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तुलिका जुबान है : नि‍त्‍यानंद गायेन

 

कलाकार के पास अपनी अलग एक  भाषा होती है अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करने की। और उस भाषा को पढने /समझने के लिये भी एक विशेष आन्तरिक सम्‍वेदना की आवश्यकता होती है।

के. रविन्द्र उर्फ़  कुवर रविन्द्र  सिंह हमारे समय के उन सम्‍वेदनशील  कलाकारों में  हैं, जो आत्म प्रचार से कोसों दूर खड़े होकर अपनी सम्‍वेदनाओं और दक्षता को पेंसिल, रंग और तुलिका से आकृति प्रदान कर रहे हैं।

कलाकार अपनी भावना को जिस सहजता से कागज पर उतार देते हैं, उसके बारे में कुछ लिखना या कहना उतना ही मुश्किल है, क्योंकि कला और कलाकार अपने ही भीतर बहुत विशाल रूप में फैला होता है।

आज हिन्‍दी सहित्य की कोई भी ऐसी पत्रिका नही जो के. रविन्द्र की कला से अलंकृत होने से वंचित रही हो। यह पत्रिका और कलाकार दोनों के लिये गौरव का विषय है। इन पत्रिकाओं की एक लम्बी सूची है जिनमे इनकी 14000 (चौदह हजार) रेखांकन/चित्र के साथ कोई कवियों की कवितायेँ प्रकाशित हुई हैं।

और यह क्रम अभी जारी है। हम इस क्रम को इसी तरह आगे बढते हुए देखना चाहते हैं।
प्रदर्शनी :
रायपुर छत्तीसगढ़- 1979
ब्योहारी , मध्यप्रदेश- 1983
शहडोल, मध्यप्रदेश- 1983
विधानसभा सभागार, भोपाल- 1985
मध्यप्रदेश कला परिषद्, भोपाल- 1986
दंगा और दंगे के बाद, हिन्‍दी भवन, भोपाल- 1993
विवेकानंद सभागार, बेतुल- 1995
प्रकाशन :
साक्षात्कार, अक्षरा, वागर्थ, मधुमती, सारिका, धर्मयुग, कहानीकार, नई कहानियाँ, पहल, कथादेश, काव्या, हंस, नवभारत टाईम्स, संडे मेल, दिनमान, आजकल, नवनीत, वर्तमान साहित्य, समकालीन जनमत, समकालीन जनगाथा, संबोधन, कल के लिए, कृति ओर, संकेत, परिकथा जैसी साहित्यिक पत्रिकाओ के साथ देश की अनेकों व्यावसायिक-अव्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओ, पुस्तकों के मुख पृष्ठों पर अबतक लगभग 14000 (चौदह हजार) रेखांकन/चित्र के साथ कवितायें प्रकाशित
सम्मान :
सृजन सम्मान-1995, भोपाल(म.प्र.)
कलारत्न-1998, बिहार
सृजन सम्मान- 2003, रायपुर(छत्‍तीसगढ़)