
प्रख्यात आलोचक डा. रामविलास शर्मा को 1991 में व्यास सम्मान प्रदान किया था। इस अवसर पर कथाकार प्रकाश मनु ने उनसे अंतरंग बातचीत की थी-
डॉ. रामविलास शर्मा (1912-2000) हिंदी आलोचना के शीर्षपुरुष थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने और उसे सामाजिक विकास की चेतना और पक्षधरता से जोडऩे वालों में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उनका जीवन एक आलोचक की निरंतर विकास और संघर्ष-यात्रा का पर्याय कहा जा सकता है और एक कडिय़ल आलोचक और चिंतक का आदर्श उनमें देखा जा सकता है। निराला पर उनका काम किसी रचनाकार को संपूर्णता से थाहने के लिहाज से आज भी हमें उतना ही बड़ा, उतना ही चुनौतीभरा लगता है—करीब-करीब अतुलनीय! यह रामविलास जी के काम करने के ढंग और प्रकृति को बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। निराला की तरह उन्हें भी एक साथ कई मोरचों पर लडऩा पड़ा। साथ ही परंपरा की पहचान के लिए विचार और भाषा की जड़ों तक जाने का गंभीर काम उन्होंने किया। और भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान का तो अभी तक मूल्यांकन होना बाकी है। उन्होंने एक साथ दस आलोचकों के बराबर काम कर दिखाया और बड़े ही चुपचाप, इसलिए कि उनके यहाँ दिखावा या ‘पोस्चर’ सबसे कम है—और पश्चिम से चार अक्षर उधार लेकर उछलने वाली कलाबाजी तो बिलकुल नहीं है। उनके आग्रह कभी-कभी दुराग्रह भले ही लगते रहे हों, पर वे उन आलोचकों की तरह नहीं थे जो सुबह कुछ कहते हैं, शाम को कुछ और! आलोचना में इस तरह की हलकी नेतागिरी की जगह रामविलास जी ने अलग रहकर चुपचाप ठोस काम करना बेहतर समझा और उम्र के आखिरी चरण में भी किसी जवान आदमी के जोश के साथ अपने काम में जुटे रहे।
उन्हें व्यास सम्मान दिए जाने के अवसर पर उनके जीवन और कामों को लेकर लंबी बातचीत करने का मन था। मैं उनसे मिलने गया, तो वे अपनी छड़ी लिए घूमने जाने के लिए करीब-करीब तैयार थे। मैंने साथ चलने की इच्छा प्रकट की, तो वे खुशी से राजी हो गए। पूरे रास्ते वह प्रफुल्ल उत्साह के साथ बतियाते, तेज-तेज चलते रहे (वैसे भी पुराने दिनों और मित्रों की याद उनके चेहरे पर जैसी मुलायमियत भरी मुसकराहट ले आती है, उसे देख पाना खुद में एक अनुभव है।) और लौटे तो फिर वैसे ही बातचीत के लिए तैयार! एक आलोचक के सुदीर्घ जीवन के अनुभवों और मुश्किलों से शुरू हुई यह बातचीत करीब-करीब बहस की शक्ल लेती हुई प्रगतिशील आंदोलन के उतार-चढ़ाव, नई कविता के आत्मसंघर्ष, हिंदी-उर्दू के झगड़े और भाषा की समस्याओं तक को अपनी गिरफ्त में लेती है और रामविलास जी के व्यक्तिगत जीवन के संवेदनों को बार-बार छू जाती है। बीच में दो-एक बार वह उत्तेजित भी हुए, पर ज्यादातर उनकी मुद्रा ‘बड़े भाई’ की तरी शांत व्याख्याकार की रही। बीच-बीच में अतीत में लौटने का सुख उनकी आँखों में चमक भर जाता।
करीब ढाई घंटे बाद जब मैं उठा, तो चेहरे पर उतर आई हलकी थकान के बावजूद उनका उत्साह चकित कर देने वाला था! अलबत्ता बीच में चाय पीते समय मैंने देखा, प्याला उठाते समय उनके हाथ काँपते हैं। और एकाएक कडिय़ल आलोचक के रूप में उनकी लंबी संघर्ष-यात्रा मेरी आँखों के आगे घूम गई।
यहाँ अनेक मोड़ों और पड़ावों से गुजरी इस लंबी, विचारोत्तेजक बातचीत के कुछ अंश दिए जा रहे हैं-
डॉक्टर साहब, एक लेखक—खासकर आलोचक के रूप में लंबी यात्रा तय की है आपने। तो क्या आप बताएँगे कि एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या है—और सबसे बड़ी तकलीफ क्या है?
(हँसते हुए) भई, मुझे तो आलोचना में मजा आता है। अलबत्ता तकलीफ दूसरों को हो सकती है। बेहतर होता, अगर आप पूछते कि मजा क्या आता है आलोचना में…?
ठीक है, यही बताइए…!
आलोचना में जो सबसे बड़ा काम हम करते हैं, वह है किसी साहित्यिक कृति या अनेक साहित्यिक कृतियों और प्रवृत्तियों के आपसी संबंधों को पहचानना। कभी-कभी यह एक लेखक और उसकी युग के दूसरे लेखकों के बीच होता है और कभी अनेक युगों के लेखकों के बीच। अब उदाहरण दूँ आपको! तुलसी और निराला तो एक युग के नहीं हैं, लेकिन तुलसी और निराला में जब मैं साम्य देख लेता हूँ तो मुझे खूब मजा आता है। इसी तरह महावीरप्रसाद द्विवेदी और निराला को लोक एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं, पर मैंने खोज की तो पता चला कि ऐसा नहीं है। निराला तो महावीरप्रसाद द्विवेदी की परंपरा का ही विकास कर रहे हैं, उनके सच्चे उत्तराधिकारी हैं…
लेकिन कहा तो यह जाता है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘जूही की कली’ सरस्वती के मंदिर से लौटा दी थी…
(दृढ़ता के साथ) नहीं, यह ठीक नहीं है…!
तो क्या यह बात गलत प्रचारित है कि द्विवेदी जी मुक्त छंद से चिढ़ते थे, इसलिए ‘जूही की कली’ उन्होंने लौटा दी थी…?
बिलकुल। इसलिए कि अगर ऐसा होता तो निराला ‘अनामिका’ में महावीरप्रसाद द्विवेदी के लिए ऐसे सम्मानसूचक शब्द न लिखते! और फिर द्विवेदी जी ने निराला की मुक्त छंद में लिखी कविताओं की प्रशंसा की थी…
…और डॉक्टर साहब, एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?
सारी सामग्री की समेटकर, उसे व्यवस्थित करके, विश्लेषित करके सही निष्कर्ष तक ले जाना! इसमें काफी समय और भारी परिश्रम लगता है।
आपकी आलोचना-पद्धति पर आरोप भी लगते रहे कि उसमें लचीलापन कम है, कट्टरता है। कुछ न उसे कठमुल्लापन कहा! आपने खुद भी शायद कहीं लिखा है कि आप इस ‘मारधाड़ वाली आलोचना’ से ऊब गए हैं और अब कुछ और करना चाहते हैं।
मारधाड़ वाली आलोचना मैंने नहीं कहा, मेरे मित्र अमृतलाल नागर ने एक दफा कहा था। मुझसे छोटे थे, पर अकसर बड़ों जैसी बात कहते थे, बेबाक राय देते थे।
उन दिनों मैं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा हुआ था। तो प्रगतिशील साहित्य पर जो आक्रमण होते, उनका मैं जवाब दिया करता था। वैसे भी अगर कोई रचना मुझे लगता कि सामाजिक विकास की चेतना में रुकावट खड़ी करने वाली है, तो मैं उस पर जमकर प्रहार करता! उसे देखकर उन्हीं दिनों नागर जी ने लिखा था, ”क्या हर कुत्ता जो तुम्हारे घर आकर भौंकता है, उसे देखकर तुम लाठी लेकर मारने दौड़ोगे? तब तो तुम्हारी बहुत सी ताकत इसी में जाया हो जाएगी। कोई ठोस काम क्यों नहीं करते?’’ तो मैंने फिर इस तरह की चीजें छोड़ दीं सन् 52 में। ऐसा लेखन सन् 43 से 52 तक ही ज्यादा मिलेगा, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का नेता था। उसके बाद यह कम, बहुत कम हो गया। ऐसा नहीं कि मैंने आरोपों के जवाब नहीं दिए। जहाँ बहुत जरूरी लगा, वहाँ दिए भी। जैने ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ में कहीं-कहीं बहुत सख्ती से नामवर सिंह की खबर ली है। लेकिन अब यह नहीं है कि मैं हर किसी के बारे में लिखूँ- या यही देखता रहूँ कि कौन मेरे खिलाफ लिख रहा है…
तो आप मानते हैं कि एक दौर था, जब आपकी आलोचना में कट्टरता ज्यादा थी…?
ज्यादा थी, लेकिन वह समय की जरूरत भी थी। वैसे लोग भूल जाते हैं कि मैंने मारा है तो मार खाई भी खूब है। अब इस बात का क्या किया जाए कि मेरा लिखा तो लोगों को याद रहता है, जबकि दूसरों का लिखा वे भूल जाते हैं! (हँसते हैं)
आपको शायद याद नहीं, रांगेय राघव ने मेरी तीखी आलोचना की थी, यशपाल ने, पंत जी ने भी! मैंने सन् 48 में लिखा था पंत जी पर, जब वह ‘ग्राम्य’ की जमीन को छोड़कर स्वर्णशिखरों पर चढ़ाई करने लगे थे…
किस पत्र में? ‘हंस’ में क्या…?
जी हाँ, ‘हंस’ में। वही हमारा मुखपत्र था। और फिर पंत जी ने भी उसका जवाब दिया था। एक बार मिले तो उन्होंने खुद बताया, ”रामविलास जी, मैंने आपकी बातों का जवाब दिया है अपनी पुस्तक की भूमिका में।’’
कई बार ऐसा नहीं लगता कि ऐसी आलोचना व्यक्तिगत उठापटक में खर्च हो जाती है और साहित्य या साहित्यिक चेतना के विकास में इससे कोई मदद नहीं मिलती?
देखिए, कोई रचना मेरे सामने हो तो सबसे पहले मैं यह देखूँगा कि उसके पीछे लेखक की दृष्टि क्या है। वह सामाजिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है या उसमें रोड़े खड़े करती है। इस लिहाज से उपयोगी हुई तो मैं उसकी विशेषताएँ बताऊँगा और अगर समाज को अस्वस्थ करने वाली चीज हुई तो मैं पूरे जोर से उस पर आक्रमण करूँगा। और उसमें दो-एक खासियतें भी हों तो उनकी चर्चा की मुझे जरूरत नहीं लगती। जैसे अगर मान लीजिए, आज कोई नायिका-भेद की कविता लिखे और उसमें सुंदर-सुंदर शब्द, कल्पनाएँ ले आए तो आज जमाना तो है नहीं नायिका-भेद का, इसलिए उसमें कैसी कलात्मक खासियतें हैं, यह चर्चा करने की मैं जरूरत नहीं समझता।
नहीं, मैं एक और बात कह रहा था। जैसे निराला की आप चर्चा करते हैं ‘निराला का साहित्य साधना’ में तो बड़ी सहानुभूति से उनकी तकलीफों और संघर्षों को देखते हैं और यह भी कि उनके साहित्य में ये चीजें कैसे आती हैं, लेकिन मुक्तिबोध को देखते हैं तो यह सहानुभूति गायब हो जाती है। आप उनके संघर्षों को भूल जाते हैं और कमजोरियों को फैला-फैलाकर दिखाने लगते हैं।
देखिए, मुक्तिबोध शुरू में ऐसे नहीं थे, बाद में चलकर हुए। सन् 46 के आसपास! और सिर्फ वही नहीं, पूरा का पूरा दृश्य ही बदल रहा था उन दिनों। वे तमाम लोग जो घोषित मार्क्सवादी थे, वे अब टूटने, झुकने लगे थे। सन् 46 के आसपास एक बड़ा बदलाव आपको दिखाई देगा। उसमें अज्ञेय ही नहीं, भारतभूषण अग्रवाल, नेमिचंद जैन, मुक्तिबोध, दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन सब बदले नजर आएँगे। यह मोटे तौर से अमरीकी प्रभाव था जो अस्तित्ववाद की शक्ल में समाने आया था। अस्तित्ववाद को अमरीका हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा था हमारे मनोबल को तोडऩे के लिए। इसी समय भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचंद्र जैन जैसे घोषित मार्क्सवादी रातोंरात बदल गए। बालकृष्ण शर्मा नवीन संघर्ष पथ छोड़कर ‘क्वासि’ लिखने लग गए। पूरे देश में कम्युनिस्टों की धरपकड़ हो रही थी और पंत ‘स्वर्ण किरण’ और ‘स्वर्णधूलि’ लिख रहे थे।
पर यह जरूरी तो नहीं कि अस्तित्ववाद अमरीकी हथियार ही हो! वह एक विचारधारा है और किसी भी विचारधारा की सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन यह आप कैसे कहते हैं कि…?
भई, देखना तो यह होगा कि किस चीज पर कौन जोर दे रहा है और किस मकसद से? अमरीका इनका पूरा समर्थन कर रहा था और भारत में मार्क्सवाद की जगह अस्तित्ववाद नजर आए, इसमें उसकी पूरी दिलचस्पी थी। और अज्ञेय पूरी तरह अमेरिकी गिरफ्त में थे ही। उनके आसपास धर्मवीर भारती, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, लक्ष्मीकांत वर्मा, ये सारे जो लोहियावादी घिर आए थे, इन्हीं को लेकर उन्होंने प्रयोगवाद चलाया और आगे चलकर नई कविता भी! दोनों में बुनियादी रूप में ज्यादा फर्क नहीं था और अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक सब उसमें शामिल थे।
लेकिन आप अज्ञेय और मुक्तिबोध को एक साथ कैसे रख सकते हैं? अज्ञेय ने इतने समझौते किए और मुक्तिबोध जीवन भर अपने आप से झगड़ते रहे—’ब्रह्मराक्षस’ जैसा आत्मसंघर्ष और कहाँ है?
लेकिन एक बात में दोनों समान हैं—विघटन और अवसाद।
यों देखें डॉ. साहब, तो अवसाद तो छायावाद में भी है, बल्कि यों कहें कि विषाद और नैराश्य उसकी मूल वृत्ति है।
विषाद है, लेकिन उससे उबरकर उल्लास की ओर जाने वाला भाव भी है।
तो क्या छायावाद में कम पलायन है। वे तो एक दूसरी दुनिया ही बसा लेते हैं जिसका कहीं अस्तित्व नहीं है, भागकर वहाँ छिप जाते हैं?
(खीजकर) भई, पीड़ा है, लेकिन संघर्ष भी तो साथ ही चलता है। निराला के यहाँ है यह संघर्ष।
निराला को छोड़ दें डॉक्टर साहब, क्योंकि छायावाद में उनकी स्थिति ‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ है। बाकी महादेवी, प्रसाद, पंत के यहाँ कहाँ है संघर्ष?
भई, आपको पता नहीं, प्रसाद ने केवल रोमानी कविताएँ ही नहीं लिखीं, कुछ आशा जगाने वाली कविताएँ भी हैं। उनके नाटकों में संघर्ष है।
लेकिन डॉक्टर साहब, कविता की ही बात करें तो?
कुछ कविताएँ उनकी हैं, महादेवी के यहाँ भी मिल जाएगा ‘जाग तुझको दूर जाना…’
एक बात बताएँ डॉक्टर साहब, इनमें वह समय कहाँ है जिसमें ये लिखी जा रही थीं—गुलामी की पीड़ा, आम आदमी की यातनाएँ, विवशता, दारिद्र्य, यह सब कहाँ है महादेवी के गीतों में! वे तो सौ साल पहले लिखी जाती या बाद में, ऐसी ही होतीं…!
तकलीफें हैं, लेकिन इस बारे में मेरी और आपकी दृष्टि में फर्क है शायद…
और जो छायावाद का पलायन है, ‘ले चल मुझे भुलावा देकर…’ यह शराब पीकर गम भुलाना नहीं है क्या?
यह फिर भी बेहतर है क्योंकि इसमें पीड़ा से दूर जाने की इच्छा तो है, पीड़ा को मूल्य तो नहीं बना दिया गया नई कविता की तरह?
यानी पीड़ा का चित्रण और पीड़ा को मूल्य बना देना, इसमें बारीक सा अंतर है। वह समझाएँगे आप?
बारीक सा नहीं, काफी बड़ा अंतर है।
तो वह पता कैसे चले? कसौटी क्या होगी उसकी?
बताया न, कोई रचना कुल मिलाकर सामाजिक चेतना को आगे बढ़ाती है या नहीं, इस आधार पर हम निर्णय करेंगे।
डॉक्टर साहब, आलोचना में क्यों कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्तिगत संबंध रचना के मूल्यांकन में प्रभाव डालें। मसलन निराला को आप निकट से जानते हैं तो आपने उन पर जो लिखा, उसमें उनके व्यक्तित्व की एक-एक रेखा बोलती है, लेकिन उन्हीं स्थितियों से गुजरे और भी लोग थे और भी बड़े लेखक, वे आपको नजर नहीं आए?
अगर आपका यह कहना है कि मैं व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर निर्णय करता हूँ तो यह सही नहीं है। मैं इसका खंडन करता हूँ। निराला जी को मैं जानता था, इसीलिए उन पर ऐसा लिखा हो, यह जरूरी नहीं। न जानता होता तो भी यही लिखता। इसी तरह तुलसीदास से तो मैं कभी नहीं मिला, लेकिन उन्हें मैं बड़ा कवि मानता हूँ। निराला से भी बड़ा। रांगेय राघव, यशपाल मेरे निकट थे, लेकिन उन पर मैंने बहुत तीखी आलोचनाएँ लिखीं। यशपाल पर लिखा लेख तो मैं उन्हें दिखाने ले गया था। उन्हें सुनाया भी और उन्हें खूब बुरा लगा, लेकिन मैंने वह कभी छपने नहीं दिया। वह आज तक नहीं छपा। हाँ, मैंने उन्हें बता दिया कि तुम्हारे बारे में मेरी राय क्या है। तो मैं इस बात का खंडन करता हूँ कि व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर मैं रचना को अच्छी-बुरी ठहाराता हूँ।
नहीं, मैं सायास प्रभाव की बात नहीं कर रहा, लेकिन किसी से किसी कारण सहानुभूति है तो उसका गुप्त प्रभाव पड़ता होगा। जैसे निराला की हीनताओं और विभाजित व्यक्तित्व की आप सहानुभूति से परख करते हैं और कविता में चमरौधा जूता आपको दुस्साहसिक प्रयोग लगता है, लेकिन मुक्तिबोध की परेशानियाँ, यहाँ तक कि बीड़ी की तलब पर आप व्यंग्य करते हैं। ऐसे ही साही हैं। आप जैसा साबित करना है, वैसे कुटेशंस ढूँढ़ लेते हैं। तो यह कैसे होता है कि…?
(थोड़ा उत्तेजित होकर…) इस पर बहस करें तो मेरा ख्याल है सारा समय इसी में चला जाएगा। बेहतर है कि हम लोग कविता के अलावा किसी और विषय पर आएँ।
डॉक्टर साहब, हमारे विश्वविद्यालय हिंदी साहित्य में क्या कुछ बना या बिगाड़ रहे हैं, इस पर कुछ कहेंगे?
देखिए, हमारे समय में तो विश्वविद्यालयों में रामचंद्र शुक्ल, श्यामसुंदर दास जैसे लोग होते थे जो अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान थे। आजकल तो पता नहीं। मैं लगभग बीस वर्षों से साहित्य से कटा हुआ हूँ। ज्यादा पढ़ नहीं पा रहा।
विश्वविद्यालयों में जो हिंदी पढ़ाई जाती है, वह इतनी कृत्रिम और आडंबर भरी है, बोलचाल की भाषा से इतनी दूर है कि ताज्जुब होता है कि अगर यह हिंदी है तो वह क्या है! यह स्थिति क्या परेशान करने वाली नहीं है?
अगर ऐसा है, तब तो ठीक नहीं है। इतना फर्क बोलने और लिखने की भाषा में होना नहीं चाहिए। मराठी में बंगला में ऐसा फर्क आपको नहीं मिलेगा।
अपने देश में हिंदी और उर्दू का झगड़ा खामखा बना और बढ़ा दिया गया है और कुछ लोग इसे लगातार उकसाते हैं, जबकि आम आदमी के सामने यह मुश्किल नहीं है। वह जो भाषा बोलता है, उसमें हिंदी, उर्दू दोनों सहज ही मिल जाती हैं। तो इस झगड़े का क्या हो जो हम पर खामखा थोप दिया गया है?
मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। हिंदी-उर्दू में तो उतना फासला भी नहीं है जितना हिंदी और उसकी बोलियों में है। और विरोध तो कतई नहीं है! दोनों ने क्रिया-पद मिलते हैं जबकि हिंदी और भोजपुरी या हिंदी और मैथिली के क्रिया-पद एक नहीं हैं। मुझे लगता है, उर्दू का जो भी साहित्य है, वह सारा देवनागरी लिपि में आए, यह जरूरी है। और फिर आप जैसे लोगों को इस क्षेत्र में खूब काम करना चाहिए। गाँव-गाँव कस्बे-कस्बे में जाकर लोगों को यह बात बतानी चाहिए कि सच्चाई क्या है।
लेकिन डॉक्टर साहब, जब तक राजनीति इस मामले में जहर घोलती रहेगी, तब तक ये रचनात्मक काम कुछ सफल होंगे? यकीन है आपको?
तो राजनीतिक प्रोपगैंडा का राजनीतिक तौर से ही मुकाबला किया जाना चाहिए।
राजनीतिक यानी…समझाएँगे!
देखिए, प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ मुस्लिम कवियों की बड़ी अटूट परपंरा है। लोगों को उसके बारे में बताया ही नहीं जाता। अगर ये सारी बातें सामने आएँ तो लोगों का नजरिया बदल सकता है। नवयुवकों को इस काम के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह इस क्षेत्र में काम करने वालों को वजीफे दे। इससे बेरोजगारी मिटेगी और देश के निर्माण में कुछ ठोस काम होगा जिसका असर अगले बीस वर्षों में दिखाई देगा।
लेकिन डॉक्टर साहब, पूरी दुनिया में जो उथल-पुथल पिछले कुछ वषों में हुई है, उसके बारे में क्या सोचते हैं आप? लगता नहीं कि सोवियत संघ के पतन से पूरी दुनिया में समाजवादी आंदोलन को धक्का पहुँचा है?
समाजवादी देश ही नहीं, जो पूंजीवादी देश अपना स्वतंत्र विकास करना चाहते हैं, उन्हें भी धक्का पहुँचा है। यह अमरीकी साम्राज्यवाद की बहुत बड़ी विजय है।…अच्छा, मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। बगैर विदेशी कर्ज के आप काम चला सकते हैं कि नहीं चला सकते? मेरा दावा है कि चला सकते हैं। वही हालत सोवियत संघ में थी। जब उसने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीतीं, तब तो कर्ज नहीं लिया। फिर अब कर्ज लेने की क्या जरूरत थी?… फिर जो कर्ज देगा, वह अपनी शर्तें भी रखेगा और मनवाएगा। आपकी स्वतंत्रता फिर कहाँ रही? सिर्फ पिछलग्गू बन सकते हैं आप!
हमारे देश में आम आदमी के लिए जीने के रास्ते लगातार तंग होते जा रहे हैं। विषमता बढ़ी है और लोगों का यह विश्वास बुरी तरह हिला है कि सच्चाई और ईमानदारी से भी कुछ पाया जा सकता है। तो अब रास्ता क्या हो?
यही कि लोगों को संगठित होकर अपनी आवाज उठानी होगी। उसमें पढ़े-लिखे, अनपढ़, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर सब शामिल हों। और केवल भारत में ही क्यों? सभी देश मिलकर हल खोजें। बल्कि अब तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान और पूरे एशिया भर के लोग भी इसी तरह इकट्ठे हो सकते हैं और दुनिया का नक्शा बदलते देर नहीं लगेगी…
आपके खयाल से अकादमियाँ और साहित्यिक संस्थाएँ कुछ भला कर रही हैं साहित्य का…या कर सकती हैं?
ज्यादातर तो अकादमियाँ हों या यूनिवर्सिटियाँ, सभी रिपीट कर रही हैं कुछ कामों को…दोहराव बहुत ज्यादा है, जैसे-तैसे लीक पीट दी जती है। उदाहरण के लिए शोध को लीजिए, उन्हीं घिसे-पिटे विषयों पर घिसे-पिटे ढंग से होते हैं। कोई समझ में नहीं आता कि अकादमियाँ कर क्या रही हैं? नई से नई योजनाएँ बनाकर काम हो, तो बहुत सारा काम हो सकता है। अकादमियाँ मिलकर तय करें कि भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए वे क्या कर सकती हैं। एक अकादमी तमिल सिखाने की व्यवस्था करे, दूसरी तेलुगु, मलयालम। इससे आप देखेंगे कि एक वातावरण बनेगा, दूरियाँ कम होंगी और एक मजबूत देश की छवि बनेगी।…
साहित्यिक पुरस्कारों के पक्ष और विपक्ष में काफी कहा जाता है। आपके खयाल से सही भूमिका क्या हो सकती है पुरस्कारों की?
पुरस्कार लेखक की साहित्य-साधना का सम्मान करने के लिए हो, इसमें तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन अकसर होता यह है कि पुरस्कार बड़ा होता है उसके साथ जुड़ी हुई बड़ी राशि से। जितनी बड़ी राशि, उतना बड़ा पुरस्कार…! मैं कई बार कल्पना करता हूँ कि क्या दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, लेखक मिलकर कोई ऐसी बॉडी नहीं बना सकते जो अच्छे वैज्ञानिकों, लेखकों को सिर्फ सर्टिफिकेट दे। क्या यह सर्टिफिकेट बड़े से बड़े पुरस्कार से कम होगा? और कुछ नहीं तो कम से कम हम भारत में तो यह कर सकते हैं।…वैसे में चाहता हूँ, कुछ समय के लिए अकादमियाँ, साहित्यिक संस्थाएँ, के.के. बिड़ला फाउंडेशन भी पुरस्कार देना बंद कर दे और जो पुरस्कार की राशि हो, वह हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगाई जाए। साक्षर लोग ज्यादा होंगे तो साहित्य के पाठकों की भी कमी नहीं रहेगी।
प्रगतिशील आंदोलन की विफलता के लिए आप किन कारणों को जिम्मेदार समझते हैं?
नहीं, विफल कहाँ? नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ये सब लिख तो रहे हैं।
नहीं, मैं इधर की पीढ़ी की बात कर रहा हूँ। नागार्जुन, केदार के बाद वाली…?
वह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि मैं आजकल पढ़ नहीं पा रहा हूँ। साहित्य से कुछ दूर चला आया हूँ। मेरी कुछ योजनाएँ हैं, उन्हीं पर काम में जुटा हूँ।
अच्छा, यह जो समीक्षकों का विचार है कि प्रगतिशील आंदोलन तो आगे नहीं चला, लेकिन नई कविता की एक धारा ने ही प्रगतिशील कविता की भूमिका निभाई, इस बारे में आपका क्या कहना है?
नहीं, यह ठीक नहीं। नई कविता पूरी तरह प्रगतिवाद के विरोध में खड़ी थी।
बहुत से प्रगतिशील लेखक इसलिए भी प्रगतिवादी आंदोलन से कट गए कि उसमें सपाटता बहुत आ गई थी और अंतर्विरोधों पर खुलकर बहस नहीं होती थी। क्या आपको नहीं लगता ऐसा?
आप मुझे बताइए, किस दौर में साहित्य ऐसा लिख गया जिसमें सपाटता बिलकुल न हो। अगर कमियाँ हैं, अंतर्विरोध है तो उनको दूर कीजिए। यह तो नहीं कि आप खुद दूर आ गए। मैं जब प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय था तो ऐसे बहुत से मामलों पर मैंने बहसें चलाईं। भाषा को लेकर लंबी बहस चली। मैं कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा-नीति से असहमत था और जो कुछ लिखता था वह कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र में छपा करता था। आप इससे अंदाजा लगाइए हमारी स्वतंद्धता का।
एक और बात! यह जो प्रतिशीलता का एक संकुचित अर्थ बन गया है कि उसमें मजदूर-किसान और क्रांति के गाने गाए जाएँगे, इससे भी लोग बिदके होंगे! क्योंकि लोग वास्तविक जीवन में तो इनके निकट थे नहीं, तो बड़ी बनावटी रचनाएँ आतीं थी। साठोत्तरी लघु पत्रिकाओं का मुझे पता है। उनमें बहुतेरी लाल क्रांति का परचम फहराती थीं। वे कविता-कहानियाँ कहाँ गईं, आज पता नहीं चलता?
प्रगतिशील की यह परिभाषा गलत है और ऐसी बातें विरोधियों ने हमें बदनाम करने के लिए उड़ाई हैं। हाँ, इतना जरूर है कि हमें आम जनता के निकट आना होगा। उनकी मुश्किलें समझकर उनसे जुड़कर लिखें।
केदारनाथ अग्रवाल ने अपनी प्रगतिशीलता को पार्टीवाद से अलग घोषित किया—कि यानी पार्टीवाद या पार्टी दखल से वे भी परेशान हैं?
लेकिन पार्टी तो कभी नहीं कहती कि यह लिखो वह लिखो, कहेगा तो कोई लेखक ही न?
तो भी एक तरह का सेंसरशिप तो लगता है?
देखिए, पार्टी क्या है—एक तरह की विचारधारा है और विचाराधारा का प्रभाव तो होगा ही। जैसे गाँधी जी की विचारधारा का प्रभाव था, वैसे ही कम्युनिस्ट विचारधारा का। लेकिन विचारधारा से तो कोई लेखक मैच्योर ही बनता है।
लेकिन यह सेंसरशिप स्वत:स्फूर्त रचना में बाधक भी तो बनती है?
मेरा मानना है कि कोई रचना पूरी तरह स्वत:स्फूर्त नहीं होती। लेकिन इतनी तो जरूर होती है कि अगर हम यह सोचकर बैठ जाएँ कि अच्छी रचना ही लिखनी है तो वह नहीं लिखी जाती और कभी वह ऐसे ही बन जाती है।
तब भी लेखक कुछ शब्दों को चुनता है, कुछ को रिजेक्ट करता है—यानी वह अपना आलोचक खुद होता है। इस रूप में रचना स्वत:स्फूर्त कभी नहीं होती।
अच्छा, अब एक अलग तरह का सवाल! जो आलोचना आप लिखते हैं या आपके लिखे पर जो आलोचना होती है, उससे कई बार क्षोभ और गुस्सा भी तो आता होगा। उससे आपके व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन पर भी कोई प्रभाव पड़ता है?
नहीं, मुझ पर तो कभी नहीं। जिन पर मैंने लिखा, उनका कह नहीं सकता। (हँसी)
कई बार आलोचना सिर्फ दूसरों की कमजोरियाँ तलाशने का धँधा बन जाती है। इसे एकांगी आलोचना नहीं कहेंगे?
‘कविता के नए प्रतिमान’ पर लिखे गए लेखों में आपने नामवर के अंतर्विरोधों को खोला है, लेकिन उनकी तारीफ में एक शब्द भी नहीं है?
‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिह कुल मिलाकर प्रगतिवाद के विरोध में खड़े हैं, इसीलिए इतनी सख्त आलोचना की जरूरत पड़ी।
इस तरह की आलोचना से आपने काफी दुश्मन भी बना लिए होंगे?
नहीं, मेरे मन में तो ऐसी कोई बात नहीं है। हाँ, लोगों ने वैसा किया हो, तो कह नहीं सकता। वैसे तो मेरा खयाल है ऐसा नहीं हुआ। नामवर सिंह पर मैंने सबसे सख्त लिखा है, पर हम लोग खूब अच्छे मित्र हैं और सम्मान करते हैं एक-दूसरे का। रांगेय राघव को मुझ पर कुछ लिखना होता था तो किताबें मुझसे ही माँगकर ले जाते थे और आपको शायद मालूम हो, मेरी बहुत कटु आलोचना की है उन्होंने। भगवतीचरण वर्मा के ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ पर मैंने बहुत तीखा लेख लिखा था, हालाँकि हम मित्र थे, बाद में भी रहे।…उस उपन्यास के जवाब में रांगेय राघव ने ‘सीधा सादा रास्ता’ लिखा तो मेरे घर आए। बोले—मैं आपके लेख को भूमिका के रूप में देना चाहता हूँ। मैंने कहा, ठीक है खुशी से छापो।
अपने जीवन-संघर्ष के किसी कमजोर क्षण में मार्क्सवाद से क्या कभी मोहभंग नहीं हुआ आपका?
देखिए, मार्क्सवाद सिखाता है कि हर चीज पर डाउट करो। तो मैं मार्क्सवाद को भी आलोचनात्मक नजरिए से देखता हूँ। मैं यह नहीं मानता कि मार्क्स कोई गलती नहीं कर सकता।
इतने लंबे आलोचक जीवन में आपने तमाम लोगों पर तमाम तरह की चीजें लिखीं। क्या आपको कभी कनफेस करने की भी जरूरत पड़ी?
यह तो काल्पनिक प्रश्न हुआ, उदाहरण देकर बताए।
वहीं पंत जी वाला लेख, जिसमें लघु-लघु की गिनती होता है या वे लेख जिन्हें नागर जी ने मारधाड़ वाले लेख कहा ?
सच तो यह है मेरे पास समय नहीं, नहीं तो मैं तो और लिखूँ! पंत जी ने ‘स्वर्ण किरण’, ‘स्वर्णधूलि’ वाले ढोंग का विरोध करना जरूरी था। एक बात बताऊँ आपको, पंत जी आध्यात्मवादी कभी थे ही नहीं। यह अध्यात्म सिर्फ उन्होंने ओढ़ रखा था। निराला जी से प्रतिद्वंद्विता…
आपका मतलब है, पंत जी आतंकित थे निराला जी से?
इनके संबंध बड़े अद्भुत थे। निराला बहुत प्यार करते थे पंत जी से। उन्हें अच्छा कवि भी मानते थे। पंत मन ही मन आतंकित थे निराला जी से। समझते थे कि वह बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन यह बात स्वीकार कभी नहीं करते थे।
क्या आपको लगता है, निराला से मिलने के बाद आपमें एक व्यक्तित्वांतर हुआ। यानी उनसे न मिले होते तो ठीक-ठीक ऐसे न होते…?
लेखक तो मैं तब भी होता। एक तो घर का माहौल ऐसा था कि सभी भाई खूब पढ़ते थे, रुचि लेते थे। खुद पिता जी ने अभावों में रहते हुए भी कई भाषाएँ सीखी थीं। हमें भी प्रोत्साहन देते। फिर संयोग से अध्यापक भी अच्छे मिले जो खूब स्नेह करते थे। जब मैं सोलह वर्ष का था, मेरा एक निबंध मेरे अध्यापक ने कक्षा में पढ़कर सुनाया और खूब तारीफ की थी। फिर बी.ए. में पढ़ता था, तब भी ऐसा ही हुआ। तो मुझे लगता था, लेखक तो मैं हो सकता हूँ। निराला जी से भेंट बहुत बाद में हुई, जब मैं इलाहाबाद में एम.ए. का छात्र था…
उसे भेंट की याद है आपको? तब क्या निराला बिलकुल स्वस्थ थे?
हाँ, मैं ‘परिमल’ खरीद रहा था कि कहीं से घूमते-फिरते वह आ गए। मेरे हाथ में ‘परिमल’ देखकर बोले, इसमें कुछ अतुकांत कविताएँ हैं जो आपको शायद ज्यादा पसंदन आएँ। मैंने कहा, वही तो मुझे ज्यादा पसंद हैं। सुनकर निराला को आश्चर्य हुआ था। उनकी आँखों में प्रसन्नताभरी चमक मैंने देखी…
तब के निराला तो बिलकुल देवपुरुषों जैसे थे। उस समय निराला अपने चरम थे, कहीं कोई असामान्यता नहीं! कविताएँ सुनाने का खूब शौक था, लेकिन अपनी नहीं, दूसरों की। सैकड़ों कविताएँ उन्हें याद थीं, पार्क में रात देर तक बैठकर सुनाया करते थे। रवींद्रनाथ टैगोर की कितनी ही कविताएँ मैंने शब्दश: उनसे सुनी हैं।
बाद में आप आलोचना से कटकर भाषा विज्ञान की ओर आए। आपको क्या लगता है, कौन से सवाल, कौन सी चुनौतियाँ थीं जो आपको इधर खींच लाईं?
एक तो मैंने जब से होश सँभाला, यही सुनता आया हूँ कि एक थे आर्य, एक थे द्रविड़। आर्य अक्रांता थे, द्रविड़ों को खदेड़ा था। आज भी आर्य भारत अलग है, द्रविड़ भारत अलग। तो मैं सोचा करता था, क्या यह वाकई ऐसा है? क्या आर्य सचमुच बाहर से आए थे? दूसरे, यह कहा जाता था कि हिंदी में तो इतनी बोलियाँ हैं और सब एक-दूसरे से जुदा-जुदा तो हिंदी एक भाषा कैसे रही? देश एक कहाँ है…? मुझे लगा कि इन प्रश्नों को सुलझाया जाए। हिंदी बोलने वाले हम इतने सारे लोग हैं। भाषा-संबंधी देन भी हमारी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन कुछ गलतफहमियों के सहारे उन्हें नकारा जाता था और हममें हीनता पैदा की जाती है। मैंने पहले तो यही देखा कि क्या आर्य वाकई बाहर से आए थे? मैंने पाया—और इसे सभी भाषाविज्ञानी मानते हैं, कोई विवाद नहीं इसमें—कि सघोष महाप्राण ध्वनियाँ (जैसे घ, भ इत्यादि) केवल हिंदी, संस्कृत में हैं। तो अगर ये आर्य कहीं बाहर से आए होते तो दूसरी भाषाओं में भी ये ध्वनियाँ होनी चाहिए, लेकिन नहीं मिलीं—संसार की किसी भी और भाषा में नहीं। अब सवाल यह है कि हमारी भाषा में सुरक्षित कैसे रहीं, कहाँ से आईं? तो बहुत सारी बातें जिन्हें भाषाविज्ञानी अब तक रूढि़ की तरह ढोते चले आए थे, मैंने नए सिरे से परखा…और जैसे-जैसे आगे बढ़ा, मुझे मजा भी बहुत आया। जिन दिनों के.एम. मुंशी संस्थान में था, मैंने सोचा अवसर का लाभ उठाया( जाए। उन दिनों भाषा विज्ञान के बारे में जमकर अध्ययन किया।
आपकी किताब ‘घर की बात’ पढ़कर अच्छा लगा, थोड़ा खेद भी हुआ। भाषा की इतनी बढिय़ा अर्थ-छवियाँ बिखरी पड़ी हैं वहाँ कि लगा, आप बहुत अच्छे उपन्यासकार हो सकते थे। पर आपको भारी भरकम आलोचक ने उसे दबा दिया।
(हँसकर) मैंने बिलकुल शुरू में एक उपन्यास लिखा था, ‘चार दिन’। अब भी उपन्यास लिखने का इरादा खत्म नहीं हुआ। उम्मीद रखिए…
अपने साहित्यिक मित्रों के बारे में कुछ बताइए? सुना है, खूब छेड़छाड़, शरारतें होती थीं नागर जी के साथ?
निराला जी के यहाँ ही भेंट हुई थी नागर जी से। हमसे छोटे थे चार साल, लेकिन बातें बड़ों जैसी समझदारी की करते थे। हम कहते, ”हम बड़े हैं, आप कहा करो, क्या ‘तुम…’, ‘तुम’ करते हो?’’ तो जवाब मिला, ”आप हमसे नहीं बोला जाएगा। नरेंद्र शर्मा को बोल सकते हैं पर तुमसे नहीं!’’ आपको बताया है कि उन्होंने ही मुझे मारधाड़ वाली आलोचना से रोका था। बैसवाड़ा के न होते हुए भी इतनी बढिय़ा बैसवाड़ी वह बोल लेते थे कि ताज्जुब होता था। उनके उपन्यासों में—खासकर संवादों में बैसवाड़ी के कुछ बहुत ही बढिय़ा प्रयोग मिलते हैं। अभी उनकी ग्रंथावली पर लिखने के लिए मैं उनके उपन्यास दुबारा पढ़ रहा था तो उनमें एक-दो जगह ठेठ गाँव के मुहावरे इतने बढिय़ा ढंग से आए हैं कि मैं कुछ देर तक किताब दूर रखकर हँसता ही रहा कि शहर का यह आदमी जान कैसे गया इन्हें?
केदारनाथ अग्रवाल से भी लंबी मित्रता है। हमसे बड़े हैं, मगर चार साल नहीं, एक साल। बहुत लंबा पत्र-व्यवहार है उनसे, अभी पीछे छपा भी है। इनकी कविताएँ बहुत आकर्षित करती हैं मुझे। लेकिन गद्य और भी गजब का है। मुझे लगा, इस गद्य की ताकत लोगों को बतानी चाहिए। लोग अब देख रहे हैं, खुद समझ रहे हैं कि क्या कुछ है इन पत्रों में।
और नागार्जुन?
नागार्जुन से भी मित्रता है, पर उनसे लंबा पत्र-व्यवहार नहीं हुआ।
केदार और नागार्जुन के व्यक्तित्व की जाहिर है, अलग-अलग रेखाएँ आपको खींचती होंगी! क्या फर्क लगा आपको उनमें?
केदार के यहाँ संवेदनाशीलता बहुत है, सौंदर्यानुभूति उनकी बहुत सजग, बहुत तीव्र है, इसलिए उनके प्रकृति चित्रण का जवाब नहीं। ऐसे दृश्यों की सुंदरता देखकर आप मुग्ध हो जाएँगे लेकिन व्यंग्य केदार के यहाँ बहुत नीचे हैं। नागार्जुन के यहाँ व्यंग्य नंबर एक पर हैं, बहुत उम्दा हैं, लेकिन सौंदर्य चित्रण देखें तो तीसरे-चौथे नंबर पर। केदार के मुकाबले बहुत हलके पड़ते हैं।
प्रगतिवाद में केदार जी की चर्चा सबसे कम हुई है। बड़े प्रगतिवादी आलोचक हलके टोन में उनकी चर्चा करके छोड़ देते हैं, ऐसा क्यों?
आप ठीक कह रहे हैं। मैंने तो इस पर बकायदा लिखा है कि केदार जी की उपेक्षा हुई है और यह गलत है।
हिंदी साहित्य का मौजूदा दृश्य कुछ-कुछ निराश पैदा करने वाला नहीं लगता आपको? किताब पाठकों से दूर चली गई। एक तो पाठक कम हैं, फिर किताबें महंगी भी बहुत हैं।
लेकिन आप जरा जाकर पता लगाइए, प्रकाशक तो बढ़े हैं और उनकी हालत देखें तो लेखक तो वहीं का वहीं है और प्रकाशक कहाँ से कहाँ पहुँच गए! किताबें बिकती नहीं, तो कैसे होता ऐसे?
सरकारी खरीद की ओर भागते हैं सभी। किताबें बोरों में बंद हो जाती हैं, पाठकों तक नहीं आतीं…
यह तब भी होता था। प्रकाशक इसी चीज के पीछे भागता था। पाठक को संस्कार देने काकाम उसने नहीं किया और आज भी ऐसा ही है। पर दूसरी भाषाओं में ऐसा नहीं है, बंगला में देखें, मराठों में देखें! कुछ वर्ष पहले अखबारी कागज पर छपा हुआ माइकेल मधुसूदन दत्त का काव्य बहुत सस्ते में खरीदा था मैंने!…उन लोगों की पुस्तकें सजिल्द कम होती हैं। किताब लाइब्रेरी की बजाय पाठकों तक पहुँचे यह ज्यादा है। हमारे यहाँ उलटा है। अमरीकी प्रभाव ज्यादा है। किताब की साज-सज्जा बढिय़ा होगी, लेकिन दाम इतना रखेंगे कि कोई खरीद ही नहीं सकता।
क्या मीडिया का दबाव भी साहित्य की इस दुर्गति के लिए जिम्मेदार है—खासकर टी.वी.?
देखिए, साहित्य का तो एक तरह का नशा है, जिसे एक बार लग गया उसे लग गया। फिर आसानी से छूट नहीं सकता। दूरदर्शन ने आपके पाठक छीने नहीं, वह तो नए दर्शक पैदा कर रहा है। जिसे किताबें पढऩी होंगी, वह किताबें ही पढ़ेगा। मैं खुद बहुत कम देखता हूँ टीवी। इसकी बजाय तो मुझे संगीत सुनना अच्छा लगता है और वह मैं सुनता हूँ ट्रांजिस्टर से।
लेकिन जिस तरह लेखक ललचाते हुए दूरदर्शन की ओर भाग रहे हैं, फिर वहाँ चाहे उनका अपमान हो, कहानियों में दूरदर्शनी सीरियलों जैसा जो कामचलाऊपन आ रहा है और लोगों को लगने लगा है कि दूरदर्शन में तो इतने दर्शक हैं, वे किस स्तर के हैं इससे फर्क नहीं पड़ता—तो एक क्रेज तो बना ही है कि…
यह सब बहुत थोड़े समय के लिए होता है, चला जाता है। कोई सोचे कि इससे साहित्य खत्म हो जाएगा, तो यह बेवकूफी है!…साहित्य इतनी हलकी चीज नहीं।
आज साहित्य में इतने कटघरे और गुटबंदियाँ हैं कि नया लेखक जिधर भी जाए, अपने सामने काँटेदार बाड़ देखता है। यह हालत कैसे बदले?
नए लेखकों को चाहिए कि वे अलग से या मिलकर इस काँटेदार बाड़ को तोड़ें। आगे बढऩे वालों को कोई रोक सका है भला।
आजकल आप क्या विशेष कर रहे हैं?…किस तरह की योजना?
मैं ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान पर एक तरह का शोध कार्य कर रहा हूँ। एशिया और ऋग्वेद से संबंधित पुस्तक आशा है, जल्दी ही आएगी। ऋग्वेद कई दृष्टियों से मुझे महत्वपूर्ण लगा है, खासकर भाषा-संबंधी अध्ययन और प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति, जीवन शैली, शिल्प और विकास की अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं की खोज के लिए।
और ज्यादातर समय इसी में जाता होगा?
काफी एकांत है यहाँ…स्थान थोड़ा दूर भी है, इसलिए कभी-कभार ही कोई आता है मिलने। लिखने-पढऩे के लिए काफी समय मिल जाता है।
कहते-कहते मुसकरा देते हैं रामविलास जी। मैं देवेंद्र सत्यार्थी पर लिखी गई किताब ‘तीन पीढिय़ों का सफर’ उन्हें भेंट करता हूँ और बताता हूँ, ”आज ही सत्यार्थी जी मिले थे। कह रहे थे—कोई कितना ही मना करें, पुरस्कार के लिए कहीं एक लालच तो होता ही है मन में। रामविलास जी से मामले में हम सबसे आगे हैं। और उन्होंने बताया कि एक किताब उन्होंने समर्पित की थी आपको, ‘उठाइए लाठी आलोचक जी’ इस ललकार के साथ…’’
रामविलास जी हँस पड़ते हैं, ”और वह किताब आज तक मुझे नहीं मिली। उनसे कहिएगा—मुझे क्यों नहीं भेजी वह किताब?’’
मैं आलोचना के इस शिखर पुरुष को प्रणाम कर लौट पड़ता हूँ।
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