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आज की कविता का परिदृश्य विविधता से भरा है: संतोष सहर

पटना : जन संस्कृति मंच की ओर से 5 जनवरी, 2012 को पटना में काव्यगोष्ठी आयोजित की गई। जसम राज्य कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में तीन पीढि़यों के ग्यारह कवियों ने कवितायें सुनाईं। एक ओर युवा पीढ़़ी के कुमार मुकुल और अरविंद श्रीवास्तव थे, तो दूसरी ओर नब्बे के दशक में कविता लेखन की शुरुआत करने वाले नवीन कुमार, सुधीर सुमन, राजेश कमल जैसे कवि थे। नई पीढ़ी के कवियों के प्रतिनिधि के रूप में कौशलेंद्र, प्रत्युष कुमार मिश्र, आसिया, आलिया, अंचित पांडेय, कृष्ण समिद्ध इस कवि गोष्ठी में मौजूद थे। खासकर नई पीढ़ी के कवियों ने हिन्‍दी कविता में नई सम्‍भावनाओं का संकेत दिया।

इंटरनेट के प्रचलन में आने के बाद कविता का जिन्‍दगी के साथ कैसा रिश्ता बना है, इसकी भी बानगी इस कविता पाठ में देखने को मिला। जो कवि अपनी कविताएयें साथ नहीं ला पाए थे, इंटरनेट उनके काम आया। नई पीढ़ी के कवियों में यह प्रवृत्ति आम है। किसी ने कहा भी कि फेसबुक जैसे साइटों ने कविता को नया जीवन दिया है। युवा हो रही कवि पीढ़ी का भी इंटरनेट के साथ सहज रिश्ता है। अरविंद श्रीवास्तव को कविता सुनाने में जितनी दिलचस्पी थी, उससे कहीं ज्यादा ब्लॉग सम्‍बन्‍धी सूचनाओं को साझा करने में थी। जाहिर है आज के संचार माध्यमों ने जिन सूचनाओं के भरमार के बीच हमें डाल दिया है, इससे हिन्‍दी कवि और उनकी कवितायें भी प्रभावित हुई है। व्यापक दुनिया की सूचनायें कविता में दाखिल हो रही हैं। हालाँकि इन सूचनाओं को अपनी पैनी निगाह से परखते हुए निरंतर सचेत वर्ग दृष्टि के अनुसार कविता रचने वाला मुक्तिबोध सरीखा कोई कवि सूचना साम्राज्य के पिछले दो दशकों में शायद नहीं आया है।

सूचना साम्राज्य ने हमें दर्शक और श्रोता की भूमिका में ला पटका है, एक दर्शक भाव की प्रतिक्रिया पिछले दो दशकों की कविताओं में ज्यादा नजर आती रही है। जाहिर है उसके जरिये जिस तरह के विमर्श और बहसें संचालित की जाती रही हैं, उसका भी असर हिन्‍दी कविता पर रहा है, अब इसकी खासियतें भी हैं और इसकी अपनी सीमायें भी हैं। अरविंद श्रीवास्तव की ‘राजधानी में एक उजबेक लड़की’, ‘आँखें’ (हुसैन को समर्पित), ‘मामूली आदमी का घोषणा-पत्र’, ‘एक डरी और सहमी दुनिया में’, ‘अंत में’, ‘पीठ’, ‘कंधा’ आदि कविताओं में से ज्यादातर कवितायें इस दौर की प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती लगीं। बौद्धिक मंथन और चिंतन का खुलकर अहसास दिलाने वाली कौशलेन्द्र की ‘अपव्यय’, ‘एक प्रारम्‍भ’, ‘बाघ’, ‘दलपति’, ‘राख का ढेर’ आदि में स्थिति थोड़ी भिन्न थी। उनकी कविताओं में इस सूचना साम्राज्य में मौजूद किसी विशिष्ट सूचना को अपने स्थानीय संदर्भों में एक प्रतीक की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की गई थी। कुमार मुकुल हमेशा की तरह समाज-राजनीति और संस्कृति की आम प्रवृत्तियों से बहस करने वाली मुद्रा में थे। असंतोष, तंज और झुंझलाहट भरा रोष उनके द्वारा पढ़ी गई तीनों कविताओं- ‘औफिशियल समोसे पर पलने वाले चूहे’, ‘ओ जनद्रोहियों’ और ‘बात करने की बीमारी’ में मौजूद थी। ऐसी कवितायें खुद रोष और असंतोष से भरे पाठक और श्रोता को भी राहत प्रदान करती हैं। नवीन कुमार की कविता ‘एक नवजात के प्रति’ और सुधीर सुमन की ‘हमें जो तय करना है’, ‘स्वप्न’, ‘उन्हें मत बताना’ व्यवस्था के अनुकूलन के विरुद्ध व्यक्ति की मुक्ति की जद्दोजहद की अभिव्यक्ति लगीं। इनकी कवितायें वैचारिक आग्रह वाली कवितायें थीं। वैचारिक आग्रह तो राजेश कमल की ‘मुंबई’, ‘अच्छे लोग’, ‘सत्येन्द्र दुबे की ओर से’, ‘ईश्वर के हाथ’ आदि कविताओं में भी था, पर उनमें विचार के बजाय स्थितियाँ ज्यादा मुखर थीं। छोटी दृष्टांत कथाओं जैसी इन कविताओं को काफी पसंद भी किया गया। प्रत्युष कुमार मिश्र की ‘ढेंकी’, ‘कौवे और मोबाइल’ और ‘दिल्ली में’ कवितायें अपने देशज अंदाज और विषयवस्तु के कारण काफी सराही गईं। कृष्ण समिद्ध ने अपनी याददाश्त के आधार पर कुछ छोटी कवितायें सुनाईं।

आसिया की ‘उलझी सी तुम’, ‘रात’, ‘For You, Beloved Death’, आलिया अफजल की ‘Walls Of Pastry Shop8’ और एक शीर्षकविहीन कविता तथा अंचित की ‘अजायबघर’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘बस इतना करना समय’, ‘तुम्हारा शहर सपनों का शहर’, ‘Remembering Enna’ आदि कविताओं में नई पीढ़ी की कविता के वैचारिक सरोकार का परिचय मिला, जिसमें आसपास के समाज और सम्‍बन्‍धों के प्रति उनका नजरिया तो था ही, कुछ शाश्वत सवालों और प्रवृत्तियों को जानने-समझने और उनमें अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश भी थी। अपने तईं काफी संतुलित रचाव वाली कविताएयें इन कवियों के बेहतर भविष्य का परिचय देती लगीं।

काव्यगोष्ठी में पढ़ी गई कविताओं पर बोलते हुए आलोचक संतोष सहर ने कहा कि नई पीढ़ी के कवियों की कवितायें काफी उम्मीद बंधाने वाली हैं। पुरुष और स्त्री दृष्टि में जो भिन्नता होती है, वह भी इनकी कविताओं में जाहिर हुआ। संतोष सहर ने कहा कि कवितायें आज भी बड़े पैमाने पर लिखी जा रही हैं, कई पीढि़याँ आज कविता लेखन में सक्रिय हैं। आज की कविता का परिदृश्य काफी विविधता से भरा है। जरूरत यह है कि संगठन इन्हें एक मंच पर ले आएं, ताकि कवि एक-दूसरे से भी सीखें और पाठकों व श्रोताओं के सामने भी अपने समय की कविता अपनी संपूर्णता में आ सके। संतोष सहर ने कविता में भाषा, विषय और विचार के स्तर पर सहजता की जरूरत पर भी जोर दिया। काव्य-गोष्ठी का संचालन राजेश कमल ने किया। इस मौके पर संतोष झा, अभ्युदय, समता, अभिनव, संजीव, निखिल आदि मौजूद थे।

शासकवर्ग जिन सच्चाइयों पर पर्दा डाल रहा है, उसे सामने ला रहा प्रतिरोध का सिनेमा: कुंदन शाह

पटना : ‘‘प्रतिरोध का सिनेमा एक ऐसा समारोह है जो हमारी व्यथा और हमारी आवाज को पर्दे पर लाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकतंत्र की हिफाजत जैसी थीम पर पूरी दुनिया में इस तरह का फिल्मोत्सव शायद ही आयोजित होता हो। वैश्विक स्तर पर ऐसी जनप्रतिबद्ध फिल्मों के समारोह कम ही होते हैं। फिल्मों के जरिये यह बेहद जरूरी कोशिश उन सच्चाइयों को सामने लाने की है, जिस पर शासकवर्ग पर्दा डाल देना चाहता है या जिनको हमसे छिपाना चाहता है।’’ जन संस्कृति मंच-हिरावल द्वारा कालिदास रंगालय में 2 से 4 दिसम्‍बर तक आयोजित तीसरे प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव का उद्घाटन करते हुए प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक कुंदन शाह ने ये विचार व्यक्त किए। कुंदन शाह ने कहा कि हमारी व्यक्तिगत समस्याएं भी व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि वे सबकी समस्या हैं, हमारी, हमारे समाज और देश की समस्यों की असली वजहों को हमसे छिपाया जा रहा है। टेलिविजन और न्यूज चैनल को भी उन सच्चाइयों और वजहों को दिखाने नहीं दिया जाता। कारपोरेट जिस तरह हमारी प्राकृतिक सम्पदा को हड़प रहे हैं, वह बेहद खतरनाक है। कुपोषण, भूख, भ्रष्टाचार और लूट आदि समस्याओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बेशक ज्यादातर लोग शिकार हैं और इस व्यवस्था में फँसे हुए हैं, पर यह ऐसा वक्त है जब सच को जानना जरूरी है। यह जानना जरूरी है कि इराक, लिबिया पर कब्जे के पीछे की सच्चाइयाँ क्या हैं और हमारे बुनियादी मुद्दों की सरकारों द्वारा उपेक्षा और उनके कारपोरेट प्रेम की वजहें क्या हैं। कुंदन शाह ने जर्मनी में नाजी सत्ता के खिलाफ लिखे गई मार्टिन निमोलर की चर्चित कविता- पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए/मैं चुप था, क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था/फिर वे ट्रेड यूनियनिस्टों के लिए आए, मैं चुप था, क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनिस्ट नहीं था/फिर वे यहूदियों के लिए आए, मैं चुप था, क्योंकि मैं यहूदी नहीं था/अन्‍त में वे मेरे लिए आए और मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था, सुनाते हुए कहा कि ऐसा माहौल न हो, इसके लिए जनता को हर मोर्चे पर प्रतिरोध करना होगा और व्यापक एकता बनानी होगी।

फिल्मोत्सव स्वागत समिति के अध्यक्ष बीबीसी के बिहार संवाददाता वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने दर्शकों और अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि जिस राज्य में भ्रष्टाचार का ग्राफ सभी राज्यों से ऊँचा है, जिस राज्य में प्रतिरोध शासन को कतई पसन्‍द नहीं है, वहाँ प्रतिरोध का सिनेमा का आयोजन जनता की ताकत को बढ़ाने वाला कदम है।

प्रतिरोध का सिनेमा फिल्मोत्सव के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि जो बड़ी पूंजी द्वारा संचालित माध्यम हैं, वे जनता को भ्रमित कर रहे हैं और उसे अकेला कर रहे हैं, लेकिन प्रतिरोध का सिनेमा की कोशिश यह है कि दुनिया भर में मनुष्य के पक्ष में निर्मित सिनेमा को व्यापक जनता तक ले जाया जाए, उसकी सामूहिकता को ताकत प्रदान किया जाए।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए मशहूर कवि आलोकधन्वा ने कहा कि पूंजीवाद ने जो चमकीला मुखौटा लगा रखा है, उसको उतारकर उसके असली चेहरों को दिखाने का प्रयास है प्रतिरोध का सिनेमा। जिस राज्य में परिवर्तन के लिए लहू बहाने वालों को पीछे धकेलकर जनता के हित का पाखंड रचा जा रहा हो, वहाँ ऐसे फिल्मोत्सव का आयोजन स्वागत योग्य है, जिनमें दिखाई जाने वाली फिल्मों में पूरे तंत्र का असली चेहरा नजर आता है। इस मौके पर मंच पर अर्थशास्त्री नवलकिशोर चौधरी, इतिहासकार प्रो. डेजी नारायण, कवि मदन कश्यप, पत्रकार अग्निपुष्प, फिल्म सोसाइटी आन्‍दोलन से जुड़े आर.एन. दास और कवयित्री प्रतिभा भी मौजूद थीं। संचालन जसम की राष्ट्रीय पार्षद समता राय ने किया।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश के दौर में जाने भी दो यारोंका प्रदर्शन

फिल्म प्रदर्शन की शुरुआत कुंदन शाह की सर्वाधिक चर्चित फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ की प्रस्तुति से हुई। 1983 में प्रदर्शित यह फिल्म आज की राजनीति, नौकरशाही और पत्रकारिता में पैदा हुए भीषण भ्रष्टाचार की भविष्यवाणी सी करती लगती है। आज जबकि व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले और उसके संरक्षक भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का पाखंड करते हैं, तब इस फिल्म को देखना अपने आप में पूरे भ्रष्ट तंत्र के बारे में गम्‍भीरता से सोचने को विवश करता है। आज कामेडी के नाम पर जो भौंडापन परोसा जा रहा है, उसे भी यह फिल्म आईना दिखाती लगी। दर्शकों की कुंदन शाह के साथ विचारोत्तेजक बातचीत भी हुई।‘जाने भी दो यारो’ के अंत और शीर्षक को लेकर भी दर्शकों ने सवाल किए। कुंदन शाह ने कहा कि वह अमिताभ की फिल्मों की तरह भ्रष्टचारियों को गोली मार देने वाली फिल्में नहीं बना सकते, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार का अन्‍त नहीं हो सकता। ‘जाने भी दो यारो’ में भ्रष्ट ठेकेदार को जीतते हुए दिखाना या सत्य हमेशा जीतता है और बुराई हारती है, इस धारणा पर व्यंग्य करते हुए दिखाना उनके पक्ष में नहीं है, बल्कि फिल्म का मकसद यह है कि दर्शक इस परिस्थिति के बारे में सोचने को विवश हों और इसे बदलने के रास्ते की तलाश करें।

स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक पूंजीवादी शोषण और भ्रष्टाचार का यथार्थ नजर आया

पटना फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत भारतीय सिनेमा इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण फिल्म ‘नीचा नगर’ के प्रदर्शन से हुई। पूंजीवादी व्यवस्था में मौजूद भीषण शोषण, अथाह पाखंड और जनकल्याण के दावों की आड़ में छिपी स्वार्थलिप्सा का पर्दाफाश करने वाली इस फिल्म को मशहूर फिल्म निर्देशक चेतन आनंद ने बनाया था। 1946 में बनी इस फिल्म ने प्रतिष्ठित कान्स फिल्मोत्सव में बेस्ट फिल्म का ग्रांडप्रिक्स पुरस्कार प्राप्त किया था।यह भारतीय सिनेमा में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थवाद की शुरुआत करने वाली फिल्म मानी जाती है। इतने वर्ष बाद भी इस फिल्म को देखते हुए यह स्पष्ट महसूस होता है कि ब्रिटिश हुकूमत ने इसे क्यों प्रतिबंधित किया होगा। पूंजीवादी सत्ता के जनकल्याण के पाखंड को यह आज भी बड़ी कारगर तरीके से उजागर करती है। ‘नीचा नगर’ उन गरीब और अभावग्रस्त लोगों की बस्ती है, जिसके लोग म्यूनिस्पिल कारपोरेशन पर काबिज एक अमीर द्वारा इमारतें बनाने के लिए गंदे नाले को बस्ती की ओर मोड़ देने से बीमारी की चपेट में हैं। वे चाहते हैं कि नाला जिधर पहले बहता था, उधर ही उसका रुख किया जाए। लेकिन विरोध करने पर उनके इलाके में पानी की सप्लाई को खत्म कर दिया जाता है, इलाज के लिए अस्पताल बना दिया जाता है, लेकिन बीमारी की वजह नाले को हटाया नहीं जाता। नगर का जो पूरा तंत्र है, उसमें शामिल लोगों के अपने-अपने स्वार्थ हैं। जो जनता को अपने हक के लिए संगठित करते हैं, यह तंत्र उन्हें ही जनविरोधी साबित करने की कोशिश करता है, लेकिन नीचा नगर के लोगों का संघर्ष जारी रहता है और उनकी अन्‍त में जीत होती है।

बीजू टोप्पो और मेघनाथ द्वारा निर्देशित डाक्यूमेंटरी ‘विकास बंदूक की नाल पर’ ‘नीचा नगर’ की परंपरा को ही आज के संदर्भों में आगे बढ़ाते हुई प्रतीत हुई। उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जिस तरह विकास के नाम पर कारपारेट कंपनियाँ, सरकार और पुलिस बर्बरतापूर्ण तरीके से जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों के हक से बेदखल कर रही हैं, यह डाक्यूमेंटरी इसी का पर्दाफाश करती है। इसी तरह अमरीकी निर्देशिका एनी लियोनार्ड की ‘दी स्टोरी ऑफ स्टफ’ में लोकसंस्कृति पर उपभोक्तावाद के विनाशकारी प्रभावों को उजागर करने वाली फिल्म थी। माइकल मूर की बहुचर्चित डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘फारेनहाइट 9/11’ को देखते हुए पूंजीवादी व्यवस्थाओं और कारपोरेट कंपनियों के सरगना अमेरिका के बर्बर सैन्य रणनीति के मकसद को दर्शकों ने बखूबी समझा। उन्होंने महसूस किया कि अमेरिका के लिए लोकतंत्र और इंसाफ शब्द सिर्फ पाखंड है। अपने फायदे और मुनाफे के लिए उसने इराक पर हमला किया था। पूंजीवादी व्यवस्थाओं के जरिये न लोकतंत्र को बचाया जा सकता है और न ही मनुष्य को, इसे इन फिल्मों ने स्पष्ट किया। इस तरह से ‘नीचा नगर’ के म्युनिस्पल कारपोरेशन से लेकर विश्व साम्राज्यवाद तक शोषण, भ्रष्टाचार, छल और दमन का तो तार जुड़ता है, उसे दर्शकों ने बड़ी सहजता से समझा। निश्चित तौर पर ये लोगों की राजनीतिक समझदारी को बढ़ाने वाली और सच्चे जनतंत्र के लिए एकजुट होने की उन्हें प्रेरणा देने वाली फिल्में थीं।

फिल्म हमारी जिंदगी के यथार्थ को पेश करने वाली एक कला है, महज बाजारू प्रोडक्ट नहीं

प्रतिरोध का सिनेमा में दिखाई जाने वाली फिल्मों ने यह साबित किया कि फिल्में महज उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों के प्रचार का माध्यम नहीं हो सकतीं। फिल्म अंततः एक कला माध्यम है और विचार व यथार्थ से उसका गहरा नाता होता है। एक अच्छा फिल्मकार प्रकृति और मनुष्य की जिन्‍दगी के प्रति उत्तरदायी होता है, वह बाजार की बंदिशों का अतिक्रमण करता है। बर्ट हांसरा की फिल्म ‘ग्लास’ मानो इस बात का सटीक उदाहरण थी। गये तो थे वे कांच उद्योग पर एक विज्ञापन फिल्म बनाने, लेकिन कांच से निर्मित होती बोतलों में छिपी कलात्मकता को उन्होंने अपनी डाक्यूमेंटरी में दर्ज किया और यह बेहद प्रभावशाली फिल्म मानी गई। हांसरा की अद्भुत कलादृष्टि से रूबरू होना पटना के फिल्म दर्शकों के लिए अनोखा अनुभव था।

हांसरा की ही दूसरी फिल्म ‘जू’, जो एक मूक फिल्म है, उसमें भी इस निर्देशक की प्रयोगशीलता और विलक्षण कलात्मक नजरिये को लोगों ने बखूबी महसूस किया। बेशक इन फिल्मों ने दर्शकों को एक नए कलात्मक आस्वाद और यथार्थबोध से जोड़ा। एंब्रॉस बीयर्स की लघुकथा पर आधारित फिल्म ‘ऍन अकरेंस ऑफ आउल क्रीक ब्रिज’ भी इसी श्रेणी की फिल्म थी, जिसमें युद्ध के दौरान फाँसी की सजा पाये एक ऐसे किसान के मन में झाँकने की कोशिश की गई है, जो वहाँ से भाग जाने का सपना देखता है।

मैं तुम्हारा कवि हूं: एक साधारण आदमी की असाधारण गाथा

युवा फिल्मकार नितिन पमनानी की फिल्म ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ जनकवि विद्रोही की जिन्‍दगी और कविताओं पर आधारित फिल्म है, जो देखने में बिल्कुल साधारण लगते हैं, पर उनकी जिन्‍दगी असाधारण है। दिल्ली से लेकर बिहार तक जनता और उसके आंदोलनों से जुड़े लोग उनकी कविताओं के दीवाने हैं। वह कवितायें लिखते नहीं, बल्कि कहते हैं। सुविधाहीनता के बावजूद उनकी मस्ती, बेबाकी एवं विद्रोही तेवर को इस फिल्म ने बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया। फिल्म के सहनिर्देशक इमरान ने बताया कि वह वामपंथी छात्रनेता चंद्रशेखर के जीवन पर आधारित फिल्म ‘एक मिनट का मौन’ से प्रभावित होकर डाक्युमेंटरी निर्माण से जुड़े। अपने युवा साथियों के साथ मिलकर ‘डिजाल्व स्टूडियो’ की स्थापना की और आजकल प्रतिरोध का सिनेमा आंदोलन और दिल्ली फिल्म अर्काइव्स में सक्रिय हैं। उनसे दर्शकों ने विद्रोही पर फिल्म बनाने की जरूरत और फिल्म के राजनीतिक सरोकार को लेकर कई सवाल भी किए। जनकवि विद्रोही के बारे में जेएनयू से आए मार्तंड ने भी अनुभव दर्शकों से साझा किए।

भारतीय जनता के आक्रोश की संगठित अभिव्यक्ति

भारत में आज मौजूदा तंत्र किस तरह जनता के संवैधानिक-लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर रहा है, यह पटना फिल्मोत्सव के आखिरी दिन पी. बाबूराज व सी. शरतंचद्र निर्देशित मलयालम फिल्म ‘1000 डेज एंड अ ड्रीम’,  अजय टीजी की ‘अंधेरे से पहले’ और हाओबम पबन कुमार की फिल्म ‘ए एफ एस पी ए 1958’ में अत्यंत प्रभावशाली तरीके से नजर आया। ‘1000 डेज एंड अ ड्रीम’ में कोकाकोला कंपनी के साथ उद्योगपतियों, मीडिया और राजनीतिक पार्टियों की साठगाँठ के विरुद्ध ग्रामीणों की मुहिम को दर्शाया गया है। ‘अंधेरे से पहले’ छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में जिंदल थर्मल प्लांट द्वारा जमीन हड़पे जाने के खिलाफ आदिवासी किसानों के सतत संघर्ष को सामने लाने वाली फिल्म थी। इन फिल्मों को देखते हुए पटना के दर्शकों ने महसूस किया कि आज की व्यवस्था के छल और साजिशों का जैसा सामना वे खुद कर रहे हैं या आसपास के समाज में जो जनविरोधी घटनायें घट रही है, वैसी ही परिस्थितियाँ देश के दूसरे हिस्सों में भी है। फिल्मोत्सव की आखिरी फिल्म ‘ए एफ एस पी ए 1958’ में दर्शकों ने मणिपुर में विशेष सशस्त्र बल अधिनियम की आड़ में आम जनता के शांतिपूर्ण जनांदोलनों के बर्बर दमन के सच को देखा। यह सच्चाई बेहद विचलित करने वाली और आक्रोश से भरने वाली थी। यह फिल्म उस राष्ट्रवाद पर भी सवाल खड़ा करती है, जिसके पहरुए देश के ही एक भाग की जनता पर बर्बर अत्याचार करते हैं और देश के शेष हिस्से के लोगों तक उस दमित-उत्पीडि़त जनता की आवाज को पहुँचने नहीं देते या विरोध करने वाली जनता को उग्रवादी व आतंकवादी के तौर पर प्रचारित करते हैं। इस तरह ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ फिल्मोत्सव दमित-उत्पीडि़त जनता की व्यथा और आक्रोश को देश के दूसरे हिस्सों की जनता की पीड़ा और गुस्से से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता लगा। आज का सिनेमा किस तरह जनसंघर्षों को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा सकता है और किस तरह व्यापक जनांदोलन का वाहक हो सकता है, इसे उड़ीसा में खनन कंपनियों से अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासियों पर सूर्यशंकर दास द्वारा बनाई गई छोटी-छोटी फिल्मों ने बखूबी जाहिर किया। यह संघर्ष के बीच रहकर बनाई गई फिल्में हैं। फिल्मकार ने आदिवासी नौजवानों को भी कैमरे थमा दिए हैं और उनके जरिये औद्योगिक प्रदूषण, पुलिसिया बर्बरता, राजनीतिक साजिश, गैरकानूनी बेदखली की वह सच्चाई सामने आ रही है, जिसे आज की मीडिया में सामने नहीं आने दिया जाता। दरअसल छल, भ्रष्टाचार और पाखंड पूंजीवाद की जन्मजात खासियत होती है। मानवीय सम्‍बन्‍धों के स्तर पर भी पूंजीवाद इसी तरह की प्रवृत्तियों को बढ़ाता है, आखिरी दिन दिखाई गई 7 मिनट की फिल्म ‘प्राइसलेस’ इसी का साक्ष्य लगी।

तीसरे प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव’ का समापन ‘हम होंगे कामयाब’ गीत के गायन से हुआ। फिल्मोत्सव आयोजन समिति के सारे सदस्य और कार्यकर्ता इस दौरान मंच पर मौजूद थे।

पटना फिल्मोत्सव में देवानंद को श्रद्धांजलि दी गई

पटना फिल्मोत्सव के आयोजन के दौरान ही विख्यात अभिनेता देवानंद के निधन की सूचना मिली। एक मिनट का मौन रखकर उन्हें भावभीनी श्रद्धाजंलि दी गई। फिल्मोत्सव के मुख्य अतिथि निर्देशक और पटकथा लेखक कुंदन शाह ने कहा कि देवानंद अपने आप में अद्वितीय अभिनेता थे। उनकी फिल्म ‘गाइड’ के सारे चरित्र परंपराओं को तोड़ने वाले चरित्र हैं। उन्होंने फिल्म उद्योग में पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों के प्रति उनके गहरे संबंधों की चर्चा की तथा बताया कि उन्होंने कई लोगों को फिल्मों में जगह दी। कुंदन शाह ने कहा कि वह हमारे लिए हमेशा युवा थे, शारीरिक रूप से न होने के बावजूद वह हमारे लिए हमेशा युवा ही बने रहेंगे।

‘समकालीन जनमत’ के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि देवानंद पिछली चार पीढि़यों के प्रिय कलाकार थे। उनकी जीवन शैली और पर्दे पर निभाए गए उनके किरदार आज भी नौजवान पीढ़ी की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते लगते हैं। हिंदुस्तानी समाज में परंपरागत मूल्यों और आधुनिकता के बीच का जो द्वंद्व है, वह आज भी जारी है और देवानंद आधुनिकता और आजादी की आकांक्षा को अभिव्यक्ति देने वाले फिल्मकार और अभिनेता हैं। वह जिन्‍दगी के रोमांस और जीवंतता को आवेग देने वाले अभिनेता थे। फिल्म प्रदर्शन के दौरान देवानंद की स्मृति में उनकी मशहूर फिल्म ‘गाइड’ के अंश दिखाए गए।

प्रस्‍तुति : सुधीर सुमन

जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हो गया। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए 25 को उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद सहित तमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी, 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना वि‍श्‍वविद्यालय से 1962 में एम.ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। वि‍श्‍वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने पीएचडी बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से भी वह जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के वह स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने यह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्‍वास रखने वाले रचनाकार थे। वह मानते थे कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वह जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वह उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वह जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के पहले सचिव थे। वी क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नाम से उनका कहानी संग्रह 2005 में भावना प्रकाशन से प्रकाशि‍त हुआ। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’ छपकर आयी थी। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है, उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वह अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन और केदार जन्तशती आयोजन के वह मुख्य कार्यकर्ता थे।

उनके निधन पर शोक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रशेखर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सर्जानात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमें इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।

विनायक सेन कि रिहाई के लिए बिहार में प्रदर्शन

नई दि‍ल्‍ली: सुप्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक डॉक्टर विनायक सेन की रिहाई की मांग के समर्थन में बिहार में जन संस्कृति मंच की पटना, बेगूसराय और समस्तीपुर इकाइयों ने अन्य लोकतान्त्रिक संगठनों के साथ मिलकर सडकों पर उतर कर आवाज़ बुलंद की है।

26 दि‍सम्‍बर को जसम, हिरावल और आइसा  ने मिलकर पटना के बीएन कॉलेज गेट से प्रतिरोध मार्च निकाला, जो शहीद भगत सिंह चौक पर पहुँच कर सभा में तब्दील हो गया। जसम के पूर्व महासचिव और कवि महेश्‍वर के स्मृति-दिवस को ‘दमन विरोधी दिवस’ के रूप में मनाते हुए यह मार्च निकाला गया। मार्च का नेतृत्व जसम के राज्य सचिव संतोष झा, हिरावल की समता, आइसा बिहार के संयुक्त सचिव परवेज़, मार्कंडेय, राहुल, इफ़्तेख़ार, हिमांशु, मुशर्रफ आदि ने कि‍या। वक्ताओं ने कहा कि देश में लोकतंत्र का प्रश्‍न फिर से एक प्रमुख प्रश्‍न बन गया है। डॉक्टर सेन को दी गयी उम्र क़ैद की सज़ा देश भर में लोकतान्त्रिक आवाजों का दमन करने की सरकारी साजिशों का हिस्सा है। डॉक्टर सेन को फ़ौरन रिहा करने की जोरदार मांग करते हुए उन्होंने बिहार में पिछले दिनों संपन्न विधानसभा चुनावों में भाजपा की भारी जीत और भाजपाइयों द्वारा इसे हिंदुत्व की जीत बताये जाने की याद दिलाते हुए लोगों से इन सांप्रदायिक फांसीवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट होने की भी अपील की। विदित हो कि छत्तीसगढ़ में भी भाजपा कि हुकूमत है, जहाँ डॉक्टर सेन को सज़ा सुनाई गयी है।

30 दिसम्‍बर को बेगूसराय में जसम, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, fact, नटकिया, आशीर्वाद संगठनों की तरफ से रामधारी सिंह दिनकर चौक से शहीद चौक तक कैंडल मार्च निकाला गया। बैनर पर ‘protest against conviction of dr vinayak sen’ लिखा हुआ था। इस मार्च का नेतृत्व जसम के राज्य उपाध्यक्ष दीपक सिन्हा, जलेस के जिला अध्यक्ष भगवान प्रसाद सिन्हा, रंगकर्मी प्रवीण कुमार गुंजन, आर टी राजन, दीनानाथ, अविनाश अशेष, अभिजीत आदि कर रहे थे।

1 जनवरी, 2011 को समस्तीपुर में जसम, revolutionary youth assoiation और आइसा ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ मार्च निकाला। यह मार्च रंगकर्मी सफ़दर हाशमी के शहादत दिवस पर लेनिन आश्रम से निकल कर शहर के प्रमुख मार्गों से गुज़रते हुए शहीद भगत सिंह चौक पर पहुंचा। ‘डॉक्टर विनायक सेन को ससम्मान रिहा करो’, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन बंद करो’, ‘तमाम काले कानून रद करो’ आदि नारे लगाते हुए सौ से अधिक लोगों ने जुलूस में हिस्सा लिया। चौक पर पहुंचकर जुलूस सभा में परवर्तित हो गया। सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर सुरेन्द्र प्रसाद ने की. प्रमुख वक्ताओं में जसम के जिला अध्यक्ष और ‘समकालीन चुनौती’ के संपादक प्रोफ़ेसर सुरेन्द्र सुमन, इनौस के जिला सचिव सुरेन्द्र कुमार सिंह, आइसा के जिला संयोजक अर्विन्दानंद, डॉक्टर खुर्शीद, प्रोफ़ेसर उमेश कुमार, फूलबाबू सिंह, कृष्ण बालक महतो आदि थे।

यथार्थ को सामने लाती है कला : शाजी एन. करुन

पटना : ‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्संबंध का दृश्य रूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है। चीजों, घटनाओं या परिस्थितियों और सही-गलत मूल्यों की गहरी समझदारी, बोध और ज्ञान से ही यह विवेक निर्मित होता है। हम जिस यथार्थ को देख सकते हैं या देखना चाहते हैं, कला उसे ही सामने रखती है।’ ये बातें प्रसिद्ध फ़िल्मकार शाजी एन करुन ने जसम-हिरावल द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित त्रिदिवसीय पटना फ़िल्मोत्सव- प्रतिरोध का सिनेमा का उद्घाटन अवसर पर कहीं। समारोह 4, 5 और दि‍संबर को आयोजि‍त कि‍या गया था।
उद्घाटन से पूर्व मीडियाकर्मियों से एक मुलाकात में फ़िल्मोत्सव के मुख्य अतिथि शाजी एन. करुन ने कहा कि सिनेमा हमारी स्मृतियों को उसके सामाजिक आशय के साथ दर्ज करता है। सिनेमा अपने आप में एक बड़ा दर्शन है। लेकिन हमारे यहां इसका सार्थक इस्तेमाल कम हो हो रहा है। हमारे देश में करीब 1000 फिल्में बनती हैं लेकिन दुनिया के फ़िल्म समारोहों में चीन, वियतनाम, कोरिया, मलेशिया और कई छोटे-छोटे देशों की फ़िल्में हमसे ज्यादा दिखाई पड़ती हैं, इसलिए कि वे उन देशों के जीवन यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं और उन्हें सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं बनाया जाता।
अपनी फ़िल्म कुट्टी स्रांक के लिए श्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय सम्मान पाने वाले शाजी एन. करुन ने कहा कि आस्कर अवार्ड वाली फ़िल्में पूरी दुनिया में दिखाई जाती हैं, जबकि नेशनल अवार्ड पाने वाली फ़िल्में इस देश में ही दिखाई नहीं जातीं। अब तक वे छह बड़ी फ़िल्में बना चुके हैं और उनके लिए यह पहला मौका है कि बिहार में जनता के प्रयासों से हो रहे फ़िल्मोत्सव में उनकी एक फ़िल्म दिखाई जा रही है। इस तरह के प्रयास राख में दबी हुई चिंगारी को सुलगाने की तरह हैं। शाजी ने कहा कि आर्थिक समृद्धि से भी कई गुना ज्यादा जरूरी सांस्कृतिक समृद्धि है। आज किसी भी आदमी को अपनी दस यादें बताने को कहा जाए तो वह कम से कम एक अच्छी फ़िल्म का नाम लेगा। लेकिन बालीवुड की मुनाफा वाली फ़िल्मों और टेलीविजन में जिस तरह के कार्यक्रमों की भीड़ है, उसके जरिए कोई सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हो सकता। आज जरूरत है कि सिनेमा को सामाजिक बदलाव के माध्यम के बतौर इस्तेमाल किया जाए।
प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने बताया कि यह आयोजन देश में इस तरह का 16वां आयोजन है, जो बगैर किसी बडे़ पूंजीपति, सरकार या कारपोरेट सेक्टर की मदद के हो रहा है। फ़िल्मोत्सव स्वागत समिति की अध्यक्ष ‘सबलोग’ की संपादक मीरा मिश्रा ने कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की जरूरत है। प्रतिरोध का सिनेमा इसी लक्ष्य से प्रेरित है।

उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा ने कहा कि बहुमत हमेशा लोकतंत्र का सूचक नहीं होता, कई बार वह लोकतंत्र का अपहरण करके भी आता है। कला की दुनिया जिन बारीक लोकतांत्रिक संवेदनाओं के पक्ष में खड़ी होती है,कई बार वह बड़ी उम्मीद को जन्म देती है। हमारे भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों को पैदा करने में विश्व और देश की क्लासिक फ़िल्मों ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस वक्त अंधेरा बहुत घना है। इस अंधेरे वक्त में जनभागीदारी वाले ऐसे आयोजन उजाले की तरह हैं। वास्तविक लोकतंत्र के लिए वामपंथ का जो संघर्ष है, उससे अलग करके इस आयोजन को नहीं देखा जा सकता।

इतिहास की प्रोफेसर डा. भारती एस कुमार ने शाजी एन. करुन को गुलदस्ता भेंट किया। डा. सत्यजीत ने फ़िल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया। उद्घाटन सत्र के आखिर में कवि गोरख पांडेय की स्मृति में लिखे गए दिनेश कुमार शुक्ल के गीत ‘जाग मेरे मन मछंदर’ को हिरावल के कलाकारों ने गाया। मंच पर अर्थशास्त्री प्रो. नवल किशोर चौधरी, अरुण कुमार सिंह, पत्रकार अग्निपुष्प और कथाकार अशोक भी मौजूद थे।
दूसरे सत्र में शाजी एन. करुन की फिल्म कुट्टी स्रांक दिखाई गई। यह केरल के एक ऐसे नाविक की कहानी है जिसके जीवन का एकमात्र शौक चिविट्टु नाटकम (म्यूजिकल ड्रामा) है। उसका काम और उसका गुस्सैल स्वभाव उसे एक जगह टिकने नहीं देता। मनुष्य के सच्चे व्यवहार और सच्चे प्रेम के लिए उसकी अंतहीन प्रवृत्ति का प्रतिनिधि है वह। उसकी मृत्यु के बाद उसकी प्रेमिकाओं के जरिए उसका व्यक्तित्व खुलता है। फ़िल्म प्रदर्शन के बाद शाजी एन. करुन के साथ दर्शकों का विचारोत्तेजक संवाद हुआ।

दूसरे दिन फ़िल्म प्रदर्शन की शुरुआत अपनी मौलिक कथा के लिए आस्कर अवार्ड से नवाजी गई फ्रांसीसी फ़िल्म ‘दी रेड बलून’ से हुई। लेखक और निर्देशक अल्बर्ट लामोरेस्सी की इस फ़िल्म में बेहद कम संवाद थे। इसमें पास्कल नाम के बच्चे और उसके लाल गुब्बारे की कहानी है। गुब्बारा पास्कल के स्व से जुड़ा हुआ है। उस गुब्बारे को पाने और नष्ट कर देने के लिए दूसरे बच्चे लगातार कोशिश करते हैं। इस फ़िल्म को देखना अपने आप में बच्चों की फैंटेसी की दुनिया में दाखिल होने की तरह था। दूसरी फ़िल्म संकल्प मेश्राम निर्देशित ‘छुटकन की महाभारत’ थी। इस फिल्म में जब गांव में नौटंकी आती है तो उससे प्रभावित छुटकन सपना देखता है कि शकुनी मामा और दुर्योधन का हृदय परिवर्तन हो गया है और वे राज्य पर अपना दावा छोड़ देते हैं।

फ़िल्मोत्सव के दूसरे दिन दिखाई गई दो फ़िल्में अलग-अलग संदर्भों में धर्म और मनुष्य के रिश्ते की पड़ताल करती प्रतीत हुईं। राजनीति धर्म को किस तरह बर्बर और हिंसक बनाती है यह नजर आया उड़ीसा के कंधमाल के आदिवासी ईसाइयों पर हिंदुत्ववादियों के बर्बर हमलों पर बनाई गई फ़िल्म ‘फ्राम हिंदू टू हिंदुत्व’ में। उड़ीसा सरकार के अनुसार इन हमलों में 38 लोगों की जान गई थी, 3 लापता हुए थे, 3226 घर तहस-नहस कर दिए गए थे और 195 चर्च और पूजा घरों को नष्ट कर दिया गया था। 25,122 लोगों को राहत कैंपों में शरण लेनी पड़ी और हजारों लोग जो उड़ीसा और भारत के अन्य इलाकों में पलायन कर गए, उनकी संख्या का कोई हिसाब नहीं है। बाबरी मस्जिद ध्वंस की पूर्व संध्या पर दिखाई गई इस फ़िल्म से न केवल कंधमाल के ईसाइयों की व्यथा का इजहार हुआ, बल्कि भाजपा-आरएसएस की सांप्रदायिक घृणा और हिंसा पर आधरित राजनीति का प्रतिवाद भी हुआ।

सहिष्णु कहलाने वाले हिंदू धर्म के स्वघोषित ठेकेदारों के हिंसक कुकृत्य के बिल्कुल ही विपरीत पश्चिम बंगाल के मुस्लिम फकीरों पर केंद्रित अमिताभ चक्रवर्ती निर्देशित फ़िल्म ‘बिशार ब्लूज’ में धर्म का एक लोकतांत्रिक और मानवीय चेहरा नजर आया। ये मुस्लिम फकीर- अल्लाह, मोहम्मद, कुरान, पैगंबर- सबको मानते हैं। लेकिन इनके बीच के रिश्ते को लेकर उनकी स्वतंत्र व्याख्या है। इन फकीरों के मुताबिक खुद को जानना ही खुदा को जानना है।
पहाड़ को काटकर राह बना देने वाले धुन के पक्के दशरथ मांझी पर बनाई गई फ़िल्म ‘दी मैन हू मूव्ड दी मांउटेन’ फ़िल्मोत्सव का आकर्षण थी। युवा निर्देशक कुमुद रंजन ने एक तरह से उस आस्था को अपने समय के एक जीवित संदर्भ के साथ दस्तावेजीकृत किया है कि मनुष्य अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकता है। जिस ताकत की पूंजी और सुविधाओं पर काबिज वर्ग हमेशा अपनी प्रभुता के मद में उपेक्षा करता है या उपहास उड़ाता है, गरीब और पिछड़े हुए समाज और बिहार राज्य में अंतर्निहित उस ताकत के प्रतीक थे बाबा दशरथ मांझी। अकारण नहीं है कि इस फ़िल्म के निर्देशक को बाबा दशरथ मांझी से मिलकर कबीर से मिलने का अहसास हुआ।
सुमित पुरोहित निर्देशित फिल्म ‘आई वोक अप वन मार्निंग एंड फाउंड माईसेल्फ फेमस’ पूंजी की संस्कृति द्वारा मनुष्य को बर्बर और आदमखोर बनाए जाने की नृशंस प्रक्रिया को न केवल दर्ज करने, बल्कि उसका प्रतिरोध का भी एक प्रयास लगी। सुमित पुरोहित ने कालेज में अपने जूनियर दीपंकर की आत्महत्या और उस आत्महत्या को हैंडी-कैमरे में शूट करने वाले उसके बैचमेट अमिताभ पांडेय और उस दृश्य को बेचने वाली मीडिया के प्रसंग को अपनी फ़िल्म का विषय बनाया है। अमिताभ चूंकि शक्तिशाली घराने से ताल्लुक रखता था, जिसके कारण इस मामले को दबाने की कोशिश की गई, लेकिन चार वर्ष बाद सुमित और अन्य छात्रों ने उन तथ्यों को सामने लाने का फैसला किया, जिसकी प्रक्रिया में यह फ़िल्म भी बनी। इस फ़िल्म के सन्दर्भ में सबसे चौंकाने वाला तथ्य फ़िल्म के आख्रिर में स्क्रीन पर लिखे वक्तव्यों से पता चलता है। डाक्यूमेंटरी जैसे सरंचना वाली यह फ़िल्म वास्तव में एक कपोल कल्पना थी जिसका मकसद टी वी के सबकुछ देख लेने और कैद कर लेने पर अपनी टिप्पणी करना था.
अपने अस्तित्व की रक्षा के नाम पर सुविधाओं के भीषण होड़ में लगा पूरा समाज, खासकर मध्यवर्ग क्यों संवेदनहीन होता जा रहा है, क्यों वह मूल्यहीन और अमानवीय हो रहा है, युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन निर्देशित नाटक ‘समझौता’ ने इसका जवाब तलाशने को प्रेरित किया। आहुती नाट्य एकाडमी, बेगूसराय की इस नाट्य प्रस्तुति में मानवेंद्र त्रिपाठी ने अविस्मरणीय एकल अभिनय किया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित इस नाटक में मूल कहानी के भीतर एक रूपक चलता है सर्कस का, जहां मनुष्य ही शेर और रीछ बने हुए हैं। पशु की भूमिका में रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत ही यातनापूर्ण और अपमानजनक है, जिसके खिलाफ एक आत्मसंघर्ष नायक के भीतर चलता है। नायक को लगता है कि उसकी सर्विस और सर्कस में कोई फर्क नहीं है। नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार ने किया था। संगीत परिकल्पना संजय उपाध्याय की थी। संगीत संयोजन अवधेश पासवान का था और गायन में भैरव, चंदन वत्स, आशुतोष कुमार, मोहित मोहन, पंकज गौतम थे। मुक्तिबोध की इस कहानी के बारे में परिचय सुधीर सुमन ने दिया।

फ़िल्मोत्सव के समापन के रोज दर्शकों ने चार महिला फ़िल्मकारों की फ़िल्मों का अवलोकन किया। महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर प्रदर्शित ये फ़िल्में समाज की सचेतन महिला दृष्टि के गहरे सरोकारों की बानगी थीं।
अनुपमा श्रीनिवासन निर्देशित फ़िल्म ‘आई वंडर’ राजस्थान, सिक्किम और तमिलनाडु के ग्रामीण बच्चों के स्कूल, घर और उनकी जिंदगी को केंद्र में रखकर बनाई गई है। फ़िल्म ने कई गंभीर सवाल खड़े किए, जैसे कि इन बच्चों के लिए स्कूल का मतलब क्या है? बच्चे स्कूल में और उसके बाहर आखिर सीख क्या रहे हैं? इन बच्चों के रोजमर्रा के अनुभवों के जरिए इस फ़िल्म ने दर्शकों को यह सोचने के लिए बाध्य किया कि शिक्षा है क्या और उसे कैसी होनी चाहिए। अनुपमा से दर्शकों ने शिक्षा पद्धति को लेकर कई सवाल किए।
दीपा भाटिया निर्देशित फ़िल्म ‘नीरो’ज गेस्ट’ किसानों की आत्महत्याओं पर केंद्रित थी। दीपा ने सुदूर गांव के गरीब-मेहनतकश किसानों से लेकर बड़े-बड़े सेमिनारों में बोलते देश के मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ को अपने कैमरे में उतारा है। पिछले 10 सालों में लगभग 2 लाख किसानों की आत्महत्या के वजहों की शिनाख्त करती यह फिल्म एक जरूरी राजनीतिक हस्तक्षेप की तरह लगी।
पूना फिल्म इंस्टिट्यूट से फ़िल्म संपादन में प्रशिक्षित बेला नेगी की पहली फ़िल्म ‘दाएं या बाएं’ में ग्रामीण संस्कृति पर पड़ते बाजारवाद के प्रभावों को चित्रित किया गया था। पूंजीवादी-बाजारवादी संस्कृति ने जिन प्रलोभनों और जरूरतों को पैदा किया है, उनको बड़े ही मनोरंजक अंदाज में इस फ़िल्म ने निरर्थक साबित किया।
‘दी अदर सांग’ भारतीय शास्त्रीय संगीत और गायिकी की उस परंपरा को बड़ी खूबसूरती से दस्तावेजीकृत करने वाली फ़िल्म थी, जिसको उन ठुमरी गायिकाओं ने समृद्ध बनाया था, जो पेशे से तवायफ थीं। फ़िल्म निर्देशिका सबा दीवान ने तीन साल तक तवायफों की जीवन शैली और उनकी कला पर गहन शोध करके यह फ़िल्म बनाई है। इस फ़िल्म ने दर्शकों को रसूलनबाई समेत कई मशहूर ठुमरी गायिकाओं के जीवन और गायिकी से तो रूबरू करवाया ही, लागत करेजवा में चोट गीत के मूल वर्जन ‘लागत जोबनवा में चोट’ के जरिए शास्त्रीय गायिकी में अभिजात्य और सामान्य के बीच के सौंदर्यबोध और मूल्य संबधी द्वंद्व को भी चिह्नित किया। अभिजात्य हिंदू शास्त्रीय संगीत परंपरा के बरअक्स इन गायिकाओं की परंपरा को जनगायिकी की परंपरा के बतौर देखने के अतिरिक्त इस फिल्म में व्यक्त महिलावादी नजरिया भी इसकी खासियत थी। लोगों ने बेहद मंत्रमुग्ध होकर इस फ़िल्म को देखा।

म्यूजिक वीडियो जिन सामाजिक प्रवृत्तियों और वैचारिक या व्यावसायिक आग्रहों से बनते रहे हैं, तरुण भारतीय और के. मार्क स्वेर द्वारा तैयार किये गए म्यूजिक वीडियो के संकलन ‘हम देखेंगे’ उसको समझने की एक कोशिश थी।

जसम, बिहार के राज्य सचिव संतोष झा ने कलाकारों और दर्शकों से अपील की कि वे जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों, उसकी लोकतांत्रिक आकांक्षा और उसके बेहद जरूरी प्रतिरोधों को दर्ज करें और 10-15 मिनट के लघु फ़िल्म के रूप में निर्मित करके अगस्त, 2011 तक फेस्टिवल के संयोजक के पास भेज दें, जो फ़िल्में चुनी जाएंगी, उनका प्रदर्शन अगले फ़िल्म फेस्टिवल में किया जाएगा। समापन वक्तव्य कवि आलोकधन्वा ने दिया।

फ़िल्म फेस्टिवल में गोरखपुर फ़िल्म सोसाइटी और समकालीन जनमत की ओर से किताबों, कविता पोस्टरों और फ़िल्मों की डीवीडी का स्टाल भी लगाया गया था। प्रेक्षागृह के बाहर राधिका-अर्जुन द्वारा बनाए गए कविता पोस्टर लगाए गए थे, जो फ़िल्मोत्सव का आकर्षण थे। इस अवसर पर शताब्दी वर्ष वाले कवियों की कविताओं पर आधारित सारे छोटे पोस्टर पटना के साहित्य-संस्कृतिप्रेमियों ने खरीद लिए। किताबों और फ़िल्मों की डीवीडी की भी अच्छी मांग देखी गई। आयोजन का संचालन संतोष झा और संजय जोशी ने किया। उनके साथ विभिन्न फ़िल्मों और निर्देशकों का परिचय डा. भारती एस. कुमार, के.के. पांडेय और सुमन कुमार ने दिया।

पटना पुस्तक मेला 10 दिसंबर से गांधी मैदान में आयोजित

दि‍ल्‍ली : पटना पुस्तक मेला 10 दिसंबर से ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित किया जाएगा। 21 दिसंबर तक चलने वाले इस पुस्तक मेले में देश-विदेश के 250 से अधिक प्रकाशक एवं पुस्तक विक्रेता भाग लेंगे, जिनके आठ सौ से अधिक स्‍टाल होंगे। रविवार और अन्य छुट्टियों के दिनों को छोडकर मेले का समय दोपहर 12 बजे से रात 8 बजे तक होगा। रविवार और अन्य छुट्टियों के दिन मेले का समय दोहपर 11 बजे से रात 8.30 बजे तक निर्धारित किया गया है। मेले परिसर में वि‍भि‍न्‍न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा सेमिनार, वाद-विवाद प्रतियोगिता एवं क्विज का आयोजन किया जाएगा।

मानस चलन्तिका टीका के मटमैले पर्दे पर दास्तान-ए-वैशाली : संजीव कुमार

अधिकांश लोगों ने बचपन का वह दौर देखा होगा, जब गली-मुहल्‍ले में एक्‍का-दुक्‍का टीवी होती थी और उस पर कार्यक्रम देखने के लिए मन में बेचैनी। मेजबान के यहां भीड़ लग जाती थी। सिनेमा हॉल में फिल्‍म देखना तो उत्‍सव जैसा होता था। टीवी की घर-घर में पहुंच और मनोरंजन के अन्‍य साधनों के विकास ने उस दौर का अंत कर दिया। पटना के सिनेमा हॉल वैशाली के बहाने उस रोमांचकारी दौर और उसके अंत पर युवा कथाकार संजीव कुमार का स्‍मृति लेख-

Memory is the only one of our mental faculties that we accept as working normally when it malfunctions.                                                    -Mary Warnock

कम लोगों को पता होगा कि जिस प्रतिभाबहुल हिन्दी जगत ने एक ओर टेलीविजन के लिए दूरदर्शन, स्वीमिंग पूल के लिए तरण ताल- जैसे शब्द गढ़े और दूसरी ओर इंस्पेक्टर के लिए निसपिटर (नासपिटा के ध्वनिसाम्य पर),  लॉर्ड के लिए लाट,  अल्युमिनियम के लिए ललमुनियाँ इत्यादि का आविष्कार किया,  उसी ने इन दोनों परम्पराओं को मिलाते हुए मूवीज-टॉकीज यानी चलती बोलती तस्वीरों (के प्रदर्शन की जगह) के लिए एक शब्द दिया है- चलन्तिका टीका। बदकिस्मती से यह शब्द खुद अचलन्तिका साबित हुआ,  पर बिहार के बेगूसराय शहर से सम्बन्ध रखने वाले लोग वहां के ऐतिहासिक सिनेमाघर ‘श्री कृष्ण चलन्तिका टीका’  के कारण इससे परिचित हैं,  भले ही वे इसे जातिवाचक संज्ञा न मानते हों। वैसे भी यह मानने से ज्यादा जानने या पहचानने का मामला है और मेरी महीन मेधा का साधुवाद कीजिए,  जिसने पहली ही भिड़न्त में इसकी जातिवाचकता को पहचान लिया। तब से जो भी सिनेमाघर मुझे अपना-सा लगा,  उसे मैंने इस श्रुतिमधुर कुलनाम के साथ ही पुकारा है। यह सब सिर्फ इसलिए बता रहा हूँ,  ताकि आप मानस चलन्तिका टीका को रामचरितमानस का कोई चलताऊ किंवा प्रचलित भाष्य न समझ बैठें। यह तो कोटि-कोटि कविआए हुए जनों द्वारा कोटिशः प्रयुक्त रूपक अलंकार की एक और आजमाइश भर है। मानस चलन्तिका टीका- यानी मनरूपी टॉकीज। …फिलहाल इसके मटमैले पर्दे पर स्मृति के मायावी प्रोजेक्टर से प्रक्षेपित एक और चलन्तिका टीका- वैशाली- की दास्तान देख-सुन रहा हूँ,  जाहिर है,  सुनाने के लोभ से। मूल में यह दास्तान काफी-कुछ धुँधली और सम्बन्ध-व्यवस्था-रहित है और इस लिहाज से शायद वह दास्तान है ही नहीं। दिक्कत ये है कि उस धुन्ध और अव्यवस्था को दूर किये बगैर सुनाने का काम हो नहीं सकता। इसलिए कुछ तो उस मायावी प्रोजेक्टर के चलते जो माध्यम होने के साथ-साथ बहुधा हमारी जरूरत को भाँप कर सम्पादक और सर्जक की भूमिका अख्तियार कर लेता है और कुछ मेरी सचेत कोशिशों के चलते,  अपने शब्दावतार में यह दास्तान काफी हद तक सुसम्बद्ध दिखलाई पड़ेगी।

काश, स्मृति मूलतः इतनी व्यवस्था-प्रिय होती!

अब याद नहीं कि वह खबरनवीस कौन था,  जिसने हमारी सांध्य सभा में यह स्कूप पेश किया कि ‘कौमनिटी सेंटर के पिछुअत्ती ए गो हॉल बनेगा।’  पटना में उन दिनों सिर्फ ‘हॉल’  कहा जाय,  तो मतलब होता था, सिनेमा हॉल। दूसरे स्थानों और कालों में भी यह मतलब होता होगा, पर शायद तभी जब इस शब्द के प्रयोग का सन्दर्भ स्पष्ट हो। मसलन ‘फलाँ फिल्म किस हॉल में चल रही है?’  मैं जिस भाषिक व्यवहार की बात कर रहा हूँ, उसमें बिना किसी स्पष्ट सन्दर्भ के भी ‘हॉल’ का मतलब सिनेमा हॉल ही होता है या कहिए,  होता था। यह शायद उस ठिगने शहर का अपना तरीका था,  सिनेमा घरों की विराटता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का। चारमंजिला इमारतें तक उन दिनों मुश्किल से मिलती थीं और हमने सुन रखा था कि बम्बई में पच्चीसवीं मंजिल पर रहने वालों के घरों में ऑक्सीजन का सिलेण्डर,  एहतियातन,  हमेशा मौजूद रहता है। इस सुनावत पर भरोसा न करने की कोई वजह नहीं थी। हम पढ़े-लिखे बालक थे और हमें पता था कि ऊँचाई के साथ-साथ वायुमण्डल विरल होता जाता है।

बहरहाल, ‘हॉल बनेगा’  की खुशी को अभी हम सहेज भी नहीं पाये थे कि खबरनवीस ने एक झटका दिया,  गोया चुम्बन के बाद चाँटा,  बकौल राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह। बताया,  ‘बनेगा,  बकी अभी टाइम लगेगा। रिजर्व बैंक वाला लोग केस कर दिया है कि हमारा क्वार्टर के सामने हॉल नहीं बनना चाहिए। फैमिली वाला जगह है ना! हॉल बनने से त लफुआ सब का जुटान होने लगेगा।’ रिजर्व बैंक वालों का इस तरह राजेन्द्र नगर की महान सांस्कृतिक उपलब्धि के आड़े आना हम सभी को बेहद नागवार गुजरा। हमने सर्वसम्मति से इस लोकोक्ति को दुहराया कि ऊपर वाला सब कुछ देखता है;  उसके यहां देर है,  अन्धेर नहीं। दो एक ने तो लगे हाथ कभी उस बैंक में खाता न खुलवाने की कसम खा ली और मेरी पक्की जानकारी है कि वे आज तक इसपर अडिग हैं।

अन्धेर सचमुच नहीं था। रिजर्व बैंक क्वार्टर्स वाले केस हार गये। ऐसा कुछ हकीकत में हुआ था या कि अफसानों और अफवाहों में ही केस लड़ा भी गया और जीता-हारा भी गया,  मैं नहीं जानता। पर यह सच है कि कुछ समय बाद हॉल बनने की शुरुआत हो गई। यह सन् 75-77 की बात रही होगी,  जब सम्पूर्ण क्रान्ति की लहर के साथ शहर के तमाम लफंगों ने अपने को क्रान्तिकारियों में शुमार करा लिया था और प्रतिक्रिया में भद्र समाज का एक बड़ा हिस्सा तमाम क्रान्तिकारियों को लफंगों में शुमार करने लगा था। हॉल बनने की शुरुआत का जब समाचार मिला,  तो हममें से कइयों ने क्रान्तिकारी लफंगों और लफंगे क्रान्तिकारियों के मुँह से सुनी हुई बात ‘जे.पी. जिन्दाबाद’  का उद्घोष किया। उत्साह के भाव को रसदशा तक पहुँचाने का यह माना हुआ तरीका था। एक मित्र ने तो,  जो उम्र में मुझसे तीन-चार साल बड़ा यानी चौदह-पन्द्रह की लपेट में रहा होगा,  उत्साह में कदमकुआँ थाने के गेट पर खड़े बन्दूकधारी सिपाही को मामू कह कर हुलका दिया और फिर यज्जा-वज्जा-शैली में भाग खड़ा हुआ। यह भी इमरजेंसी के दौर में उत्साह व्यक्त करने की एक लोकप्रिय पद्धति थी। इसी में कभी तथाकथित मामू पीछे पड़ जाय,  तो पद्धति जरा महंगी पड़ती थी। उस दिन भी हममें से एक को मुखबिर बना कर मामू ने उत्साही बालक पुन्नू का घर खोज ही लिया। फिर उसे यह समझाने में पुन्नू के घरवालों को खासी मिहनत करनी पड़ी कि लड़का हॉल के साइड यानी साइट पर गया हुआ था और उसका काम चालू देखकर उत्साह में आ गया था। फिर जो हुआ,  वह तो स्वाभाविक ही था। इसमें लड़के का क्या कसूर!

बात वाजिब थी। हमारे इलाके को एक सिनेमा हॉल की जितनी सख्त जरूरत थी और हॉल बनने की उम्मीद जगते ही इस जरूरत को जितनी शिद्दत से महसूस किया जाने लगा था,  उसे देखते हुए पुन्नू का उत्साह और तज्जनित कर्म अनुचित नहीं था। उत्साह के कारणों की चर्चा आगे सविस्तार होगी;  जहाँ तक तज्जनित कर्म का सवाल है,  वह दौरे-जहाँ से मिली हुई एक रस्म की अदायगी भर थी,  कोई मौलिक उद्भावना नहीं। इसके लिए भला एक बालक को कसूरवार कैसे ठहराया जाता! दौरे-जहाँ का करिश्‍मा क्या था,  यह इससे समझिए कि पप्पू के छोटे भाई (प.छो.भा.) ने,  जो उन दिनों बोलना सीख ही रहा था,  राइम-रटन्त की शुरुआत ‘जानी जानी यस पापा’  या ‘मछली जल की रानी है’  की जगह ‘देवकान्त बरुआ,  इन्दू जी के…..(तुक मिलाएँ!)’  से की थी और वह भी बिना किसी के सिखाए। उम्र के थोड़े फर्क के बावजूद हमारी पीढ़ी की हालत कमोबेश प.छो.भा. जैसी ही थी। हमें भी न तो उस उथल-पुथल के टुच्चेपन की समझ थी,  न ही उसके औदात्य की। तभी तो रात के आठ बजे जब हमारी गली से सौ कदम के फासले पर स्थित लोकनायक जयप्रकाश के आवास से थाली और कनस्तर बजने की आवाजें आनी शुरू होतीं और चन्द मिनटों कि भीतर पूरा पटना शहर थालियों और कनस्‍तरों की ढनढनाहट से गूँजने लगता,  तब उसे प्रतिरोध का दिगन्‍तव्यापी नाद मान कर नहीं,  बड़ों के बचपने का इजहार मान कर हमारी खुशी सारे बाँध तोड़ने लगती थी। हम उसमें काफी बढ़-चढ़ कर योगदान करते थे,  जिसे आज आप चाहें तो प्रतिरोध के कोरस में हमारा ऐतिहासिक योगदान कह सकते हैं,  पर जिसके पीछे हमारी प्रेरणा निहायत क्षणवादी होती थी। क्षणों में जीने की यह संकीर्णता एक बार खासी मंहगी पड़ी थी,  जब रसोईघर से थाली-कनस्तर की मांग पर दुत्कारे जाने के बाद हमारे समवयस्क,  तथापि आदरणीय मित्र मनोज जी ने हड़बड़ी में बिजली के खम्भे को लोहे की छड़ से पीटना शुरू किया और ऊपर तारों के जमघट में कुछ ऐसी सम्पूर्ण क्रान्ति मची कि आसपास के तीन-चार घरों में रातभर के लिए बत्ती गुल हो गई।

तो कहना ये है कि हम नादान बालक थे और हमारे प्रतिनिधि पुन्नू की कारस्तानी प.छो.भा. की राइम-रटन्त जितनी ही निष्पाप थी। हमें तो यह पता भी नहीं था कि सिपाही को मामू क्यों कहा जाता है। आज सोचता हूँ,  तो इसका सम्बन्ध उस लोकविश्‍वास के साथ जान पड़ता है, जिसके अनुसार भान्जे को पीटने वाले के हाथ बुढ़ापे में कांपते हैं। उन दिनों पुलिस वालों से आन्दोलनकारियों की मुठभेड़ें अक्सर हुआ करती थीं। ऐसी ही किसी घातक रूप से मजेदार मुठभेड़ में किसी लाठी खाते आन्दोलनकारी ने किसी लाठी भाँजते सिपाही को मामू कह कर उस लोकविश्‍वास का लाभ उठाने की कोशिश की होगी। तभी से यह मजाक चल पड़ा होगा और उत्साह के हर मौके को घातक रूप से मजेदार बनाने के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा होगा।

इस विषयान्तर के बाद अब चर्चा उस उत्साह के कारण,  यानी हमारी जरूरतमन्दगी की! उस समय तक पटना शहर के सभी सिनेमाघर गांधी मैदान और रेलवे स्टेशन के आसपास थे। ये जगहें तब की यातायात सुविधाओं को देखते हुए हमारे इलाके से दूर पड़ती थीं। इससे हमें जो घाटे होते थे,  वे इस प्रकार हैं- 1.  अगर अभिभावकों से छुप कर फिल्म देखनी हो,  तो तीन की बजाय साढ़े चार घण्टे घर से गायब रहना पड़ता था,  जिसमे रिस्क ड्योढ़ा था। 2.  अगर अनुमति लेकर फिल्म देखना चाहें,  तो दूरी के नाम पर आवेदन को टाला जाता था। मसलन, ‘अगले महीने चाचा आयेंगे,  तब उनके साथ जाना।’  और 3. सिनेमाघरों के शो-केस में लगे ‘स्टिल्स’ को देखने-जैसे छोटे,  किन्तु अनिवार्य कार्य के लिए इतनी दूरी तय करनी पड़ती थी। ये सभी घाटे उस इलाके में रहने के चलते हमें उठाने पड़ते थे,  जो उस समय से एकाध दशक पहले तक पटना का एक छोर हुआ करता था। राजेन्द्र नगर को छूती हुई रेलवे लाइन गुजरती थी और उसके बाद बाइपास। यही पटना की दक्षिणी सीमा थी,  हमारे होश सम्भालने से पहले तक,  ऐसा हमने सून रखा था। हमारे होशमन्द होते-होते बाइपास के उस पार कंकड़बाग नामक एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी तेजी से बसने लगी थी। कंकड़बाग का अतीत, वर्तमान और भविष्य हमारे इलाके के मध्यवर्गीय घरों में अक्सर चर्चा का विषय हुआ करता था। वहां जमीन ले चुके लोग किराये के मकान में रहने वाले अपने ऐसे परिचितों पर तरस खाते थे,  जो वहां एक कट्ठा जमीन तक नहीं ले सके और वहां जमीन न ले पाने वाले यह कहकर अपनी तकदीर को कोसते थे कि जब हजार रुपये कट्ठा जमीन मिल रही थी, तब यह सोच कर नहीं ली कि कौन जायेगा उस उजाड़ में रहने! ‘मति मारी गयी थी’- ऐसा यथार्थवादियों का निष्कर्ष होता और ‘भगवान को मंजूर नहीं था’- इस पर वे पहुँचते,  जो अपनी मति का सम्मान बचने के लिए यथार्थवाद से दूर हट गये थे। ढेर सारी भविष्यवाणियों के हवाले से तरस खाने और ढेर सारी विगत परिस्थितियों के हवाले से अफसोस करने का यह चलन बड़ों की बैठकों से इतना हावी था कि हमारी किशोर पीढ़ी को जब परिपक्व बातचीत का शौक चर्राता,  तो हम इमरजेंसी की खूबियों-खामियों पर चर्चा करने के साथ-साथ ‘कंकड़बाग में जमीन की खरीद-फरोख्त उर्फ क्या से क्या हो गया’  को भी अपना विषय बनाते थे। वैसे सच पूछा जाय,  तो हम कभी इस बात के कायल नहीं हो पाये कि किसी भले आदमी को कंकड़बाग में जा बसना चाहिए। हमें तब किसी ने यह नहीं बतलाया था कि कंकड़बाग न बस रहा होता, तो हमारे इलाके को सिनेमाघर का उपहार भी नहीं मिलता। उसके बसने के साथ-साथ शहर का केन्द्र हमारी ओर खिसकता आ रहा था और सिनेमाघर की योजना राजेन्द्र नगर के इसी नये स्टेटस का नतीजा थी। अगर बाइपास,  जिसका नाम अब पुराना बाइपास हो चुका है,  के पार खेत ही खेत होते,  तो उससे पचास कदम इधर सिनेमाघर बनाने का ख्याल किसी के दिमाग में भला क्यों आता! इस तरह हमें कंकड़बाग का अहसानमन्द होना चाहिए था,  जो कि अज्ञानवश हम नहीं थे।

चर्चा सिनेमाघर की जरूरत पर चल रही थी। तो उसका ऐसा है कि वह सिर्फ हम किशोरों को ही नहीं,  हमारे माता-पिताओं को भी थी। सिनेमा मनोरंजन का मुख्य,  बल्कि अपने तरह का एकमात्र साधन था और आसपास हॉल न होने की स्थिति में रिक्शा-भाड़ा इत्यादि मिलाकर मामला खासा खर्चीला पड़ जाता था। नौटंकी या फगुआ-चैती- जैसे सामूहिक गान से अपना मनोरंजन करना या किसी की दालान पर घण्टों बैठकी मारना सम्भव नहीं था,  क्योंकि आखिर शहरीपन भी कोई चीज है। यह सही है कि बगल के ही इलाके लोहानीपुर में यह शहरीपन नदारद था,  पर हमारे थ्री स्टार मुहल्ले में इस चीज की खासी पूछ थी। मानसिकता के स्तर पर उसकी पूछ न भी होती,  तो वस्तुगत परिस्थितियों मे वह शहरीपन विद्यमान था। सिन्धियों,  पंजाबियों, मारवाड़ियों और बंगालियों के कई परिवार हमारे मुहल्ले में रहते थे। आज तख्‍़मीना करने बैठता हूँ,  तो थोड़ी हैरत होती है कि यह प्रेम-प्रिपासु उस उम्र में जब-जब दिल के हाथों लाचार हुआ,  उसकी वजह कोई-न-कोई पंजाबन या बंगालन थी। बिहारी परिवारों में भी कोई भोजपुरी भाषी इलाके से आता था,  कोई मिथिलान्‍चल से। इन सब तरह के बाशिन्दों के बीच कोई कौटुम्बिक या पीढ़ीगत रिश्ता हाने का सवाल ही नहीं था। इनके बीच पुश्तों के साझा अनुभव नहीं थे,  एक-जैसा पेशा नहीं था,  एक-जैसी नियति नहीं थी। ऐसे में शहरीपन उनका शौक ही नहीं,  उनकी मजबूरी भी थी और मनबहलाव के गँवई साधन पूरी तरह उनकी पकड़ से छू चुके थे। बस ले-देकर एक सिनेमा का आसरा रह गया था। इसके अलावा रेडियो नाम की भी एक चीज हुआ करती थी, जिसके शॉर्ट वेव पर कोई मनचाहा स्टेशन पकड़वाने में तनी हुई रस्सी पर चलने का-सा अनुभव होता था। इसे सिनेमा के विकल्प की तरह इस्तेमाल करना वैसा ही था,  जैसे विलायती शराब की कमी को देसी ठर्रे की बजाय चाय से पूरा करना। जहाँ तक टी.वी. का सवाल है,  ये उसके तुतलाने के दिन थे। उसका सर्वभक्षी विस्तार अभी बहुत दूर की चीज थी।

सिनेमा हॉल बनने की शुरुआत के आसपास ही टी.वी. का प्रवेश हमारे इलाके में हुआ था। राजेन्द्र नगर रोड नं. 1 और 2 के जो मकान तिनकोनिया पार्क की परिधि में और उसके आसपास थे,  उनमें से दो या तीन में ही टी.वी. सेट हुआ करता था। जिन-जिन घरों में यह बला थी, उनमें रविवार की शाम का तो आलम न पूछिए। बैठक में रखे सोफों-कुर्सियों को दीवार से लगा दिया जाता और बीच की जगह में जाजिम-चादर इत्यादि बिछा कर बीसियों लोगों के बैठने की व्यवस्था की जाती। अक्सर यह व्यवस्था नाकाफी साबित होती थी। इसलिए पाँच बजे से शुरू होने वाली फिल्म के लिए लोग साढ़े चार बजे से ही जगह लूटने लगते थे। अन्ततः फिल्म शुरू होने के समय तक बैठक में मुख्यधारा के समाज के अलावा एक हाशिए का समाज भी दिखलाई पड़ने लगता था, जिसमें सही समय पर न आने वाले आगन्तुकों के साथ-साथ मेजबान परिवार के सदस्य भी शामिल होते थें। यह हाशिए का समाज खिड़कियों पर चढ़ा,  दीवारें के सहारे खड़ा या दरवाजे की चौखट में अड़ा नजर आता था।

मेजबान परिवार के सदस्यों को हाशिए की जगह मुख्यधारा में बैठ कर फिल्म देखने का मौका तभी मिलता था,  जब कोई कला-फिल्म दिखलाई जा रही हो। पर,  जाहिर है,  इस मौके का भी वे पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। आध-पौन घण्टे में टी.वी. बन्द कर दी जाती और दूरदर्शन वालों केा गरियाने का अध्याय अगले ढाई घण्टे तक जारी रहता। कई बार तो ऐसी फिल्म की घोषणा होते ही लोग रविवार की शाम का कोई और कार्यक्रम तय कर लेते थे। मिसाल के लिए जिस रविवार को मणि कौल की ‘दुविधा’  आने वाली थी,  उस शाम हमारे सभी महत्वपूर्ण ठिकानों पर ताला बन्द पाया गया या फिर यह सूचना मिली कि आज टी.वी. नहीं चलेगा। हार कर कला की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हम बालकों को एक घर की बरसाती में रहने वाले कुँवारे घोष बाबू के यहाँ पहुँचना पड़ा,  जो ‘मिली’  फिल्म के बरसाती-वासी अमिताभ बच्चन की तरह ही पूरी दुनिया से कटे-कटे रहते थे। घोष बाबू ने बिना कोई खुशी या नाराजगी जाहिर किये हम लोगों को बरसाती में बिठाया ओर शुरुआती विज्ञापनों के बीच ही यह समझाया कि ‘फिलिम शमझने वाला है। आप लोक अगर हाल्ला मचाएगा,  तो फिलिम का मैशेज शमझ नहीं पायेगा। इश्‍लिए इदर शान्ति शे…।’  हम लोगों ने यथासम्भव शान्ति से रहने की कोशिश भी की,  लेकिन हम उत्तरोत्तर इस कोशिश में असफल होते गये। अब धुँधली-सी याद है कि पहली बार हम लोगों के मुँह से ‘फिक्क’-सी हँसी तब निकली,  जब बैलों के गले की घण्टियों और पहिए की चर्रक-चूँ के साथ बहुत देर तक चलती रहने वाली बैलगाड़ी एक विशाल पेड़ के नीचे रुकी और नायक ने पर्दा हटाते हुए नायिका से पूछा,  सम्भवतः उस फिल्म का पहला संवाद,  ‘केले खाओगी?’  इस हँसी से आगे बढ़ते-बढ़ते हम इस हद तक गये कि नायक को देवानन्द का नौकर और नायिका को हेमा मालिनी की आया घोषित करते हुए कहकहे लगाने लगे। ठीक इसी समय घोष बाबू ने उठ कर टी.वी. बन्द कर दिया और हम उनके कूचे से बेआबरु होकर निकले। बाहर हम लोगों के बीच यह मुद्दा बहस तलब बना कि घोष बाबू ने ऐसा हमारी हरकतों से ऊब कर किया था या फिल्म से ऊब कर?

उपर्युक्त प्रकरण से यह स्पष्ट है कि रविवार की फिल्म देखने के मामले में हम बालकों और किशोरों का हुजूम रिश्ते की नजदीकी-दूरी या परिचय-अपरिचय की परवाह नहीं करता था। हम अँगुली पकड़ कर पहुंचा पकड़ने वाले लोग थे। जहाँ थोड़ी-सी गुंजाइश दिखी,  हम वहाँ पूरा कब्जा जमा लेते। पर लड़कियों और माता-पिताओं की स्थिति ऐसी नहीं थी। माता-पिता तो हमारी तरह किसी भी घर में घुस जाने का गँवारपन दिखला नहीं सकते थे और जहाँ तक लड़कियों का सवाल था,  उन्हें माता-पिता की निगाहों के सामने ही रहना था,  इसलिए जहाँ वो नहीं,  वहाँ ये नहीं। यों शहरीपन और गँवारपन की समझ हममें भी थी,  लेकिन इस समझ की बिना पर मुफ्त की फिल्म देखने का लोभ संवरण करना हमें ज्यादती लगती थी। इस प्रकार लज्जा और लोभ में से बुजुर्ग लोभ का गला घोंटते थे,  हम लज्जा का। और लड़कियाँ?  मेरा अन्दाजा है कि हर रविवार की शाम उनमें से ज्यादातर खुद अपना गला घोंटने की नाकाम कोशिश करती थीं।

तो ये था वह पूरा सांस्कृति परिदृश्य,  जिसके बीच रख कर आपको वैशाली सिनेमा हॉल के महत्व और उससे जुड़ी हमारी उत्तेजना को समझना होगा। जी हाँ,  यही नाम था उसका,  जो हमने तब जाना,  जब पहली बार उसके प्रस्वावित निर्माण-स्थल पर गये। केस,  हकीकत या अफसाने में, तब चल ही रहा था। इसलिए हॉल बनने की शुरुआत नहीं हुई थी। सिर्फ एक बड़ा-सा बोर्ड लगा था,  जिस पर आर्किटेक्ट की कल्पना तस्वीर मे उतारी गई थी। इस तस्वीर में सब कुछ निहायत भव्य और सुन्दर था,  पर सबसे खूबसूरत थी उस नाम की लिखावट,  जो भवन के दाहिने हिस्से में उसके शिखर पर मुकुट की तरह सजा हुआ था। तस्वीर को देख कर हम सभी गौरवान्वित हुए,  क्योंकि यह वह चीज थी,  जो ठीक हमारे मुहल्ले के मुहाने पर बनने जा रही थी। फिर तो जब-जब हम सामूहिक स्तर पर आत्मगौरव की थोड़ी भी कमी महसूस करते,  उस साइट पर जाकर तस्वीर को देख आते थे। स्टे-आर्डर हटने के बाद जब काम की शुरुआत हो गई,  तब उस धूल-धक्कड़ में भी हमारा जाना-आना लगा रहा। उस प्रकार आप कह सकते हैं कि हमारी अनवरत देख-रेख में वैशाली का निर्माण-कार्य सम्पन्न हुआ।

वैशाली के बनने के साथ-साथ उसके आसपास कई चीजें बन रही थीं। बात ये थी कि रेलवे क्रासिंग की ओर जाती सड़क का वह हिस्सा अब तक थोड़ा वीराना-सा था,  पर हॉल बनने की शुरुआत होते ही दूकानों और ढाबों की तादाद भी बढ़ने लगी। इस तरह काम पूरा होते-होते उस जगह की शक्ल काफी बदल चूकी थी। बाद के दौर में सब्जियों की खरीददारी में बचाये गये पैसे से चाट,  समोसा,  मसाला डोसा इत्यादि खाना होता,  तो हम उत्तर में नाला रोड तक जाने की बजाय दक्षिण में वैशाली तक जाना पसन्‍द करते थे। आखिर नाला रोड हमारे होश सम्भालने के पहले से ही जमा-जमाया बाजार क्षेत्र था,  जबकि वैशाली और उसके आजू-बाजू का पूरा विकास हमारी देख-रेख में हुआ था!

खैर! वैशाली बनकर खड़ी हो गई,  तब उसके मुहूर्त का दिन तय हुआ और हम लोग उत्सुकतापूर्वक इन्तजार करने लगे कि देखें,  कौन-सी फिल्म लगती है! हमारी उत्सुकता की तान निराशा पर टूटी,  जब उसका उद्घाटन महान सामाजिक फिल्म ‘आनन्द आश्रम’ से हुआ। फिर हमारे ही बीच के किसी परिपक्व दिमाग ने सुझाया कि जब शुरू के कुछ दिन वैसे ही हाउसफुल जाने हैं,  तो हॉल-मालिक क्या बेवफूक है, जो ‘आनन्द आश्रम’  की जगह ‘डॉन’  के चक्कर में पड़े। इस सूझ से हमारी निराशा दूर हुई। किन्तु निराशा पर यह विजय बहुत टिकाऊ नहीं थी। हमने पाया कि एक-के-बाद-एक महान सामाजिक या महान फ्लॉप फिल्में हमारी इस महान उपलब्धि पर हावी हैं। भूले-भटके कभी चर्चित फिल्म लग जाती थी। वह भी ज्यादातर गांधी मैदान के पास के किसी हॉल का शुरुआती हंगामा बाँटने के लिए। ऐसी फिल्म आमतौर पर दो हफ्ते के लिए लगाई जाती और हाउसफुल रहते हुए ही उतर भी जाती थीं। बहुत कम हिट फिल्में ऐसी रही होंगी,  जो अकेले वैशाली के हिस्‍से आयी हों। इसमें हमें कोई सन्देह नहीं था कि वैशाली पटना का सबसे उम्दा हॉल है। पहली बार 70 एम.एम. स्क्रीन,  पहली बार स्टीरियो साउण्ड ट्रैक, सबसे बड़ा और खुला हुआ परिसर। ‘एलिफिन्सटन’ की लॉबी में जहाँ ब्लीचिंग पाउडर की गन्ध थी,  वहीं वैशाली की लॉबी में मशीन से भूने जाते पॉपकार्न और बढ़िया इत्र की मिली-जुली खुशबू बसी हुई थी। इन सबके बावजूद ‘जानी दुश्मन’, ‘कुर्बानी’,  ‘हिम्मतवाला’,  ‘मुकद्दर का सिकन्दर’- जैसी फिल्में उसकी किस्मत में कम ही आती थीं और वह भी ज्यादातर एलिफिन्सटन,  वीणा,  अशोक या अप्सरा की थाली से फेंके गये टुकड़े की तरह। वजह शायद ये रही हो कि व्यावसायिक केन्द्रों के आसपास सिनेमाघरों के जो दो गुच्छे थे,  उनसे छिटक कर वह एक रिहायशी इलाके में अलग-थलग पड़ी थी। किसी सुपरहिट फिल्म को अकेले उसके भरोसे छोड़े देने में वितरक पचास बार सोचते होंगे। मैं यह अन्दाजा ही लगा सकता हूँ,  क्योंकि वितरण-व्यवसाय की प्राथमिकताओं और काम के तरीकों के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है।

मुझे यह भी पता नहीं कि कब वैशाली की स्तरहीनता को ही नियति मान कर हम आशा-निराशा से ऊपर उठ गये। साल-छः महीने में कोई ‘ए’ ग्रेड फिल्म लग जाती,  तो हम खुश होते थे। नहीं लगने की सूरत में दुखी नहीं होते थे। बाद को जब हमने हाफ टाइम से बिना टिकट फिल्म देखने का सिलसिला शुरू किया,  तब यह बात अच्छी तरह दिमाग में बैठ गयी कि वैशाली जैसी भी है,  हमारे बुरे दिनों की साथी है।

हाफ टाइम से बिना टिकट फिल्म देखने का आइडिया हमारे बीच के ही किसी खुराफाती दिमाग ने निकाला था। आइडिया यों था कि इण्टरवल से ठीक पहले अगर हॉल की चारदीवारी के भीतर चले आओ,  तो इण्टरवल में बाहर आई भीड़ के साथ अन्दर जाकर बैठा जा सकता है और बाद की आधी फिल्म देखी जा सकती है। ‘जानी दुश्मन’ का हाउस फुल दौर बीतने के बाद आइडिया पर अमल किया गया। कामयाबी मिली। उत्साहित हो कर ‘जानी दुश्मन’  के उत्तरार्द्ध को हमने सात-आठ दफा देखा। इसके बाद तो सिलसिला ही चल पड़ा। इस कार्यवाही में सिर्फ दो-तीन चीजों का खयाल रखना पड़ता था। एक तो यह कि मैटिनी शो के दरम्यान चार से सवा चार बजे के बीच हॉल की चारदीवारी के भीतर चले जाएँ,  क्योंकि इण्टरवल से ठीक पहले मेन गेट बन्द कर दिये जाते थे। दूसरा यह कि बालकनी में बैठें, क्‍योंकि उसके वर्गीय आधार के चलते वहां चेकिंग कम होती थी। तीसरे,  एक बार में चार से ज्यादा लोग न जाएँ। ये सावधानियाँ बरतते हुए हम साल भर से ज्यादा समय तक यह सिलसिला चला ले गये। उसके बाद,  जैसा कि एक मूर्धन्य गीतकार कह गये हैं,  छोटी-सी इक भूल ने सारा गुलशन जला दिया। हुआ यों कि एक दिन हम तीन लोग बालकनी के सुख से ऊब कर फर्स्ट क्लास में बैठ गये और वह भी ऐसी कतार में,  जहाँ हमारे अलावा और कोई नहीं था। राजेन्द्र कुमार की कोई फिल्म थी,  जिसका नाम सदमे के कारण भूल गया हूँ। जनाब अभी यात्रा से लौट कर नायिका को तस्वीरों से भरी अलबम दिखला ही रहे थे कि हमारे चेहरों पर टार्च की चुंधियाती रोशनी पड़ी। रोशनी ने टिकट की माँग की और हमने रोशनी से ही मुखातिब होकर कहा कि नहीं है। ‘तीनों को बुक करो।’ रोशनी ने गरज कर कहा। फिर दो लोग हमें अर्द्धचन्द्र होकर बाहर की ओर ले चले। कतारों के बीच धकियाये जाते हुए मैंने विधाता को धन्यवाद दिया, जिसने हॉल के भीतर अन्धेरे का प्रावधान रखा है। साथ ही यह प्रार्थना भी की कि यह जो तकनीकी पदबन्ध है,  बुक करना,  उसका कोई भयावह अर्थ न हो। बाहर आये। पहलवान जी,  अर्थात् मुख्य दरबान के आगे पेशी हुई। पहलवान ने कद-काठी में सबसे बड़ा देखकर मुझी से पूछना शुरू किया।

‘अन्दर कैसे आया?’

‘इण्टरवल में।’

‘कहाँ रहता है?’

‘राजेन्द्र नगर,  1 नम्बर।’

‘कहाँ पढ़ता है?’

‘पाटलिपुत्रा।’

‘किस क्लास में?’

‘नौवाँ नवीन।’

‘सेक्शन?’

‘ए।’

‘रॉल नम्बर?’

‘एक।’

पहवान हैरत से मुझे ऊपर-नीचे देखने लगा। आधे मिनट का विस्मित मौन। फिर पूछा,  थोड़े बदले हुए स्वर में,  ‘पाटलिपुत्रा में फर्स्ट आता है, बोर्ड इम्तहान में मेरिट लिस्ट में रहेगा और ई धन्धा? क्लास-टीचर शमीम साब हैं ना!’

‘जी।’

‘बतला दें उनको?’

‘……’

‘जाओ,  भागो। आगे से आया है त बड़ी मार मारेंगे। बड़ा आदमी बनना है कि हॉल का दरबानी करना है।’

हम बुक न किये जाने का- उसका जो भी मतलब हो- शुक्र मनाते बाहर आये। फिर बेटिकट क्या,  बाटिकट भी हॉल में घुसने का साहस कम-से-कम मुझे अगले एक-डेढ़ साल तक नहीं हुआ।

शायद इसी बीच हमारे बिहार माध्यमिक बोर्ड के इम्तहान भी हुए,  जिसमें सर गणेशदत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल की कक्षा दसवीं नवीन के सेक्शन ‘ए’  का रोल नम्बर 1 मेरिट लिस्ट में अनुपस्थित पाया गया। इतना ही होता, तब भी कोई बात न थी। उसी स्‍कूल के दो ‘लो प्रोफाइल’ विद्यार्थी लिस्ट में मौजूद थे। तेज झटका लगा। नतीजतन मैं साहित्यकार बन बैठा। यह अपने लुप्त आत्मसम्मान को फिर से हासिल करने की बेचैन कोशिश थी। ‘हमन दुनिया से यारी क्या’  वाली मुद्रा के चलते पुराने संगी-साथियों से मेल-जोल कम हुआ। परिचय के नये वृत्त बने। सिनेमाघरों के शो-केस में लगे ‘स्टिल्स’ देखने का शौक छूटा और उसकी जगह राजकमल प्रकाशन और पी.पी.एच. में खड़े होकर किताबें देखने का शौक तारी हुआ। वैशाली पास रह कर भी दूर होती गई। अब उसके पास से गुजरे कभी-कभी महीनों बीत जाते। कुल मिलाकर,  सन् 82 की बोर्ड परीक्षाओं के बाद के इन वर्षों में वह मेरे सरोकार या उत्सुकता की चीज नहीं रह गई थी। ऐसा नहीं कि मैंने उन दिनों फिल्में नहीं देखीं। ‘हिम्मतवाला’  और ‘मुकद्दर का सिकन्दर’  तभी देखी गई थीं। ऐसा नहीं कि मैं कभी यों ही भटकता वैशाली के परिसर में नहीं गया। ‘पुकार’  की होर्डिंग बनाते एक मजदूर की कलाकारी किंवा कलाकार की मजदूरी को नजदीक से तभी देखा था। इन सबके बावजूद उन तीन-चार सालों की मेरी याददाश्त में वैशाली की मौजूदगी बहुत झीनी है।

हो सकता है,  यह समझ बहुत सब्जेक्टिव हो,  पर मुझे बड़ी शिद्दत से महसूस होता है कि इस समय तक आते-आते मेरे लंगोटिया यार और मुहल्ले के लोग भी वैशाली से लगभग वीतराग हो गये थे। उनकी सान्ध्य-सभा में जब कभी मैं शामिल होता,  वह कहीं भी एजेण्डे में न होती। टेलीविजन तिनकोनिया पार्क को घेरने वाले लगभग सभी घेरों में आ चुका था। हिन्दी के बेमिसाल किस्सागो मनोहर श्याम जोशी के गढ़े हुए पात्र इन घरों के सदस्य बन चुके थे। प्रसारण की तकनीकी गुणवत्ता में काफी सुधार हो गया था और अब चलती-बोलती तस्वीरों की रबड़ के टुकड़े की मानिन्द खींच-तान नहीं होती थी। तवे- जैसे रिकार्ड की जगह कैसेट्स और उसमें भी टी सिरीज के आने से मनचाहे गाने जब चाहे सुनने का अधिकार निम्न मध्यवर्गीय जनों को भी मिल गया था। रेडियो सीलोन से सिबाका गीतमाला सुनने के लिए तनी हुई रस्सी पर चलने की अब जरूरत नहीं थी।

इन्हीं वर्षों में वैशाली के ठीक सामने वह फ्लाई ओवर बनाकर तैयार हुआ था,  जो रेलवे क्रासिंग के ऊपर से निकलता हुआ राजेन्द्र नगर और कंकड़बाग को जोड़ता है। इसका निर्माण रुकवाने के लिए हॉल वालों ने काफी कोशिश की,  क्योंकि इससे वैशाली के सामने की जगह तंग हो रही थी और भव्यता आहत। इसका निर्माण रुकवाने के लिए शायद रिजर्व बैंक वालों और आसपास के दूसरे निवासियों ने भी कोशिश की,  क्योंकि फ्लाई ओवर के साथ चोरी-झपटमारी का कोई नजदीकी रक्त-सम्‍बन्‍ध उन्होंने ढूँढ़ निकाला था। पर विरोध के बावजूद जैसे वैशाली का बनाना नहीं रुका था,  वैसे ही फ्लाई ओवर का बनना भी नहीं रुका। ठीक-ठीक किस साल उसका काम पूरा हुआ,  मुझे याद नहीं। पर इतना अवश्य याद है कि काम के दरम्यान वैशाली तक जाने वाले रास्ते की जो टूट-फूट हुई थी,  उसकी लम्बे समय तक कायदे से मरम्मत नहीं हो पायी और न ही मलबे को ठिकाने लगाया गया। वजह शायद ये हो कि मुख्य ट्रैफिक के लिए अब उस रास्ते की दरकार नहीं रह गई थी। कंकड़बाग जाने के लिए इस फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं वैशाली को ऊपर से देखता,  तो वह उतनी विराट और उत्तुंग नहीं लगती थी।

वह नवें दशक के मध्य से थोड़ा आगे या पीछे का कोई दिन रहा होगा, जब फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं उसे देख कर ठिठक गया। वहाँ एक अस्वाभाविक वीरानगी थी। पार्किंग में कोई गाड़ी-स्कूटर नहीं,  पीछे साइकिल-स्टैण्ड भी खाली। टिकट काउण्टर के सामने क्यू के लिए लगाये गये लोहे के घेरे सूने पड़े थे। सामने की सीढ़ियों पर इक्का-दुक्का लोग थे,  जिन्हें देख कर लगा नहीं कि फिल्म देखने आये होंगे। सीढ़ियों के ऊपर शीशे के दरवाजे का एक पल्ला खोल कर पहलवान जी ने अपनी कुर्सी लगा रखी थी। दाहिनी ओर चारदीवारी के साथ किसी फिल्म की होर्डिंग लगी थी,  जिसकी फीकी रंगत बता ही थी कि फिल्म की किस्मत-जैसी भी रही हो,  होर्डिंग ने सिल्वर जुबली पूरी कर ली है। मुझे लगा कि हॉल बन्द पड़ा है। लौट कर साथियों से पूछताछ की,  तो पता चला कि उसे बन्द हुए दो महीने बीत चुके हैं। हॉल के चार हिस्सेदार थे, जिनमें कुछ अनबन चल रही थी। इस अनबन के बीच ‘कहानी फूलमती की’ और ‘नारद गाथा’- जैसी फिल्मों के सहारे वैशाली कई महीनों तक घिसटती रही। फिर जब अनबन अदालत तक पहुँच गई,  तब उसे बन्द कर दिया गया।

लगता है कि ‘हमन दुनिया से यारी क्या’  वाले इस स्वयंभू साहित्यकार को ही नहीं,  इसके स्थानीय भाई-बन्दों को भी वैशाली के बन्द होने से कोई फर्क नहीं पड़ा था। पड़ा होता,  तो उसे लेकर चर्चाएँ अवश्य होतीं और मैं दो महीने तक इस घटना से नावाकिफ न रहता।

सन् 89 में मैं दिल्ली आ गया। हर गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में पटना जाना होता। पता नहीं क्यों,  अब वैशाली की स्थिति और गति में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी। यह दिलचस्पी शायद वैसी ही थी, और है, जैसी किशोरावस्था में अपने बचपन की जंग लगी तिपहिया साइकिल और विकलांग गुड्डे-गुड़ियों को लेकर होती है। हर बार मैं यह सुनने के लिए कान खड़े रखता कि वैशाली का क्या मामला चल रहा है। एक बार सुना,  लालू प्रसाद यादव ने उसे खरीद लिया है (क्या इसलिए कि उसके बनने का समाचार सुनते ही हमने जे.पी. जिन्दाबाद का नारा लगाया था!) और वह दुबारा चालू होने वाली है। दूसरी बार सुना कि वह बात अफवाह थी। खरीदा किसी और ने है। चालू होने ही वाली थी कि पी.डब्ल्यू.डी. ने खतरनाक पाया। बिना पर्याप्त मरम्मत के उसे जनता के लिए खोला नहीं जा सकता और हालत ये है कि नये मालिक ने अपनी पाई-पाई उसे खरीदने में ही झोंक दी है,  अब वह मरम्मत नहीं करा सकता। तीसरी बार सुना कि उसे मालगोदाम में तब्दील करने की योजना है। यह मेरी अब तक की आखिरी जानकारी थी। जानकारी मिलते ही याद आया कि गांधी मैदान के सामने का एक सिनेमा हॉल ‘रीजेण्ट’  बहुत पहले कभी मालगोदाम हुआ करता था। इसे क्या कहें नियति का मजाक,  जिसका फलसफा बहुत पहले वैशाली में ही ‘ग्रैण्ड रिवाइवल’  पर देखी गई ‘वक्त’  ने समझाया था।

सन् 95 में अपनी ताजा-ताजा शादी के बाद मैं पटना गया था। पत्नी को लेकर फ्लाई ओवर की तरफ घूमने निकल गया। शाम धुँधलका था,  जब ऊपर चढ़ते हुए उस पर मेरी नजर पड़ी। उसके परिसर में धुँधलका थोड़ा और गहरा था,  क्योंकि अन्दर कहीं बिजली-बत्ती नहीं थी और बाहर की स्ट्रीट-लाइट उतने विशाल परिसर की चारदीवारी से चार-पाँच कदम आगे ही दम तोड़ देती थी। चारदीवारी से लगा हुआ बाहर का हिस्सा भी,  जहाँ कभी ठेलों,  खोमचों,  पान-सिगरेट की दुकानों और ढाबों का ताँता हुआ करता था,  बिल्कुल वीरान था। इस वीरानगी और नीम अन्धेरे में अपने सर पर नाम का मुकुट सजायें वह ऐसी दीख रही थी,  माने दरबार का पूरा तामझाम समेट लिए जाने के बावजूद कोई बादशाह जड़ाऊ हीरों से खाली कर दिये गये अपने तख्त पर बैठा हो। मैंने पत्नी को यह दृश्य दिखलाया। हम दोनों काफी देर तक फ्लाई ओवर की रेलिंग पर टिके उसे देखते रहे और मुझे रेणु के वे पात्र याद आये,  जो गौने के बाद घर आती अपनी पत्नियों को निलहे साहबों की कोठी दिखलाया करते थे।

‘‘जरा यहाँ गाड़ी धीरे-धीरे हाँकना! कनिया साहेब की कोठी देखेंगी। …यही है मकै साहब की कोठी।..वहाँ है नील महने का हौज!

नई दुलहिन ओहर के पर्दे को हटाकर घूँघट को जरा पीछे खिसकाकर झाँकती है- झरबेर घने जंगलों के बीच ईंट-पत्थर का ढेर! कोठी कहाँ है?

दूल्हे का चेहरा गर्व से भर जाता है- अर्थात् हमारे गाँव के पास साहेब की कोठी थी,  यहाँ साहेब-मेम रहते थे।’’    (मैला आँचल)