन्हें मेरी आहट मिली तो बोले ‘देखो, कविता है यह। ‘नातिन की छोटी-छोटी चप्पलों को वह देख रहे थे। रचना-समाधि में लीन उनका चेहरा मैं कभी नहीं भूल सकता।
नागार्जुन बुजुर्गों के साथ बुजुर्ग-जवानों के साथ जवान और बच्चों के साथ हो जाते थे। जिन लोगों ने उन्हें महिलाओं के साथ घुल-मिलकर बातें करते देखा है वे लिस्ट को आगे बढ़ाएंगे। अपनी एक कविता में वह शिशु चिनार से बात करते हैं और कालिदास से जवाब-तलब करते हैं- ‘कालिदास सच-सच बतलाना।’ उनका जीवन अनुभव व्यापक था, कबीरदास की भांति वह अनेक परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के समुच्चय थे। जीवन के प्रति गहरी आसक्ति थी। तीव्र सौंदर्यानुभूति के रचनाकार थे और इसलिए गहरी घृणा और तिलमिला देने वाले व्यंग्य के सहज कवि। यह सहजता जटिल अंतर्वस्तु का रूप है। जटिल अंतर्वस्तु के बगैर सहजता आ ही नहीं सकती। कविता की बात छोडि़ए, जीवन में भी वह जो इतने सहज थे, उसकी भी वजह व्यापक परस्पर-विरोधी जीवन स्थितियों को पचा सकने वाली क्षमता का ही प्रभाव है। बात सुनने में थोड़ा अजीब लगेगी, लेकिन है सच कि नागार्जुन कविता करते समय भी सिर्फ कवि नहीं, आदमी बने रहते हैं। मतलब यह कि वे रचना की प्रक्रिया में रचनात्मकता के व्याकरण का ही पालन नहीं करते। आम आदमी की तरह स्थितियों और घटनाओं का प्रभाव ग्रहण करने वाले नागार्जुन काव्य-रूढिय़ों का अतिक्रमण करते हैं। संवेदना और शिल्प का तालमेल करते हैं। ऐसा व्यक्ति साहित्य रचते समय भी न तो काव्य रूढिय़ों का ही अनुशासन पूरी तरह स्वीकार कर सकता है और न विचारधारा या पार्टी का ही। नागार्जुन की कवितायें पढ़ते ही पाठक कविता की दुनिया से निकलकर जीवन में आ जाता है। और उसके लिए जीवन-रस ही काव्य स्वाद बन जाता है। नागार्जुन की बहुत अच्छी कविता है- फूले कदंब। कंदब पुष्प की शोभा का बयान करके उसे साक्षात कर दिया। यह हो गया कवि का काम। अपने ही द्वारा रचित पुष्पित कंदब को छूने का मन कवि में छिपे आदमी का हो रहा है। सो आखिर में लिखा ‘मन कहता है छू ले कदंब’।
अनार के दानों का उपमान सुंदर दंत पंक्ति के लिए किया जाता है। प्राय: सुंदर नायिकाओं की सुंदर दंत पंक्ति के लिए। लेकिन उस आदमी के दांत जो अभी दिल्ली से टिकट मार कर लौटा है। पान चबा रहा है। इतना पुलकित-प्रसन्न है। कैसा लग रहा है। कुटिल आदमी की प्रसन्नता कितनी घृणास्पद होती है। दांत तो अनार ही जैसे हैं, लेकिन खिले हुए हैं। खिले क्रिया से दांतों का दूर-दूर होना, बीच की खाली जगह का दिखलाई पडऩा। जिसे ‘बीडर’ कहते हैं ‘खिले’ क्रिया से अनार के दानों का उपमान सौंदर्य नहीं, कुरुचि प्रदान करता है। और यह व्यंग्य का प्रहार निर्मम है-
आये दिन बहार के
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के
दिल्ली से लौटे हैं अभी टिकट मारकर
नागार्जुन को आधुनिक कबीर यों ही नहीं कहा जाता है। कबीर ‘आंखिन देखी’ में विश्वास करते थे। ‘अनभै सांचाÓ की अभिव्यक्ति का साहस रखते थे। ‘अनभै सांचा’ अनुभव और निर्भीकता दोनों का अर्थ देने वाला संश्लिष्ट पद है। प्रगतिशील कवि कल्पना, स्मृति आदि की अपेक्षा देखने पर अर्थात् जो सामने दिख रहा है, उससे ज्यादा आकृष्ट होते हैं। ‘जो सामने हैÓ उसी में इतिहास, भविष्य सब कुछ समाया है। इसलिए देखने की कल्पना आदि से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। वस्तुत: यह अंतर लोक और वेद का है। लोक और वेद के संतुलन की बात तुलसी करते थे। कबीर लोक और वेद के संतुलन पर नहीं, उसके अंतर पर बल देते थे- तू कहता है कागद लेखी, मैं कहता हूं आंखिन देखी।
इस देखी की रचनात्मकता में बड़ी महिमा है। नागार्जुन की एक कविता है- बादल को घिरते देखा है। ‘देखा है’ का अर्थ प्रत्यक्ष अनुभव किया है, अपनी आंखों देखकर जाना है। किताबों में पढ़कर, सुनी-सुनाई बात नहीं। मैं अपने अनुभव को अभिव्यक्त कर रहा हूं। आंख और कान में अंतर होता है। अनुभव का सर्वाधिक विश्वसनीय इंद्रिय माध्यम आंख है। आंख प्रतीक है प्रत्यक्ष अनुभव का, अनुमान इससे कमतर है। इसी कविता में नागार्जुन ने लिखा-
कहां गया धनपति कुबेर वह, कहां गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के, व्योम-प्रवाही गंगाजल का
ढूंढ़ा बहुत परंतु लगा क्या, मेघदूत का पता कहीं पर
जाने दो वह कवि-कल्पित था
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ चुंबी कैलाश-शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।
कुबेर, अलका, व्योम-प्रवाही गंगाजल- सुनी-सुनाई बातें हैं, मेघदूत किताब है- मैंने जो बादल देखे, वे किताबी नहीं- आंखों से देखे, ये पंक्तियां उनको चित्रित करती हैं। लोग कालिदास के बादलों के बारे में लिखते होंगे।
‘मैंने तो में ‘तो’ के आग्रह पर विचार कीजिए। कालिदास की महानता से इंकार नहीं, लेकिन उनका अनुभव नागार्जुन का अनुभव हो- तो नागार्जुन की कविता की क्या जरूरत है। सच्चे अर्थ में यह कवि की स्वायत्तता और निजता है। ‘यह देखना’ कबीर का ‘आंखिन देखी’ ही है। कवि सरस्वती-पुत्र होता है। वह ‘अनभै साँचा’ की ही अभिव्यक्ति करता है। कबीर भक्त होते हुए भी राम के सामने भी तन कर खड़े होते थे। नागार्जुन सामाजिक विचारों के हैं, अपने को बार-बार प्रतिबद्ध घोषित करते हैं, लेकिन वामपंथी पार्टियों की खुलकर आलोचना करते हैं। बड़े कवि के पास विचारधारा का आग्रह तो होता है, लेकिन वह अपने अनुभव के आधार पर विचारधारा को तोड़ता भी है। नागार्जुन ने पारंपरिक काव्य-रूपों का हिंदी और उसकी बोलियों की क्षमता का अभूतपूर्व उपयोग किया है। नागार्जुन मैथिली और हिंदी दो भाषाओं के महाकवि हैं। जैसे तुलसीदास अवधी और ब्रजभाषा के। नागार्जुन ऐसे आधुनिक कवि हैं, जिनके पास विद्यापति, कबीर और तुलसी की परंपरा का उत्तराधिकार है। वे आधुनिक हिंदी और मैथिली के कालजयी कवि हैं।

विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक

नई दिल्ली: कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता विष्णु प्रभाकर की पहली पुण्यतिथि पर 12 अप्रैल को हिंदी भवन और चित्र-कला-संगम के तत्वावधान में विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक गोष्ठी का आयोजन किया गया। स्नेही साहित्यकारों ने श्रद्धापूर्वक उन्हें याद किया। गोष्ठी की शुरुआत मणिकुंतला के कबीर पद गायन से हुई।
वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि विष्णुजी का व्यक्तित्व अभिभूत करने वाला था। वह बड़े साहित्यकार थे और उनका युग भी बड़ा था। विष्णु जी सिद्धांतप्रिय मसिजीवी साहित्यकार थे। उन्होंने कभी अपनी संतानों तक के लिए सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया, लेकिन अफसोस है कि सात दशकों तक विष्णुजी कहानी लिखते रहे, लेकिन कहानी के इतिहास में उनका नामोल्लेख तक नहीं है।
उन्होंने कहा कि विष्णुजी के साहित्य के प्रकाशन व प्रचार तथा उनकी जन्मशती मनाने के लिए कुछ उपक्रम होना चाहिए। हिंदी भवन के मंत्री डॉ. गोविंद व्यास ने कहा कि हिंदी भवन जैनेंद्र कुमार, रामकुमार वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर तथा हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मना चुका है। उन्होंने घोषणा की कि विष्णुजी की जन्मशती भी हिंदी भवन राष्ट्रीय स्तर पर धूमधाम से मनाएगा। विष्णुजी के ज्येष्ठ पुत्र अतुल प्रभाकर ने बताया कि विष्णु प्रभाकर की स्मृति-रक्षा के लिए एक न्यास का गठन किया जा चुका है।
कथाकार हिमांशु जोशी ने कहा कि विष्णुजी अपनी पीढ़ी के अंतिम साहित्यकार थे। उनमें जरा भी दिखावा नहीं था। वह अपने पर लगे आपेक्षों का कभी जवाब नहीं देते थे। सुपरिचित आलोचक राजकुमार सैनी ने कहा कि विष्णुजी ने काफी हाउस को एक विश्वविद्यालय बनाया, जिसमें हम जैसे उनके छात्र थे। विष्णु जी लोकतांत्रिक संस्कृति के संवाहक थे।
वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि विष्णुजी से मेरी पहली मुलाकात कोलकाता में तब हुई, जब वह आवारा मसीहा के लिए शरच्चंद्र पर शोध-सामग्री के संकलन के सिलसिले में आए थे। जब विष्णुजी ने 75 वर्ष पूरे किए तो मैंने उनका साक्षात्कार सशर्त लिया था। मैंने शर्त रखी कि मैं साक्षात्कार दो हिस्सों में लूंगा। पहला साक्षात्कार आपके अजमेरी गेट स्थित कुण्डेवालान घर पर और दूसरा कनॉट प्लसे के कॉफी हाउस में। विष्णुजी ने मेरी शर्त को स्वीकार करते हुए लंबा साक्षात्कार दिया। विष्णुजी यथास्थितिवादी नहीं, मानवतावादी थे। उनके चरित्र में कहीं भी दोहरापन नहीं था।
संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. बलदेव वंशी ने कहा कि विष्णुजी की वैष्णवता उनके साहित्य के माध्यम से हमारी विरासत बन चुकी है। विष्णुजी ने साहित्य कमाया, जीवन कमाया और मृत्यु भी कमाई। उन्होंने संतों का सा जीवन जिया। खुद ठगे गए, लेकिन कभी किसी को नहीं ठगा। युवा कथाकार-पत्रकार महेश दर्पण ने कहा कि विष्णुजी के पास कृत्रिमता का अहसास नहीं होता था। वह दिल्ली के होकर भी दिल्ली के नहीं लगते थे। वह स्वयं को पूर्णत: गांधीवादी नहीं मानते थे।
सुपरिचति व्यंग्यकार प्रदीप पंत ने कहा कि विष्णुजी विरोधाभासों के सामंजस्य थे। हंसराज रहबर, भीष्म साहनी से वैचारिक भिन्नता होते हुए भी विष्णुजी की उनसे खूब पटती थी। विष्णुजी ने गांधीवाद को अपने निजी जीवन में उतारा था।
विष्णुजी की पुत्री अनीता ने कहा कि सबसे बड़ी पुत्री होने के नाते मुझे पिताजी का सबसे अधिक स्नेह मिला। जब मैं कॉलेज जाती थी तो मुझे वह दस रुपये जबखर्ची दिया करते थे और खुद भी अपना जेबखर्च दस रुपये में चलाते थे। उनके साथ दक्षिण भारत की यात्रा अविस्मरणीय है। विष्णुजी अपने चार गुरु मानते थे- मां, मामा, बड़े भाई और पत्नी को।
ेगोष्ठी का संचालन डॉ. हरीश नवल ने किया। उन्होंने कहा कि अस्वस्थ्य होते हुए भी विष्णु जी मेरी बेटी की शादी में आए और बहुत देर तक रहे। जब तक वह रहे, तब तक स्नेहीजनों से घिरे रहे।
गोष्ठी में वीरेंद्र प्रभाकर, महेशचन्द्र शर्मा, हरिनारायण, रामकुमार कृषक, हरि बर्मन, संतोष माटा, सविता चड्ढा, रामकिशोर द्विवेदी, डॉ. धर्मवीर, डॉ. रवि शर्मा, भगवान सिंह, राजेंद्र नटखट आदि उपस्थित रहे।