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आंदोलनकारी महि‍लाओं का सम्‍मेलन 27 को

देहरादून : ‘महि‍ला समाख्‍या’ और ‘पहाड़’ नैनीताल के संयुक्‍त तत्‍वाधान में उत्‍तराखण्‍ड में वि‍भि‍न्‍न समाजि‍क-राजनीति‍क आंदोलनों से जुड़ीं तथा सर्वोदय आंदोलन से जुड़ीं नेतृत्‍वकारी महि‍लाओं का सम्‍मेलन 27 मार्च, 2012 को रायल इन पैलेस (साई पीजी होम), 125 इन्‍दि‍रानगर, देहरादून में कि‍या जा रहा है।

इसमें उत्‍तराखण्‍ड में आंदोलनों से जुड़ी नेतृत्‍वकारी महि‍लायें प्रेरणादायक संस्‍मरण सुनायेंगी। आयोजन में लक्ष्‍मी आश्रम कौसानी तथा ‘पहाड़़’ नैनीताल द्वारा प्रकाशि‍त गाँधी जी की शि‍ष्‍या प्रसि‍द्ध संग्रामी तथा समाजसेवी सरला बहन की आत्‍मकथा ‘व्‍यवहारि‍क वेदांत’ के डेवि‍ड भाई द्वारा कि‍ये गये अंग्रेजी अनुवाद A Life in Two Words का वि‍मोचन भी कि‍या जायेगा।

आरसी चौहान की तीन कवि‍तायें

आरसी चौहान

चरौवाँ,  बलिया,  उत्‍तर प्रदेश में 08 मार्च, 1979 को जन्‍में युवा कवि‍ आरसी चौहान के गीत, कवि‍ता, लेख, समीक्षा आदि‍ का वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशन के अलावा आकाशवाणी से प्रसारण हो चुका है। उनकी तीन कवि‍तायें-

बेर का पेड़

मेरा बचपन
खरगोश के बाल की तरह
नहीं रहा मुलायम
न ही कछुवे की पीठ की तरह
कठोर ही

हाँ मेरा बचपन
जरूर गुजरा है
मुर्दहिया, भीटा और
मोती बाबा की बारी में
बीनते हुए महुआ, आम
और जामुन

दादी बताती थीं
इन बागीचों में
ठाढ़ दोपहरिया में
घूमते हैं भूत-प्रेत
भेष बदल-बदल
और पकड़ने पर
छोड़ते नहीं महिनों

कथा किंवदंतियों से गुजरते
आखिर पहुँच ही जाते हम
खेत-खलिहान लाँघते बागीचे
दादी की बातों को करते अनसुना

आज स्मृतियों के कैनवास पर
अचानक उभर आया है
एक बेर का पेड़
जिसके नीचे गुजरा है
मेरे बचपन का कुछ अंश
स्कूल की छुट्टी के बाद
पेड के नीचे
टकटकी लगाये नेपते रहते
किसी बेर के गिरने की या
चलाते अंधाधुंध ढेला, लबदा

कहीं का ढेला
कहीं का बेर
फिर लूटने का उपक्रम
यहाँ बेर मारने वाला नहीं
बल्कि लूटने वाला होता विजयी
कई बार तो होश ही नहीं रहता
कि सिर पर
कितने बेर गिरे
या किधर से आ लगे
ढेला या लबदा

आज कविता में ही
बता रहा हूँ कि मुझे एक बार
लगा था ढेला सिर पर टन्न-सा
और उग आया था गुमड़
या बन गया था ढेला-सा दूसरा
बेर के खट्टे-मीठे फल के आगे
सब फीका रहा भाई
यह बात आज तक
माँ-बाप को नहीं बताई
हाँ, वे इस कविता को
पढ़ने के बाद ही
जान पायेंगे कि बचपन में
लगा था बेर के चक्कर में
मुझे एक ढेला
खट्टा, चटपटा और
पता नहीं कैसा-कैसा
और अब यह कि
हमारे बच्चों को तो
ढेला लगने पर भी
नहीं मिलता बेर
जबसे फैला लिया है बाजार
बहेलिया वाली कबूतरी जाल
जमीन से आसमान तक एकछत्र।

पहाड़

हम ऐसे ही थोडे बने हैं पहाड़
हमने न जाने कितने हिमयुग देखे
कितने ज्वालामुखी
और कितने झेले भूकम्‍प
न जाने कितने-कितने
युगों चरणों से
गुजरे हैं हमारे पुरखे
हमारे कई पुरखे
अरावली की तरह
पड़े हैं मरणासन्न तो
उनकी संतानें
हिमालय की तरह खड़ी हैं
हाथ में विश्व की सबसे ऊँची
चोटी का झण्‍डा उठाये।

बारिश के बाद
नहाये हुए बच्चों की तरह
लगने वाले पहाड़
खून पसीना एक कर
बहाये हैं निर्मल पवित्र नदियाँ
जिनकी कल-कल ध्वनि
की सुर ताल से
झंकृत है भू-लोक, स्वर्ग
एक साथ।

अब सोचता हूँ
अपने पुरखों के अतीत
व अपने वर्तमान की
किसी छोटी चूक को कि
कहाँ विला गये हैं
सितारों की तरह दिखने वाले
पहाड़ी गाँव
जिनकी ढहती इमारतों व
खण्डहरों में बाजार
अपना नुकीला पंजा धंसाए
इतरा रहा है शहर में
और इधर पहाड़ी गाँवों के
खून की लकीर
कोमल घास में
फैल रही है लगातार ।

नथुनिया फुआ

ठेठ भोजपुरी की बुनावट में
घड़रोज की तरह कूदता
पूरी पृथ्वी को
मंच बना
गोंडऊ नाच का नायक-                                                                                                                            ‘नथुनिया फुआ’
कब लरझू भाई से
नथुनिया फुआ बना
हमें भी मालूम नहीं भाई !
हाँ, वह अपने अकाट्य तर्कों के
चाकू से चीर फाड़कर
कब उतरा हमारे मन में
हुडके के थाप और
भभकते ढीबरी के लय-ताल पर
कि पूछो मत रे भाई !
उसने नहीं छोड़ा अपने गीतों में
किसी  सेठ-साहूकार
राजा-परजा का काला अध्याय
जो डूबे रहे मांस के बाजार में आकंठ
और ओढे रहे आडम्‍बर का
झक्क सफेद लिबास
माना कि उसने नहीं दी प्रस्तुति‍
थियेटर में कभी
न रहा कभी पुरस्कारों की
फेहरिस्त में शामिल
चाहता तो जुगाड़ लगाकर
बिता सकता था
बाल-बच्चों सहित
राज प्रसादों में अपनी जिन्‍दगी के आखिरी दिन
पर ठहरा वह निपट गँवार
गँवार नहीं तो और क्या कहूँ उसको
लेकिन वाह रे नथुनिया फुआ
जब तक रहे तुम जीवित
कभी झुके नहीं हुक्मरानों के आगे
और भरते रहे साँस
गोंडऊ नाच के फेफडों में अनवरत
जबकि…
आज तुम्हारे देखे नाच के कई दर्शक
ऊँचे ओहदे पर पहुँचने के बाद
झुका लेते हैं सिर
और हो जाते शर्मशार …।

पर्यावरणविद् चण्‍डी प्रसाद भट्ट पर कार्यक्रम 19 को

नई दिल्‍ली : इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और पहाड़ के संयुक्‍त तत्‍वावधान में वरिष्‍ठ पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के कार्यकर्ता चण्‍डीप्रसाद भट्ट के जीवन और उनके कार्यों को रेखांकित करने के लिए आइआइसी ऑडिटोरियम, लोधी रोड, नई दिल्‍ली में 19 जुलाई, 2011 को शाम 6.30 बजे विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। वह भी इस अवसर पर उपस्थित रहेंगे। उन्‍होंने पर्यावरणीय आंदोलन के विकास में भारत और देश के बाहर महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रसिद्ध से दूर रहकर अपने जन्‍म प्रदेश उत्‍तराखंड में निरंतर कार्य कर रहे हैं। वह बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक हैं।

कार्यक्रम में गांधी शांति प्रतिष्‍ठान के अनुपम मिश्र, अनिकेत के रमेश पहाड़ी, पहाड़ के शेखर पाठक, न्‍यू इंडिया फाउंडेशन के रामचंद्र गुहा, केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण, जीपीएफ की राधा बहन मुख्‍य वक्‍ता होंगे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता पुष्‍पेष पंत करेंगे।

पहाड़ पर बारिश का कहर : अतुल शर्मा

इस बार भी बारिश पहाड़ पर कहर बनकर बरस रही है। अनियोजित व अवैज्ञानिक विकास के चलते इससे राहत मिलती नहीं देख रही है। कवि और पत्रकार अतुल शर्मा की रिपोर्ट-

सुबह से शाम तक थका देने वाली पहाड़ी ऊँचाइयों और ढलानों में ताजी ठंडी हवा, खुला नीला आकाश, पानी का मीठा स्रोत महिलाओं की जीवन शक्ति हैं। बोझ और पानी को ढोतीं महिलाएं दरअसल पहाड़ को ढोती हैं।

सुबह जलकुर घाटी, लम्‍बगांव से निकली दो महिलाओं को बारिश की तेज धार से हुए भूस्‍लखन ने लाशों में बदल दिया। जलकुर गाड (नदी) में बाढ़ आने से लापता चल रही दो महिलाओं के शव ग्रामीणों ने रातभर सर्च रेस्‍क्‍यू अभियान चलाकर के बरामद कर लिए। ब्‍लॉक डूंडा के बागी बह्मपुरी गांव में सोमवार देर रात आधा दर्जन महिलायें धान की रोपाई कर घर लौट रही थीं। अचानक जलकुर नदी में बाढ़ आने से नदी पार करते वक्‍त महिलायें तेज बहाव में बह गईं। पानी के उफान से बचते हुए कृष्‍णा, पिंकी, मंगली देवी व सौंद्राणी किनारे लग गईं, जबकि बालकराम की पत्‍नी शारदा व उसके भाई आनन्‍द प्रकाश की पत्‍नी रुक्मिणी के पीठ पर पहाड़ी बोझ (बिलडे़) होने से वे पानी के तेज बहाव में बह गईं। हादसे के बाद किनारे लगीं महिलायें जब चिल्‍लाने लगीं तो आसपास के लोग मौके पर पहुँचे। इतने में रुक्मिणी और शारदा घटनास्‍थल से लगभग आधा किलोमीटर दूर बह गई थीं। ग्रामीणों ने खोजबीन अभियान चलाया तो रुक्मिणी पत्‍थर पर फँसी हुई थी। शारदा का पता नहीं चला। रुक्मिणी को बेहोशी में उत्‍तरकाशी में उपचार हेतु लाया गया। वहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।

पहाड़ में इस तरह के हादसे बारिश के साथ हाथ मिलाएं रहते हैं और कहर बनकर बरसती है बारिश। चट्टानें खिसक जाती हैं। कब्रगाह बन जाता है गांव, जब दरकती है छाती पहाड़ की।

27 जून, 2011 को पुरोला, उत्‍तरकाशी में तेज बिजली कड़की और भयंकर रूप से गिरी। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में भेड़, बकरी और उनकी चराने वाले इसकी चपेट में आ गये। सात सौ से अधिक भेड़ें वहीं मर गईं। ये भेड़े पच्‍चीस परिवारों का जीवन चलाती थीं। पहाड़ की ऊँचाइयों और ढलानों पर उछलती-कूदती भेड़ों को मरा हुआ देखकर मन भर आया। आँसुओं की कभी न खत्‍म होने वाली इस कहानी का अन्‍त कहीं भी नजर नहीं आ रहा है।

अभी बारिश शुरू ही हुई है और बीस घंटे से जाम में फँसे मनसेरू ने बताया कि वह भूखा-प्‍यासा तीर्थयात्रियों की सेवा में लगा है। गंगोत्री मार्ग में भारी भूस्‍खलन 28 जून, 2011 को हुआ और बीस घंटे तक वह साफ नहीं हुआ। नालूपानी, देवीधार और भटवाडी में भारी चट्टानीं जमीन धँस गई। कमोबेश यह हाल हिमाचल और उत्‍तराखण्‍ड दोनों का ही है।

बरसात में सड़कें, गांव पगडंडियां, नदी-नाले सभी की सूरत बदली हुई लगती है। दैनिक जीवन किसी अंधी गुफा की तरह हो जाता है- डरवाना, भयावह और काला। पहाड़ों में दुर्घटनाओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। रास्‍ता बाधित होने के कारण बुलडोजर अपनी पूरी कोशिश के साथ रास्‍ते साफ करने में लगे रहते हैं, लेकिन लगता है कि कभी-कभी ये बुलडोजर पूरी कोशिश के बावजूद रास्‍ते को काफी देर तक साफ करते हैं। जहां सड़क नहीं है, वहां ने एंबुलैंस जा सकती है, न बुलडोजर।

भूगर्भीय परिवर्तन, अनियोजित व अवैज्ञानिक विकास, अंधाधुंध दोहन, कच्‍चे और नये पहाड़ पर जमीनी हकीकत से दूर बनी योजनाएं इन आपदाओं का कारण बनती हैं। बादल फटते हैं, जो क्षेत्रीय भाषा में ‘पणगोले’ कहलाते हैं तो उससे ऐसी जबरदस्‍त तेज बारिश होती है कि कई बार पूरा प्रवाह जमीन को रौंद जाता है।

लघु जल नीति परियोजनायें कोसी, अलकनन्‍दा, भिलंगना, भागीरथी, पिंडर, टौंस, गंगा, यमुना और पिथौरागढ़ से लेकर हिमाचल की सीमा तक नदियों के दोनों तरफ ऐसे सुरंग बांध बनाती है, जिससे पहाड़ी पर्यावरण कमजोर पड़ जाता है। मुनाफे के लिए वहां रहने वाले लोगों के लिए यह खतरनाक होता ही है, साथ-ही-साथ पूरे जलचक्र को भी प्रभावित करता है।

आज चारधाम यात्रा के लोग रास्‍ते बाधित होने पर बहुत मुश्किल में हैं। सड़कों पर ही बैठे या लेटे हैं। व्‍यवस्‍था जितना कर सकती है, वो पर्याप्‍त नहीं है। दूसरी तरह राज्‍य की उत्‍तराखंडी भाजपा सरकार व केन्‍द्र की कांग्रेस सरकार के बीच आपदा प्रबंधन के लिए पैसा भेजने व मांगने की कवायद राजनीतिक रूप लेती है। केन्‍द्र से उत्‍तराखण्‍ड सरकार ने ज्‍यादा पैसा मांगा। केन्‍द्र ने लगभग पांच सौ करोड़ भेजे। पूरी राजनीति चली। आपदा प्रबंधन से जुडे़ विभागों के अनुसार उन्‍होंने 421 करोड़ खर्च किए, जबकि लोग इसे सही मानते। फिर भी इसी को सच मान लिया जाए तो 79 करोड़ अभी तक खर्च क्‍यों नहीं हुआ। ये बड़ा सवाल है।

पहाड़ की त्रासदी यही है कि कागजों में आपदा प्रबंधन की तैयारियां पूर्ण बताई जाती हैं, जबकि रोज की मानूसनी दुर्घटनाओं के समय यह आपदा प्रबंधन कहीं गायब रहता है ?

गत वर्षों को देखा जाए तो नदियों पर मलबा गिरने से बनी झीलों, भूकम्‍प और भूस्‍खलन से पहाड़ हमेशा ग्रसित रहा है। साठ के अंत और सत्‍तर के शुरू में विरही नदी झील बनी और टूटी और तबाही का कारण बनी। उत्‍तरकाशी में डबरानी में झील का तांडव देखा। 91 के भूकम्‍प ने तबाही मचाई थी। नीलकंठ में कुछ वर्षों पूर्व भूस्‍लखन से सैकड़ों कांवडिये दब गए थे। पिछले साल बारिश तबाही बनकर बरसी थी। न जाने कितने लोग, मवेशी, जंगल आदि नष्‍ट हो गए थे। यह सिलसिला इस वर्ष भी जारी है।

यात्रामार्ग पर भूस्‍खलन का तांडव मचा। हेलंग के पास चट्टान खिसक गई। इसकी चपेट में आने से वाहन सवार कुछ यात्रियों की मौत हुई और दो घायल हो गए। गाडि़यों पर चट्टानें गिरीं। ग्‍लेशियर टूटा। जोशीमठ, पांडकेश्‍वर और बद्रीनाथ में इन दिनों सैकड़ों गाडियां रुकी इुई हैं। केदरनाथ और यमुनोत्री मार्ग में बहुत बुरे हाल हैं। यात्रा मार्ग पर 322 स्‍थान अतिसंवेदनशील हैं। बद्रीनाथ और गंगोत्री मार्ग पर एक दर्जन स्‍थान बेहद संवेदनशील हैं।

डूंडा और नालू पानी के बीच गिरी चट्टान की चपेट में आने से राजस्‍थान के यात्रियों की एक इनोवा और स्‍कार्पियों तथा उत्‍तरकाशी निवासी चतर सिंह की आल्‍टो कार दफन हो गई। ऐसी हादसे पहाड़ में भूस्‍लखन के कारण रोज घट रहे हैं। बद्रीनाथ के पास कंजनजंगा के नजदीक टूटा गलेशियर दस मीटर की सड़क बहा ले गया। 48 घंटे बंद रही गंगोत्री यात्रा। दो गाडि़यां भागीरथी में भी बहीं। इस बाधित मार्ग के कारण 15 हजार यात्री जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच फंस गए। उधर जोशीमठ से ऋषिकेश आ रही एक टैक्‍सी हेलंग के पास चट्टान गिर जाने से तीर्थयात्री को निगल गई।

उत्‍तरकाशी-देहरादून मार्ग धरासू के निकट बंद होने पर गंगोत्री पहुंचे तीर्थयात्री व स्‍थानीय लोग चौरंगीखाल, लम्‍बगांव, पीपलडाल मार्ग से आवाजाही कर रहे हैं। पेट्रोल पम्‍प संचालकों ने ब्‍लेक में तेल बेचा, लेकिन अतिआवश्‍यक सेवाओं के लिए तेल उपलब्‍ध नहीं करवाया। ऐसा बताया जा रहा है कि पम्‍प संचालकों का कथित आरोप है कि प्रशासन ने सरकारी वाहनों के लिए तेल पर नियंत्रण कर दिया है। इसलिए आम आदमियों की दिनचर्या गड़बड़ा गई है। दर्जनों लिंक मार्ग भूस्‍लखन से अवरोध है। चिल्‍याणी सौंड के जोगत, खालसी, बनचौरा डूंडा के धनारी समेत अनेक मार्गों पर आवाजाही बाधित है।

रोज इस बारिश से तबाही से त्रस्‍त पहाड़ एक व्‍यापक बहस की दरकार रखता है। यह एक दर्द है जो सहा नहीं जाता। और व्‍यवस्‍था के सामने यह समस्‍या है कि ये मौसम उनसे न उगला जाता न निगला। उम्‍मीद है कि लोग पहाड़ का दर्द महसूस करेंगे और सिर्फ सोचने को ही नहीं कुछ करने को भी मजबूर होंगे।

दाज्यू : शेखर जोशी

कथालेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी का जन्म 10 सितंबर, 1932 को अल्मोड़ा जनपद (उत्तराखंड) के गांव ओलियागांव में एक किसान परिवार में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और दिल्ली में हुई। इंटरमीडिएट में पढ़ाई के दौरान सुरक्षा विभाग में ई.एम.ई. अप्रेंटिसशिप के लिए चयन हो गया। सन् 1951 से ’55 तक दिल्ली में अप्रेंटिसशिप के दौरान उनका प्रगतिशील लेखकों, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और पत्रकारिता जगत से संपर्क हुआ। सन् 1955 से 1986 तक इलाहाबाद के एक सैनिक औद्योगिक प्रतिष्ठान में कार्य किया। इसके बाद वर्कशाप आफीसर पद से त्यागपत्र देकर स्वतंत्र लेखन में सक्रिय।  
उन्होंने पहली कहानी ‘दाज्यू’ सन् 1953 में  ‘पर्वतीय जन’ के लिए लिखी, जो बाद में  ‘संकेत’ में प्रकाशित होकर चर्चित हुई। इस कालजयी कहानी का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पर चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी ने फिल्म का निर्माण किया।
उनको हार्दिक शुमकानाएं। उनकी कालजयी कहानी-

चौक से निकल कर बायीं ओर जो बड़े साइनबोर्ड वाला छोटा कैफे है वहीं जगदीश बाबू ने उसे पहली बार देखा था। गोरा-चिट्टा रंग, नीली शफ्फ़ाफ आंखें, सुनहरे बाल और चाल में एक अनोखी मस्ती- पर शिथिलता नहीं। कमल के पत्ते पर फिसलती हुई पानी की बूंद की सी फुर्ती। आंखों की चंचलता देख कर उसकी उम्र का अनुमान केवल नौ-दस वर्ष ही लगाया जा सकता था और शायद यही उम्र उसकी रही होगी।
 अधजली सिगरेट का एक लंबा कश खींचते हुए जब जगदीश बाबू ने कैफे में प्रवेश किया तो वह एक मेज पर से प्लेटें उठा रहा था और जब वे पास ही कोने की टेबल पर बैठे तो वह सामने था। मानो, घंटों से उनकी, उस स्थान पर आने वाले व्यक्ति की, प्रतीक्षा कर रहा हो। वह कुछ बोला नहीं। हां, नम्रता प्रदर्शन के लिए थोड़ा झुका और मुस्कराया भर था, पर उसके इसी मौन में जैसे सारा ‘मीनू’ समाहित था। ‘सिंगल चाय’ का आर्डर पाने पर वह एक बार पुन: मुस्करा कर चल दिया और पलक मारते ही चाय हाजिर थी।
 मनुष्य की भावनाएं बड़ी विचित्र होती हैं। निर्जन, एकांत स्थान में निस्संग होने पर भी कभी-कभी आदमी एकाकी अनुभव नहीं करता। लगता है, उस एकाकीपन में भी सब कुछ कितना निकट है, कितना अपना है। परंतु इसके विपरीत कभी-कभी सैकड़ों नर-नारियों के बीच जनरवमय वातावरण में रह कर भी सूनेपन की अनुभूति होती है। लगता है, जो कुछ है वह पराया है, कितना अपनत्वहीन! पर यह अकारण ही नहीं होता। उस एकाकीपन की अनुभूति, उस अलगाव की जड़ें होती हैं- बिछोह या विरक्ति की किसी कथा के मूल में।
 जगदीश बाबू दूर देश से आए हैं, अकेले हैं। चौक की चहल-पहल, कैफे के शोरगुल में उन्हें लगता है, सब कुछ अपनत्वहीन है। शायद कुछ दिनों रहकर, अभ्यस्त हो जाने पर उन्हें इसी वातावरण में अपनेपन की अनुभूति होने लगे। पर आज तो लगता है यह अपना नहीं, अपनेपन की सीमा से दूर, कितना दूर है! और तब उन्हें अनायास ही याद आने लगते हैं अपने गांव पड़ोस के आदमी, स्कूल-कालेज के छोकरे, अपने निकट शहर के कैफे-होटल…!
 ’चाय शा’ब!’
 जगदीश बाबू ने राखदानी में सिगरेट झाड़ी। उन्हें लगा, इन शब्दों की ध्वनि में वही कुछ है जिसकी रिक्तता उन्हें अनुभव हो रही है। और उन्होंने अपनी शंका का समाधान कर लिया-
 ’क्या नाम है तुम्हारा?’
 ’मदन।’
 ’अच्छा, मदन! तुम कहां के रहने वाले हो?’
 ’पहाड़ का हूं, बाबूजी!’
 ’पहाड़ तो सैकड़ों हैं- आबू, दार्जिलिंग, मंसूरी, शिमला, अल्मोड़ा! तुम्हारा गांव किस पहाड़ में है?’
 इस बार शायद उसे पहाड़ और जिले का भेद मालूम हो गाया। मुस्करा कर बोला-
 ’अल्मोड़ा, शा’ब अल्मोड़ा।’
 ’अल्मोड़ा में कौन-सा गांव है?’ विशेष जानने की गरज से जगदीश बाबू ने पूछा।
 इस प्रश्न ने उसे संकोच में डाल दिया। शायद अपने गांव की निराली संज्ञा के कारण उसे संकोच हुआ था इस कारण टालता हुआ सा बोला, ‘वह तो दूर है शा’ब अल्मोड़ा से पंद्रह-बीस मील होगा।’
 ’फिर भी, नाम तो कुछ होगा ही।’ जगदीश बाबू ने जोर देकर पूछा।
 ’डोट्यालगों’ वह सकुचाता हुआ-सा बोला।
 जगदीश बाबू के चेहरे पर पुती हुई एकाकीपन की स्याही दूर हो गई और जब उन्होंने मुस्करा कर मदन को बताया कि वे भी उसके निकटवर्ती गांव ‘……..’  के रहने वाले हैं तो लगा जैसे प्रसन्नता के कारण अभी मदन के हाथ से ‘ट्रेÓ गिर पड़ेगी। उसके मुंह से शब्द निकलना चाह कर भी न निकल सके। खोया-खोया सा वह मानो अपने अतीत को फिर लौट-लौट कर देखने का प्रयत्न कर रहा हो।
अतीत- गांव…ऊंची पहाडिय़ां…नदी…ईजा (मां)…बाबा…दीदी…भुलि (छोटी बहन)…दाज्यू (बड़ा भाई)…!
मदन को जगदीश बाबू के रूप में किसकी छाया निकट जान पड़ी! ईजा?- नहीं, बाबा?- नहीं, दीदी,…भुलि?- नहीं, दाज्यू? हां, दाज्यू!
दो-चार ही दिनों में मदन और जगदीश बाबू के बीच की अजनबीपन की खाई दूर हो गई। टेबल पर बैठते ही मदन का स्वर सुनाई देता-
‘दाज्यू, जैहिन्न…।’
‘दाज्यू, आज तो ठंड बहुत है।’
‘दाज्यू, क्या यहां भी ‘ह्यूं’ (हिम) पड़ेगा।’
‘दाज्यू, आपने तो कल बहुत थोड़ा खाना खाया।’ तभी किसी और से ‘बॉयÓ की आवाज पड़ती और मदन उस बावाज की प्रतिध्वनि के पहुंचने से पहले ही वहां पहुंच जाता! आर्डर लेकर फिर जाते-जाते जगदीश बाबू से पूछता, ‘दाज्यू कोई चीज?’
‘पानी लाओ।’
‘लाया दाज्यू’, दूसरी टेबल से मदन की आवाज सुनाई देती।
मदन ‘दाज्यू’ शब्द को उतनी ही आतुरता और लगन से दुहराता जितनी आतुरता से बहुत दिनों के बाद मिलने पर मां अपने बेटे को चूमती है।
कुछ दिनों बाद जगदीश बाबू का एकाकीपन दूर हो गया। उन्हें अब चौक, केफे ही नहीं सारा शहर अपनेपन के रंग में रंगा हुआ सा लगने लगा। परंतु अब उन्हें यह बार-बार ‘दाज्यूÓ कहलाना अच्छा नहीं लगता और यह मदन था कि दूसरी टेबल से भी ‘दाज्यू’…।
‘मदन! इधर आओ।’
‘आया दाज्यू!’
‘दाज्यू’ शब्द की आवृति पर जगदीश बाबू के मध्यमवर्गीय संस्कार जाग उठे- अपनत्व की पतली डोरी ‘अहंÓ की तेज धार के आगे न टिक सकी।
‘दाज्यू, चाय लाऊं?’
‘चाय नहीं, लेकिन यह दाज्यू-दाज्यू क्या चिल्लाते रहते हो दिन रात। किसी की ‘प्रेस्टिज’ का खयाल भी नहीं है तुम्हें?’
जगदीश बाबू का मुंह क्रोध के कारण तमतमा गया, शब्दों पर अधिकार नहीं रह सका। मदन ‘प्रेस्टिज’ का अर्थ समझ सकेगा या नहीं, यह भी उन्हें ध्यान नहीं रहा, पर मदन बिना समझाये ही सब कुछ समझ गया था।
मदन को जगदीश बाबू के व्यवहार से गहरी चोट लगी। मैनेजर से सिरदर्द का बहाना कर वह घुटनों में सर दे कोठरी में सिसकियां भर-भर रोता रहा। घर-गांव से दूर, ऐसी परिस्थिति में मदन का जगदीश बाबू के प्रति आत्मीयता-प्रदर्शन स्वाभाविक ही था। इसी कारण आज प्रवासी जीवन में पहली बार उसे लगा जैसे किसी ने उसे ईजा की गोदी से, बाबा की बांहों के, और दीदी के आंचल की छाया से बलपूर्वक खींच लिया हो।
परंतु भावुकता स्थायी नहीं होती। रो लेने पर, अंतर की घुमड़ती वेदना को आंखों की राह बाहर निकाल लेने पर मनुष्य जो भी निश्चय करता है वे भावुक क्षणों की अपेक्षा अधिक विवेकपूर्ण होते हैं।
मदन पूर्ववत काम करने लगा।
दूसरे दिन कैफे जाते हुए अचानक ही जगदीश बाबू की भेंट बचपन के सहपाठी हेमंत से हो गई। कैफे में पहुंच कर जगदीश बाबू ने इशारे से मदन को बुलाया परंतु उन्हें लगा जैसे वह उनसे दूर-दूर रहने का प्रयत्न कर रहा हो। दूसरी बार बुलाने पर ही मदन आया। आज उसके मुंह पर वह मुस्कान न थी और न ही उसने ‘क्या लाऊं दाज्यू’ कहा। स्वयं जगदीश बाबू को ही कहना पड़ा, ‘दो चाय, दो ऑमलेट’ परंतु तब भी ‘लाया दाज्यू’ कहने की अपेक्षा ‘लाया शा’ब’ कहकर वह चल दिया। मानों दोनों अपरिचित हों।
‘शायद पहाडिय़ा है?’ हेमंत ने अनुमान लगाकर पूछा।
‘हां’, रूखा सा उत्तर दे दिया जगदीश बाबू ने और वार्तालाप का विषय ही बदल दिया।
मदन चाय ले आया था।
‘क्या नाम है तुम्हारा लड़के?’ हेमंत ने अहसान चढ़ाने की गरज से पूछा।
कुछ क्षणों के लिए टेबुल पर गंभीर मौन छा गया। जगदीश बाबू की आंखें चाय की प्याली पर ही रह गईं। मदन की आंखों के सामने विगत स्मृतियां घूमने लगीं… जगदीश बाबू का एक दिन ऐसे ही नाम पूछना… फिर… दाज्यू आपने तो कल थोड़ा ही खाया… और एक दिन ‘किसी की प्रेस्टिज का खयाल नहीं रहता तुम्हें…’
जगदीश बाबू ने आंखें उठाकर मदन की ओर देखा, उन्हें लगा जैसे अभी वह ज्वालामुखी सा फूट पड़ेगा।
हेमंत ने आग्रह के स्वर में दुहराया, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’
‘बॉय कहते हैं शा’ब मुझे।’ संक्षिप्त-सा उत्तर देकर वह मुड़ गया। आवेश में उसका चेहरा लाल होकर और भी अधिक सुंदर हो गया था।

एकाकी देवदारु: शेखर जोशी

विकास के नाम पर पेड़ों को काटा जाना आम बात है। कभी हमने सोचा कि वह पेड़ किसी का संगी-साथी और आत्मीय भी हो सकता है। वर्षों बाद कथाकार शेखर जोशी अपने गांव गए तो बचपन के संगी देवदारु को न देखकर उनके मन में ऐसी टीस उठी, मानों कोई आत्मीय बिछड़ गया हो-

हिमालय के आंगन का वन-प्रांतर! और उस सघन हरियाली के बीच खड़ा वह अकेला देवदारु! खूब सुंदर, छरहरा और सुदीर्घ!  सहस्रों लंबी-लंबी बांहें पसारे हुए। तीखी अंगुलियां और कलाइयों में काठ के कत्थई फूल पहने हुए। ऐसा था हमारा दारुवृक्ष- एकाकी देवदारु! हमारी भाषा के आत्मीय संबोधन में ‘एकलु द्यार!’
वृक्ष और भी कई थे। कोई नाटे, झब्बरदार। कोई घने, सुगठित और विस्तृत। कोई दीन-हीन मरभुखे, सूखे-ठूंठ से। बांज, फयांट, चीड़, बुरांश और पांगर के असंख्य पेड़। समस्त वनप्रांतर इस वनस्पति परिवार से भरा-पुरा रहता था- वर्ष-वर्ष भर, बारहों मास, छहों ऋतुओं में।
देवदारु के वृक्ष भी कम नहीं थे। समीप ही पूरा अरण्य ‘दारु-वणि’ के नाम से प्रख्यात था। हजारों-हजार पेड़ पलटन के सिपाहियों की मुद्रा में खड़े हुए। कभी ‘सावधान’ की मुद्रा में देवमूर्ति से शांत और स्थिर तो कभी हवा-वातास चलने पर सूंसाट-भूंभाट करते साक्षात् शिव के रूप में तांडवरत। लेकिन हमारे ‘एकाकी देवदारु’ की बात ही और थी। वह हमारा साथी था, हमारा मार्गदर्शक था। ‘दारुवणि’ जहां समाप्त हो जाती, वहां से प्राय: फर्लांग भर दूर, सड़क के मोड़ पर झाड़ी-झुरमुटों के बीच वह अकेला अवधूत-सा खड़ा रहता था। जैसे, कोई साधु एक टांग पर तपस्या में मग्न हो।
सुबह-सुबह पूरब में सूर्य भटकोट की पहाड़ी के पार आकाश में एक-दो हाथ ऊपर पहुंचते तो उसका प्रकाश पर्वत शिखरों के ऊपर-ऊपर सब ओर पहुंच जाता था। एकाकी दारु के शीर्ष में प्रात: का घाम केसर के टीके से अभिषेक कर देता। रात से ही पाटी में कालिख लगा, उसे घोंट-घाट, कमेट की दावात, कलम और बस्ता तैयार कर हम लोग सुबह झटपट कलेवा कर अपने प्राइमरी स्कूल के पंडितजी के डर से निकलते। गांव भर के बच्चे जुटने में थोड़ा समय लग ही जाता था और कभी-कभार किसी अनखने-लाड़ले के रोने-धाने, मान-मनौवल में ही किंचित विलम्ब हो जाता तो मन में धुकुर-पुकुर लग जाती कि अब पंडितजी अपनी बेंत चमकाएंगे। आजकल की तरह तब घर-घर में न रेडियो था, न घड़ी। पहाड़ की चोटी के कोने-कोने में घाम उतर आया तो सुबह होने की प्रतीति हो जाती थी। ऐसे क्षणों में स्कूल के रास्ते में हमारी भेंट होती थी ‘एकाकी दारु’ से। वही हमको बता देता था कि अब ‘हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए’ प्रार्थना शुरू हो गई होगी। कि अब गोपाल सिंह की दुकान से हुक्के का आखिरी कश खींचकर मास्टर साहब कक्षा में आ गए होंगे।
‘एकाकी दारु’ के माथे पर केसर का नन्हा टीका देखकर हम निश्चिंत हो जाते थे कि अब ठीक समय पर प्रार्थना में पहुंच जाएंगे। यदि बालिश्त भर घाम की पीली पगड़ी बंध गई तो मन में धुकुर-पुकुर होने लगती थी और हम पैथल की घाटी के उतार में बेतहाश दौड़ लगा देते थे और यदि किसी दिन दुर्भाग्य से सफेद धूप का हाथ भर चौड़ा दुशाला एकाकी दारु के कंधे में लिपट जाता था तो हमारे पांव न स्कूल की ओर बढ़ पाते थे, न घर की ओर लौट पाते थे। किसी कारण घर से स्कूल की और प्रस्थान करते हुए हम मन ही मन ‘एकाकी दारु’ से मनौतियां मनाते कि वह केसर का टीका लगाए हमें मिले।
सांझ को स्कूल से लौटते समय चीड़ के ठीठों को ठोर मारते, हिसालू और किलमौड़े के जंगली फलों को बीनते-चखते, पेड़ों के खोखल में चिडिय़ों के घोंसलों को तलाशते, थके-मांदे ‘दारुवणि’ की चढ़ाई पार कर जब हम ‘एकाकी दारु’ की छाया में पहुंचते तो एक पड़ाव अनिवार्य हो जाता था। कोई-कोई साथी उसकी नीचे तक झुकी हुई बांहों में लेट कर झूलने लगता। कोई उसकी पत्तियों के ढेर पर फिसलने का आनंद लेता। सुबह शाम का ऐसा संगी था हमारा ‘एकाकी दारु’।
वर्षा बाद मैं उसी मार्ग से गांव लौट रहा था। जंगलात की बटिया अब मोटर सड़क बन गई है। परंतु जिस समय उस मोड़ पर सड़क को चौड़ा करने के लिए निर्माण विभाग वाले एकाकी दारु को काट रहे होंगे, रस्सियां लगा कर उसकी जड़-मूल को निकालने का षडय़ंत्र रच रहे होंगे, उस समय शायद किसी ने उन्हें यह न बताया होगा कि यह स्कूली बच्चों का साथी ‘एकाकी दारुÓ है, इसे मत काटो, इसे मत उखाड़ों, अपनी सड़क को चार हाथ आगे सरका लो। शायद सड़क बनवाने वाले उस साहब ने कभी बचपन में पेड़-पौधों से समय नहीं पूछा होगा, उनकी बांहों पर बैठकर झूलने का सुख नहीं लिया होगा और सुबह की धूप के उस केसरिया टीके, पीली पगड़ी और सफेद दुशाले की कल्पना भी नहीं की होगी।
अब वहां सिर्फ एक सुनसान मोड़ है और कुछ भी नहीं।