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हरिशंकर परसाई के दो व्यंग्य

हिंदी साहित्य में व्यंग्य को केंद्र में लाने और व्यापकता प्रदान में हरिशंकर परसाई का महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी पुण्यतिथि 11 अगस्त पर उनके दो व्यंग्य श्रद्धांजलि स्वरूप दे रहे हैं-

मुण्डन

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची। हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुण्डन हो गया था। कल तक उनके सिर पर लंबे घुंघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुण्डन हो गया था।
सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है। अटकलें लगने लगीं। किसी ने कहा, ”शायद सिर में जूं हो गई हों।” दूसरे ने कहा, ”शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का परदा अलग कर दिया हो।” किसी ने कहा, ”शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गई।” पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे।
आखिर एक सदस्य ने पूछा, ”अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूं कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गई है?”
मंत्री ने जवाब दिया, ”नहीं।”
सदस्यों ने अटकल लगाई कि कहीं उन लोगों ने ही तो मंत्री का मुण्डन नहीं कर दिया, जिनके खिलाफ वे बिल पेश करने का इरादा कर रहे थे।
एक सदस्य ने पूछा, ”अध्यक्ष महोदय! क्या माननीय मंत्री को मालूम है कि उनका मुण्डन हो गया है? यदि हां तो क्या वे बताएंगे कि उनका मुण्डन किसने कर दिया है?”
मंत्री ने संजीदगी से जवाब दिया, ”मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं!”
कई सदस्य चिल्लाये, ”हुआ है! सबको दिख रहा है।”
मंत्री ने कहा, ”सबको दिखने से कुछ नहीं होता। सरकार को दिखना चाहिए। सरकार इस बात की जांच करेगी कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं।”        
एक सदस्य ने कहा, ”इसकी जांच अभी हो सकती है। मंत्री महोदय अपना हाथ सिर पर फेरकर देख लें।”
मंत्री ने जवाब दिया, ”मैं अपना हाथ सिर पर फेरकर हरगिज नहीं देखूंगा। सरकार इस मामले में जल्दबाजी नहीं करती। मगर मैं वायदा करता हूं कि मेरी सरकार इस बात की विस्तृत जांच करवाकर सारे तथ्य सदन के सामने पेश करेगी।”
सदस्य चिल्लाये, ”इसकी जांच की क्या जरूरत है? सिर आपका है और हाथ भी आपके हैं। अपने ही हाथ को अपने सिर पर फेरने में मंत्री महोदय को क्या आपत्ति है?”
मंत्री बोले, ”मैं सदस्यों से सहमत हूं कि सिर मेरा है और हाथ भी मेरे हैं। मगर हमारे हाथ परम्पराओं और नीतियों से बंधे हैं। मैं अपने सिर पर हाथ फेरने के लिए स्वतंत्र नहीं हूं। सराकर की एक नियमित कार्य-प्रणाली होती है। विरोधी सदस्यों के दबाव में आकर में उस प्रणाली को भंग नहीं कर सकता। मैं सदन में इस संबंध में एक वक्तव्य दूंगा।”
शाम को मंत्री महोदय ने सदन में वक्तव्य दिया-
”अध्यक्ष महोदय! सदन में यह प्रश्न उठाया गया कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं? यदि हुआ है, तो किसने किया है? ये प्रश्न बहुत जटिल हैं। और इस पर सरकार जल्दबाजी में निर्णय नहीं ले सकती। मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। जब तक पूरी जांच न हो जाए, सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कह सकती। हमारी सरकार तीन व्यक्तियों की एक जांच समिति नियुक्त करती है, जो इस बात की जांच करेगी। जांच समिति की रिपोर्ट मैं सदन में पेश करूंगा।”
सदस्यों ने कहा, ”यह मामला कुतुबमीनार का नहीं जो सदियों जांच के लिए खड़ी रहेगी। यह आपके बालों का मामला है, जो बढ़ते और कटते रहते हैं। इसका निर्णय तुरंत होना चाहिए।”
मंत्री ने जवाब दिया, ”कुतुबमीनार से हमारे बालों की तुलना करके उनका अपमान का अधिकार सदस्यों को नहीं है। जहां तक मूल समस्या का संबंध है, सरकार जांच के पहले कुछ नहीं कह सकती।”
जांच समिति सालों जांच करती रही। इधर मंत्री के सिर पर बाल बढ़ते रहे।
एक दिन मंत्री ने जांच समिति की रिपोर्ट सदन के सामने रख दी।
जांच समिति का निर्णय था कि मंत्री का मुण्डन नहीं हुआ।
सत्ताधारी दल के सदस्यों ने इसका स्वागत हर्षध्वनि से किया।
सदन के दूसरे भाग से ‘शर्म-शर्म’ की आवाजें उठीं। एतराज उठे- ”यह एकदम झूठ है। मंत्री का मुण्डन हुआ था।”
मंत्री मुसकराते हुए उठे और बोले, ”यह आपका खयाल हो सकता है। मगर प्रमाण तो चाहिए। आज भी अगर आप प्रमाण दे दें तो मैं आपकी बात मान लेता हूं।”
ऐसा कहकर उन्होंने अपने घुंघराले बालों पर हाथ फेरा और सदन दूसरे मसले को सुलझाने में व्यस्त हो गया।

प्रेमियों की वापसी

नदी के किनारे बैठकर दोनों ने अंतिम चिट्ठी लिखी- ”यह दुनिया क्रूर है। प्रेमियों को मिलने नहीं देती। हम इसे छोड़कर उस लोक जा रहे हैं, जहां प्रेम के मार्ग में कोई बाधा नहीं है।”
प्रेमेंद्र ने कहा,  ”यह दुनिया बहुत बुरी है न, रंजना?”
रंजना समर्थन किया, ”हां, बहुत दुष्ट है।”
”इसमें आग क्यों नहीं लगती, रंजना?”
”क्योंकि आग लगानेवाले आत्महत्या कर लेते हैं।”
प्रेमी जरा देर कुछ नहीं बोल सका। फिर उसने कहा, ”हम अनंत काल तक उस लोक में सुख भोगेंगे।”
प्रेमिका बोली, ”इसका भी क्या ठीक है। वहां मेरे चाचा-चाची पहले से ही हैं। तुम्हारे चाचा भी वहां पहुंचे गए हैं। वे लोग क्या हमें शादी करने देंगे।”
प्रेमी ने समझाया, ”वहां कोई बंधन नहीं है। भगवान खुद कन्यादान करेंगे। बुजुर्गों के बाप भी अपना कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तो, चिट्ठी पर दस्तख्त करो।”
रंजना ने कहा, ”नहीं, पहले तुम।”
प्रेमेंद्र बोला, ”नहीं, पहले तुम। मैं सुसंस्कृत पुरुष हूं। लेडिज फस्र्ट!”
रंजना ने कहा, ”पर मैं नारी हूं- पुरुष की अनुगामिनी।”
इस बात से सुसंस्कृत पुरुष खुश हो गया और उसने दस्तख्त कर दिए। नीचे पुरुष की अनुगामिनी ने दस्तख्त कर दिए।
पानी में कूदते वक्त भी विवाद हुआ-
”नहीं, पहले तुम। मैं सुसंस्कृत पुरुष हूं। लेडिज फस्र्ट।”
”नहीं, तुम पहले। मैं नारी हूं- पुरुष की अनुगामिनी।”
सुसंस्कृत पुरुष को इस बार खुशी नहीं हुई। उसने संदेह से पुरुष की अनुगामिनी की तरफ देखा। उसने भी पलटकर संदेह से सुसंस्कृत पुरुष की ओर तरफ देखा।
दोनों एक साथ साड़ी से बंधे और कूद पड़े। जार्जेट सार्थक हुई।
रास्ते में रंजना ने प्रेमेंद्र से कहा, ”तुम तो मरने के बाद भी दांतों से नाखून काटते हो। बड़ी गंदी आदत है।”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”तुम भी तो भैंस की तरह मुंह फाड़कर जम्हाई ले रही हो। मुंह पर हाथ क्यों नहीं रखतीं? बड़ी गंवार हो!”
रंजना ने विषय बदलना उचित समझा। बोली, ”उधर घर के लोग अपने लिए बहुत रो रहे होंगे।”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”तुम्हारे मां-बाप तो खुश होंगे। सोचते होंगे, बला टली। दहेज बचा। तुम्हारी चार बहनें और बैठी हैं न। ”
रंजना ने तैश में कहा, ”और तुम्हारा बाप क्यों रो रहा होगा? मैं जानती हूं, वह तुमसे कितनी नफरत करता है। ”     
अब प्रेमेंद्र को विषय बदलना उचित मालूम हुआ। उसने कहा, ”छोड़ो इन बातों को। इधर घर बसाने की सोचो। ”
रंजना ने कहा, ”बड़ी गलती हो गई। मैंने कॉलेज में हमेशा पाक-शास्त्र का पीरियड गोल किया। सीख लेती, तो तुम्हें बढिय़ा पकवान बनाकर खिलाती। ”
फिर उसे कुछ याद आया, बोली, ”पर कोई बात नहीं। हमारी पाक-शास्त्र की प्रोफेसर- मिस सूद- पिछले महीने ही वहां पहुंची हैं। तुम उन्हें जानते हो न? पाक-शास्त्र बहुत अच्छा पढ़ाती हैं, पर खाना बहुत खराब बनाती हैं। उन्हें प्रिंसिपल साहिबा के भाई से गर्भ रह गया था। उन्होंने जहर खा लिया। बेचारी ने कैरेक्टर रोल अच्छा लिखवानेके लिए वैसा किया था। ”
 वे उसे लोक पहुंच चुके थे। शाम को पार्क में घूम रहे थे कि एक बेंच पर पहचाने-से स्त्री-पुरुष बैठे दिखे। पुरुष नारी का हाथ पकड़े था और नारी पुरुष के कंधे पर सिर रखे थी।
प्रेमेंद्र ने ठिठकर कहा, ”अरे, ये तो मेरे स्कूल के हेडमास्टर सक्सेना साहब हैं! ”
रंजना ने कहा, ”और वह मेरी हेडमास्टरनी मिसेज शर्मा हैं। ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”सक्सेना साहब तो बड़े सख्त और अनुशासनप्रिय आदमी थे। हमने उन्हें कभी मुस्कराते भी नहीं देखा। हम लोगों को आश्चर्य होता था कि जो आदमी मुसकरा नहीं सकता, उसके बच्चे कैसे होते जाते हैं। ”
वे मुडऩे लगे। तभी हेडमास्टर ने पुकारा, ”शरमाओ मत, बच्चो! इधर आओ। ”
वे उनके पास चले गए। मिसेज शर्मा ने अपनी विद्यार्थिनी को पहचान लिया। थोड़ी देर औपचारिक बातचीत होती रही। फिर वे अपने-अपने विद्यार्थी से पार्क में घूमते हुए बातें करने लगे।
हेडमास्टर ने कहा, ”प्रेमेन, तुम परेशान हो रहे हो कि मुझ-जैसा कठोर, संयमी और सदाचारी आदमी मिसेज शर्मा से प्रेम कैसे करने लगा। बात ऐसी हुई कि दो साल पहले एजूकेशन बोर्ड के दफ्तर में हम दोनों मैट्रिक की परीक्षा के नम्बरों का टोटल कर रहे थे। तभी हमारा टोटल हो गया। तीन महीने पहले मिसेज शर्मा की निमोनिया से मौत हो गई और एक हफ्ता पहले मैं भी हार्टफेल से यहां आ गया। मैंने इससे कह दिया है कि मैंने तुम्हारे विरह में आत्महत्या कर ली। तुम उसे बता मत देना कि मैं हार्टफेल होने से मरा। ”
उधर मिसेज शर्मा ने रंजना से कहा, ”मैं तो इस हेडमास्टर का घमण्ड तोडऩा चाहती थी। वह बड़ा कठोर और सदाचारी बनता था। राष्टï्रपति से तमगा ले आया था। पर जब मैंने इस तोड़ा तो तमगा बेचकर मेरे चक्कर लगाने लगा। झूठ बोलना इसने यहां भी नहीं छोड़ा। मरा हार्टफेल होने से और कहता है कि मैंने तुम्हारे लिए आत्महत्या कर ली। देख, तुझे जो करना हो, जल्दी कर लेना। पुरुष का कोई भरोसा नहीं। यह हेडमास्टर चोरी-चोरी अपनी साली की तलाश करता रहता है। ”
उधर हेडमास्टर ने प्रेमेंद्र से कहा, ”इस लड़की का कोई पूर्व प्रेमी तो यहां नहीं है? जरा सावधान रहना। कुछ भरोसा नहीं। यह हेडमास्टरनी चुपके-चुपके अपने स्कूल के संगीत मास्टर का पता लगाती रहती है। ”
वे अपने गुरुओं से दीक्षा लेकर आगे बढ़े तो देखा- प्रेमेंद्र के चाचा अपने साहब की बीवी के हाथ में हाथ डाले घूम रहे हैं। उसे झटका लगा। चाचा के बारे में वह ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकता था। चाचा ने उसे देख लिया। बोले, ”शरमाओ मत। यहां हम सब मुक्त हैं। मेमसाहब से हमारा उधर से ही चल रहा था। ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”मगर चाचा, आप तो कहा करते थे, मेमसाहब बड़ी फ्लर्ट(कुलटा) औरत हैं। ”
चाचा ने कहा, ”सो तो हम उसकी तारीफ में कहते थे। अरे, पतिव्रता होती, तो हमारे किस काम आती? फ्लर्ट है, तभी तो हमें फायदा पहुंचाती रही है। ”
अब प्रेमेंद्र को विश्वास हो गया कि जिनसे डरते थे, वे सब नियम-बंधन वहां नहीं हैं।
वह रंजना से शादी करने के लिए कहता और वह टालती जाती।
एक दिन उसने कहा, ”मैं सब जान गया हूं। तुम छिपकर उस विनोद से मिलती हो। वह, जो कार दुर्घटना में में मर गया था। वह हेडमास्टरनी तुम्हें उससे मिलवाती है। तुम भूल गई कि यह वही विनोद है, जिसके बाप ने तुम्हारे बाबूजी को सस्पेंड करवाया था। ”
रंजना ने कहा, ”तुम्हें भ्रम है। मैं उससे नहीं मिलती। ”
”तुम उससे प्रेम मत करने लगना। ”
”मैं भला उस बदमाश से प्रेम करूंगी? ”  
”तुम उससे प्रेम करने ही लगी हो। मुझे विश्वास हो गया है। ”
”आखिर क्यों तुम ऐसा सोचते हो? कैसे कहते हो कि मैं उससे प्रेम करती हूं। ”    
”इसलिए कि तुमने उसे बदमाश कहा। प्रेम न करतीं, तो उसे बदमाश नहीं कहतीं। ” 
रंजना ने छिपाना जरूरी नहीं समझा। उसे बतला दिया कि मैं विनोद से विवाह करने वाली हूं।
प्रेमेंद्र ने रोना चाहा, पर उस लोक में आंसू नहीं निकलते। उसने उसे भला-बुरा कहा और आत्महत्या की धमकी देकर चला गया।
पर आत्महत्या वह कर नहीं सका। उसने फांसी लगाने की कोशिश की, गरदन कसी ही नहीं। रेल के नीचे लेट गया, पर पूरी गाड़ी निकल गई और उसे चोट तक नहीं आई। वह नदी में कूद गया, पर उतरता रहा। एक दिन वह इमारत की पांचवीं मंजिल से कूद पड़ा। नीचे सड़क पर एक पुलिसवाले के ऊपर गिरा। पुलिसवाले ने हंसकर कहा, ”क्या बच्चों का खेल खेलते हो! ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”मैं पांचवीं मंजिल से कूदा हूं और तुम इसे बच्चों का खेल कहते हो। ”
उसने जवाब दिया, ”तो क्या हुआ! तुम यहां सौवीं मंजिल से भी कूद सकते हो। पर तुम आखिर कूदे क्यों? ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”मैं आत्महत्या करना चाहता हूं। ” 
पुलिसवाले ने कहा, ”पर आत्महत्या तो यहां हो नहीं सकती। हो जाए, तो जीव यहां से कहां जाएं? तुम्हारे उधर के कवि तक यह जानते हैं। किसी ने कहा है न- मरे के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे! ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”तो हत्या तो हो सकती होगी। मैं उस हेडमास्टरनी की हत्या करना चाहता हूं। ”
पुलिसवाले ने कहा, ”तुम्हारे पुराने संस्कार छूटे नहीं हैं, तभी तो हत्या के लिए पुलिस से सलाह मांगते हो। देखो, हत्या भी नहीं हो सकती। वही समस्या है कि जीव कहां जाए। बात क्या है? कुछ प्रेम वगैरह का मामला है क्या? ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”हां, वह मुझे धोखा दे गई। ”
पुलिसवाले ने कहा, ”तो तुम प्रेम और विवाह के संचालक से मिलो। वे मामला सुलझाएंगे। ”
प्रेमेंद्र संचालक के दफ्तर गया। उन्होंने उसे सिर से पांव तक देखा और खूब मुसकान लाकर पूछा, ”यस यंग मैन, व्हाट कैनाई डू फ्रा यू? ”(मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?)
प्रेमेंद्र ने कहा, ”साहब, भारत से आए मालूम होते हैं। ”
साहब ने पूछा, ”तुमने कैसे जाना? ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”ऐसे कि आप यहां भी अंगरेजी में बोल रहे हैं। यह ऊंचे दरजे के भारतीय के लक्षण हैं। ”
साहब ने कहा, ”तुम ठीक कहते हो। अंगरेजी के लिए ही मैंने वह गिरा हुआ देश छोड़ दिया। मैं आईसीएस था। दिल्ली में एक विभाग का सेक्रेटरी था। 26 जनवरी, 1965 को जब हिंदी उस देश की शासन की भाषा हो गई तो 27 को मैं हवाई जहाज से लंदन पहुंचा और टेम्स नदी में कूद पड़ा। ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”सर, आप इतनी दूर क्यों गए? वहां दिल्ली में यमुना में कूदकर मर सकते थे। ”
साहब ने कहा, ”नॉनसेंस! कैसी बात करते हो! जमुना में कूदता तो ‘हर मेजस्टी ’ (इंग्लैंड की रानी) मेरे बारे में क्या सोचती? ”
प्रेमेंद्र ने उन्हें अपनी समस्या बताई। संचालक ने कहा, ”यह पॉलिसी का मामला है। ऊपर से तय होगा। पॉलिसी तय करा लो, तो अमल में मैं जैसा कहोगे, वैसा ही घुमा दूंगा। ठीक उस पॉलिसी से उलटा उसी पॉलिसी के अंतगर्त कर सकता हूं। मुझे दिल्ली में इसका अभ्यास हो चुका है। मैं तुम्हारे केस को विधाता के पास भेज देता हूं। तुम उनसे कल मिल लो। ”  
दूसरे दिन प्रेमेंद्र विधाता के सामने हाजिर हुआ। रंजना भी बुला ली गई थी।
विधाता ने कहा, ”तुम्हारा मामला हमने देख लिया। तुम क्या चाहते हो? ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”अगर आप सीरिसली लें, तो मैं आपकी ‘प्रभु ’ कहूं- प्रभु, आप रंजना को मुझसे प्रेम करने का हुक्म दें और बदजात हेडमास्टरनी को डिसमिस कर दें। ”
विधाता ने कहा, ”जहां तक प्रेम का संबंध है, हमारे हाथ संविधान से बंधे हैं। प्रेम पब्लिक सेक्टर में नहीं है, प्राइवेट सेक्टर में है। वह हेडमास्टरनी भी हमारी नौकरी में नहीं है। हम दूसरा पक्ष सुनकर समझौता कराने का प्रयत्न कर सकते हैं। देवी रंजना, तुम्हें इस संबंध में क्या करना है? ”
रंजना ने निवेदन किया, ”प्रभु, हमारी दुनिया में हमें स्वतंत्रता नहीं है, इसलिए जो हमारे संपर्क में आ जाता है, उसी से हमें प्रेम करना पड़ता है। यह प्रेमेंद्र हमारे घर बचपन से आता रहा है। पिताजी इससे पान-सिगरेट मंगवाते थे। मेरे माता-पिता इतने सख्त हैं कि न मुझे अकेली कहीं जाने देते थे, न किसी आदमी को घर आने देते थे। मैं प्रेमेंद्र के सिवा किसी दूसरे पुरुष को जानती भी नहीं थी। इसी मजबूरी में जो हमारा संबंध हुआ, उसे हम प्रेम कहने लगे। मेरा वश चलता, तो विनोद से प्रेम करती। मुझे वह पसंद था। पर उसके पिता ने हमारे बाबूजी को सस्पेंड करवा दिया था। इसलिए उसका हमारे यहां आना नहीं होता था। पर यहां स्वतंत्रता है। मैं अपनी इच्छा से प्रेम कर सकती हूं। इसलिए विनोद से प्रेम करती हूं। परतंत्रता में जो हो गया, वह स्वतंत्रता में नियामक नहीं हो सकता। ”
विधाता ने प्रेमेंद्र ने कहा, ”सुना तुमने? तुम क्या कहते हो? ”
प्रेमेंद्र ने दुखी प्रेमी के आधिकारिक रोष से कहा, ”यही कहना है कि हमें ऐसी जगह नहीं रहना। हमें वापस हमारे संसार में भेज दिया जाए। इधर का भरोसा झूठा निकला। ”
विधाता ने कहा, ”तुम वहां से यहां और यहां से वहां भागते फिरोगे, या कुछ करोगे भी। ” 
तबतक सचिव ने रिकार्ड देखकर बताया, ”प्रभु, इस लड़की की माता का कोटा खत्म हो गया है। पांच लड़कियां देनी थीं, सो दे चुके। अब यह उसी परिवार में जन्म नहीं ले सकती। लड़के के बाप का अलबत्ता एक बेटा बकाया है। ”
प्रेमेंद्र ने गुस्सा से कहा, ”अजीब धांधली है! यहां भी अपने बाप हम नहीं चुन सकते! एक लड़की किसी को दे देने में क्या लड़कियों का स्टॉक यहां खत्म हो जाएगा? ”
विधाता ने उसे नाराजगी से देखा। बोलो,”तुम्हें गुस्सा जल्दी आता है, प्रेमी महोदय! तुम इतनी जल्दी दुनिया क्यों छोड़ आए? किसी दुर्घटना में मारे गए थे क्या? ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”मैं प्रेम के कारण आत्महत्या करके आया हूं। हम दोनों एक साथ नदी में कूद पड़े। वहां की दुनियावाले हमारी शादी नहीं होने दे रहे थे। ”
विधाता ने कहा, ”मगर तुम बात तो ऐसे तैश में करते हो, जैसे किसी आंदोलन में शहीद होकर आए हो! दुनिया में कोई और काम करने को नहीं बचे थे जो यहां चले आए? ”
वे दोनों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।
विधाता ने रंजना से कहा, ”देवीजी, आपका नया प्रेमी जब सुनेगा कि आप इनके प्रेम में आत्महत्या करके आई हो, तो वह भी आपको छोड़ देगा। यहां सुंदरियों की कमी नहीं है। ”
रंजना ने कहा, ”साहब, यह जगह हमें बिल्कुल पसंद नहीं आई। यहां कुछ निश्चित नहीं है। इधर की स्वतंत्रता बरदाश्त नहीं हो सकती। कोई किसी के प्रति सच्चा नहीं होता। आप तो हम लोगों को वापस हमारी दुनिया में भेज दीजिए। कहीं भी भेज दीजिए। ”
विधाता ने कहा, ”पर अब एक कठिनाई है। जो प्रेम में आत्महत्या करके आते हैं, उन्हें फिर मनुष्य बनाने का नियम नहीं है। जिस कारण से उन्हें जीना चाहिए, उस कारण से वे मर जाते हैं। उनमें मुनष्य के रूप में प्रेम करने का साहस और विवेक की कमी होती है। तुम्हारे लिए भी यह अच्छा नहीं है कि तुम फिर मनुष्य बनो। एक बार बनकर और प्रेम करके तुमने देख लिया। तुमसे बना नहीं। तुममें हिम्मत हीं नहीं प्रेम को निबाहने की। तुम दुबारा इस झंझट में मत पड़ो। कोई और जीवधारी बनो, जो मनुष्य की तरह प्रेम करने को बाध्य नहीं है। बोलो, कोई जानवर बनना चाहते हो? ”
प्रेमेंद्र ने रंजना से कहा, ”बता क्या बनेगी? ”
उसने प्रेमेंद्र ने कहा, ”तुम्हीं बताओ पहले। ”
प्रेमेंद्र ने कहा, ”नहीं, पहले तुम। मैं सुसंस्कृत आदमी हूं, लेडिज फस्र्ट! ”
रंजना ने कहा, ”नहीं, तुम पहले बताओ। मैं स्त्री हूं, पुरुष की अनुगामिनी! ”

(सदाचार का तावीज से साभार)

प्रेमिका की तलाश

प्रेम, यानी इश्क का भूत कब और किस पर सवार हो जाए, कहना मुश्किल है। यह भूत वक्त, हालात या उम्र, किसी का भी खयाल नहीं रखता। कोई भी इससे बच नहीं सकता। हम सभी कभी-न-कभी इसकी चपेट में आ ही जाते हैं। असल में यह भूत हमेशा हमारे इर्दगिर्द मौजूद रहता है। इसे जरा सा मौका मिला और हो गया सवार। फिर इसका कोई इलाज नहीं, सब झाडफ़ूंक बेकार।
अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था कि मुझे भी इस ने धर दबोचा। मैंने पीछा  छुड़ाने की बहुत कोशिश की, परंतु वह नहीं माना। मैं ही कमजोर साबित हुआ। मजबूरन झुकना पड़ा, परंतु एक गहरा संकट उठ खड़ा हुआ। प्रेम करना है तो एक अद्द प्रेमिका भी होनी चाहिए। प्रेमिका भी ऐसी कि… पूछो नहीं। आज तक न तो ऐसी हुई हो और न आगे कभी हो। वर्तमान में एक हो और वह केवल मेरे लिए। सो सारा बचपन एक अद्द प्रेमिका की तलाश में गुजर गया, लेकिन खोज पूरी न हुई।
जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था, हालांकि अभी अभी थोड़ी-बहुत लड़खड़ाहट थी। मेरे मन से आवाज उठी, ‘अरे मूर्ख, तू क्यों पागल बनता है? एक प्रेमिका ढूंढकर उसके पीछे सारी जिंदगी पागल बन, लोगों के ताने सुनने और पत्थर खाने में कोई अक्लमंदी नहीं।Ó इसलिए प्रेमिका तलाश मुहिम बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई।
हमने पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रंथों को पढ़कर और कुछ तो सीखा नहीं, परंतु इतना जरूर जान लिया कि राजा, महाराजाओं और सामंतों के प्रेम का श्रीगणेश नदी के किनारे जलक्रीड़ा करती या पानी के लिए जाती सुंदरियों की छेड़छाड़ से होता था। नदी, पोखर का जमाना तो रहा नहीं, सुंदरियां बाथरूम में बंद हो कर जलक्रीड़ा करने लगी हैं। इसलिए मैंने बड़े अरमानों से मोहल्ले के नल की ओर पग बढ़ा दिए।
पानी का संकट चल रहा था, सो लंबी लाइन लगी थी। इसे मैंने अपना सौभाग्य समझा। मैंने लाइन के चारों ओर चक्कर लगाया तो परेशान हो गया कि प्रेम किस से शुरू करूं? सभी एक से बढ़कर एक थीं। मैंने अक्ल से काम लिया और सोचा, एकसाथ तीन-चार निशानें लगाता हूं, जो भी सही बैठ गया, उसी से काम चला लूंगा।
अपनी ओर से कोशिश शुरू कर दी। खूब फब्तियां कसीं, खूब ऊटपटांग गाने गाए, बेहूदा शेरों के तीर चलाए, लेकिन किसी के दिल में प्रेम के बीज फूटना तो दूर, कान में जूं तक नहीं रेंगी। न तो किसी ने झूठा गुस्सा दर्शाया और न ही कोई हंसी। न जाने जल संकट के कारण उन्होंने ध्यान नहीं दिया या पहले ही मेरे जैसे झूठे-सच्चे प्रेमी बना चुकी थीं। मेरी पहली कोशिश बेकार गई।

कालेज की सबसे खूबसूरत लड़की मेरी क्लास में पढ़ती थी। एक दिन चार-पांच लड़कों ने घेर लिया और छेड़खानी करने लगे।
मैं उधर से निकला तो उन्हें ललकारा, ”अकेली लड़की को छेड़ते हो।”
”अकेली को छेड़ें या सहेलियों के साथ, तुझे क्या?” एक लड़का मुसकराया।
मैं गुस्से में चिल्लाया, ”चुपचाप यहां से दफा हो जाओ। नहीं तो एकएक की हड्डी-पसली तोड़ दूंगा।”
”अरे, जा-जा…तेरे जैसे सुकडे पहलवानों से डरने लगे तो लूट लिया हमने छेड़छाड़ का मजा।” दूसरा गुस्से से बोला।
अपने दुबले-पतले बदन को देखकर एक बार तो मैं डर ही गया। मैं वहां से भागने ही वाला था कि ऐन वक्त पर याद आ गया। मैंने ढिशुमढिशुम शुरू कर दी। चंद घूंसे खाकर चारों रफूचक्कर हो गए।
लड़की कांपती हुई मेरे पास आई और बोली, ”मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलंगी।”
”एहसान कैसा, यह तो मेरा फर्ज था। तुम अकेली क्या आती हो? अगर बुरा न मानो तो मेरे साथ आया-जाया करो। मेरा घर भी इधर ही है।”मैंने बिना किसी फीस के नेक सलाह दे दी।
वह फूटफूट कर रोने लगी तो मेरी आंखें चमक उठीं। मन ही मन खुश हुआ कि काम बन गया।
”तुम घबराओ नहीं। मैं हूं न।” मैं स्टाइल में बोला।
उसके होंठ फडफ़ड़ाए,   ”भैया…”
मैं धड़ाम से आसमान से सीधा धरती पर आ गया।
उसने सुबकी ली, ”मेरा कोई भाई नहीं है। मुझे इसका बहुत दुख था, रक्षाबंधन पर मेरी सभी सहेलियां अपने भाइयों को राखी बांधती हैं, अपनी रक्षा के लिए मैं किसे राखी बांधूं?
”परसों रक्षाबंधन है। तुम हमारे घर जरूर आना। मैं अभी बाजार से राखी खरीद लाती हूं।” उसने आंसूं पोंछ लिए। उसकी आंखों में खुशी की चमक उभर आई।
मेरी बोलती बंद हो गई। सिर हिलाने के अलावा कोई चारा नहीं था। वह बाजार की ओर बढ़ गई। मेरी क्या हालात हुई, इसका आप अंदाज लगा सकते हैं। अपने दोस्तों को नाटक करने व मार खाने के लिए जो रुपए दिए, वे अलग डूब गए।

मैं जिस भी समारोह में जाता हूं, चाहे वह दोस्त का हो या दुश्मन का, उत्सव हो या मातम, मेरी निगाहें रूपसियों को तलाश करती रहती हैं। ताकझांक करने में कभी-कभी तो मैं रिश्तों को भी ताक पर रख देता हूं।

जवानी की दहलीज पर मजबूती से कदम जम चुके थे। कालेज के मौजमस्ती के माहौल को छोड़कर आफिस के बोर माहौल में आ गया था। इत्तिफाकन आफिस से में बहुत सी लड़कियां काम करती थीं। मैंने सोचा, ‘चलो, मन लगाने का कुछ तो साधन है।Ó
मेरा मन कामधाम में नहीं लगता था, बस दिनभर लड़कियों को ताकता रहता और कल्पना करता था कि सभी लड़कियां मुझे घेरे हुए प्रेमभरी बातें कर रही हैं।
मेरे एक साथी को मेरे इश्की भूत को पता चला तो उसने नेक सलाह दी, ”यार, साइकिल से काम नहीं चलेगा। तू कम से कम स्कूटर तो खरीद ले, फिर आती-जाती लड़कियों को लिफ्ट दे।”
सलाह मुझे पसंद आ गई। इधर-उधर से रुपया उधार लेकर नया तो नहीं परंतु पुराना स्कूटर खरीद लिया। वह दो-चार महीने तो सही चला, फिर खड़पड़ करने लगा।
मैंने बहुत कोशिश की कि कोई लड़की लिफ्ट मांगे। मैं स्कूटर की रफ्तार धीमी कर लेता, परंतु मेरे स्कूटर का आलाप सुनकर लड़कियां पहले ही मुंह फेर लेतीं।
एक दिन मैंने बस स्टाप पर आफिस की एक लड़की को देखा। मेरी बांछें खिल गईं, फौरन स्कूटर रोक लिया, ”मैडम, पहले ही देर हो गई है, मेरे साथ स्कूटर पर चलो।”
उसने जबरदस्ती धन्यवाद कहा और मुंह मोड़ लिया। वहां खड़े सभी लोग मुझे घूरने लगे तो आगे बढऩा पड़ा।
मैडम आफिस 15 मिनट देर से पहुंची और मैं पूरे तीन घंटे देरी से पहुंचा। मैं हांफता हुआ मैडम की सीट तक पहुंचा और बोला, ”अच्छा हुआ, जो आप मेरे साथ नहीं आईं। रास्ते में स्कूटर खराब हो गया था। कोई मैकेनिक की दुकान भी नहीं मिली… स्कूटर खींच कर लाना पड़ा।”
”यह तो मुझे पहले ही पता था,” मैडम गंभीरता से बोली।
”कैसे? क्या आप ज्योतिष भी जानती हैं?”
”तुम्हारे खचड़ा स्कूल से और क्या उम्मीद की जा सकती है,” मैडम मुंह बनाती हुई बोलीं।
सभी के चेहरों पर मुस्करान खिल उठी। मैं अपना सा मुंह लेकर चुपचाप अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।
उसी दौरान मेरी जबरदस्ती शादी कर दी गई। बच्चे हो गए, लेकिन इश्क का भूत न उतरा।

एक दिन मैंने आफिस की लड़कियों के घरों के बारे पता लगाया। केवल एक लड़की का घर मेरे घर के पास था, जो खूबसूरत तो नहीं, पर ठीकठाक थी। मैंने शान से उससे कहा, ”मैडम, मेरा घर आपके घर के पास ही है। आप बस में आने के बजाय मेरे साथ आया-जाया कीजिए।”
उसने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा और चीखी, ”बकवास बंद करो।”
अगले दिन मेरी पेशी हो गई। मैनेजर ने खूब डांटा और मेरी तरक्की भी रोक दी।
मैं सोचने लगा कि ऐसी क्या गलती हो गई? बाद में पता चला कि उस लड़की ने मेरी शिकायत कर दी थी। मैनेजर की निगाहें पहले ही उस पर लगीं थीं।

हमारे आफिस में नया क्लर्क आया। वह मजनंू बना घूमता। अपनी प्रेमिकाओं के नाम गिनवाता। उनके बारे में चटखारे ले लेकर चटपटे किस्से सुनाता।
मुझे लगा, अब जाकर कोई सही आदमी मिला।
”गुरु, मैं बहुत परेशान हूं। आज तक कोई प्रेमिका नहीं मिलीं। हमें भी कोई गुरुमंत्र दो,” मैं गिड़गिड़ाया।
वह मुसकराया, ”तुम आफिस कैसे आते हो?”
”स्कूटर से।”
”तुम यहीं मार खा गए।”
”वह कैसे?”मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।
”प्रेम का श्रीगणेश बसों में होता है… भीड़भाड़, घिचपिच रहती है, बस सुनहरा मौका देखा और हो जाओ शुरू।”
मेरे स्कूटर आफिस न ले जाने के फैसले पर घर के सभी लोग हैरान हो गए।
पत्नी ने कहा, ”तुम से कितनी बार कहा कि इस खचड़ा को मत ले जाओ, परंतु तुम ने कभी नहीं सुनी। लगता है, आज तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है… तुम दफ्तर नहीं जाओगे।”
”परंतु मैं ठीक हूं,” मैं खीज उठा।
मेरा बेटा किसी डाक्टर की तरह बोला, ”अच्छा यह बताइए, आपका क्या नाम है?”
”अनुराग।”
”आपका आफिस कहां है?”
”सेक्टर-10 नोएडा में।”
”अच्छा, यह बताओ, आज तारीख क्या है?”
”15 अक्टूबर।”
”आप ठीक हैं। आफिस जा सकते हैं।” वह सिर हिलाते हुए इतमीनान से बोला।
मुझे बहुत झुंझलाहट हुई। आफिस के लिए देर हो रही थी, इसलिए चुपचाप खिसक लिया।
मैं बस में चढ़ा तो देखा कि एक हसीन लड़की सामने ही खड़ी है। मैं मन ही मन खुश हुआ। वह जैसे ही भीड़ में आगे बढ़ी, मैंने वैसे ही उसे छेड़ा तो हंगामा खड़ा हो गया।
”लुच्चे-लफंगे, लड़की को छेड़ते शरम नहीं आती,” वह चिल्लाई।
उस लड़की से दो-चार कदम आगे खड़े लड़के ने मेरा कालर पकड़ कर एक घूसा जड़ दिया और चीखा, ”मारो साले को…”
एक अधेड़ बोल उठा, ”क्या जमाना आ गया है… इन लौफरों ने बहू-बेटियों का घर से निकलना मुश्किल कर दिया है। ऐसी धुनाई करना कि छठी का दूध याद आ जाए।”
सबको बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल गया। सबके सब शरीफ बन गए। तड़तड़ातड़। मुझे वह मार पड़ी कि अस्पताल में भर्ती होने के चार घंटे बाद होश आया और डेढ़ महीने तक वहां आराम करना पड़ा।
तकरीबन दो महीने बाद दफ्तर जाना शुरू किया तो देखा कि वही लड़का और लड़की बस में छेड़छाड़ कर रहे हैं और एक-दूसरे को देखकर मुसकरा रहे हैं। वह अधेड़ मंदमंद मुसकराते हुए बड़े मोहक अंदाज से लड़की को घूर रहा है। मेरा दिल जल उठा।
मेरे मजूनं गुरु ने समझाया, ”यह भी प्रेम करने का फार्मूला है, जो पंसद न आए, उसकी शिकायत कर दो, हंगामा खड़ा कर दो, उसे बदनाम कर दो। जो पसंद आ जाए, नैन लड़ाते रहेा और बगुलाभगत बनकर प्रेम करते रहो।”

सारी उम्र बीत गई। दो-चार साल और जी गया तो बहुत है। कब्र मैं पैर लटके हुए हैं, लेकिन इश्क का भूत नहीं उतरा है। प्रेमिका की चाह अभी भी बाकी है।