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सवाल सिर्फ भाषा का नहीं : अनुराग

भाषा के मुद्दे पर हम 63 साल पहले जहां थे, आज भी वहीं खड़े हैं। इसका सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाना हम सबके लिए शर्म की बात है। इसी वजह से समय-समय पर भाषा को लेकर विवाद भी उत्पन्न हुए हैं। 
रूस में बोली जाने वाली अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव ने मेरा दागिस्तान में प्रसिद्ध लोककवि अबूतालिब के साथ घटित एक रोचक किस्से का वर्णन किया है। किस्सा यों है-
अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया।
अंग्रेज अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में पूछताछ करने लगा।
 अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेजगीन, दार्गिन और कुमीक भाषाओं में अंग्रेज को अपनी बात समझाने की कोशिश की।
आखिर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुंस्कृत ने जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए कहा, ”देखा, संस्कृति का क्या महत्व है? अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न।”
”समझ रहा हूं।” अबूतालिब ने जवाब दिया, ”मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की।”
हमारे मन में अपनी मातृभाषा और देश की भाषाओं के लिए अबूतालिब की तरह स्वाभिमान नहीं, बल्कि कुंठा है। इसी का परिणाम है कि हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति की बात करने वाले को दकियानूसी और पिछड़ा मानते हैं। अंग्रेजी भाषा व संस्कृति को अपनाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए उन्हें आधुनिक तथा प्रगतिशील होने का खिताब देते हैं। अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने पर अंग्रेजीदा तो हमारी उपेक्षा करते ही हैं, किंतु हम भी स्वयं को हीन व लज्जित महसूस करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीयता का हवाला देकर ऐसा भ्रमजाल फैलाया गया कि मानो प्रत्येक भारतीय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाकर काम करना है। इसलिए हर किसी के लिए अंग्रेजी सिखना जरूरी है। इसी भ्रमजाल के कारण हम अपने बच्चों को महंगे से महंगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। इन स्कूलों में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। यह शिक्षा पद्धति बहुत महंगी भी है। अपनी सीमित आय होने के कारण इसके लिए आर्थिक अपराधों की शरण में जाना पड़ता है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से यह शिक्षा पद्धति भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देती है।
अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा का हृास है। बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा प्रारंभ करता है तो वह उसके बहुमुखी विकास की उम्र होती है। तब उसे विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे उसके विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वह बड़ा होकर प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है तो अंग्रेजी फिर अड़चन पैदा करती है। प्रतियोगी को जो समय अपने विषय के गहरे अध्ययन में लगाना चाहिए, वह समय उसे अंग्रेजी के अध्ययन में लगाना पड़ता है। वह जब सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो यहां पर भी सबसे पहले अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है। योग्य से योग्य व्यक्ति को भी अंग्रेजी का ज्ञान न होने पर या कम होने पर अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसे में हीन भावना आना स्वाभाविक है।
 भारत में अभी भी करीब 35 फीसदी लोग अशिक्षित हैं। देश के एक बड़े हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। और जहां व्यवस्था है भी, वहां सब रामभरोसे चल रहा है। ऐसे में अंग्रेजी की वकालत करना समझ से परे है।
असल में गुलामी के दौरान ही एक ऐसे वर्ग ने जन्म ले लिया था, जिसे देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं था। यह वर्ग आजादी भी नहीं चाहता था। इस वर्ग का मकसद अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित कर सत्ता सुख भोगना था। इसके लिए इसने खुद को अंग्रेजी रहन-सहन में ढालना शुरू कर दिया। यह वर्ग जबान भी अंग्रेजों की बोलता। अंग्रेजों से नजदीकी साबित करने के लिए भारतीयों से दूरी बनाना इसकी मजबूरी थी। इसे श्रेष्ठता का दंभ होने लगा। अन्य लोगों को यह गंवार और जाहिल समझाता। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता की कुंजी इसी वर्ग के हाथ में आई। यह वर्ग तो चाहता ही नहीं कि मात्र एक भाषा से उन्हें जो श्रेष्ठता मिली है, वह छीन जाए।
भाषा को लेकर प्राथमिक स्तर से ही प्रयास किए जाने की जरूरत है। दस मिन्स टेन, जिस बच्चे को यह बताना पड़ रहा हो, उसे हिंदी में काम करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस भी देश ने भी तरक्की की है, अपनी मातृभाषा में ही है। यदि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो यह हिंदी की नहीं, शासक वर्ग की कमी है। हिंदी के प्रचार-प्रचार के नाम पर तमाम तरह की नौटंकी करने की बजाए, विश्व ज्ञान-विज्ञान, साहित्य हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। एक अनुमान के अनुसार भारत में हिंदी में बोलने वाले 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाले मात्र 0.021 प्रतिशत हैं। आज हिंदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते हैं। तकनीकी विकास के चलते आज हिंदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इंटरनेट पर भी हिंदी का साम्राज्य बढ़ा है।
और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिंदी पखवाड़ा और हिंदी सप्ताह जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिंदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपए बर्बाद किए जा रहे हैं? क्यों हिंदी अकादेमी, हिंदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका,  न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?
भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरंत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है। इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आंदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आंदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकले हिंदी : शरणकुमार लिम्बाले

हमारे देश में बहुत-सी भाषाएं हैं। और उनकी कई बोलियां हैं। हर बोली की अपनी-अपनी आंचलिक विशेषता है। इनकी लिपि भी अलग-अलग है। इससे भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में रुकावट पैदा होती है। इसके अलावा हिंदी को राष्टरभाषा बनाने के लिए जो राजनीतिक इच्छा शक्ति होनी चाहिए, वह किसी भी पार्टी में नहीं है।
भारत में करीब डेढ़ सौ साल तक ब्रिटिश की राजसत्ता रही। यहां से गोरे ब्रिटिश चले गए, लेकिन काले रह गए। ब्रिटिश मानसिकता हमारे में बहुत ज्यादा काम करती है। जो बाबू-अधिकारी हैं, वे रहन-सहन और विचार में अभी भी अंग्रेजी को बनाए हुए हैं। अंग्रेजी बोलने से प्रतिष्ठा मिलती है। फाइव स्टार का वेटर भी अंग्रेजी बोलता है।
केवल दिल्ली में या केंद्र सरकार के कार्यालयों में रहने से हिंदी का प्रचार-प्रसार नहीं होगा। हमारा देश केवल सरकारी संस्थाओं में नहीं है। वह बहुत फैला हुआ है। हिंदी के साहित्य का प्रादेशिक भाषाओं में और प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए।
पंचवर्षीय योजना में सड़कों, पुलों, बांध आदि पर ध्यान दिया जाता है। लेेकिन देश जो सांस्कृति-सामाजिक जीवन जीता है, वह भाषा के माध्यम से जीता है। जितने जरूरी सड़क, बांध आदि हैं, उतनी ही जरूरी भाषा भी है। इसलिए पंचवर्षीय योजना में भाषा के विकास पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सप्ताह-पखवाड़ा से मनाने से कुछ भी नहीं होने वाला है। वास्तव में इन्हीं लोगों ने हिंदी को बंधक बना रखा है। इसके विकास के लिए इसे संस्थानों और कार्यालयों से बाहर निकलना होगा।
- मराठी के चर्चित लेखक और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित

हिंदी राष्ट्र की अस्मिता की भाषा है : बालशौरि रेड्डी

मैंने गांधीजी से हस्ताक्षर लेकर हिंदी सीखी। उन्होंने 21 जनवरी, 1946 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की रजत जयंती समारोह का उद्घाटन किया था। उन्होंने कहा था कि बहुत जल्द ही देश आजाद होने जा रहा है। आजाद भारत हिंदुस्तान की  राष्ट्रभाषा हिंदी होगी। अत: में महिलाओं तथा युवाओं से अपील करता हूं कि आप लोग अभी से हिंदी सीखना आरंभ करें ताकि हिंदुस्तान का आजाद होती ही जनता की भाषा में शासन का कार्य संपन्न हो सके। गांधीजी का यह सपना आज तक हम लोग साकार नहीं कर सके।
किसी भी स्वतंत्र राष्टर का अपना संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रभाषा होती है। किसी भी देश के लिए विदेशी भाषा कभी भी  राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती। जब टर्की आजाद हुआ तो कमलपाशा ने सभी अधिकारियों को बुलाकर कहा, ‘ हमारा देश स्वतंत्र हो गया है। हम तरक्की करना चाहते हैं। बताओ।” सभी ने सुझाव दिए। अंत में कमलपाशा ने कहा, ”आप लोग अपनी घड़ी देखो। इसी सैकेंड से टर्की की राजभाषा तुर्की है। जाओ काम करो।” ऐसे काम होता है।
1950 में संविधान में हिंदी को स्वीकृति मिली। यह बताया गया कि 15 वर्ष के बाद हिंदी अंग्रेजी का स्थान ग्रहण करेगी ओर हिंदी प्रशासनिक भाषा होगी। लेकिन 1963 में इसमें संशोधन हुआ कि जब तक हिंदीत्तर भाषा के तीन चौथाई सांसद स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा। अब तो यह विवाद का विषय बन गया है।
1965 में जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, उन्होंने सोचा कि देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना क्रियांवित करते हैं, लेकिन भाषा के लिए अब तक जो प्रयास हुआ नगण्य है। उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली आमंत्रित किया। तीन दिन तक गहन चर्चा हुई। इसके बाद सर्वसम्मित से प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी राज्य त्रि-भाषा सूत्र पर अमल करेंगे। इसके अनुसार पहली भाषा के रूप में मातृभाषा, दूसरी के रूप में हिंदी और तीसरी के रूप अंग्रेजी पढ़ाई जानी थी। आंध्र, केरल और कर्नाटक में इसका अनुपालन हुआ। हरियाणा में थोड़े प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश में तेलुगु को कुछ जगह पढ़ाया गया। लेकिन इस सूत्र पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।  
देश में रेल विभाग, वित्त विभाग, सेना आदि कई विभाग एक हैं। लेकिन शिक्षा नीति प्रदेश सरकारो के हाथ में है। वहां के शिक्षा मंत्री पाठ्यक्रम तैयार करते हैं। पूरे देश के लिए अगर एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनती तो सारे बच्चों को एक प्रकार की शिक्षा मिलती। लेकिन प्रत्येक प्रदेश में वहां के नेताओं के बारे में पढ़ाया जा रहा है। बच्चे सोचते हैं कि यही हमारी दुनिया है। हमारे बीच में एकात्मकता नहीं है। विघटन की प्रवृत्ति है। एक राष्टï्रीय शिक्षा नीति तुरंत बनाई जानी चाहिए। भले ही इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा।
हिंदी राष्ट की अस्मिता की भाषा है। मैं पहले भारतीय हूं, उसकेे बाद आंध्रवासी। मेरी मातृभाषा तेलुगु मुझे बहुत प्यारी है क्योंकि वह जन्मघूटी से सीखी हुई भाषा है। हिंदी से कम नहीं मानता और हिंदी के लिए मैं अपनी मातृभाषा की बलि देना भी नहीं चाहूंगा। लेकिन एक भारतीय के नाते संपूर्ण राष्ट के लिए हिंदी को प्रशासनिक और भारत भारती के रूप में अवश्य देखना चाहता हूं।
- तेलुगु के वरिष्ठ लेखक और चंदामामा के पूर्व संपादक