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शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

shekshik dakhal

शैक्षिक सरोकारों को लेकर प्रकाशित की जा रही है पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’ की लेखक रमेश जोशी की समीक्षा-

शिक्षा मानवीय संसाधनों को विकसित करती है। इस दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए यदि शिक्षा की व्यवस्था की जाय तो स्वाभाविक है उत्तम मानवीय संसाधनों का विकास होगा और अपेक्षानुरूप हम अपने समाज को ढालने में समर्थ हो सकेंगे। यदि संसाधनों को लेकर या फिर वित्तीय संकट का रोना रोकर कामचलाऊ व्यवस्था पर निर्भर रहा जाय तो परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जैसे-जैसे तकनीकी का विकास हो रहा है शिक्षा का दायरा भी विस्तृत होता जा रहा है। वर्तमान में शिक्षा देना बहुत आसान नहीं रह गया है, केवल कक्षा-कक्ष में जाकर पाठ्यक्रम से सम्बन्धित बातें बता देना और परीक्षा पास करवाना ही शिक्षा का लक्ष्य नहीं है, बल्कि छात्रों के अन्दर विद्यमान दक्षताओं को पहचान कर उनमें अपेक्षित परिवर्तन करते हुए उनमें जीवन कौशलों को विकसित करना भी है। शिक्षा को कैसा होना चाहिए और छात्रों को किस प्रकार आवश्यकताओं के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण तथा जीवनोपयोगी शिक्षा दी जाय इसको शिक्षक से बेहतर कौन जान सकता है। छात्रों में बहुमुखी प्रतिभा को विकसित करने के लिये शिक्षक को अनेक प्रयोग करने पड़ते हैं। छात्रों की कल्पना शक्ति का विकास करने के लिये शिक्षक को स्वयं भी रचनाशील होना चाहिए। आज भी संसाधनों को दरकिनार करते हुए कई शिक्षक छात्रों के भविष्य को संवारने में लगे हैं और सामाजिक चेतना के माध्यम से अन्य लोगों में भी चेतना का संचार करने में लगे हैं।

रचनात्मकता शिक्षक का प्रमुख गुण है। वह इसके अभाव में वह वर्तमान में विद्यालयों में उचित वातावरण का सृजन नहीं कर सकता है। बच्चों की रचनात्मक प्रवृति को विकसित करने के लिये तथा शिक्षकों में चेतना का संचार करने के लिए शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ का अंक रचनाधर्मी शिक्षकों के अथक प्रयास से निकल चुका है। इसे लोग पढें विशेषरूप शिक्षकों से निवेदन है कि अवश्य ही इस पत्रिका को पढ़ें तथा अपेक्षित सुधार हेतु अपनी राय दें ताकि इसे और अधिक उपयोगी बनाया जा सके। केवल सम्‍पादक मंडल या इससे जुड़े लोगों के प्रयास से बहुत अधिक सफलता नहीं मिल सकती है। अतः पाठकों की अधिकाधिक संख्या तथा उनकी प्रतिक्रिया सफलता के लिये आवश्यक है।  ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक अपने आपमें काफी सामाग्री समेटे हुए है। पत्रिका का बाह्य आवरण बहुत सुन्दर तथा आकर्षक है। अश्‍वघोष की ‘आजकल’ तथा हरीश चन्द्र पाण्डेय की ‘वहाँ कोई बच्ची नहीं थी’ कविता पत्रिका का निश्चित रूप से वजन बढ़ाती हैं। सम्‍पादकीय में महेश पुनेठा ने ‘ पाठ्य पुस्तकों के बोझ तले सिसकती रचनात्मता’ में विद्यालयों के बोझिल तथा सीमित वातावरण का जिक्र किया है जिससे कि बच्चों की रचनात्मकता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। पाठ्य पुस्तकों का बोझ बच्चों को शिक्षा की मौलिक विचारधारा से भटका रहा है तथा उन्हें बोझिल बना रहा है। पुनेठा जी ने लिखा है,‘बच्चा तनाव में है और किसी बोझ से दबा है तो वह नया सोच ही नहीं सकता और जब सोच ही नहीं सकता है तब रचने की बात तो दूर की कौड़ी है।’ वह आगे कहते हैं, ‘बच्चों का मन बहुत करता है कि खुले में विचरण करें, कल्पनाओं की उड़ान भरें, कुछ नया करे पर अध्यापकों-अभिभावकों द्वारा उसे किसी प्रकार से फिर पाठ्यपुस्तक रूपी किले से बाँध दिया जाता है।’ पाठ्य पुस्तकों की निर्भरता पर वह कहते हैं, ‘ एक आम तर्क होता है कि जब पाठ्यपुस्तक ही नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे शुरू होगी? यह प्रवृति बच्चे की रचनात्मता को कुंद करती है।’ यहाँ तक कि हमारे शिक्षकों में भी इस बात के लिये नाराजगी होती है कि वे पुस्तकों के अभाव में क्या करें।

हमारे परिवेश से भिन्न होने के कारण अंग्रेजी माध्यम से होने वाले नुकसान के बारे में उनका कहना है कि,‘ अंग्रेजी माध्यम के चलते बच्चे की चिंतन मनन की प्रक्रिया बाधित हुई है। एक ऐसी भाषा जो मातृभाषा से इतर है, बच्चे कि लिये उसमें चिंतन और कल्पना करना स्वाभाविक नहीं है।’

राजीव जोशी के समन्वयन में ‘स्वाधीन हुए बिना रचनात्मकता सम्‍भव नहीं’ विषय पर कई छात्रों, शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है तथा लेखन व सृजन के लिए स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकारा है। साथ ही स्वतंत्रता के असली मायनों को भी परिलक्षित किया है। स्वतंत्रता के सम्बन्ध में युवा उपन्यासकार राजीव रंजन कहते हैं, ‘स्वतंत्र होकर मिट्टी में जैसे दबाव नहीं डाला जा सकता उसे गढ़ने की स्वतंत्रता तो है पर इस प्रक्रिया में वह निश्चित दबाव, आकार, चाक की गति आदि की अवहेलना नहीं कर सकता।’ बातचीत में प्रोफेसर ए.के. जलालुद्दीन ने कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की हैं जो कि शिक्षक के लिये बहुत जरूरी हैं और इनका ध्यान यदि कक्षा-कक्ष में दिया जाय तो हम सफल शिक्षक की जिम्मेदारी का निर्वाहनआसानी से कर सकते हैं। शिक्षक को शिक्षण के इतर दी गयी जिम्मेदारियों पर भी कई लोगों ने ध्यान आकृष्ट किया है और इस पर सोचना वास्तव में बहुत जरूरी हो गया है।

बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर अभिभावक या शिक्षक उसे कितना बड़ा दण्ड देते हैं इसका वर्णन ‘किस्सा गुलफाम उर्फ टोलम का’ में किया गया है। हमें समस्या की तह में जाने की आवश्यकता है और उसके उपरान्त ही हम कोई निर्णय लें ताकि किसी का भविष्य खराब न हो सके। कविता की सार्थकता पर मोहन श्रोत्रिय ने प्रकाश डाला है। वह कहते हैं, ‘कविता सृजन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक कर्म है तो उसे सामाजिक सरोकार भी होंगे ही। इन सरोकारों की खुली अभिव्यक्ति भी पाठकों से कवि, कविता की निकटता और जुड़ाव को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।’ शिक्षक के व्यवहार की महत्ता को परिलक्षित करता खजान सिंह का आलेख बताता है कि विद्यालय में शिक्षक के लिए छात्रों के साथ मधुर व्यवहार कितना उपयोगी होता है। यदि आज भी छात्र विद्यालय के वातावरण को अनाकर्षक मानते हैं तथा पढ़ने से दूर भागते हैं तो निश्चित रूप से शिक्षक को अपने व्यवहार को पुनः सुधारने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण आलेख इस पत्रिका में दिये गये हैं जो कि पठनीय हैं।

‘आते हुए लोग’ के सम्बन्ध में मेरा सुझाव है कि इसमें और अधिक लोगों के विचारों को स्थान दिया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों के अनुभवों को इसमें शामिल किया जाय साथ ही व्यक्तिगत आक्षेपों से बचा जाय। व्यवस्थागत खामियों को उजागर करना ठीक है परन्तु व्यक्तिगत रूप से अल्प अनुभव को आधार मानकर कोई सार्वजनिक सिद्धान्त स्वतः निकाल लेना तर्क संगत नहीं होता है। मेरा सम्पादक मंडल से अनुरोध है कि इस प्रकार की खामियों से बचा जाय।
कुल मिलाकर पत्रिका में उपलब्ध सामाग्री पठनीय है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए कई महत्वपूर्ण सामाग्री इसमें समाहित है। ‘समाचार पत्रों में शिक्षा जगत की मौजूदगी’ डॉ. दिनेश जोशी का संकलन भी बहुत कुछ कहता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आप शिक्षक हों चाहे अभिभावक शिक्षा जगत में नित बदलती तस्वीर के लिये तथा अपने नौनिहालों के भविष्य के लिए इस पत्रिका को अवश्य पढ़ें।

पत्रिका का नाम : शैक्षिक दखल
सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
सहयोग राशि‍: 20 रुपये(प्रति‍ अंक), 100 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 1000 रुपये(आजीवन)

चिडिया से बतियाती औरत

जब दो कलाकारों का सृजन एक साथ सामने आता है तो कुछ अलग ही प्रभाव होता है। ऐसा ही शानदार प्रभाव डाला है कवि महेश चंद्र पुनेठा की कविताओं पर वरिष्‍ठ चित्रकार कुँवर रविन्‍द्र के बनाए पोस्‍टरों ने-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रति संसार की रचना : महेश चंद्र पुनेठा

युवा कवियित्री रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्‍मान’ से सम्‍मानित किया गया है। कवि महेश चंद्र पुनेठा द्वारा लिखी गई उनके कविता संग्रह ‘पेड़ बनी स्‍त्री’ की भूमिका-

स्त्री मन की उधेड़बुन, बेचैनी, झुँझलाहट, खीज, आशा-आकांशा को जितनी गहराई और प्रमाणिकता से एक स्त्री की रचनाओं में जाना और महसूस किया जा सकता है शायद और कहीं नहीं। रचना में एक स्त्री अपने मन को पूरी तरह से उडे़ल कर रख देती है। स्त्री के विद्रोही मन की ऊँचाई और प्रेमी मन की गहराई का असली भान उसकी रचना में ही होता है। उसके लिये वास्तविक संसार में वह जो सम्‍भव नहीं उसे अपने कविता-संसार में सम्‍भव कर दिखाती है। एक ऐसे प्रति संसार की रचना करती है जो उसे पसंद है। रेखा की प्रस्तुत संग्रह की कविताएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ये कविताएं जितना एक स्त्री जीवन के बाह्य पक्ष के बारे में बताती हैं उससे ज्यादा उसके मन के बारे में। एक स्त्री अपने आसपास को किस तरह देखती है और आसपास की तमाम चीजें और घटनाएं उसके मन पर कैसा प्रभाव डालती हैं, यह इन कविताओं में दृष्टिगोचर होता है। इनके यहाँ प्रेम और विद्रोह दोनों है। वह अंधविश्‍वासों और रूढि़यों से मुठभेड़ करती हैं। चीजों को उसी रूप में नहीं स्वीकारती हैं जैसी पहले से चली आ रही हैं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल करते हुए जो उन्हें तर्क संगत लगता है उसे स्वीकार करती हैं। स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान के साथ होने वाला कोई भी खिलवाड़ उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

रेखा में अपनी बात को बेवाक रूप से कहने का साहस भी है और दृढ़ता भी। उनमें सामंती मूल्यों के प्रति गहरा आक्रोश है। वह उन्हें तोड़ना चाहती हैं। पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के साथ होने वाले हर छल-छद्म से वह परिचित हैं। उसको अपनी कविताओं में निर्ममता से उघाड़ती हैं। ‘स्त्री पूजा’ के प्रपंच को वह अच्छी तरह जानती और समझती हैं इसलिए उसकी कोई परवाह नहीं करती हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि स्त्री पूजा उसको सम्मान देने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान की खुशफहमी पैदा कर उसका मनमाफिक उपयोग करने की चालाक कोशिश है। महिमामंडित कर चुप कराने का षड्यंत्र है ताकि उसके भीतर किसी तरह का विद्रोह पैदा न होने पाए। उसको यह खुशफहमी रहे कि कोई बात नहीं, भले कितने ही दुःख-दर्द सहन करने पड़ें पर उसका सम्मान तो कायम है। लाज, प्रेम, दया,  क्षमा, त्याग, विनयशीलता, आज्ञाकारिता, समर्पण को स्त्री के गहने क्यों बताए गये हैं, इसको भी वह अच्छी तरह समझती हैं। वह मानती हैं कि जब स्त्री समाज के बनाए सामंती नियम-कानूनों और मूल्यों के बोझ से बाहर निकलेगी तभी सही अर्थों में उसकी मुक्ति सम्‍भव है।

रेखा की कविताओं में जगह-जगह स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा पंख फड़फड़ाती हुई दिखाई देती है। उनकी स्त्री लकीरों से बाहर निकलकर अपना मनचाहा संसार रचना चाहती है, भले ही व्यवस्था को लकीर से बाहर जाना पसंद नहीं है। उनके यहाँ ‘उड़ान’ बीज शब्द के रूप में आता है जो मुक्ति का प्रतीक है। यह अच्छी बात है कि उनकी स्त्री के भीतर तमाम परेशानियों और जाल-जंजालों के बावजूद भी मुक्ति की आकांक्षा मरती नहीं है। वह उड़ना चाहती है। अपने पंखों को हमेशा तोलती रहती है। परिस्थितियों के सामने झुकती नहीं है बल्कि उससे टकराना चाहती है। उठ खड़ी होती है। निर्भीक होकर अपनी सहमति-असहमति व्यक्त करती है यह जानते हुए भी कि औरत की हर लड़ाई में उसकी देह को ही उसका दुश्मन बना दिया जाता है। फिर भी उनकी इच्छा है कि बेटियाँ खूब नाचें-गाएं, खेलें-कूदें जिससे गूँज उठें दसों-दिशाएं।

प्रकृति के विभिन्न उपादान इन कविताओं में बार-बार आते हैं। प्रकृति का आलंबन लेकर अपने दुःख-दर्द, हर्ष-उल्लास और आशा-आकांशा को व्यक्त करने का औरत का बहुत पुराना तरीका इन कविताओं में भी परिलक्षित होता है। सूरज, पेड़, बादल, बारिश, नदी, पहाड़, धूप, फूल-पत्ती आदि इन कविताओं में बहुत आते हैं। यह कवियित्री की प्रकृति से निकटता को बताती है। यहाँ इन सबका मानवीकरण कर दिया है। कवियित्री इनसे बतियाती है। अपने दुःख-दर्द उनको सुनाती है। स्त्री के दुःख इतने अधिक हैं कि फिर भी खत्म नहीं होते।

रेखा की कविताओं में प्रेम की गहरी एवं विलक्षण अनुभूति के दर्शन होते हैं। एक ऐसी परिस्थिति में जबकि घर-बाहर के काम के बोझ से दबी औरत के पास ‘प्यार-व्यार’ की बातों के लिए समय तक नहीं है उसमें रेखा का प्रेम कविताएं लिखना प्रीतकर लगता है। तमाम व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी प्रेम के प्रति सम्मान का भाव है। उनकी कविताओं में आया प्रेम फिल्मी प्रेम नहीं, बल्कि जीवन का सबसे उद्दात भाव है जो मजबूती से थामे रखता है। जिसकी नमी, तरलता, हरापन बचाए रखती है आदमी होने के अहसास को। उनके लिए प्रेम मनुष्य होने का पर्याय है। वह मानती हैं कि प्रेम करना किसी लड़की के लिये  हथेली में गुलाब उगाने जैसा है जिसकी मीठी चुभन को तो छुपाया जा सकता है पर खुशबू को नहीं। प्रेम के सामने सामंती और पूँजीवादी मूल्यों के चलते आने वाले खतरों से भी रेखा वाकिफ हैं। ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं पर वह व्यंग्य करती हैं कि ये सब घटनाएं उस देश में होती हैं जिसमें ‘राधा-कृष्ण’ की पूजा की जाती है। वह स्त्रियों को सलाह देती हैं- तुम जरूर करना प्रेम/पर ऐसा नहीं कि/जिससे प्रेम करना उसी में/ढूँढने लगना/आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप। अर्थात अपनी अस्मिता को बचाए रखना। वह इसके खिलाफ दिखती हैं कि प्रेम में अपने अस्तित्व को ही मिटा दिया जाय जैसे नदी सागर में मिलकर मिटा डालती है क्योंकि जब स्त्री बचे रहेगी तभी दुनिया का अस्तित्व भी बचा रहेगा। यह स्त्री अस्मिता के प्रति उनकी अतिरिक्त सजगता ही कही जाएगी।

इन कविताओं में ग्वाले, घसियारिनें, स्कूली बच्चे, खेतों में खरपतावार हटा-हटाकर थक गई बहू-बेटियाँ, दूर शहर गए आदमी के इंतजार में बैठी पहाड़ी स्त्री, सड़क किनारे खेलते नंग धड़ंग बच्चे, भीख मांगती मांएं भी दिखाई देते हैं। अपने आसपास की केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि उसके बीच रह रहे श्रम करते लोगों पर भी रेखा का ध्यान बराबर जाता है। यह उनके अपने लोक और श्रम से संपृक्ति का प्रमाण है।

रेखा की कविताओं की खासियत है कि वह किसी बात को उलझाती नहीं हैं। भाषा के खेल के द्वारा कोई चमत्मकार पैदा करने की कोशिश नहीं करती हैं। बोलचाल के उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जो उनके पास सहजता से उपलब्ध हैं। बिम्‍बों में अपनी बात कहती हैं पर उनके लिये भी कहीं दूर नहीं जाती हैं बस अपने आसपास से ही उठाती हैं। अपनी कोमल भावनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों को अपनी कल्पनाशीलता से एक नया और मोहक रूप प्रदान कर देती हैं। उनकी बालसुलभ कल्पनाएं बहुत भाती हैं। प्रेम कविताओं में तो मानो उनकी कल्पनाशीलता को नये पंख लग जाते हैं।

रेखा की कविताएं पहाड़ी झरने की तरह हैं जो एक ओर देखने वाले को भीतर-बाहर से भिगोती हैं तो दूसरी ओर कठोर से कठोर चट्टानी भूमि को भी तोड़ केनन में बदल डालती हैं। फिर केनन पानी से लबालब भरकर हर पल तरंगायित होता रहता है। उसके छींटे आसपास फैलकर सभी को नम कर देते हैं। इन कविताओं को पढ़ने के बाद पाठक वह नहीं रह जाता है जो उससे पहले होता है। लगातार एक झरना उसके भीतर प्रवाहित होते रहता है। रेखा अपनी अद्भुत कल्पनाओं से उसे गुदगुदाते हुए एक नए लोक में ले जाती हैं जहाँ पहुँचते-पहुँचते उनके तीखे प्रश्‍न फिर उसे वास्तविक लोक में लौटा ला उससे जिरह करने लगते हैं। पाठक सोचने-विचारने को मजबूर हो जाता है और उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाशने लगता है। तब उसे लगता है कि उसकी नजर जहाँ सब कुछ ठीक-ठाक देख रही थी वह वैसी नहीं है। चीजें बहुत गड़बड़ हैं। उनको सही करने की जरूरत है। इस तरह ये कविताएं हमें सचेत करती हैं। इन कविताओं को धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है।

किताब : पेड बनी स्‍त्री (कविता संग्रह)
कवियित्री : रेखा चमोली
मूल्‍य : 100 रुपये
प्रकाशक: बिनसर पब्लिकेशन कंपनी, 8 प्रथम तल 4, डिस्पेंसरी रोड देहरादून-248001

‘पेड़ बनी स्‍त्री’ से रेखा चमोली की कुछ कविताएं

पूँजीवादी क्रूरता, त्रासदी एवं अमानवीयता को उघाड़ती कविता : महेश चंद्र पुनेठा

चंद्रकांत देवताले

हाल ही में वरिष्‍ठ कवि चंद्रकांत देवताले को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार देने की घोषणा हुई है। इस पर उनकी चर्चित कविता ‘थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे’ पर कवि महेश चंद्र पुनेठा का समीक्षात्‍मक आलेख-

हम सभ्य हो चुके हैं। हमने सीख लिए हैं- रहन-सहन के नए-नए  तरीके, नई-नई भाषाएं, आचार-व्यवहार के नए रूप।उड़ चले हैं दूर आसमान तक। लाँघ लिये हैं सात समुंद्र। जीत ली हैं सारी भौगोलिक दूरियाँ। लिख डाली हैं बड़ी-बड़ी पोथियाँ।स्थापित कर लिये हैं हजारों हजार स्कूल, मदरसे, कॉलेज, विश्‍वविद्यालय, संग्रहालय, पुस्तकालय, अप्पूघर,  पार्क, मैदान, बाग-बगीचे बावजूद इसके एक बड़ी शर्मनाक बात  है हमारे लाखों करोड़ों नन्हे-नन्हे बच्चे काम करने को विवश हैं । कुछ पीठ पर अपने से बड़ा बोरा लटकाए कूड़े के ढेर में रोटी तलाश रहे हैं, कुछ होटल में कोमल-कोमल हाथों से बरतनों को चमका रहे हैं, कुछ अपनी कमीज खोलकर ट्रेन का फर्श या लोगों के जूते साफ कर रहे हैं तो कोई दन-कालीन, माचिस, बीड़ी-सिगरेट, पटाखे, बल्ब-ट्यूब या चूडि़याँ बनाने जैसे खतरनाक कामों में लगे हैं, कुछ गोबर, लीद ढूँढते रहने के बाद अंधेरे में दुबक रहे हैं । ये छोटे-छोटे मासूम बच्चे घरों, ढाबों, होटलों, कारखानों,  खादानों, भट्टियों, खेतों हर जगह काम करते हुए देखे जा सकते हैं । शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ बच्चे काम करते नहीं दिखाई देते हों। ये सभी बच्चे गरीब, किसान और मजदूर परिवारों के होते हैं। थोड़े से बच्चे हैं जो सही अर्थों में अपना बचपन जी रहे हैं बाकी के लिये तो जैसे बचपन किसी उड़ती चिडि़या का नाम हो । वे उन मेमनों जैसे होते हैं जिन्हें गड़रिये जल्द बना लेते हैं ऊन के पेड़ जो शैशव में ही बन जाते हैं अधेड़।…जो खेलते नहीं कभी खिलौनों से पर जिनका बचपन रहता है खिलौना। बचपन की इस त्रासाद एवं शर्मनाक स्थिति का वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले की कविता, ‘थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे’ सटीक चित्रण करती है । इस कविता में वर्ग विभाजित समाज के दोनों वर्गों के बच्चों की जीवन-स्थिति के दृश्य एक साथ प्रस्तुत कर कवि ने इस भयावह स्थिति को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। कविता की शुरूआत ही इन दृश्यों से होती है-

थोड़े से बच्चों के लिए
एक बगीचा है
उनके पाँव दूब पर दौड़े रहे हैं
असंख्य बच्चों के लिए
कीचड़-धूल और गंदगी से पटी
गलियाँ हैं जिनमें वे
अपना भविष्य बीन रहे हैं।
कविता में आगे दो दृश्य और आते हैं-
एक मेज है
सिर्फ छह बच्चों के लिए
और उनके सामने
उतने ही अंडे और सेव हैं
एक कटोरदान है सौ बच्चों के लिए
और हजारों बच्चे
एक हाथ में रखी आधी रोटी को
दूसरे से तोड़ रहे हैं ।

वास्तव में यह विडम्‍बना है कि पूँजीवादी  समाज में जहाँ एक ओर एक वर्ग तो तमाम सुख-सुविधाओं का उपभोग करता है, यहाँ तक कि उसके पास संसाधन उसकी आवश्यकता से कई गुना अधिक होते हैं, वहीं दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग ऐसा होता है जिसके पास अपनी जरूरी आवश्यकताओं के लिये भी संसाधन उपलब्ध नहीं रहते हैं। उसे भूख के कारण आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ता है। कविता की उक्त पंक्तियों में जिस स्थिति को दिखाया गया है आज समस्या उससे भी अधिक जटिल एवं त्रासद हो चुकी है। आज एक ओर कुछ के लिये अनगिनत सेव और अंडे हैं तो दूसरी ओर अनगिनत के लिए आधी रोटी भी नहीं है। बहुत सारे बच्चे ‘अपना भविष्य बीन रहे हैं’ कहकर कवि गरीब वर्ग के जीवन की इस त्रासदी को उसकी सारी भयावहता के साथ उघाड़ता है। गरीब लोगों का जीवन इतना अनिश्चित होता है कि भविष्य को सजाने-सँवारने जैसी कोई बात उनके पास होती ही नहीं है । वे तो अभावों में जीते हुए भविष्य को केवल बीन ही सकते हैं। इन बच्चों के कठिन जीवन संघर्ष के माध्यम से कवि पूँजीवादी व्यवस्था में अमीर और गरीब के बीच की खाई और संसाधनों के असमान वितरण को पाठकों के सामने बड़े ही मार्मिक ढंग से रखता है। यहाँ कवि की पक्षधरता किस वर्ग के प्रति और कितनी गहरी है साफ-साफ देखी जा सकती है। कविता की ये पंक्तियाँ गरीब वर्ग के प्रति कवि की गहरी सम्‍वेदनशीलता का प्रमाण हैं-

ढेर सारे बच्चे होटलों में
कप-बसियाँ रगड़ रहे हैं
उनके चेहरे मेमनों की तरह दयनीय हैं
और उनके हाथों और पाँवों की चमड़ी
हाथ और पाँव का साथ छोड़ रही है।

कितनी दुःखद स्थिति है कि जिस उम्र में उच्च-मध्य वर्ग के बच्चे अपने खाए बर्तनों को अपनी मेज से खिसकाते तक नहीं, उसी उम्र में बहुत सारे बच्चे होटल में बर्तन माँजने तथा दूसरे के द्वारा तय की गई मजदूरी पर अपनी इच्छा के विरुद्ध कठोर श्रम करने के लिये मजबूर हैं। कैसा क्रूर समाज है-

अखबार के चेहरे पर जिस वक्त
तीन बच्चे आइसक्रीम खाते
हँस रहे हैं
उसी वक्त
बीस पैसे में सामान ढोने के लिए
लुकाछिपी करते बच्चों के पुट्ठों पर
पुलिस वालों की बेतें उमच रही हैं।

कविता की ये पंक्तियाँ पूरी व्यवस्था की कलई खोल कर रख देती हैं। बेतों की उमच सीधे दिल में चोट करती है। मन घृणा से भर उठता है। ऐसा लगता है जैसे ये बेत बच्चों के पुट्ठों में न पड़कर हमारी सभ्यता और संस्कृति के पुट्ठों पर पड़ रहे हों। शर्म आती है ऐसे ‘सभ्य समाज’ पर। ऐसी असम्‍वेदनशील परिस्थितियों में जी रहे बचपन से कैसे एक सम्‍वेदनशील नागरिक बनने की आशा कर सकते हैं। इन हालातों में पल -बढ़कर निकलने वाला बच्चा आगे एक सभ्य, सुशील और विवकेशील मनुष्य बनेगा यह सोचना भी किसी यूटोपिया से कम नही लगता। यदि ये बच्चे दिवारों पर गालियाँ लिखते हैं, बीड़ी के अद्धे ढूँढते हैं, नशाखेारी करते हैं तो इसमें बहुत अधिक आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उसके लिये वे बच्चे नहीं वरन उनका परिवेश जिम्मेदार है । यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चे के मन के निर्माण में उसके सामाजिक वातावरण और आर्थिक स्थिति की प्रमुख भूमिका होती है । जैसा कि कवि एकांत श्रीवास्तव अपने एक निबंध में लिखते हैं, ‘बचपन की आँख से देखा गया जीवन स्मृति में अमर रहता है । यह समय मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण का समय है ।संस्कार यहाँ आकार लेते हैं जो बाद में समग्र जीवन और विचार को संचालित करते हैं।’

यदि बच्चों को गाली-गलौच, नशाखोरी, चोरी-डकैती या अन्य कुप्रवृत्तियों से बचाना है तो उसके आधारभूत कारणों का उपचार करना होगा । जिसमें पहला है गरीबी और शोषण आधारित व्यवस्था का अंत। यह साफ देखा जाता है जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक होती है वह व्यक्ति अपने और अपने बच्चों के भविष्य के प्रति सजग होता है। उसे अपने और अपने बच्चों के भविष्य को सजाने-सँवारने की चिंता होती है । निश्चित रूप से वह अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के प्रति गम्भीर होता है । यहीं से शुरुआत होती है एक स्वस्थ एवं संतुलित विकास की । एक और बात आज गरीब बच्चों के अभिभावकों को यह कह कर गरियाया जाता है कि सरकार द्वारा बच्चों की शिक्षा के लिये तमाम सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराने के बावजूद वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते । वे बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहते । दरअसल सच्चाई यह नहीं है। गरीब की सबसे बड़ी समस्या है दो वक्त की रोटी। अगर वह अपने एक बच्चे को स्कूल भेजता है तो इसका सीधा मतलब है कमाने वाले दो हाथों का कम पड़ जाना । कुछ इसी तरह का मामला बालश्रम का है । इसे केवल कानून बनाकर नहीं रोका जा सकता है। फिर ऐसे कानून से तो बिल्कुल ही नहीं जिसकी खाल बच्चों के पुट्ठों में बेतें बरसाकर खुद सरकारी कारिंदे ही उधेड़ते रहते हैं। इसके लिये उन हालातों को दूर करना जरूरी है जिनके फलस्वरूप बच्चे अपने श्रम को बेचने को विवश होते हैं। उस व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है जिसमें राज्य,  कानून, पुलिस, सेना जैसे प्रबंध आम आदमी के हित में न होकर एक वर्ग विशेष के हित में होते हैं। इस कविता में कवि का मंतव्य भले यह कहना रहा हो या नहीं पर यहाँ ‘बीस पैसे में सामान ढोने के लिये/लुकाछिपी करते बच्चों के पुट्ठों पर  उमच रही पुलिस वालों की बेतों से’ कहीं न कहीं यह बात भी उभर कर आती है कि आखिर राज्य, पुलिस, सेना आदि समाज के किस वर्ग के हित के लिये होती है। कविता यह सोचने को भी प्रेरित करती है कि गरीब बच्चों में जो तमाम कुप्रवृत्तियाँ घर कर जाती हैं उसके लिये कौन-कौन से कारक उत्तरदायी होते हैं? एक बड़ी कविता की खासियत होती है कि वह केवल उसी बात को नहीं कहती है जो सीधे  शब्दों में कही गयी हो, बल्कि उसमें बहुत सारी बातें शब्दों और वाक्यों के बीच से ध्वनित होती हैं। यह बात इस कविता के संदर्भ में भी कही जा सकती है।

यह कविता गहरी पीड़ा और बेचैनी से पैदा कविता है। दिखावटी गुस्से और सहानुभूति से ऐसी कविता सम्‍भव नहीं है। बहुसंख्यक बच्चों के साथ होने वाले इस दर्दनाक एवं शर्मनाक व्यवहार को देख कवि मन इतना व्यथित हो जाता है कि वह कह उठता है-

ईश्‍वर होता तो इतनी देर में उसकी देह कोढ़ से
गलने लगती, सत्य होता तो वह अपनी
न्यायाधीश की कुर्सी से उतर
जलती सलाखें  आँखों में
सुपस लेता, सुंदर होता तो वह अपने चेहरे
पर तेजाब पोत अंधे कुँए में कूद
गया होता……….।

पर यहाँ तो ईश्‍वर के नाम पर सिर्फ कुछ छपे हुए शब्द, सत्य के नाम पर चापलूसी की नॉद में लपलपाती जुबानें और सुंदरता के नाम पर सख्त चेहरे हैं। उक्त पंक्तियाँ न केवल कवि के आक्रोश को व्यक्त करती हैं बल्कि समाज में व्याप्त इस अमानवीयता को और अधिक तीव्रता से सामने रखती है। कविता की इन पंक्तियों में भाषा की आक्रामकता और व्यवस्था के प्रति तीखा व्यंग्य है। इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद कोई भी सम्‍वेदनशील व्यक्ति बैचेन हुए और तिलमिलाए बिना नहीं रह सकता । न ही इस अन्याय के प्रति चुप बैठ सकता है । व्यवस्था के प्रति उसके मन में गुस्सा अवश्य पैदा होगा । अधिक न कर सके भले वह पर स्वयं तो कभी भी बच्चों के प्रति असम्‍वेदनशील नहीं हो सकता । बाल शोषण और विषमता भरे समाज के प्रति आँखें मूँदे नहीं रह सकता। एक अच्छी कविता से यह आशा भी की जाती है कि वह पाठक को वैसा नहीं रहने देती है जैसा वह उस कविता को पढ़ने से पूर्व था।

जिस समाज में इतनी विषमता और अभाव हैं, क्या वह समाज बनावटी समानता, किताबी जुमलों तथा सुभाषित वाक्यों से इस असमानता को ढक सकता है? कविता प्रकारांतर से यह प्रश्‍न भी खड़ा करती है। समाज में व्याप्त इस विषमता और अभावों को ढकने का प्रयास इस व्यवस्था द्वारा निरंतर किया जाता रहता है । गरीबी और असमानता को पूर्वजन्म के कर्मों,  दैवीय कृपा या भाग्य के साथ जोड़ कर उन्हें भ्रमित किया जाता है । धर्म,  शिक्षा एवं संचार के माध्यमों को इस कार्य में लगाया जाता है । बड़े-बड़े धर्म ग्रंथों में छपी सुंदर-सुंदर बातों, झूठी स्तुतियों, दीवारों पर सुलेख में लिखे सुभाषित वाक्यों से क्या इस असमानता को ढका जा सकता है? बिल्कुल नहीं। जमीनी वास्तविकता अधिक दिनों तक छुपी नहीं रह सकती है । देर-सबेर प्रतिरोध खड़ा होना निश्चित है।कवि की भी इस पर गहरी आस्था है। उसका यह विश्‍वास विल्कुल सही है कि-

वे पृथ्वी के बाशिंदे हैं करोड़ों
और उनके पास आवाजों का महासागर है
जो गुब्बारे की तरह
फोड़ सकता है किसी भी वक्‍त
अंधेरे के सबसे बड़े बोगदे को ।

कवि देवताले के शिल्प के लिए कहा जाता है कि वह चौंकाने वाले काव्य शिल्प के जरिए कविता की बनावट और कविता की जमीन को अपने क्रोध से तोड़ते हैं, पर इस कविता का शिल्प चौंकाने वाला न होकर सहज संप्रेषणीय है, जिसमें विपरीत स्थितियों के संयोजन से एक संश्लिष्ट दृश्य उपस्थिति किया गया है। न भाषा की दुरूहता है और न ही अंतर्वस्तु की । वह संप्रेषणीय शिल्प में अपनी बात को रखते हैं । पाठक को उलझना या शब्दों के जाल में भटकना नहीं पड़ता है। शिल्प कवि के मंतव्य को सही-सही पाठक तक पहुँचाने में समर्थ है। साथ ही कवि कर्म की इमानदारी को व्यक्त करता है। कवि की दृष्टि में कहीं कोई उलझाव नहीं दिखाई देता । वह वर्गों में बँटी दुनिया को बिल्कुल साफ-साफ देखते हैं और करोड़ो-करोड़ उपेक्षित व उत्पीडि़त लोगों की ताकत को पहचानते हैं । कवि का दृढ़ विश्‍वास है कि यदि यह वर्ग संगठित और चेतनाशील हो जाय तो अंधेरे के सबसे बड़े बोगदे को तोड़ने में भी सक्षम है। ‘पर वे शायद जानते नहीं’ कहकर कवि उनमें राजनीतिक चेतना के अभाव की ओर भी संकेत कर देता है । इस तरह वह कह देते हैं कि आज जो करोड़ों-करोड़ बाशिंदे शोषण और उत्पीड़न के शिकार हैं उसके पीछे इनका अपनी ताकत को नहीं पहचानना और असंगठित होना है। यहाँ यह उस ओर भी ध्यान खींचते हैं कि थोड़े और बाकी के अंतर को समाप्त करने के लिए कहीं न कहीं शोषित-पीडि़त बहुसंख्यक जनता को राजनीतिक चेतना से लैस करने की आवश्यकता है। यह बात जितनी उस समय सत्य थी जब यह कविता लिखी गई उससे ज्यादा कहीं आज हैं । जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद जैसी तमाम संकीर्णताओं में जकड़ी यह बहुसंख्यक जनता आज भी विभाजित है । फलस्वरूप आवाजों का यह महासागर उमड़ नहीं पा रहा है। उनको अपनी ताकत का अहसास कराने की जरूरत है। लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का भी यह एक कार्यभार है।

यह कविता कवि के सामाजिक सरोकारों और काव्य सम्‍वेदना को परिलक्षित करती है । एक प्रतिबद्ध कवि की विशेषता होती है कि वह चीजों को द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखता है । किसी धुंध या कुहासे से भ्रमित नहीं होता । उसे चीजें साफ-साफ दिखाई देती हैं । वह जितनी स्पष्टता  से खुद देखता है उतनी स्पष्टता के साथ दूसरों को भी दिखाता है। उन्हें किसी तरह से भरमाने की कोशिश नहीं करता है । प्रस्तुत कविता में यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है । कवि वर्तमान में ही नहीं, अतीत के पन्नों में भी चीजों को देखता है । सामाजिक-आर्थिक असमानता केवल आज की ही बात नहीं है, बल्कि युगों-युगों से थोड़े और बाकी का यह अंतर बरकरार है । जिसे कवि कल की छीना-झपटी और भागमभाग के पैबंद इतिहास के रूप में देखता है।

उनकी स्मृतियों में फिलवक्त
चीख और रुदन
और गिड़गिड़ाहट की हिंसा है
उनकी आँखों में कल की छीना-झपटी
और भागमभाग का पैबंद इतिहास है।

इस  कविता में शब्दों और मुहावरों का सटीक एवं संतुलित प्रयोग किया गया है। भविष्य बीन रहे हैं, टपरों के नसीब में उलझ गया है, बेतें उमच रही हैं, सुपस लेता, काले गणित के पैबंद, अंधेरे के बोगदे, गिड़गिड़ाहट की हिंसा, शब्द रहित भय, जख्मी आज, जैसे प्रयोग कवि की अद्भुत भाषायी सामर्थ्‍य को बताते हैं। इन शब्दों या मुहावरों की जगह अगर हम अन्य शब्दों का प्रयोग करें तो कविता की तासीर ही समाप्त हो जाएगी । कविता वह सब कुछ नहीं कह पाएगी जो कहना चाहती है। इन शब्दों को पाकर कविता जैसे बोलने लगती है । ये शब्द कविता को नया अर्थ-सौंदर्य प्रदान करते हैं। कथ्य के अनुकूल शब्दों का ऐसा सटीक चयन एक बड़ा कवि ही कर सकता है। ‘उमच’, ‘सुपस’आदि ऐसे शब्द हैं जिनमें क्रिया का पूरा बल दिखाई देता है। ये शब्द स्थिति की भयावहता को उसकी पराकाष्ठा में व्यक्त करते हैं । घटना को विजुअल बना देते हैं। भाव की जो गहराई कहने वाले के मन में है वही सुनने या पढ़ने वाले के मन में पैदा हो जाती है। इन शब्दों की खासियत यह है कि ये किसी शब्दकोश से लिये गये शब्द न होकर जन-भाषा से लिये गये हैं। कविता में जिस तरह के शब्द-चित्र या बिम्‍ब कवि द्वारा खींचे गये हैं, वे इस बात के प्रमाण भी हैं कि कवि ने गरीब वर्ग के बच्चों को कितनी करीब से देखा और उनकी क्रियाओं को नोट किया है । बिना देखे कोई यह नहीं कह सकता है कि उनके चेहरे मेमनों की तरह दयनीय हैं/और उनके हाथों और पाँवों की चमड़ी/हाथ और पाँव का साथ छोड़ रही है। इस तरह यह कविता जीवन को किताब से नापने वाली नहीं वरन जीवनानुभव से पैदा कविता है। कामकाजी बच्चों पर इसके बाद लिखी गई अनेक कविताओं में इस कविता का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। राजेश जोशी की कविता ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ भी इससे अछूती नहीं लगती ।

कुल मिलाकर यह कविता हमारी सभ्यता एवं विकास की पोल खोलने वाली कविता है । यह केवल बच्चों की दुनिया की कविता नहीं, बल्कि हमारे पूरे समाज एवं समय को रचती कविता है । यह पूँजीवादी समाज की क्रूरता, त्रासदी  व अमानवीयता को उघाड़ती है। इस कविता में देवताले अपना गहरा विक्षोभ, गहरी पीड़ा और गरीब बच्चों के साथ अपनी आत्मसंलग्नता व्यक्त करते हैं। साथ ही यह कविता पाठक को अपनी ओर से आगे बहुत कुछ रचने और जोड़ने का अवकाश देती है। कविता को पढ़कर सहज ही पाठक के मन में प्रश्‍न पैदा होते हैं- आखिर क्यों कुछ बच्चों के लिये ही आकर्षक स्कूल और प्रसन्न पोशाकें हैं ? क्यों कुछ के लिये ही रंग-बिरंगी किताबें, खेल-खिलौने, मैदान और बाग-बगीचे हैं ? क्यों ढेर सारी बच्चियाँ गोबर, लीद ढूँढते रहने के बाद अंधेरे में दुबक रही हैं ? क्यों लड़कियाँ नदी-तालाब-कुआँ घासलेट-माचिस-फंदा ढूँढ रही हैं? क्यों शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले समाज में  असंख्य बच्चों के हिस्से में हिंसा ही हिंसा है ?

 

नयन-माथे से लगा लूँ, उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ : पुनेठा

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के हाल ही में प्रकाशित पहले कविता संग्रह ‘न रोको उन्‍हें शुभा’ पर युवा कवि-आलोचक महेश चंद्र पुनेठा की समीक्षा-

शेखर जोशी मूलरूप से कहानीकार के रूप में जाने-जाते हैं पर उनके बारे में वीरेन दा का यह कहना बिल्कुल सही है कि कविता गुठली की तरह उनकी कहानी के बीचों-बीच छिपी है। कविता की यही गुठली है जो अंकुरित हो सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘न रोको उन्हें शुभा’ नाम से एक कविता-वृक्ष की तरह हमारे सामने खड़ा है। इस वृक्ष में विविध रूप-रंग-गंध के कविता-पुष्प खिले हैं। इन कविताओं में जीवन और प्रकृति के अनेकानेक दृश्य-छवियाँ-छटाएँ बिखरी पड़ी हैं जो कवि के लम्‍बे जीवनानुभव की निष्‍पत्ति हैं। इन कविताओं में मजदूर और किसान चेतना के दर्शन तो होते ही हैं साथ ही एक सम्‍वेदनशील मन की भावसिक्त लहरें पाठक को भिगोती भी हैं। ये पहाड़ी नदी की तरह न होकर झील की तरह हैं जो ऊपर से देखने पर शांत-अविचलित दिखती हैं पर भीतर से हलचल से भरी हुई होती हैं जिनमें ढेरों मूँगे-शंख-सीपियाँ हैं।

पिछले दिनों युवा उपन्यासकार दयानंद पाण्डेय ने अपने रिपोर्ताज में लिखा कि शेखर जोशी किसान चेतना के नहीं, बल्कि मजदूर चेतना के कहानीकार हैं। मुझे उनका यह मूल्याँकन अधूरा लगा। शेखर जोशी के कहानी संग्रह ‘मेरा पहाड़’ में हमें ऐसी अनेक कहानियाँ मिलती हैं जिनमें पहाड़ी किसान जीवन के संघर्ष दिखाई देते हैं। उसी तरह समीक्ष्य संग्रह की कविताओं में भी। ‘धान रोपाई’, ‘प्रवासी का स्वप्न’, ‘आभार, ‘अन्नप्रसवा!’, ‘स्मृति में रहें वे’ जैसी कविताएं केवल किसान चेतना से लैस कवि ही लिख सकता है। उसे ही ‘धान की बालियों का वह पागल नर्तन’, धान की सुवास तथा उसकी विविध किस्मों की पहचान हो सकती है। वही कवि इस तरह से लोकगीत के बोलों को रेखाँकित कर सकता है- धरती माँ है/देगी, पालेगी, पोसेगी उन्हीं को/जो उसकी सेवा में जाँगर धन्य करेंगे। धान रोपाई का ऐसा सूक्ष्म चित्रण वही कर सकता है जिसने किसान जीवन को नजदीक से देखा-भोगा हो- आज हमारे खेतों में रोपाई थी धानों की/घर में/बड़ी सुबह से हलचल मची रही कामकाज की/खेतों में/हुड़के के थापों पर गीतों की बरषा बरसी/मूँगे-मोती की मालाओं से सजी/कामदारिनों ने लहँगों में फेटे मारे/आँचल से कमर कसी। जो कवि धान के लहराते खेतों के बीच खड़ा रहा हो कभी वही कह सकता है- कल ये फिर हरे-भरे झूमेंगे/मंजरित बालियाँ इठलाएँगी, नाचेंगी/सौंधी बयार मह-मह महकेगी। इन दृश्य-श्रव्य बिम्‍बों को पढ़ते हुए थोड़ी देर के लिए पाठक खुद को धान के खेतों के बीच खड़ा पाता है और उसके नासापुटों में धान की विविध किस्मों की खुशबू समा जाती है। शेखर जोशी को किसान मन की गहरी समझ है। वह उसके मन में उतरना जानते हैं। वह उस नब्ज को पहचानते हैं जिसके सहारे सीधे किसान मन में उतरा जा सकता है। उससे सम्‍वाद स्थापित किया जा सकता है। ‘अस्पताल डायरी-3 : आभार, अन्नप्रसवा!’ कविता इसका उदाहरण है। किसानों के प्रति इतना श्रद्धानवत कोई अन्य नहीं हो सकता है- नयन-माथे से लगा लूँ/उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ…..जो धरा पर सप्तगंधी अन्न-रंगों अल्पना लिखते। उनकी किसान चेतना का एक प्रमाण यह भी है कि वह अपनी कविता के लिये अधिकांश बिम्‍ब-रूपक भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। ‘मिलःनाइट शिफ्ट’ मे ड्यूटी करते हुए थके मजदूर की तुलना वह रस की अंतिम बूँद तक चूस दिए गए ‘गन्ने की सूखी ठठरी’ से करते हैं। उन्हें गबरू जवान जगतार ‘बकरी के छौने सा खिलंदड़ा’ लगता है। अस्पताल में बीमार मास्साब से खेती-बाड़ी की बात करने पर वह उनकी आँखों में ‘रोपाई वाले खेतों की तरलता’ देखते हैं और खेती-बाड़ी की बात करते हुए अपनी हारी-बीमारी और दुःख-चिंताओं को भूल जाते हैं। क्या किसी मध्यवर्गीय बोध के कवि के साथ ऐसा संभव है?

खैर मजदूर चेतना के रचनाकार के रूप में तो शेखर जोशी पहचाने ही जाते हैं। मजदूर जीवन की त्रासदी, शोषण-उत्पीड़न और संघर्ष उनकी नजर से कभी छुपा नहीं रहा। कहानी हो या फिर कविता हर विधा में प्रमाणिक रूप में अभिव्यक्त हुआ। प्रस्तुत संग्रह में ‘मिडनाइट-शिफ्ट’ तथा ‘कारखाना-1 व 2’ इसके उदाहरण हैं। उनके अनुसार मजदूर पुर्जे का प्रतिरूप है जिसका श्रम यंत्रक्रम से चलता है। कारखाना इन पुर्जों का ताना-बाना है जहाँ वह ‘यंत्रवत-यंत्रवेग से’ चलने को विवश है।

किसान-जीवन से प्रेम करने वाला व्यक्ति प्रकृति से प्रेम किए बिना नहीं रह सकता है। शेखर जोशी प्रकृति के प्रति गहरी रागात्मकता के रचनाकार हैं। ‘पहली वर्षा के बाद’, ‘ग्रीष्मावसान’, ‘विदा की बेला’, ‘नदी किनारे’, ‘मुझे अपने में समेटे’, ‘बसंताभास’ आदि कविताओं में प्रकृति के प्रति उनकी यह रागात्मकता देखी जा सकती हैं। उनकी कविताओं में आए लाल गदृगद खिलखिलाते बुरूँश के अरुणमुखी फूल, पार्श्‍व में फैले रजत श्रृंग, उफनती भादो की वेगवती नदी, आकाश ताकते देवदार, पहाड़ी ढलान पर खड़े चीड़ों के झबरीले शावक, भूरी मटमैली चादर ओढ़े बूढ़े पहाड़, कुहरे में ढँकी घाटियाँ, चुप्प सोया ताल, पहाड़ों का गहन विस्तार, घुँघराले बालों वाले खुफिया दोस्त सी लहरदार वसंती हवा, डूबता रवि, घिरती साँझ, झमाझम बरसता पानी, फूटते सोते आदि पहाड़ी अंचल के भू-दृश्य को किसी कुशल चितेरे की तरह चित्रित कर देते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार विश्‍वनाथ त्रिपाठी के नंगालताई गाँव से लौटने पर कवि को अपना गाँव याद हो आता है- वे ढलवाँ छतों वाले घर/सीढ़ी-दर-सीढ़ी  लहलहाती फसलें/निरंतर सम्‍वाद करती नदी/सरगोशियाँ करते चीड़ के लम्‍बे दरख्त/तेज हवा में सफेद हथेलियाँ चमकाती बाँज की टहनियाँ/वन से लौटती गोधन की डार/निकट आता वह घंटियों का मन्द्र स्वर। बड़ी बात यह है कि कवि को अपने गाँव की प्रकृति के साथ ही याद आते- वे संगी/वे साथी/वे स्वजन-परिजन/उन्हीं का दिया है यह जीवन-रस/स्मृति में रहें/रहें, वे आमरण।

कवि को वैज्ञानिक सदी पर गर्व है पर उनका यह गर्व गर्ववादियों की तरह अंधा नहीं है जिसमें गर्व करने वाले को उसकी कमियाँ नहीं दिखाई देती हैं। वह गुण-दोषों पर बराबर दृष्टि रखते हैं- धन्य हो हमारी विज्ञान सम्पन्न सदी/तूने कितना भर दिया हममें आत्मविश्वास/कितनी शक्ति/लेकिन, साथ ही बनाया कितना निरीह/ये चर्नोबिल, ये फुकोशिमा और ये अपना भोपाल।

‘अखबार की सुर्खियों में चला गया जगतार’, ‘मुजफ्फर नगर 94’, ‘उत्तराधिकार’, ‘स्वप्नगाथा’ उनकी अलग तेवर की कविताएं हैं जिनमें कवि की पक्षधरता का पता चलता है। साथ ही भारतीय लोकतंत्र के खोखलेपन को उघाड़ती हैं।

जहाँ तक इन कविताओं के भाषा-शिल्प की बात है, यह कहा जा सकता है कि चिर-परिचित जीवन प्रसंगों से जुड़ी होने के कारण तत्सम बहुल शब्दावली के बावजूद कविता की संप्रेषणीयता बाधित नहीं होती है तथा कविता की लय के चलते गद्य होने से भी बच जाती हैं। ताजे बिम्‍बों और रूपकों से भरपूर होने के कारण कुछ कविताओं को छोड़कर इनकी काव्यात्मकता में भी कमी नहीं आने पायी है। कहीं जरूर इस तरह की चूक हो गई हैं जो थोड़ा चौंकाती भी हैं। जैसे- धानों की हरी मखमल के किनारे/पीली गोट सरसों की…..धान के साथ सरसों का प्रयोग असंगत प्रतीत होता है। इसी तरह कवि का यह कहना समझ से परे है-शुभा!/अभिशप्त हैं पीढि़याँ/लिखने को कविताएं/बुनने को सपने/और अंकित करने को सतरंगी दुनिया।

कवि-कहानीकार शेखर जोशी की चिर इच्छा है- कि डूबकर पानी पीऊँ/जब तक जीना है प्रभु/मस्ती में जीऊँ। जीवटता और जिजीविषा से भरा कवि ही इस तरह की इच्छा रख सकता है। कवि की यह इच्छा अवश्य पूरी हो ताकि मस्ती से जीते हुए हिन्‍दी साहित्य को उनसे कुछ और अनमोल रचनाएं मिल सकें। जीवन के 80वें साल में आए उनके इस कविता-संग्रह का स्वागत होना ही चाहिए जिसके प्रकाशन के पीछे कवि की अपने बीते दिनों की स्मृति को दुबारा जीने की इच्छा रही। इस संग्रह को पढ़ने के बाद मेरा तो मन हो रहा है- नयन-माथे से लगा लूँ/उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ।

पुस्‍तक : न रोको उन्हें शुभा(कविता संग्रह)
कवि : शेखर जोशी
मूल्य-एक सौ पचास रुपये
प्रकाशक : साहित्य भंडार 50, चाहचंद, इलाहाबाद-211003

शि‍क्षा व्‍यवस्‍था में ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

 

हाल में प्रकाशि‍त पत्रि‍का ‘शैक्षि‍क दखल’ के प्रवेशांक पर कवि‍ और शि‍क्षक रमेश जोशी की टि‍प्‍पणी-

शिक्षा के गिरते स्तर तथा शैक्षिक गुणवत्ता पर उच्च स्तर से लेकर चाय-समोसे की दुकान तक नियमित रूप से चर्चा होते रहती है। यह अलग बात है कि यह चर्चा/बहस अधिकांश समय निकालने के लिए ही होती है या व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति अथवा समुदाय विशेष की छवि धूमिल करने हेतु होती है। परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा के स्तर/गुणवत्ता में कमी होती जा रही है तथा दोहरी शिक्षा प्रणाली से समाज में उत्तरोतर खायी बढ़ती जा रही है। इस पूरे शिक्षा तंत्र को संचालित करने में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, अस्तु यदि गुणवत्ता में कमी आ रही है तो शिक्षक भी इसके लिये निश्‍चि‍त रूप से दोषी है। यह बात दीगर है कि व्यवस्थागत खामियों के चलते शिक्षक का चरित्र धूमिल हो रहा है। परन्तु इन व्यवस्थागत खामियों को दूर करने में शिक्षकों को भी महत्वपूर्ण भागीदारी करनी होगी, अपने विद्यालय स्तर के क्रियाकलापों में(जहाँ वे उस भूमिका में पहले से हैं) तथा सामाजिक चेतना के क्षेत्र में (अनेक शिक्षक इस दिशा में प्रयासरत हैं) समाज का दृष्टिकोण शिक्षक के प्रति नकारात्मक क्यों है, इसकी तह में जाना पड़ेगा तथा समाज को जागरूक करने के लिये अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता है। यह अतिरिक्त प्रयास रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा किया जा रहा है जो कि स्वागत योग्य है।

‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका के रूप में शिक्षकों का यह प्रयास सभी शिक्षकों की सहभागिता पर निर्भर होगा। चर्चित कवि एवं आलोचक महेश पुनेठा जो कि एक समर्पित शिक्षक भी हैं तथा दिनेश कर्नाटक कहानीकार एवं शिक्षक द्वारा सम्पादित यह पत्रिका अपने प्रथम प्रयास में ही काफी हद तक सफल कही जा सकती है। ‘प्रारम्‍भ शीर्षक’ में महेश पुनेठा ने शिक्षा, शिक्षक तथा समाज के स्वरुप को बारीकी से निरुपित किया है तथा शिक्षण मूल्यों की महत्ता को रेखांकित किया है, शिक्षक समाज को इसकी आवश्यकता है। प्रेमपाल शर्मा द्वारा लिखित ‘सामाजिक न्याय तथा भाषा’ भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण आलेख है। अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत किस प्रकार हमारे ऊपर हावी है, इसका जिक्र किया है। साथ ही हिन्‍दी भाषा की अनिवार्यता तथा इस हेतु सरकारी प्रयासों की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया है ताकि अधिकाधिक जनता को इसका लाभ मिल सके।

शिरीष खरे द्वारा सारगर्भित आलेख ‘अगर शिक्षा की एक परत हो’ में भी सरकारी नीतियों की खामियों को उजागर किया है। किस प्रकार स्वतंत्रता से लेकर आज शिक्षा में समानता का अभाव है, इसका चित्रण किया गया है। इसके परिणामस्वरूप आज भी समाज का एक वर्ग विशेष सब पर हावी है। दिनेश कर्नाटक की कहानी ‘मैकाले का जिन्न’ हमारी शिक्षा व्यवस्था का एक मॉडल प्रस्तुत करता है। किस प्रकार शिक्षक की कार्यप्रणाली बाधित हो रही है, इसका सजीव चित्रण उन्होंने किया है। दरअसल शिक्षण कार्य एकमात्र पेशा ही नहीं वरन पेशे से कहीं ऊपर का कार्य है, यह एक जूनून है इसलिये शिक्षक को विभागीय दिशा-निर्देशों के साथ-साथ स्वविवेक का भी प्रयोग करना चाहिये और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे असफलता ही मिलेगी। कर्नाटक द्वारा रचित शिक्षक पात्र नरेन्द्र इसी सरकारी व्यवस्था से बंधा है और यदि वह अतिरिक्त प्रयास करना भी चाहता है तो परिस्थितियाँ इसके लिये उसे इजाजत नहीं देती हैं। डॉ. विपिन कुमार शर्मा की पुस्तक समीक्षा ‘पढने का आनंद’ भी पठनीय एवं शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिये उपयोगी है।

कुल मिलाकर पत्रिका पठनीय है। शिक्षकों का यह प्रथम प्रयास अच्छा है। यद्यपि आवरण एवं साज-सज्जा की दृष्टि से पुस्तक आकर्षक नहीं बन पाई परन्तु इसमे समाहित अधिकांश सामग्री पढ़ने योग्य है। सभी शिक्षक इसे पढ़ें और अपने अनुभवों को पत्रिका तक पहुँचाएं तभी यह प्रयास वास्तविक रूप से सार्थक होगा। पत्रिका से जुड़े शिक्षकों से भी अनुरोध होगा की इसमें समर्पित एवं सफल शिक्षकों के विचार प्रकाशित करें तथा उनके कार्यों को स्थान दें।

सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 0941170470
सहयोग राशि‍ : 15 रुपये(प्रति‍ अंक), 50 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 2000 (आजीवन)

जो रचता है वह मारा नहीं जाता है : महेश चंद्र पुनेठा

भगवत रावत

हि‍न्‍दी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ भगवत रावत (13 सितंबर 1939- 25 मई 2012) को श्रद्धांजलि‍स्‍वरूप चर्चित कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख-

मैं भगवत रावत से बरास्ता उनकी कविताओं से ही परिचित हूँ। उनकी कविताओं को अक्सर पढ़ता रहा हूँ। वे मेरे पसंदीदा कवियों में से एक हैं। उनकी कविताओं में कथारस की प्रधानता मुझे बहुत प्रीतिकर लगती है। मेरे लिये भगवत रावत उन विरले कवियों में हैं जिनकी कविताएं मात्र सम्‍वेदना नहीं जगातीं बल्कि हमें सचेत भी करती हैं। करुणा और प्रेम में ही नहीं डुबाती हैं बल्कि बेचैन भी करती हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, जैसे हम देश के उन आम-आदमियों से मिल रहे हैं जो इस पृथ्वी को कच्छप की तरह अपनी पीठ पर धारण किये हुए हैं पर उन्हें न इस बात का न भान है और न गुमान। उस आदमी को देख रहे हैं जो चारों और फैली हुई/स्थिर और कठोर चट्टानों की दुनिया के बीच..झाड़ियों में सूखे डंठल बटोरकर/आग जलाता है। उससे बातचीत कर रहे हैं जो अपनी पहचान के लिये जूझ रहा है। उस आदमी के सुख-दुःख बाँट रहे हैं जो जीवन भर दूसरों का माल-असबाब ढोता रहा फिर भी गरीबी का बोझ नहीं उतार पाया है।

भगवत रावत की कवितायें अपने चारों ओर के छल-छद्म, स्वार्थ, मक्कारी, झूठ, फरेब से कुंठित और निराश हो चले व्यक्ति को सकून तथा आत्मविश्‍वास प्रदान करती हैं। उनकी कवितायें भरोसा दिलाती हैं कि अभी दुनिया इतनी ‘गलीज नहीं हुई है कि हम इससे भागने की सोचें और एक सम्‍वेदनशील व्यक्ति के रहने योग्य न समझें, आशा एवं सुख के अनेक द्वीप अभी बचे हुए। पल-पल के हिसाब वाले इन दिनों में अभी भी सम्‍भव है- न कोई रिश्तेदारी, न कोई मतलब/न कोई कुछ लेना-देना, न चिट्ठी पत्री/न कोई खबर, कोई सेठ न साहूकार/एक साधारण सा आदमी/पाटता तीस-पैंतीस से ज्यादा वर्षों की दूरी/खोजता-खोजता, पूछता-पूछता घर-मोहल्ला/वह भी अकेला नहीं पत्नी  को साथ लिये/सिर्फ दोस्त की बेटी के ब्याह में शामिल होने चला आया। भगवत रावत ऐसे आत्मीयता भरे क्षणों को कविता की विषयवस्तु बनाकर उसे जीवनधर्मी बना देते हैं। कविता में सौंदर्य की प्रस्थापना के लिये उन्हें कहीं विशिष्ट की खोज में नहीं जाना पड़ता है। रास्ते में पड़े उबड़खाबड़-खुरदुरे पत्थर को उठाकर सुन्‍दर मूर्ति बना देने का अद्भुत हुनर उनके पास था। जीवन के छोटे-छोटे क्षणों को ही संश्‍लि‍ष्टता की बदौलत बड़ी कविता का रूप दे देते हैं। यह उनकी जीवन के प्रति गहरी रागात्मकता का प्रमाण है। इसी का बल है वह उन लोगों को देख पाते हैं जो- बैलों के साथ जुते/अपना बदन तोड़ते/हंसिए की तेज धार से/अपनी उम्र काटते’ हैं। उन्हें इस बात पर अपराध बोध भी होता है कि- हमेशा आगे बढ़ गया/पत्थरों से निकली हुई उनकी चिंगारियों को/कभी अपने जिस्म पर नहीं लिया/तांगा हाँकते हुए/उनके हाथों से/कभी घोड़े की रास/ अपने हाथों में नहीं ली। ऐसा वही कह सकता है जिसे इस वर्ग  से गहरी आत्मीयता हो और उनके श्रम की कीमत को पहचानता हो। जिसके सृजन का केन्‍द्र क्रियाशील जीवन हो। इसलिये बहुत कम भरोसे के लायक बची इस दुनिया में भी उनकी कविता एक ‘भरोसा’ प्रदान करती है। कुछ उसी तरह जैसे बर्तन वाली बाई को है। उसे भरोसा है कि एक दिन/उसकी लकड़ी मिल जाएगी/उसे भरोसा है कि एक दिन/अपराधी पकड़े जायेंगे। यही भरोसा है जो पीड़ित-शोषित-उपेक्षित जनों को संघर्ष के लिये प्रेरित करता है। जिसका बना रहना बहुत जरूरी है अन्यथा शोषक वर्ग द्वारा तो निरन्‍तर इसे तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है ताकि संघर्षशील जनता द्वारा वर्तमान व्यवस्था को ही अपनी नियति मान लिया जाये। उनकी कविता की सबसे बड़ी ताकत उस आदमी की तलाश है ‘जो थका-माँदा लगभग पराजित और अपमानित जीवन व्यतीत करता हुआ भी हारा नहीं’  है। जिसको दृढ़ विश्वास है कि ‘एक न एक दिन उसकी सच्चाई रंग लायेगी।’

भगवत रावत की कवितायें उन मित्रों की तरह हैं जो हमसे दूर रहते हुए भी जरूरत पर हमारे पास आ प्रकट होते हैं और हमें ताजगी से भर देते हैं। बचपन के किसी दोस्त की तरह हमारे अकेलेपन में आकर हमारे कंधे पर हाथ रख ‘चुपचाप अपना बीड़ी का बंडल बढ़ा’ देती हैं। अकेले में भी हमारे भीतर बजती रहती हैं। जब भी उनकी कवितायें पढ़ता हूँ अपने-आप को समृद्ध पाता हूँ। लगता है अपने लोगों से मिलकर लौटा हूँ जिन्होंने–‘जोड़-जाड़कर जुटी घरेलू दुनिया में पले-बढ़े तमाम आदमियों की तरह घरेलू दुनिया से ज्यादा बड़े सुख का सपना कभी नहीं देखा’।

उनकी कवितायें दुनिया की आपाधापी से बच-बचाकर आती हैं इसलिये कवि पाठकों से अपील करता है कि उनसे हड़बड़ी में नहीं मिला जाये- कम से कम अपना पसीना सुखा सकें/इतना समय/उन्हें दें/उन्हें बस इतना अपना/हो लेने दें/कि वे आपसे/बातचीत किये बिना/वापस न जायें। वास्तव में उनकी कविताओं को  धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है। ऊपर से सीधी-सरल लगने वाली उनकी कवितायें अपने भीतर बहुत कुछ समाए रहती हैं। उनका हमेशा सचेत प्रयास रहा है कि कविता को इतना सरल-सहज बनाया जाय कि वह सीधे पाठक के मन में उतर जाय। उनकी मान्यता रही कि हमारे नागरिक समाज में शायद ही ऐसा कोई हो जिसके मन में कविता के बारे में कुछ न कुछ धारणा न हो। उनका विश्‍वास था कि वह जो लिखेंगे उसे अवश्य ही कोई न कोई, न केवल समझेगा, उससे प्रतिकृत और प्रभावित भी होगा। वह कविताओं को बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते थे क्योंकि विभिन्न मनःस्थितियों में कवितायें विभिन्न अर्थ छवियाँ देती हैं। उनकी कविता में हमारे समय के निशान बहुत व्यापक एवं गहरे हैं। वह अपने समय की घटनाओं, दुर्घटनाओं, छल, प्रपंच,  पाखंड, प्रेम, करुणा, संहार, षड्यंत्र, राजनीति को अपने कथ्य का मुख्य आधार बनाते हैं। उन्हें पता है, मनुष्यता को बचाने के नाम पर कैसे मनुष्यता का कत्ल किया जा रहा है। वह जीवन भर मनुष्यता की खोज करते रहे भले ही वह इस खोज के पीछे भागते-दौड़ते थक से गये पर हारे नहीं।

उनके लिए-दुनिया का सबसे कठिन काम है जीना/और उससे भी कठिन शब्द के अर्थ की तरह/रच कर दिखा पाना/जो रचता है वह मारा नहीं जाता है। यह बात आज उन्हीं के सन्‍दर्भ में सही सिद्ध भी हो रही है भगवत रावत कभी मर नहीं सकते। सर्जन के प्रति उनकी इतनी गहरी आस्था जीवन के प्रति आस्था का ही पर्याय है। जीवन उनके लिये खाना-पीना-सोना और ऐश करना कभी नहीं रहा न ही अपनों की खुशी के लिए जीना। बल्कि रच कर दिखाना रहा। भला ऐसा कवि कभी मर सकता है क्या?  अपनी कविताओं से भगवत रावत हमेशा जिंदा रहेंगे। उनकी सादगी और विनम्रता हमेशा याद रहेगी।

भारतीय जमीन में खड़े रहकर पश्‍चि‍मी आधुनिकता से टकराती एक कालजयी रचना : महेश चंद्र पुनेठा

त्रि‍लोचन (20 अगस्त, 1917 - 9 दि‍सम्ब‍र, 2007)

प्रगति‍शील कवि‍ त्रि‍लोचन की प्रसि‍द्ध कवि‍ता ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ के माध्‍यम से उनकी काव्‍यात्‍मक दृष्‍टि‍ का वि‍श्‍लेषण करता प्रसि‍द्ध कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख-

त्रिलोचन की कविता को लेकर मलयज ने अपनी डायरी में लिखा है, ‘‘मुझे यह साफ दि‍ख पड़ता है कि आज त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की भारतीयता को लेकर हम नहीं चल सकते, इनकी भारतीयता में बौद्धिक ऊर्जा की कमी है। नितांत कमी है । ये हद से हद लिरिकल किस्म के भारतीय हैं। इनमें टकराहट नहीं है। ये बस अपने को सुरक्षित रखे हुए। अपनी अस्मिता बचाए हुए हैं, बह नहीं गए हैं । एक जमीन इनके पास है, उस पर बस टिके हुए हैं। हमें रामचंद्र शुक्ल की भारतीयता चाहिए, गॉधी जी की भारतीयता चाहिए, जिनमें एक ओर अपनी जमीन का विवेक था तो दूसरी तरफ पश्‍चि‍म से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा और ललकार और उससे टकराने का खुलापन-त्रिलोचन की भारतीयता जैसा बंधा-बंधापन उनमें न था, एक जगह टिके रहने की भारतीयता उनमें न थी ।’’ मलयज के इस मत से सहमत हो पाना कठिन है क्योंकि त्रिलोचन की ‘नगई महरा’, ‘फेरू कहार’, ‘भोरई केवट के घर’, ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ सरीखी दर्जनों कवितायें हैं जो इस बात का प्रमाण हैं कि त्रिलोचन की भारतीयता में कितनी जबरदस्त ऊर्जा है। ऐसी ऊर्जा जो रामचंद्र शुक्ल तथा प्रेमचंद की भारतीयता को आगे विकसित करती है । इस भारतीयता में अपनी जमीन का विवेक भी है और पश्‍चि‍म से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा भी । ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ कविता में जब चम्पा कहती है, ‘कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी/कलकत्ते पर बजर गिरे।’ यहाँ अपनी जमीन के प्रति प्रेम तो है ही साथ पश्‍चि‍म की अंध औद्योगिकता का विरोध भी। यह उस केन्‍द्रीकृत औद्योगीकरण तथा शहरीकरण की आलोचना है जो पश्‍चि‍म की देन है । जिसके कारण लोगों को अपना गाँव या कस्बा छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ता है । गाँधी की उस विचारधारा का प्रकारांतर से समर्थन है जिसमें वे स्वालम्बी ग्राम्य अर्थव्यवस्था के पक्ष तथा विवेकहीन मशीनीकरण के विरोध की बात करते हैं । यदि गाँव स्वालंबी होंगे तो स्वाभाविक है घर से दूर जाने का जो दंश है, उसे नहीं भोगना पड़ेगा। दरअसल इस कविता की केन्‍द्रीय अंतर्वस्तु यही है । क्या यह पश्‍चि‍म के पूँजीवादी विकास के ढाँचे से टकराना नहीं है ? अपनी जमीन पर मजबूती से खड़ा होना तथा वहाँ के जन, उसकी प्रकृति, उसके समाज और संघर्षों से गहराई से जुड़ना क्या यह पश्‍चि‍म या पश्‍चि‍मी साम्राज्यवाद को ललकारना नहीं है?

यह त्रिलोचन की पश्‍चि‍म से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा का प्रमाण ही है कि उनकी सन् 40-41 के दिनों में लिखी कविता ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चिन्हती’ आज उस समय से अधिक प्रासंगिक हो चली है। पश्‍चि‍म से आये वैश्‍वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के चलते जैसे-जैसे पूँजी का केन्‍द्रीकरण होता जा रहा है तथा देश में चंद शहर ‘विकास के द्वीप’ बनते जा रहे हैं, यह कविता उस चट्टानी-व्यवस्था से टकराती है। उस पर बज्र बनकर टूटना चाहती है। ‘कलकत्ता’  दरअसल उस पूँजीवादी व्यवस्था का प्रतीक है जिसने विकास को कुछ लोगों और  कुछ स्थानों तक सीमित कर दिया है। उसके बदले छीन लिये हैं बहुत सारे लोगों के सुख-सपने और संसाधन । गाँवों को खाली कर दिया है ।वहाँ छोड़ दिये हैं बूढ़े, बच्चे और महिलायें जो परदेश गये अपने लोगों की याद में कलपते रहते हैं । मजदूर के जीवन में परायापन एवं अलगाव पैदा कर दिया है। फलस्वरूप वह परिवार और मानवीयता से अलग होता जा रहा है। आज तो स्थितियाँ और अधिक जटिल हुई हैं । आज नौबत यह आ गई है कि कलकत्ते गये बिना गुजारा नहीं ।वैश्‍वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के फलस्वरूप गाँवों में न कुटीर उद्योग रहे, न खुदरा व्यापार, न किसानी और न खेत मजदूरी । ऐसे में छोटे-मोटे काम की तलाश में शहरों की और जाना मजबूरी हो गयी है। इसका सबसे अधिक दंश उस स्त्री को झेलना पड़ रहा है जो न केवल अपने पति से दूर हो जाती है बल्कि पति की गैर मौजूदगी में परिवार की पूरी जिम्मेदारी उस पर आ जाती है । आज यह कविता हमारे सामने एक प्रश्‍न खड़ा करती है कि परिस्थितियों के चलते क्या आज किसी चम्पा के समक्ष ऐसा विकल्प रह गया है कि वह कह सके- ‘मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी/ कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी।’ मैं समझता हूँ विकल्प नहीं रह गया है। बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था ने शहर के प्रति ऐसा आकर्षण तथा श्रम के प्रति ऐसी हिकारत पैदा कर दी है कि चम्पायें कहने लगी हैं- ‘कलकत्ते मैं भी साथ चलूँगी।’ बहू-बेटे के कलकत्ता चले जाने पर घर के बड़े-बूढ़ों पर जो पहाड़ टूटता है वह दिल को दहलाने वाला होता है। अपने अंचल उत्तराखण्‍ड के गाँवों की ही बात करूँ, पृथक राज्य बनने के बावजूद यहाँ यह दृश्य आज भी आम हैं। ‘कलकत्ते में बजर गिरे’  जैसी पंक्ति लिखकर कवि इस अर्थव्यवस्था का प्रतिरोध रचता है। वह यह कहता हुआ प्रतीत होता है कि ऐसी व्यवस्था जो अपनों को अपनों से अलगाती है,  आदमी को उसके जल-जंगल-जमीन और उसकी संस्कृति से काट देती है,  वह किसी काम की नहीं उसे समाप्त होना ही चाहिये।

त्रिलोचन परदेश गये पति के लिए घर में कलपती पत्नी की मनोदशा और परदेशी मजदूर की कठिन जिन्‍दगी को गहराई से समझते हैं। उनके दर्द को उन्होंने बहुत नजदीक से महसूस किया है। जिसको ‘परदेशी के नाम पत्र’ और ‘सचमुच इधर तुम्हारी याद तो…’ कविताओं में भी देखा जा सकता है-
सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई /झूठ क्या कहूँ । पूरे दिन मशीन पर खटना, बासे पर आकर पड़ जाना और कमाई/का हिसाब जोड़ना,बराबर चित्त उचटना ।

इस उस पर मन दौड़ाना। फिर उठकर रोटी/करना । कभी नमक से कभी साग से खाना ।
धीरज धरो, आज कल करते तब आऊँगा /जब देखूँगा अपना घर कुछ कर पाऊँगा ।

अपने बालम को कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी कहने के पीछे यह भी चम्पा की चिन्‍ता का एक कारण है । उसे डर है कलकत्ते जाने से उसका बालम न केवल उससे दूर हो जायेगा बल्कि वहाँ जाकर वह इतना व्यस्त हो जायेगा कि उसके पास उसे याद करने का समय भी नहीं रहेगा और चित्त उचटने पर कहीं इस उस पर मन न दौड़ाने लगे,  अतंतः उसे भूल ही न जाये। जैसा कि भोजपुर क्षेत्र में मिथक भी प्रचलित हैं जिनका उल्लेख इस कविता की चर्चा करते हुये विश्‍वनाथ त्रिपाठी भी करते हैं कि पूरब जाकर बालम भटक जाते हैं, पूरब की औरतें जादू-टोना जानती हैं । वे मर्दों को दिन में भेड़ और रात में आदमी बना देती हैं। इसलिये उसका गुस्सा जायज है- कलकत्ते पर बजर गिरे । यह कविता उस गुस्से को व्यक्त करने में पूरी तरह सफल रही है। त्रिलोचन जैसा कवि ही जिसको लोक मन की सूक्ष्म पहचान हो इतने संश्लिष्ट रूप से किसी भाव को व्यक्त कर सकता है।

इस कविता के बारे में परमानंद श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘कविता में यह कला अद्भुत तड़प के साथ व्यक्त हुई है । कविता के सीधे सरल या अबोध आरम्भ में आगे के जिस हादसे की खबर या उसका पूर्वाभास है उसे सुनने के लिये उपयुक्त कान चाहिए- महज कागज पर अक्षर देखने वाली आँखें नहीं । बजर गिरे में जितना कहा गया है उससे ज्यादा अनकहा है और वह कम महत्वपूर्ण नहीं ।’’ निश्‍चि‍त रूप से कविता जिस पंक्ति पर समाप्त होती है वास्तव में वहाँ कविता के अर्थ का वृत्त और अधिक फैलता जाता है। कविता की अनुगूँज मन-मस्तिष्क पर देर तक बनी रहती है। ‘वर्तमान साहित्य के शताब्दि कविता विशेषांक’ में राजेंद्र शर्मा इस कविता पर लिखते हुए बिल्कुल सही कहते हैं कि वह बहुत दूर तक और बहुत देर तक हमें बॉधे हुए अपने साथ लिये चली जाती है। हम मंत्रबिद्ध हो जाते हैं।

कविता में प्रतीकात्मकता एवं शब्दों की मितव्ययिता के आग्रहियों को भले इस कविता में काव्यात्मकता न दिखाई देती हो लेकिन एक कथात्मकता के साथ यह कविता जिस तरह से अपने पूरे यथार्थ को चित्रित करती है, उससे काव्य की नई अनुभूति होती है। यही कविता का सौंदर्य भी है। जिसे सौंदर्य की परम्परागत कसौटी से नहीं आँका जा सकता है। वरिष्ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी जिन्होंने इस कविता पर सबसे अधिक विस्तार से लिखा है, का विश्‍लेषण इस दृष्टि से उल्लेखनीय है, ‘‘ इस कविता का सौंदर्य मूलतः वात्सल्य पर टिका है। चम्पा के भोलेपन से उसका मन सुंदर है। बच्चे का अनजानापन वयस्क के यहाँ अज्ञान नहीं रहता वह भेालापन बन जाता है।…इसलिये पहली बात यह कि चम्पा का भोलापन कवि की रचना नहीं है । रचनात्मकता उस भोलेपन की प्रस्तुति में है। अनिवार्य- कथनता से लाभ यह हुआ है कि यह भोलापन वागाडम्बर से आहत नहीं हुआ । भोलापन कथित नहीं- वह सम्‍वाद से प्रकाशित होता है- पाठक-श्रोता के मन में । सौंदर्य प्रकाशित होता है । उसे पाठक-श्रोता मन में रचता है। जो मन में रचा जाता वह सौंदर्य नहीं। त्रिलोचन केवल आवश्यक- कथन करके पाठक-श्रोता को रचने का पूरा अवकाश देते हैं। यह त्रिलोचन के काव्य सौंदर्य की विधि है। इस विधि में वह अद्वितीय हैं। जो अपने संस्कारों से इस अवकाश में रच नहीं पाते उन्हें त्रिलोचन का काव्य सपाट लगेगा। उन्हें सपाट लगता है। कवि अपने शर्तों पर सौंदर्य बोध जमाते हैं। यह उनकी निजता है।’’ एक ही पंक्ति किसी कविता को कैसे अर्थ की व्यापकता प्रदान कर देती है यह कविता उसका बेहतरीन उदाहरण है। कविता में लोक हृदय की सही पहचान की गई है । कविता में गहरी सम्‍वेदना तो है ही साथ ही कथा का आनंद भी । ‘नगई महरा’  के सन्‍दर्भ में कवि राजेश जोशी की कही बात यहाँ भी समान रूप से लागू होती है, ‘‘त्रिलोचन की कहानी कहने की इस कला पर विचार किया जाना चाहिए। एक ऐसे दौर में, जबकि कहानी का घोर पतन हो चुका है, इस तरह की कवितायें न केवल एक बड़ी जरूरत को पूरा करती हैं, बल्कि कहानी को अपने संकट से उबारने के रास्ते भी बताती हैं।’’ कविता में गाँव की बोली-ठोली तथा एक बच्ची का भोलापन, कौतूहल, बालसुलभ क्रियायें जिस स्वाभाविकता के साथ आयी हैं, वे इस कविता को  काव्यात्मकता प्रदान करने के लिए काफी है। लोकगीत या लोककथाओं की जैसी गहरी आत्मीयता है इसमें । इस कविता को पढ़ते हुए अपने अंचल में प्रचलित लोकगीत याद आने लगते हैं। डॉक्‍टर नामवर सिंह इस कविता में कासी-कौसल में प्रचलित एक लोकगीत- ‘रेलिया न बैरी, जहजिया न बैरी, पइसवा बैरी हो । सइयॉ के ले गै बिदेसबा, इ पइसवा बैरी हो।’  की प्रतिध्वनि देखते हैं। वे इस कविता को उक्त लोकगीत का रूपान्तरण मानते हैं। पर मुझे लगता है ऐसा मानना इस कविता के महत्व को कम करना है । यह हो सकता है कि कविता की प्रेरणा कवि को उक्त लोकगीत को सुनकर मिली हो, पर कविता का कथ्य लोकगीत से बहुत आगे का है । लोकगीत में जहाँ केवल दो पैसे के खातिर विदेश जाने की विवशता का उल्लेख मात्र है, वहीं कविता उस व्यवस्था का तीव्र प्रतिकार करती है जो इस विवशता का कारण है। किसी व्यवस्था की उपेक्षा करना और उसके आगे न झुकना भी उस व्यवस्था का एक तरीके से प्रतिकार ही है। इस कविता में वही बात परिलक्षित होती है। ‘कलकत्ते में बजर गिरे’  कहना पूँजीवादी व्यवस्था की उपेक्षा करना ही है। यह कविता की ताकत ही है कि नामवर सिंह इस कविता को एकदम स्वतंत्र कविता न मानते हुए भी कविता के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण बातें कहते हैं जिसका उन्हीं के शब्दों में उल्लेख करना चाहूँगा, कविता में, ‘‘ सृजन-प्रक्रिया में लोकबोली का भी संस्कार हुआ है । लोकगीत के छंद का भी और लोकगीत के काव्य का भी । भाषा खड़ी बोली है, लेकिन उसमें ‘अच्छर’ अक्षर नहीं हुआ न ‘बजर’ बज्र और ‘चिह्नती’  क्रिया भी अपनी सहजता के साथ डटी हुई है । वाक्य विन्यास गद्य का है लेकिन उसमें एक अंतर्निहित लय है- वर्णन में भी और संलाप में भी । चम्पा के लहजे में गवँई गाँव के एक बेपढ़े-लिखे आदमी की स्वाभाविक सहजता और प्रमाणिकता है- धूमिल के ‘मोची राम’ से कहीं अधिक । बातचीत के क्रम में पढ़े-लिखे कवि की भाषा भी ‘हारे गाढ़े काम सरेगा’  वाली ठेठ मुहावरेदानी अपना लेती है। और काव्य में चोट भी उस कलकत्ता शहर पर है जो गाँव के रहने वालों को बेघर बनाकर हजम किये जा रहा है। कविता हर तरह से गैर-आधुनिक है, बल्कि प्रति-आधुनिक, आधुनिकता-विरोधी । शहर के विरूद्ध गाँव, पैसे के खिलाफ इंसानी रिश्ता। किंतु उस दौर की आधुनिकतावादी कविताओं में साथ इसे रखकर देखें तो प्रयोग और प्रगति के नाम पर लिखी जानेवाली कविताओं से कितनी अलग। हर तरह की अंग्रेजीयत के खिलाफ । भाव में भी और भाषा में भी। यह है ठेठ हिन्‍दी की कविता । हिन्‍दी की नयी कविता-हिन्‍दी की अपनी परम्परा से निकली हुई । आधुनिक लेकिन भारतीय । न पश्‍चि‍म से आयातित, न आतंकित ।’’ डॉक्‍टर सिंह की यह राय मलयज की स्थापनाओं का सटीक जबाब भी हो सकता है। निःसंदेह यह कविता एक ऐसी व्यवस्था की ऐसी-तैसी करती है जो मनुष्य से उसका प्रेम, आत्मीयता, घर-परिवार, गाँव-जवार, पानी-बानी छीनती है। चम्पा की तरह उसकी उपेक्षा करना, उसको ठेंगा दिखाना उससे निपटने का एक कारगर तरीका हो सकता है । बिल्कुल त्रिलोचनी तरीका जो उन्होंने भारतीय किसान से सीखा है । भाषा भी उन्हीं से सीखी है। ठेठ गाँव-जवार की । उनके यहॉ ‘काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’  का काले-काले अक्षर नहीं पहचानती या पढ़ना-लिखना नहीं जानती,  ‘कागद ही गोदा करते हो’  का पढ़ते-लिखते ही रहते हो तथा ‘हारे गाढ़े काम सरेगा’ का समय-असमय काम आयेगा नहीं होता है क्योंकि कवि को पता है जो बल या तासीर लोक से पैदा इन शब्दों और मुहावरों में है वह शब्दकोशीय शब्दों में कहाँ? थोड़ी देर के लिये कविता में उक्त स्थानों पर उनके निकवर्ती खड़ी बोली के शब्दों या वाक्यों को रख के देख लिया जाये, कविता की सरसता तथा जीवंतता में कितनी कमी आ जाती है। बोली के ये प्रयोग जीवन-यथार्थ को एक वजन प्रदान करते हैं। इसलिये त्रिलोचन भाषा को सुनने-सीखने के लिए किसानों-मजदूरों के बीच खेतों-खलिहानों-कारखानों में जाया करते थे। यह स्वाभाविक है ‘जो भाषा सीखने जायेगा वह जीवन के तौर तरीके भी सीखेगा’ (त्रिलोचन)। इसी कारण ‘त्रिलोचन की कविता में लोक जीवन की क्रियाएं, स्पंदन और धड़कनें साफ सुनाई देती है’ (विजेंद्र )। कुछ शुद्धतावादियों का मानना रहता है कि हिन्‍दी भाषा में लोक बोली के शब्द नहीं आने चाहिये क्योंकि इससे भाषा की ‘साहित्यिकता और सौंदर्य’ में कमी आ जाती है। यह भाषा का ‘पिछड़ापन’  है । पर वे भूल जाते हैं, कविता में भाषा की साहित्यिकता की रक्षा करना कवि का साध्य नहीं होता है । भाषा साधन है जिसके माध्यम से कवि अपने विचार तथा भावनाओं को भावक तक संप्रेषित करता है। इसलिये कवि को उन्ही शब्दों का प्रयोग करना चाहिये जिससे अपने भाव व विचारों को पूरी गहराई एवं तीव्रता के साथ व्यक्त कर सके। फिर वे शब्द लोक के हों या मानक भाषा के । कभी-कभी यह भी देखने में आता है  कि कवि जिस भाव या स्थिति को व्यक्त करना चाहता है उसके लिये मानक भाषा में कोई शब्द ही उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में बोली के शब्दों का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। फिर भाषा का विस्तार करना भी कवि का काम है। इस तरह भाषा को नये-नये शब्द मिलते रहते हैं। इस दृष्टि से न केवल यह कविता बल्कि त्रिलोचन का पूरा काव्य ही एक प्रतिमान है। त्रिलोचन ने ‘रस जीवन का जीवन से खींचा/दिये हृदय के भाव, उपेक्षित थी जो भाषा/उसको आदर दिया।’ त्रिलोचन की मान्यता भी है कि जिस जीवन को कविता का विषय बनायेंगे उस जीवन की भाषा लेनी ही पड़ेगी।…….शुद्ध होना भाषा के लिए घातक होता है। अपने एक साक्षात्कार में विदिशा का उल्लेख करते हुये वह कहते है, ‘‘जब विदिशा मैं गया तो विदिशा की भाषा का स्वभाव मुझे जानना पड़ा। और जब विदिशा का वातावरण मैं दे रहा हूँ तो वहाँ समझे जाने वाले शब्द मुझे लेने पड़ेंगे। विदिशा के ऐतिहासिक महत्व को यदि मैं पकड़ रहा हूँ तो पुराने शब्दों का प्रयोग मुझे करना पड़ेगा।’’वही बात कवि इस कविता में भी करता है।

इस कविता में एक निश्‍चलता और सादगी है ठीक कवि त्रिलोचन की तरह । वह जनपद की चम्पा की मन की बात को एक मनोवैज्ञानिक के मानिंद कितनी गहराई से पकड़ते हैं इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है/खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है/उसे बड़ा अचरज होता है/इन काले चिह्नों से कैसे ये सब/स्वर निकला करते हैं। लिखे-छपे काले-काले अक्षरों के लिये गाँव के निरक्षर लोग कुछ इसी तरह सोचते हैं। वह जनपद के लोगों के कितने करीब रहते थे यह बात इन पंक्तियों से उभर कर आती है। ऊपर से सामान्य और सरल लगने वाली इस कविता को पढ़ते-सुनते हुये हमारे आसपास रहने वाले अनेकानेक चम्पाओं के चेहरे हमारी आँखों के सामने तैरने लग जाते हैं। एक अच्छी कविता का यह गुण भी होता है कि वह सहृदय का चित्रित घटना, क्रिया या पात्र से एकाकार करा देती है। ऐसी ही कविता पाठक को पसंद आती है जो उसके भाव-जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित करती है।

कविता की ये पंक्तियॉ- तुम तो कहते थे गाँधी बाबा अच्छे हैं/वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे/मैं तो नहीं पढूँगी। हमारे मन में एक प्रश्‍न और पैदा करती हैं जिसकी ओर शायद कम ध्यान दिया गया है कि हमारी शिक्षा में ऐसा क्या है जिसके कारण बच्चे उससे दूर भागते हैं? आज से पचास साल पूर्व ही नहीं आज भी पढ़ने-लिखने के प्रति बच्चों के मन में बोझ का भाव दिखाई देता है। बच्चे स्कूल जाने के नाम पर आज भी प्रसन्न नहीं दिखाई देते। उन्हें यातना शिविर की तरह लगता है स्कूल। स्कूल को जाते समय होने लगता है पेट में दर्द। स्कूल सारी इच्छाओं के विरूद्ध सख्त इमारत की तरह लगता है। आखिर हम पढ़ाई-लिखाई के प्रति बच्चों में रुचि और आनंद क्यों नहीं पैदा कर पाये ?  वह चम्पा जिसे इस बात पर आश्‍चर्य होता है कि इन काले चिह्नों से कैसे ये सब स्वर/निकला करते हैं, अर्थात जिसके भीतर अपार जिज्ञासा है, वही पढ़ने-लिखने से दूर क्यों भागती है? इसका एक कारण कहीं यह तो नहीं कि हमने शिक्षा को आनंद का माध्यम न बनाकर उसे कुछ ऐसे छोटे-मोटे लाभों की प्राप्ति का साधन बना दिया है-

ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जाएगा जब
कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है !

बच्चा तो आनंद के लिये सब कुछ करता है। इस तरह के तर्कों का  बच्चों के लिये कोई विशेष महत्व भी नहीं होता है। वह चम्पा की तरह के ही उत्तर देगा-

मैं तो ब्याह कभी न करूँगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी।

इस तरह कब तक आखिर छोटे-मोटे लाभों का प्रलोभन देकर हम बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास करते रहेंगे तथा पढ़ाई के सच्चे आनंद से बच्चों को वंचित करते रहेंगे, यह यक्ष प्रश्‍न है?  कविता इस ओर हमारा ध्यान खींचती है। साथ ही बताती है कि शिक्षा का आदर्श एक अच्छा  इंसान बनाना है इसलिये तो पढ़े-लिखे व्यक्ति के झूठ बोलने पर भी आश्‍चर्य व्यक्त किया जाता है- हाय राम, तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो। इस पंक्ति से लगता है कहीं न कहीं कवि शिक्षा में मूल्यों की बात करते हैं।

यह सुना जाता है कि त्रिलोचन को छोटे बच्चों से दोस्ती करने में कोई वक्त नहीं लगता था । बच्चों के बीच जल्दी घुल-मिल जाते थे। वह बात इस कविता में भी देखी जा सकती है । चम्पा का उनकी कलम चुरा लेना जब तक उसे ढूँढ़ कर लायें कागज गायब कर देना फिर उनसे तरह -तरह के सवाल पूछना बाबजूद इसके उनका बच्ची पर गुस्सा न होना और न ही तिलमिलाना,  इस बात का प्रमाण है कि बच्चों से वह कितना स्नेह करते थे तथा बच्चे उनको अपने कितना करीब पाते थे। इस कविता में अपनी बात को कहने के लिये वह किसी वयस्क पात्र को भी चुन सकते थे पर उन्होंने एक बच्ची को ही चुना। ऐसा करना जहाँ कवि की बच्चों के प्रति रागात्मकता को प्रदर्शित करता है, वहीं कविता के सौंदर्य को और अधिक बढ़ा देता है। यह कहना असंगत नहीं होगा कि यह कविता पूँजीवाद पर चोट करने वाली कविता होने के साथ-साथ बच्चों के प्रति प्रेम की एक अद्भुत कविता भी है। कविता की ये पंक्तियाँ मन को छूने वाली हैं। यह वही लिख सकता है जिसे बच्चों की बालसुलभ क्रियाओं में आनंद आता है -

चम्पा अच्छी है
चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी-कभी उधम करती है
कभी-कभी वह कलम चुरा लेती है
जैसे तैसे उसे ढूँढ़ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ- अब क़ागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चम्पा कहती हैः तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुन कर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है, शायद कोई अन्य कवि रहा होता चम्पा जैसी चंचल, नटखट और उधम करने वाली लड़की के लिये सीधे-सीधे ‘शैतान’ शब्द का प्रयोग कर देता पर वह बहुत सतर्कता से शब्दों का चयन करते हैं- वह ‘चंचल’ कहते हैं, ‘नटखट’ कहते हैं पर शैतान नहीं । ये अनायास नहीं लगता बल्कि पूरी सम्‍वेदनशीलता से कवि ने ऐसा किया होगा । बच्चों के प्रति रागात्मकता रखने वाला कवि ही ऐसा कर सकता है। अन्यथा छोटी-मोटी शरारत में ही माता-पिता भी अपने बच्चों को ‘शैतान’ की उपाधि दे देते हैं।

यह कविता स्त्री चेतना की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कविता है। एक ऐसे समाज में जहाँ यह मान्यता हो कि स्त्री को बचपन में पिता, युवावस्था में पति तथा बुढ़ापे में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिये वहाँ किसी चम्पा के मुँह से यह सुनना प्रीतिकर लगता है- मैं अपने बालम को संग-साथ रखूँगी/कलकत्ते मैं कभी न जाने दूँगी। चम्पा का यह कथन स्त्री के आत्मविश्‍वास और अधिकार भाव को प्रदर्शित करता है। इस अधिकार भाव के साथ चम्पा किसी आधुनिक बाला से कम नहीं लगती। यहाँ चम्पा कठपुतली सी प्रतीत नहीं होती है। पूरी कविता में चम्पा का चरित्र एक हाजिर जबाब, चुलबुली एवं स्वतंत्र चेता लड़की का है। आज से छः-सात दशक पूर्व जबकि लड़कियों में तमाम तरह के प्रतिबंध रहते थे- जोर से हँसना-बोलना भी उनके लिये गलत माना जाता था, तब चम्पा जैसी लड़की को कविता का विषय बनाना कवि का स्त्री-स्वतंत्रता  के पक्ष में खड़ा होना है। यह कविता दूरस्थ जनपदों में रहने वाली स्त्री के जीवन,  स्वभाव और नियति से हमारा परिचय कराती है। जैसा कि युवा आलोचक अरविंद त्रिपाठी इस कविता के सन्‍दर्भ में लिखते हैं, ‘‘यह  कविता लोकजीवन में व्याप्त एक औसत भारतीय स्त्री की नियति का साक्षात्कार कराती है। इसीलिये सारी अल्हड़ता और सारे सौंदर्यबोध के बावजूद कविता में स्त्री नियति की उदासी छाई हुई है। इसलिये चम्पा एकवचन की स्त्री की नियति की कविता नहीं है, बल्कि बहुवचन की स्त्री की नियति का उदास साक्षात्कार है। आज भी हमारे आम घरों में चम्पायें अपनी नियति से जूझ रही हैं।’’ पूरी कविता में सम्‍वाद के दौरान चम्पा का कवि से बीस साबित होना भी यूँ ही नहीं लगता, बल्कि इसके पीछे भी कवि की सोची-समझी योजना लगती है। वह कहीं भी चम्पा को कमजोर नहीं दिखाना चाहता। जिस बिन्‍दु पर कवि कविता समाप्त करता है, वहाँ चम्पा उसे अनुत्तरित कर देती है। कवि और चम्पा के तर्क-वितर्क में चम्पा का हावी रहना बहुत अच्छा लगता है। यह कविता को असाधारण बना देता है। यह इस कविता की विशिष्टता है।

इस तरह यह कविता अपने प्रत्येक पाठ के बाद अलग-अलग भाव धरातलों पर कुछ नये-नये रूप में खुलती है। यह जनपदीय चेतना की कविता है जो पूँजीवादी समाज में चतुर्दिक व्याप्त अलगाव का निषेध या प्रतिकार करती है। यह कविता साधारण में असाधारण और सहज में जटिल का संधान करती है। जैसा कि प्रखर आलोचक डॉक्‍टर जीवन सिंह कहते हैं कि त्रिलोचन अंतर्वस्तु और भाषा दोनों स्तरों पर कविता के देशी साँचे को नहीं छोड़ते। वह अपनी जमीन को कभी नहीं भूलते । इस कविता में भी यह बात साफ-साफ देखी जा सकती है। कुल मिलाकर यह भारतीय जमीन में खड़े रहकर पश्‍चि‍मी आधुनिकता से टकराती एक कालजयी रचना है।

साहित्य चिंता की अपेक्षा जीवन चिंता को प्राथमिकता देने वाले आलोचक : महेश चंद्र पुनेठा

आलोचक जीवन सिंह।

‘आकंठ’ के वरि‍ष्‍ठ आलोचक जीवन सिंह पर केन्‍द्रि‍त अंक(सितम्बर, 2011) का सम्‍पादन कवि महेश चंद्र पुनेठा ने कि‍या है। इस अंक का सम्‍पादकीय-

यदि हम पूरी हि‍न्‍दी आलोचना-परम्परा का अवगाहन करें तो हमें दो  मुख्य धाराएँ दिखाई देती हैं- पहली जो साहित्यशास्त्रीय सिद्धांतों के आधार पर साहित्य की विवेचना-विश्‍लेषण करती है और दूसरी वह जो जीवन के गहरे अनुभवों से प्राप्त चेतना के आलोक में साहित्य को देखती है तथा उसका केवल विवेचन-विश्‍लेषण ही नहीं करती, बल्कि उसे दिशा भी प्रदान करती है। पहली धारा साहित्य चिंता को प्राथमिकता देती है और दूसरी जीवन चिंता को। साहित्य चिंता से प्रेरित धारा रूप पक्ष को महत्व देती है और उसकी प्रेरणा पूरी तरह रचना में निहित रहती है, जबकि जीवन चिंता से अभिप्रेत धारा वस्तु और रूप दोनों को लेते हुए वस्तु पक्ष को अधिक महत्व देती है और जीवन-प्रश्नों की उपेक्षा नहीं करती है। उसके लिए साहित्य विशुद्ध कला नहीं है जहाँ वर्ण-चमत्कार और वर्णन-चमत्कार का बाहुल्य हो, बल्कि जहाँ जीवन की कठोर और कोमल धड़कनें दर्ज हों तथा मुक्ति की पदचापें सुनाई देती हों। डॉक्‍टर जीवन सिंह आलोचना की दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके यहाँ किसी तरह की व्यूह रचना और उठाने-गिराने का खेल नहीं दिखाई देता है। उन्हें जहाँ जीवन के बड़े प्रश्‍न और मनुष्यता दिखाई देती है वह उसे अपने विवेचन का विषय बनाते हैं। वह हमेशा साहित्य को अपने समय और समाज की संबद्धता में देखते हैं। उनके लिए जीवन-व्यवहार और जीवन-संदर्भों के सवाल कितने महत्वपूर्ण और अनिवार्य हैं, उनके पूरे लेखन में देखा जा सकता है। ये सवाल उनके लेखन में अंतःसूत्र के तरह निहित हैं। उनका लेखन जीवन प्रश्नों से कहीं भी किनारा नहीं करता। वह अपने आलोचना कर्म में हमेशा इस बात की तलाश करते हैं कि क्या रचनाकार अपनी रचनाओं में जीवन-तथ्यों के मूल तक उतर पाया है, उसने अपने समय की पेचीदगियों को पहचाना है, जन अर्थात सर्वहारा वर्ग के जीवन और मूल्यों की सही विवेचना की है तथा वह जीवन को पूरी गहराई और संश्‍लि‍ष्‍टता के साथ व्यक्त कर पाया है। किसी भी कृति का मूल्याँकन करते हुए वह देखते हैं कि प्रस्तुत रचना में-जीवन के किस रूप को प्रधानता दी गई है, किस वर्ग का जीवन उसमें प्रतिबिंबित हुआ है, क्या उसमें शोषक वर्गों के विरूद्ध श्रमिक जनता के हित मुखरित हुये हैं या नहीं, रचनाकार की अपने समय के जीवन से कितनी गहरी एवं व्यापक संपृक्ति है, उनका लेखन जीवन की क्रियाशीलता, जीवन-सौंदय, जीवन-बोध, जीवन की संश्लिष्टता, जीवन की विविधता तथा जीवन की भाषा की तलाश का पर्याय है।

डॉक्‍टर जीवन सिंह, कवि की निजी ईमानदारी और निजी अनुभूति के स्थान पर उसकी समय और समाज के प्रति ईमानदारी को अधिक महत्व देते हैं। उनकी मान्यता है,  इसके लिए जरूरी है कि वह अपनी निजी सीमाओं से बाहर निकलकर जीवन-संग्राम में शामिल रहे । पर यह विडम्‍बना है कि हिन्‍दी के कुछ आलोचक एवं विमर्शकार रचनाकार के लिये जीवन संग्राम में उतरना कोई अनिवार्य नहीं मानते। इसी का परिणाम आज हम देखते हैं कि अधिकांश रचनाकार अपने आप को केवल लिखने तक सीमित किये हुये हैं। समय और समाज के प्रति अपने दायित्व को वे केवल वैचारिक अभिव्यक्ति तक सीमित मानते हैं। यह गलत प्रतिमानों को मान्यता देने का परिणाम है। उस ईमानदारी का क्या मूल्य जो समाज को कहीं ले नहीं जाती है। अपनी निराशा, कुंठा, उदासी को ईमानदारी से व्यक्त करने मात्र का समाज की दृष्टि से कोई महत्व नहीं। कुछ आलोचकों ने अनुभूति की प्रमाणिकता और ईमानदारी के नाम पर कविता को कवि के निजी मामले तक सीमित कर दिया। फलस्वरूप अनेक बार अवैज्ञानिक स्थापनाओं को भी महत्व मिला। इसलिये जीवन सिंह बिल्कुल सही स्थापना देते हैं कि ‘ईमानदारी और प्रमाणिक अनुभूति’ के बजाय ‘अनुभूति की व्यापकता और समकालीन सामाजिक यथार्थ’ से कविता को परखा जाना चाहिये। जनता को हिकारत की नजर से देखने वाली ईमानदारी प्रकारांतर से जनता की ताकत को नकारना तथा परिवर्तनकारी ताकतों के प्रयासों को झूठा सिद्ध करना ही है।

जीवन-चिंता के आलोचक होने के कारण उनके सौंदर्य की कसौटी में हमेशा उन लोगों का जीवन है जो श्रम से जुड़े हैं, क्योंकि उनके लिये जो कुछ सौंदर्यपूर्ण है वह मनुष्य के श्रम की देन है। प्रकृति के सौंदर्य के समानान्तर इस पृथ्वी पर मनुष्य ने जो कुछ सौंदर्यपूर्ण सर्जन किया है उसमें मनुष्य के श्रम की मुख्य भूमिका है। जीवन और दुनिया से प्रेम करने वाला व्यक्ति ही सामान्य जन और उसके जीवन के प्रति इस तरह के भाव रख सकता है। उनकी मानवीय श्रम पर गहरी आस्था है। वह मानते हैं कि मानवीय श्रम के बिना कुछ सम्‍भव नहीं है। लेकिन यह हमारी संकीर्णता और स्वार्थबद्धता है कि श्रम को हमेशा दरकिनार करते हैं और आधुनिक ज्ञान प्रक्रिया को इतना बढ़कर मानते हैं कि श्रम की क्रूर उपेक्षा करने में कोई संकोच नहीं बरतते। उनका विश्‍वास है कि कभी फिर समय आएगा जब श्रम के दर्शन के अनुसार दुनिया बदलेगी और पूँजी और बाजार का वर्चस्व खत्म होगा। वह मेहनतकश को अपना सच्चा साथी कहते हैं और उसकी पक्षधरता स्वीकारते हैं। एक जनसम्‍बद्ध साहित्यकार ही ऐसा कह सकता है। यह उनकी ताकत भी है। उनका उद्देश्य अपनी आलोचना द्वारा कला और श्रम के बीच पैदा किये गये अलगाव को दूर कर सौंदर्यबोध को उसकी मानवीयता में स्थापित करना हैं जिसमें वह सफल भी रहे हैं। वह श्रम और पूँजी के संबंध की सच्चाई को खोलने का काम अपनी आलोचना में करते हैं।

वह मानते हैं कि जब एक रचनाकार के भाव का स्तर, इस जगत की सारी संकीर्णताओं, संकुचितताओं और स्वार्थबद्धताओं का अतिक्रमण कर, विशुद्ध रूप से मानवीय स्वरूप ग्रहण कर लेता है, तो समकालीन और सच्ची कविता को जन्म देता है। कवि का सामान्य जन के भावभूमि से एक रिश्ता कायम होना चाहिये। उसे सामान्य जन से संबंधित सम्‍पूर्ण परिस्थितियों के बीच से होकर गुजरना चाहिये। इस दौरान उसे केवल उसकी दुरावस्थाजन्य विषमता और वेदना को ही नहीं वरन् उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति, वर्ग और व्यवस्था की पहचान भी जरूरी है। वह कुछ उदाहरणों के द्वारा भी अपनी इस बात को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं- ‘बड़े रचनाकार हर युग में इस तरह की स्थितियों से गुजरे हैं। कबीर अपने जमाने में सामान्य जन और उसकी दुरावस्था के पक्ष से, उस समय के पंडे और मौलवी से बहस करने से नहीं चूकते। तुलसी भी अपने समय के सामान्य जन की पीड़ा की अनदेखी नहीं करते।’ वह बहुत सही कहते हैं कि ‘पद्मावत’ की नागमती जब अपना रानीपन भूलकर सामान्य स्त्रियों की भाँति विरह-दग्ध होती है, तभी उसका वास्तविक रूप सामने आता है। रानीपन की विशिष्टता और आभिजात्य में वह काव्य चरित्र नहीं बन पाती। मीरा भी मीरा तभी बनती है, जब वह राजमहलों की पटरानी न बनकर, सामान्य जनजीवन की भावनाओं से एकाकार कर उनमें घुलमिल जाती हैं। इस तरह वे साधारणता के सौंदर्यशास्त्र को महत्व देते हैं।

वह जीवन की सच्चाई से वे मुँह नहीं मोड़ते हैं। उनकी आलोचना में वास्तविक जीवन-सौंदर्य का अन्वेषण कर आवृत्त सत्य को उद्घाटित करने की सतत् प्रक्रिया चलती रहती है। वह लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों और उसके सांस्कृतिक आचरण की प्रतिष्ठा अपनी आलोचना द्वारा करते हैं। यहीं पर वह पक्षधरता का सवाल भी उठाते हैं। उनका मानना है कि इसके बिना जीवन और समाज की जटिलता एवं वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता है। उनकी दृष्टि में जीवन साहित्य के लिये नहीं बल्कि साहित्य जीवन के लिये है। वह नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, मुक्तिबोध आदि को अज्ञेय से इसलिये बड़ा कवि मानते हैं कि उनके यहाँ साहित्य की अपेक्षा जीवन की चिन्‍ता अधिक दृष्टिगोचर होती है। उनका मानना है कि इनकी कविताओं में जीवन की धड़कन सुनाई देती है। यहाँ जीवन के चित्र विविधता एवं गहराई लिये हुये हैं। ये कवि केवल जीवन की विसंगतियों और विडम्‍बनाओं के चित्र ही नहीं उकेरते, बल्कि उनसे बाहर निकलने की राह भी बताते हैं। यदि वह अज्ञेय, रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, श्रीकांत वर्मा, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह आदि कवियों तथा ‘कविता के नये प्रतिमान’ रचने वाले नामवर सिंह और नवलकिशोर नवल व अशोक वाजपेयी जैसे आलोचकों से सहमति नहीं रखते हैं तो उसका कारण उनकी जीवन चिंता ही है। वह इनकी रचनाओं का विश्‍लेषण कर बताते हैं कि इनके यहाँ जीवन समग्रता के साथ नहीं आता है। जीवन की सम्‍पूर्णता की इनकी रचनाओं में घोर उपेक्षा हुई है। इसका सीधा कारण है उनकी अपने समय के जीवन में पैठ न होना । इन कवि-आलोचकों द्वारा उस समृद्ध हिन्‍दी काव्य परम्परा की अनदेखी की गई है जो अपनी देशी तथा लोक जीवन से सम्‍बद्ध जीवन-यथार्थ तथा सौंदर्यानुभूति की उपज है। इनके द्वारा कविता को जीवन की विसंगति एवं विडम्‍बनाओं के चित्रण एवं आलोचना को उसके विवेचन तक सीमित कर दिया है।

‘कविता के नये प्रतिमान’ के सन्‍दर्भ में जीवन सिंह यदि यह कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं कि दरअसल कवि मोहग्रस्त नहीं था, आलोचक मोहांध हो गया था। उसकी कसौटी में खोट आ गया था। उसने जो ‘प्रतिमान’ रचे और उसकी जो आधारभूमि तैयार की, वह अपनी भूमि के यथार्थ से कम, परायी भूमि के प्रभाव की गिरफ्त में ज्यादा थी। वह कविता की अंतर्वस्तु पर आधारित रूप विन्यास से ज्यादा रूप पर आधारित अंतर्वस्तु से मुग्ध हो गया था। उसने रूप पर आधारित प्रतिमानों को रूपवादी संरचना में कुछ इस तरह की कलाकारी से प्रस्तुत किया था कि पाठक अपनी-अपनी भावना के अनुरूप प्रभु की मूर्ति के दर्शन कर लें।’ यदि ऐसा नहीं होता तो प्रतिमानों के रचे जाते वक्त आलोचक की नजर में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार सरीखे वे कवि अवश्य होते जिनके यहाँ न केवल जीवन की विसंगति-विडम्‍बना तथा व्यापक सामाजिक अनुभव ऐतिहासिक एवं द्वंद्वात्मक दृष्टि से व्यक्त हुये हैं बल्कि उन ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल भी गहराई से हुई जो उन विसंगति-विडम्‍बनाओं के लिये जिम्मेदार हैं। यह दुःखद है कि कुछ कवि-आलोचक डॉक्‍टर जीवन सिंह की इस आलोचना को विध्वंसात्मक आलोचना या ‘निंदा ही निंदा’ की आलोचना मानते हैं। मैंने जहाँ तक जीवन सिंह जी के आलोचना कर्म को जाना-समझा है उसके आधार पर कह सकता हूँ कि उनकी आलोचना में ऐसे अनेक प्रकरण आते हैं जहाँ वह उक्त कवियों तथा आलोचकों की प्रशंसा  करते हैं तथा उनके साहित्यिक अवदान को स्वीकारते हैं। क्या किसी रचनाकार की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाना उसका ध्वंस करना होता है ? क्या आलोचना का काम केवल प्रशंसा ही प्रशंसा करना मात्र है? आलोचना मीठी ही मीठी नहीं होती है। कृति की सीमाओं या कमजोरियों को बताना भी आलोचक का धर्म होता है। किसी रचनाकार की सीमाओं की ओर संकेत करने का मतलब उसे खारिज करना नहीं होता है। इससे तो रचनाकार और साहित्य दोनों का ही हित होता है और अंततः समाज का । रचना हो चाहे आलोचना उसमें यदि विसंगतियों को उभारा जाता है तो उसका उद्देश्य उन विसंगतियों को दूर करना होता है। यदि हम किसी विसंगति को नजरअंदाज करते हैं तो उसका आशय है उसे बने रहने देना है। एक अच्छी आलोचना का काम है रचना की विसंगतियों को रेखांकित करना ताकि आगे उन्हें दूर किया जा सके। इस तरह की आलोचना को विध्वंसात्मक आलोचना कहना कहीं न कहीं आलोचना को पथ विचलित कर उसको भ्रष्ट करना है।

जीवनानुभवों की व्यापकता व विस्तृत एवं विविध क्रियाधर्मीं जीवन का समर्थन जीवन सिंह जी की जीवन चिंता से ही उद्भूत है। उनका मानना है कि सौंदर्यबोध का गहरा रिश्ता लेखक का जीवनानुभवों तथा विश्‍वदृष्टि से रहता आया है। विश्‍व दृष्टि और जीवनानुभवों की व्यापकता के अभाव में लेखक का सौंदर्यबोध भी जागतिक संकीर्णताओं से नहीं उबर पाता। इसके लिए वह जीवन से निकट सम्‍पर्क जरूरी मानते हैं। अपनी पुस्तक ‘कविता और कवि कर्म’ में एक स्थान पर वह लिखते हैं- ‘कविता दरअसल कवि पहले अपने जीवन में रचता है। जो कवि अपने जीवन में कवि नहीं वह कविता में भी वैसे ही हानि-लाभ के जोड़-तोड़ बिठाता है जैसे अपने जीवन में।….जो कविता जीवन की सहजताओं के जितनी नजदीक होगी वह उतनी ही दीर्घायु और कालजयी होगी।’ मध्यवर्गीय कवियों में यह आज कम होता जा रहा है। इसी का परिणाम है उनकी कविता में सरसता एवं जीवंतता की कमी दिखाई देती हैं। ये कविताएं एकरस व एकरूप होती जाती हैं। डॉक्‍टर सिंह तुलसीख्‍ सूर, कबीर, जायसी, मीरा, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, कुमारेंद्र, विजेंद्र, मानबहादुर सिंह, ज्ञानेंद्रपति, मदन कश्यप, एकांत श्रीवास्तव, केशव तिवारी आदि कवियों का उदाहरण देकर बताते हैं कि उनकी कविता की श्रेष्ठता का कारण कहीं न कहीं उनकी जीवन से निकटता ही है। इनकी कविताओं में वाग्वैधग्दता, क्रीड़ा-कौतुक और अर्थ-चमत्कार के लिये कोई स्थान नहीं है। ये कवि उन्हें इसलिये प्रभावित करते हैं क्योंकि इनकी कविताओं में जीवन का ताप और जीवन के संघर्ष हैं।

कविता में जीवन की तलाश करते हुए डॉक्‍टर जीवन सिंह कवि के जीवन तक पहुँच जाते हैं। कवि के जीवन को उसकी रचना से अलग नहीं रखते, क्योंकि उनका मानना है एक सार्थक और बड़े रचनाकार का संघर्ष मूल्य के स्तर पर उसके जीवन व्यवहार से प्रारम्‍भ होता है। कविता को यदि हमें बचाना है तो उसे पहले अपने जीवन में बचाने के लिये काम करना होगा। प्रलोभनों, लालचों के सामने आत्मसंघर्ष करना होगा। यदि हमारे जीवन में कविता नहीं है तो वह शब्दों में रचित कविता में कैसे बच सकेगा, हमारे जीवन का भीतरी स्वर ही बाहर की शब्द रचित कविता के स्वर को पकड़ता है । जहाँ यह स्वर नहीं है वहाँ कविता की कोई जरूरत नहीं । इस तरह वह जीवन और कविता की एैक्यता को देखते हैं। इस तरह वह उस आलोचना परम्‍परा के वाहक है जो किसी रचनाकार का मूल्याँकन करते हुये उसके जीवन को उसके कृतित्व से अलग नहीं रखती। उनका दृढ़विश्वास है कि कोई भी कलाकार उसी स्थिति में आत्म साक्षात्कार या आत्मसंभवा अभिव्यक्ति करने में सक्षम होता है जबकि उसने अपने जीवन में स्वयं उदात्त स्थिति को प्राप्त कर लिया हो। जिन रचनाकारों की आत्मसंस्कृति अपनी विकारग्रस्तता में संकुचित रहती है, वे अपनी रचनाओं में उत्कृष्ट स्थिति को नहीं पहुँच पाते।

डॉक्‍टर सिंह को अपनी परम्परा और लोक जीवन का गहरा एवं व्यापक ज्ञान है जिसके चलते ही वह किसी रचनाकार के अपनी परम्परा-क्लैसिक एवं लोक जीवन के अपरिचय को एकदम ताड़ लेते हैं। उनकी रचनाओं में उन्हें जीवन और कविता की फाँक तुरन्‍त दिखाई दे जाती है। यह उन्होंने सायास अर्जित किया है। उनकी जीवन की उबड़-खाबड़ घाटियों में गहरी पैठ एवं उसकी यथार्थ की जटिलताओं की खूब समझ है जिसके कारण वह उन कवियों को बहुत जल्दी पकड़ लेते हैं जो कविता में बनावटी जीवन का चित्रण करते हैं तथा विचारवक्रता और प्रतीकात्मकता से काम चलाना चाहते हैं।

वह एक कवि-आलोचक के लिये जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक मानते हैं- ‘आज की कविता में जो बड़ी कमजोरी है, वह कवि द्वारा कविता रचने के लिये किये जाने वाले निरीक्षण की कमी की वजह से है। आज के ज्यादातर कवि, कुछ प्रचलित काव्य सूत्रों, फार्मूलों और कला योजनाओं की काव्यरीति के बल पर कविता रचने में लगे हुये हैं। इससे कविता में सरसता के स्थान पर सूखे जैसा माहौल व्याप्त है। जो कविता जीवन के निरीक्षण से रची जाएगी, उसमें अपने आप सरसता का वेग आता जाएगा ।’ उनका यह कथन बिल्कुल तर्क संगत है कि किसी भी जीवन स्थिति या कला जगत में उस समय रीतिवाद की स्थिति पैदा हो जाती है जब वह जीवन-क्रियाओं के निरीक्षण से अपना नाता तोड़ लेता है। वह जीवन-अनुराग रखने वाले आलोचक हैं इसलिए जीवन-संबंधों, जीवन-रूपों तथा जीवन-क्रियाओं के इंद्रियबोधात्मक ज्ञान एवं भाव प्रसार से बिम्‍ब ग्रहण करने पर अधिक बल देते हैं। उसे कविता की सृजनात्मकता को जानने की कसौटी बनाते हैं- ‘यदि कवि अपने समय के जीवन और जीवन संबंधों, रूपों, एवं उसकी जटिलताओं को मात्र एक नये सोच के रूप में और वक्रताओं में व्यक्त करता है तथा कहीं-कहीं सतही एवं चलताऊ बिम्‍बात्मक सक्रियता भी दिखला देता है तो समझा जा सकता है कि वह कविता के चालू मुहावरे को उड़ाकर कवि बनने चला है, जीवन की समग्रता में गहरी पैठ के आधार पर नहीं।’

वह ऐसे आलोचक हैं जो जीवन को नजदीक से देखते हैं और पहचानते हैं। मुक्तिबोध के इस कथन पर कि ‘साहित्य विवेक मूलतः जीवन विवेक है’ पर उनकी गहरी आस्था है। उनका मानना है कि जिस रचनाकार का जीवन का अनुभव जितना व्यापक होता है उसका साहित्य उतना ही प्रमाणिक एवं जीवंत होता है। एक रचनाकार को अपने समय या समकाल को समझने के लिये न केवल भावना या सम्‍वेदना के स्तर पर एक व्यापक और बुनियादी क्रियाशील संसार की आंतरिकता का अनुभव करना पड़ता है वरन् उसके यथार्थ की जटिल तहों तक जाने के लिये उससे जुड़े सामाजिक, आर्थिक और दार्शनिक प्रश्नों की गुत्थी को भी सुलझाना पड़ता है। उनकी जीवन के प्रति रागात्मकता को इस कथन में भी देखा जा सकता है कि सच्ची सौंदर्य की सृष्टि लोक-जीवन के तादात्म्य से ही होती है। लोक जीवन की अनुभूति जितनी व्यापक एवं गहरी होगी कविता का सौंदर्य उतना ही अधिक निखरता है। वह इस बात को चिह्नित करते हैं कि तुलसी, कबीर, सूर, जायसी, मीरा आदि के काव्य में जो सौंदर्य की सृष्टि हुई है उसका कारण इन कवियो की लोकभूमि से सम्‍बद्धता है। जब-जब कविता ने इसे छोड़ा है तब-तब न केवल संकुचित हुई बल्कि कला के ऊँचे आसन से भी गिर गई। उनकी आलोचना इस तरह कविता में सौंदर्य की लोक सृष्टि करती है। आखिर ऐसा कौन करेगा! वही ना जो लोक से सम्‍बद्ध हो। जिसका मन लोक में रचा-बसा और रमा हो। जिसे लोक से सच्ची प्रीत हो। मानवीय मूल्यों और श्रम के प्रति जिसकी गहरी आस्था हो। ठालप जीवन जीने वाले किताबी आलोचक ऐसा नहीं कर सकते हैं। वह मानते हैं कि शास्त्र की उत्पत्ति लोक से हुई। लोक के विवेचन से जिन नियमों-उपनियमों का निर्माण हुआ उसे शास्त्र कहा गया। शास्त्र में रूढ़ि है तो लोक में खुलापन होता है। जीवन की तरह कला एवं साहित्य रूपों को भी शास्त्रीयता की जकड़बंदी से मुक्ति आवश्यक होती है। शास्त्र और लोक दोनों का उन्हें गहरा ज्ञान है पर हमेशा शास्त्र के ऊपर लोक को ही रखते हैं। उन्होंने लोकभूमि के सूत्र को काव्य और काव्य चिंतन की अपनी परम्परा के भीतर से पकड़ा है। पर वह लोक जीवन में व्याप्त रूढ़ियों और अंतर्विरोधों की अनदेखी नहीं करते। यह उनकी जीवन चिंता का ही प्रमाण है कि वह मानते हैं कि मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अंतर्विरोध मनुष्य के रूप में अमनुष्य होते जाना है। मानवीय मूल्यों में ह्रास उन्हें कचोटता है। वह अपने लेखन में हमेशा उसे बचाने की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि मनुष्यता की सृष्टि और फैलाव जितना ज्ञानसत्ता से होता है उतना ही मनुष्य की भावसत्ता से । इन दोनों के बीच संतुलन और द्वंद्वात्मक रिश्ता होना जरूरी होता है। मनुष्य की भावसत्ता को स्थापित करने के लिए लोक के मूल को पकड़े रहना पड़ता है। उनके लिये लोक वह क्रियाशील सामूहिक जीवन है जो अपने श्रम प्रक्रिया में आज भी मानवीय भावसत्ता को बचाए हुये है । उसकी सहजता को बचाये है। जीवन सिंह लोक से बोध एवं भाव दोनों स्तरों पर जुडे़ हैं । उनके लिये लोक सजावट की चीज नहीं है। वह लोक जीवन और प्रकृति को रचना के लिये महत्वपूर्ण मानते हैं।

जीवन-चिंता के चलते जीवन सिंह ने कभी-भी अपने लेखन को पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति की सीढ़ी नहीं बनाया। कभी इस बात की परवाह नहीं की कि उनके लेखन से कौन प्रसन्न और कौन नाराज होगा ? पूरी ईमानदारी के साथ आलोचना कर्म में संलग्न रहे हैं। साहित्य और समाज के प्रति उनकी गम्भीरता एवं प्रतिबद्धता कम नहीं हुई। उनके डायरी के पन्नों तथा पत्रों से भी हमें पता चलता है कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं, उनकी चिंताओं के मूल विषय कौन से हैं। उन्होंने हमेशा उन बातों को कहा जो उन्हें मनुष्यता के पक्ष में लगीं। उन्होंने साहित्य के अभिजात्य केन्‍द्रों की कभी परवाह नहीं की। इसी का परिणाम उन्हें उपेक्षा के रूप में झेलना पड़ा। पर उन्हें इस बात का भी कोई मलाल नहीं है क्योंकि ऐसा नहीं कि इसके बारे में उन्हें पहले से पता नहीं था। वह तो इसे अपने संघर्ष का एक हिस्सा मानते आये हैं। जहाँ पूरा लोक ही हाशिए में है वहाँ उसके रचनाकारों का हाशिए में होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं। इन खतरों को उन्होंने जानबूझ कर उठाया है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह लोक की लड़ाई को इतने आगे तक भी नहीं ले जा पाते। इतनी बेवाकी एवं साफगोई से अपनी बात नहीं कह पाते।

जीवन चिंता को प्राथमिकता देने का मतलब यह नहीं है कि वह कला पक्ष की उपेक्षा करते हों । उनके लिए रचना का न वस्तु पक्ष उपेक्षणीय है न कलापक्ष, न ही जीवन मूल्य उपेक्षणीय हैं और न कला मूल्य। वह इन सब का संतुलन बनाकर ही आगे बढ़ते हैं। जीवन की गहरी एवं व्यापक समझ वाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है, क्योंकि जीवन की सम्‍पूर्णता इन सब से मिलकर ही है। वह कवि की कला में ही उसकी स्वायत्तता देखते हैं। उनकी स्थापना है कि एक अच्छी रचना रूप और वस्तु के द्वंद्व से ही पैदा होती है। कविता और आलोचना के क्षेत्र में आये वाक्छल जिसने साहित्य को आम आदमी के यथार्थ से अलग कर समाज में विभ्रम की स्थिति पैदा की, को उद्घाटित करने से वह कहीं और कभी नहीं चूकते हैं।

वह सामाजिक क्रियाओं की जटिलता में जीवन यथार्थ की पड़ताल करते हैं, इसलिए शब्द-शिल्प के जाल में नहीं फँसते बल्कि बुनियादी, उत्पादक, क्रियाशील एवं वास्तविक समाज, मानवीय और अमानवीय ताकतों के यथार्थ को उद्घाटित करते हैं। इस तरह समकालीन यथार्थ को समग्रता में उजागर करते हैं। यही कारण रहा है कि उनके आलोचना कर्म केन्‍द्र में हमेशा जीवनधर्मी यथार्थवादी कविता-परम्परा रही है। अधूरी एवं खंडित अभिप्राय वाली कविता को कटघरे में खड़ा करते रहे जिसके चलते हुये उन्हें जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि वाले कलावादी आलोचकों का कोपभाजन बनना पड़ा है।

यह उनकी जीवन के प्रति प्रतिबद्धता ही है कि कविता को परखने के औजार भी जीवन से ही लेते हैं । लोकधर्मी प्रतिमानों को लेकर उनकी मान्यता है कि वे श्रम की संस्कृति और सौंदर्यभावना से उत्प्रेरित हैं। लोक की साधारणता, सहजता, सक्रियता और उन्मुक्तता ही वह कसौटी हो सकती है जो किसी भी समय की कविता को परखने का काम कर सकती है क्योंकि साधारणता, सच्‍चाई, सक्रियता, सहजता आदि का नाम ही तो लोकजीवन है जहाँ किसी तरह का कोई आडम्‍बर व पाखंड नहीं।  पर वह इस बात से भी वाकिफ हैं कि संबंधों की निरंतर आती और बढ़ती जा रही जटिलता को इतने मात्र से परख-जाँच पाना सम्‍भव नहीं है। उसके लिए अर्थ, समाज, राजनीति आदि की अपर सम्‍बद्धता से मानव निर्मित मानव-मन और व्यवहार की भीतर तक जाँच जरूरी है।

एक आलोचक का जीवनानुभव एक रचनाकार के जीवनानुभवों से अधिक होने चाहिये तब ही वह रचना का सही-सही मूल्याँकन कर सकता है। जो आलोचक केवल रचना के द्वारा ही जीवन को जानता है स्वयं उस जीवन से अपरिचित है तो वह रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता है। आलोचना को रचना से अधिक गहरे स्तर पर समाज से जुड़ा होना चाहिये। तभी वह समाज से रचना के जुड़ाव का सही मूल्याँकन कर सकती है। इधर के आलोचकों में इस बात की कमी दिखाई देती है। जीवन से जुड़ाव की कमी के चलते ही आज की आलोचना लोकधर्मी और जनपदीय चेतना के साहित्य की उपेक्षा करती है। आलोचना मध्यवर्गीय जीवन के आसपास ही घूमती रह गई है। लेकिन जीवन सिंह की आलोचना जनपदीय जीवन और प्रकृति के प्रति रागात्मकता पैदा करती है। इसका कारण यह है कि वह अपनी आलोचना के केन्‍द्र में उन कवियों और कविताओं को रखते आये हैं जो लोकधर्मी और जनपदीयता बोध से लैस हैं। उनकी कविता में मनुष्य, समाज, प्रकृति और जीवन के प्रति राग-विराग गहराई से व्यक्त हुआ है। उन्हें जनपदीयता जीवन में भी और साहित्य में भी अपनी ओर आकर्षित करती है क्योंकि भले वहाँ जीवन के बड़े प्रश्‍न चाहे न निकलकर आयें हों किंतु कुछ बुनियादी व आधारभूत प्रश्‍नों को यहाँ कई तरह और कई कोणों से लाया गया है। उनकी दृष्टि में जनपद की महक सनी और लोकरंग में रंगी कविता का महत्व इस तथ्य में है कि वह ‘व्यक्ति के मनोवेगों पर असर डालती है।’

उनका मानना है कि पूँजी द्वारा निर्मित नए माहौल में आदमी पत्थर जैसा जड़ और संवेदना शून्य बनने की स्थिति में आ गया है। आदमी इससे कैसे बचे ? इसका उत्तर महानगरीय सभ्यता और पूँजीवादी दर्शनों के पास नहीं है। वहाँ जीवन की जटिलताएं और मनोगत उलझनें तो बहुत हैं लेकिन इस प्रश्‍न का उत्तर नहीं है। उन्हें इसकी गुंजाइश जनपदीय जीवन में दिखाई देती है, क्योंकि जनपद की खासियत होती है जन की प्रकृति से सम्‍बद्धता । यह सम्‍बद्धता जहाँ उसे एक ओर जीवट का धनी और संघर्षशील बनाती है वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक एवं सम्‍वेदनशील बनाती है। प्रकृति उसे मानवीय स्वभाव के समीप बने रहने की ठोस स्थितियाँ प्रदान करती है। प्रकृति के अपूर्व सौंदर्य के बीच मानवीय सौंदर्य का भी बराबर अहसास बना रहता है। भरपूर क्रियाशील जीवन से जीवंत संबंध बना रहता है। प्रकृति की कठिन परिस्थितियाँ एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के महत्व का अहसास भी कराती हैं। सामूहिकता के महत्व को बताती हैं। जबकि पूँजी निर्मित महानगरीय सभ्यता सबसे पहले आदमी का प्रकृति से और उसके बाद मानवीय प्रकृति से अलगाव करती जाती है। डॉक्‍टर जीवन सिंह प्रकृति के इस महत्व को स्वीकार करते हैं और रचना में प्रकृति को अधिक से अधिक स्थान देने के पक्षधर हैं। उनके लिए जीवन का प्रसार केवल मनुष्य तक नहीं है उसके चारों ओर की प्रकृति भी इसमें शामिल रहती है जो जीवन को गतिशील बनाती है।

जीवन सिंह की आलोचना के महत्व को कम करने की नीयत से  अक्सर व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाता है कि वह कवि विजेंद्र के आलोचक हैं । पहले तो उनके बारे में यह कहना उनका सीमित मूल्याँकन है क्योंकि जिसने उनकी आलोचना को समग्र रूप से पढ़ा है वह जानते हैं कि उन्होंने कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, कुमारेंद्र, मानबहादुर सिंह, ज्ञानेंद्रपति सहित उन तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ कवियों की कविता पर भी लिखा है जिनकी कविता जीवन व लोकधर्मी प्रतिमानों में खरी उतरती है। उन्होंने जितना कवि विजेंद्र की कविता पर लिखा है उससे कम मुक्तिबोध, नगार्जुन, त्रिलोचन, केदार पर नहीं लिखा है। इसलिये उनको एक कवि विशेष का आलोचक बताना कहीं न कहीं उनका गलत एवं अधूरा मूल्याँकन है। यह सौतिया डाह का परिचायक है। फिर भी यदि किसी को लगता है कि उन्होंने कवि विजेंद्र को कुछ अधिक महत्व दिया तो इसमें भी असंगत क्या है? विजेंद्र हमारे समय के एक समर्थ कवि हैं जिनकी कविताओं में जीवन की गहराई एवं व्यापकता के दर्शन होते हैं। कविता हो या गद्य उसमें लोक की पक्षधरता और लोक-जीवन की धड़कनें साफ-साफ सुनाई देती हैं। विचारबोध, इंद्रियबोध और भावबोध का एक सही संतुलन उनकी कविताओं में दिखाई देता है। अपनी आलोचना में जीवन सिंह कविवर विजेंद्र को जो महत्व देते हैं, वह व्यक्तिगत कारणों से नहीं बल्कि अपने जन, जनपद और उसकी प्रकृति के प्रति उनकी गहरी निष्ठा के चलते ही है। डॉक्‍टर रामविलास शर्मा ने कवि निराला पर सबसे अधिक लिखा है पर उन्हें ‘निराला का आलोचक’ क्यों नहीं कहा जाता है?

अंत में, यही कहा जा सकता है कि जो आलोचक अपने समय और समाज की जटिलताओं को जितनी गहराई एवं व्यापकता से समझाता है वह उतनी ही अच्छी तरह रचना की जटिलता को खोल पाता है तथा उसका उतना सही विश्‍लेषण कर पाता है। जीवन सिंह यह काम बखूबी कर पाते हैं क्योंकि उन्हें अपने समय, समाज एवं जीवन की गहरी एवं व्यापक समझ है। वह चीजों को केवल ऊपरी तौर पर नहीं देख़ते हैं बल्कि उसके भीतर तक पैठ उसे खंगालते हैं तथा ऐतिहासिक-भौतिकवाद और द्वंद्वात्मकता की कसौटी पर कसते हैं, एकांगी रूप में कोई निर्णय नहीं लेते है। उन्हें अपने इतिहास, परम्परा एवं संस्कृति की भी गहरी समझ है। इस सबको देखने की उनके पास लोक दृष्टि है। वह हमेशा लोक के पक्ष में खड़े होकर देखते हैं। वह लोक की क्रियाशीलता और सामूहिकता के मूल्य को कभी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते। साथ ही व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता का भी सम्मान करते हैं। उनका लोक पक्ष में खड़ा होना प्रकारातंर से जीवन के पक्ष में खड़ा होना है। उनकी मान्यताओं-स्थापनाओं-निष्कर्षों से असहमति हो सकती है पर उनकी जीवन के प्रति निष्ठा और जन के प्रति प्रतिबद्धता असंदिग्ध है। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि इस अंक के लिए सामग्री जुटाने के दौरान मैंने जिन भी साहित्यिकों से उन पर लिखने का अनुरोध किया] उस पर जो उत्साह और आत्मीयता का इजहार उनकी ओर से देखने को मिला वह अद्भुत था। वह केवल एक ईमानदार, प्रतिबद्ध व निष्ठावान व्यक्ति के प्रति ही सम्‍भव था।

शिक्षा को परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाने की जरूरत : महेश चंद्र पुनेठा

 

आज की शि‍क्षा विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल है जि‍सका मूल्‍यों से कुछ लेना-देना नहीं है। इसके कारणों, घातक दुष्‍परि‍णामों और सही शि‍क्षा पद्धति‍ को लेकर युवा लेखक-कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख-

आज शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है उसका जीवनोन्मुखी न होकर परीक्षोन्मुखी होना।आज सभी का सारा जोर परीक्षा पास करने या परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त करने में है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिक्षा परीक्षा के लिये है न कि जीवन के लिये। शिक्षक हों या अभिवावक या फिर विद्यार्थी सभी का परम लक्ष्य परीक्षा में बेहतर से बेहतर परिणाम प्राप्त करना मात्र रह गया है। पूरी शिक्षा परीक्षा केन्‍द्रि‍त हो चुकी है जिसके कारण पूरा वातावरण घोर गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भर गया है। शिक्षक शिक्षण इस तरीके से करते हैं जिससे कि बच्चे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त कर सकें। यही चाह अभिभावकों की भी रहती है। बच्चे तो फिर बच्चे हैं, अध्यापकों और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं के हाथों कैद। परीक्षा के अलावा किसी अन्य चीज के बारे में सोचना बच्चों के लिए सम्‍भव ही नहीं। परीक्षा ने बच्चों को महज किताबी कीड़े बना दिया है।

शिक्षा का मतलब किताबी ज्ञान हो गया है। किताब भी केवल वह जो पाठ्यपुस्तक के रूप में लागू हो। पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य पुस्तक पढ़ना समय की बर्बादी मानी जाती है। शिक्षक और छात्र दोनों के लिये पाठ्यपुस्तक ही पाठ्यचर्या हो गयी है। शिक्षक वही पढ़ाते हैं और विद्यार्थी वही पढ़ना चाहते हैं जो परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हो। परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर ही शिक्षा तथा शैक्षिक संप्राप्ति का मूल्यांकन किया जा रहा है, जिसमें सबसे अधिक बल लिखित परीक्षा को दिया जा रहा है। सभी परीक्षा को साधने में लगे हैं। बच्चे को विषय की समझ कितनी गहरी है, वह सीखी हुई विषयवस्तु को अपने जीवन की बदली परिस्थितियों  में कितना क्रियान्वित कर सकता है, विषयवस्तु को सीखने के बाद उसके व्यक्तित्व में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता है, वह कितना बेहतर इंसान या नागरिक बन पाता है, इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जानकारियों को रटना और परीक्षा में उन्हें हू-ब-हू उतार देना सीखने का पर्याय होता चला गया है, फलस्वरूप शिक्षा जीवन से कट चुकी है। जबकि जरूरी यह है कि बच्चे चीजों को समझें। चीजों को करने के रचनात्मक और नये तरीके सोचें। उनमें क्षमता होनी चाहिये कि अपनी समझ और ज्ञान को नई समस्यायें सुलझाने में इस्तेमाल कर पायें। किसी घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से आँककर उसके बारे में मन बना पायें और समस्याओं का विश्‍लेषण करके उन्हें हल करने के लिये नए रचनात्मक तरीके सोच पायें। लेकिन अधिकांश परीक्षाओं में इस क्षमता को नहीं जाँचा जाता।

शिक्षा सम्‍बन्‍धी दस्तावेजों में निहित ‘जीवन के लिए शिक्षा’ एक मुहावरा मात्र बन कर रह गया है। ज्ञान की दो दुनिया बना दी गयी हैं एक स्कूली ज्ञान और दूसरा बाहरी जीवन का ज्ञान। ऐसा वातावरण तैयार कर दिया गया है जैसे कि स्कूल का ज्ञान बाहरी जीवन के ज्ञान से श्रेष्ठ और अलग है। स्कूली ज्ञान से ही जीवन की सफलता-असफलता निर्धारित होती है तथा स्कूली ज्ञान परीक्षा से नियंत्रित है। बच्चों के पास खेलने का समय ही नहीं है। उनकी जिन्‍दगी तो यूनिट टेस्ट, वार्षिक परीक्षा और जैसे कि ये काफी न हो, बोर्ड परीक्षा के आतंक एवं अन्य अनगिनत प्रतियोगी परीक्षाओं से नियंत्रित रहती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे जीवन प्रतियोगिता के लिये ही बना है। बस दौड़ते रहे हो कहीं कोई दूसरा आपसे आगे नहीं निकल जाये। साथ-साथ आगे बढ़ने की तो कहीं कोई बात ही नहीं। बच्चे का परीक्षाओं में प्रदर्शन माँ-बाप से मिलने वाले प्यार की कसौटी बन गई है।

परीक्षा का इतना महत्वपूर्ण होना शिक्षा का नौकरी के हित होने से जुड़ा है। जहाँ से यह सोच विकसित हुई कि शिक्षा इसलिये प्राप्त की जाये ताकि पढ़-लिखकर आने वाले समय में अच्छी नौकरी मिल सके। वहीं से शिक्षा का उद्देश्‍य संकुचित हो गया। अच्छी नौकरी का मतलब भी ऐसी नौकरी से है जिसमें वेतन ऊँचा हो और शारीरिक श्रम कम से कम। आज प्रत्येक अभिभावक की जद्दोजहद है कि वह अपने पाल्य को ऐसी शिक्षा दिलवा सके जिससे उसे ऊँचे वेतन वाली नौकरी मिल सके। जब पढ़ने-लिखने के बाद ऐसा नहीं हो पाता है तो वे शिक्षा को गरियाने लगते हैं । उनको लगता है उन्होंने अपने पाल्य को शिक्षा दिलवाकर समय और धन का अपव्यय किया। औपनिवेशक काल में लिखित परीक्षा में फेल हो जाने का मतलब था सरकारी नौकरी के साथ जुड़े सामाजिक रुतबे और वेतन के साथ आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित जीवन जीने से वंचित हो जाना, आज भी वही मानसिकता हावी है। यह ठीक है कि शिक्षा रोजगार का जरिया बने, पर शिक्षा केवल रोजगार के लिये हो यह बात कुछ गले नहीं उतरती।

शिक्षा का नौकरी के हित होना और परीक्षा में प्राप्त अंकों के द्वारा उसकी गुणवत्ता का निर्धारण होना ही वे कारण हैं जिनके चलते बाजार ने शिक्षा को मुनाफे का माध्यम बना लिया है। आज बाजार अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा को लेकर उपस्थित हो रहा है। कम पैसे वालों के लिये अलग शिक्षा है और अधिक पैसों वालों के लिये अलग तरह की। ‘जिसकी आर्थिक हैसियत जैसी है वैसी शिक्षा खरीद ले’, यह बाजार का अघोषि‍त ऐलान है। ट्यूशन या कोचिंग नए धंधे के रूप में अस्तित्व में आया है। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इनसे जुड़े संस्थान विद्यार्थियों और अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।‘कुंजी’ और ‘गाइड’ छापने वालों का धंधा खूब फल-फूल रहा है। सभी का जोर एक ही बिन्‍दु पर है कि कैसे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त किये जा सकते हैं, सभी यही तरकीब बताने में लगे हुये हैं। बच्चों को साँस लेने की फुरसत नहीं है। एक अंधी दौड़ में सभी दौड़ रहे हैं। जो सफल हो गये वे अपने आप को सिकंदर समझ रहे हैं और जो पीछे रह जा रहे हैं वे कुंठा, तनाव, अवसाद से ग्रस्त हो आत्महत्या कर रहे हैं या मानसिक संतुलन खो रहे हैं। यदि शिक्षा परीक्षोन्मुख नहीं होती और उसको प्राप्त करने का  एकमात्र उद्देश्‍य नौकरी की प्राप्ति न होता तब क्या बाजार इसका इतना लाभ उठा पाता, यह विचारणीय प्रश्‍न है।

बाजार में बिक रही शिक्षा का मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल शिक्षा है। इसका उद्देश्‍य अर्थ मानव तथा व्यवस्था की मशीन में फिट होने वाले पुर्जे तैयार करना है। शिक्षा की दुकानों में वही शिक्षा बेची जा रही है जिसकी कॉरपोरेट जगत को जरूरत है। बाजार को ऐसा मानव संसाधन चाहिये जो उसकी कंपनियों में लगी अत्याधुनिक तकनीक की मशीनों को सही ढंग से परिचालित कर सके । उसके उत्पादों को खरीदने वाले उपभोक्ताओं को मानसिक रूप तैयार कर सके। ऐसे उत्पादों को भी बेच सके जो उपभोक्ता की आवश्‍यक आवश्‍यकता न हो। बाजार सोचने-समझने वाला संवेदनशील मानव नहीं चाहता। ऐसा मानव उसके किसी काम का नहीं। इसलिये आज की शिक्षा एक कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या प्रशासक तो तैयार कर रही है, पर उसे एक संवेदनशील इंसान नहीं बना रही है। न ही शिक्षा सृजनशीलता को बढ़ाने में सफल हो पा रही है। सृजनशीलता के अवसर इस बाजार-निर्भर शिक्षा ने निगल दिये हैं। इस शिक्षा में ऐसी क्षमता नहीं है कि यह किसी को साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक या चिंतक बना सके। यह उसकी न मंशा है और न ही जरूरत।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी लोककल्याणकारी, समाजवादी तथा लोकतांत्रिक सरकारें इसी शिक्षा की पैरोकार हैं। आजादी के बाद से लेकर आज तक चल रही दोहरी शिक्षा जो आज बहुपरती शिक्षा में बदल गयी है, इसका प्रमाण है। हाल ही में पारित शिक्षा अधिनियम 2009 ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी है। इस अधिनियम के द्वारा तो एक तरह से शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। जनता के पैंसों से विद्यालयों का आधारभूत ढाँचा विकसित कर प्रबंधन के नाम पर उन्हें निजी हाथों को देने की योजना बन चुकी है। प्रथम चरण में देश भर में स्थापित होने वाले छह हजार मॉडल स्कूलों में से दो हजार पाँच सौ स्कूलों को ‘सार्वजनिक-निजी साझेदारी’ के अंतर्गत किसी कॉरपोरेट क्षेत्र, स्वयंसेवी संगठन, स्वयं सहायता समूह, साझेदारी कंपनी, व्यक्ति और समुदाय आधारित संगठनों को सौंपा जायेगा। भविष्य में इस भागीदारी का बढ़ना निश्‍चि‍त है। इसी तरह कम से कम पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने के बहाने निजी स्कूलों को वाउचर प्रदान कर आने वाले समय में सरकारें नये विद्यालय खोलने के अपने दायित्व से भी बचना चाहती है। एक तरह से धीरे-धीरे शिक्षा को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। वाउचर योजना निजी क्षेत्र को लाभ पहुँचाने की योजना है। जिस दिन शिक्षा पूरी तरह निजी हाथों में चली जायेगी और विदेशी संस्थायें हमारे देश में शिक्षण संस्थायें संचालित करने लगेंगी, सोचा जा सकता है शिक्षा का उद्देश्‍य क्या रह जायेगा। शिक्षा में कितनी मूल्यों की बात रह जायेगी और कितनी जीवन की। तब शिक्षा का सम्‍बन्‍ध चेतना से नहीं रह जायेगा। शिक्षा जकड़न को तोड़े इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं की जायेगी। बच्चों में विवेकशीलता का विकास शिक्षा का कोई सरोकार नहीं रह जायेगा क्योंकि बाजार की दृष्टि से इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। जैसा कि हम अभी भी देख रहे हैं निजी स्वामित्व वाले शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के नाम पर पाठ्यचर्या में उन्हीं चीजों को शामिल किया जा रहा है जो उद्योगों के विस्तार और संचालन के लिए जरूरी हैं। वहाँ विज्ञान, भाषा व मानविकी जैसे चेतना विकसित करने व समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले विषयों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। उनके स्थान पर प्रबंधन व तकनीकी विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बच्चा जो पढ़ना चाह रहा है उसे वह नहीं पढ़ने दिया जा रहा है, बल्कि बाजार उसे जो पढ़ाना चाह रहा है उसे वह पढ़ना है। बच्चे की सृजनात्मकता और रुचि का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा छात्र-अभिभावकों का मन तैयार किया जा रहा है। उन्हें हसीन सपने दिखाये जा रहे हैं। इतने बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं कि उन्हें लगता है कि  अमुक पाठ्यक्रम पढ़ने से उनकी किस्मत ही बदल जायेगी। पर पिछले कुछ सालों में अन्य कुछ हुआ हो या नहीं लेकिन यह जरूर देखने में आया है कि जहाँ भी शिक्षा में बाजार का हस्तक्षेप बढ़ा है वहाँ आज्ञाकारिता, बौद्धिकता और व्यक्तिगत उपलब्धियों को बहुत ही महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में मानने की प्रवृत्ति स्थापित हुई है। साथ ही एक खतरा और बढ़ा है संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की अनेक शिक्षण संस्थाओं ने खूब धज्जियाँ उड़ायी हैं। शिक्षा को कट्टतरता, धर्मान्धता, जातिवाद, भाषाई दुराग्रह एवं क्षेत्रवाद फैलाने का माध्यम बनाया गया है। वि‍शेषरूप से साम्‍प्रदायिक मानसिकता को बोया और विकसित किया जा रहा है। जैसा कि प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल का मानना भी है, ‘शिक्षा के जरिये वर्ग-भेद, जाति-भेद, धार्मिक कट्टता, नस्लवाद, पितृसत्ता, सामंती व गैर-तार्किक सोच, पिछडे़पन आदि विकृतियों के खिलाफ लड़ाई आगे बढ़ाने के सरोकार गौण हो रहे हैं। शिक्षा वैश्‍वि‍क बाजार की ताकतों के हाथ में वर्चस्ववाद, शोषण, साम्‍प्रदायि‍कता व विषमता फैलाने का हथियार बनती जा रही है।’

दरअसल इसका सम्‍बन्‍ध इस बात से है कि हम कैसा समाज चाहते हैं। यदि हम ऐसा समाज चाहते हैं जो रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच से लैस हो, जहाँ चीजों का वितरण सम्यक एवं न्यायपूर्ण हो तथा सभी को अच्छी शिक्षा-स्वास्थ्य एवं भोजन की गारंटी हो तो शिक्षा प्रणाली भी ऐसी होनी चाहिये जो रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे और लोकव्यापी तथा समतामूलक हो । यदि आज ऐसा नहीं है तो यह कहीं न कहीं सत्ताधारियों के हित में है क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि जनता रचनात्मक एवं विवेकशील हो और उनके काम-काज पर प्रश्‍न खड़े करे ।

इधर बच्चों में परीक्षा के बोझ को कम करने की बात की जा रही है। कहा जा रहा है कि परीक्षा को ‘चाइल्ड फ्रेंडली’ बनाया जाये। इस दिशा में एक कदम के रूप में सी.बी.एस.सी. द्वारा हाई स्कूल की परीक्षा में बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक तथा अंकों के स्थान पर ग्रेड पद्धति को लागू किया गया है। पाठ आधारित और क्विज परीक्षा की विधि को बदलने की बात की जा रही है। यह माना जा रहा है कि इससे बच्चों पर परीक्षा का तनाव कम होगा। पर यहाँ एक सवाल खड़ा होता है कि जब तक परीक्षा से बच्चे के स्तर का निर्धारण होता रहेगा या फिर उसे वर्गीकृत किया जाता रहेगा और यह स्तर या वर्गीकरण उसके जीवन को पग-पग पर प्रभावित करता रहेगा, यही जीवन में सफलता असफलता का मानक बना रहेगा, तब तक भला बच्चा उससे निरपेक्ष कैसे रह सकता है। फिर यह स्तर का निर्धारण या वर्गीकरण अंकों के द्वारा हो या ग्रेड द्वारा इससे क्या अंतर पड़ता है। परीक्षा जहाँ होगी वहाँ तनाव अवश्‍य होगा। परीक्षा प्रतिस्पर्द्धा को भी जन्म देती है । प्रतिस्पर्द्धा तनाव का कारण बनती है। एन.सी.एफ. 2005 में स्कूलों में प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करने की बात कही गई है, पर जब तक समाज में यह प्रतिस्पर्द्धा समाप्त न हो जाये तब तक स्कूलों में कैसे हो सकती है।

प्रतिस्पर्द्धा  पूँजीवादी व्यवस्था का मूल्य है। यह माना जाता है कि शिक्षा को अपनी प्रक्रिया और मूल्याँकन में सफलता और प्रतिस्पर्धा के बजाय सहभागिता, सार्थकता और आत्मावलोकन को महत्व देना चाहिये और यह तभी हो सकेगा जब ज्ञान की प्रतिष्ठा उपयोगिता के कारण नहीं, बल्कि आनन्‍द तथा सामाजिक प्रतिबद्धता की वजह से हो। पर जिस व्यवस्था का मूल मंत्र ही प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत सफलता हो, क्या उससे आशा की जा सकती है कि वह सहभागिता, सार्थकता, आत्मावलोकन तथा आनन्‍द को महत्व देगी, इस पर समय रहते सोचे जाने की जरूरत है । शिक्षा को यदि बाजार के मकड़जाल से मुक्त करना है तो जरूरी लगता है कि इसे परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाया जाये। शिक्षा परीक्षा के लिये न हो, बल्कि परीक्षा शिक्षा के लिये हो जैसे कि परीक्षण स्वास्थ्य के लिए होता है न की स्वास्थ्य परीक्षण के लिये। परीक्षा बच्चे के मूल्याँकन के लिये न होकर शिक्षण पद्धति के मूल्याँकन एवं उसमें सुधार के लिये होनी चाहिये। परीक्षा से प्राप्त परिणामों से बच्चों को वर्गीकृत न किया जाये बल्कि सीखने के कठिन स्थलों का पता लगाया जाये ताकि उन पद्धतियों को विकसित किया जा सके जिससे सीखने की प्रक्रिया सरल और रोचक हो सके जिससे अंततः बच्चा ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सके । परीक्षा लिये जाने का तरीका कुछ ऐसा होना चाहिए कि बच्चे को इस बात का पता भी न चले कि उसकी परीक्षा ली जा रही है।

मौजूदा व्यवस्था में ऐसा सम्‍भव नहीं दिखता कि‍ परीक्षा को समाप्त किया जा सके या फिर कभी-कभी लगता है कि परीक्षा की उपयोगिता है बच्चों को खुद को जानने तथा आगे की योजना बनाने की दृष्टि से इसलिए ऐसे उपाय किये जाने चाहिये कि इसके तनाव को कम किया जा सके। इस दृष्टि से एन.सी.एफ. 2005 के सुझाव उल्लेखनीय हैं- परीक्षा हॉल में कागज कलम से ली गई परीक्षा के अलावा मूल्याँकन के बहुविध रूप होने चाहिये। मौखिक परीक्षा और समूह कार्य मूल्याँकन को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। खुली-पुस्तक परीक्षा और लचीली समय सीमा परीक्षा को देश भर में प्रायोगिक तौर पर लागू किये जाने की जरूरत है। इस तरह की शुरुआत से स्मृति आधारित परीक्षा से कुछ उच्च योग्यताओं की परीक्षा का मार्ग प्रशस्‍त होगा, जैसे-व्याख्या, मूल्याँकन और समस्या सुलझाना। विद्यार्थियों को उतने ही पत्रों की परीक्षा देने का अधिकार हो जितने की तैयारी हो । तीन साल के दौरान परीक्षा पूरी हो सके। इसको माँग पर परीक्षा प्रणाली के रूप में विकसित किया जा सकता है जिसमें छात्र तभी परीक्षा दे जब वे समझें कि उसके लिये तैयार है।