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प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक : भीमसेन त्‍यागी

प्रेमचंद (31 जुलाई, 1880 - 8 अक्टू्बर, 1936)

कथाकार और संपादक भीमसेन त्‍यागी का यह संपादकीय ‘भारतीय लेखक’ (जनवरी-मार्च, 2006) में प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद की प्रासंगिकता और उनके साहित्‍य की विशेषताओं को समझने में यह सहायक है-

प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल पुराना है। अपने जीवन काल में ही वह और उनका साहित्य विवादों के घेरे में आ गए थे और उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्र चिह्न लगने शुरू हो गए थे। ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे कई यश पीडि़त लोगों ने विवाद खड़े किए। तब से यह सिलसिला आज तक जारी है।

इस सवाल के कई चेहरे हैं। प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?  हैं तो क्यों? किस हद तक? और नहीं तो क्यों नहीं?

प्रेमचंद के देहावसान के बाद उनके विरोध की नदी में बाढ़ आ गई। उस समय जो लेखक सृजनरत थे, उनमें से किसी का भी कद प्रेमचंद के निकट नहीं पहुंचता था। उस शिखर व्यक्तित्व के सामने खड़े रह सकने का एक ही विकल्प था यदि वे प्रेमचंद की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकते तो उन्हें घसीट कर छोटा बना दें!

प्रेमचंद के परवर्ती उन लेखकों में प्रमुख थे जैनेंद्र कुमार और सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय। इन दोनों और इनकी शिष्य परंपरा के अन्य लेखकों तथा समीक्षकों ने कभी अप्रत्यक्ष तो कभी प्रत्यक्ष आरोप लगाये कि प्रेमचंद कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा से ज्यादा उन्हें समाज सुधारक माना जा सकता है। उनका लेखन तात्कालिक समस्याओं पर आधारित है। उसमें स्थायित्व नहीं, शाश्वतता नहीं। ऐसा लेखन अल्पजीवी होता है। समस्याओं के समाधान के साथ-साथ अप्रासंगिक हो जाता है।

प्रेमचंद नियोजित ढंग से लिखते थे। हर बड़ी रचना का आरंभ करने से पहले उसका विस्तृत प्रारूप तैयार करते थे। जैनेंद्र ने उनकी इस रचना प्रक्रिया पर भी टिप्पणी की- इस प्रकार की सायास चेष्टा से श्रेष्ठ साहित्य नहीं लिखा जा सकता। श्रेष्ठ साहित्य तो सहज तथा स्वत: स्फूर्त होता है!

एक तरफ प्रेमचंद के परवर्ती लेखक समीक्षक उनके खिलाफ जिहाद करके उनका कद छोटा करने की कोशिश कर रहे थे और दूसरी तरफ उनकी सहज तथा आत्मीय रचनाएं विशाल पाठक समूह के गले का हार बनती जा रही थीं। परवर्ती लेखक तथा समीक्षक प्रेमचंद को खारिज करते रहे और पाठक स्वीकार करते गए। अंतत: साहित्य का निर्णायक और सृजेता का असली माई-बाप तो पाठक ही है। उनकी प्रासंगिकता पर बार-बार प्रश्रचिह्न लगाया जाना, स्वयं उनकी प्रासंगिकता का प्रमाण है। जो लेखक सचमुच प्रासंगिक नहीं बन पाता या नहीं रह जाता, समय उसे बिना किसी शोर शराबे के इतिहास के कूड़ेदान में ढकेल देता है। आज कोई यह सवाल नहीं उठाता कि जैनेंद्र प्रासंगिक हैं या नहीं ? अज्ञेय प्रासंगिक हैं या नहीं? इलाचंद्र जोशी प्रासंगिक हैं या नहीं? भगवती चरण वर्मा प्रासंगिक हैं या नहीं? मोहन राकेश प्रासंगिक हैं या नहीं? और इन सबके साथ चलने वाली समीक्षकों की कतार प्रासंगिक है या नहीं? सवाल उठता है तो सिर्फ एक प्रेमचंद प्रासंगिक हैं या नहीं?

प्रेमचंद बड़े लेखक थे। और बड़प्पन अपने साथ उदारता लाता है। प्रेमचंद ने कभी अपने विरोधियों को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं दिया, बल्कि उनके प्रति स्नेहभाव बनाये रखा। जैनेंद्र अपनी कूट शैली में प्रेमचंद का विरोध कर रहे थे और प्रेमचंद ने जैनेंद्र के बारे में घोषणा कर की थी कि वह भारत के भावी गोर्की हैं। लेकिन समय बहुत क्रूर है। वह सबको छान देता है। प्रेमचंद की उदारताजनित भविष्यवाणी जैनेंद्र के किसी काम न आयी। अंतत: समय ने सिद्ध कर दिया कि यदि भारत के गोर्की कोई है तो केवल प्रेमचंद।

प्रश्र किसी एक लेखक की व्यक्तिगत कुंठा अथवा वैमनस्य का नहीं। यह अंतर चेतना के सूक्ष्म धरातल पर होता है। वर्ग विभाजित समाज में हर वर्ग अपनी वाणी को मुखरित करने के लिए अनायास अपने लेखक तैयार कर लेता है। या यों कहें कि लेखक का मानसिक परिवेश जिस वर्ग से जुड़ा होता है, वह अपने लेखन के माध्यम से सहज रूप से उसी वर्ग का हित साधन करता है।

मोटे तौर पर समाज में दो वर्ग हैं। एक सुविधाभोगी अथवा सुविधाकामी वर्ग है, जो अपने लिए अधिकतम सुविधाएं जुटाना चाहता है और इस नेक काम के लिए वृहत्तर समाज को खाद की तरह इस्तेमाल करता है। इस वर्ग के लिए साहित्य दिमागी अय्याशी का मयखाना होता है। इसके लेखक अपने समय के समाज से कटे हुए एकांतभोगी और अंतर्मुख होते हैं। वे अ’छी खासी सुखद स्थितियों में भी दुख खोजते रहते हैं। उनका रचना संसार स्वयं उनके भीतर की कुंठा तथा आत्मश्लाधा पीडि़त दंभ तक सीमित रहता है। अपने समय के समाज से उनका विशेष सरोकार नहीं होता है। सरोकार होता है तो सिर्फ इतना कि वे उस समाज को कैसे इस्तेमाल कर सकें। समाज उनके लिए वह दीवार होता है, जिस पर वे अपनी आत्ममुग्ध तस्वीर टांग सकें।

इसके विपरीत समाज का दूसरा वर्ग सुविधा वंचित और जीवन-स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत होता है। कबीर ने कहा है- ‘सुखिया सब संसार है खावै और सोबै, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै।’ समाज का पहला वर्ग और उसके प्रतिनिधि लेखक सुखिया संसार है और दूसरा वर्ग तथा उसके लेखक दुखिया दास कबीर। प्रेमचंद कबीर की इसी औघड़ परंपरा के लेखक थे। उनका रचना संसार समाज के इस छोर से उस छोर तक फैला था। उस समाज के सारे दुख उनके अपने दुख थे। उनके भीतर न जाने कितने होरी और घीसू कुलबुला रहे थे। प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य इस दुख से साक्षात्कार का साहित्य है। साक्षात्कार के अतिरिक्त उस दुख के कारणों की गहरी खोजबीन समाज के विभिन्न वर्गों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अंतर्संबधों की परख और उन्हें बेहतर बना सकने की ललक- ये सब प्रेमचंद की चिंता का विषय थे। वह शाश्वतता के पीछे न भाग कर सार्थक साहित्य के सृजन के पक्षधर थे। शाश्वतता सायास नहीं जुटायी जा सकती। समय की कसौटी पर कसा जाकर ही साहित्य शाश्वत होता है। उपरोक्त दोनों धाराएं आधुनिक हिंदी साहित्य में आरंभ से चली आ रही हैं। पहली धारा के लेखक प्रसाद,  जैनेंद्र,  अज्ञेय,  भगवतीचरण वर्मा,  निर्मल वर्मा,  प्रियंवद आदि हैं तो दूसरी धारा के प्रतिनिधि लेखक हैं- प्रेमचंद, यथपाल, निराला, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत,  भीष्म साहनी,  शेखर जोशी,  संजीव आदि। प्रेमचंद की परंपरा के इन लेखकों ने साहित्य को नये तेवर और नई पहचान दी है।

प्रेमचंद की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर विकासमान रहे। ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे सुधारवादी उपन्यासों से शुरू करके ‘गोदान’ जैसे यथार्थवादी, कालजयी उपन्यास तक पहुंचे। इसी तरह कहानियों में ‘नमक का दरोगा’ जैसी आदर्शवादी कहानियों से शुरू करके ‘नशा’, ‘पूस की रात’, ‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ तक का लंबा सफर तय किया।

इसके विपरीत जो शाश्वत साहित्य को सृजन का दंभ भरते रहे, वे अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर अधोगति को प्राप्त होते रहे। जैनेंद्र तमाम कोशिशों के बावजूद ‘त्यागपत्र’ को नहीं लांघ सके, अज्ञेय का शिखर ‘शेखर’ बन कर रह गया और भगवतीचरण वर्मा ‘चित्रलेखा’ के मोहपाश में ऐसे बंधे कि उससे बेहतर सृजन के लिए मुक्त नहीं हो सके।

प्रेमचंद का देहावसान 1936 में हुआ। उसके बाद के 18 वर्ष लेखकों तथा समीक्षकों द्वारा प्रेमचंद की घोर उपेक्षा के वर्ष थे। ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास की विस्फोटक घटना था। इसने संपूर्ण साहित्य परिदृश्य को बदल दिया। कुंठित तथा दमित व्यक्ति-मन की रचनाएं पृष्ठभूमि में चली गयीं और सामाजिक यथार्थ अपनी संपूर्ण गरिमा के साथ चर्चा के केंद्र में आ गया। यह वह बिंदु था, जहां से प्रेमचंद की प्रासंगिकता की खोज एक नये कोण से आरंभ हुई। उसके पश्चात प्रेमचंद परंपरा के लेखक निरंतर अपने समय के जलते हुए सवालों से जूझते रहे और उन्हें साहित्य में अभिव्‍यक्‍त करते रहे।

प्रेमचंद आम आदमी के लेखक थे और आम आदमी की तरह ही जीते थे। उनकी अपेक्षा दाल-रोटी और तोला भर घी तक सीमित थी। उनकी सादगी में ही महानता थी। ऐसा नहीं कि प्रेमचंद के जीवन में ऐसे अवसर नहीं आये कि वे सुविधाओं का भरपूर उपयोग कर सकें। लेकिन उन्होंने उन अवसरों की तरफ से आंख फेर ली। प्रेमचंद फिल्में लिखने के लिए मुंबई आये तो अच्‍छा-खासा कमा रहे थे। लेकिन मायानगरी का व्यावसायिक माहौल उन्हें रास नहीं आया। वह वापस बनारस लौट आये और अपने लेखन में रत हो गये।

एक तरफ प्रेमचंद की यह जीवन शैली थी और दूसरी तरफ आज का अदना से अदना लेखक वे सब सुविधाएं प्राप्त करना चाहता है, जो अमरीकी लेखक को सुलभ है।

प्रेमचंद साहित्य में ऐसे कौन से तत्व हैं,  जो उसे कालजयी और आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं? इस प्रश्र के मूल तक पहुंचने के लिए उन तत्वों की परख करनी होगी, जो किसी भी साहित्य को कालजयी बनाते हैं। पहला तत्व है- अपने समय की सही पहचान और उसे कलात्मक ढंग से वाणी देना। विश्व के सभी महान लेखक अपने समय के प्रति सचेत रहे। उन्होंने अपनी जनता के दुख-सुख को समझा और उसे कलात्मक अभिव्यक्ति दी। उनके समय को समझने के लिए इतिहास के शुष्क पन्ने उतनी मदद नहीं करते, जितनी कि उन महान लेखकों का साहित्य। वह साहित्य एक परंपरा के रूप में विकसित होता है और आने वाली पीढिय़ों को बीते समय से सबक लेकर अपने जीवन को ढालने और तराशने में मदद करता है। वह साहित्य शताब्दियों तक प्रासंगिक बना रहता है। इसी कारण वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, शेक्सपियर, टाल्सटाय, लू-शुन जैसे महान लेखक आज भी प्रासंगिक हैं। भारत में इस शताब्दी में वह काम जितने प्रभावी ढंग से प्रेमचंद ने किया, उतने प्रभावी ढंग से संभवत: और कोई लेखक नहीं कर सका।

दूसरा तत्व है- लेखक का समकालीन विश्व साहित्य से निकटता स्थापित करना और अपनी रचनाशीलता को उसके समकक्ष ले जाने में समर्थ होना। प्रेमचंद अपने समय के विश्वस्तरीय लेखकों का सूक्ष्य अध्ययन करते थे और इसी माध्यम से उनके साथ पारिवारिक ऊष्मा अनुभव करते थे। वह सबसे अधिक मक्सिम गोर्की से प्रभावित थे। गोर्की की मृत्यु के समाचार से वह विह्वल हो उठे थे।

उन दिनों प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार थे। उनकी पत्नी शिवरानी देवी ‘प्रेमचंद घर में’ लिखती हैं: ‘‘गोर्की की मौत पर ‘आज’ आफिस में मीटिंग होने वाली थी।… उन दिनों मुझे भी रात को नींद नहीं आती थी। मेरी आंख खुली तो देखा कि आप जमीन पर बैठे कुछ लिख रहे हैं। मैं बोली-आप क्या कर रहे हैं?’

‘बोले-कुछ नहीं।‘

‘मैं बोली- नहीं, कुछ तो जरूर लिख रहे हैं।‘

‘आप बोले- नींद नहीं आती तो क्या करूं? भाषण तो लिखना ही पड़ता।‘

‘मैं बोली- जब तबियत ठीक नहीं तो भाषण कैसे लिखा जाएगा?’

‘आप बोले- जरूरी है। बिना लिखे काम नहीं चलेगा…’

‘मैंने देखा कि लिखते समय उनकी आंखों में आंसू थे।‘

‘सुबह हुई। दूसरे दिन मीटिंग में जाने को तैयार हुए तो बोली- आप चल तो सकते नहीं। फिजूल में जा रहे हैं।‘

‘आप बोले- तांगे पर जाना है। पैदल तो जा नहीं रहा हूं।‘

‘मैंने उनके साथ में बड़े लड़के को भेज दिया। नीचे तक खुद पहुंचाने आयी। मैं डर रही थी कि कहीं जीने पर से ये गिर न जाएं।‘

‘जब वे वहां से लौटे तो मैं फिर दरवाजे पर मिली। वे ऊपर चढऩे लगे तो उनके पैर लडख़ड़ा गये। ऊपर आने पर चारपायी पर लेट गये… जब वे कुछ सुस्ता लिये, तब बोले- मैं वहां खड़ा न हो सका, भाषण पढऩा तो दूर रहा। एक और महाशय से भाषण पढ़वाया।‘

‘मैं बोली- मेरा कहा आप मानें तब न।‘

‘आप बोले- गोर्की के मरने से मुझे बहुत दुख हुआ। गोर्की की जगह लेने वाला कोई नहीं रहा।‘

‘गोर्की के मरने की चर्चा वे कई दिनों तक करते रहे। जब-जब गोर्की के विषय में बाते करते, तब तब उनके हृदय में एक प्रकार का दर्द-सा उठता दिखायी पड़ता… वही उनका अंतिम भाषण था… कौन जानता था कि दो महीने भी बीतने नहीं पायेंगे कि वह खुद चले जाएंगे…।‘

प्रेमचंद गोर्की से कभी नहीं मिले थे। लेकिन उनकी रचनाओं के माध्यम से ही इतना गहरा भावनात्मक जुड़ाव अनुभव करते थे, जितना निकट आत्मीय जानों से होता है। गोर्की के न रहने पर वह मर्मांतक पीड़ा से ग्रस्त हो गये। यह पीड़ा गोर्की के माध्यम से विश्व के उन असंख्य पीडि़त तथा दमित नागरिकों के प्रति भी थी, जिनके लिए गोर्की और स्वयं प्रेमचंद जिये और मरे।

किसी लेखक के महान और कालजयी होने की परख का तीसरा बिंदु- उसकी भविष्य में झांक सकने की क्षमता।

प्रेमचंद की एक कहानी का पात्र कहता है- स्वराज्य के आने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि जॉन की जगह गोविंद गद्दी पर बैठ जाए। जब तक पूरी व्यवस्था को न बदला जाए, आम लोगों का भला नहीं होगा।

इस पात्र के मुंह से प्रेमचंद का भविष्यद्रष्‍टा बोल रहा है। उन्होंने अपने वैज्ञानिक चिंतन के आधार पर भविष्य दर्शन कर लिया था। आखिर हुआ क्या? आजादी के नाम पर जॉन की जगह गोविंद और फिर उसके वंशज गद्दी पर बैठते गये लेकिन आम लोगों का भला नहीं हो सका। प्रेमचंद की यह भविष्य दृष्टि  उनकी दूसरी रचनाओं में भी मौजूद है। और यह दृष्टि ही उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाये हुए हैं।

वर्तमान संदर्भ में प्रेमचंद की प्रासंगिकता को समझने के लिए आज के राजनीतिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक गणित को गहराई से समझना होगा। आज का विश्व समाज मुख्य रूप से साम्राज्यवाद की गिरफ्त में है। सोवियत रूस के पतन के पश्चात अमेरिका एकमात्र महाशक्ति रह गया है और इस अवसर का लाभ उठाकर वह समूचे विश्व में शोषण की कुटिल नीतियों का जाल फैला रहा है। कुछ संपन्न राष्ट्र उसके सहभागी हैं और अधिकांश देश खास तौर से तीसरी दुनिया के देश इस शोषण के शिकार। बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशनें स्थानीय उद्योगों को चौपट कर रही हैं और आटोमेशन के कारण बेरोजगारी की दर भयानक रूप से बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से गरीबी और भुखमरी बढ़ रही है। उपभोक्ता वस्तुएं समाज के एक सीमित वर्ग के लिए सुरक्षित हो गयी हैं। समाज का शेष बहुसंख्यक वर्ग उन वस्तुओं के सपने देखने और फिर सपनों के टूटने की पीड़ा झेलने के लिए अभिशप्त है।

टीवी चैनलों के माध्यम से अमेरिकी साम्राज्यवाद सीधे हमारे घरों में घुस आया है और उसकी जारज संताने भ्रष्टाचार, अपराध तथा अपसंस्कृति, खुलकर नंगा नाच रही हैं। आधुनिकता तथा उत्‍तर आधुनिकता के इस घटाटोय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता खोजना एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं।

साम्राज्यवादी शोषण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मायाजाल का बीज महाजनी सभ्यता में है। उसी महाजनी सम्यता में, जिसके वास्तविक रूप को सबसे पहले प्रेमचंद ने पहचाना। यहां प्रेमचंद का भविष्य–द्रष्‍टा फिर सामने आता है। स्वतंत्रता के दो-तीन दशक पूर्व ही उन्होंने देश की भावी दिशा को पहचान लिया था।

तीसरी दुनिया के देशों में जिनमें भारत भी एक है साम्राज्यवादी नीतियों के साथ-साथ सामंती मूल्य भी अपनी जकड़ बनाये हुए हैं। हम अर्धउपनिवेशी तथा अर्धसामंती स्थितियों में जी रहे हैं। प्रेमचंद ने इन दोनों समाजविरोधी शक्तियों को ठीक समय पर पहचान लिया था। उनका साहित्य इन दोनों महाशक्तियों के विरोध का साहित्य है।

प्रेमचंद के समय से अब तक गंगा में बहुत सा पानी बह गया है। जमाने ने रह-रहकर करवटें बदली हैं। लेकिन ये सब करवटें ऊपरी सतह पर, कायिक स्तर पर थीं। आत्मिक स्तर पर, सांस्कारिक स्तर पर देश उन्हीं मूल्यों से निर्देशित होता रहा। शहरों में और किसी हद तक गांवों में भी जो चमक-दमक नजर आती है, वह केवल ऊपरी पालिश है, भीतर वही शोषण का शिकंजा कसा है। आदमी जब-जब इस शिकंजे को ढीला करना चाहेगा, शोषण से मुक्त समाज की रचना करना चाहेगा तो उसे लौट कर प्रेमचंद के पास जाना होगा। प्रेमचंद की यह विशेषता ही उन्हें अत्याधुनिक तथा प्रासंगिक बनाती है।

 

 

 

 

हि‍मपात की डायरी : अतुल शर्मा

पहाड़ी क्षेत्रों में हि‍मपात का सि‍लसि‍ला जारी है। मंसूरी में बर्फ पड़ने पर कवि‍ और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा को ऐसी स्‍थि‍ति‍यों में की गई यात्राओं का स्‍मरण हो आया-

मंसूरी से देहरादून तक पैदल यात्रा के कई संस्‍मरण हैं। यहां 16 फरवरी की रात पड़ी बर्फ का ही जि‍क्र अभीष्‍ट है। मंसूरी में बर्फ पड़ी। देहरादून में दो दि‍न बादल घि‍रे रहे। ओले, बारि‍श और सर्द हवाओं ने मोटे स्‍वेटर नि‍कलवा दि‍ए। कुछ समय  पहले जब मैं नींद में था, तब मंसूरी धनौल्‍टी में खूब बर्फ पड़ी। 17 फरवरी सुबह खि‍ली धूप में मन हो रहा था कि‍ बर्फ के पास चल दूं। पहले भी कई बार गया हूँ। मुझे ऐसी यात्राएं याद आ गईं। देहरादून से राजपुर तक बस में गए। वहां से शहंशाही आश्रम से कुछ आगे मंसूरी की तरफ पैदल चल दि‍ए। उस समय चूने की खानें बंद नहीं थीं। वहां छोटे ट्रक जि‍न्‍हें गट्टू कहते थे, उन पर सवार होकर तीन कि‍लोमीटर की चढ़ाई चढ़ गए। वहां से एक छोटी सी पगडंडी से पहाड़ी का एक छोटा हि‍स्सा चढ़कर मंसूरी का पैदल रास्‍ता शुरू हो गया। ये पहाड़ी रास्‍ता झाड़ीपानी तक ले जाता था। बायीं तरफ से दून घाटी दूर तक दि‍खती थी। और इधर छोटा-सा पहाड़ी गांव गुमसुम और ठंड में डूबा हुआ था। पैदल चलना थकाने वाला बि‍ल्‍कुल नहीं था। मेरे साथ सुप्रसि‍द्ध हास्‍य कवि‍ ओमप्रकाश आदि‍त्‍य, गीतकार रमानाथ अवस्‍थी, कथाकार रमेश गौड़ आदि‍ थे। पि‍ताजी ने मेरी ड्यूटी लगा दी इन्‍हें पैदल मंसूरी यात्रा करवाने की। झाड़ीपानी पहुंचने पर पहाड़ और सड़क के कि‍नारे बर्फ दि‍खने लगी थी। सभी पुलकि‍त थे। वहां चाय पी और गुड़ खरीदा। छोटे से पहाड़ी रास्‍ते की घुमावदार सड़कें कुछ देर बाद बर्फ से ढकीं मि‍लीं। गुड़ और ताजी बर्फ खाते हुए आगे नि‍कल पडे़। नीचे के रास्‍ते को इंगि‍त करके ऊपर चल रहे लोगों ने रमानाथ जी का गीत गुनगुनाया था। धीरे-धीरे चलते हुए बर्फ हमारा साथ दे रही थी। पि‍क्‍चर पैलेस मंसूरी से पहले बार्लोगंज में आधे घंटे बैठे। वहां सैलानि‍यों के हि‍मपात और स्‍थानीय लोगों के हि‍मपात में अन्‍तर समझ आया था। पि‍क्‍चर पैलेस पहुंचने से पहले सीढ़ि‍यों, छतों, पेडों की पत्‍ति‍यों से बर्फ झड़ रही थी। मोड़ों के साथ धूप आती और फि‍र पहाड़ी के पीछे छि‍प जाती।

बहुत सालों बाद दि‍ल्‍ली में आकाशवाणी के लि‍ए रि‍कार्डिंग के सि‍लसि‍ले में गया तो वहां वि‍वि‍ध भारती के प्रोडयूसर के रूप में रमानाथ अवस्‍थी मि‍ले। यह 1971 की बात होगी। कवि‍ व रेडि‍यो नाटकों के प्रख्‍यात अभि‍नेता देवराज दि‍नेश से परि‍चय कराया तो अवस्‍थी जी बोले, ‘‘अतुल, तुम्‍हारे साथ पैदल मंसूरी चढ़ गये थे। वहां से लाये छोटे-छोटे पत्‍थर आज भी मेरे बगीचे के पेड के नीचे रखे हैं।’’

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रातभर बर्फ पड़ी। जब मैं सो रहा था, मुझे बर्फ के कई रंग याद आने लगे। सुबह मुझे याद आया कि‍ एक दूसरी मंसूरी हि‍मपात यात्रा में मैं घनश्‍याम रतूड़ी़ सैलानी के साथ चल रहा था। सैलानी ने प्रसि‍द्ध चि‍पको आन्‍दोलन में जनजागरण का नब्‍बे प्रति‍शत कार्य अपने गीतों से कि‍या था। मुझे इस सूनी सड़क के कि‍नारे चलते हुए एक अंग्रेज दि‍खाई दि‍या। वह अपनी मस्‍ती में चल रहा था। मैंने बर्फ का गोला बनाया और उसकी पीठ पर दे मारा। उसकी कोई प्रति‍क्रि‍या नहीं थी। वह सड़क कि‍नारे खड़ा हो गया। हम लोगों को उसके पास से नि‍कलना पड़ा। वह कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद अंग्रेज पीछे था और हम आगे। एकाएक सोच की चुप्‍पी तोड़ते हुए एक बर्फ का गोला मेरी गर्दन से होते हुए बनि‍यान में घूस गया। अंग्रेज ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘दि‍स इज दे वे। इन्‍जॉय द स्‍नोफॉल।’’ उसने हमसे हाथ मि‍लाया और यह कहकर पगडंडी में गुम हो गया- ‘‘आई एम रस्‍कि‍न बॉंड।’’

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मंसूरी की पैदल यात्रा रेखा, रंजना, रीता, वि‍क्‍की, बेबी, अलका और कथाकार भीमसेन त्‍यागी (जि‍न्‍हें हम अंकल कहते थे) के साथ हुई। ये यात्रा बड़ी गुमसुम चल रही थी। त्‍यागी जी के लतीफे-ठहाके गुंजते। बर्फ के गोले मारने का खेल शुरू नहीं हुआ था। सब त्‍यागी अंकल से संकोच कर रहे थे। बच्‍चों के साथ बच्‍चा बनने का हुनर उनके पास था। एकाएक बर्फ के गोले मारने की शुरुआत त्‍यागी जी ने कर दी। फिर जो बर्फ के गोलों की भरमार हुई, उससे आसपास के पर्यटक भी अछूते नहीं रहे। हमारा काफि‍ला और बड़ा हो गया। पीछे-पीछे बच्‍चों की फौज और आगे-आगे बर्फ का गोला उछालते त्‍यागी अंकल चल रहे थे।

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यह आन्‍दोलन के दि‍न थे। उत्‍तराखंड आन्‍दोलन में 100 दि‍न तक उत्‍तरकाशी में कलादर्पण संस्‍था ने प्रभातफेरि‍यां नि‍कालीं। सर्दियों में गि‍रती हुई बर्फ में मेरा गीत गाती हुई टोली पारम्‍परि‍क ढोल दमाऊ के साथ सुबह नि‍कल जाती- ‘वि‍कास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्‍यों/नदी पास है मगर ये पानी से दूर-दूर क्‍यों।’ 0बर्फ पड़ती रहती और आन्‍दोलन की आग भड़कती रहती।

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कल रात पड़ी बर्फ पूरे गढ़वाल-कुमाऊं के ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ढक गई। कढ़की में ऐसी ही एक सर्द मौसम में डॉक्‍टर कौशि‍क, डॉक्‍टर मधुसूदन कम्‍बल लेकर नि‍कल पडे़ और रात ग्‍यारह बजे ठि‍ठुरती ठंड में फुटपाथों, स्‍टेशनों और दुकानों के बंद शटर के बाहर बि‍ना कम्‍बल के सोते हुए लोगों को कम्‍बल उढ़ाते हुए नि‍कल पडे़। सुबह उठकर जि‍सने कम्‍बल देखा होगा, उसे पता ही नहीं होगा कि‍ उसे ये गर्माहट कि‍सने दी।

नया साल मुबारक : भीमसेन त्‍यागी

वरि‍ष्‍ठ कथाकार भीमसेन त्‍यागी का यह व्‍यंग्‍य नूतन सवेरा के जनवरी, 1997 अंक में प्रकाशि‍त हुआ था।  उस समय त्‍यागीजी ने जो शंकाएं प्रकट की थीं, दुर्भाग्‍यवश वे और भी भीषण रूप में सामने है-

नया साल करीब आ रहा है और मेरी डाक में रंग-बिरंगे, खुशबूदार बधाई कार्डों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन कार्डों में फूल हैं, पत्ते हैं, चिडिय़ा हैं, सुख-समृद्घि की शुभकामनाएँ हैं। मैं इन पत्रों को पढ़ता हूँ और दु:खी हो जाता हूँ। आश्‍चर्य है- इस प्रदूषित राजनैतिक माहौल में लोग खुशियों को मन के किस कोने में छिपाकर रखते हैं!
नये साल के शुभ अवसर पर आप मेरी बधाई स्वीकार करें। यह वर्ष निरंतर आपत्तियों और आशंकाओं से भरा रहे। केन्द्र और राज्यों में फिर चुनाव हों। लेकिन सरकार कहीं भी न बन सके। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पदों के लिए बराबर खींचतान चलती रहे। हम लोकतंत्र का असली मजा चखते रहें।
भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमें चलते रहें। जिन नेताओं का नकाब अभी तक नहीं उठा है, उनका भी उठ जाए। सब सुखी हो जाएं। तिहाड़ जेल संसद भवन बन जाए। जय ललिता के घर से एक टन सोना और एक लाख जूते बरामद हों, ताकि देश अपनी समृद्घि पर गर्व कर सके! जो नेता भ्रष्ट सिद्घ हो जाएं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हो और जो अभी तक भ्रष्ट नहीं हुए हों, उन पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चलाए जाएं।
राजनैतिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ सांस्कृतिक भ्रष्टाचार का भी विकास हो। सभी संस्कृतिकर्मी राजनेताओं के पिछलग्गू बन जाएं। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में गोते लगाएं और मानद पदों के ऊँचे सिंहासन प्राप्त करें। जो इनाम पाकर भी सरकार को गाली देने का दु:साहस करें, उन्हें उनकी औकात बता दी जाए।
केन्द्र और राज्यों में कहीं सरकार हो तो उनका संचालन पार्टी प्रमुखों के रिमोट कंट्रोल से हो। राजनैतिक पार्टियों की अपनी-अपनी सेनाएं हों। तमाम गुण्डे उन सेनाओं के नायक हों। शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक न्याय दिलाने का काम उनके जिम्मे हो।
कोई किसी भले आदमी के मकान में लम्बे अर्से से रह रहा हो और सिर्फ किराया देकर मकान में जमें रहना चाहता हो तो नायक धमकी के बल पर मकान खाली करवा कर बेचारे मकान मालिक को सामाजिक न्याय दिलवायें। किरायेदार नायकों को धमकी में न आए तो वे प्रेमपूर्वक हत्या करके उसे तमाम दु:खों से मुक्त कर दें। पत्रकार ऐसे कल्याणकारी कामों का विरोध करें तो उनकी जम कर ठुकायी हो और समाचार पत्रों के खिलाफ धर्मयुद्घ घोषित कर उनके दफ्तरों पर हमले किए जाएं।
नये साल में राजनेताओं और धर्मगुरूओं क संबंध प्रगाढ़ हों। वे मिलजुल कर घोटाला उद्योग का विकास करें। कोई सिरफिरा लक्खूभाई उन्हे मुकदमें में फंसाकर तिहाड़ भिजवा दे तो वे एक दूसरे के आंसू पोंछ कर आध्यात्मिक सुख प्राप्त करें।
देश में भीषण बाढ़ आए और अकाल पड़ें। नेता हेलिकॉप्टरों में बैठ कर त्रस्त इलाकों का दौरा करें और उनकी मदद के लिए मोटी-मोटी रकम मंजूर कराएं !
पुलिस के उच्च अधिकारी सुदंर महिलाओं की लिस्ट बनाएं और निर्भीक होकर एक-एक के साथ छेडख़ानी करें।
अति-अति महत्वपूर्ण दो प्रतिशत लोगों की भाषा हिं‍गलीश को देखकर देश की राष्ट्रभाषा घोषित की जाय। हिन्दी तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं में काम करने और बोलने को अपराध माना जाय!
नये साल में फिल्मी तारों और तारिकाओं के यहां बड़े-बड़े छापे पड़ें, ताकि उनके स्टेटस और काम करने के पारिश्रमिक की दरों में बृद्घि हो।
माइकेल जैक्सन बार-बार हमारे देश में आएं और फूहड़ भांड संस्कृति को स्थापित करें। वह ज्यादा से ज्यादा भारतीय लड़कियों के साथ नाचें, ताकि वे नहाना-धोना बंद कर दें और इस तरह जो पानी बचे, उससे कुछ प्यासों की प्यास बुझायी जा सके!
हमारे तमाम बेहतरीन खिलाड़ी खूबसूरत माडलों और एक्ट्रेसों से शादी कर लें और खेल के मैदान में दूसरों को जीतने का मौका देकर अपनी उदारता का परिचय दें!
देश में अंतर्राष्टरीय सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन हो और फिर मुहल्ले-मुहल्ले में वैसी प्रतियोगिताएं होती रहें! तमाम खूबसूरत लड़कियां कपड़ों में से निकल कर फ्लोर पर आ जाएं और दर्शकों की आंखों की सिकाई करती रहें।
भूमंडलीकरण और नयी आर्थिक नीति का खुल कर विस्तार हो। देश में बहुराष्टरीय कंपनियों की बाढ़ आ जाए। बाजार बिदेशी माल से पटे रहें। विज्ञापन का जादम लोगों में अंतराष्ट्रीय स्तर की विदेशी चीजें इस्तेमाल करने का उन्माद जगाए। देशी कारखाने एक-एक कर बंद होते रहें। मुल्क में बेरोजगारी बढ़े। नौजवानों को भरपूर आराम और मनोरंजन के अवसर मिलें।
देश में विदेशी टी.वी. चैनलों की भरमार हो! वे टी.वी. चैनल देशी भगवान को बेच कर खाते रहें। ज्यादा से ज्यादा सैक्स और अपराध परोसें! बेडरूम सिमटकर टी.वी. के स्क्रीन पर आ जाए। अवैध संबंधों और बलात्कारों में उफान आए। फैशन की मारी अधनंगी समाजसेविकाएं बलात्कार के विरूद्घ प्रदर्शन करती रहें !
गली-गली में बीयर बार खुले। घी-दूध की तमाम नदियां सूख जाएं और उनमें शराब उफन-उफन कर बहे। सुदंर बार-बालाएं अपने ग्राहकों का हर तरह से मनोरंजन करती रहें।
हम गरीबी, बेरोजगारी और भूखमरी का ताज पहन कर शान के साथ इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करें।
नया साल आपके लिए छोटी-छोटी खुशियां और बड़े-बड़े गम लेकर आए।

साहित्य में पुलिस जैसी भूमिका है आलोचक की : भीमसेन त्‍यागी

सातवें दशक के चर्चित कथाकार भीमसेन त्‍यागी का जन्‍म 19 सि‍तंबर, 1935 को जरवल (बहराइच) में हुआ। उनका बचपन पश्‍चि‍म उत्‍तर प्रदेश के बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में बीता और वहीं प्रारंभि‍क शि‍क्षा हुई। वि‍द्यार्थी जीवन में नि‍र्माण साप्‍ताहि‍क पत्र नि‍काला। तब से ही राष्‍टी्य स्‍तर की प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में रचनाएं प्रकाशि‍त होने लगीं। ’नया जीवन’, ‘सरि‍ता’, ‘मुक्‍ता’ आदि‍ पत्रि‍काओं के संपादकीय वि‍भाग में कार्य कि‍या। ‘नीहारि‍का’ कथा मासि‍क और हिंद पाकेट बुक्‍स के संपादक रहे। ‘जी टेलि‍फि‍ल्‍मस’ में कार्यक्रम परामर्शदाता के पद पर भी कार्य कि‍या। जमीन, नंगा शहर, वर्जित फल, काला गुलाब (उपन्‍यास), जबान, दीवारें ही दीवारें, कमजोर प्‍यार की कहानि‍यां (कहानी संग्रह) और आदमी से आदमी तक (शब्‍द चि‍त्र) उनकी प्रमुख कि‍ताबें हैं। इनके अलावा त्रैमासि‍क पत्रि‍का भारतीय लेखक का संपादन व प्रकाशन। अजीव संयोग है कि‍ उनका देहांत 19 सि‍तंबर (वर्ष 2006) को जन्‍मदि‍न वाले दि‍न हुआ। उनसे यह बातचीत 3 जनवरी, 2002 को की गई थी-

लेखन की तरफ आपका रुझान कब और कैसे हुआ?

लेखन की तरफ आने का निर्णय मेरा चुनाव नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य था। बचपन गांव और कस्बे के मिले-जुले परिवेश में बीता। वहां खुला जीवन था। उससे भी खुली थी प्रकृति। याद आता है कि पहली रचना सरसों के खेत की मेढ़ पर बैठकर सरसों के ही बारे में लिखी थी। उस कविता का अब एक शब्द भी याद नहीं है, लेकिन उसके साथ जो सृजन का थ्रिल था, वह आज भी जस-का-तस मौजूद है। इसके अतिरिक्त कस्बे के जीवन में एक-दो किस्सागो थे, जो राजा-रानी, परियों की कथाओं का वाचन करते थे। बीस-तीस श्रोता देर रात तक एकाग्र होकर सुनते थे। उन श्रोताओं में आठ-दस साल की उम्र का सबसे छोटा श्रोता मैं होता था। उन कहानियों में ऐसी पकड़ बल्कि जकड़ थी जो श्रोताओं को बांधे रखती थी। बाद में आधुनिक कहानियों से परिचय हुआ तो वे भिन्न स्वाद की अच्छी रचनाएं लगीं, लेकिन मन उन्हें कहानी स्वीकार करने को तैयार नही था, क्योंकि कहानी का जो स्वरूप व संवेदना उन किस्सों के माध्यम से मन में अंकित हो गई थी, आधुनिक कहानी उनसे एकदम भिन्न थी।

धीरे-धीरे साहित्य के प्रति रुचि बढ़ती गई और एक दिन पाया कि मैं पठन-पाठन और लेखन के अतिरिक्त और कुछ भी करने के  योग्य नही हूं। मजबूरी में लेखन से जुड़ी पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में स्वीकार किया। वह भी बहुत दिन नहीं चल पाया।

कथ्य और शिल्प में महत्वपूर्ण कौन है?

कथ्य और शिल्प को अलग-अलग करके नहीं आंका जा सकता। हर रचना अपने शिल्प का स्वयं निर्माण करती है। यदि कथ्य के अनुरूप शिल्प नहीं उगता, वह रचना के साथ एकमेएक होकर नहीं आता, तो संपूर्ण रचना नहीं बन पाती। रचना में कथ्य महत्वपूर्ण है तो शिल्प स्वत: महत्वपूर्ण होगा और यदि कथ्य ही महत्वपूर्ण नहीं है तो शिल्प का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

विभिन्न गुटों व आंदोलनों का साहित्य में क्या योगदान रहा है?

दूसरे आंदोलनों की तरह साहित्य में भी आंदोलनों की भूमिका नकारात्मक और सकारात्मक दोनों रही है। आंदोलनों ने वैचारिक धरातल पर समसामयिक सोच को प्रभावित किया और साहित्य में एक सार्थक भूमिका निभाई है। इसके विपरीत आंदोलन व्यक्तिगत गुटबाजी, स्वीकृति की प्यास और दूसरों को टंगड़ी मारकर आगे निकल जाने की अंधी दौड़ का कारण भी बने।

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और प्रसाद के विवाद से शुरू होकर छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और आज के अनेक वाद-विवादों में आंदोलनों की नकारात्मक भूमिका देखी जा सकती है।

प्रगतिवाद ने जहां एक तरफ यथार्थवाद और जनोन्मुख सोच को अभिव्यक्ति दी, वहीं साहित्य में कट्टरता और नारेबाजी को स्थापित किया। इसमें साहित्य और समाज का हित होने के साथ-साथ अहित भी कम नहीं हुआ।

उसके बाद के आंदोलनों में भी यह प्रक्रिया दोहराई जाती रही। असल में साहित्यकार को समाज तथा राजनीति के प्रति सचेत और सजग जरूर होना चाहिए, लेकिन किसी वाद से बंधकर रहना उसकी प्रगति में साधक नहीं, बाधक ही सिद्घ होगा।

साहित्यिक आंदोलनों के पीछे राजनीतिक दलों का दबाव रहा है। राजनीतिक दल जिस तरह श्रमिकों, महिलाओं, युवकों के मोर्चे खोलते हैं, उसी तरह साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी दखल रखना चाहते हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों के साहित्यिक संगठन हैं। वे उनके माध्यम से अपनी राजनीति का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन साहित्यकार राजनीतिक दलों के आपसी वैमनस्य और खींचतान से ऊपर होता है। वह उनसे मार्गदर्शन लेने की बजाए उनकी आलोचना करता है।

चीनी क्रांति के दौरान क्वाओ-मो-जो बहुत महत्वपूर्ण चीनी लेखक थे। वह राजनीति में भी सक्रिय थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माउत्से तुंग ने उनसे पार्टी का वायस-चेयरमैन बनने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि मैं लेखक पहले हूं, पार्टी का कार्यकर्ता बाद में। पार्टी का पद ग्रहण करने का मतलब पार्टी के अनुशासन में रहना और पार्टी के निर्णयों को जस-का-तस स्वीकार करना है। मैं एक लेखक की हैसियत से आलोचना के अपने अधिकार को नहीं खोना चाहता। वह आजीवन पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे, लेकिन कभी भी पार्टी का पद ग्रहण नहीं किया।

हिंदी साहित्य में ग्रामकथा और नगरकथा का विवाद पुराना है। आप इनमें से किसे महत्वपूर्ण समझते हैं?

महत्वपूर्ण विवाद नहीं, लेखन होता है। नगरकथा के लेखकों में भी कुछ का लेखन महत्वपूर्ण है। हिंदी साहित्य की ट्रेजडी यह है कि इसके अधिकांश लेखक शहरी मध्यमवर्ग से आते हैं। जबकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांव में है। यही आबादी असली भारत है।

प्रेमचंद हिंदी के पहले महत्वपूर्ण ग्राम-कथाकार हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन की दरिद्रता, सरलता और साथ ही कांइयापन सहज और सरल रूप में प्रकट हुआ है। प्रेमचंद के पास शिल्प का चमत्कार नहीं, लेकिन उनकी सरलता में ही शिल्प का सर्वोत्तम रूप मिलता है। उनके यहां शिल्प आरोपित नहीं, बल्कि सहज प्रस्फुटित है।

प्रेमचंद के देहावसान के पश्‍चात कथा के रथ की बागडोर जिनके हाथों में आई, वे गांव के नहीं, शहरी मध्यमवर्ग के लेखक थे। जैनेंद्र, अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी जैसे व्यक्तिवादी लेखकों के सामने प्रेमचंद एक पहाड़ की तरह खड़े थे। उसे लांघे बिना वे अपना मार्ग नहीं बना सकते थे। प्रेमचंद को लांघना कठिन था। इसलिए उपरोक्त लेखकों ने उस पहाड़ को छोटा बनाने की प्र्रक्रिया शुरू कर दी। प्रेमचंद पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए। वह कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा-से-ज्यादा उन्हें समाज सुधारक कहा जा सकता है लेखक तो कतई नहीं।

प्रेमचंद-निंदा की यह प्रक्रिया कई वर्ष चलती रही और पाठकों में प्रेमचंद का प्रभाव गिरता-बढ़ता रहा। प्रेमचंद के निधन के करीब 18 वर्ष बाद ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन हिंदी साहित्य की एक विस्फोटक घटना थी। फणीश्‍वरनाथ रेणु के माध्यम से कथा-प्रवाह एक बार फिर असली भारत की ओर मुड़ा। रेणु के साथ प्रेमचंद पर नए सिरे से गंभीर चर्चा शुरू हुई और उनका महत्व निरंतर बढ़ता गया।

साहित्य जगत में अश्‍लीलता को लेकर कई बार विवाद उठे हैं। श्‍लील और अश्‍लील के बारे में आपका क्या मत हैं?

अश्‍लीलता का प्रश्‍न उतना ही पुराना है, जितना स्वयं साहित्य। वास्तव में अश्‍लीलता साहित्य में नहीं बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में हो सकती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्‍लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करनेवाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का ‘यामा-द-पिट’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष संबधों का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में है वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवेदना ‘यामा-द-पिट’ में है, वह उसे विश्‍व के श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।

गोर्की की कहानी ‘एक इंसान का जन्म’ में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए भी कहीं अश्‍लीलता अनुभव नहीं करता।

जगदम्बाप्रसाद दीक्षित की कहानी ‘जिंदगी और गदंगी’ में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्‍लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदु नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता ही है।

साहित्यिक पुरस्कार देने में राजनीति होती है। इससे आप कहां तक सहमत हैं?

पुरस्कारों में राजनीति का दखल होता है, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। नोबेल पुरस्कार से लेकर ज्ञानपीठ और दूसरे देसी पुरस्कारों तक में बार-बार सामने आया है कि उनके पीछे एक निश्‍चि‍त विचारधारा को पुरस्कृत करना और निहित स्वार्थों की पूर्ति करना होता है।

सर्वाधिक कु चर्चित नोबेल के बारे में मान्य सत्य है कि वामपंथी विचारधारा के महानतम लेखकों को यह पुरस्कार नहीं मिला। इन लेखकों में गोर्की, चेखव, दोस्तोवस्की जैसे लेखक भी हैं जो अनेक नोबेल पुरस्कार विजेताओं और स्वयं नोबेल पुरस्कारों से भी भारी पड़ते हैं।

रूसी लेखकों में तोल्सतोय जैसे महान लेखक की भी उपेक्षा की गई। इसके विपरीत कई दहाई ऐसे लेखकों को पुरस्कार दिए गए जिनका आज कोई नाम भी नहीं लेता।

भारतीय परिपे्रक्ष्य में केवल रवीन्द्रनाथ टैगोर को और अब अर्धभारतीय नायपाल को इस पुरस्कार से नवाजा गया, जबकि इसी दौर के शरत, प्रेमचंद, मंटो और तकषि शिवशंकर पिल्लै जैसे महान भारतीय लेखकों, जिनका योगदान रवीन्द्रनाथ टैगोर से अधिक ही है, को यह पुरस्कार नहीं मिला। कारण- रवीन्द्रनाथ का विराट जनसंपर्क और उनकी ऋषितुल्य वेशभूषा का प्रदर्शन था।

नोबेल के अतिरिक्त भारतीय पुरस्कारों में भी यही रणनीति और कूटनीति काम करती रही है। अशोक वाजपेयी और सामान्य कोटि के कवियों को बड़े-से-बड़े पुरस्कार मिलते हैं और उनके समकालीन निश्‍चि‍त रूप से अधिक महत्वपूर्ण रचनाकार उपेक्षित रह जाते हैं।

असल में जो रचनाकार सही मायनों में रचनाकार हैं, उन्हें पुरस्कारों की अपेक्षा नहीं, उपेक्षा करनी चाहिए। वास्तविक पुरस्कारदाता पाठक होता है। पाठक जिसे स्वीकार कर ले, वही सच्चा लेखक है और पाठक का प्यार ही सच्चा पुरस्कार है।

हिंदी साहित्य के पांच महान साहित्यकार?

पांच नाम लेना कठिन है। फिर भी हिंदी के महान साहित्यकारों में प्रेमचंद, यशपाल, निराला, रेणु, नागार्जुन, मुक्तिबोध हैं।

किन लेखकों ने आपको प्रभावित किया?

उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त तोल्सतोय, चेखव, गोर्की, मोपासां, लू-शुन, कामू, हेमिंग्वे, कालिन विल्सन आदि ने किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया।

साहित्य में आलोचक की क्या भूमिका है?

साहित्य में आलोचक की वही भूमिका है, जो समाज में पुलिस की।