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साहित्य में क्लासिक क्या है, यह नागार्जुन से सीखना होगा : वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

नई दि‍ल्‍ली : राजधानी के कस्बाई गाँव सादतपुर विस्तार स्थित जीवन ज्योति हा. सै. स्कूल के हरे-भरे प्रांगण में 21 नवंबर को  बाबा नागार्जुन का जन्मशती समारोह मनाया गया। बाबा गहरे जन-सरोकारों वाले कवि थे और समारोह भी इसकी गवाही दे रहा था। उसमें न सिर्फ नागार्जुन के रचनात्मक अवदान पर गंभीर चर्चा हुई, बल्कि उनकी रचनाओं को कला, संगीत, फिल्म, पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से भी उपस्थित किया गया। सुबह प्रभातफेरी से लेकर शाम को फिल्म-प्रदर्शन तक चले इस शताब्दी समारोह का आयोजन ‘सादतपुर साहित्य समाज’ ने किया था। इसमें सादतपुर के नागरिकों तथा दिल्ली और दिल्ली के बाहर से आए अनेक सुप्रतिष्ठ लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत चित्रकार हरिपाल त्यागी, द्वारा बनाए नागार्जुन के भव्य तैलचित्र और उनकी कविताओं के 28 पोस्टरों के उद्घाटन-अनावरण से हुई। अनावरण कमलिनी दत्त,. कणिका,.विश्‍वनाथ त्रिपाठी, भगवानसिंह, वाचस्पति, उमेश वर्मा, कुबेरदत्त आदि के हाथों हुआ।

इसके बाद नागार्जुन की कुछ कविताओं की स्वरबद्ध प्रस्तुति इस समारोह की विशेष उपलब्धि रही। प्रस्तोता थीं लेडी श्रीराम कॉलेज में हिंदी व्याख्याता डॉ. प्रीति प्रकाश प्रजापति। उनका काव्य-गायन सभी के लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा। इसके बाद सादतपुर के कुछ वरिष्ठ और युवा नागरिकों ने बाबा के साथ जुड़ी अपनी यादों को ताजा किया।

अगला सत्र था नागार्जुन का महत्त्व-मूल्यांकन। सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि नागार्जुन की जन्मशती सारे देश में मनाई जा रही है, लेकिन सादतपुर में इसका मनाया जाना विशेष महत्व रखता है। यह समारोह तरौनी में मनाए गए समारोह से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करना आज की जरूरत है। बाबा का फोटो आपने किसी राजनेता के साथ नहीं देखा होगा। यहाँ आप यह विचार कीजिए कि आज जो प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं,  वे किनसे मिलते हैं और नागार्जुन किनसे मिलते थे। बाबा को हिंदी में साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला। यह पुरस्कार की परंपरा और मान्यता पर गहरा व्यंग्य और कटाक्ष है। वे वंचितों के कवि थे। डॉ. त्रिपाठी ने ‘अकाल और उसके बाद’ शीर्षक कविता के हवाले से कहा कि ‘सामयिक’ को ‘कालजयी’ कैसे बनाया जाता है, यह बाबा से सीखा जा सकता है। आज ऐसी कविता की बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि जनवादी संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए जनवादी शिल्प की जरूरत होती है। उसे साधना कठिन है, लेकिन इसे साधे बिना क्लासिक कविता नहीं रची जा सकती। जनवादी साहित्य में क्लासिक क्या है, यह नागार्जुन से सीखना होगा।

वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने ‘नागार्जुन’ शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया। सुप्रसिद्ध समालोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने बाबा के कुछ संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक बार दिनकर जी ने मुझसे कहा कि बाबा उनसे मिल लें। मैंने बाबा से जब यह कहा तो वे बहुत नाराज हुए और पूछा कि तुमने दिनकर को क्या जवाब दिया? मैं चुप। बाद में जब दिनकर जी ने बाबा की नाराजगी के बारे में जाना तो वे खुद उनसे मिलने आए और उनसे माफी माँगी। उन्होंने कहा कि यह एक जनकवि का स्वाभिमान था। मुरली बाबू ने बाबा की कविता में विविधता पर भी प्रकाश डाला और उनकी प्रगतिशील प्रयोगवादिता पर भी। रेखा अवस्थी का कहना था कि वर्ग चेतना के नाते बाबा ने जो रास्ता दिखाया है, उस पर हमें ध्यान देना चाहिए। वरिष्ठ व्यंग्य लेखक प्रदीप पंत ने कहा कि ‘अज्ञेय’ जहाँ अपने लेखन और साहित्य में अभिजात हैं, वहीं नागार्जुन उनसे एकदम दूर खड़े दिखाई देते हैं। यह एक ही समय में मौजूद दो कवियों का ध्यान देने योग्य अंतर है।

क्रांतिकारी आंदोलन की शोध-खोज करनेवाले सुपरिचित लेखक सुधीर विद्यार्थी ने अपने मार्मिक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि बाबा में दूसरी भाषाओं और दूसरों से सीखने की जो अद्भुत ललक थी, उसमें वे बच्चों से भी सीखते थे। उन्होंने जो कुछ रचा, वह बंद कमरों में बैठकर नहीं रचा। सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ और कथाकार भगवानसिंह ने नागार्जुन की कविताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें हमारे काव्येतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण कवि कहा। बाबा के परम आत्मीय रहे लेखक-प्राध्यापक वाचस्पति ने उनकी घुमक्कड़ी के कुछ दिलचस्प संस्मरण सुनाए। वरिष्ठ कथाकार संजीव ने बाबा के वात्सल्य भाव और उनकी जीवंतता को लेकर संस्मरण सुनाए। कहा कि बाबा सबको डाँटते जरूर थे, पर स्वयं भी डाँट खाने का अवसर जुटा लेते थे। लेकिन इसके पीछे उनके व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ ही थीं। धन्नासेठों की तो परछाईं तक से वे बचते थे।

समारोह के अंतिम चरण में नागार्जुन केंद्रित दो महत्वपूर्ण फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इनमें से एक का निर्माण साहित्य अकादेमी और दूसरी का एन.सी.ई.आर.टी. ने किया है। समारोह के विभिन्न सत्रों का संचालन क्रमशः वरिष्ठ कवि और ‘अलाव’ के संपादक रामकुमार कृषक, सुपरिचित कथाकार महेश दर्पण और हीरालाल नागर ने किया।

उल्लेखनीय है कि सादतपुर में बाबा नागार्जुन करीब दस-ग्यारह साल रहे और उसकी गलियों में उनकी आत्मीय उपस्थिति को अब भी महसूस किया जा सकता है। समारोह में दिनेश कुमार शुक्ल, रमेश उपाध्याय, गिरधर राठी, सुरेश सलिल, बली सिंह, भारत भारद्वाज, त्रिनेत्र जोशी, प्रकाश मनु, दिविक रमेश, रूपसिंह चंदेल, भारतेंदु मिश्र, रमेश प्रजापति, दरवेश भारती, अरविंद कुमार सिंह, सुधीर सुमन, प्रेम जनमेजय, श्याम सुशील, वीरेंद्र जैन, रामनारायण स्वामी, वरुण कुमार तिवारी, क्षितिज शर्मा, संजीव ठाकुर, विजय श्रीवास्तव, रमेश आज़ाद, राधेश्याम तिवारी, आचार्य सारथी, मणिकांत ठाकुर, प्रकाश प्रजापति, आशीष, पूर्वा दत्त, सीमा ओझा, जितेंद्र जीत, रेखा व्यास, दिलीप मंडल और कनुप्रिया आदि‍ लेखकों ने उपस्थिति दर्ज कराई।

-प्रस्तुति: मधुवेश