कथाकार और संपादक भीमसेन त्यागी का यह संपादकीय ‘भारतीय लेखक’ (जनवरी-मार्च, 2006) में प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद की प्रासंगिकता और उनके साहित्य की विशेषताओं को समझने में यह सहायक है-
प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल पुराना है। अपने जीवन काल में ही वह और उनका साहित्य विवादों के घेरे में आ गए थे और उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्र चिह्न लगने शुरू हो गए थे। ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे कई यश पीडि़त लोगों ने विवाद खड़े किए। तब से यह सिलसिला आज तक जारी है।
इस सवाल के कई चेहरे हैं। प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं? हैं तो क्यों? किस हद तक? और नहीं तो क्यों नहीं?
प्रेमचंद के देहावसान के बाद उनके विरोध की नदी में बाढ़ आ गई। उस समय जो लेखक सृजनरत थे, उनमें से किसी का भी कद प्रेमचंद के निकट नहीं पहुंचता था। उस शिखर व्यक्तित्व के सामने खड़े रह सकने का एक ही विकल्प था यदि वे प्रेमचंद की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकते तो उन्हें घसीट कर छोटा बना दें!
प्रेमचंद के परवर्ती उन लेखकों में प्रमुख थे जैनेंद्र कुमार और सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय। इन दोनों और इनकी शिष्य परंपरा के अन्य लेखकों तथा समीक्षकों ने कभी अप्रत्यक्ष तो कभी प्रत्यक्ष आरोप लगाये कि प्रेमचंद कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा से ज्यादा उन्हें समाज सुधारक माना जा सकता है। उनका लेखन तात्कालिक समस्याओं पर आधारित है। उसमें स्थायित्व नहीं, शाश्वतता नहीं। ऐसा लेखन अल्पजीवी होता है। समस्याओं के समाधान के साथ-साथ अप्रासंगिक हो जाता है।
प्रेमचंद नियोजित ढंग से लिखते थे। हर बड़ी रचना का आरंभ करने से पहले उसका विस्तृत प्रारूप तैयार करते थे। जैनेंद्र ने उनकी इस रचना प्रक्रिया पर भी टिप्पणी की- इस प्रकार की सायास चेष्टा से श्रेष्ठ साहित्य नहीं लिखा जा सकता। श्रेष्ठ साहित्य तो सहज तथा स्वत: स्फूर्त होता है!
एक तरफ प्रेमचंद के परवर्ती लेखक समीक्षक उनके खिलाफ जिहाद करके उनका कद छोटा करने की कोशिश कर रहे थे और दूसरी तरफ उनकी सहज तथा आत्मीय रचनाएं विशाल पाठक समूह के गले का हार बनती जा रही थीं। परवर्ती लेखक तथा समीक्षक प्रेमचंद को खारिज करते रहे और पाठक स्वीकार करते गए। अंतत: साहित्य का निर्णायक और सृजेता का असली माई-बाप तो पाठक ही है। उनकी प्रासंगिकता पर बार-बार प्रश्रचिह्न लगाया जाना, स्वयं उनकी प्रासंगिकता का प्रमाण है। जो लेखक सचमुच प्रासंगिक नहीं बन पाता या नहीं रह जाता, समय उसे बिना किसी शोर शराबे के इतिहास के कूड़ेदान में ढकेल देता है। आज कोई यह सवाल नहीं उठाता कि जैनेंद्र प्रासंगिक हैं या नहीं ? अज्ञेय प्रासंगिक हैं या नहीं? इलाचंद्र जोशी प्रासंगिक हैं या नहीं? भगवती चरण वर्मा प्रासंगिक हैं या नहीं? मोहन राकेश प्रासंगिक हैं या नहीं? और इन सबके साथ चलने वाली समीक्षकों की कतार प्रासंगिक है या नहीं? सवाल उठता है तो सिर्फ एक प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?
प्रेमचंद बड़े लेखक थे। और बड़प्पन अपने साथ उदारता लाता है। प्रेमचंद ने कभी अपने विरोधियों को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं दिया, बल्कि उनके प्रति स्नेहभाव बनाये रखा। जैनेंद्र अपनी कूट शैली में प्रेमचंद का विरोध कर रहे थे और प्रेमचंद ने जैनेंद्र के बारे में घोषणा कर की थी कि वह भारत के भावी गोर्की हैं। लेकिन समय बहुत क्रूर है। वह सबको छान देता है। प्रेमचंद की उदारताजनित भविष्यवाणी जैनेंद्र के किसी काम न आयी। अंतत: समय ने सिद्ध कर दिया कि यदि भारत के गोर्की कोई है तो केवल प्रेमचंद।
प्रश्र किसी एक लेखक की व्यक्तिगत कुंठा अथवा वैमनस्य का नहीं। यह अंतर चेतना के सूक्ष्म धरातल पर होता है। वर्ग विभाजित समाज में हर वर्ग अपनी वाणी को मुखरित करने के लिए अनायास अपने लेखक तैयार कर लेता है। या यों कहें कि लेखक का मानसिक परिवेश जिस वर्ग से जुड़ा होता है, वह अपने लेखन के माध्यम से सहज रूप से उसी वर्ग का हित साधन करता है।
मोटे तौर पर समाज में दो वर्ग हैं। एक सुविधाभोगी अथवा सुविधाकामी वर्ग है, जो अपने लिए अधिकतम सुविधाएं जुटाना चाहता है और इस नेक काम के लिए वृहत्तर समाज को खाद की तरह इस्तेमाल करता है। इस वर्ग के लिए साहित्य दिमागी अय्याशी का मयखाना होता है। इसके लेखक अपने समय के समाज से कटे हुए एकांतभोगी और अंतर्मुख होते हैं। वे अ’छी खासी सुखद स्थितियों में भी दुख खोजते रहते हैं। उनका रचना संसार स्वयं उनके भीतर की कुंठा तथा आत्मश्लाधा पीडि़त दंभ तक सीमित रहता है। अपने समय के समाज से उनका विशेष सरोकार नहीं होता है। सरोकार होता है तो सिर्फ इतना कि वे उस समाज को कैसे इस्तेमाल कर सकें। समाज उनके लिए वह दीवार होता है, जिस पर वे अपनी आत्ममुग्ध तस्वीर टांग सकें।
इसके विपरीत समाज का दूसरा वर्ग सुविधा वंचित और जीवन-स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत होता है। कबीर ने कहा है- ‘सुखिया सब संसार है खावै और सोबै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै।’ समाज का पहला वर्ग और उसके प्रतिनिधि लेखक सुखिया संसार है और दूसरा वर्ग तथा उसके लेखक दुखिया दास कबीर। प्रेमचंद कबीर की इसी औघड़ परंपरा के लेखक थे। उनका रचना संसार समाज के इस छोर से उस छोर तक फैला था। उस समाज के सारे दुख उनके अपने दुख थे। उनके भीतर न जाने कितने होरी और घीसू कुलबुला रहे थे। प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य इस दुख से साक्षात्कार का साहित्य है। साक्षात्कार के अतिरिक्त उस दुख के कारणों की गहरी खोजबीन समाज के विभिन्न वर्गों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अंतर्संबधों की परख और उन्हें बेहतर बना सकने की ललक- ये सब प्रेमचंद की चिंता का विषय थे। वह शाश्वतता के पीछे न भाग कर सार्थक साहित्य के सृजन के पक्षधर थे। शाश्वतता सायास नहीं जुटायी जा सकती। समय की कसौटी पर कसा जाकर ही साहित्य शाश्वत होता है। उपरोक्त दोनों धाराएं आधुनिक हिंदी साहित्य में आरंभ से चली आ रही हैं। पहली धारा के लेखक प्रसाद, जैनेंद्र, अज्ञेय, भगवतीचरण वर्मा, निर्मल वर्मा, प्रियंवद आदि हैं तो दूसरी धारा के प्रतिनिधि लेखक हैं- प्रेमचंद, यथपाल, निराला, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत, भीष्म साहनी, शेखर जोशी, संजीव आदि। प्रेमचंद की परंपरा के इन लेखकों ने साहित्य को नये तेवर और नई पहचान दी है।
प्रेमचंद की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर विकासमान रहे। ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे सुधारवादी उपन्यासों से शुरू करके ‘गोदान’ जैसे यथार्थवादी, कालजयी उपन्यास तक पहुंचे। इसी तरह कहानियों में ‘नमक का दरोगा’ जैसी आदर्शवादी कहानियों से शुरू करके ‘नशा’, ‘पूस की रात’, ‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ तक का लंबा सफर तय किया।
इसके विपरीत जो शाश्वत साहित्य को सृजन का दंभ भरते रहे, वे अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर अधोगति को प्राप्त होते रहे। जैनेंद्र तमाम कोशिशों के बावजूद ‘त्यागपत्र’ को नहीं लांघ सके, अज्ञेय का शिखर ‘शेखर’ बन कर रह गया और भगवतीचरण वर्मा ‘चित्रलेखा’ के मोहपाश में ऐसे बंधे कि उससे बेहतर सृजन के लिए मुक्त नहीं हो सके।
प्रेमचंद का देहावसान 1936 में हुआ। उसके बाद के 18 वर्ष लेखकों तथा समीक्षकों द्वारा प्रेमचंद की घोर उपेक्षा के वर्ष थे। ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास की विस्फोटक घटना था। इसने संपूर्ण साहित्य परिदृश्य को बदल दिया। कुंठित तथा दमित व्यक्ति-मन की रचनाएं पृष्ठभूमि में चली गयीं और सामाजिक यथार्थ अपनी संपूर्ण गरिमा के साथ चर्चा के केंद्र में आ गया। यह वह बिंदु था, जहां से प्रेमचंद की प्रासंगिकता की खोज एक नये कोण से आरंभ हुई। उसके पश्चात प्रेमचंद परंपरा के लेखक निरंतर अपने समय के जलते हुए सवालों से जूझते रहे और उन्हें साहित्य में अभिव्यक्त करते रहे।
प्रेमचंद आम आदमी के लेखक थे और आम आदमी की तरह ही जीते थे। उनकी अपेक्षा दाल-रोटी और तोला भर घी तक सीमित थी। उनकी सादगी में ही महानता थी। ऐसा नहीं कि प्रेमचंद के जीवन में ऐसे अवसर नहीं आये कि वे सुविधाओं का भरपूर उपयोग कर सकें। लेकिन उन्होंने उन अवसरों की तरफ से आंख फेर ली। प्रेमचंद फिल्में लिखने के लिए मुंबई आये तो अच्छा-खासा कमा रहे थे। लेकिन मायानगरी का व्यावसायिक माहौल उन्हें रास नहीं आया। वह वापस बनारस लौट आये और अपने लेखन में रत हो गये।
एक तरफ प्रेमचंद की यह जीवन शैली थी और दूसरी तरफ आज का अदना से अदना लेखक वे सब सुविधाएं प्राप्त करना चाहता है, जो अमरीकी लेखक को सुलभ है।
प्रेमचंद साहित्य में ऐसे कौन से तत्व हैं, जो उसे कालजयी और आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं? इस प्रश्र के मूल तक पहुंचने के लिए उन तत्वों की परख करनी होगी, जो किसी भी साहित्य को कालजयी बनाते हैं। पहला तत्व है- अपने समय की सही पहचान और उसे कलात्मक ढंग से वाणी देना। विश्व के सभी महान लेखक अपने समय के प्रति सचेत रहे। उन्होंने अपनी जनता के दुख-सुख को समझा और उसे कलात्मक अभिव्यक्ति दी। उनके समय को समझने के लिए इतिहास के शुष्क पन्ने उतनी मदद नहीं करते, जितनी कि उन महान लेखकों का साहित्य। वह साहित्य एक परंपरा के रूप में विकसित होता है और आने वाली पीढिय़ों को बीते समय से सबक लेकर अपने जीवन को ढालने और तराशने में मदद करता है। वह साहित्य शताब्दियों तक प्रासंगिक बना रहता है। इसी कारण वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, शेक्सपियर, टाल्सटाय, लू-शुन जैसे महान लेखक आज भी प्रासंगिक हैं। भारत में इस शताब्दी में वह काम जितने प्रभावी ढंग से प्रेमचंद ने किया, उतने प्रभावी ढंग से संभवत: और कोई लेखक नहीं कर सका।
दूसरा तत्व है- लेखक का समकालीन विश्व साहित्य से निकटता स्थापित करना और अपनी रचनाशीलता को उसके समकक्ष ले जाने में समर्थ होना। प्रेमचंद अपने समय के विश्वस्तरीय लेखकों का सूक्ष्य अध्ययन करते थे और इसी माध्यम से उनके साथ पारिवारिक ऊष्मा अनुभव करते थे। वह सबसे अधिक मक्सिम गोर्की से प्रभावित थे। गोर्की की मृत्यु के समाचार से वह विह्वल हो उठे थे।
उन दिनों प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार थे। उनकी पत्नी शिवरानी देवी ‘प्रेमचंद घर में’ लिखती हैं: ‘‘गोर्की की मौत पर ‘आज’ आफिस में मीटिंग होने वाली थी।… उन दिनों मुझे भी रात को नींद नहीं आती थी। मेरी आंख खुली तो देखा कि आप जमीन पर बैठे कुछ लिख रहे हैं। मैं बोली-आप क्या कर रहे हैं?’
‘बोले-कुछ नहीं।‘
‘मैं बोली- नहीं, कुछ तो जरूर लिख रहे हैं।‘
‘आप बोले- नींद नहीं आती तो क्या करूं? भाषण तो लिखना ही पड़ता।‘
‘मैं बोली- जब तबियत ठीक नहीं तो भाषण कैसे लिखा जाएगा?’
‘आप बोले- जरूरी है। बिना लिखे काम नहीं चलेगा…’
‘मैंने देखा कि लिखते समय उनकी आंखों में आंसू थे।‘
‘सुबह हुई। दूसरे दिन मीटिंग में जाने को तैयार हुए तो बोली- आप चल तो सकते नहीं। फिजूल में जा रहे हैं।‘
‘आप बोले- तांगे पर जाना है। पैदल तो जा नहीं रहा हूं।‘
‘मैंने उनके साथ में बड़े लड़के को भेज दिया। नीचे तक खुद पहुंचाने आयी। मैं डर रही थी कि कहीं जीने पर से ये गिर न जाएं।‘
‘जब वे वहां से लौटे तो मैं फिर दरवाजे पर मिली। वे ऊपर चढऩे लगे तो उनके पैर लडख़ड़ा गये। ऊपर आने पर चारपायी पर लेट गये… जब वे कुछ सुस्ता लिये, तब बोले- मैं वहां खड़ा न हो सका, भाषण पढऩा तो दूर रहा। एक और महाशय से भाषण पढ़वाया।‘
‘मैं बोली- मेरा कहा आप मानें तब न।‘
‘आप बोले- गोर्की के मरने से मुझे बहुत दुख हुआ। गोर्की की जगह लेने वाला कोई नहीं रहा।‘
‘गोर्की के मरने की चर्चा वे कई दिनों तक करते रहे। जब-जब गोर्की के विषय में बाते करते, तब तब उनके हृदय में एक प्रकार का दर्द-सा उठता दिखायी पड़ता… वही उनका अंतिम भाषण था… कौन जानता था कि दो महीने भी बीतने नहीं पायेंगे कि वह खुद चले जाएंगे…।‘
प्रेमचंद गोर्की से कभी नहीं मिले थे। लेकिन उनकी रचनाओं के माध्यम से ही इतना गहरा भावनात्मक जुड़ाव अनुभव करते थे, जितना निकट आत्मीय जानों से होता है। गोर्की के न रहने पर वह मर्मांतक पीड़ा से ग्रस्त हो गये। यह पीड़ा गोर्की के माध्यम से विश्व के उन असंख्य पीडि़त तथा दमित नागरिकों के प्रति भी थी, जिनके लिए गोर्की और स्वयं प्रेमचंद जिये और मरे।
किसी लेखक के महान और कालजयी होने की परख का तीसरा बिंदु- उसकी भविष्य में झांक सकने की क्षमता।
प्रेमचंद की एक कहानी का पात्र कहता है- स्वराज्य के आने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि जॉन की जगह गोविंद गद्दी पर बैठ जाए। जब तक पूरी व्यवस्था को न बदला जाए, आम लोगों का भला नहीं होगा।
इस पात्र के मुंह से प्रेमचंद का भविष्यद्रष्टा बोल रहा है। उन्होंने अपने वैज्ञानिक चिंतन के आधार पर भविष्य दर्शन कर लिया था। आखिर हुआ क्या? आजादी के नाम पर जॉन की जगह गोविंद और फिर उसके वंशज गद्दी पर बैठते गये लेकिन आम लोगों का भला नहीं हो सका। प्रेमचंद की यह भविष्य दृष्टि उनकी दूसरी रचनाओं में भी मौजूद है। और यह दृष्टि ही उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं।
वर्तमान संदर्भ में प्रेमचंद की प्रासंगिकता को समझने के लिए आज के राजनीतिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक गणित को गहराई से समझना होगा। आज का विश्व समाज मुख्य रूप से साम्राज्यवाद की गिरफ्त में है। सोवियत रूस के पतन के पश्चात अमेरिका एकमात्र महाशक्ति रह गया है और इस अवसर का लाभ उठाकर वह समूचे विश्व में शोषण की कुटिल नीतियों का जाल फैला रहा है। कुछ संपन्न राष्ट्र उसके सहभागी हैं और अधिकांश देश खास तौर से तीसरी दुनिया के देश इस शोषण के शिकार। बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशनें स्थानीय उद्योगों को चौपट कर रही हैं और आटोमेशन के कारण बेरोजगारी की दर भयानक रूप से बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से गरीबी और भुखमरी बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुएं समाज के एक सीमित वर्ग के लिए सुरक्षित हो गयी हैं। समाज का शेष बहुसंख्यक वर्ग उन वस्तुओं के सपने देखने और फिर सपनों के टूटने की पीड़ा झेलने के लिए अभिशप्त है।
टीवी चैनलों के माध्यम से अमेरिकी साम्राज्यवाद सीधे हमारे घरों में घुस आया है और उसकी जारज संताने भ्रष्टाचार, अपराध तथा अपसंस्कृति, खुलकर नंगा नाच रही हैं। आधुनिकता तथा उत्तर आधुनिकता के इस घटाटोय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता खोजना एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं।
साम्राज्यवादी शोषण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल का बीज महाजनी सभ्यता में है। उसी महाजनी सम्यता में, जिसके वास्तविक रूप को सबसे पहले प्रेमचंद ने पहचाना। यहां प्रेमचंद का भविष्य–द्रष्टा फिर सामने आता है। स्वतंत्रता के दो-तीन दशक पूर्व ही उन्होंने देश की भावी दिशा को पहचान लिया था।
तीसरी दुनिया के देशों में जिनमें भारत भी एक है साम्राज्यवादी नीतियों के साथ-साथ सामंती मूल्य भी अपनी जकड़ बनाये हुए हैं। हम अर्धउपनिवेशी तथा अर्धसामंती स्थितियों में जी रहे हैं। प्रेमचंद ने इन दोनों समाजविरोधी शक्तियों को ठीक समय पर पहचान लिया था। उनका साहित्य इन दोनों महाशक्तियों के विरोध का साहित्य है।
प्रेमचंद के समय से अब तक गंगा में बहुत सा पानी बह गया है। जमाने ने रह-रहकर करवटें बदली हैं। लेकिन ये सब करवटें ऊपरी सतह पर, कायिक स्तर पर थीं। आत्मिक स्तर पर, सांस्कारिक स्तर पर देश उन्हीं मूल्यों से निर्देशित होता रहा। शहरों में और किसी हद तक गांवों में भी जो चमक-दमक नजर आती है, वह केवल ऊपरी पालिश है, भीतर वही शोषण का शिकंजा कसा है। आदमी जब-जब इस शिकंजे को ढीला करना चाहेगा, शोषण से मुक्त समाज की रचना करना चाहेगा तो उसे लौट कर प्रेमचंद के पास जाना होगा। प्रेमचंद की यह विशेषता ही उन्हें अत्याधुनिक तथा प्रासंगिक बनाती है।





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