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जहाँ मौत भी एक गिनती है : संजय जोशी

इंसेफेलाईटिस यानी जापानी बुखार गोरखपुर के आसपास के इलाकों के हजारों बच्चों को लील चुका है। वर्षों से चल रही इस महामारी को रोक पाने में सरकार नाकाम है। सरकारी कार्यप्रणाली का वीभत्स नमूना यह है कि इस साल टीकाकरण इसलिए नहीं हो पाया क्‍यों‍क‍ि टीके रखे-रखे खराब हो गए। द ग्रुप, जन संस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसायटी की टीम इस मुद्दे को बार-बार उठा रही है। हाल ही मैं टीम दोबारा प्रभावित क्षेत्र में गई। इस पर तैयार फिल्म को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा। द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी की रिपोर्ट-
2010 के मई महीने में हम कैमरा टीम के साथ गोरखपुर के आसपास के इलाकों में जापानी बुखार से हुई मौतों की कहानी दर्ज कर रहे थे। जून बीतते-बीतते बारिश का पानी फिर से गोरखपुर के आस-पड़ोस में जमने लगा। एक बार फिर से मस्तिष्क बुखार ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। 1978 से चली आ रही इस बीमारी से यूपी के सरकारी अस्पतालों में अब तक 12 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी अस्पतालों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों की सीमित पहुंच के आधार पर कहा जा सकता है कि दिमागी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या सरकारी अस्पतालों में मौतों से कई गुना अधिक होगी। हजारों बच्चों की मौत के बावजूद सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना पायी है। सरकारी उदासीनता और लापरवाही अपनी गुणात्मक मूर्खताओं के नित नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सरकार 27 वर्ष बाद इंसेफेलाईटिस के एक रूप जापानी इंसेफेलाईटिस के टीकाकरण का फैसला कर पाई, लेकिन चार वर्ष तक टीकाकरण करने के बाद इस वर्ष इसलिए टीकाकरण नहीं हो सका क्योंकि टीके रखे-रखे खराब हो गए।
जून में अखबारों से खबर मिली कि जापानी बुखार से बचाव के लिए जो टीके आये थे, वे प्रशीतन (ठण्ड) की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खराब हो गए और इस कारण टीकों का पूरा बैच निरस्त कर दिया गया। मतलब यह कि जापानी बुखार के विषाणुओं से बचने का इस बरस कोई रास्ता न था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री  अनंत कुमार मिश्र ने भी बचकाना बयान दे डाला कि हमने ग्रामीण इलाकों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुविधा सम्पन्न बना दिया है इसलिए बेवजह जिला अस्पतालों में आने का कोई मतलब नहीं है। इसी आपाधापी में अगस्त का महीना  बीत गया और बुखार के विषाणुओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। सितम्बर से एक बार फिर मौत की खबरें आनी शुरू हो गयीं। ये अलग बात है कि बच्चों की मौतों की रोज-रोज आने वाली खबरें अभी न्यूज रूम की टीआरपी नीति की नजर में न चढ़ने के कारण अदृष्य पेजों पर हाशिये  पर पड़ी थीं। ऐसे समय में हम भी अपनी कहानी में मौतों को दर्ज करने 8 सितम्बर की सुबह गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज पहुंचे। मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में जगह-जगह मरीजों के परिवार वाले व्यस्त रेल प्लेटफार्म की तरह यहां-वहां ठुंसे पड़े थे। कैमरामेन पंकज ने वार्ड का मुआयना किया और ट्राईपोड़ रख कर फ्रेम बनाने लगा। मई में इसी वार्ड में मस्तिष्क बुखार के इक्का-दुक्का मरीज थे। अब पंकज के हर फ्रेम में कई मासूम बच्चों के चेहरे कैद हो रहे थे। हर बेड पर कम से कम दो-तीन बच्चे और उनका पस्त पड़ा परिवार किसी तरह अटा पड़ा था। हर मां-बाप यही पूछ रहा था कि क्या हुआ उसके बच्चे को ? जूनियर डाक्टर जानता है कि इस बार तो टीका भी नहीं लगा है। इसलिए कमोबेश हर बच्चे को यहां से चुपचाप विदा लेनी है। वह भी बार-बार सिर्फ यही कह रहा था कि मस्तिष्क ज्वर है। इसका निदान कैसे होगा, यह किसी के मस्तिष्क में नहीं था। सारे मस्तिष्क जैसे एक क्रूर होनी को घटते हुए देखने के आदी हो चले थे। अस्पताल की दवाओं और गंदगी की बदबू की तरह बच्चों की मौतें साल दर साल घटने वाली एक रूढ़ि में तब्दील हो चुकी  थी। वार्ड में भीड़ न हो इस समझ से मैं गलियारे की बेंच पर बैठ गया। बगल में बैठी नौजवान मुस्लिम महिला ने सुबकते हुए मुझसे पेन और कागज मांगा। उस पर उसने किसी का मोबाइल नम्बर लिखा। उसका डेढ़ साल का बेटा भी मस्तिष्क बुखार से पीड़ित वार्ड में भरती था। उसके कई हफ्ते बीमारी को समझने में और अपने गाँव-कस्बे में ठोकर खाने में बीत गए।
काश ! मेरे पास कोई जादू होता और मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्र जी से पूछता यह बेचारी किस अस्पताल में जाए। अनंत मिश्र जैसों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में  दाखिल नहीं होंगे और न ही उनके घर तक मच्छर पहुंच सकेंगे।
तभी एक महिला अपनी 12 साल की अचेत बिटिया मधुमिता को गोद में उठाये बदहवास गैलरी में आती दिखाई दी। कुशीनगर के बड़गाँव टोला की उर्मिला और शारदा प्रसाद की बेटी मधुमिता को 15 अगस्त से दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। गाँव और कस्बे में इधर-उधर चक्कर काटने में ही इस परिवार के चार-पांच हजार रुपये खर्च हो गए। मधुमिता का मामा, जो पुलिस की वर्दी में था पहले उत्तेजना और हताशा में सरकार को कोसने लगा, फिर अचानक उसे अपनी वर्दी और नौकरी का खयाल आया तो लगभग बेचारगी में हमसे वीडियो रिकार्डिंग्स को डिलीट करने की मिन्नत करने लगा। मधुमिता को उसका भाई अंशु और पिता दोनों हाथों से उठाकर डाक्टर के केबिन में ले गए। बाहर रह गई उसकी माँ उर्मिला। रोते-रोते उर्मिला ने बताया कि कैसे इस बीमारी ने पूरे परिवार को सड़क पर खड़ा कर दिया है। रक्षाबंधन से शुरू हुए दौरे बंद होने का नाम नही ले रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने अपनी बिटिया को टीके लगवाये थे- लाचारी से भरा न सुनने को मिला।
मै फिर उस मुस्लिम महिला के बगल में जा बैठा। अभी तक उसका फोन नहीं आया था, लेकिन वार्ड की भयावहता से वह अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य का लेकर परेशान थी। इस वजह से वह रो-रोकर हलकान हुए जा रही थी। स्वास्थ्य मंत्री के दावे को चुनौती देने के लिए न्यूज एजेंसी एएनआई की टीम भी वार्ड के बीचों बीच मय ट्राईपौड और कैमरा माइकों में टीवी कंपनियों की नाम वाली तिकोननुमा लकड़ी के पट्टों के साथ तैयार थी। एजेंसी के रिपोर्टर कम कैमरामैन की दुविधा थी कि उन्हें कोई भी डाक्टर आधिकारिक वक्तव्य नहीं दे रहा था। इसके समाधान के लिए उन्होंने हमारे सहयोग के लिए आये गोरखपुर के पूर्व छात्र नेता एवं पत्रकार अशोक चौधरी को घेर लिया। अशोक चौधरी कुछ बोलते कि वार्ड के दूसरे कोने से गगन भेदती चीत्कारों ने हम सबको हिला दिया। यह वार्ड के एक कमरे के बाहर से उठी आवाजें थीं। उस समय ढाई साल के एक बच्चे की मौत की पुष्टि हुई थी। ये चीत्कारें उसी के परिवार की थीं।
बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में 8 सितम्बर की दुपहर 12 बजे हर दूसरा बच्चा इसी बीमारी का शिकार था। उस वार्ड में हर परिवार अपने ऊपर मंडरा रही मौत से आशंकित था। हम वार्ड के बाहर खड़े थे। बीच बगल के गलियारे से उस नन्हे शिशु के माँ-बाप, दादी, मौसी, चाची का समवेत क्रंदन हमारे ऑडियो चैनलों में रिकॉर्ड हो रहा था। थोड़ी देर बाद उस परिवार का मुखिया, संभवत उस नन्हे शिशु का दादा घुंघराले बालों वाले प्यारे शिशु को तेजी से लेकर बाहर निकला। शिशु को देखने के बाद उस परिवार का क्रंदन वार्ड की छतों को भेदता हुआ सबके भीतर तक घुसकर बेचैन कर रहा था। जब दादा ने बच्चे को पिता को सौंपा तो तब मृत देह की झूली हुई गति से ही समझ में आया कि ये घुंघराले बाल और सलोनी सूरत जल्द ही स्मृति बन कर रह जाएंगे। बदहवास कदमों से उस परिवार ने अपने नन्हे की अंतिम यात्रा एपिडेमिक वार्ड से शुरू की। उस नन्हे शिशु का सलोना चेहरा पूरे वार्ड को गहरी खामोशी और अवसाद में डुबा चुका था। हमने भी अपना ट्राईपौड समेटा और इमरजेंसी वार्ड के पास आ गए; तभी उसी तीव्रता वाली चीखों का शोर हैडफोन के जरिये मेरे कानों तक पहुंचा। दाहिनी तरफ नजर घुमाई तो वही मुस्लिम महिला दहाड़ माकर छाती पीट रही थी, जिसने आधा घंटा पहले मुझे वार्ड के गलियार में किसी परिचित का नम्बर लिखने के लिए पेन और कागज मांगा था। हमारे फ्रेम के क्लोज अप में उसका आंसुओं से भरा चेहरा और हेडफोन पर- अरे कोई मोर बेटवा के जिया दे…का करुण आर्तनाद था।
राघव दास मेडिकल कालेज, गोरखपुर में अपनी फिल्म के लिए मौत की कहानी दर्ज करते हुए हमें सिर्फ 30 मिनट बीते थे और हम दो मौतों को देख चुके थे। अब उस आधी मौत के बारे में पता करने का हौसला मुझ में नहीं बचा था, जो कुशीनगर के बड़गाँव  से आयी उर्मिला अपनी 12 साल की लगभग विकलांग हो चुकी मधुमिता को बचाने में घरबार बेचकर कर्ज में डूबकर हासिल कर चुकी थी।
हम मेडिकल कालेज से लौट रहे हैं। गाड़ी गोरखपुर की भीड़ वाली सड़कों और बरसाती पानी के जमाव के बीच रास्ता बनाते हुए जा रही है। रेलवे स्टेषन पहुंचते एक पत्रकार दोस्त का मैसेज मिला- सिक्स डाइड टूडे इन बीआडी मेडिकल कालेज।
(जनसत्ता, 19 सितम्बर रविवारीय मैगजीन से साभार)