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ब्रजेश कुमार की तीन कविताएं

युवा कवि और पत्रकार की ये कविताएं संभवानाएं जगाती हैं-

बेरोजगार लड़के

वे मिल जाएंगे कहीं भी
झुंड में बैठे हुए
किसी चाय की दुकान पर
या कहीं भी उस जगह
जहां बैठा जा सके देर तक
अल्हड़ हवाओं की तरह
वे हंसते हैं बेफिक्र हंसी
बोलते-बोलते अकसर
देखने लगते है शून्य में
बुदबुदाते हैं
हवाओं में टांकते हैं गालियां
और हाथ में चाय की गिलास थामे
बांचते रहते हैं
गली की लड़की से लेकर
लादेन तक की कुंडली
उनके पास
सूचना और अफवाहों का
अथाह भंडार है
वे अफवाहों की सचाई में यकीन करते हैं
सच सी लगें अफवाहें
इसलिए
उनमें कुछ अफवाहें और भी जोड़ देते हैं
उन्हें कभी भी आवाज लगाई जा सकती है
मंगवाई जा सकती है बाजार से सब्जी
वे जमा करा सकते हैं पानी-बिजली का बिल
मरीज को पहुंचाना हो अस्पताल
तो उठाया जा सकता है उन्हें आधी रात में
वे अच्छे बच्चे हैं
किसी काम के लिए ना नहीं करते
ना करने पर कहा जा सकता है उन्हें
बेकार और आवारा

बस में लड़की

भीड़ के बहाने
भीड़ से बचाकर
उसके कूल्हे पर हाथ धरता हूँ
वह सिहरती है
मेरी कनपटियां सुर्ख हो जाती हैं
बस की गति और विराम के साथ
नींद भी शामिल है मेरे षडयंत्र में
छूता हूं उसे बार-बार
छूने से बचने का ढोंग रचते हुए

सिमटती है
दुबक जाती है
खिड़की से देखती है बाहर
मोबाइल पर पढ़ती है कोई पुराना मैसेज
रिंग करके काटती है बार-बार
घूंट-घूंट पीती है गुस्सा
बस में लड़की

तीसरा ख़त

कुछ शब्द यूं ही लिख डाले थे मैंने
कुछ वाक्यों का लिखा जाना
बेहद जरूरी था
बहुत कुछ कह लेने के बाद भी
बाक़ी था, बहुत कुछ कहना
इसलिए ज़रूरी था कि लिखा जाए
दूसरा ख़त
पहले ख़त के
तुम तक
पहुँचने से पहले
दूसरे ख़त में लिखा मैंने
सबसे ख़ूबसूरत दिनों
और सबसे मुश्किल रातों के बारे में
चाँद से अपनी बातचीत
और उस सपने के बारे में
जिसमें नदी के किनारे
दौड़ रहे हैं हम साथ-साथ
मैंने बताया
तुम्हें
कि दुनिया हो गई है कितनी बदरंग
और कितना मुश्किल है
बचाना अपने प्यार को
आशा-आशंका
प्यार और मनुहार से भरा
दूसरा ख़त
पोस्ट बाक्स के हवाले करने के बाद
लौटने से पहले
पल भर
रुका मैं
ध्यान से देखा पोस्ट बॉक्स को
और एक तीसरा पत्र लिखने
की ज़रूरत
मैंने शिद्दत से महसूस की