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भीमसेन त्यागी की कविताएं

कथाकार भीमसेन त्यागी प्रफुल्ल मुद्रा में पत्नी बाला त्यागी के साथ

कथाकार भीमसेन त्यागी का 19 सितंबर को जन्मदिवस है। अजीब इत्तेफाक है कि इसी दिन उनकी पुण्यतिथि भी है। उन्होंने बहुत अच्छे गीत और कविताएं लिखी हैं, लेकिन यह बात उनके निकटतम मित्रों में से भी बहुत कम लोग जानते हैं। उनकी कुछ कविताएं और गीत-

स्वागत गीत

प्राण  लगा  चंदा  की  बेंदी औ  तारों की वरमाला ले
 रात  चांदनी-सी  तुम आई!
 मन  होता  अपनी  कमजोरी  जाहिर कर दूं
 अपने  पापों  की  सब  सूची सम्मुख धर दूं
 लेकिन  तेरे  स्वप्न-जाल  की डोर  न टूटे
 सुख  का  यह साम्राज्य न  इतनी जल्दी छूटे
दुख कह देने का सुख पाऊं या सुख हरने का दुख पाऊं
 सोच-सोच  चेतना  गंवाई!

 नए-नए नित स्वप्न जुगाना तो अपन में बात बड़ी है
 इन सपनों के ऊपर ही तो संसृति की मीनार खड़ी है
 लेकिन महल रहे जो कल तक औ, अब गिरकर टूट चुके हैं
 याद कभी उनकी कर लेना पाप नहीं जो छूट चुके हैं
 मैंने मुड़कर देखा ही है अपने पिछले जीवन-पथ को
 तुम क्यों पगली-सी भरमाई!

 भला-बुरा जैसा जो कुछ कर कह आए हम
 सुख-दुख हर्ष-विषाद सभी जो सह आए हम
 भला यही अब उसको भूलें खुद को जानें
 आगे  जो  कुछ  करना  है उसको पहचानें
बहुत बार सोचा था मन ने, लेकिन कांप गया यह उस दिन
 जब उदासियां तुम पर छाईं!

गीत दर्द का होगा गाया

आज सांझ से ही ऐसा लगता है
जैसे चांद सलोना
बाद युगों के नभ में आया!

मेरा मन कुछ घबराया-घबराया-सा  है
लेकिन  घबराने  जैसी कुछ बात नहीं है
खिली  हुई  है यहां चांदनी पीली-पीली
नभ में काली रात नहीं है
काली  रात नहीं लेकिन लगता है मुझको
जैसे लखकर यह जहरीला चांद गगन में
तुमने  कोई  गीत  दर्द  का  होगा गाया!

आकर्षण की मदिरा पी तारों की टोली
नभ के आंगन में मस्ती से नाच रही है
आया  बासंती  बयार  का  पहला झोंका
सरिता नए प्यार की गीता बांच रही है
सरिता नए प्यार की गीता बांच रही औ
हम-तुम कितनी दूर सुनयने?
आज सोच यह, मेरा मन भर-भरकर आया!

विष के बदले चंदन बेच दिया

अब काया का मोह नहीं, यह चाहे जिस वन में भटके
पापों के व्यापारी को जब, मन का कंगन बेच दिया

अनचाहे सुख का जीवन, कितनी हसीन लाचारी था
क्या कह दूं, किससे कह दूं, यह सागर कितना खारी था
मत आंजो तुम आंख, मांग में मत सुहाग सिंदूर भरो
निर्जनता के बदले बांहों का मृदु बंधन बेच दिया

अपमानों का गदला पानी पी जीवन की बेल बढ़ी
और इसे था गर्व कि कितने-कितने ऊंचे शिखर चढ़ी
लेकिन क्षमा करो, मुझको मुरझाने दो, मिट जाने दो
दुख की पूंजी के बदले में सुख का क्रंदन बेच दिया

क्षण-क्षण पल-पल पर कड़वी दुविधा ने डेरा डाला था
मैं मकड़ी था और मुझे घेरे खुद मेरा जाला था
ऐसी हूक उठी मन में, रग-रग में ऐसा दर्द जगा
मैंने अभिशापों के बदले युग का वंदन बेच दिया

जिसको जीवन कहा मौत के घर की वह पगडंडी थी
आईं सांसें चार एक से एक अधिक ही ठंडी थी
और आज जब छोर पांव के नीचे सोच रहा हूं मैं
अब चलना कैसा जब विष के बदले चंदन बेच दिया

दे रहे तुम कसम

हम  सुनाते  रहे
तुम  छुपाते  रहे
  पीर फिर भी तुम्हारी
      मगर जान ली!

हारते  तुम  गए
जीतते  हम  गए
 जीत फिर भी तुम्हारी
       मगर मान ली!

दे रहे तुम कसम
है  पुरानी  रसम
 बात फिर भी तुम्हारी
       मगर मान ली!

शांति के कबूतर

विश्व शांति सम्मेलन में
उड़ाए गए कबूतर
उन्होंने शांति का संदेश
युद्ध के हैवानों तक पहुंचाया
और जब
वे लौटकर आए
तो कर दिए गए जिबह
पकाए गए देग में
शांति के पुजारियों ने
मनाया जश्न
छककर लिया महाभोज का मज़्ाा
कबूतर का मांस लजीज़्ा होता है
और
शांतिदूत कबूतर का मांस
कुछ ज्यादा ही लजीज्