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भीमसेन त्यागी की कविताएं

कथाकार भीमसेन त्यागी प्रफुल्ल मुद्रा में पत्नी बाला त्यागी के साथ

कथाकार भीमसेन त्यागी का 19 सितंबर को जन्मदिवस है। अजीब इत्तेफाक है कि इसी दिन उनकी पुण्यतिथि भी है। उन्होंने बहुत अच्छे गीत और कविताएं लिखी हैं, लेकिन यह बात उनके निकटतम मित्रों में से भी बहुत कम लोग जानते हैं। उनकी कुछ कविताएं और गीत-

स्वागत गीत

प्राण  लगा  चंदा  की  बेंदी औ  तारों की वरमाला ले
 रात  चांदनी-सी  तुम आई!
 मन  होता  अपनी  कमजोरी  जाहिर कर दूं
 अपने  पापों  की  सब  सूची सम्मुख धर दूं
 लेकिन  तेरे  स्वप्न-जाल  की डोर  न टूटे
 सुख  का  यह साम्राज्य न  इतनी जल्दी छूटे
दुख कह देने का सुख पाऊं या सुख हरने का दुख पाऊं
 सोच-सोच  चेतना  गंवाई!

 नए-नए नित स्वप्न जुगाना तो अपन में बात बड़ी है
 इन सपनों के ऊपर ही तो संसृति की मीनार खड़ी है
 लेकिन महल रहे जो कल तक औ, अब गिरकर टूट चुके हैं
 याद कभी उनकी कर लेना पाप नहीं जो छूट चुके हैं
 मैंने मुड़कर देखा ही है अपने पिछले जीवन-पथ को
 तुम क्यों पगली-सी भरमाई!

 भला-बुरा जैसा जो कुछ कर कह आए हम
 सुख-दुख हर्ष-विषाद सभी जो सह आए हम
 भला यही अब उसको भूलें खुद को जानें
 आगे  जो  कुछ  करना  है उसको पहचानें
बहुत बार सोचा था मन ने, लेकिन कांप गया यह उस दिन
 जब उदासियां तुम पर छाईं!

गीत दर्द का होगा गाया

आज सांझ से ही ऐसा लगता है
जैसे चांद सलोना
बाद युगों के नभ में आया!

मेरा मन कुछ घबराया-घबराया-सा  है
लेकिन  घबराने  जैसी कुछ बात नहीं है
खिली  हुई  है यहां चांदनी पीली-पीली
नभ में काली रात नहीं है
काली  रात नहीं लेकिन लगता है मुझको
जैसे लखकर यह जहरीला चांद गगन में
तुमने  कोई  गीत  दर्द  का  होगा गाया!

आकर्षण की मदिरा पी तारों की टोली
नभ के आंगन में मस्ती से नाच रही है
आया  बासंती  बयार  का  पहला झोंका
सरिता नए प्यार की गीता बांच रही है
सरिता नए प्यार की गीता बांच रही औ
हम-तुम कितनी दूर सुनयने?
आज सोच यह, मेरा मन भर-भरकर आया!

विष के बदले चंदन बेच दिया

अब काया का मोह नहीं, यह चाहे जिस वन में भटके
पापों के व्यापारी को जब, मन का कंगन बेच दिया

अनचाहे सुख का जीवन, कितनी हसीन लाचारी था
क्या कह दूं, किससे कह दूं, यह सागर कितना खारी था
मत आंजो तुम आंख, मांग में मत सुहाग सिंदूर भरो
निर्जनता के बदले बांहों का मृदु बंधन बेच दिया

अपमानों का गदला पानी पी जीवन की बेल बढ़ी
और इसे था गर्व कि कितने-कितने ऊंचे शिखर चढ़ी
लेकिन क्षमा करो, मुझको मुरझाने दो, मिट जाने दो
दुख की पूंजी के बदले में सुख का क्रंदन बेच दिया

क्षण-क्षण पल-पल पर कड़वी दुविधा ने डेरा डाला था
मैं मकड़ी था और मुझे घेरे खुद मेरा जाला था
ऐसी हूक उठी मन में, रग-रग में ऐसा दर्द जगा
मैंने अभिशापों के बदले युग का वंदन बेच दिया

जिसको जीवन कहा मौत के घर की वह पगडंडी थी
आईं सांसें चार एक से एक अधिक ही ठंडी थी
और आज जब छोर पांव के नीचे सोच रहा हूं मैं
अब चलना कैसा जब विष के बदले चंदन बेच दिया

दे रहे तुम कसम

हम  सुनाते  रहे
तुम  छुपाते  रहे
  पीर फिर भी तुम्हारी
      मगर जान ली!

हारते  तुम  गए
जीतते  हम  गए
 जीत फिर भी तुम्हारी
       मगर मान ली!

दे रहे तुम कसम
है  पुरानी  रसम
 बात फिर भी तुम्हारी
       मगर मान ली!

शांति के कबूतर

विश्व शांति सम्मेलन में
उड़ाए गए कबूतर
उन्होंने शांति का संदेश
युद्ध के हैवानों तक पहुंचाया
और जब
वे लौटकर आए
तो कर दिए गए जिबह
पकाए गए देग में
शांति के पुजारियों ने
मनाया जश्न
छककर लिया महाभोज का मज़्ाा
कबूतर का मांस लजीज़्ा होता है
और
शांतिदूत कबूतर का मांस
कुछ ज्यादा ही लजीज्

गाजियाबाद में काव्य गोष्ठी 19 को

गाजियाबाद: लिखावट की ओर से घर-घर कविता के तहत 19 सितंबर को शाम पांच बजे डी-106, सैक्टर-9, न्यू विजय नगर, गाजियाबाद में सामूहिक कविता पाठ का आयोजन किया जा रहा है। वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, मिथिलेश श्रीवास्तव, आर. चेतनक्रांति, विनीत तिवारी और रंजीत वर्मा काव्य पाठ करेंगे। आयोजन श्रीमति प्रोमिला देवी माथुर की स्मृति को समर्पित है।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार भीमसेन त्यागी की स्मृति में लेखक-प्रकाशक मोहन गुप्त का संस्मरण पाठ व गिरीश चंद तिवाडी गिर्दा की स्मृति में सुश्री जया मेहता व अनुराग द्वारा उनकी कविताओं का पाठ भी किया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मिथिलेश श्रीवास्तव करेंगे। विस्तृत जानकारी के लिए मेजबानी कर रहे हैं पत्रकार संजीव माथुर से 9911646458 पर संपर्क कर सकते हैं।

एक और विदा : भीमसेन त्यागी

 पिता-पुत्र संबंधों को लेकर कथाकार भीमसेन त्यागी की कहानी-

कमरे की पिछली दीवार की खिड़की तीसरे नेत्र की तरह खुली है। उसमें से आती रोशनी की बरछी बाबूजी के माथे को काटती, उनके और मेरे बीच फर्श पर आकर ठिठक गई है।
बाबूजी कसमसाकर करवट बदलते हैं और बिस्तर पर ऐसे हाथ फेरते हैं जैसे उसकी खाज मिटा रहे हों। शायद दरी में कोई सलवट उभर आई है। हाथ फेरने से सलवट निकल नहीं पाती। वे फिर उसी तरह लेट जाते हैं।
दूर से रेल के इंजन की धड़धड़ाहट सुनाई देती है। फिर एक लंबी सीटी-हू-हू-ऊ-ऊ-ऊ…
बाबूजी अक्सर चले जाने की बात कहते थे। मैं टाल जाता। लेकिन अब टालने की स्थिति टल चुकी थी। वे दिनभर अपने थोड़े से सामान को ट्रंक में लगाते रहे थे, टीन की जेब में खुंसे पुराने पोस्टकार्डों को निकालकर, फिर से पढ़-पढ़कर फाड़ते रहे थे। अब उनका जाना निश्चित था, ठीक वैसे ही जैसे एक दिन कांता का जाना निश्चित हो गया था…
सामने जिस चारपाई पर इस समय बाबूजी लेटे हैं, उस पर कांता की अम्मा बैठी थीं। उन्होंने साफ-साफ कहा था, ”बेटा अजीत, हमें तुमसे बड़ी-बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन तुमने सब पर पानी फेर दिया। अब हम किसी भी कीमत पर कांता को यहां नहीं छोड़ सकते!”
कांता के चले जाने- हमेशा-हमेशा के लिए चले जाने की सूचना मैंने बाबूजी को भेज दी थी और लिख दिया था,  ‘अब आप दिल्ली चले ही आइए। मुझे अच्छा नहीं लगता कि आप वहां अकेले रहें और इस उम्र में नौकरी करें।’

बाबूजी कस्बे के पुश्तैनी मकान में अकेले रहते थे। वह मकान बड़ी बहन की शादी में रहन रख दिया गया था। तब से लाख कोशिशों के बावजूद छुड़ाने का जुगाड़ नहीं भिड़ पाया था। लाख कोशिशों में सबसे बड़ी यह थी कि बाबूजी कचहरी की मुंशीगिरी से रिटायर होने के बाद, पैंसठ की उम्र में साठ रुपये महीना पर आटा पीसने की एक चक्की पर नौकरी करते थे। दिन-भर दस-दस, पंद्रह-पंद्रह किलो के हाड़े तोलना। बड़ा हाड़ा तोलते हुए एक बार पैर पर मना गिर गया था। पुरवा हवा चलती है तो अब भी उस पैर में दर्द होता है…
कई तरह के कई दर्द हैं, जो बाबूजी के तन-मन में रमे हैं। मां उस समय विदा हो गई थी, जब बाबूजी की मूंछ का एक बाल भी सफेद नहीं हुआ था। यह दर्द, उनका सबसे बड़ा दर्द है। दूसरा दर्द अंग्रेज के विदा हो जाने का है। वे बड़ी तड़प के साथ कहते हैं, ”अंग्रेज…अरे, जवाब नीं उसका! क्या आला हाक्कम होवैं थे! और ये हैं थारे गांधिये! क्या खा कै राज करेंगे ये!”
उनका इकलौता बेटा नालायक है, यह बाबूजी का एक और बड़ा दर्द है!

कांता के चले जाने के बाद बाबूजी जंग खाया पुराना ट्रंक और फटी दरी में लिपटा, गंदा बिस्तर कंधे पर रखे आए तो मिसेज खन्ना सदर दरवाजे पर खड़ी थीं। मैंने आगे बढ़कर बाबूजी के पैर छुए और बिस्तर कंधे से उतार लिया।
बाबूजी ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया तो कोट की दोनों बांहों में से कोहनियां निकली हुई दिखाई दीं। यह वही पुराना कोट है, जिसे वे पिछले दस साल से पहन रहे हैं।
चरण छूकर सीधा खड़ा हुआ तो देखा, मिसेज खन्ना के मोटे होंठों पर एक अजीब किस्म की मुसकान है। उन्होंने मुसकान को और फैलाव देते हुए पूछा, ”योर फादर?”
उत्तर में मैं केवल स्वीकारात्मक गर्दन हिला सका।
वह अंदर आकर बैठे तो मैंने पूछा, ”नए कोट का क्या हुआ बाबूजी?”
”टिरंक में है। हर बखत पहरने के लियो थोड़ा ई है वो।”
अब मैं क्या कहता!
कुछ देर बाद कमला चाय ले आई।
”यो कोण है!” बाबू जी ने मेरे कान से मुंह सटाकर रहस्यात्मक ढंग से पूछा।
”खाना बनाती है।” सवाल का पूरा जवाब देने के बाद मुझे यह जोडऩा भी जरूरी लगा, ”बेचारी गरीब औरत है। कई बच्चे हैं।”
”नईं! यो नीं चलैगा, ” बाबूजी ने शब्दों से कम और मुख-मुद्रा से ज्यादा नाराजगी प्रकट की, ”हम रहैंगे तो इसकी क्या जरूरत? कह दै, कल सै अपणा कोई होर इंतजाम कर लै।”
मैंने बाबूजी से या कमला से कुछ नहीं कहा, लेकिन कहने की जरूरत भी क्या थी?

शाम को खाने के बाद बाबूजी ने मेरी चारपाई के बराबर कांता की चारपाई पर अपना बिस्तर फैला दिया- फटी हुई सलवटी दरी, दुतई का आधा टुकड़ा, उड़े हुए लाल रंग का गद्दा, बिना कवर का चीकट लिहाफ। वे अपने साथ जो संक्षिप्त-सा सामान लाए थे, उसमें डेढ़ बालिश्त का नारियल का हुक्का भी था। बिस्तर में बैठकर नारियल गुडग़ुड़ाते हुए उन्होंने पूछा, ”क्यूं बई, तिनखा कित्ती है तेरी, चार सौ?”
”जी!”
”किराया कित्ता जावै?”
”अस्सी।”
”गेहूं क्या भाव मिलैं ह्यां?”
”मालूम नहीं!”
”इतना बी मलूम नहीं! नूं ई तो नास हुआ इस घर का!”
मैं चुप रहा।
”अच्छा, दूध कित्ता लेवे करै?”
”एक किलो।”
”जियादा है। आधा किलो बहोत। घी कित्ता लग जावै?”
”मालूम नहीं, कांता ही लाती थी।”
”अर चिन्नी?”
”यह भी मालूम नहीं।”
”तुजै कुछ मलूम बी है?” बाबूजी ने झल्लाकर कहा, ”ऐसे घर में कुक्कर बरकत दिखाई दै! इत्ती रकम कमारा है, अर सारी की सारी फूंक दै। सुण लै, डेढ़ सौ से पाई उप्पर नीं खरच होणे की, हां-आं-आं!”
मैं चुप रहा और बाबूजी देर तक बचत के महत्व पर भाषण देते रहे। नारियल समर्थन में हुंकारे भरता रहा।
अगले दिन सुबह पांच बजे सोया पड़ा था कि किसी ने खटाक्-से लिहाफ का कोना पकड़कर उसे ऐसे खींच लिया जैसे केले का छिलका उतार दिया हो। मैं आंखें मलता हुआ उठा और आदत के अनुसार बड़-बड़ाया, ”बई, ऐसी भी क्या जल्दी है!”
”जल्दी?” बाबूजी ने खंखार कर उत्तर दिया, ”नूं ई तो तंदरुस्ती खराब होवै है! पड़ा रह दिन चढ़े लो!”
अब मुझे पता चला कि चाय लिए जो व्यक्ति सामने खड़ा है, वह कांता नहीं, बाबूजी हैं। हड़बड़ाकर उठा और चाय का प्याला उनके हाथ से थाम लिया।
प्याले में से आत्मग्लानि की एक अजीब गंध उठ रही थी। मां की बात याद आई- ”बेट्टे, बड़ा हो कै अपणे बाबूजी की खूब सेवा करियो, कबी बी उनका जी ना दुखाइयो!”
मैं बड़ा हो गया हूं। बाबूजी की उम्र सेवा कराने योग्य हो गई है। और बजाय इसके की मैं उनकी सेवा करू, वे मेरी सेवा कर रहे हैं…
”पित्ता क्यूं नीं!” बाबूजी ने कड़क आवाज में हुक्म दिया।
एक शब्द भी मेरे मुंह से नहीं चू सका। कुल्ला करके चुपचाप चाय पीने लगा।
कुछ देर बाद बाबूजी खाना बनाने में जुट गए। मैं हाथ बंटाने रसोई में पहुंचा तो उन्होंने प्यार से डांट दिया, ”जा, तू शेफ कर लै। दफ्तर कू देर हो जागी।”
शेव का सामान वे पहले ही मेज पर रख गए थे। मैं ब्रश पर क्रीम लगाकर दाढ़ी पर मलने लगा।
थोड़ी देर बाद रसोई में से आवाज आई, ”पानी गरम है, बई, नाह लै!”
बाथरूम में पहुंचा तो देखा- वहां गरम पानी की बाल्टी के अलावा साबुन, तौलिया, अंडरवीयर, बनियान सब उसी तरह रखे हैं, जैसे कांता रखा करती थी।
नहाने के बाद आईने के सामने खड़ा कंघी कर रहा था कि रसोईघर से बाबूजी आए। दोनों हाथ आटे में सने थे। दाएं हाथ के अंगूठे से बाएं की हथेली मलते हुए उन्होंने कहा, ”खाना त्यार है, बई!”
”अच्छा।” मैं फिर कंघी करने लगा।
कुछ देर बाद वे खाने की टे्र लिए कमरे में खड़े थे।
”रसोई में ही…” मैंने कहना चाहा, लेकिन तब तक उन्होंने टे्र मेज पर रख दी और प्यार-पगे कड़े स्वर में बोले, ”बैठ, खा!”
खाना खाते समय भी मुझे मां की याद आई, लेकिन कह कुछ नहीं सका।
शाम को दफ्तर से लौटा तो देखा- तार पर कपड़े सूख रहे हैं। छोटे कपड़े ही नहीं, परदे, बिस्तरों की चादरें और दुतई तक उनमें हैं। बाबूजी सहन में मूढ़ा डाले बैठे हैं और मजे से नारियल गुडग़ुड़ा रहे हैं।
”देखिए, मिस्टर शर्मा, बाबूजी ने कितने कपड़े धो डाले हैं!” मिसेज खन्ना ने सीढिय़ां उतरते हुए कहा। आज फिर उनके मोटे होंठों पर वही मुसकान थी।
”इतने कपड़े धोने की क्या जरूरत थी?” अंदर आकर मैंने बाबूजी से कहा, ”बड़े कपड़े तो कांता भी धोबी से धुलवाती थी।”
”जभी तो नास हुआ इस घर का!” बाबूजी नारियल गुडग़ुड़ाते हुए रसोईघर में चले गए।
मैं कपड़े बदलने लगा। तहमद बांधकर पलंग पर बैठा ही था कि वे चाय की टे्र लेकर आ पहुंचे। केतली के सूंड में से भाप निकल रही थी।
चाय के बाद सुबह के अधपढ़े अखबार को लेकर पलंग पर लेट गया। सिगरेट का पैकेट तो हाथ आ गया मगर माचिस…आवाज दी, ”अरे बई, माचिस दियो!”
”ले, बेट्टे!” बाबूजी सिरहाने खड़े माचिस खडख़ड़ा रहे थे।
”अरे!” मैंने चौंककर अखबार नीचे रख दिया। याद आया, मैंने माचिस मंगाने के लिए ऐसे आवाज दी थी जैसे कांता को दिया करता था। फिर याद आया : बाबूजी के सामने तो मैं सिगरेट पीता ही नहीं!
मैंने उनके हाथ से माचिस ले ली और एक सींक निकालकर कान कुरेदने लगा।
बाबूजी चुपचाप रसोई में चले गए।
फिर अखबार उठा लिया, लेकिन मन उसमें रम न सका। अनायास खयाल आया : बाबूजी ने एक ही दिन में घर को ठीक वैसे संभाल लिया है, जैसे कांता ने संभाल रखा था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब रसोई घर से चूडिय़ों के खनकने की आवाज नहीं आती…

आवाज आती है रेल के इंजन के घड़घड़ाने की…लंबी सीटी की आवाज…कांता के चले जाने की आवाज…बाबूजी के आने की आवाज…और अब फिर बाबूजी के लौट जाने की आवाज…
टं्रक में लगा सामान बाबूजी के सिरहाने रखा है। पुराने पोस्टकार्ड फाड़ डाले गए हैं। कमरे का तीसरा नेत्र खुला है। उसमें से आती रोशनी की बरछी बाबूजी के माथे को काटती, उनके और मेरे बीच फर्श पर आकर ठिठक गई है…
सामने की चारपाई पर सोए बाबूजी खर्राटे भर रहे हैं। मुंह आधा खुला है। छह दिन की बढ़ी सलेटी दाढ़ी रोशनी  की बरछी में चमक रही है। दाएं हाथ का खुश्क पंजा छाती पर फैला है। उंगलियों में नाखूनों के पास कच्चा आटा लगा है…
छुट्टी का दिन था। माधवन आया था। भाभी साथ थीं। मैं उलझन में पड़ गया। बाबूजी के रहते बाजार से चाय नहीं मंगाई जा सकती थी, न ही मैं बना सकता था। मेहमानों के सामने बाबूजी चाय बनाएं और मैं बैठा रहूं, यह भी बुरा लगता। तो फिर?
मैं सोच ही रहा था कि बाबूजी चुपचाप उठकर चले गए।
कुछ देर बाद वे चाय की ट्रे लिए कमरे में आए तो मुझे अपना ‘मैं’ चाय के प्याले में गिरी मक्खी सा लगने लगा।
”अरे! यह क्या तकल्लुफ किया आपने, बाबूजी!” माधवन बोला, ”चाय बनवानी ही होती तो गीता बना लेती। आपने क्यों तकलीफ की!”
”क्यूं? मैं रोज नीं बणात्ता!ÓÓ बाबूजी ने बेतकल्लुफी से जवाब दिया, ”जैसा यो अपणा बच्चा है, वैसे ई तम हो।”
खैर, वे बना ही लाए थे तो सबने एक-एक कप चाय ले ली।

बाबूजी के आने के बाद पहली तनख्वाह मिली तो मैंने लिफाफा ज्यों-का-त्यों उनके हाथ में थमा दिया। उन्होंने नोटों को चुचकारकर माथे से लगाया और मेरे सर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया।
उस रात देर तक वे घर के बजट के कोट को कतर-ब्योंतकर वास्केट बनाने की कोशिश करते रहे। बीच-बीच में मुझसे चीजों के भाव पूछते रहे। मैं संतोषजनक जवाब नहीं दे सका तो झल्लाते रहे।
”क्यूं बई, यो मकान बदल ना दैं?” बाबूजी ने चश्मा माथे पर चढ़ा कर मेरी तरफ घूरते हुए कहा, ”सव्हरा बोहत मंहगा है। कोई होर देख लै बीस-बाइस का।”
मैं कटकर रह गया। बड़ी मुश्किल से तो यह ढंग का मकान मिला है, इसे ही ये बदलवा रहे हैं!
अगले दिन दफ्तर जाने लगा तो जेब खाली थी। बाबूजी से कहा, ”कुछ पैसे दे दो।”
”कित्ते?”
”दे दो दस-पंद्रह।”
”क्या करैगा?”
”खर्च के लिए चाहिए न?”
”खर्च क्या, बस के लियो चहियें। बीड़ी-सिरकट तो तू पित्ता नीं!”
मन में आया कि कह दूं- पीता क्यों नहीं, लेकिन चुप खड़ा रहा।
बाबूजी ने अठन्नी निकालकर मेरी तरफ बढ़ाई। लगा, जैसे वे मुझे भीख दे रहे हों!
”इससे क्या होगा, कम से कम दस रुपए तो दो। पता नहीं कब पैसे की जरूरत पड़ जाए।”
”लै, चाहे सारे ले लै मेरी तरफ सै तो।” बाबूजी ने धोती की अंटी से निकालकर मुड़े हुए नोट मेरी तरफ बढ़ा दिए।
उन्हें रख लेना बाबूजी का अपमान होता। दस का एक नोट रखकर बाकी वापस लौटा दिए और ब्रीफ-केस उठाकर चुपचाप घर से बाहर हो गया।

शाम को देर से लौटा। बाबूजी बरामदे में चारपाई पर लेटे ऊंघ रहे थे। बूटों की आवाज सुनकर खड़े हो गए।
”टैम देखिए बई, क्या हो रा है?”
”साढ़े दस।”
”आणे की फुरसत मिल गी?”
मैं चुपचाप अंदर आकर कपड़े बदलने लगा।
”खाणा खावैगा?” बाबूजी ने पीछे-पीछे आकर पूछा।
सुबह के बाद खाना नहीं खाया था। आते समय बड़े जोर की भूख लग रही थी। लेकिन बाबूजी के प्रश्न ने पेट और मन पूरी तरह भर दिए। कपड़े बदलकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गया।
”क्यूं बई, खाणे की बता?”
”भूख नहीं है।”
”भूख नीं है?” प्रश्न-चिह्न का तिलक उनके माथे चढ़ गया।
”हां, नहीं है!”
”तो फेर हम बी नीं खात्ते?”
”अभी तक आपने नहीं खाया?”
”खात्ता कैसो? तू तो आया ई नीं था।”
”कितनी बार कहा है, आप खा लिया करें। मेरा तो ऐसा ही रहता है शाम को।”
”खा कैसो लिया करैं! जब लो तू टैम सै आणा सुरू नीं करै, मैं खाणै का नीं!”
बाबूजी रसोई में चले गए। मुझे खयाल आया- कितनी तकलीफ देता हूं मैं इस आदमी को! कल से टाइम पर आया करूंगा।
खाने के बाद बाबूजी ने नारियल भर लिया और लिहाफ में दुबककर गुडग़ुड़ाने लगे।
”ढाई सौ तो नीं, पर दो सौ जमा करा दिये हैं डाकखान्ने में,” बाबूजी ने ऐसे स्वर में कहा जैसे दो सौ सड़क पर पड़े मिल गए हों।
”जमा तो करा दिए,” मुझे कहना पड़ा, ”लेकिन महीना कैसे निकलेगा?”
”सब लिकड़ जागा, तू देखता जा!”

अगले दिन सुबह बाबूजी चाय लेकर आए तो साथ में अखबार नहीं था।
”अखबार वाला नहीं आया?”
”नईं! मन्नै कल उसै मना कर दिया था। खन्ना साब कै तो आवै ई है इकबार, मैं मांग लाया करूंगा।”
अब मेरी समझ में आया कि दो सौ में घर का खर्च  कैसे पूरा हो जाएगा।
तीसरे दिन दस रुपए खत्म हो गए। दफ्तर जाते समय बाबूजी से कहा, ”कुछ पैसे दे दो।”
”क्यूं?”
”जरूरत है।”
”वे खतम हो गिये?”
”खत्म हो गए तभी तो मांग रहा हूं।”
”खतम कैसो हो गिये…बीड़ी तू नीं पित्ता, सिरकट तू नीं पित्ता!”
मुझे मालूम था कि सुनकर बाबूजी को तकलीफ होगी, लेकिन कहे बिना रहा नहीं गया, ”पीता क्यों नहीं! सिगरेट भी पीता हूं, और भी दस तरह के खर्च रहते हैं।”
”तू-ऊ-ऊ-ऊ!” बाबूजी का मुंह खुला रह गया, ”तू सिरकट पीवै है?”
”हां!”
”हमैं तो आज लो पता नीं चला?”
”आज तो चल गया!”
”चल गिया,” बाबूजी ने लंबी सांस लेकर कहा, ”नूं ई तो नास हुआ इस घर का! अरै! पीणी ई है तो बीड़ी पी लिया कर।”
”बीड़ी मैं नहीं पी सकता।”
”क्यूं? वो मिठ्ठी नी लगती?”
”खैर, मुझे पैसे दे दो। दफ्तर को देर हो रही है।”
”देख ले बेट्टे। जो बचैगा तेरे ई काम आवैगा।” बाबूजी ने अंटी खोलकर दस का मुड़ा हुआ नोट निकाला और मसलते हुए मेरे हाथ में ऐसे पकड़ा दिया जैसे महाजन को ब्याज का पैसा दे रहे हों।

अगले महीने तनख्वाह मिली तो रोज की तरह उस दिन भी देर से घर पहंचा। रास्ते-भर सोचता रहा, बाबूजी खाने का इंतजार देख रहे होंगे। घर पहुंचा तो देखा, वे बरामदे में मूढ़े पर बैठे-बैठे ही सो गए हैं। मुंह आधा खुला है। खर्राटों की आवाज खिरज पर चल रही है। नारियल बंदरिया के बच्चे की तरह गोद में टिका है।
मैं कुछ देर तक चुपचाप खड़ा उन्हें देखता रहा। सुख शायद इस आदमी के लिए है ही नहीं। या जो है, वही सुख है? जरूरत नहीं है, फिर भी तेली के बैल की तरह काम करता है। मेरी छोटी-से-छोटी सुविधा का खयाल रखता है- इतना खयाल कि वह स्वयं मुझे चुभने लगता है…
”कोण?” बाबूजी ने अचानक चौंककर कहा।
”मैं।”
”जीत! आ गया बेट्टे?” वे नारियल को संभालते हुए उठ खड़े हुए, ”तिनखा लाया?”
कच्चे दूध में फिटकरी गिर गई। सोचा था- इस बार तनख्वाह उन्हें नहीं दूंगा। लेकिन इस समय लगा- इनके और मेरे बीच कोई संबंध नहीं है। संबंध है इनके और तनख्वाह के बीच। मैंने आवेश में जेब से लिफाफा निकाला और बाबूजी की तरफ बढ़ा दिया।
उन्होंने करारे नोटों को चुचकारकर माथे से लगाया और आशीर्वाद का हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया। मन हुआ – पीछे हट जाऊं, लेकिन चुपचाप खड़ा रहा।
नोटों को अंटी में घुसेड़ते हुए वे बोले, ”चल, खाणा खा लै!”
”भूख नहीं है।”
”फेर कहीं खा आया क्या?”
खाना खाकर नहीं आया था, लेकिन प्रश्न का उत्तर देने को मन नहीं हुआ।
”क्यूं बई, बोलता क्यूं नीं?”
”बस, भूख नहीं है।” बात का सूत झटककर मैं अंदर आ गया आर कपड़े बदलकर बिस्तर की गुफा में घुस गया।
बाबूजी से बोलने को कतई मन नहीं हो रहा था, लेकिन रह-रहकर खयाल आता- खाना उन्होंने भी नहीं खाया होगा…नहीं खाया तो न खाएं। जिद पर अड़े हैं तो मरें भूखे…
जिद का तार कसता ही गया। मैं जान-बूझकर देर से घर आता। बाबूजी बरामदे में मूढ़े धंसे मिलते। बंदरिया का बच्चा छाती से सटा रहता। खर्राटों की आवाज पड़ोसियों तक पहुंचती।

एक दिन कुछ जल्दी दफ्तर से आ गया। मिसेज खन्ना सहन में बैठी दाल बीन रही थीं।
”हैलो, शर्मा जी!” उन्होंने इस ढंग से स्वागत किया, जैसे मैं उनका पड़ोसी नहीं, मेहमान हूं। बोलीं, ”आज तो बारिश होगी, आप टाइम से घर पहुंचे हैं।”
”फिर तो रोज ही बारिश होनी चाहिए…मिस्टर खन्ना तो ठीक साढ़े-पांच पर यहां होते हैं न!”
”उनकी बात और है।” मिसेज खन्ना जिस उत्साह से बात कर रही थीं, वह ढीला पड़ गया।
”बाबूजी नहीं हैं?”
”शायद दूध लेने गए हैं,”  मिसेज खन्ना ने उठकर गार्डन चेयर अपने नजदीक खींचते हुए कहा, ”आप बैठिए न!”
”और सुनाइए,”  मैंने कुर्सी में अपने को टिकाकर कहा, ”क्या ठाठ हैं?”
”ठाठ!” मिसेज खन्ना ने ऐसे मुंह बिचकाया, जैसे ठाठ कोई बहुत गंदी चीज हो। बात का रुख मोड़ते हुए बोलीं, ”बुरा न मानें तो एक बात कहूं, शर्माजी!”
”कभी बुरा माना है आपकी बात का?”
”सो तो ठीक है, मगर बात ही कुछ ऐसी है,” सही शब्दों की तलाश में भटकते हुए बोलीं, ”बाबूजी बेचारे बड़े परेशान से रहते हैं इन दिनों।”
”क्यों, कुछ कह रहे थे?”
”हां, कह रहे थे कि वे आपके जूठे बर्तन साफ करते हैं और आप इतना भी खयाल नहीं रखते कि उन्हें मेज से उठाकर…”
”आ गिया, बई!” पीछे से बाबूजी की आवाज आई। कोट की घिसी हुई बाहों में से कुहनियां झांक रही थीं और वे हाथ में दूध की बाल्टी लिए थे।
”चल, उठ!” एक अजीब अजनबी नजर से मुझे देखते हुए वे बोले। मैं चुपचाप उठा और उनके पीछे-पीछे  कमरे में आ गया।
”क्यूं बई,”  उन्होंने तल्ख लहजे में कहा, ”तू बहू कू क्यूं नीं बुला लेत्ता?”
”बुला तो लूं मगर…”
”मगर क्या? हमनै बी अपणी जवान्नी मैं बड़े-बड़े रंग देक्खे हैं।”
अविश्वास का एक ओर काला पर्दा उनके और मेरे बीच टंग गया।
मैंने कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी लगा जैसे ढेर-सी रूई गले में फंस गई है। ब्रीफ-केस को मेज पर पटककर दरवाजे के बाहर हो गया।
”सुण, बई!”
वापस मुड़ा।
”हम चले जावैं ह्यां सै?”
”मैंने कब कहा आपसे?”
”कहा नीं तो म्हारे रहत्तो यो बदमास्सी नीं चलणे की!”
”क्या मतलब?”
”मतलब बी बताणा पड़ैगा?”
”नहीं, कोई जरूरत नहीं है।” मैं तेजी से दरवाजे के बाहर हो गया। पीछे बाबूजी क्या बड़बड़ाते रहे, मैंने नहीं सुनना चाहा।

रात को देर से लौटा। बाबूजी बरामदे में चारपाई पर लेटे ऊंघ रहे थे। दबे पांव बराबर से निकला। दरवाजा खोला।
दरवाजा खुलते ही बाबूजी की आंख भी खुल गई।
”कोण, जीत?”
मैं चुप रहा।
”खाणा खावैगा, बई?”
फिर चुप रहा।
”बोलता क्यूं नीं?”
इस बार भी मैं कुछ नहीं बोल सका और चुपचाप कपड़े बदलकर पलंग पर लेट गया।
बाबूजी माथा पकड़कर अपनी चारपाई की पाटी पर बैठ गए।
मैंने उनकी तरफ से करवट बदल ली।
”अच्छा बई, भुगतेंगे जो लिखा है!” बाबूजी ने पिघले स्वर में कहा। फिर सिसकियों और नाक सुड़कने की आवाज आई।
‘उठ जाऊं?’ मैंने स्वयं से पूछा, लेकिन अपमान की जो गांठ लगी थी, खुल न सकी।
मैं करवट लिए लेटा रहा। कुछ देर बाद बत्ती बंद हो गई।

उस रात के बाद आज फिर हम दोनों गुमसुम लेटे हैं। दो नहीं, तीन आदमियों का खाना रसोई में बना पड़ा है, लेकिन कोई भी मौन के कांच की दीवार को तोडऩा नहीं चाहता।
परसों इलाहाबाद से गंगाधर आया था। दो दिन की छुट्टी थी, मगर मंै एक दिन और रोककर इतवार में उसके साथ घूमना चाहता था।
आज सुबह गंगाधर ने फिर कहा, ”यार, तू मुझे चला ही जाने दे! बॉस बिला वजह नाराज होगा।”
”ऐसी की तैसी बॉस की! वही सब कुछ हो गया, हम कुछ भी न हुए!”
”नहीं, तू समझता नहीं, जीत! काम ही कुछ ऐसा है।”
”काम तो हमेशा से है और रहेगा। तू यहां कब-कब…”
”तो बई, तू इसै जाण क्यूं नीं देत्ता!” बाबूजी ने रसोईघर से आकर मेरी बात का तार काट दिया, ”काम का नुकसान होत्ता हो तो किसी कू रोकणा नीं चहिए।”
मुझे लगा जैसे किसी ने दिमाग के गुब्बारे में पिन चुभो दी है। गंगाधर के चेहरे पर सफेदी पुत गई। लेकिन वह बाबूजी की बात रखने के लिए बोला, ”देख लीजिए, बाबूजी, यह नाहक जिद कर रहा है।”
”दिमाग खराब है इसका तो,”  बाबूजी शह पाकर बोले, ”हम कहवैं हैं, तू चला जा, बेट्टे!”
मेरी बरदाश्त की हद टूट गई। तल्ख लहजे में बोला, ”आप होते कौन हैं हमारे बीच बोलने वाले!”
बाबूजी की त्यौरियां बदलीं, ”हम कोई होत्ते ई नीं, हरामखोर!”
”अच्छा, बकवास बंद कीजिए!”
”ब-क-वा-स! बकवास करैं हैं हम तो!”
”और क्या कर रहे हैं?”
”अरै, मैं इबी बता दूंगा तुजै, कुक्कर करा करैं हैं बकवास!”
”अच्छा, आप अपना काम देखिए!”
”क-I-I- म! काम देक्खूं जी इसका! नौक्कर हूं ना!”
”कौन कहता है…” मैं कुछ कहने ही वाला था कि गंगाधर ने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया।
”चल, थोड़ा घूम आएं।”उसने मुझे हाथ पकड़कर खड़ाकर दिया और बाहर घसीट ले चला।
पार्क की बेंच पर बैठकर मैं देर तक पिछले चार महीने की घुटन वमन करता रहा।
अब गंगाधर रुक सकता था, लेकिन मैंने रोकना नहीं चाहा।
घर पहुंचे तो बाबूजी अपने टं्रक में सामान लगा रहे थे। टीन की जेब से पुराने पोस्टकार्ड निकालकर, फिर पढ़-पढ़कर फाड़ रहे थे।
चलते समय गंगाधर ने बाबूजी के चरण छुए। उन्होंने कुहनी निकले कोट की बांह उठाकर आशीर्वाद दिया।
गंगाधर की गाड़ी दोपहर डेढ़ बजे गई थी और मैं रात के साढ़े ग्यारह घर पहुंचा। बाबूजी आज बरामदे में नहीं हैं। चुपके से दरवाजा दबाया। खुल गया।
बाबूजी अपनी चारपाई पर लेटे हैं। नींद शायद नहीं आ रही। लिहाफ छाती तक खींच रखा है। सिर को और ऊंचा करने के लिए कुहनियां मोड़कर तकिए पर रख रखी है। चेहरे पर पीड़ा की विचित्र अपाठ्य लिपि लिखी है।
कपड़े बदलकर बाथरूम की तरफ गया तो देखा, रसोई में पूरा खाना बना पड़ा है।
लौटकर बत्ती ऑफ की और चुपचाप बिस्तर में घुस गया।
नींद नहीं आई और रात अंधेरे की पगडंडी पर भटकती रही।

बाबूजी को नींद आए काफी देर हो चुकी है। आधा मुंह खुला है और खर्राटे किसी डरावनी याद की तरह कमरे में तैर रहे हैं। सड़क की रोशनी की चमचमाती बरछी उनके माथे को काटती हुई मेरे और उनके बीच फर्श पर आकर ठिठक गई है। अभी-अभी उन्होंने फिर करवट बदली है और पुरानी दरी में पड़ी सलवट को निकालने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
मुझे मां की याद आती है। मन होता है- उठकर दरी की सलवट निकाल दूं…लेकिन बीच में ठिठकी रोशनी उनके पास जाने से रोकती है।
रेल के घड़घड़ाने की आवाज आती है। शायद फ्रंटियर जा रही है। इंजन चीखता है…हू-हू-ऊ-ऊ-ऊ-हू! कैसी खराब जगह मकान ले लिया। रात भर नींद भी नहीं आती।
अलार्म टनटनाता है। बाबूजी आंख मलते हुए उठते हैं और स्टॉप-लीवर दबा देते हैं।
मैं करवट बदलकर लेट जाता हूं।
बाबूजी बाहर जाते हैं…बाथरूम में रोशनी होती है…नल से पानी गिरता है…फ्लश घरघराता है…बरामदे में लौटते कदमों की आहट होती है…वे फिर कमरे में आ जाते हैं…बिस्तर लपेटते हैं..बंदरिया के बच्चे के दो टुकड़े करते हैं…बिस्तर में घुसेड़ देते हैं…चारपाई के नीचे से जंग खाया ट्रंक खींचते हैं…घिसी हुई कुहनियों वाला कोट पहनते हैं…मेरे बिस्तर के पास आकर खड़े हो जाते हैं..
”अच्छा बेट्टे, मैं जा रहा हूं,” वे भर्राये स्वर में कहते हैं।
मन होता है, उठकर उन्हें रोक लूं! लेकिन मैं उठ नहीं पाता और लिहाफ को सिर तक खींच लेता हूं…टं्रक एक बार फिर खडख़ड़ाता है…बाहर जाते हुए कदमों की आहट आती है…दरवाजा खुलता है…बंद हो जाता है!
सड़क पर चलते कदमों की आहट देर तक कानों में बजती रहती है।

टेलिविजन : भीमसेन त्यागी

पास-पड़ोस में सबके यहां टेलिविजन आ गए थे। बलराम के यहां नहीं था। बच्चे रोज फरमाइश करते। बलराम की पत्नी प्रेमो उनके  सुर में सुर मिलाती।
बलराम प्रेमो को जी-जान से प्यार करता है। उसकी हर जरूरत का ध्यान रखता है। लेकिन टेलिविजन? इतनी महंगी चीज! पेट के जाले ही नहीं टूटते! पूरा टब्बर है!
वैसे तो प्रेमो बड़ी भोली बनती है, लेकिन बलराम को एक बार सूंघते ही उसका पैर भारी हो जाता है। पूरे सात की लाइन लगा दी। छह लड़के हैं और एक लड़की—लछमी। गजब का रूप पाया है लछमी ने, जैसे सांचे में ढालकर मूरत तैयार की गई है। लड़कों के नाम युधििष्ठर से शुरू किए। सहदेव तक पहुंचते-पहुंचते पांचों पांडव तैयार। छठे ने अवतार लिया तो नाम की समस्या आ खड़ी हुई। उन दिनों टेलिविजन पर महाभारत चल रहा था। बलराम ने सोचा- इन ससुरे कौरवों ने क्या खता की है! इनके नाम का भी तो कोई अपने घर में होना चाहिए। छठे का नाम रखा- दुर्योधन।
दिल्ली की दक्षिण-पूर्वी सीमा जहां उत्तरप्रदेश को छूती है, वहीं विराट औद्योगिक नगर नोएडा बस रहा है। देस-परदेस के मजदूरों की बाढ़ आ गई है। जो गांव नोएडा के पेट में समा गए, उनकी खेती की जमीन तो गई, गांववालों ने अपने घर-द्वार और गांव के पास की जमीनों को घेरकर छोटी-छोटी कोठरियों के अहाते खड़े कर लिए हैं और किराये पर उठा दिए हैं।
हरौला गांव में लच्छू चौधरी के अहाते में बाहर की तरफ  दस दुकानें हैं और अंदर लंबोतरा सहन। उसके चारों तरफ कोठरियों की कतारें। क्लर्कों, मजदूरों और फुटकर धंधा करनेवालों के कुल बत्तीस परिवार हैं। उन्हीं में एक परिवार बलराम का भी है। सीलनभरी तंग कोठरी। उसी में खाना-पकाना, नहाना-धोना और घर-गिरस्ती के तमाम काम। बलराम ने दहेज में मिले नक्काशीदार पलंग के नीचे ईंटें लगाकर उसे हाथ-भर उठा दिया है। ऊपर मियां-बीवी सोते हैं, नीचे बच्चों की कतार। बलराम का बापू भप्पू कोठरी के बाहर खटिया पर सोता है। जेठ की दोपहरी में लू चलती है तो गांव के नीम की छांव बहुत याद आती है।
बलराम की मां के दुनिया से उठ जाने के बाद, भप्पू का जी उचट गया। काम में मन न लगता। शरीर भी थकता आ रहा था।
बलराम भप्पू को अपने साथ नोएडा ले आया। लेकिन यह दुनिया तो भप्पू की अपनी दुनिया नहीं है।
कलेजे में हूक उठती है- कहां गए वे महुवे और आम के रूख? गेहूं, चने और सरसों के लहलहाते खेत? कहां गए वे सांग-तमाशे, रसिया और लावनी? गांव की बोली-बानी? हंसी-ठठ्ठïा? कहा-सुनी? रूठ-मनौवल? कहां गई वह माटी की सोंधी-सोंधी बास…यहां तो फैकटरियों के धुएं से अटी हवा है, मोटरों की पें-पें, मिल के भोंपू की हू-हू, रेडियो पर बजते कानफोडू गाने और टेलिविजन पर नाचती अधनंगी पतुरिया…
सबसे पहले बालेसर के यहां टेलिविजन आया।
बलराम की कोठरी अहाते में दाहिनी तरफ तीसरे नंबर पर है। उससे अगली कोठरी में बालेसर रहता है। दिनभर घर में पड़ा फुल्लीदार सिगरेट फूंकता है। वक्त-बेवक्त निकलता है और देर रात गए आता है।
लछमन दर्जी फुसफुसाकर कहता है, ”यह जरूर चोरी-चकारी के धंधे में लगा है…”
”अजी कैसी चोरी-चकारी!” बिरजू कंपोजिटर लछमन की बात काटता है, ”यह तो ‘इसमैगलीÓ में फंसा है। देर रात गए इसे छोडऩे एक लंबी गाड़ी आती है। प्रेस से लौटते हुए देखा है कई बार!”
बालेसर की जोरू के चेहरे पर चमक और चाल में ठसक है। नाम लाजवंती लेकिन लाज की धांस तक नहीं। हर वक्त सिंगार-पटार करके पतुरिया बनी रहती है—पौडर-सुर्खी, टिक्का-बिंदी, इतर-फुलेल। अहाते की औरतों ने उसका नाम ‘चमक चांदनीÓ रख छोड़ा है। इतर की वह शीशी बालेसर लाया था। उसने कहा था, ”ले मेरी कट्टïो, तू भी क्या याद रखेगी। असली बिलैती इतर है।”
इतर वाकई गजब था। उसकी नन्ही-सी फुहार पूरे अहाते की बदबू पर छा जाती। औरत जात में से ऐसी लपट उठती कि आदमी का दिमाग घूम जाए।
हराम की कमाई है। बालेसर ले आया टेलिविजन। अहाते की तमाम औरतें और बच्चे देखने आने लगे। चमक चांदनी की छाती और चौड़ी हो गई—देख लेने दो बिचारों को।
प्रेमो से किसी का नखरा सहा नहीं जाता। उसने चमक चांदनी के यहां जाना बंद कर दिया। लेकिन बच्चे कहां मानते हैं! किसी और प्रोग्राम को छोड़ भी दें तो फिलम और चित्रहार तो चाहिए ही। एक दिन वे फिलम देखने चमक चांदनी के यहां गए और थोड़ी ही देर बाद वापस आ गए। अर्जुन ने बिसूरते हुए कहा, ”बंटी की मम्मी ने हमें बीच में ही उठा दिया… हमारे पापा गंदे हैं। एक टेलिविजन तक नहीं ला सकते…”
”चुप!” प्रेमो ने उसे डपट दिया।
अर्जुन तो चुप हो गया, लेकिन लछमी का बिसूरना बंद नहीं हुआ। घुन्नी है। कहती कुछ नहीं, रो-रोकर घर को सिर पर उठा लेती है। लछमी का बिसूरना चल ही रहा था कि बलराम आ गया। दिनभर तो साले पाठक की गालियां खाओ और शाम को यहां आओ तो एक-न-एक हराम का पिल्ला पें-पें करता मिलेगा। उसने कुढ़कर कहा, ”आज कौन मर गया?”
”मैं!” प्रेमो आंखें तरेरकर सामने आ गई, ”कितनी बार कहा कि एक टीवी ला दे। लेकिन मेरी कौन सुने। बच्चे दूसरों के यहां जावैं और झिड़की खा कै आ जावैं। और कुछ नहीं तो किस्तों पर ही ले आओ।”
किस्तों से बलराम को बहुत डर लगता है। प्राविडेंट फंड और मेडिकल के कट-कटाकर जो पैसे हाथ में आते हैं, उनसे रो-धोकर महीना पूरा होता है। उनमें से भी टेलिविजन के कटने लगेंगे तो क्या हाल होगा! बलराम ने प्रेमो को लाख समझाया, लेकिन उसने तो खूंटा पकड़ लिया, ”मुझे चाहे एक टैम भूखी रहना पड़े, लेकिन रोज-रोज बच्चों की बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती।ÓÓ
आखिर बलराम को हथियार डाल देने पड़े। दफ्तर से पांच सौ रुपए एडवांस लेकर दुकानदार के यहां जमा कराए और टेलिविजन उठा लाया। चमचमाता टीवी डब्बे से निकला तो पूरा घर दिप-दिप करने लगा। प्रेमो के चेहरे पर बरसों बाद मुस्कान की रेखा उभरी। बच्चे टीवी को घेरकर खुशी से फुदकने लगे। दुर्योधन ने प्यार से छूकर देखा। बलराम ने आंखें तरेरकर कहा, ”ऐ दुर्योधन! गंदे हाथ लगाने की जरूरत नहीं।”
छत पर एंटिना लग रहा था तो लछमी ने उसे जीत के झंडे की तरह ऊपर उठते देखा। आए चमक चांदनी और देखे! स्विच दबाते ही टेलिविजन में से सूं-सूं की आवाज निकली। अह! क्या बात है! कुछ देर की झिलमिल के बाद  एकदम साफ तसवीर उभर आई। मजा आ गया… चित्रहार चल रहा था। हीरो उछल-उछलकर गा रहा था। अर्जुन भी साथ गाने लगा तो बलराम ने फिर डपट दिया।
घर में टीवी क्या आया, उनकी दुनिया ही बदल गई। बच्चे स्कूल से आते ही बैग पटकते और टीवी खोलकर बैठ जाते। एक से एक मजेदार प्रोग्राम—फिल्म, चित्रहार, रंगोली, ठिठोली, कार्टून, उल्टा-पुल्टा, जंगल-बुक, खेल… वाह-वाह! मजे आ गए।
प्रेमो ने शादी से पहले सांग-तमाशे तो खूब देखे, फिलिम का सिर्फ नाम सुना था। शादी के बाद शहर में आई तो बलराम उसे साइकिल पर बैठाकर फिल्म दिखाने ले गया। प्रेमो तो लाज के मारे गठरी बन गई। कैसी औरतें हैं! मरदों के साथ खुल्लमखुल्ला छेड़ाछाड़ी! सरम-हया की तो धांस नहीं!
अगली बार वह सिनेमा गई तो उतना बुरा नहीं लगा… और उससे अगली बार तो अच्छा लगने लगा। शहर में नई फिल्म आती तो प्रेमो के मन में फुदक-फुदक होने लगती। बलराम ज्यादा तो नहीं, महीने में एक-दो फिल्म दिखा लाता… और अब टेलिविजन आ गया तो जैसे पूरा सिनेमा-हाल उनके घर में घुस आया।

टेलिविजन आने से किसी को परेशानी थी तो भप्पू को, ”भई बल्ले, तू यो कैसी बेमारी ले आया। तेरे बालकों ने पढऩा-लिखना तो कितई बंद कर दिया। हर बखत हुड़दंग मचाए रहवैं। और इस बहू को भी कैसा चसका लग ग्या! जब देक्खो, इस डिब्बे से चिपकी बै_ïी रहवै। भैया, अपणे से नीं देक्खी जात्ती यो बेसरमी। या तो सव्हेरे कू इसै दफा कर, नहीं तो हम वापस गांव चले जावेंगे।ÓÓ
न टेलिविजन को दफा होना था और न ही भप्पू को गांव वापस जाना था। इतना जरूर हुआ कि टेलिविजन पर कोई फिल्मी प्रोग्राम आता तो भप्पू खटिया उठाकर अहाते के बाहर गली में चला जाता।
एक दिन प्रेमो ने कहा, ”बाप्पू, आज तो देस्सी फिलम है। तुम बी देख लो!”
”कैसी देस्सी बेट्ट!” भप्पू ने जवाब दिया, ”आदमी देस्सी नीं रहे तो फिलम देस्सी कैसे बनैंगी!”
बलराम को फिल्म-विल्म का खास शौक नहीं था। दफ्तरवाले दिन में सारा लहू निचोड़ लेते हैं। शाम को खाना खाते ही नींद आने लगती है। लेकिन घर में टेलिविजन है तो वह भी कुछ देर देख लेता। अच्छा लगता। फुदकती-चहकती अधनंगी लड़कियां! बलराम उन लड़कियों से अपनी प्रेमो की तुलना करने लगता। प्रेमो के पास वह सब कुछ है, जो एक औरत के पास होना चाहिए—गेहुंआ रंग, पैने नक्श, गठा हुआ जिस्म और भरपूर प्यार। लेकिन टेलिविजन की लड़कियों के मुकाबले वह हमेशा पिछड़ जाती। बलराम उन लड़कियों को देखता और ठंडी सांस लेता।
अचानक उसके दिमाग में झटका लगता—नहीं, एक शरीफ  आदमी को पराई औरतों के बारे में इस तरह नहीं सोचना चाहिए।
उस दिन बलराम दफ्तर से लौटा तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। तनख्वाह जो मिली, उसमें सौ रुपए कम थे। वे टेलिविजन एडवांस में कट गए। लेकिन अभी खैर कहां? पांच सौ रुपए किस्त के भी तो देने पड़ेंगे। मकान का किराया, बिजली का बिल और दूधवाले को देकर, मुश्किल से राशन के पैसे बच पाए। सब्जी और ईंधन का क्या होगा? फिर बच्चों की फीस, कलम-कागज, हारी-बीमारी… एक मुसीबत हैै!
पड़ोसियों से मांग-तांगकर किसी तरह महीना पूरा किया। अगले महीने फिर कटी-पिटी तनख्वाह मिली। दिन में ही तारे दिख गए। फिर उधार का सिलसिला शुरू…
उससे अगले महीने हर तरह कतर-ब्यौंत करने के बावजूद टेलिविजन की किस्त नहीं जा सकी। दुकानदार का नुकीली मूछोंवाला पठान सुबह-शाम चक्कर काटने लगा। वह लठ ठोंककर दरवाजे पर आ खड़ा होता। बलराम का खून सूख जाता।
एक दिन सुबह-ही-सुबह पठान आ धमका और अल्टीमेटम दे गया, ”ओय सुण, आज शाम तक पैसा जमा न हुआ तो हम कल इसी वक्त आएगा और टीवी उठा ले जाएगा।”
बलराम के सोच को लकुवा मार गया। इस हरामजादे टीवी के लिए तो इतनी मुसीबत मोल ली और यही चला जाएगा। प्रेमो का जी क्या कहेगा? और बच्चे? लछमी का बिसूरता हुआ चेहरा सामने आ गया। बच्चे फिर चमक चांदनी के यहां जाएंगे और वह फिर बेइज्जती करके निकाल देगी… लेकिन असल बेइज्जती तो पठान करेगा। बहुत जालिम है… पूरे अहाते में थू-थू होगी—अरे! हिम्मत नहीं थी तो क्या डॉक्टर ने लिखकर दिया था- टेलिविजन खरीदो!
अब देखो माधुरी का ठुमका!
बलराम सारे दिन उखड़ा-उखड़ा रहा। पठान की नुकीली मूंछें दिमाग में डंक मारती रहीं। दफ्तर से और एडवांस नहीं मिल सकता था। बलराम का दिमाग बार-बार बड़े साहब के अर्दली शंकर की तरफ झपटता। शंकर जबान का जितना मीठा है, मन का उतना ही काला। जिसे कहीं से रुपया हाथ न आता हो, उसे शंकर दे देता है। लेकिन ब्याज लगाता है पांच रुपया सैकड़ा। जिसने एक बार उससे ले लिया, वह ब्याज चुकाते-चुकाते बूढ़ा हो गया।
बलराम को शंकर से बहुत डर लगता है, लेकिन उससे भी बड़ा डर है—पठान का। बलराम दिन-भर अपने से लड़ता रहा। तीसरा पहर होते-होते उसकी हिम्मत जवाब दे गई। उठा और बड़े साहब के दफ्तर जा पहुंचा। पता चला शंकर चाय पीने गया है।
बलराम कैंटीन पहुंचा तो शंकर चाय के साथ बरफी उड़ा रहा था। उसने दूर से ही बलराम की चाल भांप ली। प्यार से मिला। मना करने के बावजूद चाय मंगवाई।
बलराम ने थके हुए शब्दों में कहा, ”भाई शंकर, दो सौ रुपए की जरूरत है।”
”बाबूजी, आप तो संजमवाले आदमी हैं।”
बलराम को अपनी तारीफ कड़वी लगी।
शंकर ने पूछा, ”ऐसी क्या जरूरत पड़ गई?”
”भई, टीवी की किस्त देनी है।”
”बाबूजी, यो किस्तों की बीमारी बहुत खतरनाक है। आदमी काम करने से पहले ही मजूरी बेचकर खा जाता है। किस्तों पर चीज लेने में तो मजा आता है, लेकिन पैसे चुकाने पड़ते हैं तो तीन-तिल्लोक याद आ जाते हैं।”
बलराम चुपचाप सुनता रहा।
शंकर ने आगे कहा, ”चलो बाबूजी, जब आपने यह काम कर ही लिया तो भुगतना पड़ेगा। सात को रुपए ले लेना।ÓÓ
”सात को?” बलराम ने हैरत से कहा, ”बई, मुझे तो आज ही जरूरत है।”
”आज?” शंकर ने माथे पर हाथ मारा, ”आप तो जानते ही हैं, बाबूजी, मेरे पास तो जो कुछ आता है, सात को ही आता है। उसी दिन फिर बांट देता हूं। बेचारे जरूरतमंदों का भला हो जाता है।”
बलराम ने भर्राई आवाज में कहा, ”बई, कैसे भी करो, शंकर, आज किस्त जानी बहुत जरूरी है। नहीं गई तो वह मेरी जान खा जाएगा।ÓÓ
”ऐसी बात है तो करूंगा। आज ही करूंगा। मेरे पास एक की अमानत रखी है। वह आपको दे देता हूं। पर देख लो बाबूजी, सात को लौटाने पड़ेंगे। यह मेरी इज्जत का सवाल है।”
शंकर ने एक सौ का और बाकी दस-दस के नोट बलराम को थमा दिए।
बलराम ने गिनकर कहा, ”ये तो एक सौ नब्बे हैं।”
”ठीक तो हैं बाबूजी, दस ब्याज के कट गए। अब आपको पूरे दो सौ लौटाने हैं।”
अगले महीने शंकर के और टेलिविजन की किस्त तो गई ही, युधिष्ठिïर के इम्तहान की फीस और आ गई। नतीजा यह कि मकान का किराया रुक गया। चौधरन ने बक-बक बहुत की, लेकिन जब देने को कुछ था ही नहीं तो क्या कर लेती!
अगली बार दो महीने का किराया रुक गया। चौधरन सामान उठाकर फेंकने पर आमादा हो गई। प्रेमो ने खुशामद-दरामद करके आठ दिन की मोहलत मांगी।
आठ दिन में ही कहां से नौली आनेवाली थी? मजबूर होकर फिर शंकर के पास जाना पड़ा। उससे लेकर चौधरन का मुंह तो फूंक दिया लेकिन एक नई चिंता सवार हो गई। शंकर की रकम हर महीने बढ़ती जा रही थी। बलराम जब भी किसी झमेले में फंसता, मजबूरन शंकर के पास ही जाना पड़ता। वह थोड़ी हील-हुज्जत के बाद ब्याज काटकर रुपए दे देता और सात तारीख को पूरी रकम वसूल कर लेता। धीरे-धीरे आधी तनख्वाह शंकर के पेट में जाने लगी।
बलराम की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। कभी टेलिविजन की किस्त अटक जाती तो कभी चौधरन का किराया। दो-दो पठान सिर पर सवार रहते और सबसे बड़ा पठान शंकर तो था ही।
एक दिन शंकर ने कहा, ”बाबूजी, किस चक्कर में पड़े हो। छोटी-सी कोठरी के लिए हर महीने इतनी रकम देते हो! जिस दिन छोड़ोगे, खाली हाथ। आप एक झुग्गी क्यों नहीं डाल लेते।”
झुग्गी का नाम सुनते ही बलराम के पूरे शरीर में सनसनी दौड़ गई। तुरंत प्रेमो का खयाल आया—वह क्या कहेगी?
बलराम ने शंकर से कहा, ”अथारिटीवाले तो हर महीने झुग्गियां तोड़ते रहते हैं।”
”तोडऩे दो। उनका काम तोडऩा है और हमारा बनाना। इस तरह झुग्गियां कभी खत्म नहीं होंगी। होंगी तो उनकी एवज में सरकार को जमीन देनी पड़ेगी। अब तो राशन-कार्ड भी बन गए। वैसे तो आप सात जन्म में भी अपना मकान नहीं बना सकते। एक यही तरीका है।”
बिजली की हाइटेंशन लाइन के नीचे झुग्गी-झोंपडिय़ों की एक बड़ी बस्ती आबाद हो गई है। बलराम कभी इधर से गुजरता तो दहशत महसूस होती। किसी दिन बिजली का तार टूट गया तो हजारों की जान ले बैठेगा। ये बेचारे हर समय मौत के साये में रह रहे हैं। इनके लिए जिंदगी और मौत के बीच का फासला खत्म हो चुका है…
बलराम ने कभी सोचा भी न था कि एक दिन वह खुद झुग्गी में रहने जाएगा। लेकिन आज शंकर की बात उसे बहुत प्यारी लगी।
प्रेमो से बात की तो उसने चौंककर कहा, ”झुग्गी? वहां तो लुच्चे-लफंगे रहवैं।”
”हैं तो वे भी आदमी। हमें किसी से क्या मतलब। अपने काम से काम।” बलराम ने जरा ठिठककर कहा, ”यहीं क्या सब देवता-पुरुष बसते हैं! अच्छे-बुरे आदमी हर जगह हैं। झुग्गी में कम-से-कम खुली हवा तो आएगी। इस कोठरी में तो दम घुटता है। और फिर, झुग्गी में क्या सारी उम्र रहना है। एक-न-एक दिन सरकार वहां से उठाएगी तो बीस-पच्चीस गज जगह जरूर देगी। उस पर अपना घर बनाएंगे- साफ-सुथरा कमरा, रसोई, गुसलखाना…”
अपने घर की कल्पना में प्रेमो बलराम से कोस-भर आगे निकल गई।
तीन हजार झुग्गी के बनने में लगे और पांच सौ गए प्रधानजी को। बलराम के पास तो कुछ था नहीं, सारा खर्च शंकर ने किया। तय हुआ कि बलराम हर महीने ब्याज और पांच सौ रुपये शंकर को देगा। सात महीने में कर्ज उतर जाएगा। फिर सारी उम्र की मौज!
अपनी झुग्गी में आकर बलराम ने राहत की सांस ली। लेकिन वहां आते ही प्रेमो का दिमाग चकरा गया।
यह झुग्गी बस्ती अजीब भूलभुलैया है। बच्चा अपने घर का रास्ता भूल गया है—इस तरह की पहेलियों में जो चक्करदार रास्ता होता है, वैसी ही मुड़ी-तुड़ी गलियों का जाल पूरी बस्ती में फैला है। कहीं दो, कहीं तीन फुट की गली और उसी में नाली। असल में तो वह सिर्फ नाली है। गली का काम जबरन लिया जाता है। नाली बच्चों का शौचालय भी है। जहां-तहां नाली के दोनों तरफ पैर रखे, उकडूं बैठे बाल-भगवानों की मनोरम झांकियां दिखाई दे जाती हैं…
पूरी बस्ती हर समय गंधाती रहती है। प्रेमो का दम घुटता है। वह जिस दिन अपनी झुग्गी में आई, उसी दिन सामनेवाली झुग्गी में पुलिस का छापा पड़ा था। प्रेमो को पुलिस की वर्दी में से अजीब गंध आती है, बस्ती की गंध से कहीं ज्यादा विषैली। पुलिस तीन जवान लड़कियों और एक अधेड़ औरत को पकड़कर ले गई।
बच्चे सहम गए। प्रेमो देर तक थरथराती रही। उसने बलराम से कहा, ”कहां ले आए मुझे! यहां तो मैं घुटकर मर जाऊंगी।ÓÓ
बलराम चुप रहा। इसके अलावा वह कर भी क्या सकता था!
प्रेमो ने मन-ही-मन तय किया कि वह यहां किसी से मतलब नहीं रखेगी। अपने काम से काम। लेकिन यह भी उसके बस में कहां था?
वह किसी के पास नहीं गई। लेकिन बाएं हाथ बराबर की झुग्गी में रहनेवाली चंदा आ धमकी। वह प्रेमो के मैके और ससुराल का खानदानी शजरा समझने और अपना समझाने के  बाद असल मुद्दे पर आई, ”चंदरो ने पूरी बस्ती का माहौल बिगाड़के रख दिया है।”
”चंदरो कौन?”
”अरे! वही, जिसके यहां छापा पड़ा है! ले गई पुलिस महारानी को और साथ में तीन चूजों को भी! अच्छा है, कुछ नावां ढीला हो जाएगा। लेकिन इसे क्या फर्क पड़े है। इसने तो टकसाल लगा रखी है… टकसाल! देख लेना इसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। क्या कर लेगी पुलिस? हर महीने बंधी रकम जाती है। फिर भी दबदबा कायम रखने के लिए महीने में एक-आध बार छापा पड़ जाता है।”
प्रेमो को मतली आने लगी। उसने कहा, ”जो जैसा करेगी, भुगतेगी। हम अपना दिमाग क्यों खराब करें।”
चंदा के जाने के कुछ देर बाद ही गुरमाला आ धमकी, ”की दस री सी ए यारां दी अम्मा? इस दी छोकरी ने तो गजब ढा रखा है। रोज देर रात गए नोटों की गठरी लेके आंदी है। शर्म नहीं आंदी महतारी को। छोकरी की कमाई खा-खाके मुटा रही है।”
प्रेमो परेशान हो उठी—इनके पास ऐसी बातों के अलावा और कुछ नहीं है क्या! यहां कैसे दिन कटेंगे?
उस दमघोटू माहौल में थोड़ी राहत मिलती तो टेलिविजन के सामने बैठकर। हर वक्त कहीं-न-कहीं फिल्मी गाने आते रहते। गानों के साथ चटपटे विज्ञापन फ्रिज, कलर टीवी, वाशिंग मशीन, कार के… प्रेमो का मन करता—इन तमाम चीजों को एक साथ कौली में भरकर अपनी झुग्गी में ले आए। फिर खयाल आता—वे औरतें और हैं, जो जिंदगी जी रही हैं। हम तो बस दिन काट रहे हैं…
झुग्गी में आने के बाद सबसे ज्यादा परेशान हुआ भप्पू! लच्छू चौधरी के अहाते में कोठरी के आगे सहन तो था। भप्पू उसमें खटिया डालकर पड़ा रहता। धूप या बारिश होती तो गैलरी में चला जाता। लेकिन यहां तो झुग्गी के बाहर सिर्फ नाली है। भप्पू जाए तो कहां जाए?
प्रेमो ने पुरानी धोतियां जोड़कर पर्दा बना लिया था और झुग्गी में इधर-से-उधर प्लास्टिक की रस्सी बांधकर उस पर टांग दिया था। दिन में पर्दा एक तरफ  सरका दिया जाता और रात को सोते वक्त रस्सी पर तान दिया जाता। और कुछ हो-न-हो, आंख की ओट है।
एक और परेशानी आ खड़ी हुई। भप्पू को हर वक्त झुग्गी में पड़े रहने से मजबूरन टेलिविजन के प्रोग्राम देखने पड़ते। वह कुढ़कर कुछ-का-कुछ बड़बड़ाने लगता, ”हद्द हो गई बेसरमी की! चुम्मा दे दे चुम्मा… अबे, चुम्मे से पेट भर जाएगा क्या?”
टेलिविजन पर छोकरियां ठुमके लगाती रहतीं और भप्पू के बुढ़ापे में खलल डालती रहतीं… चोली के पीछे क्या है?… कोई बताओ इसे! अबे, तेरी मां की… साले हरामी हैं सारे-के-सारे।
अगले महीने मकान का किराया नहीं देना पड़ा। बलराम और प्रेमो ने राहत की सांस ली। तीसरे महीने टेलिविजन की किस्तें पूरी हो गईं तो लगा जैसे पहाड़ सिर से उतर गया है।
बलराम दफ्तर से थका-हारा आया और टीवी खोलकर बैठ गया। संगीत की तीखी धुन पर फुदकती-थिरकती लड़कियों को देखते हुए थोड़ी ही देर में थकान उतर गई।  थकान तो उतरी, लेकिन नशा-सा चढ़ गया। फुदकती लड़कियों के उभरे अंग दिमाग में खलबली मचाने लगे। उसने अंगों को नोचकर दिमाग से बाहर फेंकने की कोशिश की। लेकिन वह जितनी कोशिश करता, अंग उतने ही गहरे उतरते जाते!
उसे बहुत कोफ्त हुई—एक शरीफ और इज्जतदार आदमी के लिए क्या यह सब ठीक है? पराई औरतों के बारे में इस तरह नहीं सोचना चाहिए…
रात को बापू और बच्चे सब सो गए तो बलराम ने धीरे से टीवी खोल दिया। आवाज कतई बंद कर दी और चैनल का नॉब घुमाने लगा। किसी चैनल पर देर रात का प्रोग्राम लग गया। लड़कियों ने कपड़ों के साथ शर्म भी उतारकर एक तरफ  रख दी। वे बिजली की तरह थिरकने लगीं। थिरकन बलराम के शरीर में उतर गई और वह देर तक झनझनाता रहा। मन हुआ—प्रेमो को जगा ले! लेकिन फिर खयाल आया—परदे के पीछे बापू सोया है। एक जमाना था कि प्रेमो उसे दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत नजर आती थी, लेकिन अब तो… बलराम ने गहरी सांस ली।
टेलिविजन की लड़कियां स्क्रीन से उछल-उछलकर बलराम की तरफ आ रही हैं। उसका पूरा शरीर झनझनाने लगा है। क्या हो गया इन लड़कियों को! शर्म कतई बेचकर खा ली। बलराम उन लड़कियों को बरदाश्त नहीं कर पा रहा। उसने झटके से स्विच ऑफ कर दिया और सोने की कोशिश करने लगा…
झुग्गी के नीम अंधेरे में लड़कियां देर तक उत्पात मचाती रहीं। मुश्किल से आंख लगी थी कि एक भड़कदार लड़की चुपके से बलराम के  भीतर उतर आई और कुछ ही देर में उसे परास्त करके चलती बनी।
बलराम ने अपराधी की तरह टेलिविजन की तरफ नजर उठाई—मैंने यह कैसी मुसीबत मोल ले ली!
सुबह वह देर से सोकर उठा। शरीर अलसाया था। प्रेमो चाय बनाकर लाई। बलराम ने उसे शक की नजर से देखा—क्या हो गया है इस औरत को! बलराम चाय का प्याला लेकर बाहर चारपाई पर आ बैठा। सुबह की खुनकभरी हवा चल रही थी। अच्छा लगा। तभी उसकी नजर सामने की झुग्गी पर गई। चंदरो खुले आसमान के नीचे पटरे पर बैठी नहा रही थी। उसका गदराया जिस्म बलराम के भीतर हड़कंप मचाने लगा। वह झुंझला उठा—अजीब औरत है! छोटे-बड़े की कतई शर्म नहीं…
बलराम वापस अपनी झुग्गी में चला आया। बापू चाय पीकर ननकू की दुकान पर चला गया था। बलराम ने टेलिविजन चालू कर दिया। फिल्मी गानों का प्रोग्राम आ रहा था- धक-धक, धक-धक… हत्तेरे की! इनके पास दिखाने को कुछ और नहीं रह गया!
बलराम का मन बीमार हो गया है। हर समय एक ऊपरी भूख लगी रहती है, जो शांत होना नहीं जानती।
वह दफ्तर पहुंचा। रिसेप्शनिस्ट लूसी चटख नीले रंग की मिनी स्कर्र्ट में थी। बलराम झुंझला उठा— अजीब लड़की है। यह ऐसी बेहूदा ड्रेस पहनकर क्यों आती है!
बलराम आगे बढ़ा तो नीलम मिल गई।
”हाय!” उसने मुस्कुराकर कहा।
बलराम जानता है—इस मुस्कुराने का कोई मतलब नहीं। पता नहीं कंपनीवालों ने इतनी लड़कियां क्यों भरती कर रखी हैं!
बलराम शरीफ आदमी है। वह किसी को कुछ कहता नहीं। चुपके-चुपके दफ्तर की लड़कियों को घूरता रहता है। वह जानता है… अच्छी तरह जानता है कि यह शरीफ आदमियों का काम नहीं। लेकिन शरीफ होना ही उसका दुश्मन बन गया है। कितना अच्छा होता कि वह शरीफ  न होता।
शाम को बलराम घर लौट रहा था तो सड़क पर शॉर्ट्स पहने कच्ची-पक्की उम्र की लड़कियों का गुच्छा दिखाई दिया। बलराम को गुस्सा आने लगा—यह सब क्या हो रहा है! चुलबुली छोकरियां टेलिविजन से निकलकर सड़क पा आ गई हैं। आखिर क्या होगा, इस मुल्क का!
बलराम अपनी झुग्गी पर पहुंचा तो वहां लछमी अकेली थी। प्रेमो बाजार गई थी, लड़के शायद खेलने गए थे। टेलिविजन पर नशीला संगीत चल रहा था और एक अधनंगी पतुरिया ठुमके लगा रही थी।
बलराम की नजर एक बार पतुरिया पर गई और फौरन बाद लछमी पर। वह बारह की होकर तेरहवें में चल रही है। जिस्म खिलता आ रहा है। लछमी को देखते ही बलराम का दिमाग घूम गया…
प्रेमो सब्जी लेकर गली के नुक्कड़ पर पहुंची तो उसे एक भयानक चीख सुनाई दी। वह तेजी से लपककर झुग्गी पर पहुंची। लहू-लुहान लछमी बेहोश पड़ी थी…
बलराम तेजी से झुग्गी के बाहर निकला और पागल की तरह दौड़ता चला गया…
प्रेमो फटी-फटी आंखों से लछमी को ताकती रही।
टेलिविजन पर अभी तक अधनंगी पतुरिया नाच रही थी…

दिल्ली में चौपाल : भीमसेन त्यागी

भीमसेन त्यागी

एक समय था, जब दिल्ली के कॉफी हाउस में अलग-अलग भाषाओं के लेखक, पत्रकार, चित्रकार, संगीतकार, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञों आते थे। खूब बहसें हुआ करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे सब खत्म हो गया। कॉफी हाउस को लेकर  कथाकार भीमसेन त्यागी  का जीवंत संस्मरण।

मैं1958 की गर्मियों में अपना कस्बा छोड़कर दिल्ली आया। कस्बा शहर और गांव के बीच की वर्णसंकर नस्ल की बस्ती होता है।  कस्बे में शहर की तमाम बुराइयां आ जाती हैं और गांव का कोई गुण नहीं रहता। ऐसी ही निर्गुण बस्ती में मेरा बचपन बीता। रस-रंग भरी यह बस्ती अपने में पूरी दुनिया थी। यहां मौलवी उस्मान का मकतब था, मुंशी रामसिंह का प्राइमरी मदरसा और फिर मास्टर टीकाराम का अंग्रेजी स्कूल। पंडित होशियार सिंह उर्फ हुसियारे पंडित का सांग था और प्रेमी भजनी की भजन मंडली। गुल्ली-डंडा खेलने के लिए पेंठ का मैदान था और तैरने के लिए हिंडन नदी- यानि हरनंद बाबा! दिन भर के लोगों के दुख-सुख बांटने, आल्हा, होली या किस्से-कहानी सुनने-सुनाने और मामले-मुकदमें निबटाने के लिए चौपाल थी। कस्बे की बहुत संपन्न लोक-संस्कृति थी और उस संस्कृति का केंद्र भी चौपाल ही थी। यह कस्बे का धड़कता हुआ दिल था। पूरे कस्बे की गलियां रक्तवाहिनी शिराओं की तरह चौपाल से जुड़ी थीं और यहीं से जीवनदायी रक्त ग्रहण करती थी।
दिल्ली आने के बाद कस्बे के तमाम धूलभरे चेहरे याद आते। दिल्ली बहुत बड़ी थी। यहां दफ्तर की मशीनी जिंदगी थी, बसों की गहमागहमी, घर-गिरस्ती के झमेले और चंद यार-दोस्त। लेकिन ये सब मिल कर भी उस शून्य को पूरा न कर पाते, जो चौपाल के न होने से बराबर सालता।
एक दिन सुदर्शन चोपड़ा आया और उसने कहा, ”आओ, टी-हाउस चलते हैं।”
”टी-हाउस? यह क्या बला है?”
”बहुत खूबसूरत बला है। वहां दिल्ली के तमाम लेखक और पत्रकार आते हैं और दुनिया-जहान के मसलों पर बहस करके अपनी सेहत खराब करते रहते हैं।”
कनाट प्लेस में रीगल बिल्डिंग के पार्लियामेंट स्ट्रीट वाले नुक्कड़ पर आबाद है- टी-हाउस। खासा बड़ा हाल है। दरवाजे में दाखिल होते ही दायें हाथ पत्र-पत्रिकाओं का मिनी स्टाल। थोड़ा आगे टी-हाउस का काउंटर। बाकी हाल में मेजें ही मेजें। हर मेज पर चार-छ: बुद्धिजीवी सिर जोड़े बैठे हैं और गरमा-गरम बहसों में उलझे हैं। तेजतर्रार आवाजें इधर से उधर लपक रही हैं, छतफाड़ ठहाके गूंज रहे हैं। मिली-जुली आवाजों का खुरदुरा संगीत पूरे हाल में भरा है। मैं क्षण भर ठिठक कर हाल पर नजर मारता हूं- अरे! अपनी चौपाल यहां कैसे आ गयी। दिल्ली बहुत बड़ी है, वैसे ही यह चौपाल! बड़ी कितनी ही हो, आखिर है तो चौपाल ही। वही किस्से-कहानी, वही संगीत, वही रसरंग, वही लतीफे, वही ठहाके और वही दुनिया-जहान की चिंताएं। चौपाल कस्बे की लोक-संस्कृति का केंद्र थी तो यह बड़ी महानगरीय संस्कृति का केंद्र है।
उस दिन के बाद से चौपाल आने का सिलसिला बढ़ता ही गया। कुछ दिन बाद तो वहां आना दिनचर्या का जरूरी हिस्सा बन गया। दफ्तर झंडेवालान में था। पांच बजते ही दोस्तों के साथ टी-हाउस का रुख करके और पूरी शाम रसरंग में डूबे रहते। कितनी नशीली थी वे शामें। धीरे-धीरे कस्बे की चौपाल की यादें धुंधली पड़ती गयीं और उसकी जगह दिल्ली की चौपाल लेती गयी।
इस चौपाल की पहली खबी यह कि नाम है टी हाउस लेकिन यहां टी कतई नहीं मिलती। आप चाय का आदेश देते हैं तो पेश की जाती है कॉफी। कस्बे में सुना था कि सतयुग में हमारे देश में घी-दूध की नदियां बहती थीं। कोई अतिथि बस्ती में आता और पानी की मांग करता तो उसे दूध दिया जाता। टी हाउस में अभी तक सतयुग ही चल रहा है। यहां भांति-भांति के देव पुरुष आते। इनमें आदि देव शंकर नहीं, विष्णु जी यानि श्री विष्णु प्रभाकर थे। वह जन्म से ही टी हाउस में बैठे दिखाई देते। जन्म टी हाउस का या फिर स्वयं विष्णु जी का, यह शोध का विषय है। शाम होते ही विष्णु जी अपने निवास अजमेरी गेट से टी हाउस का रुख करते और खरामा-खरामा मंजिल पर पहुंच जाते। आंधी हो या तूफान, वे विष्णु जी को रोक नहीं पाते। अगर किसी शाम विष्णु जी टी हाउस में दिखायी न दें तो मान लिया जाता कि वह गंगा-यमुना के नैहर में या फिर ‘आवारा मसीहाÓ की शोध के सिलसिले में बंगाल या बरमा की यात्रा पर हैं।
खादी के कुर्ते-पाजामे, बंडी और कलफ लगी नोकीली टोपी में, विष्णु जी अलग से पहचाने जाते। वह जिस मेज पर बैठे होते, उस पर उनके हमउम्र, छोटे और बहुत ही छोटे लल्लू ब्रांड लेखक भी होते। विष्णु जी किसी को भी यह अहसास न होने देते कि वह उनसे छोटा है। साथ ही यह अहसास भी न होने देते कि कोई उनसे बड़ा है। विष्णु जी गंभीर निरामिष किस्म के गंभीर लेखक हैं। वह टी-हाडसी लतीफों पर भी ठहाका न लगाते, सिर्फ धीरे से मुस्करा देते।
उन दिनों नयी कहानी आंदोलन उरूज पर था और उसके तीन तिलंगे कुचर्चा में थे। उनके विरोध में दर्जनभर नये पुराने और पुराने नये लेखक तलवारें भांजते रहते और रोज एक नया कहानी-आंदोलन अंकुरित होता। एक दिन टी हाउस में किसी ऐसे ही आंदोलन की चर्चा हो रही थी कि विष्णु जी ने भारी मन से कहा, ”भई, हम तो न तीन में हैं, न तेरह में!”
एक लेखक होली के अवसर पर प्रकाशित ‘दिनमान’ का नया अंक लेकर आया। उसमें लगभग पूरे हिंदी साहित्य की खबर ली गयी थी और जिस-जिस की खबर ली गई थी, उसके नाम बोल्ड अक्षरों में पाये गये थे। विष्णु जी ने उत्सुकता से अंक के पन्ने पलटने शुरू किये और जिसका नाम आता, उसी पर अपनी लघु टिप्पणी जड़ते जाते- जैनेंद्र जी का नाम है, अज्ञेय का भी। खैर, उनका तो होना ही था। सर्वेश्वर और श्रीकांत भी हैं। अच्छा, नगेंद्र जी का भी नाम है और सावित्री सिन्हा भी। हरिपाल तुम्हारा नाम भी… आखिरी पन्ना पलट कर विष्णु जी एक लंबी सांस लेते हैं और कहते हैं- लो, यह तो खत्म हो गया।
एक जोरदार ठहारा फूटता है और पूरा टी हाउस पर छा जाता है। विष्णु जी के भाई श्री ब्रह्मïानंद भी अक्सर टी हाउस में नजर आते। उनके प्रिय विषय थे मनोविज्ञान और सैक्स। उन्होंने फ्रायड, युग और हैवलाक एलिस को घोट-पीस कर पचा रखा था। वह टी हाउस में कोने की किसी मेज पर, नौजवान लेखकों के  बीच बैठे, उपरोक्त दार्शनिकों की केस हिस्ट्रीज सुना-सुना कर उनका और अपना मनोरंजन करते रहते। वह विष्णु जी के ही नहीं, पूरे टी हाउस के भाई साहब थे। बहुत कम लोग उनका असली नाम जानते थे। ज्यादातर के लिए तो उनका नाम ‘भाई साहब’ ही था।
चित्रकार जगदीश जोशी कमलेश्वर के साथ ही रहता। कमलेश्वर उसका स्थानीय अभिभावक था। जोशी की शादी हुई तो रिसेप्शन का आयोजन भी हुआ। निमंत्रण कार्ड छपे। उस समय निमंत्रण भेजने के लिए डाक विभाग को तकलीफ देने की जरूरत पेश न आती। कार्डों का बंडल लेकर टी हाउस आओ और तमाम मेजों पर कार्ड तकसीम कर दो।
रिसेप्शन वैंगर्स में था। निमंत्रित लोगों में भाई साहब भी थे। मेहमान मेजों पर विराजमान हो गये तो कमलेश्वर वर-वधू को साथ लेकर उनका परिचय कराने आया। वे तीनों भाई साहब वाली मेज पर पहुंचे तो कमलेश्वर ने एक-एक मेहमान का नाम लेकर परिचय कराना शुरू किया- आप फलां, आप फलां, आप फलां और आप… भाई साहब सामने पड़े तो कमलेश्वर गड़बड़ा गया। वह भी भाई साहब का नाम नहीं जानता था। कमलेश्वर ने तुरत बुद्धि से काम लिया और अपने एक्टराना अंदाज में कहा, ”और आप… आप भाई साहब!”
भाई साहब धीरे से मुस्कराये और उन्होंने हाथ जोड़ दिए।
टी हाउस में बेबाक साहित्यिक और राजनैतिक बहसें होतीं, आंदोलन जन्म लेते, उन्हें चलाने की रणनीति तय की जाती, विरोधियों की खाट खड़ी करने के सपने देखे जाते।  भरपूर निंदा रस लूटा जाता और लतीफेबाजी होती। लतीफेबाजी टी हाउस संस्कृति का जरूरी हिस्सा थी।
यह घोर आश्चर्य की बात मानी जाती कि मोहन राकेश के ठहाकों के बावजूद टी हाउस इतने बरस तक सलामत कैसे रहा। एक शाम राकेश चंद दोस्तों के साथ मेज पर बैठा किसी टी हाउसी लतीफे का रस ले रहा था कि सामने दरवाजे पर पंडित राजेंद्र यादव नमूदार हुए। राकेश ने दोस्तों से कहा, ”राजेंद्र आ रहा है। तुम कुछ देर हंसना मत। मैं खुद राजेंद्र के मुंह से उसे चूतियां कहलाऊंगा।”
दोस्तों ने दार्शनिकों के मुखौटे लगा लिये।
राजेंद्र अंदर दाखिल हुआ और पत्रिकाओं के मिनी स्टाल पर ठिठक कर नयी पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा- किस पत्रिका में अपनी कहानी और किस आलोचनात्मक लेख में अपना नाम छपा है। कहां कौन सा नया आंदोलन शुरू हुआ है? किसने किसकी टांग खींची है। राजेंद्र की चिंता यह भी थी कि कहीं कोई जम तो नहीं गया। पत्रिकाओं से निबटकर राजेंद्र ने एक नजर हाल पर मारी। अपनी जुमटो के लोग कहां विराजमान हैं। राकेश को देखकर वह उसकी मेज की तरफ बढ़ गया।
राकेश ने उसे दूर से ही लपक लिया, ”आओ राजेंद्र! सुनाओ क्या तीर मारे? आजकल तो धुंआधार लिख रहे हो।”
राजेंद्र ने बैठते हुए कहा, ”मैं क्या लिख रहा हूं, लिख तो तुम रहे हो।”
”क्यों, मैंने क्या लिखा?”
”राजपाल के लिए हेनरी जेम्स के इतने मोटे उपन्यास का अनुवाद कर मारा और कहते हो क्या लिखा?”
”यार, वह तो पुरानी बात हो गयी। इस एक महीने में तो कुछ भी नहीं लिखा।”
”तुम एक महीने की बात करते हो। मैंने तो पिछले तीन महीने से कुछ नहीं लिखा, सिवाय चिट्ठियों के!”
”तुमने चिट्ठियां तो लिख लीं। मैं तो वह भी नहीं कर सका। डाक का ढ़ेर ला है।” राकेश निराश प्रेमी की तरह एकदम उदास हो गया, ”कुछ नहीं, राजेंद्र! मेरी जिंदगी तो बेकार है। मैं तो चूतिया हूं।”
राजेंद्र ने तपाक से जवाब दिया, ”तू क्या चूतिया है, असली चूतिया तो मैं हूं।”
राकेश ने शरारत से मुस्करा कर कहा, ”साले, इस मामले में भी आगे मत जाने देना।”
मिले-जुले ठहाके का भीषण विस्फोट हुआ तो राजेंद्र हक्का-बक्का रह गया।
टी हाउस में राकेश के ठहाकों का कोई तोड़ था तो साहित्यकारों का डॉक्टिर और डॉक्टरों का साहित्यकार रामकिशोर द्विवेदी। रामकिशोर के ठहाकों के सामने राकेश के ठहाके फीके पड़ जाते। राकेश किसी बात पर ठहाके लगाता। लेकिन रामकिशोर को ठहाका लगाने के लिए किसी बात की दरकार न थी। वह सिर्फ ठहाका लगाने के लिए ही ठहाका लगा सकता था। ठहाका उसका तकियाकलाम था, ठीक वैसे ही, जैसे ‘माफ कीजिए!’ वह अक्सर बात की शुरुआत ही ‘माफ कीजिए’ से करता।
एक दिन डॉक्टर द्विवेदी ने शेरजंग गर्ग से कोई बात कहनी चाही, ”माफ  कीजिए…”
शेरजंग ने बात बीच में ही नोच ली। कहा, ”तुम्हें कतई माफ नहीं करूंगा। यह तो तुम्हारा तकिया कलाम है।”
टी हाउस में एक और अजीब शै थी- पंजाब से आया चित्रकार हमदम। उसके एक नहीं, दो तकियाकलाम थे- ‘हरामी’ और ‘बड़ी कुत्ती चीज है!’ चाहता तो कहता- ‘बहुत हरामी है!’ वह किसी से ज्यादा ही खुश होता और कुछ ज्यादा ही तारीफ चाहता तो कहा- ‘वह बड़ी कुत्ती चीज है!’ हमदम मुद्राराक्षस के लेखन पर फिदा था और अक्सर उसकी कुछ ज्यादा ही तारीफ करता रहता।
मुद्राराक्षस भी कम हमदम नहीं था। उन दिनों वह एक पत्रिका में स्तंभ लिख रहा था। एक बार उसने लिख मारा : राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘उखड़े हुए लोग’ का नाम ही नहीं, अंदर का माल भी उड़ाया हुआ है। असल में राजेंद्र यादव मौलिक लेखक है ही नहीं, सिर्फ अनुवादक है।
एक दिन राजेंद्र ने मुद्रा को तपाक से पकड़ लिया, ”क्यों बई, तू ऐसा ही मानता है कि मैं मौलिक लेखक नहीं हूं। अनुवादक हूं।”
”नहीं, मैं तो नहीं मानता।”
”फिर फलां पत्रिका में ऐसा क्यों लिखा? जरूरी है कि मैं जो कुछ मानता हूं, वही लिखूं भी?”
उन दिनों सुदर्शन चोपड़ा घोर गृह-कलह से त्रस्त था। अपनी बंगाली पत्नी कृष्णा जी से डर कर, सिर्फ एक बैग लेकर घर से चला आया था और दोस्तों के यहां रह कर समय बिता रहा था। कृष्णा जी बराबर उसका पीछा कर रहीं थीं।
एक दिन सुदर्शन दोस्तों के साथ ही टी हाउस में बैठा था। दोस्तों में हरिपाल त्यागी भी था। अचानक सामने दरवाजे पर कृष्णा जी नजर आयीं। सुदर्शन घबरा गया कि अब भयानक कांड होगा। इस सार्वजनिक जगह पर फजीहत होगी।
कृष्णा जी उसी मेज पर आयीं। सुदर्शन को काटो तो खून नहीं। वह आने वाले किसी भी क्षण होने वाले भयानक विस्फोट का इंतजार करने लगा। लेकिन कृष्णा जी ने कुछ नहीं कहा। पर्स मेज पर रखा और चुपचाप टायलेट की तरफ चली गयीं। सुदर्शन ने राहत की सांस ली। ब्रीफकेस उठाया और फुर्ती से खिसक गया।
थोड़ी देर बाद कृष्णा जी आयीं तो सुदर्शन को न पाकर मायूस हुईं।
कुछ दिन बाद उन दोनों का समझौता हो गया। सुदर्शन घर चला गया। वे अच्छे पति-पत्नी की तरह रहने लगे। कृष्णा जी भी एक दफ्तर में काम करती थीं। एक शाम सुदर्शन ने उन्हें टी हाउस में मिलने का समय दे रखा था। वह मेज पर बैठा इंतजार कर रहा था। इत्तफाक से हरिपाल भी मौजूद था।
कृष्णा जी आईं और पर्स मेज पर रखकर टायलेट की तरफ चली गयीं। हरिपाल ने सुदर्शन को उंगली लगायी, ”सुदर्शन मौका है। भाग जा!”
टी हाउस में दिल्ली के कोने-कोने से, तरह-तरह के जीव आते। बहुत से नाम और उनसे ज्यादा बेनाम चेहरों का हुजूम लगा है। उन सबकी अपनी-अपनी विचार धाराएं, अपने-अपने सामाजिक सरोकार, अपने-अपने गम, अपनी-अपनी खुशियां, अपनी-अपनी कुंठाएं और अपने-अपने अहंकार थे। उन सबकी अलग-अलग दुनिया थी, फिर भी वे सब एक थे। उनमें इतना प्यार था कि एक दूसरे को नफरत करने के लिए मजबूर पाते और इतनी नफरत थी कि प्यार किये बिना रह न पाते। यह लव एंड हेट का अजीब फिनोमिना था। टी हाउस सिर्फ बौद्धिक अय्याशी का अड्डा न था। यह एक नशा था, जिसके बिना चैन न मिलता।
उस समय सिर्फ दिल्ली में नहीं, शायद पूरे भारत में बुद्धिजीवियो का सबसे बड़ा अड्डा टी हाउस ही था। अलग-अलग भाषाओं के लेखक, पत्रकार, चित्रकार, संगीतकार, समाजशास्त्री, राजनीतिज्ञ और दूसरे अनुशासनों के बुद्धिजीवी टी हाउस आते। इनके अलावा देश के दूसरे शहरों और धुर देहात तक के चेहरे वहां दिखाई देते। कभी-कभी हिंदी साहित्य पर शोध करने वाला कोई विदेशी शोधार्थी भी किसी मेज पर बैठा मिलता। आखिर क्या कशिश थी, जो इतने लोग दूर दराज से चल कर टी हाउस में खिंचे चले आते? टी हाउस की अपनी भरी-पूरी, बेहद नशीली संस्कृति थी, जो चुंबक की तरह लोगों को अपनी तरफ खींचती। पूरी दिल्ली में यह सबसे बड़ा अड्डा था, जहां तमाम लोगों से एक साथ मिलने, अपनी कहने, दूसरों की सुनने और एक खुशनुमा शाम बिताने का सुख मिलता।
दिल्ली और बाहर के तमाम लोग टी हाउस जरूर आते, लेकिन आभिजात्य के सताये कुछ ऐसे लेखक भी थे, जो टी हाउस को जनता ढाबा समझते और वहां आना अपनी शान के खिलाफ मानते। ऐसे महामहिम किसी पॉश रेस्तरां में बैठे, अपनी चार चावलों की खिचड़ी अलग पकाते।
टी हाउस कई बरस तक गुंजान रहा और दिल्ली की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा। लेकिन वक्त ने करवट बदली। बाजार की संस्कृति का दबाव बढऩा शुरू हुआ। टी हाउस के संचालकों को एक बेशकीमती जगह पर टी हाउस जैसा व्यवसाय चलाना, घाटे का सौदा लगने लगा। नतीजा यह कि टी हाउस बंद कर दिया गया और उसकी जगह एक भव्य टैक्सटाइल शोरूम और एक भव्य रेस्तरां खोल दिया गया।
टी हाउस उजड़ गया तो कुछ वर्कर्स ने सहकारिता के आधार पर जनता कॉफी हाउस खोला। कुछ बरस वह चला। लेकिन बाजार की संस्कृति पीछा करती हुई यहां भी आ पहुंची। थियेटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग और काफी हाउस को गिरा कर तलघर में वातानुकूलित पालिका बाजार बना दिया गया।
काफी हाउस के कुछ शैदा मोहन सिंह प्लेस के काफी हाउस में जाते रहे। शायद इक्का-दुक्का अब भी जाते हैं। लेकिन पहले टी हाउस और फिर कॉफी हाउस के उजडऩे के साथ-साथ वह चौपाल संस्कृति भी बिखर गयी, जिसे  टी हाउस ने जन्म दिय था और बरसों पोसा ।
बाजार संस्कृति ने केवल उन जगहों पर ही हमला नहीं किया, जहां टी हाउस संस्कृति पनपी थी, उसने टी हाउस के शैदाओं के दिलो-दिमाग पर और भी तेज हमला किया। दिल्ली भयावह गति से फैलती जा रही थी। वह अपनी सीमाएं लांघ कर उत्तर प्रदेश और हरियाणा में अतिक्रमण कर रही थी। मध्य आय वर्ग के टी-हाउसिये छिटक कर शहर के हाशिये पर जा गिरे थे। लोगों के बीच भौगोलिक और उसके साथ-साथ भावनात्मक फासले बढ़ रहे थे। टी हाउस और दूसरे अड्डों पर होने वाले बेबाक बहस-मुबाहसों की जगह भव्य सभागारों में होने वाली औपचारिक और निर्जीव चर्चाओं ने ले ली। पुस्तकें महंगी से और महंगी होकर आम पाठक की पहुंच से बाहर हो गयीं। जीवंत पत्रिकाएं एक-एक कर बंद हो गयीं। लेखक और पाठक का आपसी रिश्ता कमजोर पड़ गया। दूरदर्शन के माध्यम से हासोन्मुख भूमंडलीय संस्कृति का दैत्य सीधे घरों में घुस आया और हमारी चेतना को चाट कर नंगई की अपसंस्कृति का भीषण प्रहार करने ल गा। हर कोई अकेला और बेगाना हो गया। सबने अपने भीतर एक-एक अंध-गुहा बना ली और उसमें खुद ही कैद हो गये।
महानगर दिल्ली के इस उत्तर प्रदेशीय हाशिये पर बैठा, सोच रहा हूं- टी हाउस की जवानी के वे दिन भी क्या थे! उनमें जीवन की कितनी उचास थी, कितनी मचंग, कितना नशा! व्यक्ति का समाज के साथ कितना गाढ़ा रिश्ता था। टी हाउस की चौपाल संस्कृति के बिखरने के साथ-साथ वह रिश्ता भी बिखरता गया। अब यह संस्कृतिविहीन दिल्ली एक विराट रेगिस्तान है, जिसमें दूर-दूर तक भी नखलिस्तान नजर नहीं आता

साहित्य पर अश्लील तोहमत

पिछले कुछ समय से हिंदी साहित्य में कोई वैचारिक और रचनात्मक हलचल तो नहीं हो रही है, लेकिन विवाद नए-नए उठ रहे हैं। हिंदी अकादमी, दिल्ली में उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति, सैमसंग पुरस्कार, उपन्यास द्रोपदी को लेकर हंगामा और अब केदारनाथ सिंह द्वारा शलाका सम्मान ठुकराना। उनके अलावा पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रियदर्शन, रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल और विमल कुमार ने भी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है। इसके पीछे वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान नहीं दिया जाना है। दरअसल, हिंदी अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया था। बाद में इसे रोक दिया गया। असल में साहित्य से कुछ लोगों ने वैद पर अश्लील साहित्य लिखने का आरोप लगाया था। वैसे तौर से उनके उपन्यास नासरीन और बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां को लेकर आपत्ति जताई थी। हालांकि हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने यह कहा कि अकादमी ने कभी आधिकारिक तौर पर कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान देने या नहीं देने की बात नहीं कही।
वैद का लेकर हो रहे विवाद ने एक बार फिर साहित्य में अश्लीलता के सवाल को जीवित कर दिया है। यह सवाल सदियों पुराना है। साहित्य के जन्म के साथ ही इस तरह के विवाद उठने लगे। समय-समय पर इसे लेकर खूब हो-हल्ला मचा। प्रसिद्ध कथाकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र के साहित्य को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी घासलेटी साहित्य मानते थे। उन्होंने इसके विरोध में व्यापक अभियान भी चलाया था और गांधीजी से भी इसकी शिकायत की थी। हालांकि गांधीजी को उग्र की रचनाएं अश्लील नहीं लगीं और उन्होंने क्लीन चिट दे दी। अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता और परिवेश से है। हम जिस समाज में रह रहे हैं, जो इसके लिए अश्लील है, वह दूसरे समाज के लिए सहज हो सकता है। स्थिति इसकी उल्टी भी संभव है।
अगर लेखक की मानसिकता स्वस्थ और समाजपरक है तो उसमें अश्लीलता आ ही नहीं सकती है। ऐसा वर्णन पढ़कर पाठक उत्तेजित और यौनकांक्षी नहीं होगा, बल्कि उसके मन में घृणा और आक्त्रोश ही उत्पन्न होगा। अस्वस्थ मानसिकता का रचनाकार सेक्स और नग्न चित्रण केवल क्षणिक उत्तेजना के लिए करेगा। दूसरी ओर कुछ रचनाकार सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए भी इस तरह का चित्रण करते हैं, लेकिन उनके लेखन को कोई स्थाई महत्व नहीं मिलता। इसके अलावा अश्लीलता समय सापेक्ष है। समय के अनुसार इसकी परिभाषा भी बदलती रही है। आज से चालीस-पचास पहले फिल्मों में जिन दृश्यों को अश्लील माना जाता है, आज उन्हें सहज मान लिया गया है।
चर्चित कथाकार भीमसेन त्यागी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अश्लीलता का प्रश्न उतना ही पुराना है, जितना साहित्य। वास्तव में अश्लीलता साहित्य में नहीं, बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में होती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करने वाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का यामा-द-पिट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवदेना यामा-द-पिट में है, वह उसे विश्व की श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।
गोर्की की कहानी एक इंसान का जन्म में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए कहीं अश्लीलता अनुभव नहीं करता।
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कहानी जिदंगी और गंदगी में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदू नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता है।

लेखक बडे़ मूल्यों के लामबंद हों : सेरा यात्री

स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में हर कोई जानता है। अब तो बच्चे भी इस बारे में जानने लगे हैं। यदि लेखक सेक्स का वर्णन रसलोलुप होकर करता है तो वह अश्लील है। यदि मर्यादा में रहकर वर्णन किया जाता है तो वह अश्लील नहीं है।
अश्लीलता का सबसे अधिक आरोप मंटो पर लगा है। वेश्याओं का वर्णन उनकी रचनाओं में बहुत हुआ है। लेकिन उन्होंने ऐसा वर्णन नहीं किया कि जो पाठक के मन में यौन इच्छा या यौन उन्मुक्तता पैदा करता है।
अश्लीलता अगर लेखक का उद्देश्य ही बन जाए तो गलत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तस्लीमा नसरीन है। उन्होंने कैसे विभिन्न पुरुषों के साथ संभोग किया, कैसे इंज्वाय किया, इसका उल्लेख उनकी रचनाओं में है। इसे वह मुक्त सेक्स कहती हैं। उन्होंने लेखन से धर्म, भ्रष्टाचार, कुपोषण आदि के विरुद्ध जो संघर्ष किया है, वह इसके नीचे दब जाता है।
लेखक जब बडे़ मूल्यों से हटकर शरीर पर अटक जाता है तो उसकी रचना में अश्लीलता आ जाती है।
मान लिया कि कृष्ण बलदेव वैद की रचनाओं में अश्लीलता है। जब उनका नाम घोषित कर दिया और उनसे स्वीकृति ले ली तो हिंदी अकादमी का नैतिक दायित्व है कि उन्हें पुरस्कार दे। हाल ही में तेलुगु के लेखक के उपन्यास द्रोपदी को लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में हंगामा हुआ। उनका नाम घोषित कर किया जा चुका था इसलिए विवाद के बाद भी उन्हें पुरस्कार दिया गया।
आज समाज में बडे़ मूल्यों के लिए संघर्ष खत्म हो गया है। लेखकों को इसके लिए लिए लामबंद होना चाहिए। जन साधारण की समस्याओं के लिए लेखक एकजूट हों। किसे पुरस्कार दिया गया, किसे नहीं, ये बहुत छोटी चीजें हैं। बड़ी बात समाज में हो रहे अनाचार के विरुद्ध एकजूट होकर संघर्ष करना है।

अश्लीलता का संबंध सोच से : कांतिकुमार जैन

अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता, हमारे संस्कारों से है। हम सब अभी भी विक्टोरिया युगनी प्रूडरी से बाहर नहीं निकाल पाए हैं। कहते हैं कि विक्टोरिया के समकालीन कुलीन लोग अपने ड्ाइंग रूम की मेजों को मेजपोश से ढककर रखते थे ताकि तेज की नंगी टांगें आगंतुकों की आंखों से ओझल रही जाएं। हम अभी तक इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने निराला के प्रसिद्ध गीत दूर देश की वामा, आए मंद चरण अभिरामा, उतरे जल में अवसन श्यामा, अंकित उरछवि सुंदरतर हो की प्रशंसा करते हुए लिखा कि निरालाजी इस गीत में अवसन के स्थान पर नंगी कर देते तो न छंदोभंग होता, न यति टूटती पर गीत अश्लील हो जाता। अर्थात् अश्लील अवसन शब्द नहीं है। अश्लील नंगा शब्द है। अभिजनोचित, सुरुचिपूर्ण सभ्य होने का दर्प। हमें देखो, हम कितने संस्कृत हैं, तुम कितने असंस्कृत। तुम्हारें पांव पांव, हमारे पांव चरण वाली मानसिकता।
कालिदास ने मेघदूत में तन्वीश्यामा शिखरिदशना वाले प्रसिद्ध छंद में स्तन भर शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका छत्तीसगढ़ अनुवार क्या हो? छत्तीसगढ़ में स्त्री के बडे़-बडे़ स्तनों को थन कहना आम है। दाई रे, ओकर कतेक बडे़-बडे़ थन हवै। छायावाद के वरिष्ठ कवि मुकुटधर पांडेय ने मेघदूत के अपने छत्तीसगढ़ अनुवाद में लिखा-
झुके थोरकुन थनभारा ले, कूला हर गरुवावै
तेकर कारन आलस मा वे जल्दी चले न पावै
कालिदास के स्तन भार को किसी ने अश्लील नहीं कहा था, किंतु छत्तीसगढ़ में इस अनुवाद के कारण मुकुटधर जी पर भारी आरोप लगे। देववाणी में जो अश्लील नहीं है, हिंदी में या उसकी बोलियों में अनुदित होते ही वह अपनी श्लीलता खो देता है। पाण्डेय जीने इस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बडे़ दुख से मुझे लिखा था, मेघदूत के छत्तीसगढ़ अनुवाद को लेकर मुझ पर छींटाकशी शुरू हो गई है। निस्संदेह मेघदूत में एकाध स्थान पर नग्नताई पाई जाती है, अभी हम नेकेड और न्यूड का अंतर नहीं समझ पाएं हैं। खैर, आलोचना महाकवि की समझी जाएगी, मैं तो मात्र आलोचक हूं।
लेखक के चर्चित लेख- अश्लीलता का हिंदी चेहरा का अंश

मेरी पाठशाला

मैंने रैक में किताब के ऊपर किताब रख दी।
”अनुराग, यह क्या कर रहा है? ऐसे किताब के ऊपर किताब या कोई चीज नहीं रखते। कवर खराब हो जाता है।”
मैंने चौंककर देखा, कोई नहीं था।
मैं लेख लिख रहा था। शब्द गलत लिखा गया। मैंने उस पर चार-पांच बार पेन फेर दिया।
”यह क्या किया? एक बार पेन फेरने से नहीं पता चल रहा था कि शब्द काट दिया? गंदा करने की क्या जरूरत थी?”
मैंने सिर उठाकर देखा, कोई नहीं था।
अगस्त, 1993 का पहला सप्ताह। दिनभर जोरदार बारिश हुई थी। शाम को बारिश बंद हुई। मैं कंप्यूटर पर टाइप कराए गए अपने उपन्यास का प्रिंटआउट लेकर भीमसेन त्यागी से मिलने चल दिया।
उन दिनों मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था। मेरा रूम-पार्टनर त्यागीजी के प्रिंटिंग पे्रस में काम करता था। उसने त्यागीजी से मिलवाने की बात कही थी।त्यागीजी घर में अकेले थे। लुंगी और बनियान में। परिचय के बाद उन्होंने पूछा, ”किन-किन लेखकों की कौन-कौन-सी किताबें पढ़ी हैं?” 
मैंने बताया तो बोले, ”अभी तुम्हें बहुत पढऩे की जरूरत है। पहले खूब पढ़ो। फिर लिखने की सोचो।” 
मैंने उपन्यास का प्रिंटआउट दिखाया। उन्होंने दो-तीन पेज पढ़े। गलतियों पर निशान लगा दिए। मैं उपन्यास के नेगेटिव बनवा चुका था। केवल छपाई शेष थी। इसमें तीन-चार हजार रुपए खर्च हो गए थे। मैंने त्यागीजी को यह बात बताई।
उन्होंने सलाह दी कि यह उपन्यास मत छपवाओ। इसमें बहुत-सी कमियां हैं। इससे तुम्हें फायदा होने के बजाए नुकसान ही होगा। इसमें जो पैसा लग गया है, उसे भूल जाओ।
न जाने क्यों मेरे मन में यह बात बैठी हुई थी कि बड़े लेखक नए लेखकों को आगे नहीं आने देना चाहते। मैंने दहेज की समस्या पर उपन्यास लिखा था। मेरा खयाल था कि यह उपन्यास समाज को नई दिशा देगा और दहेज समस्या के समाधान में सहायक होगा। मुझे लगा कि त्यागीजी ने इसे जान-बूझकर खारिज कर दिया है। इसलिए मुझे उनकी सलाह अच्छी नहीं लगी। मैं मायूस होकर लौटा, लेकिन उपन्यास छपवाया नहीं।
त्यागीजी के बहनोई वेदप्रकाश त्यागी बिजली विभाग (अब पावर कारपोरेशन) में कार्यरत हैं। मेरे पापा बिजली विभाग से रिटायर हुए हैं। वेदप्रकाशजी से करीब 27-28 साल पुराने संबंध हैं। 1992 में मैंने पालीटैक्निक की। मैं नौकरी के लिए उनके पास नोएडा आ गया। उन्होंने एक फैक्ट्री में नौकरी लगवा दी।
उन दिनों पापा मवाना, मेरठ में कार्यरत थे। मवाना के नजदीक पेपर मिल खुली। मैं वापस चला गया। वहां आठ-नौ महीने काम किया। एक तो वेतन बहुत कम मिल रहा था, दूसरे पापा रिटायर होनेवाले थे। छोटा भाई आईटीआई कर रहा था। उसके सामने नौकरी की समस्या आनेवाली थी इसलिए वहां नौकरी छोड़ मैं दोबारा नोएडा आ गया। मैं वेदप्रकाशजी के साथ रहकर नौकरी ढूंढऩे लगा। तीन-चार महीने उनके साथ रहा। त्यागीजी उनके यहां आते-जाते रहते थे। वेदप्रकाशजी के बच्चे उन्हें मामाजी कहते, तो मैं भी मामाजी कहने लगा।
एक दिन मामाजी वेदप्रकाशजी के यहां आए थे। उन्होंने मुझे पेन-कागज लेकर बुलाया। मैंने सोचा कि वह कुछ लिखवाना चाहते हैं। उन्होंने तीन-चार लाइनें बोलीं और कागज ले लिया। वह मेरी हैंडराइटिंग देखना चाहते थे। इससे संतुष्टï हुए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जब तक नौकरी नहीं लग जाती, हमारे यहां काम कर लिया कर। कुछ पेमेंट कर दूंगा। इससे आने-जाने का और जेब-खर्च निकल जाएगा। वह साप्ताहिक पत्र ‘जनचेतना’ और साक्षरता अभियान के लिए ‘नवसाक्षर चेतना’ प्रकाशित कर रहे थे। प्रिंटिंग पे्रस चल रहा था। मुझे इनके लिए काम करना था।
मैं प्राय: रोज सुबह उनके यहां चला जाता। ग्राउंड फ्लोर पर पे्रस थी। फस्र्ट फ्लोर पर वे रह रहे थे। छत पर एक छोटा कमरा बना हुआ था। असल में वह रसोई थी। लेकिन ऊपर-नीचे बार-बार आने-जाने में ज्योति भाभी (उनकी पुत्रवधू) को दिक्कत होने के कारण रसोई नीचे ही बना ली। ऊपरवाली रसोई को मामाजी पढऩे-लिखने के कमरे के रूप में इस्तेमाल करने लगे। इसी में किताबों की रैक लगा दी गईं।
यह वह दौर था, जब परिवार पर लगातार आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा था। पे्रस बंद होने के कगार पर पहुंच गया था। ऐसा भी होता कि दो-ढाई सौ रुपए के चलते प्रिंटिंग का आर्डर पूरा न हो पाता और घाटा उठाना पड़ता। पे्रस को जिंदा रखने के लिए हर संभव प्रयास किया गया। जरूरत पडऩे पर मित्रों और रिश्तेदारों से कर्ज लिया गया। मगर तमाम प्रयासों के बावजूद पे्रस अंतत: बंद हो गया और पीछे छोड़ गया मोटा कर्ज। 
मामाजी 1984 के अंत में नोएडा आ गए थे। किराए पर रहे। 1987 में डी-180, सेक्टर-10 की बिल्डिंग खरीदी। 1988 में बेटे विवेक त्यागी ने एम।ए. कर ली। उत्तरप्रदेश फाइनेंस कारपोरेशन से लोन लेकर पे्रस लगाया- चेतना पे्रस। इसके पीछे मकसद था कि बेटा पे्रस संभाल लेगा। आय का साधन हो जाएगा और वे अपना समय लिखने-पढऩे में लगाएंगे। मामाजी का यह सपना फलीभूत नहीं हो सका। अव्यवस्था के कारण पे्रस घाटे में जाने लगा। तमाम तरह की दिक्कतें आने लगीं और मानसिक शांति छिन्न-भिन्न हो गई।
यूपीएफसी की किश्तें समय पर नहीं जा पा रही थीं। पेनल्टी लग गई। नौबत आ गई कि यदि आज पैसा जमा नहीं हुआ तो नोएडा प्राधिकरण फैक्ट्री सील कर देगा।
सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले मैं वहां गया। घर पर केवल मामीजी थीं। घर के बाकी सदस्य पैसे की व्यवस्था करने के लिए गए थे। मामीजी की आंखें भरी थीं। कागजात और आवश्यक सामान एक जगह रख लिया गया था कि दुर्भाग्यवश अगर फैक्ट्री सील हो जाती है तो कम-से-कम जरूरी सामान बाहर निकाला जा सके। हर किसी के जहन में एक ही सवाल था- अब क्या होगा! मैं चुपचाप मामीजी की बातें सुनता रहा। सांत्वना देने की स्थिति में भी नहीं था क्योंकि पैसे की समस्या तो पैसे से ही हल हो सकती थी। मैं काम पर चला गया। सारे दिन मन बेचैन रहा। रह-रहकर खयाल आता कि आज क्या होगा! शाम को वापस आया। जानकारी मिली कि आवश्यक पैसों का इंतजाम हो गया और यूपीएफसी में जमा करा दिया है। फैक्ट्री सील होने से बच गई है। राहत की सांस ली। दिन था 19 सितंबर, 1994। मामाजी का जन्मदिन। परिस्थितियां ऐसी थीं कि सुबह शुभकामना नहीं दे पा रहा था। शाम को बधाई दी।
तत्कालीन संकट तो टल गया, लेकिन उधार की राशि में मोटा इजाफा हो गया। 1995 में प्रिंटिंग पे्रस बेचनी पड़ी। उससे जो पैसा मिला, वह कर्ज के सामने ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ। परिवार पर आर्थिक और उससे भी ज्यादा मानसिक दबाव बढ़ गया।
ऐसी विषम परिस्थितियों में किसी का भी धैर्य चुक सकता था लेकिन मामाजी ने साहस से मुकाबला किया। उन्हें इस मुद्दे को लेकर हमने न कभी झींकते देखा और न घबराते। बाहर का आदमी तो जान भी नहीं सकता था कि यह परिवार इस समय किन कांटों-भरी राह से गुजर रहा है।
कुछ दिनों बाद मैं उन्हीं के साथ रहने लगा। मामाजी ने ऊपरवाला कमरा मुझे दे दिया। खुद नीचे ही सोने और पढऩे-लिखने लगे। परिवार के सभी सदस्य बहुत अच्छे हैं, इसलिए जल्द ही आत्मीय संबंध हो गए।
मामाजी के साथ रहते हुए सही मायनों में ‘लेखन की पाठशाला’ में भर्ती हुआ। मेरी भाषा में अशुद्धियां थीं। कभी-कभी शब्दों के चयन में गलती कर देता। उन्होंने मेरी शिक्षा के बारे में पूछा। कहने लगे कि तुझे किसी ने भाषा का ज्ञान नहीं दिया और न ही ऐसा माहौल मिला, इसलिए गलती करता है। लेकिन इसमें घबराने की कोई बात नहीं।
मामाजी ने भाषा सुधारने पर बहुत जोर दिया। उनका कहना था कि जिसकी भाषा ही भ्र्रष्टï है, वह कैसा लेखक? लेखक का भाषा पर पूरा अधिकार होना चाहिए। कुछ बड़े लेखकों की भाषा में बाद तक भी अशुद्धियां रह जाती हैं, लेकिन इसे आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता। रचना में भाषागत अशुद्धियां होंगी तो संपादक तुझे लेखक मानने से इनकार कर देगा और रचना पर विचार भी नहीं करेगा, इसलिए सबसे पहले भाषा पर ध्यान दे। मैं तेरी रचनाएं देखकर गलतियों पर निशान लगा दिया करूंगा। एक कॉपी पर इन्हें नोट करते रहना। सही शब्द को कम-से-कम पांच बार लिखना। धीरे-धीरे यह कमी दूर हो जाएगी। किसी शब्द को लेकर कनफ्यूजन हो सकता है। वह गलती क्षम्य है, लेकिन सामान्य शब्दों में गलती नहीं होनी चाहिए। 
परिवार पर आर्थिक दबाव बेहद बढ़ गया था। सवाल उठा कि इससे कैसे छुटकारा पाया जाए। परिवार के सभी सदस्य इस पर चर्चा करते। योजना बनती, बिगड़ती। लेकिन कोई उचित समाधान नहीं मिल रहा था। कर्जा लाखों में था। उसमें पांच-दस हजार रुपए महीने की आमदनी से कुछ होनेवाला नहीं था। काफी सोच-विचार कर मामाजी ने फैसला किया कि वह मुंबई जाकर फिल्मी लेखन करेंगे।
मामाजी फिल्मी लेखन को अच्छा नहीं मानते थे। लेकिन समस्या का समाधान तो करना ही था। उन्होंने तय किया कि मुंबई केवल तब तक रहेंगे, जब तक कर्जे का एक बड़ा भाग चुकता न हो जाए।
वह सितंबर, 1995 में मुंबई चले गए। बीच-बीच में नोएडा आते। पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 13 अपै्रल, 1997 को मेरी शादी हुई। उनके आने का कार्यक्रम था, नहीं आ पाए। 9 अपै्रल का लिखा उनका पत्र मिला। शादी में परिजनों, मित्रों ने अपने-अपने तरीके से शुभकामनाएं दीं, बधाइयां दीं और उपहार दिए। लेकिन मामाजी ने जो शुभकामनाएं दीं, वे मेरे लिए अद्भुत हैं। उन्होंने लिखा, ”विवाह का निमंत्रण मिल गया है। मेरा आने का पक्का इरादा था। 5 तारीख का रिजर्वेशन भी करा लिया था। लेकिन यहां कुछ अर्जेंट काम ऐसा आ गया कि रिजर्वेशन कैंसिल कराना पड़ा।
”मैं शरीर से नहीं आ सकूंगा, लेकिन मन से उत्सव में ही रहूंगा। कामना करता हूं- तुम्हारा वैवाहिक जीवन सुखी, समृद्ध तथा यशस्वी हो।
”आशीर्वाद की औपचारिकता मुझे नहीं आती, लेकिन मेरा आशीर्वाद तो साक्षात तुम हो!”शादी के बाद बहू के साथ मुंबई घूमने आओ।
”अमित स्नेह- तुम दोनों को!” 
डी-180 कोने की बिल्डिंग है। आर्थिक दबाव से छुटकारा पाने के लिए सड़क की ओर दुकानें निकाल दी गई थीं। फैक्ट्री के पीछे एक लंबी दुकान निकली। उसमें शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने फोटोस्टेट की मशीन लगाई हुई थी। उसने प्रस्ताव रखा कि सभी दुकानदार मिलकर पांच-छह लाख रुपए दे देंगे। आप लिखकर दे दो कि यह जगह तुम्हें दी जा रही है। मालिकाना हक आपका ही रहेगा। परिवार के कुछ सदस्यों को यह प्रस्ताव अच्छा लगा। इसमें उन्हें कुछ बुराई नहीं दिखाई दी, तत्कालीन संकट में थोड़ी राहत मिल रही थी। लेकिन मामाजी की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने विवेकजी से कहा, ”बेटे, शर्मा की नीयत ठीक नहीं है। यह फैक्ट्री कब्जाना चाहता है। सबसे पहले इसे नोटिस देकर यहां से निकालो। यह यहां रहेगा तो और दुकानदारों को भी उल्टी-सीधी पट्टïी पढ़ाता रहेगा।” दुकानदारों से सिक्योरिटी और किराया एडवांस लिया हुआ था। उसको निकालने के लिए करीब पच्चीस हजार रुपए की जरूरत थी। इस बात से मामाजी घबराए नहीं। उन्होंने जैसे-तैसे पैसे का इंतजाम किया और शर्मा को अलविदा कह दिया।
विवेकजी एक दैनिक समाचारपत्र में नौकरी कर रहे थे। भाभी किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही थीं। दोनों की सीमित आय से लाखों का कर्जा उतारना असंभव था। दूसरी ओर बच्चे बड़े हो रहे थे। खर्चा भी बढ़ रहा था। इसका एक ही उपाय था कि अपना कोई काम किया जाए और इस तरह अक्तूबर, 1999 को शुरू हुआ ‘ज्योति ग्राफिक्स’। एक छोटी फोटोकॉपी की मशीन लगाई गई। शुरू-शुरू में समस्याएं अधिक आईं। एक तो अनुभवहीनता, दूसरे कभी मशीन खराब तो कभी कोई और तकनीकी समस्या। मशीन एक ही थी। कोई खराबी आ जाती तो काम ठप्प हो जाता।
जुलाई, 2000 को मामाजी मुंबई से आए हुए थे। मैं मिलने गया।
”यहां कुछ काम नहीं हो पा रहा है। इससे मुंबई ही अच्छे थे। वहां से तो यह सोचकर आया था कि यहां अनुराग जैसे बच्चों से मुलाकात होती रहेगी, लेकिन वह तो दुर्लभ हो गया है।” मामाजी ‘वर्जित फल’ के पन्नों को देखते हुए बोले।
मैंने बताया कि इंटरव्यू के चक्कर में लगा था। इस वजह से नहीं आ पाया।
उनकी नजर पांडुलिपि के पेज नंबर 196 पर पड़ी। वह उलटा लगा था। ”यह कैसे हो गया? वैसे तो कंपोजिंग करते समय ऑपरेटर भी इसे ठीक कर लेता। लेकिन ऐसी गलती हो कैसे गई?” वह टैग से पेज निकालने लगे।
ज्योति भाभी आ गईं। बोलीं, ”आज पापा का उपन्यास पूरा हो गया है। मैं कितनी देर से कह रही हूं कि ऊपर जाकर आराम से बैठकर काम कर लो, लेकिन जा नहीं रहे। पसीने से कैसे भीगे हुए हैं।”
मामाजी ने पेज सीधा किया और टैग लगाते हुए बोले, ”इस बात का भी बहुत असर पड़ता है कि पांडुलिपि नीट और क्लीन हो। खासकर शुरुआती दौर में।” वह आगे बोले, ”यह उपन्यास पूरा हो गया है। अब मैं अपना बड़ा उपन्यास शुरू करूंगा। उसे शुरू करने का उत्साह जरूर है। यदि बड़ा उपन्यास शुरू कर देता तो यह अधूरा रह जाता। मैंने निश्चय कर लिया है कि साल में कम-से-कम छह किताबें पूरी करूंगा। भले ही छपें नहीं, लेकिन प्रकाशक के पास तो चली जाएं। किताबें तैयार हैं। थोड़ा-बहुत काम करना है। कुछ मैटर कट जाएगा तो कुछ बढ़ जाएगा।”
 फोटोस्टेट मशीन खराब थी। मामीजी गुस्से में बोलीं, ”यह मशीन राक्षस हो गई है। जितना कमाती है, उतना खा जाती है।”
मामाजी मुस्कुराए, ”अनुराग, तुझे एक किस्सा सुनाता हूं। हमारे एक परिचित ने गाड़ी ली। उसका रजिस्ट्रेशन देहरादून कराया। इसका नियम है, जहां का रजिस्ट्रेशन होगा, वहीं से रिन्यू कराना होता है। वह रिन्यू कराने देहरादून जा रहे थे। जो भी मिलता, उसी से कहते, ‘चल तुझे देहरादून घुमा लाऊं।’ लोगों ने सोचा- आना-जाना फ्री है और जो ले जाएगा खाना उसके जिम्मे रहेगा ही। कई लोग तैयार हो गए।”
देहरादून में बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। एक कोठी में आरटीओ का दफ्तर था। वहां आम के कई पेड़ थे। एक पेड़ के नीचे सभी बैठ गए। आम पके हुए थे। एक कौवा पेड़ पर बैठा था। वह जैसे ही डाल हिलाता, आम टप से नीचे। एक आदमी बड़ा खुश होता हुआ आम सबकी ओर बढ़ा देता, ‘लो जी, आप भी खाओ। आप भी लो।” वह ऊपर की ओर देखते हुए बोला, ‘वाह! काकभुशंडीजी वाह! वाह! काक ऋषिजी, वाह!’ थोड़ी देर में आम गिरने बंद हो गए। उसने ऊपर देखा। कौआ उड़कर दूसरे पेड़ पर चला गया था। वह गुस्से में चिल्लाया, ‘कौआ ढेढ़ उड़ गया।’ ”
कहकर वे जोर से हंसे, ”यही तेरी मामी का हाल है। कल कह रही थी कि यदि ऐसे ही मशीन चलती रही तो एक-डेढ़ साल में कर्जा चुकता हो जाएगा। आज मशीन खराब हो गई तो उसे राक्षसी बना दिया।” 
मैं प्रकाशित रचनाओं की कटिंग मुंबई भेजता रहता था। मैंने पत्र में वहां आने की इच्छा जाहिर की और कहानी ‘भूख’ भेजी।
मामाजी ने 12 जून, 1997 को भेजे पत्र में लिखा, ”तुम्हारे पत्र और कहानी सब मिले। कटिंग्स भी समय-समय पर मिलती रहीं। तुम्हारी लिखने की प्रगति देखकर संतोष होता है। लेकिन अभी तुम्हें बहुत गहरे अध्ययन और मनन की आवश्यकता है।
”कहानी ‘भूख’ मैंने आते ही उत्सुकतापूर्वक पढ़ी थी। आज फिर पढ़ी। यह दैहिक स्तर पर ही अटक गई है। मानव-मन की किसी सूक्ष्म अनुभूति का स्पर्श नहीं करा पाती। दिक्कत यह है कि इसमें समस्या का गांभीर्य स्थापित नहीं होता। और, समस्या ही स्थापित नहीं होगी तो कहानी का आधार क्या होगा? सवाल समस्या के छोटी या बड़ी होने का नहीं। महत्वपूर्ण सवाल उसे गंभीरता से फील करने और कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने का है। राष्टï्रीय तथा अंतरराष्टï्रीय महत्व के मुद्दों पर बहुत निकृष्टï कहानियां लिखी गई हैं और एक साधारण-सी घटना पर मास्टरपीस।
”मेरी राय है कि तुम लिखने में जल्दबाजी न करो। जो भी थीम आए, उसे धीरे-धीरे अनुभूति की आंच पर पकने दो। बहुत लगन से अच्छा साहित्य पढ़ो, तभी महत्वपूर्ण रचनाएं आएंगी।
”तुम्हारे यहां आने का प्रस्ताव मेरे लिए खुशी का बायस है। लेकिन यह बहुत महंगा और बेमुरव्वत शहर है। यहां भयानक संघर्ष है और संघर्ष का समापन किसी सार्थक उपलब्धि में नहीं, फ्रस्ट्रेशन में होता है। यह सब मैंने यहां आकर नहीं जाना, पहले से ही जानता था। इसीलिए बहुत थोड़े समय के लिए आर्थिक दबाव के कारण आया। अब ज्यादा समय यहां नहीं रहूंगा। ऐसे में तुम्हें आने की सलाह नहीं दे सकता। बेहतर है, वहीं किसी फैक्ट्री में सर्विस देख लो। साहित्य को आजीविका का साधन मत बनाओ। यह बहुत कठिन है। मैं इतना काम करके भी आज तक नहीं बना सका।”अपनी किताबों के प्रकाशन की चिंता मुझे भी है। लेकिन डेढ़ साल में एक बार भी दिल्ली नहीं आ सका। जब भी आऊंगा, तभी यह काम हो सकेगा! इनके अलावा जो किताबें फाइलों में हैं, उनकीभी व्यवस्था करनी है।”
वह दुर्भाग्यवश ये दोनों काम नहीं कर पाए। 
जैसा कि मामाजी ने लिखा था वह ज्यादा दिन मुंबई नहीं रुके और जनवरी या फरवरी, 2001 को मुंबई को अलविदा कहकर वापस आ गए।
 
मामाजी छठे दशक के अंत में इलाहाबाद गए थे। वहां उनकी भेंट श्री भारतीय से हुई थी। श्री भारतीय ने 1935 में लेखन कला की मासिक पत्रिका ‘लेखक’ का प्रकाशन किया था। उन्होंने ‘लेखक’ के चार अंक भी दिखाए। मामाजी ने इस तरह की पत्रिका के प्रकाशन पर जोर दिया तो श्री भारतीय ने चारों अंक उन्हें दे दिए और कहा कि आप इसका पुनप्र्रकाशन कर सकें तो अवश्य कीजिए। मामाजी ने वादा कर लिया। उनके मन में रह-रहकर बात उठती कि ऐसी पत्रिका जरूर निकलनी चाहिए।
एक दिन उन्होंने ‘लेखक’ के अंक दिखाए और ये सब बातें बताईं। मैंने अंक देखे। अपने तरीके की विशिष्ट पत्रिका लगी। बिल्कुल नया कलेवर। उसमें सभी महत्वपूर्ण लेखकों ने लिखा था। पे्रमचंद ने भी लिखा था।
मामाजी बोले, ”मैं नए लेखकों के लिए इस तरह की पत्रिका निकालना चाहता हूं। इसमें तुझे मदद करनी होगी। लघु पत्रिका निकालना घरफूंक तमाशा देखना है। कोई आर्थिक लाभ इससे नहीं हो सकेगा। सोच-समझ ले।”
मैंने हर संभव सहयोग देने का वादा किया।
उन्होंने पत्रिका की रूपरेखा बनाई। प्रपत्र तैयार किया। लेखक-मित्रों को भेजा। कुछ के घर गए। उनसे रचनाएं लीं। इस तरह ‘भारतीय लेखक” की शुरुआत हुई। जनवरी, 2003 में पहला अंक निकला और इस तरह करीब पांच दशक बाद उन्होंने अपना वादा पूरा किया।
‘भारतीय लेखक’ निकालने का मकसद केवल एक वादा पूरा करना नहीं था। वह गोर्की और अन्य देशी-विदेशी लेखकों का उदाहरण देकर कहते थे कि हर रचनाकार को सृजनात्मक लेखन के साथ-साथ नए लेखकों को भी आगे बढ़ाना चाहिए, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। वे नए लेखकों के प्रति अपने दायित्व को लेकर सजग थे। ‘भारतीय लेखक’ में एक खंड ‘नए लेखकों के लिए’ रखा। इसमें लेखन संबंधी रचनाएं प्रकाशित करते।
‘भारतीय लेखक’ के प्रवेशांक के संपादकीय में उन्होंने पत्रिका निकालने के औचित्य पर लिखा था, ”पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक और पत्रिका की क्या सार्थकता है? यह सवाल बार-बार प्रायोजकों के सामने आया और हर बार एक ही उत्तर मिला- रचना की आंतरिक प्रक्रिया तथा लेखकीय संघर्ष से संबद्ध कुछ ऐसे अहम सवाल हैं, जिनका हर सृजनशील लेखक को सामना करना पड़ता है। उन सवालों के उत्तर न इन पत्रिकाओं के पास हैं, न अकादमियों के पास और न इन लेखक-संघों के पास। उन सवालों के सार्थक उत्तरों की खोज में अंतत: लेखकों को जूझना पड़ता है। इस खोज का ही विनम्र किंतु सजग प्रयास है ‘भारतीय लेखक’।”
इसके अलावा ‘भारतीय लेखक’ के माध्यम से वह हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को एक मंच प्रदान करना चाहते थे। वह कहते थे कि यह केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सचमुच में ‘भारतीय लेखक’ हो। इसके लिए उन्होंने गैर-हिंदीभाषी लेखकों से सहयोग लिया और अन्य लेखकों से संपर्क कर रहे थे।
‘भारतीय लेखक’ का एक महत्वपूर्ण और चर्चित स्तंभ ‘विशिष्ट लेखक’ है। इसमें लेखक का आत्मकथ्य, उसकी एक रचना, रचना-प्रक्रिया, रचनाओं पर मूल्यांकनपरक लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदि प्रकाशित किए जाते हैं। इसका मकसद एक ओर किसी लेखक को फोकस करना, दूसरी ओर लेखक की रचना-प्रक्रिया और आत्मकथ्य के माध्यम से नए लेखक के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना है।
मामाजी का कहना था कि ‘विशिष्ट लेखक’ में जेनुइन राइटरों को लिया जाए, दंदफंद से महापुरुष बन बैठे लेखकों को नहीं। यही कारण है कि उन्होंने शेखर जोशी जैसे सहज, सरल और कलम के धनी लेखक को प्रवेशांक में लिया। ‘महापुरुषोंÓ को तो उन्होंने विशिष्टï लेखक की सूची में भी शामिल नहीं किया।
‘भारतीय लेखक’ की सामग्री ही नहीं, ले-आउट का भी साहित्य जगत में जोरदार स्वागत हुआ। साहित्य-पे्रमियों ने इसे हाथों-हाथ लिया। मामाजी के देहांत तक ‘भार