नई दिल्ली : किताबघर प्रकाशन के संस्थापक पंडित जगतराम आर्य के जन्मदिवस 16 दिसंबर को ‘आर्य स्मृति साहित्य समारोह: 2012’ का आयोजन किया गया। इस बार की सम्मान-शृंखला-19 में उपन्यास की पांडुलिपि आमंत्रित की गई थीं। पुरस्कार की घोषित राशि इकतीस हजार रुपये थी और लेखक की निर्धारित आयु सीमा 40 वर्ष थी। संयोगवश, पांडुलिपियों की संख्या सीमित रही तथा सम्मान योग्य पांडुलिपि की भी अनुपस्थिति रही। संयोजक तथा परामर्शदाता के अनुसार यह निर्णय लिया गया कि स्तरीय पांडुलिपि के अभाव में यह सम्मान प्रदान न किया जाए। साथ ही, इस बार ‘आलेख पुरस्कार’ की एक अतिरिक्त घोषणा भी की गई थी। किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किए जा रहे बहुखंडीय बृहद् किशोर उपन्यास ‘गुल्लू और एक सतरंगी’ (लेखक : श्रीनिवास वत्स) के खंड-1 पर समीक्षात्मक आलेख लिखने वाले दो प्रतिभागियों को घोषित राशि 5100/- रुपये के लिए सम्मानित किया जाना था। आलेखकार अजितकुमार तथा डॉ. विजयकुमार महांति को यह सम्मान देने की घोषणा हुई थी। व्यक्तिगत तथा अपरिहार्य कारणों से दोनों विजेता समारोह में उपस्थित न हो सके।
साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सभागार में हिन्दी के विख्यात सर्जक-आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी की अध्यक्षता में समारोह आरंभ हुआ। संगोष्ठी का संचालक युवा आलोचक पल्लव ने किया।
‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के संयोजक और किताबघर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत ने संयोजकीय वक्तव्य में समारोह के वक्ताओं तथा साहित्यिक समाज से अनुरोध किया कि इस तथ्य की जाँच की जानी चाहिए कि क्या इधर हिन्दी में उपन्यास लेखन की स्थिति में कुछ ठहराव या बदलावों के संकेत उभर रहे हैं।
आलोचक पल्लव ने संगोष्ठी के केंद्रीय विषय ‘उपन्यास का प्रदेश’ पर चर्चा करते हुए कहा कि आज हिन्दी उपन्यास की विधागत अंतर्प्रक्रियाएं कई विधाओं में आ-जा रही हैं और इससे उपन्यास की पारम्परिक लेखन प्रविधि में कुछ नया जुड़ता प्रतीत हो रहा है। काशीनाथ सिंह ने ‘काशी का अस्सी’ में जिस शिल्पविधि को अपनाया है, वह विचारणीय है कि उस कृति को उपन्यास के खाँचे-ढाँचे में देखा जाए या नहीं। यह भी कि ‘शेखर: एक जीवनी’ या ‘मैला आंचल’ के जैसा शास्त्रीय रूप इधर के उपन्यास-लेखन में देखने को नहीं मिल रहा है। इसी प्रसंग में उन्होंने चित्रा मुद्गल के प्रकाशित उपन्यासों का संदर्भ देते हुए बताया कि उनके प्रत्येक उपन्यास की जमीन नई और लिखने की तकनीक भी भिन्न है। इस प्रकार के लेखकीय योगदान से विधा की विकासमान धारा हमारे सामने आती है और उपन्यास की सोद्देश्यता का क्षेत्र व्यापक होता है।
प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल ने कहा कि हाँ, विधाओं की एक-दूसरे के मध्य आवाजाही हुई है। मगर कौन-सी कृति किस विधा में स्थित है, यह प्रायः आलोचक तय कर रहे हैं। उपन्यास अपने समय और देशकाल का गहरा आख्यान होता है। मगर कुछ कृतियों को ‘उपन्यास’ सिद्ध कर देने की हड़बड़ी इधर आलोचकों में बढ़ी है। यह उचित है कि पितामह की धोती की तरह का परिवेश हम छोड़ रहे हैं, मगर पौधे को जड़ों से उखाड़ना उचित नहीं है। कुछ दशकों पूर्व लम्बी कहानी लेखन की परम्परा अस्तित्व में थी। देखते-देखते उन्हें लघु उपन्यास, फिर उपन्यासिका और अंत में ‘उपन्यास’ ही कहा जाने लगा। ‘उपन्यास का प्रदेश’ तो विधाओं के लोक में होता ही है मगर प्रदेशों का अपना उपन्यास भी होता है। संजीव का उपन्यास ‘किसनगढ़ के अहेरी’ अपनी आँचलिकता के लिए जाना जाता है। व्यापक समस्याओं से जुड़ने वाले स्थानिक या आँचलिक उपन्यासों का भी अभाव नहीं है हिन्दी में। कृष्णा सोबती, रांगेय राघव में अपने-अपने सरोकारों का चित्रण हैं। रचना के स्तर लेखकीय प्रयोग होते रहे हैं, होने भी चाहिए। कहानी में निजता की पहचान प्रमुख होती है तो उपन्यास में वही सार्वजनिकता की ताकत और ऊर्जा पैदा करती है। हिन्दी के बड़े उपन्यासकार रांगेय राघव, यशपाल, अमृतलाल नागर…एक प्रतिमान गढ़ते हैं जिनके समक्ष खड़े होने में मुझे बीस वर्षों तक झिझक रही। अच्छे समाज की कल्पना को साकार रूप देना बडी़ रचना की मांग करता है। एक सीमा तक जाकर तो रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी उपन्यास की प्रतीति देते हैं। मगर संस्कृत के बाद, उपन्यास गद्य की विधा बनी। निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल जैसा गद्य लिखना एक चुनौती भरा कार्य है। समाज के स्वरूप का दबाव भी अपनी जगह काम करता है। लेखक का सर्जक रूप परकायाप्रवेश की स्थिति और तेजस्विता पैदा करता है। ‘रेहन पर रग्घू’, ‘अपना मोर्चा’ निश्चित ही उपन्यास हैं, मगर ‘काशी का अस्सी’? मैं समझती हूँ कि परम्परा का पुनर्निर्माण भले हो जाने दें, मगर उसके शाश्वत रूप में सेंध लगाना उचित नहीं होगा। प्रकाशकों का भी दबाव हो सकता है कि उपन्यास चूँकि आसानी से बिक सकते हैं, इसलिए कई अन्य विधाओं के ग्रंथों को भी उसी तर्ज पर ‘उपन्यास’ कहने दिया जाता है।
संचालक पल्लव ने कहा कि हर सर्जक का अपना एक मानसिक प्रदेश भी हुआ करता है। संजीव हमारे समय के ऐसे रचनाकार हैं जिनका ध्यान इस देश के हाशिए पर स्थित लोगों के जीवन की कथा को उकेरने पर गया है। उनके उपन्यास ‘सूत्रधार’ आदि से पता लगता है कि वह अपना परिश्रम, प्रतिभा, साधना और समर्पण के साथ लेखन किया करते हैं।
कथाकार संजीव ने हिन्दी के अनेक ऐसे उपन्यासों का स्मरण दिलाया जो कि साहित्य के तथाकथित समकालीन और सुपरिचित क्षेत्रों से एकदम विलग हैं। कामतानाथ के ‘कालकथा’ से लेकर भगवानदास मोरवाल के ‘काला पहाड़’ और ‘रेत’, चंद्रकांता के ‘कथा सतीसर’, नासिरा शर्मा के ‘कुइंयाजान’ तथा मैत्रेयी पुष्पा के ‘इदन्नमम’, ‘अलमा कबूतरी’ और चित्रा मुद्गल के ‘आंवा’ उपन्यास का उल्लेख किया। उन्होंने ऐसे उपन्यासों का संक्षेप में उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे ये कृतियाँ उस रचनात्मक धारा से भिन्न है, जिसे कि प्रचलित लेखन धारा के रूप में देखा जाता है। ऐसे उपन्यासों में विषय और परिवेश ही नायक कहे जा सकते हैं। दोहराव वाले विषयों की एकरसता और वर्चस्व को तोड़ते ये उपन्यास, भले ही अचर्चित रह जाते हैं मगर इनके रचने का महत्त्व तो कम नहीं होता। ममता कालिया के उपन्यास ‘दौड़’ को भी अन्य कई उपन्यासों के साथ संजीव ने उल्लेखनीय बताया।
अपनी रचना-प्रक्रिया के विषय में संजीव का कहना था कि मैं स्वयं उपन्यास का कीड़ा रहा हूँ मगर फिर भी हिन्दी, भारतीय या विश्व की अन्य भाषाओं के विराट उपन्यास साहित्य को जानने का दावा नहीं कर सकता। मगर यह सच है कि विश्व साहित्य की केंद्रीय विधा उपन्यास ही है। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा ‘लज्जा’ जैसे चर्चित उपन्यासों को उन्होंने दस्तावेजीकरण का नमूना बताया। अपात्र कृतियों को उत्कृष्ट रचना घोषित करने की आलोचकीय हड़बड़ी को संजीव ने ‘साहित्यिक अपराध’ बताते हुए आलोचना के समकालीन परिदृश्य पर निराशा व्यक्त की। ड्राइंगरूम में बैठकर, जमीनी स्तर के अनुभव नहीं अर्जित किए जा सकते। इतिहास तथ्य है जबकि उपन्यास लेखन कला, इस अंतर को हमारे लेखकों और आलोचकों को समझना होगा। कच्ची रचना सृजन नहीं हो सकती। दस्तावेज और तथ्यों की धूल हटाकर ही हम किसी अध्ययनपरक उपन्यास की रचना कर सकते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के इस कदम को साहसिक बताया कि कमजोर कृति को पुरस्कृत करने के स्थान पर उन्होंने सम्मान को शून्य कर देने की प्रक्रिया अपनाई।
संजीव ने युवा उपन्यासकारों के सामने उपस्थित नई चुनौतियों के आधिक्य को भी रचना-बंजरता की उत्पन्न स्थिति से जोड़कर देखा। कैरियर और वेतन की धमक-चमक में, समाज में ठहरकर विचार करने की बुद्धिजीवीय सक्रियता में ह्रास हुआ है, कमी आई है। जन आंदोलनों का विलोप होना, तंत्र की एक अन्य शातिराना हरकत है। इसलिए इस सबमें उलझा युवक रचनात्मक योगदान नहीं कर पा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि समय की गति-दुर्गति को देखते हुए यह वांछनीय है कि हम छोटे कलेवर के उपन्यास लिखें। विषय और कथ्य की पहुँच आम जन तक हो और आतंकित करने वाली भाषा के प्रयोग से बचें। लेखक यह भी देखें कि इस बीच पाठक की रुचियाँ बदली हैं। समाज में फैली विसंगतियों पर लेखकों को ही ध्यान देना होगा। उनके लिए फरिश्ते आसमान से नहीं उतरेंगे।
‘इदन्नमम’ और ‘अलमा कबूतरी’ जैसी कृतियों की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के अनुसार हिन्दी में प्रचलित ‘युवा लेखन’ के जुमले को अब नकार देने का समय है। उन्होंने स्वयं अपना लेखन चालीस वर्ष की आयु के बाद तब शुरू किया था, जब उन्हें अपने रचनाकार के पास पर्याप्त परिपक्वता के अर्जित होने का आत्मविश्वास हो चला था। उन्होंने कहा कि नब्बे के दशक में भी ‘न लिखने का कारण’ शीर्षक चिंताएं उपस्थित रही हैं। उन्होंने अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यासों का हवाला देते हुए कहा कि हमें चिंता यह होनी चाहिए कि लिखना है और उत्कृष्ट लिखना है। चिंता यह होनी चाहिए कि जो लिखा जाए वह गहराई से, डूबकर लिखा जाए। आज का लेखक जल्दी में है, हड़बड़ी में है। हमें शोध के लिए अपने विषय के क्षेत्रों में जाना होगा। रेणु के ‘मैला आंचल’ उपन्यास को अपनी रचनात्मक प्रेरणा बताते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि कैसे एक अंचल विशेष की कहानी होते हुए भी वह उपन्यास, राष्ट्रीय चरित्र और स्वभाव की कृति बन जाता है। ‘इदन्नमम’ और ‘चाक’ जैसे उपन्यासों में मैंने उन नारी पात्रों को खोजा है जो अपनी कथा को संप्रेषित कर पाती हैं, जुबान दे पाती हैं। लोकगीतों में वर्णित स्त्रिायों की व्यथा को मैंने अपनी रचनाओं में स्थान देने का उपक्रम किया है।
मैत्रेयी पुष्पा के अनुसार बदलावों के आगमन से हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। मैं गाँव में जाती हूँ तो पाती हूँ कि वहाँ किशोरी-युवतियाँ फेसबुक पर हैं, कंप्यूटर पर काम कर रही हैं। बहुएं मोबाइल पर बातें कर रही हैं, अर्थात् अभिव्यक्ति और संप्रेषण के नए दरवाजे इस नई तकनीक के माध्यम से खुल रहे हैं। उनका मानना था कि हमें प्रश्नांकित होने में भय या संकोच नहीं लगना चाहिए। आम प्रश्नों के उत्तर देते हैं, तो नई दृष्टि का अनुसंधान भी होता है। अभी-अभी किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘तबदील निगाहें’ में मैंने अपने वरिष्ठों से खूब प्रश्न किए हैं जिनमें प्रेमचंद, जैनेंद्र और भगवतीचरण वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार शामिल हैं। उपन्यास आपके जीवन को नई राह देते हैं, नई तलाश भी देते हैं। अनुभूत सत्य को जानने के लिए मैं काफी फील्डवर्क करती हूँ। अपने पात्रों के मध्य जाकर रहा करती हूँ और उनकी जिजीविषा और विवशता को उपन्यास का ताना-बाना बनाती हूँ। इसीलिए अनुभव, विशिष्ट रचना के रूप में बोला करते हैं। ऐसे में पाठक-समाज को अपनी छवि दिखती है तो वह कृति विशेष को पढत़ा है। मेहनत, प्रतिभा और धैर्य किसी भी कृति की गुणवत्ता को बढा़ने का काम करते हैं।
हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अपने वाङम्य के ज्ञान के बिना अच्छा साहित्य नहीं लिखा जा सकता और आज मंच पर जो तीनों उपन्यासकार उपस्थित हैं, इनके बिना समकालीन हिन्दी उपन्यास का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। शाश्वत रूप से स्थापित कृतियों के बारे में उन्होंने कहा कि काल के सदियों लम्बे कालखंड के समय के झरते रेशों ने उन्हें महानता सौंपी है, इसलिए एक पुनर्पाठ से उनके महत्त्व को निरस्त कर पाना दुष्कर कार्य है। उन्होंने कहा कि आलोचक के रूप में उन्हें कई बार बहुत असुरक्षा महसूस होती है क्योंकि मूल्याँकित रचना के प्रतिमान और उनके स्रोतों से प्रायः अवगत रहना मुश्किल प्रक्रिया है। इस तरह आलोचक भी वंचित हैं, दुखित हैं। साहित्य लेखक पाठक को समाज के समकाल से सूचित करता है और पाठक की सुरुचियों में वृद्धि और विकास लाता है। कला और संगीत आदि ललित सर्जनाएं भी यही काम करती हैं। मगर आज के बाजारवाद और साम्राज्यवादी नजरिए ने हमारा स्वाद बदल दिया है।
उन्होंने कहा कि ‘स्व’ की जगह ‘पर’ का बोलबाला है। इस तंत्र का पुर्जा बनने पर यह पाठ पढ़ना अनिवार्य है कि जो है, वह नहीं है बल्कि वह है जो नहीं है। ‘हिंदू’, ‘जनसत्ता’ आदि समाचार-पत्र पढ़कर पता लगता है कि समाज में क्या विसंगतियाँ व्याप्त हैं। लेखक वहाँ से कच्ची सामग्री उठा सकता है। समय की दुर्दम चुनौतियों को स्वीकार करने पर ही लेखक अपना सांस्कृतिक योगदान दे पाता है। समाज की तथाकथित विकास प्रक्रिया को दिशाहीन बताते हुए उन्होंने कहा कि अच्छी रचना मानव के पक्ष में खड़ी होती है। मानव निरपेक्ष विकास को उद्घाटित, प्रकाशित कर यह बताना होगा कि हम दिशाहीनता की स्थिति के मारे हैं। अच्छे उपन्यास वही हुए हैं जिनके कथ्य में बिखराव है, वैसा ही बिखराव जैसा कि जीवन में सचमुच पाया जाता है। और लेखक को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाठक उसकी अंतिम शरणस्थली है। ऐसे में जबकि हम त्याग करने का सुख ही भूल गए हैं, इसमें व्यापक पाठक वर्ग के हृदय में अपनी बात उतारनी है, जीवन का ग्राफ ही साहित्यिक उपन्यास का शिल्प हो सकता है।



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