8 जनवरी, 1935 को जन्में सुप्रसिद्ध लेखक प्रबोध कुमार ने 1955-56 में लिखना-छपना शुरू किया। करीब एक दशक तक उनकी कहानियाँ ‘कहानी’, ‘कल्पना’, ‘कृति’ आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर खासी चर्चित हुईं। उन्होंने करीब पैंतालीस वर्षों से न लिखने के बाद उपन्यास लिखा- निरीहों की दुनिया। उनकी कहानी -
मीरा के दाँत जब भी टूटते, वह उन्हें चूहे के बिल में डाल देती जिससे दोबारा निकलने पर वे चूहे के दाँतों की तरह सुडौल हों। उस दिन जब फिर उसका एक दाँत टूटा तो उसे ले वह फुदकती बिल की तरफ चली। तभी न जाने कहाँ से आ, उसके हाथ से दाँत छीन, विशू भाग गया। वह रोते-राते उसके पीछे दौड़ी लेकिन विशू को पकड़ना आसान नहीं था। हारकर बरामदे में बैठ, वह बीच-बीच में बह आती नाक घुटकने लगी। सबसे बड़ा डर उसे यह था कि विशू ने दाँत यदि खपरैल पर फेंक दिया तो नया दाँत खपरे की तरह होगा। विशू की माँ उसकी माँ के साथ पड़ोस के घर में थीं जहाँ उसी रात घर की सबसे बड़ी लड़की सरला की शादी थी। उसकी शिकायत सुनने वाला दूसरा कोई वहाँ था नहीं। विशू बगीचे में खड़ा उसे मुँह चिढ़ा रहा था। मीरा की बेहद इच्छा हुई कि जा कर उसका मुँह नोंच ले लेकिन वह जानती थी कि विशू मुँह नुचवाने वहाँ खड़ा नहीं रहेगा।
विशू ने इस उम्मीद से कि मीरा उसके पीछे-पीछे भागेगी, कहा, ‘‘अच्छा ले जाओ अपना दाँत, हमें नहीं चाहिए’’, लेकिन उस पर कोई असर न होते देख वह घाट पर चला गया। छुट्टियों में अपनी माँ के साथ जब भी वह मीरा के घर आता तो उन दोनों का अधिकतर समय तालाब पर बीतता था। घने पेड़ों के कारण, पास होने पर भी वह घर से दिखाई नहीं देता था। वहाँ पहुँचने पर उन्हें लगता कि घर से बहुत दूर चले आये हैं। विशू को तालाब बहुत पसंद था। उसके तीन किनारों पर शहर के मकान आकर यदि ठहर न जाते तो पानी में गिर पड़ते। मकानों के बीच काफी संख्या में कलशदार मंदिर फँसे थे। उनकी नुकीली आकृतियाँ दिन भर पानी में डोलती रहतीं। तालाब की चौथी ओर नीली-भूरी पहाडिय़ाँ थीं जिनमें मीरा के अनुसार, चुड़ैल छिपकर रात में उन्हें सताने की योजना बनाती थी। पहले उन्हें, जब तक कोई बड़ा व्यक्ति साथ न हो, तालाब पर बिल्कुल जाने नहीं दिया जाता था। बाद में बड़ों की व्यस्त दिनचर्या में बच्चों को किसी बात के लिए मना करना शायद एक बेमतलब आदत बन गयी थी, क्योंकि वह एक बार मना करने के बाद कोई भी यह देखने का कष्ट नहीं करता कि उन्होंने कहना माना या नहीं। एक कारण शायद यह भी रहा हो कि अब उन्हें तैरना आ गया था, यद्यपि अब भी वे पानी में तभी उतरते जब घाट पर काफी लोग नहाते रहते। पिछली गर्मियों में मीरा के पिता ने उन्हें तैरना सिखाया था। मीरा की देखादेखी वह भी उसके पिता को बाबूजी कहता था। सुबह होते ही दोनों अपनी तूंबियाँ सहेज तैयार हो जाते। उसके बाद उन्हें लगता कि बाबूजी जानबूझ कर चाय पीने में या दाढ़ी बनाने में देर लगा रहे हैं। उतावली में वे, घाट के रास्ते में, बाबूजी से हमेशा दस-बीस कदम आगे रहते। वहाँ पहुँचते ही वे अपने ऊपर के कपड़े उतार, तूंबियाँ बाँधकर बड़े लड़कों की तरह सिर के बल पानी में कूदने का अभिनय करने लगते। बाबूजी आकर देखते कि उनकी तूंबियाँ ठीक से बंधी हैं या नहीं। मीरा की तूंबियाँ उन्हें रोज दोबारा बाँधनी पड़तीं। पानी में जाकर जब वह हाथ फैला खड़े हो जाते, तब दोनों एक के बाद एक पानी में कूद पड़ते। तैरते समय उनके नौसिखिया हाथ-पैरों से बहुत पानी छिटकता जिसका आसपास नहाते लोग बुरा मानते। मीरा पर तो कोई असर न होता लेकिन विशू थोड़ी देर को सहम जाता। पानी से भारी हो बार-बार नीचे खिसकता निकर ठीक करता वह मीरा को देखने लगता। मीरा की सफेद पतली चड्डी में हमेशा हवा भर जाती जिससे कपड़े का एक गुब्बारा पानी में हर जगह उसका पीछा करता, एक पिचकता तो दूसरा तैयार हो जाता। नहाकर जब वे निकलते तो उनके होंठों पर पपडिय़ाँ जमी रहतीं। तूंबियाँ खोलने के बाद वे गर्मी के दिन होने पर भी थोड़ी देर तक तौलियों में छिपे रहते। वह जब अपना बदन पोंछता तो पाता की मीरा की अपेक्षा उसकी कमर में रस्सी के लाल निशान कम उभरे हैं।
विशू ने जोर से पत्थर फेंका तो वह चार-पाँच बार पानी पर उचटता काफी दूर जाकर डूब गया। तिजहरिया में कपड़े धोती तीन वयस्क औरतों को छोड़ घाट पर और कोई नहीं था। जब मीरा साथ रहती तो उसका काफी समय इसी तरह पत्थर उचकाने में बीतता। तब यदि कोई घाट पर होता तो उन्हें खेल में बाधा पड़ने का डर लगा रहता। घाट के पास, कुछ दिन हुये, एक मढ़िया बनी थी। वहाँ से वे पानी में फेंकने के लिये पत्थर की चीपों के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठा करते। मीरा के फेंके पत्थर पानी पर उचटने की जगह हमेशा हवा में अधगोला बनाते डब्ब-से पानी के नीचे चले जाते। उसे आश्चर्य होता कि विशू कैसे पत्थरों को इतनी बार उचटा लेता है। कभी-कभी आसपास के कुछ लड़के आकर उनके खेल में शामिल हो जाते। उनसे जब विशू हारता तो मीरा को बुरा लगता, खेल में उसकी रुचि खत्म हो जाती।
‘‘अब घर चलो विशू, खूब देर हो गयी है।’’
‘‘अभी तो सब लोग सो रहे होंगे।’’
‘‘नहीं, वहाँ चलो, बगीचे में खेलेंगे।’’
‘‘अच्छा, रुको अभी चलते हैं।’’
विशू फिर खेल में व्यस्त हो जाता। मीरा तालाब की संकरी फसील पर चढ़ घूमने लगती। जब उसे तैरना नहीं आता था तो ऐसा करते हमेशा डरती कि कहीं पानी में न गिर पड़े। फसील पर अपनी समझ में काफी देर घूम चुकने के बाद वह अक्सर पेशाब करने बैठ जाती। इतनी बड़ी होकर भी उसे समय या जगह का जरा भी खयाल नहीं रहता था। चाची, एक-दूसरे की माँ को वे चाची कहते, के पास मीरा के पेशाब करने से सम्बन्धित किस्सों का ढेर था। चाची अक्सर उससे कहा करतीं कि मीरा के लिए अब फिर से रबर की चादर लानी पड़ेगी। मीरा उनकी इस आदत से बहुत चिढ़ती थी। उसे सबसे बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि वह विशू को क्यों सारी बातें बता देती हैं। विशू इतना खराब था कि झगड़ा होने पर उन्हीं बातों से उसे चिढ़ाता।
‘‘विशू, अब चलो।’’ मीरा उन लड़कों के साथ विशू को नया खेल शुरू करते देख उतावली हो उठती। विशू ध्यान नहीं देता तो वह गुस्से में पीछे से उसकी कमीज पकड़ लेती।
‘‘अब चलो विशू, सच्ची खूब देर हो गयी।’’
‘‘बस, थोड़ी देर और रुक जाओ।’’
‘‘नहीं, अब चलो।’’
‘‘तो तुम जाओ, हम अभी आते हैं।’’
‘‘हम चाची से बता देंगे कि विशू तालाब पर खूब शैतानी कर रहा है।’’
कहकर मीरा सचमुच चल पड़ती। कहने को तो विशू कह देता, जाओ बता देना, हमें किसी का डर नहीं पड़ा है, लेकिन जल्द ही उस धमकी का असर उस पर छा जाता। अधरस्ते ही वह मीरा को पकड़ लेता। खुशी में मीरा यह पूछना भूल जाती कि जब उसे किसी का डर नहीं पड़ा है तो फिर चला क्यों आया। रास्ते में हमेशा कोई फूलों का गुच्छा या कोई विचित्र से रंग का पत्ता तोडऩे के लिए विशू से आग्रह करती। कुछ पेड़ों पर तो वह चढ़ जाता, लेकिन कुछ इतने पतले या झाड़ीनुमा होते कि उनके फूल तोडऩे के लिए जमीन पर से ही कोशिश करना पड़ती।
जब वह उचक कर भी वहाँ तक नहीं पहुंच पाता तो मीरा उससे घोड़ा बनने को कहती। विशू दोनों हाथ जमीन पर टेक देता तो वह फूल तोडऩा छोड़ उसका गर्दन पर सवार हो जाती। उसकी चड्डी में से हमेशा पेशाब के साथ, धुले कपड़ों की मिली-जुली बास आती थी, जिसे वह सूँघना न चाहते भी सूँघता था। मीरा एक बार बैठ जाता तो तब तक उसकी गर्दन नहीं छोड़ती जब तक कि विशू खुद उसकी पतली टांगों के बीच से सिर न निकाल लेता। इस प्रयास में अक्सर दोनों ही जमीन पर गिर पड़ते। विशू कहता कि अब वह कभी उसके लिए फूल नहीं तोड़ेगा लेकिन ऐसी बातें या तो वह कहने के साथ ही भूल जाता, या उसे उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता कि वह जब कुछ कहता है तो फिर उसे करता क्यों नहीं।
मीरा के बिना विशू की समझ में नहीं आ रहा था कि घाट पर क्या करे। पत्थर उचटाने के खेल से बहुत जल्द ऊब कर अब वह एक पेड़ के नीचे बैठा था। तालाब के दूसरे किनारे के पास एक आदमी नंगे बदन डोंगे में बैठा, मछली मार रहा था। सारे तालाब पर छोटी-छोटी लहरें उभरी थीं। जिनके ऊपर सूरज गोल टुकड़ों में चिलक रहा था। कभी-कभी कोई चिडिय़ा बहुत तेजी से नीचे आ, पानी की सतह को छूती फिर आसमान में उड़ जाती। मीरा को रुला कर अब विशू को बहुत बुरा लग रहा था। उसे मीरा पर कुछ गुस्सा भी आया कि वह उतनी जल्दी रोने क्यों बैठ गयी। उसे आश्चर्य था कि मीरा इतनी-सी बात भी क्यों नहीं समझ सकी कि वह दाँत खपरैल पर कभी भी नहीं फेंकता। चूहे के बिल को छोड़ टूटे दाँत के लिए और कोई जगह होती ही नहीं।
मीरा ने जब कहा, ‘‘विशू चलो, तुम्हें चाची बुला रही हैं’’ तो वह चौंक गया। उसने मुड़ कर देखा तो वह दूसरी तरफ देखने लगी। पहले तो उसकी समझ में नहीं आया कि अम्मा को उसने कौन-सा काम आ पड़ा, लेकिन मीरा को दूसरी ओर देखता पा, वह काफी डर गया। उसकी इच्छा हुई कि चुगली करने पर मीरा को पकड़कर मार लगाए, लेकिन एक अपराध के बाद दूसरा अपराध करने पर उसमें हिम्मत नहीं थी।
‘‘जाओ, अम्मा से कह दो कि हम थोड़ी देर में आते हैं।’’
‘‘नहीं, उन्होंने कहा है कि उसे लेकर जल्दी आओ। वह बरामदे में खड़ी हैं।’’
‘‘तुमने चुगली क्यों की, हम क्या तुम्हें दाँत दे नहीं देते?’’ विशू ने मीरा को छोटा-सा सफेद दाँत लौटा दिया। मीरा मन में जरूर खुश हुई होगी। लेकिन विशू से बिना कुछ कहे वह उसके पीछे-पीछे चलने लगी।
‘‘हम अम्मा से कह देंगे कि दाँत तो हमने पहले ही मीरा को लौटा दिया था।’’
‘‘वह मानेंगी ही नहीं।’’
‘‘तुम चुप रहो। तुमसे कौन बात कर रहा है?’’
‘‘नहीं रहते, जाओ।’’
‘‘तुम्हें मार तो नहीं खानी, मीरा?’’
‘‘तुम हमें मारोगे तो चाची तुम्हें भूसे वाली कोठरी में बंद कर देंगी?’’
विशू कुछ नहीं बोला। एक बार मीरा को खेल-खेल में मारने पर सचमुच उसे काफी देर उस कोठरी में बन्द रहना पड़ा था। यदि मीरा की माँ उसे न निकालती तो उसकी माँ ने तो तय कर लिया था कि उसे रात भर बन्द रखेंगी। उसने एक बार मुड़ कर मीरा को देखा कि शायद बचाव का कोई रास्ता निकल आए, लेकिन वह जमीन की तरफ देखती चल रही थी। घर के अहाते में पहुँच विशू की चाल बहुत धीमी पड़ गयी। इधर-उधर देखता, जब वह बरामदे के बिल्कुल करीब पहुँचा तो उसे अम्मा कहीं नहीं दिखीं। इससे पहले कि वह मीरा से कुछ पूछता, उसकी पीठ पर एक घूँसा मार, क्या बुद्धू बनाया-क्या बुद्धू बनाया गाती मीरा चौके की तरफ भाग गयी।
उसे बचाने वालों की वहाँ कमी नहीं होगी, यह सोच विशू अपनी माँ के कमरे में आ, खाट पर लेट गया। इस तरह से बुद्धू बन जाना उसे बहुत अखरा। उस समय घर में हो रहा हल्ला उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। पड़ोसी के यहाँ जगह कम होने से उनके कई मेहमान मीरा के यहाँ टिके थे। उनके साथ आये बच्चे तमाम वक्त रोते-चिल्लाते रहते। उनसे, बहुत थोड़ी जान-पहचान होने के कारण, विशू कतराता था। वैसे, उन बच्चों का अपना गिरोह ही इतना बड़ा था कि उन्हें विशू या मीरा को अपने खेलों में शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मीरा जरूर कभी-कभी उनमें से कुछ को फोड़ अपना अलग दल बना लेती जिसमें उसके चाहने पर भी विशू नहीं रहता था।
किवाड़ के पास से मीरा ने उसे पुकारा तो उसने आँखें बन्द कर लीं।
‘‘विशू, देखो हम कौन-सी किताब लाये हैं,’’ कहती वह उसका खाट के पास आ गयी।
‘‘विशू।’’
‘‘क्या है?’’
‘‘लो, यह किताब लाये हैं हम तुम्हारे लिए।’’
‘‘हमें नहीं चाहिए तुम्हारी किताब।’’
मीरा थोड़ी देर चुप खड़ी रही फिर किताब उसका खाट पर रख, बाहर चली गयी। अच्छी तरह से आश्वस्त होकर कि वह कहीं से देख नहीं रही है, विशू वह जासूसी उपन्यास पढऩे लगा। करीब दस-बारह पन्ने पढऩे के बाद आहट सुनकर वह फिर सोने का बहाना करने लगा। उसकी खाट से थोड़ा हट कर मीरा ने फर्श पर कैरम बोर्ड बिछा दिया। विशू अधमुंदी आँखों से उसे गोट गलत जमाकर खेलते देखने लगा। वह कैरम बोर्ड बहुत पुराना था। उस पर चारों तरफ खिंची समानांतर रेखायें लगभग मिट चुकी थीं। सिर्फ एक छेद को छोड़ बाकी की, मटमैली जालियाँ फट कर नीचे झूलने लगी थीं। उन फटी जालियों वाले छेदों में गोटें गिरतीं तो अक्सर लुढ़कती बहुत दूर तक चली जातीं। मीरा को खेल से अधिक ऐसी गोटों को पकडऩे में मजा आता था। कैरम बोर्ड की रेखायें यदि स्पष्ट होतीं, तब भी मीरा के निकट कोई अन्तर न पड़ता। वह गप्पे को कहीं भी रखकर निशाना साधती थी।
‘‘मीरा, तुम बहुत हल्का कर रही हो।’’
मीरा इतनी जोर से चौंकी कि गप्पे पर उसका उँगली फिसल गयी।
‘‘हम तो खेल रहे हैं।’’
‘‘तुम बाहर जाकर क्यों नहीं खेलती?’’
‘‘तुम भी खेलों न हमारे साथ विशू।’’
‘‘तुमसे गोटें तक तो जमाते नहीं बनतीं।’’
‘‘अच्छा, दिखायें जमाकर?’’
विशू के हाँ कहने पर दोनों कुहनियाँ कैरम बोर्ड पर रख, मीरा बड़ी लगन से गोटें जमाने लगी। बीच-बीच में वह अपनी समझ में कोई गलती करती तो थोड़ी देर गाल में उँगली धँसा कर कुछ सोचने लगती, फिर किसी काली गोट की जगह सफेद या सफेद की जगह काली गोट रख देती। सभी गोटें रख चुकने पर उसने विशू की तरफ देखा तो वह, एकदम गलत, कहकर कैरम बोर्ड के पास जा बैठा।
‘‘ठीक तो है विशू।’’
जवाब न दे, वह उन्हें ठीक से जमाने लगा। मीरा ने नीला गप्पा अपने हाथ में ले लिया। काली गोटें उसे अच्छी नहीं लगती थीं। उसे पता था कि जो शुरू करता है, उसकी सफेद गोटें होती हैं।
वे खेलने लगे। मीरा जब अचरज से उसे एक के बाद एक गोटे लेते देखती तो विशू बहुत खुश होता, लेकिन थोड़ी ही देर में वह ऊब गया। मीरा इतनी जल्दी अपनी बारी खो देती कि उसे लगता वह अकेला ही खेल रहा है।
‘‘हमें तो भूख लगी है।’’
‘‘आज तो सरला दीदी के यहाँ खाने जाना है।’’
‘‘चलो चौके में कुछ खा लेंगे।’’
मीरा ने फिर एतराज नहीं किया। खाना उसके प्रिय कामों में एक था। चौके में उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला, लेकिन मीरा को वह जगह मालूम थी जहाँ उनसे छिपाकर मिठाइयाँ या फल रखे जाते थे।
अच्छी तरह खा कर वे अपनी करतूत छिपाने में लगे थे कि तभी बाजों की आवाज सुनाई दी।
‘‘विशू, बारात।’’ मीरा लगभग चिल्ला पड़ी।
दौड़ते-दौड़ते वे पड़ोसी के घर पहुँच गये। मीरा के पिता उस घर के अन्य लोगों के साथ वहाँ खड़े थे। उन सभी के हाथों में मालायें थीं जिन्हें वे बारातियों को पहना रहे थे। वे दोनों भी एक-दूसरे का हाथ थामे, वहाँ जाकर खड़े हो गये। मीरा को कई लोगों ने प्यार से अपनी मालायें पहना दीं। विशू को भी शायद पहनाते, लेकिन वह थोड़ा हट कर खड़ा हो गया था। उसे उन लोगों से काफी शर्म लग रही थी। वैसे भी वह नये लोगों से बहुत झेंपता था। उसकी माँ जब किसी मेहमान से कहतीं, ‘मेरा विशू चौदह का हो गया है’ तब भी उसके कान जलने लगते।
सब लोगों के साथ विशू भी पण्डाल में आ गया। मीरा अपनी सरला दीदी को देखने घर में चली गयी। पण्डाल में लगी रंगीन कागज की झंडियाँ हवा में फरफरा रही थीं। बाहर का अन्धेरा तेज रोशनी में और भी घना हो गया था। वहाँ, रोशनी में चमकती आसपास के पेड़ों की निचली डालों के अतिरिक्त, कुछ भी नहीं दिख पड़ता था। उन लोगों को शरबत पीते देख विशू की भी इच्छा हुई कि पिए। उसने सोचा, यदि कोई खुद लाकर दे देगा तो वह पी लेगा। काफी राह देखने पर भी जब कोई उसके पास नहीं आया तो वह मीरा का इंतजार करता, पण्डाल के बाहर, विरल घास पर लेट गया। मीरा उसे ढूँढती जब उस किनारे पहुँची जहाँ वह लेटा था, तो विशू ने उसे बुला लिया।
‘‘विशू, सरला दीदी बहुत खराब है,’’ कहती वह उसके पास जाकर बैठ गयी।
‘‘क्यों?’’
‘‘उन्होंने हमसे बात ही नहीं की।’’
‘‘मीरा, तुमने शरबत पिया?’’
‘‘हाँ, दो गिलास। खूब अच्छा है। तुमने कितने गिलास पिये विशू?’’
विशू चुप रहा। उसने सोचा मीरा से अपने लिए मंगवाए, लेकिन टाल गया।
‘‘विशू, तुमने सरला दीदी की साड़ी देखी?’’
‘‘कैसी है?’’
‘‘इतनी चमक रही है कि क्या बतायें। अम्मा चाची से कह रही थीं कि बनारस से लायी है।’’ कहकर मीरा उसके पास लेट गयी।
‘‘हमें तो नींद आ रही है विशू।’’
‘‘यहाँ मत सोओ, घर चलकर सोना।’’
‘‘विशू, हमारा एक दाँत और हिल रहा है। तुमने चौके वाला बिल देखा है?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘खूब बड़ा है, सबेरे तुम्हें दिखायेंगे।’’
उसके बाद जब एक बार विशू कहकर वह काफी देर चुप रही तो विशू ने उसकी तरफ देखा। वह सो चुकी थी। उसका एक हाथ छाती पर पड़ा था। विशू के सिर में छोटे-छोटे कंकड़ गड़ रहे थे। उसने मीरा के पेट पर सिर रख लिया। काफी देर तक उसके पेट से आती गुड़-गुड़ आवाज सुनता इस बात से खुश होता रहा कि कल नहीं तो परसों तक वे पिन्ने बच्चे यहाँ से चले जायेंगे, फिर मीरा को घर ले जाने के लिए जगाने लगा।





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