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साहित्य में पुलिस जैसी भूमिका है आलोचक की : भीमसेन त्‍यागी

सातवें दशक के चर्चित कथाकार भीमसेन त्‍यागी का जन्‍म 19 सि‍तंबर, 1935 को जरवल (बहराइच) में हुआ। उनका बचपन पश्‍चि‍म उत्‍तर प्रदेश के बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में बीता और वहीं प्रारंभि‍क शि‍क्षा हुई। वि‍द्यार्थी जीवन में नि‍र्माण साप्‍ताहि‍क पत्र नि‍काला। तब से ही राष्‍टी्य स्‍तर की प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में रचनाएं प्रकाशि‍त होने लगीं। ’नया जीवन’, ‘सरि‍ता’, ‘मुक्‍ता’ आदि‍ पत्रि‍काओं के संपादकीय वि‍भाग में कार्य कि‍या। ‘नीहारि‍का’ कथा मासि‍क और हिंद पाकेट बुक्‍स के संपादक रहे। ‘जी टेलि‍फि‍ल्‍मस’ में कार्यक्रम परामर्शदाता के पद पर भी कार्य कि‍या। जमीन, नंगा शहर, वर्जित फल, काला गुलाब (उपन्‍यास), जबान, दीवारें ही दीवारें, कमजोर प्‍यार की कहानि‍यां (कहानी संग्रह) और आदमी से आदमी तक (शब्‍द चि‍त्र) उनकी प्रमुख कि‍ताबें हैं। इनके अलावा त्रैमासि‍क पत्रि‍का भारतीय लेखक का संपादन व प्रकाशन। अजीव संयोग है कि‍ उनका देहांत 19 सि‍तंबर (वर्ष 2006) को जन्‍मदि‍न वाले दि‍न हुआ। उनसे यह बातचीत 3 जनवरी, 2002 को की गई थी-

लेखन की तरफ आपका रुझान कब और कैसे हुआ?

लेखन की तरफ आने का निर्णय मेरा चुनाव नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य था। बचपन गांव और कस्बे के मिले-जुले परिवेश में बीता। वहां खुला जीवन था। उससे भी खुली थी प्रकृति। याद आता है कि पहली रचना सरसों के खेत की मेढ़ पर बैठकर सरसों के ही बारे में लिखी थी। उस कविता का अब एक शब्द भी याद नहीं है, लेकिन उसके साथ जो सृजन का थ्रिल था, वह आज भी जस-का-तस मौजूद है। इसके अतिरिक्त कस्बे के जीवन में एक-दो किस्सागो थे, जो राजा-रानी, परियों की कथाओं का वाचन करते थे। बीस-तीस श्रोता देर रात तक एकाग्र होकर सुनते थे। उन श्रोताओं में आठ-दस साल की उम्र का सबसे छोटा श्रोता मैं होता था। उन कहानियों में ऐसी पकड़ बल्कि जकड़ थी जो श्रोताओं को बांधे रखती थी। बाद में आधुनिक कहानियों से परिचय हुआ तो वे भिन्न स्वाद की अच्छी रचनाएं लगीं, लेकिन मन उन्हें कहानी स्वीकार करने को तैयार नही था, क्योंकि कहानी का जो स्वरूप व संवेदना उन किस्सों के माध्यम से मन में अंकित हो गई थी, आधुनिक कहानी उनसे एकदम भिन्न थी।

धीरे-धीरे साहित्य के प्रति रुचि बढ़ती गई और एक दिन पाया कि मैं पठन-पाठन और लेखन के अतिरिक्त और कुछ भी करने के  योग्य नही हूं। मजबूरी में लेखन से जुड़ी पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में स्वीकार किया। वह भी बहुत दिन नहीं चल पाया।

कथ्य और शिल्प में महत्वपूर्ण कौन है?

कथ्य और शिल्प को अलग-अलग करके नहीं आंका जा सकता। हर रचना अपने शिल्प का स्वयं निर्माण करती है। यदि कथ्य के अनुरूप शिल्प नहीं उगता, वह रचना के साथ एकमेएक होकर नहीं आता, तो संपूर्ण रचना नहीं बन पाती। रचना में कथ्य महत्वपूर्ण है तो शिल्प स्वत: महत्वपूर्ण होगा और यदि कथ्य ही महत्वपूर्ण नहीं है तो शिल्प का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

विभिन्न गुटों व आंदोलनों का साहित्य में क्या योगदान रहा है?

दूसरे आंदोलनों की तरह साहित्य में भी आंदोलनों की भूमिका नकारात्मक और सकारात्मक दोनों रही है। आंदोलनों ने वैचारिक धरातल पर समसामयिक सोच को प्रभावित किया और साहित्य में एक सार्थक भूमिका निभाई है। इसके विपरीत आंदोलन व्यक्तिगत गुटबाजी, स्वीकृति की प्यास और दूसरों को टंगड़ी मारकर आगे निकल जाने की अंधी दौड़ का कारण भी बने।

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और प्रसाद के विवाद से शुरू होकर छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और आज के अनेक वाद-विवादों में आंदोलनों की नकारात्मक भूमिका देखी जा सकती है।

प्रगतिवाद ने जहां एक तरफ यथार्थवाद और जनोन्मुख सोच को अभिव्यक्ति दी, वहीं साहित्य में कट्टरता और नारेबाजी को स्थापित किया। इसमें साहित्य और समाज का हित होने के साथ-साथ अहित भी कम नहीं हुआ।

उसके बाद के आंदोलनों में भी यह प्रक्रिया दोहराई जाती रही। असल में साहित्यकार को समाज तथा राजनीति के प्रति सचेत और सजग जरूर होना चाहिए, लेकिन किसी वाद से बंधकर रहना उसकी प्रगति में साधक नहीं, बाधक ही सिद्घ होगा।

साहित्यिक आंदोलनों के पीछे राजनीतिक दलों का दबाव रहा है। राजनीतिक दल जिस तरह श्रमिकों, महिलाओं, युवकों के मोर्चे खोलते हैं, उसी तरह साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी दखल रखना चाहते हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों के साहित्यिक संगठन हैं। वे उनके माध्यम से अपनी राजनीति का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन साहित्यकार राजनीतिक दलों के आपसी वैमनस्य और खींचतान से ऊपर होता है। वह उनसे मार्गदर्शन लेने की बजाए उनकी आलोचना करता है।

चीनी क्रांति के दौरान क्वाओ-मो-जो बहुत महत्वपूर्ण चीनी लेखक थे। वह राजनीति में भी सक्रिय थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माउत्से तुंग ने उनसे पार्टी का वायस-चेयरमैन बनने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि मैं लेखक पहले हूं, पार्टी का कार्यकर्ता बाद में। पार्टी का पद ग्रहण करने का मतलब पार्टी के अनुशासन में रहना और पार्टी के निर्णयों को जस-का-तस स्वीकार करना है। मैं एक लेखक की हैसियत से आलोचना के अपने अधिकार को नहीं खोना चाहता। वह आजीवन पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे, लेकिन कभी भी पार्टी का पद ग्रहण नहीं किया।

हिंदी साहित्य में ग्रामकथा और नगरकथा का विवाद पुराना है। आप इनमें से किसे महत्वपूर्ण समझते हैं?

महत्वपूर्ण विवाद नहीं, लेखन होता है। नगरकथा के लेखकों में भी कुछ का लेखन महत्वपूर्ण है। हिंदी साहित्य की ट्रेजडी यह है कि इसके अधिकांश लेखक शहरी मध्यमवर्ग से आते हैं। जबकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांव में है। यही आबादी असली भारत है।

प्रेमचंद हिंदी के पहले महत्वपूर्ण ग्राम-कथाकार हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन की दरिद्रता, सरलता और साथ ही कांइयापन सहज और सरल रूप में प्रकट हुआ है। प्रेमचंद के पास शिल्प का चमत्कार नहीं, लेकिन उनकी सरलता में ही शिल्प का सर्वोत्तम रूप मिलता है। उनके यहां शिल्प आरोपित नहीं, बल्कि सहज प्रस्फुटित है।

प्रेमचंद के देहावसान के पश्‍चात कथा के रथ की बागडोर जिनके हाथों में आई, वे गांव के नहीं, शहरी मध्यमवर्ग के लेखक थे। जैनेंद्र, अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी जैसे व्यक्तिवादी लेखकों के सामने प्रेमचंद एक पहाड़ की तरह खड़े थे। उसे लांघे बिना वे अपना मार्ग नहीं बना सकते थे। प्रेमचंद को लांघना कठिन था। इसलिए उपरोक्त लेखकों ने उस पहाड़ को छोटा बनाने की प्र्रक्रिया शुरू कर दी। प्रेमचंद पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए। वह कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा-से-ज्यादा उन्हें समाज सुधारक कहा जा सकता है लेखक तो कतई नहीं।

प्रेमचंद-निंदा की यह प्रक्रिया कई वर्ष चलती रही और पाठकों में प्रेमचंद का प्रभाव गिरता-बढ़ता रहा। प्रेमचंद के निधन के करीब 18 वर्ष बाद ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन हिंदी साहित्य की एक विस्फोटक घटना थी। फणीश्‍वरनाथ रेणु के माध्यम से कथा-प्रवाह एक बार फिर असली भारत की ओर मुड़ा। रेणु के साथ प्रेमचंद पर नए सिरे से गंभीर चर्चा शुरू हुई और उनका महत्व निरंतर बढ़ता गया।

साहित्य जगत में अश्‍लीलता को लेकर कई बार विवाद उठे हैं। श्‍लील और अश्‍लील के बारे में आपका क्या मत हैं?

अश्‍लीलता का प्रश्‍न उतना ही पुराना है, जितना स्वयं साहित्य। वास्तव में अश्‍लीलता साहित्य में नहीं बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में हो सकती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्‍लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करनेवाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का ‘यामा-द-पिट’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष संबधों का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में है वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवेदना ‘यामा-द-पिट’ में है, वह उसे विश्‍व के श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।

गोर्की की कहानी ‘एक इंसान का जन्म’ में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए भी कहीं अश्‍लीलता अनुभव नहीं करता।

जगदम्बाप्रसाद दीक्षित की कहानी ‘जिंदगी और गदंगी’ में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्‍लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदु नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता ही है।

साहित्यिक पुरस्कार देने में राजनीति होती है। इससे आप कहां तक सहमत हैं?

पुरस्कारों में राजनीति का दखल होता है, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। नोबेल पुरस्कार से लेकर ज्ञानपीठ और दूसरे देसी पुरस्कारों तक में बार-बार सामने आया है कि उनके पीछे एक निश्‍चि‍त विचारधारा को पुरस्कृत करना और निहित स्वार्थों की पूर्ति करना होता है।

सर्वाधिक कु चर्चित नोबेल के बारे में मान्य सत्य है कि वामपंथी विचारधारा के महानतम लेखकों को यह पुरस्कार नहीं मिला। इन लेखकों में गोर्की, चेखव, दोस्तोवस्की जैसे लेखक भी हैं जो अनेक नोबेल पुरस्कार विजेताओं और स्वयं नोबेल पुरस्कारों से भी भारी पड़ते हैं।

रूसी लेखकों में तोल्सतोय जैसे महान लेखक की भी उपेक्षा की गई। इसके विपरीत कई दहाई ऐसे लेखकों को पुरस्कार दिए गए जिनका आज कोई नाम भी नहीं लेता।

भारतीय परिपे्रक्ष्य में केवल रवीन्द्रनाथ टैगोर को और अब अर्धभारतीय नायपाल को इस पुरस्कार से नवाजा गया, जबकि इसी दौर के शरत, प्रेमचंद, मंटो और तकषि शिवशंकर पिल्लै जैसे महान भारतीय लेखकों, जिनका योगदान रवीन्द्रनाथ टैगोर से अधिक ही है, को यह पुरस्कार नहीं मिला। कारण- रवीन्द्रनाथ का विराट जनसंपर्क और उनकी ऋषितुल्य वेशभूषा का प्रदर्शन था।

नोबेल के अतिरिक्त भारतीय पुरस्कारों में भी यही रणनीति और कूटनीति काम करती रही है। अशोक वाजपेयी और सामान्य कोटि के कवियों को बड़े-से-बड़े पुरस्कार मिलते हैं और उनके समकालीन निश्‍चि‍त रूप से अधिक महत्वपूर्ण रचनाकार उपेक्षित रह जाते हैं।

असल में जो रचनाकार सही मायनों में रचनाकार हैं, उन्हें पुरस्कारों की अपेक्षा नहीं, उपेक्षा करनी चाहिए। वास्तविक पुरस्कारदाता पाठक होता है। पाठक जिसे स्वीकार कर ले, वही सच्चा लेखक है और पाठक का प्यार ही सच्चा पुरस्कार है।

हिंदी साहित्य के पांच महान साहित्यकार?

पांच नाम लेना कठिन है। फिर भी हिंदी के महान साहित्यकारों में प्रेमचंद, यशपाल, निराला, रेणु, नागार्जुन, मुक्तिबोध हैं।

किन लेखकों ने आपको प्रभावित किया?

उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त तोल्सतोय, चेखव, गोर्की, मोपासां, लू-शुन, कामू, हेमिंग्वे, कालिन विल्सन आदि ने किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया।

साहित्य में आलोचक की क्या भूमिका है?

साहित्य में आलोचक की वही भूमिका है, जो समाज में पुलिस की।

मेरी पाठशाला

मैंने रैक में किताब के ऊपर किताब रख दी।
”अनुराग, यह क्या कर रहा है? ऐसे किताब के ऊपर किताब या कोई चीज नहीं रखते। कवर खराब हो जाता है।”
मैंने चौंककर देखा, कोई नहीं था।
मैं लेख लिख रहा था। शब्द गलत लिखा गया। मैंने उस पर चार-पांच बार पेन फेर दिया।
”यह क्या किया? एक बार पेन फेरने से नहीं पता चल रहा था कि शब्द काट दिया? गंदा करने की क्या जरूरत थी?”
मैंने सिर उठाकर देखा, कोई नहीं था।
अगस्त, 1993 का पहला सप्ताह। दिनभर जोरदार बारिश हुई थी। शाम को बारिश बंद हुई। मैं कंप्यूटर पर टाइप कराए गए अपने उपन्यास का प्रिंटआउट लेकर भीमसेन त्यागी से मिलने चल दिया।
उन दिनों मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था। मेरा रूम-पार्टनर त्यागीजी के प्रिंटिंग पे्रस में काम करता था। उसने त्यागीजी से मिलवाने की बात कही थी।त्यागीजी घर में अकेले थे। लुंगी और बनियान में। परिचय के बाद उन्होंने पूछा, ”किन-किन लेखकों की कौन-कौन-सी किताबें पढ़ी हैं?” 
मैंने बताया तो बोले, ”अभी तुम्हें बहुत पढऩे की जरूरत है। पहले खूब पढ़ो। फिर लिखने की सोचो।” 
मैंने उपन्यास का प्रिंटआउट दिखाया। उन्होंने दो-तीन पेज पढ़े। गलतियों पर निशान लगा दिए। मैं उपन्यास के नेगेटिव बनवा चुका था। केवल छपाई शेष थी। इसमें तीन-चार हजार रुपए खर्च हो गए थे। मैंने त्यागीजी को यह बात बताई।
उन्होंने सलाह दी कि यह उपन्यास मत छपवाओ। इसमें बहुत-सी कमियां हैं। इससे तुम्हें फायदा होने के बजाए नुकसान ही होगा। इसमें जो पैसा लग गया है, उसे भूल जाओ।
न जाने क्यों मेरे मन में यह बात बैठी हुई थी कि बड़े लेखक नए लेखकों को आगे नहीं आने देना चाहते। मैंने दहेज की समस्या पर उपन्यास लिखा था। मेरा खयाल था कि यह उपन्यास समाज को नई दिशा देगा और दहेज समस्या के समाधान में सहायक होगा। मुझे लगा कि त्यागीजी ने इसे जान-बूझकर खारिज कर दिया है। इसलिए मुझे उनकी सलाह अच्छी नहीं लगी। मैं मायूस होकर लौटा, लेकिन उपन्यास छपवाया नहीं।
त्यागीजी के बहनोई वेदप्रकाश त्यागी बिजली विभाग (अब पावर कारपोरेशन) में कार्यरत हैं। मेरे पापा बिजली विभाग से रिटायर हुए हैं। वेदप्रकाशजी से करीब 27-28 साल पुराने संबंध हैं। 1992 में मैंने पालीटैक्निक की। मैं नौकरी के लिए उनके पास नोएडा आ गया। उन्होंने एक फैक्ट्री में नौकरी लगवा दी।
उन दिनों पापा मवाना, मेरठ में कार्यरत थे। मवाना के नजदीक पेपर मिल खुली। मैं वापस चला गया। वहां आठ-नौ महीने काम किया। एक तो वेतन बहुत कम मिल रहा था, दूसरे पापा रिटायर होनेवाले थे। छोटा भाई आईटीआई कर रहा था। उसके सामने नौकरी की समस्या आनेवाली थी इसलिए वहां नौकरी छोड़ मैं दोबारा नोएडा आ गया। मैं वेदप्रकाशजी के साथ रहकर नौकरी ढूंढऩे लगा। तीन-चार महीने उनके साथ रहा। त्यागीजी उनके यहां आते-जाते रहते थे। वेदप्रकाशजी के बच्चे उन्हें मामाजी कहते, तो मैं भी मामाजी कहने लगा।
एक दिन मामाजी वेदप्रकाशजी के यहां आए थे। उन्होंने मुझे पेन-कागज लेकर बुलाया। मैंने सोचा कि वह कुछ लिखवाना चाहते हैं। उन्होंने तीन-चार लाइनें बोलीं और कागज ले लिया। वह मेरी हैंडराइटिंग देखना चाहते थे। इससे संतुष्टï हुए। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जब तक नौकरी नहीं लग जाती, हमारे यहां काम कर लिया कर। कुछ पेमेंट कर दूंगा। इससे आने-जाने का और जेब-खर्च निकल जाएगा। वह साप्ताहिक पत्र ‘जनचेतना’ और साक्षरता अभियान के लिए ‘नवसाक्षर चेतना’ प्रकाशित कर रहे थे। प्रिंटिंग पे्रस चल रहा था। मुझे इनके लिए काम करना था।
मैं प्राय: रोज सुबह उनके यहां चला जाता। ग्राउंड फ्लोर पर पे्रस थी। फस्र्ट फ्लोर पर वे रह रहे थे। छत पर एक छोटा कमरा बना हुआ था। असल में वह रसोई थी। लेकिन ऊपर-नीचे बार-बार आने-जाने में ज्योति भाभी (उनकी पुत्रवधू) को दिक्कत होने के कारण रसोई नीचे ही बना ली। ऊपरवाली रसोई को मामाजी पढऩे-लिखने के कमरे के रूप में इस्तेमाल करने लगे। इसी में किताबों की रैक लगा दी गईं।
यह वह दौर था, जब परिवार पर लगातार आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा था। पे्रस बंद होने के कगार पर पहुंच गया था। ऐसा भी होता कि दो-ढाई सौ रुपए के चलते प्रिंटिंग का आर्डर पूरा न हो पाता और घाटा उठाना पड़ता। पे्रस को जिंदा रखने के लिए हर संभव प्रयास किया गया। जरूरत पडऩे पर मित्रों और रिश्तेदारों से कर्ज लिया गया। मगर तमाम प्रयासों के बावजूद पे्रस अंतत: बंद हो गया और पीछे छोड़ गया मोटा कर्ज। 
मामाजी 1984 के अंत में नोएडा आ गए थे। किराए पर रहे। 1987 में डी-180, सेक्टर-10 की बिल्डिंग खरीदी। 1988 में बेटे विवेक त्यागी ने एम।ए. कर ली। उत्तरप्रदेश फाइनेंस कारपोरेशन से लोन लेकर पे्रस लगाया- चेतना पे्रस। इसके पीछे मकसद था कि बेटा पे्रस संभाल लेगा। आय का साधन हो जाएगा और वे अपना समय लिखने-पढऩे में लगाएंगे। मामाजी का यह सपना फलीभूत नहीं हो सका। अव्यवस्था के कारण पे्रस घाटे में जाने लगा। तमाम तरह की दिक्कतें आने लगीं और मानसिक शांति छिन्न-भिन्न हो गई।
यूपीएफसी की किश्तें समय पर नहीं जा पा रही थीं। पेनल्टी लग गई। नौबत आ गई कि यदि आज पैसा जमा नहीं हुआ तो नोएडा प्राधिकरण फैक्ट्री सील कर देगा।
सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले मैं वहां गया। घर पर केवल मामीजी थीं। घर के बाकी सदस्य पैसे की व्यवस्था करने के लिए गए थे। मामीजी की आंखें भरी थीं। कागजात और आवश्यक सामान एक जगह रख लिया गया था कि दुर्भाग्यवश अगर फैक्ट्री सील हो जाती है तो कम-से-कम जरूरी सामान बाहर निकाला जा सके। हर किसी के जहन में एक ही सवाल था- अब क्या होगा! मैं चुपचाप मामीजी की बातें सुनता रहा। सांत्वना देने की स्थिति में भी नहीं था क्योंकि पैसे की समस्या तो पैसे से ही हल हो सकती थी। मैं काम पर चला गया। सारे दिन मन बेचैन रहा। रह-रहकर खयाल आता कि आज क्या होगा! शाम को वापस आया। जानकारी मिली कि आवश्यक पैसों का इंतजाम हो गया और यूपीएफसी में जमा करा दिया है। फैक्ट्री सील होने से बच गई है। राहत की सांस ली। दिन था 19 सितंबर, 1994। मामाजी का जन्मदिन। परिस्थितियां ऐसी थीं कि सुबह शुभकामना नहीं दे पा रहा था। शाम को बधाई दी।
तत्कालीन संकट तो टल गया, लेकिन उधार की राशि में मोटा इजाफा हो गया। 1995 में प्रिंटिंग पे्रस बेचनी पड़ी। उससे जो पैसा मिला, वह कर्ज के सामने ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ। परिवार पर आर्थिक और उससे भी ज्यादा मानसिक दबाव बढ़ गया।
ऐसी विषम परिस्थितियों में किसी का भी धैर्य चुक सकता था लेकिन मामाजी ने साहस से मुकाबला किया। उन्हें इस मुद्दे को लेकर हमने न कभी झींकते देखा और न घबराते। बाहर का आदमी तो जान भी नहीं सकता था कि यह परिवार इस समय किन कांटों-भरी राह से गुजर रहा है।
कुछ दिनों बाद मैं उन्हीं के साथ रहने लगा। मामाजी ने ऊपरवाला कमरा मुझे दे दिया। खुद नीचे ही सोने और पढऩे-लिखने लगे। परिवार के सभी सदस्य बहुत अच्छे हैं, इसलिए जल्द ही आत्मीय संबंध हो गए।
मामाजी के साथ रहते हुए सही मायनों में ‘लेखन की पाठशाला’ में भर्ती हुआ। मेरी भाषा में अशुद्धियां थीं। कभी-कभी शब्दों के चयन में गलती कर देता। उन्होंने मेरी शिक्षा के बारे में पूछा। कहने लगे कि तुझे किसी ने भाषा का ज्ञान नहीं दिया और न ही ऐसा माहौल मिला, इसलिए गलती करता है। लेकिन इसमें घबराने की कोई बात नहीं।
मामाजी ने भाषा सुधारने पर बहुत जोर दिया। उनका कहना था कि जिसकी भाषा ही भ्र्रष्टï है, वह कैसा लेखक? लेखक का भाषा पर पूरा अधिकार होना चाहिए। कुछ बड़े लेखकों की भाषा में बाद तक भी अशुद्धियां रह जाती हैं, लेकिन इसे आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता। रचना में भाषागत अशुद्धियां होंगी तो संपादक तुझे लेखक मानने से इनकार कर देगा और रचना पर विचार भी नहीं करेगा, इसलिए सबसे पहले भाषा पर ध्यान दे। मैं तेरी रचनाएं देखकर गलतियों पर निशान लगा दिया करूंगा। एक कॉपी पर इन्हें नोट करते रहना। सही शब्द को कम-से-कम पांच बार लिखना। धीरे-धीरे यह कमी दूर हो जाएगी। किसी शब्द को लेकर कनफ्यूजन हो सकता है। वह गलती क्षम्य है, लेकिन सामान्य शब्दों में गलती नहीं होनी चाहिए। 
परिवार पर आर्थिक दबाव बेहद बढ़ गया था। सवाल उठा कि इससे कैसे छुटकारा पाया जाए। परिवार के सभी सदस्य इस पर चर्चा करते। योजना बनती, बिगड़ती। लेकिन कोई उचित समाधान नहीं मिल रहा था। कर्जा लाखों में था। उसमें पांच-दस हजार रुपए महीने की आमदनी से कुछ होनेवाला नहीं था। काफी सोच-विचार कर मामाजी ने फैसला किया कि वह मुंबई जाकर फिल्मी लेखन करेंगे।
मामाजी फिल्मी लेखन को अच्छा नहीं मानते थे। लेकिन समस्या का समाधान तो करना ही था। उन्होंने तय किया कि मुंबई केवल तब तक रहेंगे, जब तक कर्जे का एक बड़ा भाग चुकता न हो जाए।
वह सितंबर, 1995 में मुंबई चले गए। बीच-बीच में नोएडा आते। पत्रों के माध्यम से संपर्क बना रहा। 13 अपै्रल, 1997 को मेरी शादी हुई। उनके आने का कार्यक्रम था, नहीं आ पाए। 9 अपै्रल का लिखा उनका पत्र मिला। शादी में परिजनों, मित्रों ने अपने-अपने तरीके से शुभकामनाएं दीं, बधाइयां दीं और उपहार दिए। लेकिन मामाजी ने जो शुभकामनाएं दीं, वे मेरे लिए अद्भुत हैं। उन्होंने लिखा, ”विवाह का निमंत्रण मिल गया है। मेरा आने का पक्का इरादा था। 5 तारीख का रिजर्वेशन भी करा लिया था। लेकिन यहां कुछ अर्जेंट काम ऐसा आ गया कि रिजर्वेशन कैंसिल कराना पड़ा।
”मैं शरीर से नहीं आ सकूंगा, लेकिन मन से उत्सव में ही रहूंगा। कामना करता हूं- तुम्हारा वैवाहिक जीवन सुखी, समृद्ध तथा यशस्वी हो।
”आशीर्वाद की औपचारिकता मुझे नहीं आती, लेकिन मेरा आशीर्वाद तो साक्षात तुम हो!”शादी के बाद बहू के साथ मुंबई घूमने आओ।
”अमित स्नेह- तुम दोनों को!” 
डी-180 कोने की बिल्डिंग है। आर्थिक दबाव से छुटकारा पाने के लिए सड़क की ओर दुकानें निकाल दी गई थीं। फैक्ट्री के पीछे एक लंबी दुकान निकली। उसमें शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने फोटोस्टेट की मशीन लगाई हुई थी। उसने प्रस्ताव रखा कि सभी दुकानदार मिलकर पांच-छह लाख रुपए दे देंगे। आप लिखकर दे दो कि यह जगह तुम्हें दी जा रही है। मालिकाना हक आपका ही रहेगा। परिवार के कुछ सदस्यों को यह प्रस्ताव अच्छा लगा। इसमें उन्हें कुछ बुराई नहीं दिखाई दी, तत्कालीन संकट में थोड़ी राहत मिल रही थी। लेकिन मामाजी की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने विवेकजी से कहा, ”बेटे, शर्मा की नीयत ठीक नहीं है। यह फैक्ट्री कब्जाना चाहता है। सबसे पहले इसे नोटिस देकर यहां से निकालो। यह यहां रहेगा तो और दुकानदारों को भी उल्टी-सीधी पट्टïी पढ़ाता रहेगा।” दुकानदारों से सिक्योरिटी और किराया एडवांस लिया हुआ था। उसको निकालने के लिए करीब पच्चीस हजार रुपए की जरूरत थी। इस बात से मामाजी घबराए नहीं। उन्होंने जैसे-तैसे पैसे का इंतजाम किया और शर्मा को अलविदा कह दिया।
विवेकजी एक दैनिक समाचारपत्र में नौकरी कर रहे थे। भाभी किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही थीं। दोनों की सीमित आय से लाखों का कर्जा उतारना असंभव था। दूसरी ओर बच्चे बड़े हो रहे थे। खर्चा भी बढ़ रहा था। इसका एक ही उपाय था कि अपना कोई काम किया जाए और इस तरह अक्तूबर, 1999 को शुरू हुआ ‘ज्योति ग्राफिक्स’। एक छोटी फोटोकॉपी की मशीन लगाई गई। शुरू-शुरू में समस्याएं अधिक आईं। एक तो अनुभवहीनता, दूसरे कभी मशीन खराब तो कभी कोई और तकनीकी समस्या। मशीन एक ही थी। कोई खराबी आ जाती तो काम ठप्प हो जाता।
जुलाई, 2000 को मामाजी मुंबई से आए हुए थे। मैं मिलने गया।
”यहां कुछ काम नहीं हो पा रहा है। इससे मुंबई ही अच्छे थे। वहां से तो यह सोचकर आया था कि यहां अनुराग जैसे बच्चों से मुलाकात होती रहेगी, लेकिन वह तो दुर्लभ हो गया है।” मामाजी ‘वर्जित फल’ के पन्नों को देखते हुए बोले।
मैंने बताया कि इंटरव्यू के चक्कर में लगा था। इस वजह से नहीं आ पाया।
उनकी नजर पांडुलिपि के पेज नंबर 196 पर पड़ी। वह उलटा लगा था। ”यह कैसे हो गया? वैसे तो कंपोजिंग करते समय ऑपरेटर भी इसे ठीक कर लेता। लेकिन ऐसी गलती हो कैसे गई?” वह टैग से पेज निकालने लगे।
ज्योति भाभी आ गईं। बोलीं, ”आज पापा का उपन्यास पूरा हो गया है। मैं कितनी देर से कह रही हूं कि ऊपर जाकर आराम से बैठकर काम कर लो, लेकिन जा नहीं रहे। पसीने से कैसे भीगे हुए हैं।”
मामाजी ने पेज सीधा किया और टैग लगाते हुए बोले, ”इस बात का भी बहुत असर पड़ता है कि पांडुलिपि नीट और क्लीन हो। खासकर शुरुआती दौर में।” वह आगे बोले, ”यह उपन्यास पूरा हो गया है। अब मैं अपना बड़ा उपन्यास शुरू करूंगा। उसे शुरू करने का उत्साह जरूर है। यदि बड़ा उपन्यास शुरू कर देता तो यह अधूरा रह जाता। मैंने निश्चय कर लिया है कि साल में कम-से-कम छह किताबें पूरी करूंगा। भले ही छपें नहीं, लेकिन प्रकाशक के पास तो चली जाएं। किताबें तैयार हैं। थोड़ा-बहुत काम करना है। कुछ मैटर कट जाएगा तो कुछ बढ़ जाएगा।”
 फोटोस्टेट मशीन खराब थी। मामीजी गुस्से में बोलीं, ”यह मशीन राक्षस हो गई है। जितना कमाती है, उतना खा जाती है।”
मामाजी मुस्कुराए, ”अनुराग, तुझे एक किस्सा सुनाता हूं। हमारे एक परिचित ने गाड़ी ली। उसका रजिस्ट्रेशन देहरादून कराया। इसका नियम है, जहां का रजिस्ट्रेशन होगा, वहीं से रिन्यू कराना होता है। वह रिन्यू कराने देहरादून जा रहे थे। जो भी मिलता, उसी से कहते, ‘चल तुझे देहरादून घुमा लाऊं।’ लोगों ने सोचा- आना-जाना फ्री है और जो ले जाएगा खाना उसके जिम्मे रहेगा ही। कई लोग तैयार हो गए।”
देहरादून में बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। एक कोठी में आरटीओ का दफ्तर था। वहां आम के कई पेड़ थे। एक पेड़ के नीचे सभी बैठ गए। आम पके हुए थे। एक कौवा पेड़ पर बैठा था। वह जैसे ही डाल हिलाता, आम टप से नीचे। एक आदमी बड़ा खुश होता हुआ आम सबकी ओर बढ़ा देता, ‘लो जी, आप भी खाओ। आप भी लो।” वह ऊपर की ओर देखते हुए बोला, ‘वाह! काकभुशंडीजी वाह! वाह! काक ऋषिजी, वाह!’ थोड़ी देर में आम गिरने बंद हो गए। उसने ऊपर देखा। कौआ उड़कर दूसरे पेड़ पर चला गया था। वह गुस्से में चिल्लाया, ‘कौआ ढेढ़ उड़ गया।’ ”
कहकर वे जोर से हंसे, ”यही तेरी मामी का हाल है। कल कह रही थी कि यदि ऐसे ही मशीन चलती रही तो एक-डेढ़ साल में कर्जा चुकता हो जाएगा। आज मशीन खराब हो गई तो उसे राक्षसी बना दिया।” 
मैं प्रकाशित रचनाओं की कटिंग मुंबई भेजता रहता था। मैंने पत्र में वहां आने की इच्छा जाहिर की और कहानी ‘भूख’ भेजी।
मामाजी ने 12 जून, 1997 को भेजे पत्र में लिखा, ”तुम्हारे पत्र और कहानी सब मिले। कटिंग्स भी समय-समय पर मिलती रहीं। तुम्हारी लिखने की प्रगति देखकर संतोष होता है। लेकिन अभी तुम्हें बहुत गहरे अध्ययन और मनन की आवश्यकता है।
”कहानी ‘भूख’ मैंने आते ही उत्सुकतापूर्वक पढ़ी थी। आज फिर पढ़ी। यह दैहिक स्तर पर ही अटक गई है। मानव-मन की किसी सूक्ष्म अनुभूति का स्पर्श नहीं करा पाती। दिक्कत यह है कि इसमें समस्या का गांभीर्य स्थापित नहीं होता। और, समस्या ही स्थापित नहीं होगी तो कहानी का आधार क्या होगा? सवाल समस्या के छोटी या बड़ी होने का नहीं। महत्वपूर्ण सवाल उसे गंभीरता से फील करने और कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करने का है। राष्टï्रीय तथा अंतरराष्टï्रीय महत्व के मुद्दों पर बहुत निकृष्टï कहानियां लिखी गई हैं और एक साधारण-सी घटना पर मास्टरपीस।
”मेरी राय है कि तुम लिखने में जल्दबाजी न करो। जो भी थीम आए, उसे धीरे-धीरे अनुभूति की आंच पर पकने दो। बहुत लगन से अच्छा साहित्य पढ़ो, तभी महत्वपूर्ण रचनाएं आएंगी।
”तुम्हारे यहां आने का प्रस्ताव मेरे लिए खुशी का बायस है। लेकिन यह बहुत महंगा और बेमुरव्वत शहर है। यहां भयानक संघर्ष है और संघर्ष का समापन किसी सार्थक उपलब्धि में नहीं, फ्रस्ट्रेशन में होता है। यह सब मैंने यहां आकर नहीं जाना, पहले से ही जानता था। इसीलिए बहुत थोड़े समय के लिए आर्थिक दबाव के कारण आया। अब ज्यादा समय यहां नहीं रहूंगा। ऐसे में तुम्हें आने की सलाह नहीं दे सकता। बेहतर है, वहीं किसी फैक्ट्री में सर्विस देख लो। साहित्य को आजीविका का साधन मत बनाओ। यह बहुत कठिन है। मैं इतना काम करके भी आज तक नहीं बना सका।”अपनी किताबों के प्रकाशन की चिंता मुझे भी है। लेकिन डेढ़ साल में एक बार भी दिल्ली नहीं आ सका। जब भी आऊंगा, तभी यह काम हो सकेगा! इनके अलावा जो किताबें फाइलों में हैं, उनकीभी व्यवस्था करनी है।”
वह दुर्भाग्यवश ये दोनों काम नहीं कर पाए। 
जैसा कि मामाजी ने लिखा था वह ज्यादा दिन मुंबई नहीं रुके और जनवरी या फरवरी, 2001 को मुंबई को अलविदा कहकर वापस आ गए।
 
मामाजी छठे दशक के अंत में इलाहाबाद गए थे। वहां उनकी भेंट श्री भारतीय से हुई थी। श्री भारतीय ने 1935 में लेखन कला की मासिक पत्रिका ‘लेखक’ का प्रकाशन किया था। उन्होंने ‘लेखक’ के चार अंक भी दिखाए। मामाजी ने इस तरह की पत्रिका के प्रकाशन पर जोर दिया तो श्री भारतीय ने चारों अंक उन्हें दे दिए और कहा कि आप इसका पुनप्र्रकाशन कर सकें तो अवश्य कीजिए। मामाजी ने वादा कर लिया। उनके मन में रह-रहकर बात उठती कि ऐसी पत्रिका जरूर निकलनी चाहिए।
एक दिन उन्होंने ‘लेखक’ के अंक दिखाए और ये सब बातें बताईं। मैंने अंक देखे। अपने तरीके की विशिष्ट पत्रिका लगी। बिल्कुल नया कलेवर। उसमें सभी महत्वपूर्ण लेखकों ने लिखा था। पे्रमचंद ने भी लिखा था।
मामाजी बोले, ”मैं नए लेखकों के लिए इस तरह की पत्रिका निकालना चाहता हूं। इसमें तुझे मदद करनी होगी। लघु पत्रिका निकालना घरफूंक तमाशा देखना है। कोई आर्थिक लाभ इससे नहीं हो सकेगा। सोच-समझ ले।”
मैंने हर संभव सहयोग देने का वादा किया।
उन्होंने पत्रिका की रूपरेखा बनाई। प्रपत्र तैयार किया। लेखक-मित्रों को भेजा। कुछ के घर गए। उनसे रचनाएं लीं। इस तरह ‘भारतीय लेखक” की शुरुआत हुई। जनवरी, 2003 में पहला अंक निकला और इस तरह करीब पांच दशक बाद उन्होंने अपना वादा पूरा किया।
‘भारतीय लेखक’ निकालने का मकसद केवल एक वादा पूरा करना नहीं था। वह गोर्की और अन्य देशी-विदेशी लेखकों का उदाहरण देकर कहते थे कि हर रचनाकार को सृजनात्मक लेखन के साथ-साथ नए लेखकों को भी आगे बढ़ाना चाहिए, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। वे नए लेखकों के प्रति अपने दायित्व को लेकर सजग थे। ‘भारतीय लेखक’ में एक खंड ‘नए लेखकों के लिए’ रखा। इसमें लेखन संबंधी रचनाएं प्रकाशित करते।
‘भारतीय लेखक’ के प्रवेशांक के संपादकीय में उन्होंने पत्रिका निकालने के औचित्य पर लिखा था, ”पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक और पत्रिका की क्या सार्थकता है? यह सवाल बार-बार प्रायोजकों के सामने आया और हर बार एक ही उत्तर मिला- रचना की आंतरिक प्रक्रिया तथा लेखकीय संघर्ष से संबद्ध कुछ ऐसे अहम सवाल हैं, जिनका हर सृजनशील लेखक को सामना करना पड़ता है। उन सवालों के उत्तर न इन पत्रिकाओं के पास हैं, न अकादमियों के पास और न इन लेखक-संघों के पास। उन सवालों के सार्थक उत्तरों की खोज में अंतत: लेखकों को जूझना पड़ता है। इस खोज का ही विनम्र किंतु सजग प्रयास है ‘भारतीय लेखक’।”
इसके अलावा ‘भारतीय लेखक’ के माध्यम से वह हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को एक मंच प्रदान करना चाहते थे। वह कहते थे कि यह केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सचमुच में ‘भारतीय लेखक’ हो। इसके लिए उन्होंने गैर-हिंदीभाषी लेखकों से सहयोग लिया और अन्य लेखकों से संपर्क कर रहे थे।
‘भारतीय लेखक’ का एक महत्वपूर्ण और चर्चित स्तंभ ‘विशिष्ट लेखक’ है। इसमें लेखक का आत्मकथ्य, उसकी एक रचना, रचना-प्रक्रिया, रचनाओं पर मूल्यांकनपरक लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदि प्रकाशित किए जाते हैं। इसका मकसद एक ओर किसी लेखक को फोकस करना, दूसरी ओर लेखक की रचना-प्रक्रिया और आत्मकथ्य के माध्यम से नए लेखक के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना है।
मामाजी का कहना था कि ‘विशिष्ट लेखक’ में जेनुइन राइटरों को लिया जाए, दंदफंद से महापुरुष बन बैठे लेखकों को नहीं। यही कारण है कि उन्होंने शेखर जोशी जैसे सहज, सरल और कलम के धनी लेखक को प्रवेशांक में लिया। ‘महापुरुषोंÓ को तो उन्होंने विशिष्टï लेखक की सूची में भी शामिल नहीं किया।
‘भारतीय लेखक’ की सामग्री ही नहीं, ले-आउट का भी साहित्य जगत में जोरदार स्वागत हुआ। साहित्य-पे्रमियों ने इसे हाथों-हाथ लिया। मामाजी के देहांत तक ‘भार