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मुक्तिबोध लोकतंत्र के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले कवि

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नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध की मशहूर कविता के प्रकाशन के पचास वर्ष के मौके पर जन संस्कृति मंच के कविता समूह की ओर से 13 मई 2013 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान में लोकतंत्र के ‘अंधेरे में’ आधी सदी विषयक विचार-गोष्ठी आयोजित की गई। जसम के पिछले सम्मेलन में कविता, कहानी, जनभाषा, लोककला आदि के क्षेत्र में सृजनात्मकता को आवेग देने के लिए विशेष समूह बनाए गए थे। इस आयोजन से कविता समूह की गतिविधि का सिलसिला शुरू हुआ।
आयोजन की शुरुआत रंगकर्मी राजेश चंद्र द्वारा ‘अंधेरे में’ के पाठ से हुई।

इस मौके पर चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा ‘अंधेरे में’ के अंशों पर बनाए गए पोस्टरों को आलोचक अर्चना वर्मा ने तथा मंटो पर केंद्रित ‘समकालीन चुनौती’ के विशेषांक को लेखक प्रेमपाल शर्मा ने लोकार्पित किया।

विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि 57 से 63 तक मुक्तिबोध की यह कविता संभावना की कविता थी, पर 2013 में वास्तविकता की कविता है। यह एक ‘समग्र’ कविता है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस ‘वह’ की तलाश है, दरअसल वह जिंदगी के संघर्षों से अर्जित क्राँति-चेतना है। लेनिन के मुताबिक़ कई बार ‘फैंटेसी’ असहनीय यथार्थ के खिलाफ एक बगावत भी होती है। इस कविता में फैंटेसी पूँजीवादी सभ्यता की समीक्षा करती है। यह  मध्यवर्ग के आत्मालोचन की कविता भी है। अंधेरे से लड़ने के लिए अंधेरे को समझना जरूरी होता है। यह कविता अंधेरे को समझने और समझाने वाली कविता है।

आलोचक अर्चना वर्मा ने कहा कि मौजूदा प्रचलित विमर्शों के आधार पर इस कविता को पढ़ा जाए  तो हादसों की बड़ी आशंकाएं हैं। जब यह कविता लिखी गई थी, उससे भी ज्यादा यह आज के समय की जटिलताओं और तकलीफों को प्रतिबिंबित करने वाली कविता है। ऊपर से दिखने वाली फार्मूलाबद्ध सच्चाइयों के सामने सर  झुकाने वाली ‘आधुनिक’ चेतना के बरक्स मुक्तिबोध तिलस्म और रहस्य के जरिये सतह के नीचे गाड़ दी गयी सच्चाइयों का उत्खनन करते हैं। यह यह एक आधुनिक कवि की अद्वितीय उपलब्धि है।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सामाजिक बेचैनी की लहरों ने हमें दिल्ली में ला पटका था, हम कैरियर बनाने नहीं आए थे। उस दौर में हमारे लिए ‘अंधेरे में’ कविता बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। इस कविता ने हमारी पीढ़ी की संवेदना को बदला और अकविता की खोह में जाने से रोका। हमारे लोकतंत्र का अंधेरा एक जगह कहीं घनीभूत दिखाई पड़ता है तो इस कविता में दिखाई पड़ता है। पिछले पाँच दशक की कविता का भी जैसे केंद्रीय रूपक है ‘अंधेरे में’। यह निजी संताप की नहीं, बल्कि सामूहिक यातना और कष्टों की कविता है।

चित्रकार अशोक भौमिक ने मुक्तिबोध की कविता के चित्रात्मक और बिंबात्मक पहलू पर बोलते हुए कहा कि जिस तरह गुएर्निका को समझने के लिए चित्रकला की परंपरागत कसौटियाँ अक्षम थीं, उसी तरह का मामला ‘अंधेरे में’ कविता के साथ है। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह और उसके दमन तथा साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ वियतनाम के संघर्ष ने बाद की पीढि़यों को ‘अंधेरे में’ कविता को समझने के सूत्र दिए। ‘अंधेरे में’ ऐसी कविता है, जिसे सामने रखकर राजनीति और कला तथा विभिन्न कलाओं के बीच के अंतर्संबंधों को समझा जा सकता है।

‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक और आलोचक रामजी राय ने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ते हुए हम अंधेरे की नींव को समझ सकते हैं। पहले दिए गए शीर्षक  ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ में से अपने जीवन के अंतिम समय में आशंका के द्वीप को हटाकर मुक्तिबोध ने 1964 में ही स्पष्ट संकेत दिया था कि लोकतंत्र का अंधेरा गहरा गया है। ‘अँधेरे में’ अस्मिता या म‍हज क्रांतिचेतना की जगह नए भारत की खोज और उसके लिए संघर्ष की कविता है। मुक्तिबोध क्रांति के नियतिवाद के कवि नहीं हैं, वह वर्तमान में उसकी स्थिति के आकलन के कवि हैं। वह अपनी कविता में विद्रोह की धधकती हुई ज्वालामुखियों की गड़गडाहट दर्ज करते हैं। इस देश की पुरानी हाय में से कौन आग भड़केगी, जो शोषण और दमन के ढाँचे को बदल देगी, वह इस सोच और स्वप्न के कवि हैं। सही मायने में वह कविता के होलटाइमर थे।

विचार गोष्ठी का संचालन जसम, कविता समूह के संयोजक आशुतोष कुमार ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि मदन कश्यप, कथाकार महेश दर्पण, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, वरिष्ठ कवयित्री प्रेमलता वर्मा, शीबा असलम फहमी, दिगंबर आशु, यादव शंभु, अंजू शर्मा, सुदीप्ति, स्वाति भौमिक, वंदना शर्मा, विपिन चौधरी, भाषा सिंह, मुकुल सरल, प्रभात रंजन, गिरिराज किराडू, विभास वर्मा, संजय कुंदन, चंद्रभूषण, इरफान, हिम्मत सिंह, प्रेमशंकर, अवधेश, संजय जोशी, रमेश प्रजापति, विनोद वर्णवाल, कपिल शर्मा, सत्यानंद निरुपम, श्याम सुशील, कृष्ण सिंह, बृजेश, रविप्रकाश, उदयशंकर, संदीप सिंह, रोहित कौशिक, अवधेश कुमार सिंह, ललित शर्मा, आलोक शर्मा, मनीष समेत कई जाने-माने साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और प्रकाशक मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। इस मौके पर फोनिम, लोकमित्र और द ग्रुप की ओर से किताबों, फिल्मों के सीडी और कविता पोस्टर के स्‍टॉल भी लगाए गए थे।

सुधीर सुमन राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

कवि-कथाकार महाप्रकाश को जसम की श्रद्धांजलि

नई दिल्ली: मैथिली की प्रगतिशील धारा के चर्चित कवि और कथाकार महाप्रकाश 19 जनवरी, 2013 को हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका फेफड़े और किडनी में संक्रमण का इलाज चल रहा था, वहीं उन्होंने आखिरी सांसें ली।

सहरसा (बिहार) के बनगाँव में 14 जुलाई 1949 को महाप्रकाश का जन्म हुआ था। 1968-69 से उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी। 1972 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘कविता संभवा’ की काफी चर्चा हुई थी। यात्री और राजकमल चौधरी के बाद वह मैथिली की प्रगतिशील धारा के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि थे। हाल में ही अंतिका प्रकाशन से उनका दूसरा कविता संग्रह ‘समय के संग’ प्रकाशित हुआ था। चांद, अंतिम प्रहर में, इश्तिहार, बोध, हिंसा, जूता हमर माथ प सवार अइछ, पंद्रह अगस्त, शांतिक स्वरूप आदि उनकी महत्वपूर्ण कविताएं हैं। उन्‍होंने कहानियाँ भी खूब लिखीं, लेकिन उनका कोई गम्‍भीर मूल्याँकन नहीं हुआ है। ध्वंस, दीवाल, खाली हौसला, अदृश्य त्रिभुज, बिस्कुट, पाखंड पर्व आदि उनकी चर्चित कहानियाँ हैं। ‘पाखंड पर्व’ में उन्होंने कुलीन मैथिली समाज की जनविरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। उनकी कविताओं और कहानियों का अनुवाद हिन्‍दी और बांग्ला में भी हुआ। उन्‍होंने अनुवाद का काम भी किया। मैथिली उपन्यासकार ललित के उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद ‘विपक्ष’ पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाओं में मिथिला का व्यापक जीवन नजर आता है। पूँजीवाद के खिलाफ अपनी रचनाओं में वह निरंतर मुखर रहे।

युवा पीढ़ी के रचनाकार महाप्रकाश के जबर्दस्त प्रशंसक रहे। उन्होंने कई नये रचनाकारों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। वह बहुत अच्छे वक्ता थे। गप्पें करना, संगीत सुनना और आत्मकथा पढ़ना उन्हें खासतौर से पसंद था। वह बेहद स्वाभिमानी और सम्‍वेदनशील थे। इस स्वाभिमान ने ही उन्हें जनसामान्य सा जीवन चुनने में मदद की और सम्‍वेदनशीलता ने प्रगतिशील विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाया। युवा कवि राजेश कमल के अनुसार वह अक्सर दुनिया जहान में घट रही घटनाओं को लेकर फोन करते थे और बताते कि क्या गलत है और क्या सही है। फोन पर वह अपनी कविता या कहानी के बारे में बात लगभग नहीं करते थे।
महाप्रकाश के शव को 19 जनवरी को शाम में लोधी रोड, नई दिल्ली के विद्युत शवदाहगृह में अग्नि के हवाले किया गया। इस मौके पर उनके बेटों और करीबी परिजनों के साथ कहानीकार गौरीनाथ, आलोचक श्रीधरम, कवि रमण, युवा कवि खालिद, भाकपा-माले केंद्रीय कमेटी सदस्य प्रभात कुमार, सुधीर सुमन आदि मौजूद थे।

बिहार की राजधानी पटना में 20 जनवरी को जन संस्कृति मंच के राज्य कार्यालय में महाप्रकाश की स्मृति में शोकसभा हुई, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन, कवि राजेश कमल, प्रतिभा, संतोष सहर, रंजीव, रंगकर्मी संतोष झा और समता राय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

मातृभाषा, साहित्य और प्रगतिशील विचारधारा तथा नई रचनाशीलता के प्रति अपने गहरे समर्पण के लिए वह हमेशा याद आएंगे। जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

मंटो के नाटक को नहीं दिखाया जाना विडम्‍बनापूर्ण : जसम

Saadat Hasan Manto

नई दिल्‍ली : मंटो को समर्पित भारत रंग महोत्सव में मंटो के ही नाटक को न दिखाया जाना विडम्‍बनापूर्ण है। नियंत्रण रेखा पर जो भी विवाद और तनाव है उसका राजनयिक हल तलाश किया जाना चाहिए, उसका इस्तेमाल देश के अंदर अंधराष्ट्रवादी-साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने और लोकतान्त्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने के लिये नहीं किया जाना चाहिए। मंटो भारत-पाकिस्तान विभाजन की मूर्खता और अतार्किकता को दिखाने वाले तथा साम्प्रदायिक उन्माद का विरोध करने वाले लेखक हैं और दोनों देशों की साझी संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। मंटो ने आज से कई गुना अधिक तनाव और साम्प्रदायिक कत्लेआम के दौर में भी अपना विवेक नहीं खोया था। हम उस विवेक के साथ हैं। सांस्कृतिक एकता और प्रगतिशील-सेकुलर मूल्यों के जरिए ही भारत-पकिस्तान की जनता का भविष्य बेहतर हो सकता है। इस बेहतरी की जो सांस्कृतिक लड़ाई है उसमें मंटो की रचनाएँ आज भी मददगार हैं। दोनों देशों की सरकारें जिस तरह के साम्प्रदायिक-युद्धोन्माद की राजनीति का खेल खेलती रहती हैं, हम संस्कृतिकर्मी और कलाकार इसके विरोधी हैं। हम इसे बरदाश्‍त नहीं करेंगे कि इसकी आड़ में मंटो के नाटक के मंचन को रोक दिया जाए। आज के वक्त में मंटो की रचनाओं को याद किया जाना और जरूरी है।

भारत रंग महोत्सव में 19 जनवरी, 2013 को अजोका थियेटर के नाटक न दिखाए जाने के निर्णय के बाद पत्रकारों-बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों ने इस नाटक का मंचन अपनी पहल पर करवाकर जो पहल की है, उसका हम जन संस्कृति मंच की ओर से स्वागत करते हैं।

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

आजादी, बराबरी और इंसाफ तथा उसके लिए प्रतिरोध महान जीवन मूल्य है : जन संस्कृति मंच

सुधीर सुमन

नई दिल्ली: हम उस बहादुर लड़की के प्रतिरोध का गहरा सम्मान करते हैं,  जिसने 16 दिसंबर की रात अपनी आजादी और आत्मसम्मान के लिये अपनी जान को दाँव पर लगा दिया और बलात्कारियों द्वारा नृशंस तरीके से शरीर के अंदरूनी अंगों के क्षत-विक्षत कर देने के बावजूद न केवल जीवन के लिये लम्‍बा संघर्ष किया, बल्कि  न्याय की अदम्य इच्छा के साथ शहीद हुई। आजादी, बराबरी और इंसाफ तथा उसके लिए प्रतिरोध महान जीवन मूल्य है, जिसकी हमारे दौर में बेहद जरूरत है। जन संस्कृति मंच लड़की के परिजनों और करोड़ों शोकसंतप्त लोगों की प्रति अपनी संवेदनात्मक एकजुटता जाहिर करता है।

यह गहरे राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक शोक की घड़ी है। हम सबके दिल गम और क्षोभ से भरे हुए हैं। हमारे लिये इस लड़की का प्रतिरोध इस देश में स्त्रियों को साथ हो रहे तमाम जुल्मो-सितम के प्रतिरोध की केंद्रीय अभिव्यक्ति रहा है। जो राजनीति, समाज और संस्कृति स्त्रियों की आजादी और बराबरी के सवालों को अभी भी तरह-तरह के बहानों से उपेक्षित कर रही है या उनके प्रति असंवेदनशील है या उनका उपहास उड़ा रही है, उनको यह संकेत स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि जब स्वतंत्रता, सम्मान और समानता के अपने अधिकार के लिये जान तक कुर्बान करने की घटनाएं सामने आने लगें,  तो वे किसी भी तरह वक्त को बदलने से रोक नहीं सकते।

इस देश में स्त्री उत्पीड़न और यौन हिंसा की घटनाएं जहाँ भी हो रही हैं, उसके खिलाफ बौद्धिक समाज, संवेदनशील साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और आम नागरिकों को वहाँ खड़ा होना होगा और जाति-सम्‍प्रदाय की आड़ में नृशंस स्त्री विरोधी मानसिकता और कार्रवाइयों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति की  मुखर मुखालफत करनी होगी, समाज, प्रशासन तंत्र और राजनीति में मौजूद स्त्री विरोधी सामंती प्रवृत्ति और उसकी छवि को मौजमस्ती की वस्तु में तब्दील करने वाली उपभोक्तावादी अर्थनीति और संस्कृति का भी सचेत प्रतिवाद विकसित करना होगा, यही इस शहीद लड़की के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अनियंत्रित पूँजी की संस्कृति जिस तरह हिंस्र आनंद की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही और जिस तरह वह पहले से मौजूद विषमताओं को और गहरा बना रही है,  उससे मुकाबला करते हुए हमें एक बेहतर समाज और देश के निर्माण की ओर बढ़ना होगा।

आज इस देश की बहुत बड़ी आबादी आहत है और वह अपने शोक की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना चाहती है, वह इस दुख के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करना चाहती है, लेकिन उसके दुख के इजहार पर भी पाबंदी लगाई जा रही है। इस देश की राजधानी को जिस तरह पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है, जिस तरह मेट्रो स्‍टेशन बंद किए गए हैं, जिस तरह बैरिकेटिंग करके जनता को संसद से दूर रखने की कोशिश की गई है, वह दिखाता है कि इस देश का शासकवर्ग जनता के शौक से भी किस तरह खौफजदा है। अगर जनता के दुख-दर्द से इस देश की सरकारों और प्रशासन की इसी तरह की दूरी बनी रहेगी और पुलिस-फौज के बल पर इस तरह लोकतंत्र चलाने की कोशिश होगी, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता की वेदना की नदी ऐसी हुकूमतों और ऐसे तंत्र को उखाड़ देने की दिशा में आगे बढ़ चलेगी।

सुधीर सुमन, जसम राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी

पहला कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान 20 को

2 अक्टूबर 2011 को दूरदर्शन के चर्चित प्रोड्यूसर, कवि और चित्रकार कुबेर दत्त का अचानक निधन हो गया था। उनकी शोकसभा में जसम ने तय किया था कि उनकी याद में हर साल मीडिया और साहित्य-संस्कृति विषय पर एक स्मृति व्याख्यान आयोजित किया जाएगा। 20 अक्टूबर को शाम 5.30 बजे गाँधी शांति प्रतिष्ठान में हो रहे जन संस्कृति मंच के आयोजन में पहला कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान हिन्‍दी के चर्चित कवि और कुबेर दत्त के मित्र मंगलेश डबराल देंगे। व्याख्यान का विषय- ‘साहित्य और जनमाध्यम’ है।

दरअसल कुबेर दत्त ने दूरदर्शन के माध्यम से आम अवाम को न केवल अपने देश के श्रेष्ठ जनपक्षीय साहित्य और कलात्मक सृजन से अवगत कराया, बल्कि  दुनिया के महान साहित्यकारों और कलाकारों से भी परिचित कराया। उदाहरण के लिये खलील जिब्रान, तोल्सतोय, चेखव, लू-शून, चोमा द कोरोस, हेंकोवस्की, बारान्निकोव, रेरिख, एलिजाबेथ ब्रूनर, एलियास लोन्रोट, क्रिस्तोफ ब्रिस्टी, चेलिशेव, ओदोनेल स्मेकेल, ज्यां पाल सात्र, देरिदा, एडवर्ड सईद, ओलिवियर टोड, नोम चोमस्की, प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, महादेवी, पंत, किशोरीदास वाजपेयी, बच्चन, अज्ञेय, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर, शिवमंगल सिंह सुमन, केदारनाथ अग्रवाल, भवानी प्रसाद मिश्र, चंद्रकिरण सौनरिक्शा, अमृत राय, गिरिजा कुमार माथुर, विष्णुचंद्र शर्मा, मुज्तबा हुसैन, हंसराज रहबर, कमला देवी चटोपाध्याय, विष्णु प्रभाकर, भीष्म साहनी, पद्मा सचदेव, इस्मत चुगताई, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, मार्कंडेय, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, वरवर राव, स्वदेश दीपक, गोपालदास नीरज, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, कुमार विकल, विष्णु खरे, केदारनाथ सिंह इब्बार रबी, लीलाधर जगूड़ी, गिरधर राठी, रमनाथ अवस्थी, रामकुमार कृषक, तसलीमा नसरीन, त्रिनेत्र जोशी, पंकज सिंह, मंगलेश डबराल, सुरेश सलिल, अनामिका, अजय सिंह, धनंजय सिंह, बल्ली सिंह चीमा, विष्णु नागर, असद जैदी, मदन कश्यप, देवी प्रसाद मिश्र, कात्यायनी जैसे कई साहित्यकार हैं, जिन पर उन्होंने कार्यक्रम बनाए या उनका इंटरव्यू लिया या उनके साथ मिलकर कार्यक्रम तैयार किया। ऋत्विक घटक, नेत्रसिंह रावत, नेमीचंद्र जैन, सफदर हाशमी जैसे फिल्मकार और रंगकर्मियों पर भी उन्होंने कार्यक्रम तैयार किये। इसी तरह रजा, जे. स्वामीनाथन, विवान सुंदरम, गुलाम रसूल संतोष, हरीप्रकाश त्यागी जैसे चित्रकारों, हरि प्रसाद चैरसिया, उस्ताद अली अकबर खां जैसे संगीतकारों पर भी उन्होंने कार्यक्रम बनाए। पिकासो की पेंटिंग पर सत्तर कडि़यों का धारावाहिक उन्होंने बनाया। नेल्शन मंडेला पर बनाया गया उनका कार्यक्रम भी काफी चर्चित रहा। अपने कार्यकाल में उन्होंने हजारों साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को दूरदर्शन के लिये रिकार्ड किया और उन पर कार्यक्रम बनाए। संत कबीर की छह सौवीं जयंती हो या मई दिवस या सुलेखन का इतिहास- वह मानो अपने समय के हर संदर्भ को दर्ज कर देना चाहते थे। हाल ही में गुजरे रामविलास शर्मा के छोटे भाई रामशरण शर्मा ‘मुंशी’ द्वारा राम की शक्तिपूजा के पाठ की रिकार्डिंग भी दूरदर्शन के पास है, यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। उनकी जीवनसंगिनी कमलिनी दत्त बताती हैं कि नई सदी के शुरुआत में एक साल उन्होंने हर दिन के लिये एक प्रोग्राम तैयार किया, जिसमें अगर किसी रोज अल्यूमुनियम दिवस था, तो उस पर भी प्रोग्राम उन्होंने बनाया।

कुबेर दत्त ने 25 वर्षों तक ‘पत्रिका’ कार्यक्रम का निर्देशन किया। 12 वर्षों तक श्रोताओं के पत्रोत्तर का कार्यक्रम ‘आप और हम’ पेश किया। आईना, कला परिक्रमा, पहल, जनवाणी, सरस्वती, फलक, सृजन, किताब की दुनिया आदि कार्यक्रमों के जरिये उन्होंने अपने समय के काफी महत्वपूर्ण प्रसंगों, संदर्भों और बहसों को दर्ज किया। वह दूरदर्शन में एक अधिकारी थे, लेकिन सत्ता की संस्कृति के विरोधी थे और भरसक उन्होंने जनता के पक्ष में खड़े होकर कार्यक्रम बनाये। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जसम के बहुतेरे आयोजनों को उन्होंने कवर किया या कवर करवाया। दूरदर्शन का अधिकारी रहते हुए क्रांतिकारी कवि वरवर राव पर आयोजन करवाने में वह जरा भी नहीं हिचके। इसकी एक बानगी है उनकी रिपोर्ट- दो हज़ार के टिकेट पर एक करोड़ का राम, जिसमें उन्होंने एक करोड़ रुपये खर्च कर रामलीला के नाम पर किये जाने वाले तमाशे का विरोध किया था। आज जब 3-3 करोड़ के खर्चे से ‘अंधा युग’ और ‘तुगलक’ हो रहा है,  और पूरे देश में रंगकर्म की दशा खराब है, तब कुबेर जी की याद आती है  कि वह होते तो इसका जरूर विरोध करते।

कुबेर दत्त जैसा प्रतिबद्ध कार्यक्रम निर्माता दूरदर्शन या प्राइवेट चैनलों में अब शायद ही कोई मिले। अब जबकि दूरदर्शन और प्राइवेट चैनलों ही नहीं, बल्कि अखबारों से भी साहित्य गायब होता जा रहा है, तब साहित्य और जनमाध्यम पर विचार करना,  दरअसल विचार और संवेदना को जनमाध्यमों के केंद्र  में लाने की एक छोटी सी कोशिश है, जो कुबेर जी को याद करते हुए की जा रही  है।

कुबेर स्मृति आयोजन में कमलिनी दत्त उनके कुछ  कार्यक्रमों, उनके फोटोग्राफ्स, उनके मूड्स और उनकी खासियत पर केंद्रित एक वीडियो प्रस्तुत करेंगी। इसके अलावा उनकी बेटी पुरवाधनश्री, भाई सोमदत्त शर्मा के साथ वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चित्रकार हरिपाल त्यागी, कवि रामकुमार कृषक, पंकज सिंह, कृष्ण कल्पित, मदन कश्यप, श्याम सुशील और चंद्रभूषण कुबेर की दुनिया से गुजरने के अपने अनुभवों को प्रस्तुत करेंगे। जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय समेत कई महत्वपूर्ण साहित्यकार इस आयोजन में मौजूद रहेंगे।

आयोजन स्थल पर कुबेर दत्त की कविता और पेंटिंग से बनाए गए पोस्टर भी लगाए जाएंगे।

आम आदमी के संघर्षों को अभिव्यक्ति देनी होगी: जितेंद्र कुमार

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता जि‍तेंद्र कुमार।

आरा: संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को आम आदमी के बीच जाना होगा, उनके संघर्षों को अभिव्यक्ति देनी होगी, यही अदम गोंडवी जैसे जनता के शायर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जनता की सच्चाई की अभिव्यक्ति के लिए रचनाकारों को ज्यादा मेहनत करनी होगी। जसम, भोजपुर द्वारा 8 जनवरी, 2012 को आयोजित कार्यक्रम ‘स्मृति अदम गोंडवी’ के मुख्य वक्ता कवि आलोचक जितेंद्र कुमार ने यह कहा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आलोचक रवीन्‍द्रनाथ राय ने कहा कि अदम की रचनायें परिवर्तन का हथियार हैं। उनकी गजलें भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और शोषण के खिलाफ लगातार खड़ी रहेंगी। भोजपुर में क्रांतिकारी जन आंदोलन के साथ अदम की रचनाशीलता का गहरा रिश्ता था। उनकी गजलें यहाँ के आंदोलनकारियों के जुबान पर रही हैं।

अध्यक्ष मंडल में शामिल वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने अदम गोंडवी से हुई मुलाकात की चर्चा करते हुए कहा कि समाज के प्रति दायित्व से जुड़ी और जनता के हित में लेखन-चिंतन की जो अदम गोंडवी की परंपरा रही है, उसे आगे बढ़ाना होगा। यही उन्हें याद करने की सार्थकता होगी। रामनिहाल गुंजन ने अपनी कविता ‘नया अमन राग’ का पाठ भी किया।

संचालक सुधीर सुमन ने अदम गोंडवी पर लखनऊ के संस्कृतिकर्मी श्याम अंकुरम द्वारा लिखे गए एक ‘संस्मरणात्मक स्मृति लेख’ का पाठ किया, जिसमें उनके घुमक्कड़ और विद्रोही स्वभाव तथा क्रांतिकारी वामपंथी राजनीति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का विस्तार से जिक्र किया गया है।

अदम गोंडवी की गज़ल सुनाती रजनी शाक्या।

अदम गोंडवी पर केंद्रित यह कार्यक्रम जनता के प्रति प्रतिबद्ध रचनाशीलता की नयी आहट का भी संकेत दे गया। शुरुआत छोटी उम्र की बेहद प्रतिभाशाली गायिका रजनी शाक्या की सुमधुर आवाज में अदम गोंडवी की एक गजल ‘हि‍न्‍दू या मुस्लिम के एहसासात को मत छेडि़ए/ अपनी कुर्सी के लिए जज्बात को मत छेडि़ए’ से हुआ। उसके साथ उसके भाई ऋषिकेश ने भी अदम की गजल ‘जो डलहौजी न कर पाया वो हुक्काम कर देंगे/कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे’ को गाकर सुनाया। ‘युवानीति’ के राजू रंजन ने उनकी रचना ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं/दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है’ और ‘भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो’ को गाकर सुनाया।

इस मौके पर अरुण प्रसाद, राकेश दिवाकर, सुमन कुमार सिंह, सुनील चौधरी, जनगीतकार विजेंद्र अनिल के पुत्र सुनील और अरविंद अनुराग ने नये जनगीतों और कविताओं का पाठ किया। अरुण शीतांश और मिथिलेश ने अदम गोंडवी की गजलों का पाठ किया। शंकर प्रसाद ने पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’ की पंक्तियां सुनाईं। छोटी उम्र की निशा कुमारी से लेकर वरिष्ठ कवि जगतनंदन सहाय और जर्नादन मिश्र ने अपनी कविताओं तथा राजदेव करथ, केडी सिंह और केशव प्रसाद ठाकुर ने भोजपुरी की रचनाओं का पाठ किया। शायर ए.के. आँसू और एस.एम. आजाद ने अपनी गजलों के जरिये इस कार्यक्रम को जोश से भरा। संतोष श्रेयांश और सुनील श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं के जरिये प्रगतिशील-जनवादी काव्य परम्‍परा के ऊर्जावान होने का संकेत दिया।

कार्यक्रम में पूर्वी चंपारण में भिखारी ठाकुर की मंडली के कलाकार सीताराम पासवान के भीख मांगने की खबर पर रोष जाहिर करते हुए एक प्रस्ताव लिया गया, जिसमें कहा गया कि संस्कृति पर लाखों रुपये बहाने वालों के शासनकाल में जनता के संस्कृतिकर्मियों की यही वास्तविक स्थिति है, भोजपुर के संस्कृतिकर्मी इस मुद्दे को लेकर पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी, संस्कृति मंत्री और मुख्यमंत्री को एक हस्ताक्षरित पत्र भेजेंगे।

 

कार्यक्रम में राकेश दिवाकर, जितेंद्र जी और सुधीर सुमन द्वारा बनाए गए अदम गोंडवी के गजलों के पोस्टर भी लगाए गए।

(सुमन कुमार सिंह द्वारा जारी)

 

हर वर्ष गुरशरण सिंह की स्मृति में नाट्योत्सव और कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान का आयोजन करेगा जसम

स्‍मृति सभा में विचार व्‍यक्‍त करते विश्‍वनाथ त्रिपाठी।

नई दिल्ली: जन संस्कृति मंच हर वर्ष 27-28 सितंबर को इंकलाबी जन-नाट्यकर्मी गुरशरण सिंह की याद में  नाट्योत्सव तथा कवि-मीडियाकर्मी कुबेर दत्त की याद में मीडिया और संस्कृति से संबंधित विषयों पर कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान का आयोजन करेगा। इसी तरह समाजशास्त्री और आदिवासी संस्कृति के विश्लेषक रामदयाल मुंडा की याद में जसम की ओर से हर साल झारखंड में आदिवासी कला पर दो दिवसीय आयोजन किया जाएगा। जसम की ओर से गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित स्मृति सभा में यह घोषणा की गई।

स्मृति सभा की अध्यक्षता करते हुए आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि गुरशरण सिंह उम्मीद, उत्साह और संघर्ष के सर्जक कलाकार थे, उनमें लोककलाकारों वाली खासीयत थी। कुबेर दत्त बहुत अच्छे कवि थे। अपनी पत्नी कमलिनी दत्त के केरल में इलाज के दौरान उन्होंने जैसी कविताएं लिखीं, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की वैसी कविताएं दूसरों के पास कम दिखाई देती हैं। रामदयाल मुंडा आदिवासी जिंदगी के व्याख्याकार और विश्लेषक होने के साथ कवि भी थे।

प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने गुरशरण सिंह  से संबंधित अपनी याद को साझा करते हुए कहा कि जब तक जुल्म, अन्याय और शोषण जारी है, तब तक गुरशरण सिंह प्रांसगिक रहेंगे, जब तक रात बाकी है, तब तक उनकी बात भी बाकी है। गौतम नवलखा ने उन्हें मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कार्यकर्ता के बतौर याद किया। श्रमिक संगठन एक्टू के महासचिव सपन मुखर्जी ने कहा कि गुरशरण सिंह पूरी जिंदगी कम्युनिस्ट बने रहे। इंकलाब ही उनके जीवन का उद्देश्य था। खालिस्तानियों और राजसत्ता के आतंक के दौर में जब पंजाब में वाम पार्टियां पीछे चली गईं, तब उन्होंने कम्युनिस्टों की आवाज को जिंदा रखा। कवि इब्बार रब्बी ने भी अलगाववाद के दौर में गुरशरण सिंह के संघर्ष को याद किया तथा रामदयाल मुंडा के जीवन को एक आदिवासी के संघर्ष की लंबी दास्तान बताया। युवा फिल्मकार अजय भारद्वाज ने कहा कि गुरशरण सिंह के नाटकों को करना या देखना एक स्पष्ट पोलिटिकल पोजिशन लेने की तरह होता था। पंजाब में नक्सली आंदोलन को आगे ले जाने और राज्य दमन का प्रतिरोध करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। चित्रकार अशोक भौमिक ने उन्हें जनांदोलनों से उपजा नाटककार बताया। नाट्यकर्मी अरविंद गौड़ ने नुक्कड़ नाट्य आंदोलन में गुरशरण सिंह की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका को चिह्नित किया और कुबेर दत्त को दूरदर्शन में काम करने वाले एक जनवादी व्यक्ति के बतौर याद किया।

आलोचक मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह (जलेस) ने भूमिगत दिनों में गुरशरण सिंह से हुई मुलाकात का प्रसंग सुनाया तथा दूरदर्शन में साहित्य-संस्कृति को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने वाले संस्कृतिकर्मी के रूप में कुबेर दत्त को याद किया। आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी (प्रलेस) ने कहा कि साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों की एक पीढ़ी के लिए कुबेर दत्त दूरदर्शन का पर्याय हो गए थे। कवि त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि उनमें जो संवेदनशीलता थी, उसे दूरदर्शन जैसा माध्यम पूरा समेट ही नहीं सकता था। उद्भावना के संपादक अजेय कुमार ने कहा कि कुबेर दत्त ने वामपंथी संस्कृतिकर्म को दूरदर्शन में जगह दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वरिष्ठ गजलगो शेरजंग सिंह गर्ग ने उन्हें बहुमुखी सांस्कृतिक प्रतिभासंपन्न संवेदनशील व्यक्ति के तौर पर याद किया। वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु ने उनकी याद में एक लंबी कविता सुनाई। कुबेर दत्त के सहयोगी श्याम सुशील ने साहित्य-कला-संस्कृति के प्रति उनके जुनून को खास तौर पर चिह्नित किया। स्मृति सभा का संचालन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। सभागार में धर्मेद्र सुशांत और अभ्युदय द्वारा कुबेर दत्त की कविताओं पर बनाए गए पोस्टर भी लगाए गए थे। इस मौके पर मदन कश्यप, पंकज सिंह, सुरेश सलिल, वीरेन्द्र कुमार वर्णवाल, देवी प्रसाद मिश्र, जसम महासचिव प्रणय कृष्ण, भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, इरफान, महेश दर्पण, सतीश सागर, महेंद्र महर्षि समेत कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और राजनीतिकर्मी भी मौजूद थे।

सुधीर सुमन, जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से जारी

क्रांतिकारी नाट्यकर्मी गुरुशरण सिंह को जसम की श्रद्धांजलि‍

संस्कृति की दुनिया में शहीद भगत सिंह की विरासत के वाहक पंजाब के विख्यात रंगकर्मी गुरुशरण सिंह नहीं रहे। वह उम्र के 82 साल पूरे कर चुके थे।

भगत सिंह उनके सबसे बड़े प्रेरण-स्रोत थे और उनके जीवन और सन्देश को वह लगातार अपने नाटकों में जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते रहे। यह भी अजब संयोग है क़ि उनका निधन 28 सितम्बर को हुआ जो शहीद-ए-आज़म का जन्मदिवस है। चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ और दोपहर बाद उनकी अंत्येष्टि संपन्न हुई। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक और संस्कृतिकर्मी शामिल थे। शोक सभा इतवार को होगी। परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं।

महज 16 साल की उम्र में गुरुशरण सिंह ने कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और ता-उम्र कम्यूनिस्ट उसूलों पर कायम रहे। फोन पर जन संस्कृति मंच के साथियों से बात करते हुए गुरुशरण जी की बड़ी बेटी ने गर्व के साथ कहा क़ि उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहेगा क़ि उनके पिता ने कभी भी किसी सरकार के साथ कोई समझौता नहीं किया, अपने उसूलों से कभी पीछे नहीं हटे।

रसायन शास्त्र से एम्.एस.सी. करने के उपरांत वह पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में रिसर्च आफिसर के पद पर नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाखड़ा नांगल बाँध और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहीं काम करते हुए उन्होंने 1956 से अपनी क्रांतिकारी नाट्य-यात्रा शुरू की। जब वह नाटक करते तो उसमें बेटियों सहित उनका पूरा परिवार भाग लेता। देश-विदेश में उन्होंने हज़ारों प्रस्तुतियां कीं। बगैर साजो-सामान के जनता के बीच गावों, मुहल्लों, चौराहों और सड़कों पर मामूली संसाधनों के साथ नाटक करना उनकी नाट्य-शैली का अभिन्न अंग था। सामंती शोषण, पूंजीवादी लूट और दमन तथा साम्राज्यवाद के विरोध में जन-जागरण इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता। तमाम समसामयिक घटनाओं के सन्दर्भ भी मूलतः इन्हीं केन्द्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उनके नाटकों में नियोजित रहते थे।

गुरुशरण सिंह ने जनता के रंगमंच, आन्दोलनकारी और प्रयोगधर्मी थियेटर, ग्रामीण रंगमंच का पंजाब में उसी तरह विकास किया जैसा क़ि बादल सरकार ने बंगाल में। यह एक अखिल भारतीय प्रक्रिया थी जो देश में आमूलचूल बदलाव के लिए चल रहे जन-संघर्षों के साथ संस्कृतिकर्मियों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर चलने के संकल्प से उपजी थी। जिस तरह बादल सरकार मूल कर्मभूमि बंगाल होने के बावजूद कभी बंगाल तक सीमित नहीं रहे, वैसे ही गुरुशरण सिंह भी कभी पंजाब तक महदूद नहीं रहे। यही कारण था क़ि प्रधानतः हिंदी-उर्दू क्षेत्र के संगठन जन संस्कृति मंच के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वह दिल्ली में अक्टूबर 1985 में सम्पन्न हुए उसके स्थापना सम्मलेन में संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए। क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय महासचिव चुने गए।

गुरुशरण सिंह और अवतार सिंह ‘पाश’ ऐसे क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मी थे जिन्होनें 1980 के दशक में अलगाववादी आन्दोलन में सुलगते पंजाब में पूरी निर्भीकता के साथ गाँव- गाँव जाकर भगत सिंह के सपनों, भारतीय क्रान्ति की जरूरत, समाजवाद की ज़रूरत, सामंती शोषण और साम्राज्यवाद के विरोध की आवाज़ को बुलंद किया। ‘पाश’ इसी प्रक्रिया में शहीद हुए।

गुरुशरण जी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका से भी कभी गुरेज़ नहीं किया। ‘पंजाब लोक सभ्याचार मंच’ और ‘इंकलाबी मंच, पंजाब’ के तो वे संस्थापक ही थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे। भाकपा (माले) के बहुत करीबी हमदर्द रहे और लगातार उसके कार्यक्रमों में सरगर्मी से शिरकत करते रहे। वह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी महज कलाकार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और समर्पित संस्कृतिकर्मी की भूमिका में रहे। अपने अभिन्न मित्र बलराज साहनी की याद में उन्होनें ‘बलराज साहनी यादगार प्रकाशन’ की स्थापना कर सैकड़ों छोटी-बड़ी किताबों का प्रकाशन किया जिनकी कीमत बहुत ही कम हुआ करती थी। इन किताबों को वह अक्सर खुद अपने झोले से निकाल कर बेचा भी करते थे। उनके लिए कोई काम छोटा या बड़ा नहीं था।

लम्बे समय से बीमार रहने के बावजूद गुरुशरण जी सदैव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सजग और अपने उद्देश्यों के लिए सचेष्ट रहे। पंजाबी और हिन्दी में उनके ढेरों नाटक जनता की स्मृति में अमर रहेंगे। ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ या ‘जन्गीराम की हवेली’ जैसे उनके नाटक हिन्दी दर्शक भी कभी भूल नहीं सकते।

वह अपने सम्पूर्ण जीवन और संस्कृति-कर्म में जनवादी, खुशहाल और आज़ाद भारत के जिस सपने को साकार करने के लिए जूझते रहे, उसे ज़िंदा रखने और पूरा करने का संकल्प दोहराते हुए हम अपनी सांस्कृतिक धारा के जुझारू प्रतीक कामरेड गुरुशरण सिंह को जन संस्कृति मंच की और से लाल सलाम पेश करते हैं।

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

नागार्जुन की काव्य-चेतना ही जनचेतना है : आलोकधन्वा

बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने पिछले वर्ष उनके जन्‍मशताब्‍दी समारोह की शुरुआत की थी। इस वर्ष 25 जून को आरा में आयोजित समारोह के साथ यह संपन्‍न हो गया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-

आरा : नागार्जुन इसलिए बडे़ कवि हैं कि वे वर्ग-संघर्ष को जानते हैं। वे सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक कवि हैं। आज उन पर जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें उन्हें मार्क्सवाद से प्रायः काटकर देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि  नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते। नागार्जुन की कविता बुर्जुआ से सबसे ज्यादा जिरह करती है। उनकी कविताएं आधुनिक भारतीय समाज के सारे अंतर्विरोधों की शिनाख्त करती हैं। नागार्जुन की काव्य धारा हिंदी कविता की मुख्य-धारा है। उनकी जो काव्य-चेतना है, वही जनचेतना है। यह बात नक्सलबाड़ी विद्रोह की धारा के मशहूर कवि आलोकधन्वा  ने नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून, 2011 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का उद्घाटन करते हुए कही।

उन्‍होंने खुद को भोजपुर में चल रहे सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य के लिए जितनी उसकी आत्मा अनिवार्य है, राजनीति भी उसके लिए उतनी ही अनिवार्य है। बेशक हमारा आज का दौर बहुत मुश्किलों से भरा है, लेकिन इसी दौर में नागार्जुन के प्रति पूरे देश में जैसी उत्कंठा और सम्मान देखने को मिला है, वह उम्मीद जगाता है। संभव है हम चुनाव में हार गए हैं, लेकिन जो जीते हैं, अभी भी विरोध के मत का प्रतिशत उनसे अधिक है। वैसे भी दुनिया में तानाशाह बहुमत के रास्ते ही आते रहे हैं। लेकिन जो शहीदों के रास्ते पर चलते हैं, वे किसी तानाशाही से नहीं डरते और न ही तात्कालिक पराजयों से विचलित होते हैं। भोजपुर में जो कामरेड शहीद हुए उन्होंने कोई मुआवजा नहीं मांगा। उन्होंने तो एक रास्ता चुना, कि जो समाज लूट पर कायम है उसे बदलना है, और उसमें अपना जीवन लगा दिया।

पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने उनके जन्मशताब्दी समारोहों की शुरुआत की थी और यह निर्णय किया था कि इस सिलसिले का समापन भोजपुर में किया जाएगा। उसी फैसले के अनुरूप नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का आयोजन किया गया।  जनता, जनांदोलन, राजनीति, इंकलाब और कविता के साथ गहन रिश्ते की जो नागार्जुन की परंपरा है, उसी के अनुरूप यह समारोह आयोजित हुआ। लगभग एक सप्ताह तक जनकवि नागार्जुन की कविताएं और उनका राजनीतिक-सामाजिक स्वप्न लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। अखबारों की भी भूमिका साकारात्मक रही। समारोह की तैयारी के दौरान आरा शहर और गड़हनी व पवना नामक ग्रामीण बाजारों में चार नुक्कड़ कविता पाठ आयोजित किए गए, जिनमें नागार्जुन के महत्व और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताया गया तथा उनकी कविताएं आम लोगों को सुनाई गईं। अपने जीवन के संकटों और शासकवर्गीय राजनीति व संस्कृति के जरिए बने विभ्रमों से घिरे आम मेहनतकश जन इस तरह अपने संघर्षों और अपने जीवन की बेहतरी के पक्ष में आजीवन सक्रिय रहने वाले कवि की कविताओं से मिले। यह महसूस हुआ कि जो जनता के हित में रचा गया साहित्य है उसे जनता तक ले जाने का काम सांस्कृतिक संगठनों को प्रमुखता से करना चाहिए। यह एक तरह से जनता को उसी की मूल्यवान थाती उसे सौंपने की तरह था।

नागार्जुन का भोजपुर से पुराना जुड़ाव था। साठ के दशक में वह पूर्वांचल नाम की संस्था के अध्यक्ष बनाए गए थे। जनांदोलनों में शामिल होने के कारण उन्हें बक्सर जेल में भी रखा गया था। नागार्जुन ने तेलंगाना से लेकर जे.पी. के संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक पर लिखा, लेकिन भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन में तो जैसे उन्हें अपना जीवन-स्वप्न साकार होता दिखता था। ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ जैसी कविताएं इसकी बानगी हैं।

बारिश दस्तक दे चुकी थी, उससे समारोह की तैयारी थोड़ी प्रभावित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद 25 जून को नागरी प्रचारिणी सभागार में लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी के बीच समारोह की शुरुआत हुई। सभागार के बाहर और अंदर की दीवारों पर लगाए गए  नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवियों की कविताओं पर आधारित राधिका  और अर्जुन द्वारा निर्मित आदमकद कविता-पोस्टर और बाबा नागार्जुन की कविताओं व चित्रों वाले बैनर समारोह स्थल को भव्य बना रहे थे। कैंपस और सभागार में बाबा की दो बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। बाबा के चित्रों वाली सैकड़ों झंडियां हवा में लहरा रही थीं।

विचार-विमर्श के सत्र में ‘प्रगतिशील आंदोलन और नागार्जुन की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिन्हें लगता है कि प्रगतिशीलता कहीं बाहर से आई उन्हें राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोशांबी, हजारी प्रसाद द्विवेदी  और नागार्जुन की परंपरा को समझना होगा। सारी परंपराओं को आत्मसात करके और उसका निचोड़ निकालकर प्रगतिशील आंदोलन को विकसित किया गया। हिंदी कविता में तो बाबा प्रगतिशीलता की नींव रखने वालों में से हैं। नागार्जुन की काव्य यात्रा के विभिन्न पड़ावों का जिक्र करते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि वे प्रगतिशीलता के आंदोलन के आत्मसंघर्ष के भी नुमाइंदे हैं। ऊंचे  से ऊंचे दर्शन को भी उन्होंने संशय से देखा। बुद्ध और गांधी पर भी सवाल किए। योगी अरविंद पर भी कटुक्ति की। वे किसी से नहीं डरते थे, इसलिए कि वे अपनी परंपरा में उतने ही गहरे धंसे हुए थे। बाबा शुरू से ही सत्ता के चरित्र को पहचानने वाले कवि रहे। नामवर सिंह 1962 के बाद के दौर को मोहभंग का दौर मानते हैं, लेकिन नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदार जैसे कवियों में 1947 की आजादी के प्रति कोई मोह नहीं था, कि मोहभंग होता। स्वाधीनता आंदोलन के कांग्रेसी नेतृत्व में महाजनों-जमींदारों के वर्चस्व को लेकर इन सबको आजादी के प्रति गहरा संशय था। नागार्जुन ने तो कांग्रेसी हुकूमत की लगातार आलोचना की। दरअसल प्रगतिशीलता की प्रामाणिक दृष्टि हमें इन्हीं कवियों से मिलती है। तेलंगाना के बाद साठ के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए किसानों की खुदमुख्तारी का जो संघर्ष नए सिरे से सामने आया, उसने प्रगतिशीलता और वर्ग संघर्ष को नई जमीन मुहैया की और सत्तर के दशक में जनांदोलनों ने नागार्जुन सरीखे कवियों को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में जितने भी जनांदोलन हुए, नागार्जुन प्रायः उनके साथ रहे और उनकी कमजोरियों और गड़बडि़यों की आलोचना भी की। लेकिन नक्सलबाड़ी के स्वागत के बाद पलटकर कभी उसकी आलोचना नहीं की। जबकि संपूर्ण क्रांति के भ्रांति में बदल जाने की विडंबना पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा। आज जिस तरीके से पूरी की पूरी राजनीति को जनता से काटकर रख दिया गया है और जनता को आंदोलन की शक्ति न बनने देने और बगैर संघर्ष के सत्ता में भागीदारी की राजनीति चल रही है, तब जनता की सत्ता  कायम करने के लिहाज से नागार्जुन पिछले किसी दौर से अधिक प्रांसगिक हो उठे हैं।

आइसा नेता रामायण राम ने नागार्जुन की कविता ‘हरिजन-गाथा’ को एक सचेत वर्ग-दृष्टि का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें जनसंहार को लेकर कोई भावुक अपील नहीं है, बल्कि एक भविष्य की राजनैतिक शक्ति के उभार की ओर संकेत है। उत्तर भारत में दलित आंदोलन जिस पतन के रास्ते पर आज चला गया है, उससे अलग दिशा है इस कविता में। एक सचेत राजनीतिक वर्ग दृष्टि के मामले में इससे साहित्य और राजनीति दोनों को सही दिशा मिलती है।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने ‘भोजपुर’ और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न विषय पर बोलते हुए कहा कि नागार्जुन अपने भीतर अपने समय के तूफान को बांधे हुए थे। मार्क्सवाद में उनकी गहन आस्था थी। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था कि बाजारू बीजों की निर्मम छंटाई करूंगा। जाहिर है उनके लिए कविता एक खेती थी, खेती- समाजवाद के सपनों की। भोजपुर उन्हें उन्हीं सपनों के लिए होने वाले जनसंघर्षों के कारण बेहद अपना लगता था और इसी कारण भगतसिंह उन्हें प्यारे थे। वह भारत में इंकलाब चाहते थे। उसे पूरा करना हम सबका कार्यभार है।

विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता डा. गदाधर सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार डा. नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक डा. रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष आलोचक रामनिहाल गुंजन ने की। संचालन सुधीर सुमन ने किया। डा.रवींद्रनाथ राय ने समारोह की शुरुआत में स्वागत वक्तव्य दिया और जनता के राजनीतिक कवि नागार्जुन के जन्मशताब्दी पर भोजपुर में समारोह होने के महत्व के बारे में चर्चा की। डा. गदाधर  सिंह ने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनके कविता पाठ में छात्रों की भारी उपस्थिति रहती थी। वे एक स्वतंत्रचेत्ता प्रगतिशील कवि थे।  उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, मजाज और गोपाल सिंह गोपाली पर केंद्रित समकालीन चुनौती के विशेषांक का लोकार्पण भी किया। डा. नीरज सिंह ने कहा कि बाबा नागार्जुन सीधे-सीधे किसान आंदोलन में शामिल हुए और किसान-मजदूरों की मानसिकता को जिया। वे चाहते थे कि परिवर्तन जब भी हो, मजदूर-किसानों के लिए हो। बाबा ने अपनी कविताओं के जरिए जनांदोलनों को शक्ति दी। रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा हमारे दौर के जनपक्षधर साहित्यकारों और जनता की राजनीति करने वालों के लिए बड़े प्रेरणास्रोत हैं। सही मायने में उन्होंने ही कविता को जनता के संघर्षों का औजार बनाया। कथाकार सुरेश कांटक ने एक संस्मरण सुनाया कि किस तरह बाबा को जब खून की जरूरत पड़ी, तो संयोगवश जिस नौजवान का खून उनसे मिला, वह भोजपुर का निवासी था। इस नाते भी बाबा कहते थे कि उनकी रगों में भोजपुर का खून दौड़ता है।

दूसरे सत्र की शुरुआत युवानीति द्वारा बाबा की चर्चित कविता ‘भोजपुर’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। उसके बाद कवि जितेंद्र कुमार की अध्यक्षता और कवि सुमन कुमार सिंह के संचालन में कविता पाठ हुआ, जिसमें कृष्ण कुमार निर्मोही, श्रीराम तिवारी, रामनिहाल गुंजन, जगतनंदन सहाय, दीपक सिन्हा, कुमार वीरेंद्र, संतोष श्रेयांश, ओमप्रकाश मिश्र, सरदार जंग बहादुर, सुनील चैध्री, रहमत अली रहमत आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। समारोह स्थल पर एक बुक स्टाल भी लगाया गया था। समारोह में शामिल होने के लिए उत्तर बिहार के जसम के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी सुरेंद्र प्रसाद सुमन के नेतृत्व में भोजपुर पहुंचे थे। 24 जून को इन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बाबा नागार्जुन के ननिहाल सतलखा चंद्रसेनपुर से की थी, जहां एक सभा में उनके ननिहाल के परिजनों ने उनकी मूर्ति स्थापना, पुस्तकालय और उनके नाम पर एक शोध संस्थान बनाने के लिए एक कट्ठा जमीन देने की घोषणा की। उसके बाद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी दरभंगा और समस्तीपुर में सभा करते हुए पटना पहुचे  और फिर 25 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में शामिल हुए। समारोह में जसम राष्ट्रीय पार्षद संतोष सहर, जसम बिहार के सचिव संतोष झा, कवि राजेश कमल, संस्कृतिकर्मी समता राय, प्रो. पशुपतिनाथ सिंह आदि भी मौजूद थे।

समारोह में बाबा नागार्जुन की कविता पाठ का वीडियो प्रदर्शन और कवि मदन कश्यप का काव्य-पाठ भी तय था। लेकिन ट्रेन में विलंब के कारण ये कार्यक्रम अगले दिन स्थानीय बाल हिंदी पुस्तकालय में आयोजित किए गए। कवि-फिल्मकार कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई नागार्जुन के काव्य पाठ के वीडियो का संपादन रोहित कौशिक ने किया है और इसके लिए शोध कवि श्याम सुशील ने किया है। करीब 13 मिनट का यह वीडियो नागार्जुन के सरोकार और कविता व भाषा के प्रति उनके विचारों का बखूबी पता देता है। बाबा इसमें मैथिली और बांग्ला में भी अपनी कविताएं सुनाते हैं। एक जगह इसमें नागार्जुन कहते हैं कि कविता में अगर कवि को गुस्सा नहीं आता, अगर वह निडर नहीं है, डरपोक है, तो बेकार है। इस वीडियो में बाबा नागार्जुन को कविता कविता पाठ करते देखना और उनके विचारों को सुनना नई पीढ़ी के लिए एक रोमांचक और उत्प्रेरक अनुभव था।
मदन कश्यप के एकल कविता पाठ की अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया। उन्होंने गनीमत, चाहतें, थोड़ा-सा फाव, सपनों का अंत और चिडि़यों का क्या नामक अपनी कविताओं का पाठ किया। उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां गौरतलब हैं-
सपने के किसी अंत का मतलब
स्वप्न देखने की प्रक्रिया का अंत नहीं है।
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गनीमत है
कि पृथ्वी पर अब भी हवा है
और हवा मुफ्त है…
गनीमत है
कि कई पार्कों में आप मुफ्त जा सकते हैं
बिना कुछ दिए समुद्र को छू सकते हैं
सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य देख सकते हैं
गनीमत है
कि गनीमत है।

इस तरह नागार्जुन जन्मशताब्दी  समारोह तीन दिनों तक चला, जो बाबा के जन्मस्थान सतलखा चंद्रसेनपुर से शुरू होकर भोजपुर में उनके महत्व और प्रासंगिकता पर विचार विमर्श से गुजरते हुए उनपर केंद्रित वीडियो के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ। यद्यपि भोजपुर के सांस्कृतिक जगत के लिए तो पूरा हफ्ता ही नागार्जुनमय रहा।

भोजपुर में नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह 25 को

आरा : जनकवि नागार्जुन के गांव तरौनी, दरभंगा से 26 जून 2010 को उनके जन्मशताब्दी समारोहों के आयोजन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका समापन 25 जून 2011 को नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा, भोजपुर में हो रहा है। यह भोजपुर के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी गर्व की बात है। दरअसल बाबा नागार्जुन का भोजपुर के सांस्कृतिक जगत और जनांदोलनों से गहरा संबंध था। साठ के दशक में आलोचक चंद्रभूषण तिवारी और उनके साथियों के सहयोग से बनाए गए पूर्वांचल संस्था के वह अध्यक्ष थे। बिहार में जनांदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था। एक बार वे बक्सर जेल में बंद किए गए थे।
बाबा ने मिथिलांचल में जन्म लिया था, पर पूरा देश उनके घर की तरह था। देश के विभिन्न इलाकों के साहित्याकारों और सामान्य जनता के पास उनसे जुड़ी बेहद आत्मीय और अंतरंग स्मृतियां हैं, पर भोजपुर से उनका खास लगाव था। यहां की क्रांतिकारी पंरपरा मानो उनके मिजाज में घुली हुई थी।  जुल्म और गैरबराबरी के रस्मो-रिवाज और शासकवर्ग के दमन-शोषण-उत्पीड़न का मुखर विरोध करने की जो उनकी प्रवृत्ति थी, वह भी उन्हें भोजपुर की माटी से जोड़ती थी। कभी हार न मानने वाली और बार-बार नए सिरे से संघर्ष के लिए उठ खड़े होने वाली जनता को वह बड़ी उम्मीद से देखते थे। इसी उम्मीद में वे संपूर्ण क्रांति आंदोलन में शामिल हुए, जिसमें भोजपुर के नौजवानों की भी अहम भूमिका थी, लेकिन वे जानते थे कि क्रांति सिर्फ सुगबुगाई है। जैसे ही संपूर्ण क्रांति संपूर्ण भ्रांति में तब्दील होती प्रतीत हुई, वे उससे बाहर आ गए। लेकिन किसी प्रयोग के असफल होने या उसकी गड़बडि़यों को लेकर पस्त और निराश होने वाले कवि वे नहीं थे। आपातकाल और 1977 में बेलछी जनसंहार के बाद के वर्षों में लिखी गई अपनी दो कविताओं- ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ में उन्होंने भोजपुर के किसान आंदोलन को नई उम्मीद से देखा। भगतसिंह ने अपने बहुचर्चित लेख में जिस दलित समुदाय को असली सर्वहारा कहा था, उनके राजनीतिक उभार की संभावना की ओर नागार्जुन ने ‘हरिजन गाथा’ कविता में स्पष्ट संकेत किया। बेशक इस संघर्ष ने भोजपुर को गैरजनतांत्रिक सामंती मूल्यों के खिलाफ एक नए जनवादी समाज के निर्माण के संघर्ष भूमि के रूप में देश-दुनिया में मशहूर कर दिया। बाबा नागार्जुन ही नहीं, बल्कि दूसरे लेखकों की रचनाओं में भी भोजपुर का संघर्ष मानवीय प्रगति के इतिहास के एक अहम दौर की तरह दर्ज हुआ।
बाबा नागार्जुन की चेतना में 1970 और 1980 का भोजपुर हमेशा के लिए पैवस्त रहा। ‘हरिजन गाथा’ में भोजपुर के आंदोलन की छाया साफ तौर पर दिखती है। उस दलित सर्वहारा नायक और उसकी राजनीति के बारे में लिखी गईं कुछ पंक्तियां देखने लायक है-
समझ-बूझकर ही समता का
असली मुद्दा पहचानेगा
अरे देखना इसके डर से
थर-थर कांपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे
इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा….
श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सबका उद्धार करेगा
आज यही संपूर्ण क्रांति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा
हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तकरार करेंगी।
अंतिम चार पंक्तियां गौर करने लायक है, जो इसका स्पष्ट संकेत करती हैं कि बाबा के लिए संघर्ष के रूपों का मामला उतना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि जनता की राजनीतिक मुक्ति, सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव यानी संपूर्ण क्रांति उनका मकसद था, और उसके लिए संघर्ष के सारे रूप उन्हें मंजूर थे। यही मकसद उन्हें भगतसिंह और उनके साथियों से जोड़ता था। और भोजपुर ने उन्हें इसलिए भी आकर्षित किया कि यहां उन्हें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद के प्रतिरूप दिखाई पड़े, भूमिपुत्रों का संग्रामी तेवर दिखाई पड़ा, जिसका उन्होंने ‘भोजपुर’ कविता में आह्लाद से स्वागत किया और खुद अपने जनकवि समेत सबको इससे जुड़ने का आह्वान किया।
बाबा नागार्जुन ने अपनी लेखनी से भोजपुर को अपूर्व गौरव प्रदान किया और साहित्य के इतिहास में हमेशा के लिए उसे गरिमापूर्ण जगह दी, इस नाते भी भोजपुरवासियों द्वारा उन्हें उनकी जन्मशताब्दी पर याद करने का खास अर्थ है। समारोह में ‘भोजपुर’ कविता और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय अपना वक्तव्य देंगे।
यह साल भारतीय उपमहाद्वीप में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन के 75 साल पूरा होने का भी साल है। बाबा नागार्जुन शुरू से लेकर जीवनपर्यंत इस प्रगतिशील-जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के साथ थे। वे इस सांस्कृतिक आंदोलन के बहुत बड़े जनकवि हैं। प्रगतिशील आंदोलन में उनकी भूमिका पर जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण अपना वक्तव्य देंगे। बाबा ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास भी लिखे। उनकी कविता, कहानी और उपन्यास पर चंद्रेश्‍वर, प्रो. नंदकिशोर नंदन, सुरेंद्र प्रसाद सुमन समेत कई विद्वान विचार रखेंगे। बाबा का रचनाकर्म जनांदोलनों के साथ साहित्य के अटूट रिश्ते की बानगी है। इस संबंध में कवि मदन कश्यप, रामायण राम, संतोष सहर आदि वक्तव्य देंगे। समारोह में बाबा की महत्वपूर्ण कविताओं को साहित्यकार पढ़ेंगे। साथ ही मदन कश्यप, चंद्रेश्‍वर समेत स्थानीय कवियों का कविता पाठ भी होगा।
बाबा ने अपनी एक कविता में कहा था-
जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं
जनकवि हूं साफ कहूगा, क्यों हकलाऊं।
दरअसल ऐसी साफगोई और बेबाकी, ऐसी जनपक्षधरता आज पहले से भी ज्यादा जरूरी है। बाबा नागार्जुन पर आरा में आयोजित समारोह कोई रस्मी आयोजन भर नहीं है, बल्कि इसका मकसद यह है कि बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाया जाए, बाबा के रचनात्मक मकसद को समझा जाए और उनके अधूरे स्वप्न को साकार करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाए। इसलिए भी समारोह में ज्यादा से ज्यादा आम लोगों की भागीदारी की कोशिश की जा रही है। बाबा जनता के कवि थे, साहित्य के जनरूपों का उन्होंने इस्तेमाल किया था। इसलिए मुख्य समारोह से पहले कुछ नुक्कड़ों पर उनकी कविताओं का पाठ भी किया जाएगा। सोमवार 20 जून को शाम में रेलवे स्टेशन परिसर, 22 जून को गड़हनी तथा 23 जून को वीर कुंवर सिंह पार्क के सामने बाबा की चुनिंदा कविताओं का जनता के समक्ष पाठ किया जाएगा। इस बीच समारोह से संबंधित बैनर और फेस्टून लगाने का काम शुरू हो चुका है।
भारी बारिश के बावजूद आज (19जून, 2011) जसम की प्रेस कांफ्रेंस ज्ञानपीठ पब्लिक स्कूल में हुई, जिसमें जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन, जनमत संपादक सुधीर सुमन, राष्ट्रीय पार्षद सुनील चौधरी और कवि सुमन कुमार सिंह मौजूद थे।

समारोह तैयारी समिति की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी