देहरादून : महिला समाख्या, उत्तराखण्ड ने अपनी कार्यकर्ताओं के जीवन में आये उतार-चढ़ाओं और संघर्ष के बाद उनको मिली सफलताओं को ‘बोल कि लब आजाद है तेरे’ नाम की किताब में संकलित किया है। 15 नवम्बर, 2011 को अकेता होटल, राजपुर रोड, देहरादून में प्रातः 10.30 बजे से इस किताब पर केन्द्रित एक दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस किताब के बहाने समाज की आधी आबादी की स्थिति-परिस्थिति को खंगालने की कोशिश की जाएगी। गोष्ठी में इस पुस्तक की सच्ची कहानियों पर तथा इनके माध्यम से महिलाओं की स्थिति पर चर्चा होगी। लेखिका सुश्री सुधा अरोड़ा, कृष्णा खुराना, अतुल शर्मा, कमल जोशी, सुभाष पंत आदि गोष्ठी के वक्ता होंगे।
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मानव जीवन बचाने के लिए हिमालय दिवस की पहल

नई दिल्ली: विश्व के सबसे युवा, लेकिन सबसे ऊंचे पर्वत हिमालय को बचाने के लिए बुद्धिजीवियों, पर्यावरणविदें ने इस वर्ष से 9 सितंबर को हिमालय दिवस मानने का फैसला लिया गया है। इसके तहत पहला आयोजन देहरादून में हुआ। इसमें महिला समाख्या के अलावा 28 संगठनों ने भाग लिया।
तथाकथित विकास की अंधी दौड़ के कारण हिमालय में हो रहे बदलाव और उनसे उत्पन्न खतरों से आगाह करती लेखक-पत्रकार महीपाल सिंह नेगी की रिपोर्ट-
”यूं तो पत्थर दिल है पहाड़,
सब सह लेता है।
प्रकृति का कोप,
आदमी का स्वार्थ।
लेकिन जब उसके
रिसते नासूर पर,
मरहम की जगह,
भर दी जाती है बारूद,
बेबस बिखर जाता है पहाड़
टुकड़े-टुकड़े पत्थरों में।
पहाड़ इसी तरह
आदमी की मौत का
सबब बनता है।
आदमी सिर्फ नापता है
उसकी संपदा, अपना हित,
कभी भांपता नहीं है
पहाड़ की पीड़ा।…”
हिमालय की पहाडिय़ों पर वर्ष दर वर्ष बढ़ते जा रहे पारिस्थितिक व पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में महेन्द्र यादव की यह कविता संपूर्ण हिमालय को लेकर शीघ्र गंभीर बहस की मांग करती है। हिमालय से जुड़े सवालों-सरोकारों पर बहस के लिए यह अनुकूल और महत्वपूर्ण समय भी है।
उत्तराखंड के जन संगठनों एवं बुद्धिजीवियों की पहल पर इस वर्ष से 9 सितंबर को हिमालय दिवस मनाने की परंपरा शुरू की गई है। इस पहल का स्वागत होना चाहिए और साथ ही कोशिश हो कि यह पहल उत्तराखंड से बाहर देश के अन्य हिमालयी प्रांतों व देश से बाहर हिमालयी क्षेत्र वाले अन्य राष्ट्रों तक भी पहुंचे।
विश्व के सबसे युवा, लेकिन सबसे ऊंचे पर्वत हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यंत नाजुक है। धरती पर यह अकेली स्थलाकृति है जो अब भी निर्माण प्रक्रिया में है। इसकी ऊंचाई अब भी बढ़ रही है। ऐसे में विकास और नियोजन का जो नजरिया यहां थोपा जा रहा है, उससे तात्कालिक रूप से हिमालयवासियों का जीवन संकट में पड़ रहा है। वैश्विक तापवृद्धि के साथ पारिस्थितिक तंत्र का खंडित होना और उस पर सरकारों व योजनाकारों की अदूरदर्शिता खतरे की घंटी बजा चुका है। है कोई सुनने वाला?
ग्लेशियरों के सिकुडऩे के प्रमाण मिल चुके हैं। जलवायु और मौसम, नदियों और नदी तंत्र से निर्मित पारिस्थितिकी और उस पर निर्भर जीव व जंतु समाज पर गंभीर संकट की आशंका है। जिन स्थानों तक सर्दियों में हर वर्ष बर्फ पड़ती थी, वहां अब पांच-सात साल तक बर्फ दिखाई नहीं देती। बर्फ के भंडार (ग्लेशियर) खत्म हो रहे हैं और नई बर्फ गिर नहीं रही। मौसम चक्र बदलने से जैव विविधता के साथ ही बहुत सीमित और वर्षा आधारित खेती भी संकट में है।
उत्तराखंड को सामने रखें तो कुछ और संकट इससे पहले ही आ चुके हैं। हाल के दिनों तक पर्यावरण के लिए पेड़ लगाने और भू, वन व खनन माफिया पर रोक लगाने की बात होती थी। लेकिन अब इससे भी बड़े संकट खड़े हो गए हैं। घने जंगलों वाले ढलान और घाटियां भी भूस्खलनों की चपेट में आ रही हैं। ढलानों पर बसे गावों में जन-जीवन संकट में है।
भूस्खलन उन घाटियों में ज्यादा हो रहे हैं, जहां विकास परियोजनाओं के निर्माण में भारी विस्फोटों (डायनामाइट) का प्रयोग हो रहा है। बांध, बांध की सुरंगें, कालोनियां व सड़कें तो चीर फाड़ कर ही रही हैं, निर्माण की जल्दी और श्रम बचाने के लिए अंधाधुंध विस्फोटों से पड़ती दरारें। सरकार भी मान चुकी है कि करीब एक सौ गांवों के अस्तित्व पर संकट है।
टिहरी बांध की झील से ऊपर बसे तीन गांव भूस्खलन के कारण दूसरी जगह बसाये जा रहे हैं। दर्जन भर और गांवों पर भी खतरा है, अभी जी.एस.आई. का सर्वे चल रहा है। इसी दौरान बांध के पावर हाउस के ठीक ऊपर की जमीन धंस गई तो परियोजना अधिकारियों को वहां बनाई गई अपनी ही कालोनी खाली करानी पड़ी। उत्तरकाशी, भटवाड़ी और जोशीमठ पर लगातार खतरा है। ये सभी उन्हीं घाटियों में हैं जहां बांध बने हैं या बन रहे हैं। ऊर्जा प्रदेश का ऐसा ही शोर रहा तो अगले दस-पंद्रह सालों में खतरे वाले गावों और कस्बों की की सूची चार-पांच सौ तक पहुंचने वाली है।
तत्काल दूसरा बड़ा खतरा प्राकृतिक जलश्रोतों का लगातार सूखना भी है। यह भी उन क्षेत्रों में अधिक हो रहा है जहां विस्फोटों से पहाडिय़ां हिल रही हैं। जल संकट से दर्जनों गांव उजाड़ हो चुके हैं।
जंगलों की आग भी साल दर साल विकराल हो रही है। महिनों जंगल धधकते रहते हैं। सरकारी तंत्र जले जंगलों के केवल आंकड़े एकत्र कर पाता है। कार्बनडाइआक्साइड से सांस लेना मुश्किल हो जाता है। पानी होने से आग पहले गाड़-गदेरों को पार नहीं कर पाती थी। गाड़ गदेरे प्राकृतिक फायर लाइन बनाते थे। पानी सूखने से आग अब सूखे गाड गदेरों को पार कर जाती है। बुग्यालों तक आग की लपटें पहुंच रही हैं। इससे अनेक दुर्लभ जड़ी बूटियां हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगी।
हिमालयी जीवन जरूर हमेशा कठिन व चुनौतीपूर्ण, लेकिन सुरक्षित था। अनादिकाल से यहां देव, दैत्य, यक्ष, गंधर्व, कोल, किन्नर, किरात व खस, सभ्यतायें स्थापित व विकसित हुईं और वह भी कंदराओं, गुफाओं में। हिमालय वासियों ने प्रकृति से बैर लेने की बजाय उसके अनुरूप जीवन को ढाला। उसकी चुनौतियों को स्वीकार किया, चुनौती नहीं दी।
चिपको आंदोलन के बाद हिमालय की संवेदनशीलता को मानते हुये उत्तराखंड में एक हजार मीटर से अधिक ऊंचे क्षेत्रों में पेड़ों का कटान रोक दिया गया था। अब इससे भी कहीं अधिक, दो-ढाई हजार मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बाधों के निर्माण में सैकड़ों टन डायनामाइट का प्रयोग हो रहा है। अब सोचिये जो क्षेत्र पेड़ कटने से अस्थिर हो सकते हैं, वे पहाड़ के अंदर बारूद भरकर विस्फोट करने से सुरक्षित रह सकेंगे?
हिमालयी प्रांत एक तरफ ग्रीन बोनस मांग रहे हैं और दूसरी ओर इस मांग के आधार (हरित पारिस्थितिकी) को ही नष्ट करने पर आमादा हैं। ग्रीन विरासत तो पूर्वजों ने हमें सौंपी है, और हम अगली पीढिय़ों के लिए बांधों से डूबी घाटियां, भूस्खलनों से उजाड़ ढलान, जल संकट से बंजर गांव और गांवों के नीचे सुरंगें छोड़ जाएंगे। विकास का जो तरीका अपनाया जा रहा है, वह बस एक पीढ़ी के लिए ही है।
उत्तराखंड के इतिहास प्रसिद्ध भड़ (वीर) माधोसिंह भंडारी ने चार सौ साल पहले टिहरी जिले के मलेथा गंाव में छेणी-हथोड़ी से एक भूमिगत सिंचाई नहर बनाई थी जो आज भी वैसे ही काम कर रही है और शायद सैकड़ों वर्ष बाद भी ऐसी ही रहने वाली है। क्या आज के ऊर्जा प्रदेश की कोई भी योजना चार सौ साल के लिए है? चार सौ छोडिय़े, सौ साल में कोई जगह योजना के लिए तो दूर इनसान के रहने लायक भी शायद ही रहे। नदियां पट्टे पर बिक रही हैं। सभ्यताओं का पोषण करने वाले हिमालय सरकारी मंडियों में नीलाम हो रहा है। नदियों का विस्थापन और अंतत: विलोप हो जाएगा। करीब दो सौ बांधों से पंद्रह सौ किलोमीटर तक नदियां सुरंगों में कैद हो जाएंगी। कवि डा. नागेंद्र जगूड़ी ने लिखा है-
”चारों ओर विकास का जंगल राज है
बस्तियां बचाओ-बचाओ चीख रही हैं
इज्जत बचाने को नदियां
आत्महत्या (सूख)कर रही हैं।…”
बहस के लिए सवाल और भी हैं। हिमालय के जिन ताल-बुग्यालों में ऋषि, मुनि और तपस्वी ज्ञान-ध्यान के लिए आते थे, वहां अब पर्यटक धमा चौकड़ी करते हुए पहुंच रहे हैं और टनों प्लास्टिक पाालीथिन कचरा बिखरा कर लौट जाते हैं। निचली घाटियों में जैव विविधताभक्षी लैण्टाना झाड़ी का उन्मूलन तो हो न सका कि अब गाजर घास फैल रही है।
हिमालय का पारिस्थितिक तंत्र इस धरती पर सबसे नाजुक है, इस बात को जितना जल्दी हो समझ लेना चाहिए। हिमालय दिवस की पहल यह समझ विकसित कर सकेगा, ऐसी अपेक्षा की जानी चाहिए। पहल तो हिमालयवासियों को ही करनी है। उत्तराखंड से इसकी पहल ज्यादा सार्थक इसलिए कही जाएगी क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों के अवैज्ञानिक और भीषण शोषण की प्रयोगभूमि इसे बना दिया गया है।
अंत में सवाल यह भी कि आखिर हम हिमालय को अब तक समझ भी कितना पाए हैं। जो पर्वत अब भी निर्माण प्रक्रिया में है, उसके मिजाज को समझना आसान नहीं है।
राय और कालिया का विरोध जारी
नई दिल्ली : नया ज्ञानोदय में प्रकाशित विभूतिनारायण राय के इंटरव्यू में लेखिकाओं के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणी का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसके लिए पत्रिका के संपादक को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराते हुए लेखकों के समूह ने शुक्रवार को ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। उन्होंने पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया के इस्तीफे की मांग की। दूसरी ओर विभिन्न संगठनों ने भी इसके खिलाफ मोर्चा खोल लिया है।
ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करने वाले लेखकों का कहना है कि इसके लिए संपादक सबसे ज्यादा दोषी है क्योंकि उन्होंने महिला विरोधी बातचीत को बगैर संपादन छाप दिया। लेखकों ने कालिया के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की और उन्हें अविलंब हटाने की मांग की। प्रदर्शन को उग्र होता देख भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी आलोक जैन को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने इस मामले को न्यास के सामने उठाने की बात कही।
प्रदर्शन में संजीव, मैत्रेयी पुष्पा, रेखा अवस्थी, भाषा सिंह, सर्वेश, विमल कुमार, जीतेंद्र कुमार, गीताश्री, अनीता भारती आदि ने भाग लिया।
दूसरी ओर लखनऊ की साहित्यिक संस्था प्रतिमान की ओर से आयोजित गोष्ठी में लेखकों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विभूति नारायण की टिप्पणी की कड़ी निंदा की।
डा. कुसुम वाष्र्णेय ने गोष्ठी का संयोजन किया। गोष्ठी में प्रस्ताव पास किया कि पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया ने जिस तरह श्रेष्ठ साहित्यिक मूल्यों की विदाई कर बाजारूपन को प्रश्रय दिया है, यह उसी की कुत्सित परिणति है। यह लेखिकाओं की बेबाक अभिव्यक्ति को भोंथरा करने की सोची-समझी साजिश है। इसके लिए राय और कालिया समान रूप से जिम्मेदार हैं। प्रस्ताव में भारत सरकार और ज्ञानपीठ न्यास से मांग की गई कि दोनों को उनके दायित्व से मुक्त कर दिया जाए। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा, कवयित्री कात्यायनी, नरेश सक्सेना, आलोचक वीरेंद्र यादव आदि ने विचार रखे।
उत्तराखंड की संस्था महिला समाख्या प्रदेश के सभी जिलों में प्रेस कांफे्रंस कर राय की टिप्पणी का विरोध कर रही है।
महिलाओं को मान्यता खुद स्थापित करनी होंगी: मैत्रेयी

देहरादूनः महिला दिवस के सौ साल होने के उपलक्ष्य में प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा के जन्मदिन 26 मार्च को महिला समाख्या, उत्तराखंड ने दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया। इसे चार सत्रोंं, महिला आंदोलन के सौ वर्ष, महिला आंदोलन और मुस्लिम महिलाएं, महिला आंदोलन और दलित महिलाएं, महिला आंदोलन और गांधी में बांटकर महिला आंदोलन और उसकी स्थिति को समझने का प्रयास किया। कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तराखंड की राज्यपाल माग्र्रेट आल्वा ने किया।
महिला समाख्या की निदेशिका गीता गैरोला ने अब तक की यात्रा का विवरण देते हुए इस दौर में सामने आई चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चुनौतियों से निपटने मंे लगातार चली जद्दोजहद के बाद समाख्या की अवधारणा व कार्यक्रम को समझने में समाज के अंदर निरंतर चली बहस से काफी चीजें स्पष्ट हुईं। इस दौर के अनुभव इतने महत्वपूर्ण हैं कि स्त्री मुक्ति के आंदोलन को आगे ले जाने के लिए हिम्मत और वैचारिक धरातल प्रदान करते हैं।
महादेवी सृजन पीठ के अध्यक्ष डॉ लक्ष्मण सिंह बटरोही ने ‘महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री विमर्श’ से महादेवी के स्त्री चेतना वाले साहित्य व सरोकार तथा आज के संदर्भ में उनके महत्व को सामने रखा। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में महादेवी का उदय पुरुषवादी वर्चस्व के विरोध में उभर कर सामने आता है। एक बार महादेवी ने बौद्ध भिक्षुणी बनने की कोशिश की थी। दीक्षा के समय जब गुरु और उनके मध्य परदा रखा तो महादेवी यह कह कर चली आईं कि जो धर्म स्त्री से सीधा संवाद नहीं कर सकता, उसकी उन्हें जरूरत नहीं। डॉ बटरोही के अनुसार मीरा भारत की पहली विद्रोही कवि थीं, लेकिन महादेवी ने मीरा के आध्यात्मिक मिथक को तोड़ा और उसके संघर्ष को सामान्य स्त्री के संघर्ष के रूप में देखा। शिक्षा और पति में से शिक्षा को चुना। घर की देहली से बाहर निकली और कभी नहीं लौटी।
मुख्य अतिथि माग्र्रेट आल्वा में कहा कि कोई हमारी (स्त्रियों की) बात सुने या न सुने, हम तो अपने हक की बात करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि हर महिला अपने जीवन में कुछ-न-कुछ मुश्किलें उठाती हैं। महिला होने के कारण जन्म के दिन से ही बहुत कुछ सहना पड़ता है। महिलाओं को पंचायतों से लेकर संसद तक में आरक्षण की बहस के दौरान बहुत से लोग इस परिवर्तन को पचा नहीं पाए। बहस के दौर में महिलाओं की क्षमताओं पर जो सवाल उठाए जाते थे, आज उन तमाम सवालों के जबाब महिलायें दे रही हैं। पंचायत से लेकर संसद तक में महिलायें इसलिए होनी चाहिए कि वे महिलाओं की मुश्किलें बेहतर जानती हैं।
100 साल की इस लंबी अवधि में कुछ महिलाओं ने अपने व्यक्तिगत संघर्ष को लिखकर सार्वजनिक करने की हिम्मत दिखाई। जिससे पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे में घुट-घुट कर जीने वाली बाकी औरतों को जीने के रास्ते मिल सके और वे उन रास्तों पर चलने की हिम्मत कर सके। इन जीवंत उदाहरणो को ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं तक पहुंचाने और उन पर बहस कर उनके रास्तों को सहज बनाने की प्रक्रिया में महिला समाख्या द्वारा देश की कुछ चर्चित व संघर्शषील महिलाओं की कथा-आत्मकथाओं के अंशों की पुस्तक ‘ना मैं बिरवा, ना मैं चिरिया’ का विमोचन भी किया।
‘महिला आंदोलन के 100 वर्ष’ विषय का संचालन गीता गैरोला ने किया। मुख्य वक्ता प्रसिद्ध नारीवादी जया श्रीवास्तव ने कहा कि महिला के जीवन चक्र में हिंसा और अन्याय का चक्र बना है। इसलिए महिलाओं की लड़ाई इंसाफ के लिए है। पांच ‘इ’, इंसाफ, इंसान, इश्क, इमान और इल्म पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इन भावनाओं के बीच एक रिश्ता है जिसे महिला आंदोलन के संदर्भ में समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्री आंदोलन कभी भी पुरुष विरोधी नहीं, बल्कि दासता, अत्याचार व दमन विरोधी रहा है, यह समझने की जरूरत है।
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को सुधारवाद की बजाए हक आधारित दृष्टिकोण बताते हुए उन्होंने उदाहरण दिया कि ऐनी बेसेंट ने भी कहा था, ‘महिलाओं को हक नहीं दे सकते तो मानवाधिकार की बात भी मत कीजिए और मानवाधिकार की बात करनी है तो महिला अधिकारांे की बात भी करनी होगी।’
नारीवादी महिला संगठनों के इतिहास मे हैदराबाद के पुरोगामी महिला संगठन को भारत का पहला नारीवादी संगठन बताया। जेपी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी के साथ ही 1975-1990 के दौरान उभरे बहुत से महिला संगठनों व उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि इन सबसे महिला आंदोलन की समझ आगे बढ़ी है। रचनात्मक स्तर पर भी इस दौरान महिला जागरण के अनेक गीत व नाटक रचे गए। उत्तराखंड में जल, जंगल व जमीन के हक तथा चिपको व शराब बंदी आन्दोलन में महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका को भी उन्होंने महिला आंदोलन का हिस्सा बताया और इन्हें समग्र रूप में देखे जाने की जरूरत बताई।
द्वितीय सत्र ‘महिला आंदोलन और मुस्लिम महिलायें’ की अध्यक्षता हम्माद फारूखी ने की। मुख्य वक्ता शीबा असलम थीं। संचालन सनत पत्रिका के संपादक फैजल मलिक ने किया।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे हम्माद फारूखी ने कहा कि मुस्लिम समाज और इस समाज की महिलाओं की समस्याएं दूसरे समाज की मूल समस्याओं से भिन्न नहीं हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी यहां भी दूसरे समाजों की तरह है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्र में निवास, स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज आदि के कारण भिन्न पहचान बनती है। इसे एक जैसे परिभाष्ति करने की कोशिश होती है, जबकि पूरा समाज एक जैसा होता नहीं है।
संबोधन के दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि चिंतन का परित्याग करने से इस्लाम में जड़ता आ गई है। चिंतन हो तो परिस्थिति अनुसार समाधान के विकल्प भी इस्लाम में मौजूद हैं और सहमति-असहमति के बीच संवाद रास्ता भी दिखाएगा।
मुख्य वक्ता शीबा असलम ने कहा कि जब सब तरह के समुदायों में मंथन व हलचल है, तब मुस्लिम महिलायें कैसे खामोश हैं, उनकी स्थिति कैसे भिन्न है। राजनीतिक क्षेत्र में संस्कृतिक विविधता को अल्पसंख्यकवाद के रूप में देखा जाने लगा है। मुस्लिम कट्ठरपंथियों ने भी अपनी आधी आबादी (औरत) को धर्म की आड़ में अलग-थलग रखा। इस्लाम को गलत रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हुई, जबकि इस्लाम के सिद्धांतों में भेदभाव था ही नहीं।
उन्होंने कहा कि यह एक चुनौती है कि भारत जैसे देश में जहां व्यवस्था भ्रष्ट है, लोग मजहब को छोड़ व्यवस्था पर भरोसा कैसे करें ? सेकुलर होना तो सरकार का काम है, लोग मजहबी हों, इसमें कोई बुराई नहीं है, इसलिए परिवर्तन की बहस मजहब के भीतर से भी चलाई जा सकती है और रास्ता वहीं से भी निकलेगा। इसमें तर्कहीनता बड़ी बाधा है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में निश्चित है कि बालिग होने पर ही शादी हो और कुरान में किसी आपातकालीन स्थिति के अलावा किसी को भी एक से अधिक शादी की इजाजत नहीं है। एक से अधिक विवाह सामान्य मुस्लिम अधिकार नहीं है। तलाक, फतवा व काजी व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि किस तरह इस्लाम की दुहाई देकर इन सब की आड़ में औरत का शोषण होता रहा है। फतवे की व्यवस्था को महज मशवरा बताते हुए उन्होंने कहा कि फतवा कोई कानून नहीं है, लेकिन औरत और पढ़े-लिखे व्यक्ति के खिलाफ फतवे को जबरन थोपा जाता है। शिया समुदाय में तलाक व्यवस्था में हुए कुछ सुधारों का उन्होंने स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि जेहाद को इस्लाम से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इससे पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को दिक्कत होती है। प्रतिभागियों द्वारा सवाल उठाए जाने पर “ाीबा असलम ने बताया कि तीन बार तलाक का कुरान से कोई लेना-देना नहीं है। तलाक एक प्रक्रिया है, जिसमें पत्नी की सहमति आवश्यक होती है। इस्लाम में परिवार नियोजन की मनाही नहीं है।
फैजल मलिक ने कहा कि कुछ वर्षों से कुछ ऐसा माहौल बना है कि मुसलमान होने से डर लगता है। जैसे कोई सिराहने बैठा हो और कह रहा हो,‘उठ, तू मुसलमान है।’ इस स्थिति महिलाओं के लिए ज्यादा पीड़ादायक है। इस्लाम की ठीक से व्याख्या नहीं की गई है। धर्मगुरुओं ने धर्म से उतना ही लिया, जिससे उनको फायदा हो, समाज को नहीं।
हजरत मोहम्मद ने समझाया था कि सांप्रदायिकता घर उजाड़ती है और मजहब इन्सान बनाता है। उन्होंने स्वयं एक विधवा से शादी की और कन्या भू्रण हत्या का विरोध किया था।
मंजू मलिक ने कहा कि औरत की तकलीफें नस्ल-दर-नस्ल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी खून में दौड़ती रही हैं। सदियोें तक औरत की जो भावनाएं दबाई गईं, वे सकारात्मक माहौल बनने से उभर रही है। विपरीत परिस्थितियों में समाज में अपना मुकाम बनाने वाली नाहिद ने ‘मेरे संघर्ष की कहानी-मेरी जुबानी’ सुना कर समाज के समक्ष कई प्रश्न खड़े किए।
सत्रों की समाप्ति के बाद ‘संभव’ नाट्य मंच, देहरादून ने कथाकार विद्यासागर नौटियाल की कहानी ‘फट जा पंचधार’ के नाट्य रूपांतरण का मंचन किया।
ओमप्रकाश बाल्मिकी की अध्यक्षता में ‘महिला आंदोलन एवं दलित महिलायें’ का विषय पर सत्र की शुरुआत डा. चंद्रा भण्डारी ने किया। उन्होंने कहा कि समाज की प्रारंभिक आत्मनिर्भर व्यवस्था टूटने से श्रम और सम्पत्ति के बंटवारे में पुरुष सम्पत्ति के मालिक के रूप में स्थापित हुए। इस जटिल सामाजिक श्रम विभाजन ने पुरुष के मुकाबले महिला की सामाजिक स्थिति कमजोर की और फिर इसने लिंगभेद को भी स्थापित कर दिया। महिलायें घर की सीमा तक सिमटने लगीं। भारतीय समाज में वर्णव्यवस्था के रूप में एक और तरह का विभाजन हुआ, जिसमें ऊंची-नीची श्रेणियों के कार्य के आधार पर जातियां थोप दी गईं। उत्पादन के कार्य करने वाले निम्न जातियों में वर्गीकृत हुए और उनके हिस्से शोषण और उपेक्षा आई। राज-काज के साथ सम्पत्ति और संसाधनों के मालिक ऊंची जातियां बन बैठीं। श्रम और सम्पत्ति के विभाजन ने भारतीय समाजों को दूसरी बार विभाजित कर दिया। पहले विभाजन से महिला और दूसरे विभाजन से दलित शोषण के शिकार हुए।
मुख्य वक्ता दलित आंदोलन की प्रसिद्ध नेता रजनी तिलक ने कहा कि समाज ने जिन जातियों को हाशिये पर रखा, उन्हें अछूत, अनुसूचित व दलित रूप में देखा। उनके श्रम का शोषण किया और सम्मान से भी वंचित किया गया। अंग्रेजी शासन काल में भी महिलाओं व दलितों को हाशिये पर रखने की कोशिश हुई। अंग्रेजी राज के कानूनों में भी यह दिखाई देता है।
भारत में कई बार महिला व दलित आंदोलन समानांतर भी चलते रहे। डॉ अंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलन इस समाज में जागरूकता के लिए महत्वपूर्ण रहे। स्त्री मुक्ति की भावना भी इन आंदोलनों में शमिल रही है।
सावित्री बाई फुले के जन्मदिन को महिला जाग्रति दिवस के रूप में मनाने की परंपरा दलित स्त्री की आवाज को सम्मान देने की कोशिश है। अलग-अलग राज्यों में महिला आंदोलन चल रहे हैं। इनके समंवय व मंथन की निरंतर जरूरत है। समय-समय पर मानवाधिकार आयोग व महिला आयोग को महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, लेकिन अब भी समग्र रूप में आवाज उठाने की जरूरत है।
जातिगत शोषण को ऐतिहासिकता में देखने और आजादी को स्त्री मुक्ति के संदर्भ में परिभाषित करने की जरूरत बताते हुए उन्होनें कहा कि आगे का रास्ता भी इसी से निकलेगा। उन्होंने अन्याय झेलने वाले सभी समाजों से चुप्पी तोड़ने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को पहली चुनौती महिला और दलित समाज ने ही दी है। मेहनतकश समाज के श्रम के शोषण पर अधिकार के लिए कुछ लोगों को दलित बना दिया गया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि महिला आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से ऊंची जाति की महिलाओं का है इसलिए निचले स्तर के असली मुद्दे अब भी चर्चा में नहीं आ पा रहे हैं। महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर आने को सकारात्मक बदलाव बताते हुए वह सार्वजनिक मंचों का उपयोग राजनीतिक बदलाव के लिए करने की जरूरत पर भी जोर देती हैं।
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान महिलाओं के दमन का प्रसंग उठाते हुए उन्होंने अफसोस जताया कि राज्य आज तक एक दोषी को भी दंडित नहीं कर सका।
अध्यक्षीय भाषण में ओमप्रकाश बाल्मीकी ने सवाल उठाया कि क्या हम अब भी ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां हर स्तर पर महिलाओं को प्रताड़ित-उत्पीड़ित किया जा रहा है। समाज में दलितों से नफरत करना अब भी सिखाया जाता है। जो विचार समाज में घृणा पैदा करता है, उस पर चोट करना जरूरी है। ‘कन्यादान’ जैसी धारणा और प्रपंचों से, जो लड़की को वस्तु समझता है, उससे बाहर निकलना भी महिला आंदोलन का हिस्सा होना चाहिए। उत्तराखंड के सभी आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी अग्रिम मोर्चे पर रहने के बावजूद आंदोलन के बाद फायदा उठाने वालों में लड़ने वाली महिलायें कहीं नहीं दिखाई देतीं, इस स्थिति को उन्होंने सोचनीय बताया।
इस सत्र के दौरान नन्दी नैनवाल एवं विजय लक्ष्मी ने ‘मेरे संघर्ष की कहानी मेरी जुबानी’ सुनाई। चिपको आंदोलन की प्रसिद्ध नेत्री और कठिन परिस्थितियों में समाज में जगह बनाने वाली सुदेषा देवी को सम्मानित किया।
प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी पुष्पा की अध्यक्षता में ‘महिला आंदोलन एवं गंाधी’ की मुख्य वक्ता डा. दिवा भट्ट तथा सत्र का संचालन डा. बसंती पाठक ने किया।
सत्र को आरंभ करते हुए हेमलता खण्डूड़ी ने कहा कि आजादी के आंदोलन के साथ गंाधी जी ने उपेक्षित समुदायों, दलितों व महिलाओं के प्रति संवेदनशील होकर सबकी भागीदारी के प्रयास किए। बाल विवाह, सती, पर्दा व विधवा उपेक्षा जैसी उत्पीड़नकारी परंपराओं का विरोध निरंतर करते रहे। महिलाओं की नेतृत्व क्षमता का मूल्यंाकन किया और नेतृत्व में आने को प्रेरित किया। स्त्री शिक्षा व स्वावलंबन की जरूरत भी गंाधी जी ने समझाई थी।
मुख्य वक्ता डॉ दिवा भट्ट ने कहा कि आजादी के आंदोलन में हर अवसर पर महिलाओं की भागीदारी में गंाधी जी की महत्वपूर्ण प्रेरणा रही है। गंाधी जी ने महिलाओं की “ाक्ति व सामथ्र्य को पहचाना और उन्हें सम्मान दिया। उनका मानना था कि स्त्री व पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। आत्मबल में गंाधी जी महिला को पुरुष से आगे बताते थे। महिला के लिए अबला शब्द का वे विरोध करते व कहते कि यदि बल का अर्थ पशुबल है, तब जरूर महिला का बल पुरुष से कम है।
उन्होंने कहा कि गंाधी जी सार्वजनिक हित के आंदोलनों में महिलाओं के नेतृत्व पर जोर देते थे। उनकी मान्यता थी कि इससे सफलता मिलनी आसान होगी। मनुष्य समाज को आगे ले जाने में वे महिलाओं की बराबर भागीदारी पर जोर देेते रहे। उन्होंने कहा कि अब करीब 100 वष बाद गांधी जी के इन विचारों के आधार पर महिला स्वतंत्रता की स्थिति का आंकलन किया जाना चाहिए। यह भी स्मरण रहना चाहिए कि गांधी जी की अहिंसा आत्मसमर्पण नहीं था, क्योंकि स्त्री के खिलाफ शील भंग जैसे अत्याचार पर उन्होंने कहा था, ‘तुम्हारे हाथ हैं, नाखून हैं, उनका इस्तेमाल करो।’
आजादी के आंदोलन में महिलाओं को साथ ले जाने का प्रयोग सबसे पहले गांधी जी का था। गांधी जी के विचारों में विरोधाभास को भी रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं की भिन्न भूमिका की बात गांधी जी करते थे। क्या गंाधी जी महिलाओं को सीमित भूमिका में देखते थे ? यह जरूर बहस का विषय है।
डॉ0 सविता मोहन ने कहा कि गांधी जी ने जिन तीन अखबारों का प्रकाशन किया था, उनमें स्त्री शिक्षा पर सर्वाधिक जोर होता था।
डॉ0 शेखर पाठक ने कहा कि अंग्रेजी राज के दौरान उत्तराखंड का संदर्भ लें तो बहुत से लोगों को स्त्री संघर्ष नहीं दिखाई देता। वे सवाल खड़ा करते हैं, क्या इतिहास के पास ऐसा देखने की दृष्टि थी ? अब नए संदर्भ में महिला की भूमिका को देखा जा रहा है और इसकी जरूरत भी हैं। उन्होंने कहा कि शुरू में महिलायें इसलिए पृष्ठभूमि में रहीं कि कठिन परिस्थितियों में घर, परिवार व समाज को देखना चुनौतिपूर्ण था। जब वन आंदोलन शुरू हुआ तो महिलायें घर से बाहर निकलने लगीं। आजादी के आंदोलन में भी महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ती गई।
गांधी जी से प्रभावित सरला बहन व मीरा बहन का उत्तराखंड आगमन व गांधी के विचारों के साथ महिलाओं के बीच काम करना महत्वपूर्ण रहा। इसका प्रभाव उत्तराखण्ड में आज भी है।
डॉ0 पाठक के अनुसार आजादी के आंदोलन और उसके बाद भी काफी समय तक दलित स्त्री इसलिए नहीं दिखाई देती क्योंकि उनका योगदान व संघर्ष मौखिक परंपरा में आगे बढ़ा, लिखित में नहीं आ पाया। महिलाओं के बहुत से संघर्ष इतिहास व साहित्य में स्थान नही बना पाए। उत्तराखंड में यह लंबी श्रंृखला है। राज्य आंदोलन में वह प्रखर रूप से सामने आती है। इन सबको स्थान मिलने का समय भी आएगा। जल, जंगल और जमीन के आंदोलन आज फिर महत्वपूर्ण हो गए हैं और इनमें महिलाओं की भागीदारी फिर निर्णायक होगी।
अध्यक्षीय भाषण में कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि महिलाओं के आज के आंदोलन भी गंाधी के सत्याग्रह जैसे ही हैं। समय बदल गया है इसलिए गंाधी के विचारों में विसंगतियां दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि महिला आंदोलन में पुरुष का विरोध भी क्यों न हो। जो उत्पीड़न करे, संघर्ष तो उससे होगा ही। संघर्ष के बिना सृजन संभव नहीं। उन्होंने कहा कि स्त्री की छटपटाहट किसी को दिखाई क्यों नहीं देती ? छटपटाहट से बाहर निकलने के लिए वह विरोध क्यों न करें ? नैतिकता का पाठ उसे ही क्यों पढ़ाया जाता है ? महिलाओं को धर्मग्रंथों की दुहाई दी जाती है, लेकिन इन ग्रंथों में तो चीर हरण, अग्नि परीक्षा है। चैराहे पर लुटती महिला का चीर बचाने अब कोई क्यों नहीं आता ?
उन्होंने कहा कि महिलाओं की स्थिति आज भी कैसी है, असलियत सब जानते हैं, इसलिये सच्चाई स्वीकार कर ही रास्ता निकलेगा। मान्यताएं बदलनी पड़ेंगी। महिलाओं से भी वह सवाल करती हैं कि महिला दिवस से ज्यादा आकर्षण जब करवाचैथ का हो गया है, तब परिवर्तन कैसे आएगा।
महिलाओं को अपनी मान्यता खुद स्थापित करनी होंगी। नए पर्व, त्योहार, उत्सव कायम करने होंगे। ऐसी मर्यादाएं, मान्यताएं बनानी होंगी, जिसमें महिलायें सम्मान के साथ शामिल हों। उन्होंने कहा कि हजारों साल की गुलामी महिलाओं की रही है, इसे कसटने में समय जरूर लगेगा।
‘आलो आंधारी’ की लेखिका बेबी हालदार ने अपने संघर्ष सुनाने के साथ अपनी सफलता को भी बांटा। गीता गैरोला ने कहा कि महिला आंदोलन के इतिहास में महिला समाख्या के प्रयास एक खामोश परिवर्तन साबित हो रहे हैं, इसे अनुभव किया जा सकता है।


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