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भाषा कभी लॉक नहीं होती : कान्ति कुमार जैन

भाषा में आ रहे बदलाव और उसके कारणों पर चर्चित संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का आलेख-
कुछ दिनों पहिले रायपुर के मेरे एक मित्र ने मुझे अपने छोटे बेटे के विवाह का निमंत्रण पत्र भेजा। उस निमंत्रण पत्र में नीचे उनके आठ वर्षीय नाती का आग्रह था- चच्चू की शादी लॉक हो गयी है, उसमें जरूर आना। मैं समझ गया कि यह आठ वर्षीय नाती अमिताभ बच्चन का लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखता होगा। जिसमें अमिताभ हाट सीट पर बैठे हुए प्रतिभागी का उत्तर सुनकर कहते हैं-कांफीडेंट, फाइनल, लॉक करने लायक है ओर प्रतिभागी के हां कहने पर कम्प्यूटर को आदेश देते हैं- कम्प्यूटर जी, कृपया बी को लॉक कर दें। उस नन्हे-मुन्ने की समझ में आया होगा कि लॉक करने का अर्थ होता है- पक्का करना, निश्चय करना। अतः जब उसके चच्चू की शादी पक्की हो गयी तो नये मुहावरे में वह लॉक हो गयी। लॉक करना हिन्दी के किसी शब्दकोश में नहीं है। हो भी नहीं सकता। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की उम्र अभी कुछ साल ही हुई है और हमारे शब्दकोश जीवित भाषा से सौ नहीं तो 85 साल पीछे तो चल ही रहे हैं। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ मैं लहना सिंह ने मगरे में मिली उस लड़की से पूछा था, ‘तेरी कुड़माई हो गई।’ यही 1915 की बात है। 1915 से लेकर आज तक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों ने पढ़ा होगा, तेरी कुड़माई हो गयी। यह शब्द हिन्दी का नहीं है, पर हिन्दी पढ़ने जाने वालों की पिछली सात-आठ पीढ़ियां इस शब्द से परिचित हैं। तेरी कुड़माई हो गयी अर्थात तेरी मंगनी हो गई, पर हिन्दी के किसी कोश में यह शब्द नहीं मिलता। हिन्दी के कोशकार ने कुड़माई को हिन्दी शब्द मानने की उदारता या व्यवहारिकता नहीं बतायी, पर जीवित भाषाएं कोशकारों का अनुशासन नहीं मानतीं। वे जनता के साथ चलती हैं। कुड़माई का अर्थ टटोलने के लिये जब मैंने हिन्दी के शब्दकोश उलटे तो लगे हाथ मैंने बिंदास, ढिशुंग-ढिशुंग, धांसु शब्द भी खोजे। पर ये शब्द भी हिन्दी शब्द कोशों में नहीं हैं। फिक्सिंग, एड्स जैसे शब्दों की हिन्दी शब्द कोशों में तलाश करना बेकार ही है। जब हिन्दी के कोशकार पंजाबी कुड़माई की मंगनी हिन्दी के मुंडे से नहीं करवा पाये तो हिन्दी में लॉक करने की उम्मीद करना बेकार ही है। लॉक करना अब के. बी.सी. का अपना मुहावरा नहीं है, वह अमिताभ बच्चन की कथन-भंगिमा की विशिष्टता भी नहीं है, वह सारे हिन्दी क्षेत्र में और हिन्दी क्षेत्र के बाहर भी, पक्का करने, सुनिश्चित करने का पर्याय बन गया है। जो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ नहीं देखता, वह भी लॉक करने का अर्थ जानता है।
भाषा को जब कबीर ने सैकड़ों साल पहिले ‘बहता नीर’ कहा था तो वे मानों कहना चाहते थे कि भाषा का कोई अंतिम रूप नहीं होता, भाषा को लेकर कोई यह दावा नहीं कर सकता- बस इतना ही, इससे आगे नहीं। भाषा मिथक नहीं मानती। जीवन सदैव आगे बढ़ता चलता है। भाषा भी उसके साथ, उसके पीछे कदम मिलाकर बढ़ती जाती है। यदि ऐसा न होता तो बुद्ध ने प्राकृत को न अपनाया होता। खुसरों ने पंडित प्यासा क्यों, गधा उदासा क्यों जैसी पंक्तियाँ न लिखी होती। गांधी जी ने हिन्दुस्तानी का नारा न दिया होता और अमिताभ ने बड़ी आसानी से पूछा होता पक्का, वह लॉक कर दे क्यों कहता। नवीनता लाने के लिए, सामने वालों को अपनी बात समझाने के लिए, जनता के दिलों में अपने कहे को उतारने के लिए वह कहता है- लॉक कर दें। यह बात हमारे कोशकार नहीं जानते हैं। लेकिन रायपुर के मेरे उस मित्र का आठ साल का नाती जो मुझे अपने चच्चू की शादी पक्की हो जाने पर उसके विवाह में आने की मनुहार कर रहा है, जानता है।
भाषा के बदलने के बहुत सारे कारक गिनाये गये हैं। युद्ध, क्रांति, यात्रा, धर्म, सेना, आक्रमण, नयी खोजें, दूरदर्शन आदि। दूरदर्शन इन सबमें सबसे नया और काफी प्रभावशाली कारक है। दूरदर्शन पर आने वाले विज्ञापनों से, दिखाये जाने वाले चैनलों से, गानों से भाषा घर बैठे बदल रही है। उसकी पैंठ घर-घर तक है। सब लोगों तक है। वह नये युग का कबूतर है। वह कब आपके कानों में ईलू ईलू फूँक जायेगा, पता नहीं। भाषा अब आपके अचेतन पर प्रभाव डालती है, वह कक्षा में नहीं, बेडरूम में आपको अपने तेवर दिखाती है। वह गाँवों, कस्बों, शहरों में एक साथ पहुँचती है। वह पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे सबको आकृष्ट करती है। आज जो भूमण्डलीकरण हो रहा है। उसका सबसे बड़ा सेल्समैन दूरदर्शन है। दूरदर्शन की कृपा से, भूमण्डलीकरण के चलते एक नयी हिन्दी विकसित हो रही है, जिसे हम हिंग्लिश कह सकते हैं। कोका कोला हो जाय, लेट अस एंज्वाय। भौरा बगियन में गाईंग को हर दूरदर्शक समझता है, समझता है और एंज्वाय कराता है और कापी करता है। इसे हम केवल मनोरंजन या विज्ञापन की भाषा कहकर नहीं टाल सकते। यदि हम हिन्दी के लोकप्रिय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के नाम ही देखें तो हम इंडिया टूडे, सांध्य टाइम्स जैसे नाम दिखेंगे। यह नहीं कि इनके हिन्दी पर्याय नहीं हैं या नहीं हो सकते, पर तब उनकी अपील कम हो जायेगी। वे हिन्दी क्षेत्र के बाहर नहीं समझे जा सकेंगे। भाषा इन दिनों हिन्दी का प्रचार करने के लिए नहीं, व्यापार का प्रचार करने के काम में लायी जा रही है । जो माल सबसे ज्यादा बिकेगा, हम उसके व्यापारी हैं। वह माल जिस भाषा में बिकेगा, वह हमारे काम की भाषा है। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में वे सारी भाषाएँ मिट जानेवाली हैं जो व्यापार, वाणिज्य के लिये उपयोगी नहीं रह गयी हैं। आर्थीकरण की प्रक्रिया ने गदबा जैसी भाषा को खतम कर दिया। उपभोक्तावादी भूमण्डलीकरण को संस्कृति हमारी बोलियों को लील जायेगी।
भूमण्डलीकरण का खतरा तो हिन्दी के सामने है ही, हिंदी इन दिनों एक नयी समस्या से जूझ रही है। हिन्दी का पत्रकार, हिन्दी का अध्यापक, हिन्दी का लेखक अब दूर-दूर तक फैले हुए हिन्दी क्षेत्रों से आता है। उसके लिए पंक्ति से बिछुड़ों की जगह डार से बिछुड़ा ज्यादा अपनी अभिव्यक्ति है, झूमना की जगह ‘झीमना’ उसे ज्यादा अपना लगता है। ‘परांदा मेरा लाल है’ कहकर उसे ज्यादा संतोष होता है। ये लेखक अपने साथ अपनी-अपनी बोलियों के शब्द और अभिव्यक्तियां ला रहे हैं। हाथी या जंगली सूअर के बाहरी दांतों के लिए परिनिष्ठित हिन्दी में कोई शब्द नहीं है, पर बोलियों में है- खिरसा। चलते-चलते बैठ जाने वाले पशु के लिए गरियार शब्द है- ‘मरे बैल गरियार, मर्रे वह अड़ियल टटटू’। उबला हुआ अनाज बोलियों में कोहरी कहलाता है। जिसे अंग्रेजी में एम्प्टी स्टमक कहते है, वह बुंदेली में निन्ने मौ (निरन्न मुंह)। जो बिना गुरू का है वह निगुरा कहलाता है। आज भी प्रायवेट परीक्षा में बैठने वालों को नियमित छात्र की तुलना में हीन माना जाता। अनियमित छात्र की तुलना में निगुरा शब्द स्वीकार करने में क्या संकोच है।
अंग्रेजी की लाघव प्रियता अब हिंदी ने भी स्वीकार कर ली है। आज से बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व आधाक्षरों से मिलकर बनने वाले शब्द हिन्दी मे कम ही देखने में आते थे, पर अब तो भाजपा, विहिप, टाडा, मीसा, लिटटे्, इंका हिंदी के समाचार पत्रों में आम हैं। कभी-कभी ये संक्षिप्त अभिव्यक्तियां इतनी प्रचलित हो जाती हैं कि हम उनके पूर्ण रूप भूल जाते हैं। एल.एल.बी., डी.डी.टी., एस.टी.डी., फिपेट ही प्रचलित है, उनके पूर्ण रूप कहीं सुनने में नहीं आते।
आशुतोष रामनारायण को आप नहीं जानते होंगे, पर आशुतोष राना हमेशा से ऐसे ही नहीं थे। जब वे सागर विश्वविद्यालय के विवेकानंद छात्रावास में रहते थे तो बड़ी समस्या आ गयी। दो-दो आशुतोष (दोनों के पिता श्री का नाम भी एक जैसा- रामनारायण)। ऊधम की एक आशुतोष ने, दूसरा दंडित हो। छात्रावास के प्रतिपालक के रूप में मैंने तय किया कि गाडरवारा के आशुतोष को आशुतोष राना लिखा जाये- रामनारायण का संक्षेप। तब क्या पता था कि आशुतोष राना इस कदर चमकदार सितारा बनकर उभरेगा।
एक बार मुझे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाना था मौखिकी के लिए। मैंने आटो वाले से कहा- जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी। वह भौचक मेरा मुंह देखता रह गया। मैंने उसे समझाया। मेरे मुंह से निकला- अरे, भाई जे.एन.यू.। वह बोला- साहब, हिंदी में ऐसा कहिए न। आप पता नहीं अंग्रेजी में क्या-क्या बोले जा रहे हैं।
सो, अब भाषा का हिन्दी होना या अंग्रेजी होना बेमानी हो गया है। भाषा वह जो अपनी बात समझा सके। भूमण्डलीकरण के उस युग में भाषा से हमारी अपेक्षा बदल गयी है। भाषा अब हमें ‘कामायनी’ लिखने के लिए नहीं चाहिए, वह माल बेचने के लिए चाहिये। गालिब के दीवान के अंदर की भाषा की तुलना में हमारे लिए वह भाषा जरूरी हो गयी है जिसमें उपभोक्ता वस्तुओं के रैपर छपते हैं। भाषा की महत्ता अब उसके सुंदर होने में नहीं रह गयी है, उसके अर्थपूर्ण होने में हो गई है। भाषा बदल रही है। नये जमाने के लिए नयी भाषा अमिताभ बच्चन द्वारा जब चार विकल्पों में से किसी एक विकल्प को लॉक करने की बात की जाती है, तब वह प्रकारान्तर से जैसे यह कह रहा है- भाषा को अंतिम रूप से लॉक मत कीजिए, वह शब्द कोशों में बंद होकर अपना दम तोड़ देती है, उसे जीवन के चौराहे पर स्वच्छंद घूमने दीजिए। बच्चे जब बाढ़ पर होते हैं तो उनके कपड़े उटुंग हो जाते हैं। जूते कसने लगते हैं। हिन्दी बाढ़ पर है, उसे उटुंग शब्द कोशों से निकालिए। उसके जूते उसकी चाल के लिए खतरा न बन जायें, इसका ध्यान रहे।
भाषाओं का परिवर्तन : बालकृष्ण भट्ट
भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार, नाटककार और पत्रकार बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी में हो रहे बदलाव को लेकर यह लेख 125 साल पहले लिखा था-
यह एक सामान्य सिद्धांत है कि किसी भाषा पर प्रभुत्व होना या उससे अच्छी तरह परिचित हो जाना तभी लोग मानते हैं जब सीखने वाला उसी भाषा में सीख सके अर्थात चित्तवृत्ति उसके मनन करने के विषयों को उसी भाषा के ढंग से ग्रहण करे। इसके मानने में किसको इनकार होगा कि हर एक भाषा के ढंग निराले ही हैं। दो भाषा व्याकरण की रीति पर कुछ मिलती भी हों, परन्तु वे चीजें जिनको महाविरे कहते हैं कभी नहीं मिल सकते और यही महाविरे ही हर भाषा की जान हैं। हिन्दी और अंगरेजी ही को लीजिए इन दो भाषाओं में थोड़ा थोड़ा कहीं कहीं व्याकरण के नियमों का तो भेद हई है। किन्तु बड़ा भारी अन्तर महाविरों की निराली चाल का है। जहाँ कहीं इन महाविरों की कोई गलती सुनने में आती है तो वह कान से चट खटकजाती है। यह लोग कदापि न समझे कि मुहाविरे अंगरेजी ही में हैं और जब उन पर आक्षेप होता है तो ‘राधा बाजार अंगरेजी’ या ‘बाबुओं की अंगरेजी’ इत्यादि शब्द तज़या निन्दा की राह से कहे जाते हैं। जब तक किसी भाषा में जान है अर्थात रोजमर्रे के काम में उसे लोग वर्तते हैं और पुष्टरीति पर उसके स्थिति बनी रहती है तब तक नये नये मुहाविरे नित्य उसमें बनते ही जायेंगे।
सृष्टि के चेतन पदार्थों का जो नियम है कि वे कभी एक सा नहीं रहते वरन दिन प्रतिदिन परिवर्तन की सान पर चढ़ते ही जाते हैं। यह नियम भाषा के सम्बन्ध में पूरी रीति पर लगता है। क्योंकि कुछ ऐसा मालूम होता कि रुधिर और अस्थि मनुष्य के शरीर से उतना निकट सम्बन्ध नहीं रखते जितना उनकी भाषा रखती है। और इसी कारण बड़े से बड़े पण्डित के आगे कोई अशुद्ध संस्कृत शब्द बोलिए तो वह इतना न खटकेगा जितना एक सामान्य से सामान्य बे मुहाविरे हिन्दी शब्द कान को चोट पहुँचावेगा। क्योंकि संस्कृत अब बोल चाल की भाषा न रह गई। विचार कर देखिये तो जो हिन्दी हम आज कल बोलते हैं वह पहले क्या थी और अब क्या है। अब फारसी उर्दू शब्द उसमें मिलते जाते हैं। क्योंकि जब आपके बड़े बड़े प्रामाणिक हिन्दी कवियों ने फारसी अरबी के शब्द ग्रहण किये तो हमारे और आपके निकाले वे सब जो हमारी भाषा के नस नस में अन्तः प्रविष्ट में हो रहे हैं क्यों कर निकाल सकते हैं। बल्कि बिरुद्धता दिखलाना वैसा ही है जैसा किसी वेगगामिनी नदी के प्रवाह को अकेले एक हाथ से रोककर उलट देने का प्रयत्न करना है। जिस तरह ये शब्द सर्वसाधारण अपनी भाषा में प्रचलित कर लेते हैं या जिस तरह के शब्द अपने नित्य के बोलचाल से लोग निकाल कर फेंक देते हैं उस पर आपको कुछ भी अधिकार नहीं है। आप मनुष्यों की भाषा तभी बदल सकते हैं जब जुलू या हबशी की रपूत का कई आदमी इन देशों में पैदा कर सकें या उससे भी बढ़कर कोई दूसरा प्राकृतिक अनर्थ जो सर्वथा प्रकृति विरुद्ध है कर सकें। क्योंकि यह कैसे संभव है कि प्रबल कालचक्र अपनी निशानी सब चीजों पर न छोड़ जाय। मुसलमानों के अत्याचार का फल जैसा हम अपनी रीति रसम सामाजिक व्यवहार अपनी और अपने यहाँ की स्त्रियों की दशा सबमें पाते हैं तब यह क्यों कर हो सकता है कि मुगलों की भाषा का असर हमारी भाषा में न हो।
सोचिये कि जिस हिन्दी को हम बोलते हैं वह कितने हजार वर्ष से घिसते-घिसते करोड़ै टक्करें खाकर और न जानिये कौन-कौन सी मुसीबतैं झेलकर न मालूम किसका किसका जमाना देखभाल आज हमारे बोलचाल के काम में आ रही है। यदि प्रकृति को भी हिन्दी ही मान लीजिये तो देखिये कि आजकल की हिन्दी से और चांद और पृथ्वीराज के समय की हिन्दी से और चांद के समय की हिन्दी से और कालिदास के समय की हिन्दी से काल का कितना अन्तर है। क्योंकि कालिदास भवभूत प्रभृति कवियों के समय में भी संस्कृत जैसी उनके नाटकों में पाई जाती है केवल विद्वानों ही की मण्डली में बोली जाती थी और वे लोग भी कवित्व शक्ति के प्रकाशक गझिन शास्त्रार्थ के बाद घर जाते रहे होंगे तो नौकरों या लड़के वालों या स्त्रियों से (या सृष्टि सृष्टुराध्या) के जाड़े की बड़े धूम धाम की संस्कृत न बोलते रहे होंगे। जैसा वेद की संस्कृत का व्याकरण व्यास वाल्मीकि तथा कालिदास आदि कवियों की संस्कृत के व्याकरण से कुछ पृथक है वैसा ही नाटक की प्राकृतों का व्याकरण चन्द आदि की प्राकृतों से बिभिन्न है अर्थात जो एक समय के विद्वानों की साधु भाषा थी वही किसी पूर्व समय के बेपढ़े लिखे लोगों की भाषा रही और इस अदल बदल में एक बात सदा ध्यान देने लायक है कि भाषा का परिवर्तन शब्दों पर इतना निर्भर नहीं जितना उसके व्याकरण सम्बन्धी विषयों पर या मुहाविरों के अदल बदल होने पर अर्थात नये शब्दों की भरती होने से कुछ डर की बात नहीं है बल्कि पढ़े लिखे लोग या सर्व साधारण उन शब्दों को अपना कर मान ले तो भाषा और भी पुष्ट हो जाएगी।
फारसी में देखिये तो यही हाल है अंगरेजी में देखिये तो यही हाल है पृथ्वी की और और भाषाओं में यही नियम पाया जाता है कि दूसरी भाषा के शब्द को बेधड़क अपना कर लेते हैं जैसा कोई किसी लड़के को गोद ले वैसा ही वह शब्द उसी भाषा का होकर रह जाता है। एक दूसरी विचित्र बात यह भी है एक भाषा का शब्द जब दूसरी भाषा में जाता है तो बहुधा अपने शुद्ध रूप में कभी नहीं रहता और जब ऐसा अशुद्ध शब्द भी दूसरी किसी भाषा में अच्छी तरह मिल जाता है तो फिर उसके शुद्ध करने का प्रयत्न भी व्यर्थ ही है क्योंकि बोलने वालों के मन या जबान पर जो एक बार चढ़ गया वह कभी नहीं निकल सकता।
भाषाओं के इतिहास में आप हिन्दी की दशा देख यह मत समझ लीजिये कि भाषा की सूरत बदलने के लिये विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाना जरूरी बात है। ऐसा ख्याल करना भूल है कि अगर विदेशियों की भाषा के साथ यह भाषा टक्कर न खाये होती तो शुद्ध रीति पर बनी रहती। क्योंकि वेद की संस्कृति को नाटक और काव्यों की संस्कृत में किसने उतार दिया। या संस्कृत को प्राकृतों के रूप में किसी विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाने ने बदल दिया। और फिर भाषा की बाहरी आकृति पर विदेशियों का कुछ असर पहुँच सकता है पर उसके भीतरी नियमों को तिल भर भी खसकाना किसी के सामर्थ्य में नहीं है। हमने ऊपर कहा कि भाषा भी संसार को इतर चैतन्य सृष्टि का नियम मानती है। इस तरह जैसा पीटने से गदहा घोड़ा नहीं हो सकता उसी तरह बाहर वालों का सम्पर्क भी कुछ बहुत हानिकारक नहीं हो सकता और फिर भाषा के सम्बन्ध में (हानि) शब्द का पूरा पूरा तात्पर्य तय करना बड़ा कठिन है। क्योंकि परिवर्तन के बीज तो भाषा में आप ही आप भरे हैं क्यों संस्कृत से प्राकृत हुई और प्राकृतों से वर्तमान हिन्दी। हम लोगों का केवल इतना ही कर्त्तव्य है कि देखते जायं कि क्या क्या अदल बदल हुए हैं अभेद्य दुर्ग सदृश पाणिनि के व्याकरण के आगे हिन्दी का व्याकरण छोटी सी फूस की झोपड़ी है। ये तो प्रगट है कि अब हमें उतने बड़े व्याकरण की आवश्यकता न रह गई एक वह समय था कि अनेक जंजालों से भरे हुए पाणिनि कात्यायन पंतजलि के सूत्र वार्तिक भाष्य में एक मात्रा का भी हेर फेर हो जाने पर एक बड़ी भारी इमारत को ढहाकर फिर से खड़ी करना था। और इसी का परिणाम यह हुआ कि हमारे यहाँ का व्याकरण ऐसा झंझट से भरा हुआ शास्त्र हो गया जैसा पृथ्वी के किसी कोने में न हुआ होगा। सच पूछिये तो दो गाड़ी के बोझ की पुस्तकें शेखर मंजूषा कैदर बड़े बड़े जगड़ जाल जो रच गये उनमें और है क्या। सिवा इसके कि कीचड़ में पाँव फिर धोओ एक बड़े यत्न और प्रयास से। एक बने बनाये सुन्दर और मनोहर महल को तोड़ फोड़ छिन्नभिन्न कर पीछे पछताय फिर उसी को बनाया है। इन्हीं विफल चेष्टाओं में व्याकरण इतना बड़ा शास्त्र हो गया जिसमें नवीन और प्राचीनों का झगड़ा पढ़ते पढ़ते उमर की उमर बीत जाती है कोरे के कोरे मूर्ख रह जाते हैं। ऐसी सरल भाषा हिन्दी में इस सब खट पट का अब कुछ काम ही न रह गया पर क्यों ऐसा हुआ यह तो आदमी तभी तै कर सकेगा जब और भी सैकड़ों हजारों (क्यों) का उत्तर दे सकेगा। जैसा क्यों मनुष्य संसार में पैदा होता है? क्यों फिर यहाँ से चला जाता है? इत्यादि इत्यादि। अब एक प्रश्न उसके सम्बन्ध में और उठता है कि यदि भाषा की धारा ऐसे अपरिवर्तनीय इतने जोर शोर के साथ बह रही कि उसमें चूं भी नहीं कर सकते तो किसी समय के अच्छे अच्छे लेखकों का क्या दबाव या असर उस पर होता है इस प्रश्न का उत्तर सहज में मिल सकता है। पुरानी हिन्दी को ही लीजिये पुराने ठेठ हिन्दी शब्दों को कोई अच्छी तरह सोच विचार कर लिखने वाला फिर से जिला कर समाज में प्रचलित कर सकता है। अपनी निज की भाषा के कामकाजी शब्दों की मर जाने या मृतक प्राय हो जाने से बचाना अच्छे लेखकों का काम है। बाहरी भाषाओं के शब्दों को अपना सा कर डालना जिससे भाषा दिन प्रतिदिन अमीर होती जाय यह भी एक बड़ा काम है। और सबसे बड़ा काम है अपने भाषा के विषयों को दूना चौगुना करते जाना अर्थात जो जो विषय भाषा में पहले कम थे उनको देना और जो विषय कभी थे ही नहीं उनको बाहर से लाय भरती करना। इस सबका असर यह होगा कि भाषा की नमन शक्ति बहुत बढ़ जायेगी अर्थात जिस तरह के विषय पहले उससे बाहर समझे जाते थे वे जल्द उसकी पहुँच के भीतर आ जायंगे। हमारे देखते ही देखते अंगरेजी मेमों ने हिन्दुस्तानी गहनों का पहनना आरंभ कर दिया जैसा सोने की चूड़ियाँ जड़ाऊ कंठे आदि। इसी तरह यदि हम अपनी मातृभाषा को अंगरे
खबरों के आगे खिंचता नेपथ्य : प्रभु जोशी

पिछले दिनों इन्दौर में हिन्दी के हिंग्लिशीकरण के विरोध में प्रतीकात्मक ढंग से प्रमुख समाचार पत्रों की होली जलायी गई। इस पर समाचार पत्रों के रुख और हिंग्लिशीकरण के प्रति सचेत करता वरिष्ठ लेखक और पत्रकार प्रभु जोशी का आलेख-
दुनिया भर में, ‘विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र‘ की तरह ख्यात भारत ने, जब एक ‘नव-स्वतंत्र राष्ट्र‘ की तरह, विश्व-‘राजनीति में जन्म लिया, तब निश्चय ही न केवल ‘पराजित‘ बल्कि, लगभग हकाल कर बाहर कर दी गयी ‘औपनिवेशिक-सत्ता‘ के कर्णधारों की आँखें, इसकी ‘असफलता‘ को देखने के लिए बहुत आतुर थीं। चर्चिल की बौखलाहटों को व्यक्त करती हुई, तब की कई उक्तियाँ इतिहास के सफों पर आज भी दर्ज हैं। अलबत्ता, उनकी ‘अपशगुनी उम्मीदों‘ के बार-खिलाफ, जब-जब इस ‘महादेश‘ में संसदीय चुनाव हुए, तब-तब इस बात की पुष्टि काफी दृढ़ता के साथ हुई कि बावजूद ‘सदियों की पराधीनता‘ के, भारतीय-जनमानस में एक अदम्य ‘लोकतांत्रिक-आस्था‘ है, जो केवल उसके सोच भर में स्पंदित नहीं है, बल्कि, उसकी तमाम संस्थाओं में, वह लगभग ‘दहाड़ती‘ हुई उपस्थित है। कहने की जरूरत नहीं कि उसके ‘चौथे खंभे‘ में तो ‘नृसिंह‘ की-सी शक्ति है, जो सत्ता के पेट को चीर सकती है। आपातकाल में तो उसने यह पूरी शिद्दत से प्रमाणित कर दिया था कि न केवल ‘लिख कर‘ बल्कि इसके विपरीत ‘न लिखकर‘ भी वह अपनी आवाज को इस तरह बुलन्द कर सकती है, जो हजारों-हजार लिखे गए लफ्जों से कहीं ज्यादा प्रखर प्रतिरोध का रूप रख सकती है। सम्पादकीय की जगह खाली छोड़ने से ‘मौन की तीखी अनुगूँज‘ राष्ट्रव्यापी बन गयी थी।
बहरहाल, इन्दौर नगर में पिछले दिनों ‘गाँधी-प्रतिमा स्थल‘ पर कतिपय बुद्धिजीवियों ने देश भर के कोई बीस-बाइस हिन्दी समाचार पत्रों की एक-एक प्रति जुटाकर, तमाम अखबारों के द्वारा ‘अकारण‘ ही तेजी से किये जा रहे हिन्दी के हिंग्लिशीकरण बनाम ‘क्रिओलीकरण’ के जरिए, जिस ‘बखड़ैली भाषा‘ को जन्म देने में लगे है, उसके प्रति हिन्दी भाषाभाषी पाठकों की पीड़ा और प्रतिकार को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए, उनकी होली जलायी। निश्चय ही प्रतिकार की इस ‘प्रतीकात्मकता‘ से जो लोग असहमत थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए। उनके पास अपने तर्क और अपनी स्पष्ट मान्यताएँ थीं, जबकि अखबारों की ‘होली‘ जलाने वालों के पास अपनी सिद्धान्तिकी थी। दोनों के पक्ष-विपक्ष में एक गंभीर विमर्श भी बन सकता था।
बहरहाल, घटना छोटी-सी और निर्विघ्न सी थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता के विगत तिरेसठ साल के इतिहास में पहली बार घट रही थी। लेकिन देश के किसी भी हिन्दी अखबार ने ( हालांकि, जनसत्ता ने खबर तो नहीं, लेकिन, राजकिशोर के लेख में इस खबर को यथावत और विस्तार से दिया है।) यह खबर प्रकाशित नहीं की। इण्टरनेट के ब्लागों और ‘फेस बुक‘ पर अवश्य इस पर बहस के लिए अवकाश (स्पेस) निकला, लेकिन, आरंभ में उसका रूप जिस तरह की गंभीरता लिए हुए शुरू हुआ था, दूसरे दिन वह ‘भर्त्सना‘ और ‘भड़ास‘ की शक्ल अख्तियार कर चुका था। उसमें मनोरंजन और मसखरी भी शामिल हो चुकी थी। अतः पूरी बात विचार के दायरे से ही लगभग बाहर हो गयी। यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि कदाचित् सम्पूर्ण हिन्दी समाचार-पत्रों ने, इस कार्यवाही को अपनी सत्ता के प्रति एक ‘बदअखलाक चुनौती‘ की तरह लिया है। हो सकता है समाचार-पत्र, चूंकि वे समय और समाज में विचार के लिए वाजिब जगह बनाने की जिम्मेदारी अपने ही हिस्से में समझते हैं, अतः वे इस कार्यवाही के खिलाफ निस्संदेह ठोस बौद्धिक-असहमति रखते हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि जो समाचार पत्र, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, ’समय और समाज’ की खाल खींच कर उसमें नैतिकता का नमक डालने पर तत्पर रहता है, क्या वह तिरेसठ वर्ष के अपने जीवनकाल में मात्र एक दिन किसी एक शहर में अपने पाठक की असहमति और उसका प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक बरदाश्त नहीं कर सकता? जबकि, वह इस महाकाय जनतंत्र की रक्षा का एक सर्वाधिक शक्तिशाली कवच है? क्या समूचा समाचार-जगत ’विचार’ के स्तर पर, व्यक्ति की सी स्वभावगत ’एकरूपता’ रखता है ? जबकि, वह व्यक्ति नहीं संस्था है। मुझे यहाँ याद आता है कि नेहरू के विषय में कहा जाता रहा है कि उनका अहम् काफी अदम्य था और वे अमूमन अपनी असहमति की अवमानना पर तिक्त हो जाते थे। एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। ’टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के तब के ख्यात सम्पादक मुलगांवकर प्रधानमंत्री आवास पर स्वल्पाहार हेतु आमंत्रित थे और जिस सुबह वे आमंत्रित थे, ठीक उसी दिन उन्होंने नेहरू तथा ’नेहरू-सरकार’ के विरूद्ध अपने अखबार में बहुत तीखी सम्पादकीय टिप्पणी छाप दी। लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री-आवास से दूरभाष पर सूचना दी गयी कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से पूर्व में स्वल्पाहार के समय प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित भेंट निरस्त की जा रही है। यह सूचना पाते ही श्री मुलगांवकर ने नेहरू को फोन किया कि ठीक है कि आज का सम्पादकीय आपके तथा आपकी सरकार के खिलाफ है, लेकिन इसका हमारे नाश्ते से क्या लेना-देना है ?
बहरहाल, नेहरू ऐसे थे कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी ठिठक कर बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपनी आलोचना सुन सकते थे। कदाचित् उनके इसी जनतांत्रिक धैर्य को ध्यान में रखकर दुनिया भर की प्रेस उन्हें ’डेमोक्रेटिक प्रॉफेट’ के विशेषण से सम्बोधित भी करती थी।
बहरहाल, इन्दौर नगर में भारतीय समाचार पत्रों को उनकी भाषागत नीति को केन्द्र में रखकर उसके प्रतिरोध में होली जलाने वाली कार्यवाही को लेकर इतना आहत और क्रोधित नहीं होना चाहिए कि उनके द्वारा अकारण किये जा रहे क्रिओलीकरण के खिलाफ शुद्ध गाँधीवादी प्रतिकार की खबर को वे अपने पृष्ठों पर तिल भर भी जगह न दें। यह काम निश्चय ही सम्पादक का नहीं हो सकता। तो क्या हमारे समाचार-पत्रों में एक किस्म की ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप‘ अघोषित रूप से आरंभ है ? जबकि, ठीक उसी दिन ‘दैनिक भास्कर‘ ने क्रिओलीकरण के विरूद्ध लिखी गयी मेरी तीखी टिप्पणी ससम्मान और प्रमुखता से छापी और ‘नईदुनिया‘ ने इसके दो दिन पूर्व ही ‘भाषा के खिलाफ हो रही साजिश को समझो‘ शीर्षक से हिन्दी के ‘क्रिओलीकरण‘ के खतरे की तरफ पाठकों नहीं, सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषियों को सचेत करने वाली उस टिप्पणी को एक ऐसी सम्पादकीय टीप के साथ प्रकाशित किया, जो ‘जन-आह्वान‘ के स्वर में थी। यह तथ्य दोनों ही अखबारों के ‘खुलेपन‘ और ‘जनतांत्रिक उदारता‘ के स्पष्ट प्रमाण हैं। तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उनकी यह ‘उदारता‘ इतनी ज्वलनशील है कि प्रदर्शन की आँच की खबर से भस्म हो सकती है ? हाँ, राजनीतिक सत्ताएँ ‘विचार‘ को खतरा मानती हैं और उससे डरती भी हैं, लेकिन अखबर की ताकत तो ‘विचार‘ ही है। ‘विचार‘ तो उसके लगभग प्राण हैं ? फिर चाहे वे ‘सहमति‘ के रूप में हों, या ‘असहमति‘ के रूप में। मैं मानता हूँ कि आज हमारा समाज जितना ‘सूचना-सम्पन्न‘ हुआ है, उसके पीछे प्रमुख रूप से ‘लिखे-छपे शब्द‘ की बहुत बड़ी भूमिका है, ‘बोले गये‘ शब्द वाले माध्यम की तो प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ केवल मनोरंजन ही है। अतः मुझे उस माध्यम से कुछ नहीं कहना। वह अभी तक परिपक्व ही नहीं हो पाया है। अधिकांश का ‘समाचार-विवेक‘ तो सांध्यकालीनों की सनसनी के समांतर ही है। वे ‘सचाई‘ के साथ फ्लर्ट (!) करते हैं। उनका ‘रिमोट‘ सच के किसी दूसरे ‘सनसनाते संस्करण‘ को बदलने का उपकरण है। लेकिन सुबह के दैनिक अखबार यह मानते हैं कि वह मालिकों का कम पाठकों का ज्यादा हैं। इसीलिए, यदि पाठकों का एक छोटा-समूह ‘संवादपरक प्रतिरोध‘ की संभावना के पूरी तरह निशेष हो जाने के बाद, यदि निहायत ही गाँधीवादी तरीके से अपना विरोध होली जलाकर प्रकट कर रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार-पत्रों में हो आयी उसकी आस्था का पूर्णतः से लोप हो गया है। गाँधीजी ने, जब विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी तो वे ‘वस्त्रोत्पादन‘ के विरूद्ध कतई नहीं थे। ना ही वस्त्र धारण करने के काम से उनकी आस्था उठ गयी थी। वे तो प्रतीकात्मक रूप से एक अचूक सूचना दे रहे थे कि हमें ‘औपनिवेशिक विचार‘ का विरोध करना है, जो वस्तुओं में शामिल है।
अंत में इन दिनों जिस ‘शक्ति-त्रयी‘ की बात की जा रही है, उसमें ‘सूचना‘ भी राज्य सत्ता के समानान्तर मानी जा रही है। ‘सूचना‘ का निर्माण और वितरण करने वाली दुनिया की चार पांच संस्थाओं को ‘सत्ता‘ का सर्वोपरि रूप माना जा रहा है, क्योंकि वे ही ‘विश्वमत‘ गढ़ती या बनाती हैं। उनमें किसी भी मुल्क या उसकी सरकार को ध्वस्त करने की भी अथाह कुव्वत है, लेकिन वे अपने मुल्क के ‘प्रतिरोध की आवाजों‘ की अनसुनी नहीं करती वर्ना, नोम चॉमस्की जैसे लोगों के विचारों की आहटें शेष संसार को सुनाई ही नहीं देती।
मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री चेम्बर लेन के आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दिये गये भाषण की याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘आक्सफर्ड‘ ने हमें जब-जब जैसा-जैसा करने को कहा हमने हमेशा ही ठीक वैसा-वैसा किया; लेकिन जब आक्सफर्ड को हमने अपने जैसा करने को कहा, उसने वैसा कभी नहीं किया और एक ब्रिटिशर की तरह मुझे इन दोनों बातों पर अपार गर्व है।
कुल मिलाकर चेम्बर लेन ने यही कहना चाहा हम ब्रिटिशर्स विचार के स्तर पर इतने उदार हैं। हम अपनी प्रखरतम आलोचना का सम्मान करते हैं, लेकिन, हमें अपने मुल्क की बुद्धिजीवी बिरादरी पर भी गर्व है, जो असहमतियों को व्यक्त करने में भीरू नहीं है। किसी भी देश और समाज में भीरूता का वर्चस्व बौद्धिकों में व्याप्त होने लगे, तब शायद यह मान लेना चाहिए कि वह फिर से पराधीन होने के लिए तैयार हैं।
अंत में कुल जमा मकसद यही है कि लोहिया की विचारधारा में गहन आस्था रखने वाले श्री अनिल त्रिवेदी, तपन भट्टाचार्य और जीवनसिंह ठाकुर ने भारतीय भाषाओं के आमतौर पर तथा हिन्दी के क्रिओलीकरण (हिंग्लिशीकरण) को लेकर खासतौर पर एक शांत और नितान्त निर्विघ्न प्रदर्शन किया तो वस्तुतः वे निश्चय ही इसके दूरगामी खतरों की तरफ पूरे देश और समाज को चेतन करना चाहते हैं। वे ठीक ही कह रहे हैं ‘भाषा का प्रश्न‘ महज भाषा भर का नहीं होता, वह समूचे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का भी अनिवार्य अंग होता है। क्या हमें यह नहीं दिखाई दे रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन ‘ज्ञान समाज‘ के नाम पर, मात्र अपने सांस्कृतिक उद्योग की जड़ें गहरी करने में लगे हैं। ‘कल्चरल इकोनॉमी‘ उनकी अर्थव्यवस्था का तीसरा घटक है, जो अँग्रेजी सीखने-सिखाने के नाम पर अरबों डॉलर की पूंजी कमाना चाहते हैं। हिन्दी, यदि संसार की दूसरी सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा की चुनौतीपूर्ण सीमा लांघने को है, तब उसे एक धीमी मौत मारने के लिए उसका क्रिओलीकरण क्यों किया जा रहा है ? अभी षड्यंत्र की यह पहली अवस्था है, ‘स्मूथ डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात हिन्दी के शब्दों का चुपचाप अँग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापन इसे सर्वग्रासी हो जाने दिया गया तो अंत में आखिरी प्रहार की अवस्था आ जाएगी और वह होगा, देवनागरी लिपि को बदलकर उसके स्थान पर रोमनलिपि को चला देना। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि 5 जुलाई 1928 को ‘यंग इंडिया‘ में जब गाँधीजी ने लिखा कि ’अँग्रेजी साम्राज्यवादी भाषा है और इसे हम हटा कर रहेंगे’, तब गोरी हुकूमत अँग्रेजी के प्रसार प्रचार पर छह हजार पाऊण्ड खर्च करती थी (तब भी यह राशि बहुत ज्यादा थी)। गाँधीजी की इस घोषणा को सुनते ही उन्होंने लगे हाथ अँग्रेजी के प्रचार-प्रसार का बजट बढ़ा दिया। 1938 में बजट की राशि थी तीन लाख छियासी हजार पाऊण्ड। यदि अखबारों की होली जलाकर प्रकट किये गये इस विरोध के बाद हिन्दी के समाचार पत्रों मे भाषा के ‘क्रिओलीकरण‘ की गति तेज हो जाये तो यह स्पष्ट सूचना जायेगी कि भाषा संबंधी नीतियों के पीछे अँग्रेजी की ‘नवसाम्राज्यवादी‘ शक्तियाँ दृढ़ता के साथ काम कर रही हैं।
सवाल सिर्फ भाषा का नहीं : अनुराग

भाषा के मुद्दे पर हम 63 साल पहले जहां थे, आज भी वहीं खड़े हैं। इसका सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाना हम सबके लिए शर्म की बात है। इसी वजह से समय-समय पर भाषा को लेकर विवाद भी उत्पन्न हुए हैं।
रूस में बोली जाने वाली अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव ने मेरा दागिस्तान में प्रसिद्ध लोककवि अबूतालिब के साथ घटित एक रोचक किस्से का वर्णन किया है। किस्सा यों है-
अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया।
अंग्रेज अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में पूछताछ करने लगा।
अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेजगीन, दार्गिन और कुमीक भाषाओं में अंग्रेज को अपनी बात समझाने की कोशिश की।
आखिर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुंस्कृत ने जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए कहा, ”देखा, संस्कृति का क्या महत्व है? अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न।”
”समझ रहा हूं।” अबूतालिब ने जवाब दिया, ”मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की।”
हमारे मन में अपनी मातृभाषा और देश की भाषाओं के लिए अबूतालिब की तरह स्वाभिमान नहीं, बल्कि कुंठा है। इसी का परिणाम है कि हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति की बात करने वाले को दकियानूसी और पिछड़ा मानते हैं। अंग्रेजी भाषा व संस्कृति को अपनाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए उन्हें आधुनिक तथा प्रगतिशील होने का खिताब देते हैं। अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने पर अंग्रेजीदा तो हमारी उपेक्षा करते ही हैं, किंतु हम भी स्वयं को हीन व लज्जित महसूस करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीयता का हवाला देकर ऐसा भ्रमजाल फैलाया गया कि मानो प्रत्येक भारतीय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाकर काम करना है। इसलिए हर किसी के लिए अंग्रेजी सिखना जरूरी है। इसी भ्रमजाल के कारण हम अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। इन स्कूलों में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। यह शिक्षा पद्धति बहुत महंगी भी है। अपनी सीमित आय होने के कारण इसके लिए आर्थिक अपराधों की शरण में जाना पड़ता है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से यह शिक्षा पद्धति भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देती है।
अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा का हृास है। बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा प्रारंभ करता है तो वह उसके बहुमुखी विकास की उम्र होती है। तब उसे विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे उसके विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वह बड़ा होकर प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है तो अंग्रेजी फिर अड़चन पैदा करती है। प्रतियोगी को जो समय अपने विषय के गहरे अध्ययन में लगाना चाहिए, वह समय उसे अंग्रेजी के अध्ययन में लगाना पड़ता है। वह जब सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो यहां पर भी सबसे पहले अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है। योग्य से योग्य व्यक्ति को भी अंग्रेजी का ज्ञान न होने पर या कम होने पर अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसे में हीन भावना आना स्वाभाविक है।
भारत में अभी भी करीब 35 फीसदी लोग अशिक्षित हैं। देश के एक बड़े हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। और जहां व्यवस्था है भी, वहां सब रामभरोसे चल रहा है। ऐसे में अंग्रेजी की वकालत करना समझ से परे है।
असल में गुलामी के दौरान ही एक ऐसे वर्ग ने जन्म ले लिया था, जिसे देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं था। यह वर्ग आजादी भी नहीं चाहता था। इस वर्ग का मकसद अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित कर सत्ता सुख भोगना था। इसके लिए इसने खुद को अंग्रेजी रहन-सहन में ढालना शुरू कर दिया। यह वर्ग जबान भी अंग्रेजों की बोलता। अंग्रेजों से नजदीकी साबित करने के लिए भारतीयों से दूरी बनाना इसकी मजबूरी थी। इसे श्रेष्ठता का दंभ होने लगा। अन्य लोगों को यह गंवार और जाहिल समझाता। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता की कुंजी इसी वर्ग के हाथ में आई। यह वर्ग तो चाहता ही नहीं कि मात्र एक भाषा से उन्हें जो श्रेष्ठता मिली है, वह छीन जाए।
भाषा को लेकर प्राथमिक स्तर से ही प्रयास किए जाने की जरूरत है। दस मिन्स टेन, जिस बच्चे को यह बताना पड़ रहा हो, उसे हिंदी में काम करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस भी देश ने भी तरक्की की है, अपनी मातृभाषा में ही है। यदि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो यह हिंदी की नहीं, शासक वर्ग की कमी है। हिंदी के प्रचार-प्रचार के नाम पर तमाम तरह की नौटंकी करने की बजाए, विश्व ज्ञान-विज्ञान, साहित्य हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। एक अनुमान के अनुसार भारत में हिंदी में बोलने वाले 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाले मात्र 0.021 प्रतिशत हैं। आज हिंदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते हैं। तकनीकी विकास के चलते आज हिंदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इंटरनेट पर भी हिंदी का साम्राज्य बढ़ा है।
और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिंदी पखवाड़ा और हिंदी सप्ताह जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिंदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपए बर्बाद किए जा रहे हैं? क्यों हिंदी अकादेमी, हिंदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका, न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?
भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरंत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है। इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आंदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आंदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकले हिंदी : शरणकुमार लिम्बाले
हमारे देश में बहुत-सी भाषाएं हैं। और उनकी कई बोलियां हैं। हर बोली की अपनी-अपनी आंचलिक विशेषता है। इनकी लिपि भी अलग-अलग है। इससे भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में रुकावट पैदा होती है। इसके अलावा हिंदी को राष्टरभाषा बनाने के लिए जो राजनीतिक इच्छा शक्ति होनी चाहिए, वह किसी भी पार्टी में नहीं है।
भारत में करीब डेढ़ सौ साल तक ब्रिटिश की राजसत्ता रही। यहां से गोरे ब्रिटिश चले गए, लेकिन काले रह गए। ब्रिटिश मानसिकता हमारे में बहुत ज्यादा काम करती है। जो बाबू-अधिकारी हैं, वे रहन-सहन और विचार में अभी भी अंग्रेजी को बनाए हुए हैं। अंग्रेजी बोलने से प्रतिष्ठा मिलती है। फाइव स्टार का वेटर भी अंग्रेजी बोलता है।
केवल दिल्ली में या केंद्र सरकार के कार्यालयों में रहने से हिंदी का प्रचार-प्रसार नहीं होगा। हमारा देश केवल सरकारी संस्थाओं में नहीं है। वह बहुत फैला हुआ है। हिंदी के साहित्य का प्रादेशिक भाषाओं में और प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए।
पंचवर्षीय योजना में सड़कों, पुलों, बांध आदि पर ध्यान दिया जाता है। लेेकिन देश जो सांस्कृति-सामाजिक जीवन जीता है, वह भाषा के माध्यम से जीता है। जितने जरूरी सड़क, बांध आदि हैं, उतनी ही जरूरी भाषा भी है। इसलिए पंचवर्षीय योजना में भाषा के विकास पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सप्ताह-पखवाड़ा से मनाने से कुछ भी नहीं होने वाला है। वास्तव में इन्हीं लोगों ने हिंदी को बंधक बना रखा है। इसके विकास के लिए इसे संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकलना होगा।
- मराठी के चर्चित लेखक और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित
हिंदी राष्ट्र की अस्मिता की भाषा है : बालशौरि रेड्डी
मैंने गांधीजी से हस्ताक्षर लेकर हिंदी सीखी। उन्होंने 21 जनवरी, 1946 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की रजत जयंती समारोह का उद्घाटन किया था। उन्होंने कहा था कि बहुत जल्द ही देश आजाद होने जा रहा है। आजाद भारत हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हिंदी होगी। अत: में महिलाओं तथा युवाओं से अपील करता हूं कि आप लोग अभी से हिंदी सीखना आरंभ करें ताकि हिंदुस्तान का आजाद होती ही जनता की भाषा में शासन का कार्य संपन्न हो सके। गांधीजी का यह सपना आज तक हम लोग साकार नहीं कर सके।
किसी भी स्वतंत्र राष्टर का अपना संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा होती है। किसी भी देश के लिए विदेशी भाषा कभी भी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। जब टर्की आजाद हुआ तो कमलपाशा ने सभी अधिकारियों को बुलाकर कहा, ‘ हमारा देश स्वतंत्र हो गया है। हम तरक्की करना चाहते हैं। बताओ।” सभी ने सुझाव दिए। अंत में कमलपाशा ने कहा, ”आप लोग अपनी घड़ी देखो। इसी सैकेंड से टर्की की राजभाषा तुर्की है। जाओ काम करो।” ऐसे काम होता है।
1950 में संविधान में हिंदी को स्वीकृति मिली। यह बताया गया कि 15 वर्ष के बाद हिंदी अंग्रेजी का स्थान ग्रहण करेगी ओर हिंदी प्रशासनिक भाषा होगी। लेकिन 1963 में इसमें संशोधन हुआ कि जब तक हिंदीत्तर भाषा के तीन चौथाई सांसद स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा। अब तो यह विवाद का विषय बन गया है।
1965 में जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, उन्होंने सोचा कि देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना क्रियांवित करते हैं, लेकिन भाषा के लिए अब तक जो प्रयास हुआ नगण्य है। उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली आमंत्रित किया। तीन दिन तक गहन चर्चा हुई। इसके बाद सर्वसम्मित से प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी राज्य त्रि-भाषा सूत्र पर अमल करेंगे। इसके अनुसार पहली भाषा के रूप में मातृभाषा, दूसरी के रूप में हिंदी और तीसरी के रूप अंग्रेजी पढ़ाई जानी थी। आंध्र, केरल और कर्नाटक में इसका अनुपालन हुआ। हरियाणा में थोड़े प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश में तेलुगु को कुछ जगह पढ़ाया गया। लेकिन इस सूत्र पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।
देश में रेल विभाग, वित्त विभाग, सेना आदि कई विभाग एक हैं। लेकिन शिक्षा नीति प्रदेश सरकारो के हाथ में है। वहां के शिक्षा मंत्री पाठ्यक्रम तैयार करते हैं। पूरे देश के लिए अगर एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनती तो सारे बच्चों को एक प्रकार की शिक्षा मिलती। लेकिन प्रत्येक प्रदेश में वहां के नेताओं के बारे में पढ़ाया जा रहा है। बच्चे सोचते हैं कि यही हमारी दुनिया है। हमारे बीच में एकात्मकता नहीं है। विघटन की प्रवृत्ति है। एक राष्टï्रीय शिक्षा नीति तुरंत बनाई जानी चाहिए। भले ही इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा।
हिंदी राष्ट की अस्मिता की भाषा है। मैं पहले भारतीय हूं, उसकेे बाद आंध्रवासी। मेरी मातृभाषा तेलुगु मुझे बहुत प्यारी है क्योंकि वह जन्मघूटी से सीखी हुई भाषा है। हिंदी से कम नहीं मानता और हिंदी के लिए मैं अपनी मातृभाषा की बलि देना भी नहीं चाहूंगा। लेकिन एक भारतीय के नाते संपूर्ण राष्ट के लिए हिंदी को प्रशासनिक और भारत भारती के रूप में अवश्य देखना चाहता हूं।
- तेलुगु के वरिष्ठ लेखक और चंदामामा के पूर्व संपादक


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