
अनिल सिन्हा की स्मृति में कविता पोस्टर का लोकार्पण करते अशोक भौमिक और उमा चक्रवर्ती। साथ में बी. मोहन नेगी और आशुतोष कुमार।
गोरखपुर में 23 से 27 मार्च तक चले छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल पर संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-
गोरखपुर : ‘‘आज जो स्त्री आंदोलनों की शताब्दी मनाई जा रही है, उसकी शुरुआत श्रमिक महिलाओं ने की थी। भारत में सौ-सवा सौ साल के दौरान स्त्रियों के संघर्ष का जायजा लेते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने कहा कि उन्नीसवी सदी में जो समाज सुधार का आंदोलन था, वह औरतों की स्थिति पर टिका हुआ था। वह मध्यवर्गीय परिवार के दायरे में सीमित था। जो औरतें खेतों में काम करती हैं, पत्थर तोड़ती हैं, उनकी चर्चा नहीं मिलती। परिवार में औरतों की जिंदगी में क्या और कितना बदलाव लाना है, समाज सुधारक प्रायः यही तय कर रहे थे। हालांकि उस दौर में स्त्रियां क्या सोच रही थीं, इतिहास में इसके साक्ष्य कम मिलते हैं, लेकिन जो साक्ष्य मिले हैं वे बताते हैं कि उस वक्त स्त्रियों का स्वर ज्यादा प्रतिरोधी था। उदाहरण के तौर पर ताराबाई शिंदे और रमाबाई के लेखन और संघर्ष को देखा जा सकता है। ये बातें उन्होंने छठे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन करते हुए कही। उन्होंने कहा कि स्त्री का संघर्ष सिर्फ भौतिक जरूरतों यानी रोजी-रोटी के लिए ही नहीं, बल्कि सोचने, अनुभव करने और अपने आत्म को हासिल करने का भी संघर्ष है। महिला आंदोलन के साथ संस्कृतिकर्म के गहरे रिश्ते के कई अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिला आंदोलन और प्रतिरोधी संस्कृतिकर्म के बीच घनिष्ठ रिश्ता होना चाहिए, इस एकजुटता से ही नाजुल्मी समाज बन पाएगा।’’

अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशाला में बच्चों के साथ उषा श्रीनिवासन।
यह फेस्टिवल मानो इस तरह की एकजुटता की अभिव्यक्ति ही था। शहीद-ए-आजम भगतसिंह के शहादत दिवस के अवसर पर शुरू इस फेस्टिवल के प्रेक्षागृह के प्रवेशद्वार पर प्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की एक मशहूर पेंटिंग लगी थी, जिसमें भगतसिंह निर्भीकता और जोश के साथ फांसी के तख्ते की ओर बढ़ रहे हैं। 23 मार्च क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन के बड़े कवि अवतार सिंह पाश का भी शहादत दिवस है। उद्घाटन सत्र में युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने उनकी कविता ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’ को याद करते हुए प्रतिरोध की सांस्कृतिक धारा को और मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया। जनकवि रमाशंकर यादव और बल्ली सिंह चीमा का काव्यपाठ तथा हिरावल (पटना) और संकल्प (बलिया) द्वारा फैज, गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल की रचनाओं और भिखारी ठाकुर के विदेशिया का गायन भी फेस्टिवल का आकर्षण था। बच्चों के सत्र में उषा श्रीनिवासन के अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशाला में सूर्य, चांद, ग्रह, धरती, मौसम आदि के संबंध में ढेर सारी जानकारियां बड़े सहज अंदाज में मिलीं। बच्चों ने ढेर सारे चित्र और रेखांकन बनाए। उन्हें जफर पनाही की फिल्म ‘व्हाइट बलून’ दिखाई गई। पूरे फेस्टिवल के दौरान बी. मोहन नेगी के कविता पोस्टर और युवा चित्रकार अनुपम राय के चित्रों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। प्रेक्षागृह के बाहर लेनिन पुस्तक केंद्र और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से किताबों का स्टाल लगाया गया था। इस मौके पर प्रकाशित स्मारिका का लोकार्पण भी समारोह में हुआ। इस मौके पर उमा चक्रवर्ती ने स्त्री अधिकार आंदोलन और अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों से संबंधित अपने निजी संग्रह में मौजूद पोस्टरों पर आधारित एक महत्वपूर्ण व्याख्यान भी दिया। ये पोस्टर पिछले तीन-चार दशक के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों के ऐतिहासिक साक्ष्य की तरह थे। इमरजेंसी के प्रसंग से शुरू होकर उनका व्याख्यान आज के अघोषित इमरजेंसी के प्रसंग पर पहुंचा। अंतिम पोस्टर विनायक सेन का था, जिसमें नेल्शन मंडेला और आंग सान सूकी के साथ उनकी तस्वीर है और जिसमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है। उमा चक्रवर्ती ने स्पष्ट तौर पर कहा कि आज भारतीय लोकतंत्र गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है।
फेस्टिवल पत्रकार-लेखक-जनसंस्कृतिकर्मी अनिल सिन्हा की स्मृति को भी समर्पित था। अनिल सिन्हा का ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक इस अभियान से गहरा जुड़ाव था। अनिल सिन्हा एक प्रखर जनवादी कला समीक्षक भी थे। इस मौके पर गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत की गई। चित्रकार अशोक भौमिक ने ‘चित्त प्रसाद और भारतीय पेंटिंग की प्रगतिशील परंपरा’ पर पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान बताया कि किस तरह पीपुल्स वार, जनयुद्ध और स्वाधीनता जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के अखबारों में चित्त प्रसाद ने अकाल, लूट और शोषण के चित्र बनाकर चित्रकला और पत्रकारिता को नए आयाम दिए। फेस्टिवल में अनिल सिन्हा की पत्नी आशा सिन्हा का हौसले से भरा एक मार्मिक संदेश भी पढ़ा गया जिसमें यह कहते हुए कि साम्राज्यवाद विरोधी, वामपंथी और लोकतांत्रिक साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों का जो एक विशाल परिवार है, अनिल सिन्हा उसके सदस्य थे, उन्होंने यह संकल्प जाहिर किया है कि वे और उनके बच्चे प्रतिबद्धता की उसी राह पर कायम रहेंगे। अनिल सिन्हा की याद में भगवान स्वरूप कटियार द्वारा लिखी गई कविता के पोस्टर का लोकार्पण भी इस दौरान हुआ। लोकार्पण उमा चक्रवर्ती ने किया।
विभिन्न कलाओं और विधाओं के अंतर्संबंधों के बारे में तो अनिल सिन्हा लिखते ही रहे, एक संगठक के बतौर उनकी गहरी निगाह संस्कृति के क्षेत्र में उभरने वाली नई प्रगतिशील प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर भी रहती थी। इस फेस्टिवल में विभिन्न राज्यों से पहुंचे प्रतिनिधियों ने प्रतिरोध के सिनेमा का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाकर उन्हें मानो सही श्रद्धांजलि दी। फिलहाल देश के 22 शहरों और कस्बों में फिल्म सोसाइटी बनाने और फिल्म फेस्टिवल करने का निर्णय हुआ। जो राष्ट्रीय कमेटी बनेगी, उसमें कुछ महत्वपूर्ण फिल्मकार, रंगकर्मी, साहित्यकार, चित्रकार आदि भी शामिल होंगे। प्रतिनिधियों के बीच इसे लेकर पूरी सहमति थी कि इस मुहिम में साम्राज्यवादी पूंजी से पोषित किसी संस्था, सरकार, कारपोरेट या माफिया की कोई मदद नहीं ली जाएगी। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता के सहयोग के बल पर ही विकसित होगा। इसकी नीतियों और रणनीतियों पर हुए विचार-विमर्श में अशोक चैधरी, मनोज सिंह, आशुतोष कुमार, संतोष झा, सुभाषचंद्र कुशवाहा, समता राय, स्वाधीन दास, मदन चमोली, शैलेंद्र, नितिन, अंकुर, भगवान स्वरूप कटियार, अवंतिका आदि शामिल थे।
ऐसा सिनेमा जिसमें जनता के दुख-दर्द और उसके संघर्ष और प्रतिरोध का अक्स हो, उसे उस तक पहुंचाया जाए, इसी मंशा से आज से पांच साल पहले गोरखपुर से ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक अभियान की शुरुआत हुई थी। इस बीच लखनऊ, नैनीताल, दुर्ग, पटना जैसे शहरों में भी इसी नाम से फिल्मोत्सवों का सिलसिला शुरू हुआ। इस बार 23 मार्च से 27 मार्च तक आयोजित छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल इस तरह का सोलहवां आयोजन था।

सबा दीवान की फिल्म द अदर सांग का दृश्य ।
यह फिल्म फेस्टिवल इस मायने में खास था कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर इसमें 17 भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्में दिखाई गईं। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने कहा कि पूंजीवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने अन्याय को बढ़ावा दिया है। प्रतिरोध और जनांदोलन आज की जरूरत हैं, इसके लिए संवाद जरूरी हैं। हमारे समाज की जमीनी सचाइयों के मद्देनजर तमाम मुद्दों समेत महिला प्रश्न पर भी गंभीर संवाद होना चाहिए।
यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष मनाने की कोई रस्मअदायगी भर नहीं थी, बल्कि यह एक तरह से महिलाओं के संघर्ष और सृजनात्मकता के प्रति एकजुटता का इजहार भी था। इस फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों ने देखा कि विषय और सरोकार के लिहाज से हमारी महिला फिल्मकारों का काम कितना महत्वपूर्ण है। ‘व्हेन वीमन यूनाइट’ आंध्र प्रदेश में शराबबंदी के लिए हुए महिलाओं के एक सफल आंदोलन पर केंद्रित फिल्म थी जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया। मानवाधिकार और नागरिक आंदोलनों के लिए ख्यात जी. कन्नाविरन के जीवन और कर्म पर केंद्रित फिल्म ‘द एडवोकेट’ (दीपा धनराज) को भी सजग दर्शकों का साथ मिला। फिल्में खुद जब किसी अभियान का हिस्सा हों, तो वे दर्शकों के बीच बहस को जन्म देती हैं, उन्हें विचारोत्तेजित करती हैं, यह दिखा कश्मीर में अपने लापता परिजनों की तलाश में लगी औरतों के अभियान पर बनाई गई फिल्म ‘व्हेयर हैव यू माई न्यू क्रिंसेट मून?’ (इफत फातिमा) के प्रदर्शन के दौरान। स्त्री की पराधीनता की वजहों की पड़ताल और मुक्ति की तड़प और जद्दोजहद कई फिल्मों में नजर आई। ‘ससुराल’ (मीरा दीवान) ने जहां पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दोयम दर्जे के यथार्थ को अत्यंत मार्मिक तरीके से दर्शाया, वहीं फॉर माया (वसुधा जोशी) में चार पीढि़यों की स्त्रियों के संघर्षों का जायजा लिया गया। समृद्धि और आधुनिकता के चकाचौंध वाली देश की राजधानी दिल्ली में भी औरतें किस कदर असुरक्षित हैं और इस महानगर का पूरा परिवेश किस कदर पुरुष वर्चस्व से भरा है, इस पर से पर्दा उठाया ‘मेरा अपना शहर’ (समीरा जैन) ने। मोरालिटी टीवी और लविंग जेहाद (पारोमिता वोहरा) ने मुनाफाखोरी और सनसनी में डूबे आज के पूंजीवादी मीडिया पर बहस छेड़ी, जो अपने स्वार्थ में अक्सर सामंती नैतिकता, पुलिसिया दमन, सांप्रदायिक-जातीय घृणा और स्त्री पराधीनता के पक्ष में खड़ा हो जाता है। अभिजात्य नैतिकता किस तरह स्त्रियों के श्रम और प्रतिभा का इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें सम्मान से वंचित रखती है, उन्हें उपेक्षित करती है, यह रसूलन बाइ्र्र समेत कई अन्य ठुमरी गायिकाओं की जिंदगी पर केंद्रित फिल्म ‘द अदर सांग’ (सबा दीवान) में दर्शकों ने देखा। ‘कमलाबाई’ (रीना मोहन) प्रथम मूक फिल्म और मराठी नाट्य मंच की मशहूर अभिनेत्री की जिंदगी पर आधारित थी। इसमें कमलाबाई की जीवनीशक्ति देखने लायक थी। ‘गॉडेसेज’ (लीना मणिमेकलै) और ‘सब्जी मंडी के हीरे’ (निलिता वाछानी) रीयल लाइफ के उन नायक-नायिकाओं की जिंदगी की असाधारणता को दर्ज करने वाली फिल्में थीं, जिनके लिए मुख्यधारा की फिल्मों में प्रायः जगह नहीं होती। ‘गॉडसेज’ तमिलनाडु के निम्नवर्गीय महिलाओं की जिंदगी पर केंद्रित थी और ‘सब्जी मंडी के हीरे’ बसों में बाम, पाउडर, पाचक, सूरमा और जादू की किताब बेचने वाले लोगों से संबंधित थी। गागर में सागर की कहावत को चरितार्थ करती भारत में संगीत रिकार्डिंग के सौ वर्ष (कमलिनी दत्त) हो या भक्ति आंदोलन के मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को उजागर करती ‘सबद निरंतर’ (राजुला शाह) या फोटो स्टूडियोज की स्मृतियों के जरिए जनजीवन को समझने की कोशिश करती ‘सिटी ऑफ फोटोज’ (निष्ठा जैन)-इन फिल्मों में अपनी विरासत, स्मृति और परंपरा के प्रति महिला फिल्मकार काफी सचेत दिखीं। उर्दू जबान की अहमियत के प्रति दर्शकों को सोचने को बाध्य करती सियासत, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 418’ (शाजिया इल्मी) भी ऐसी ही फिल्म थी। विकास लोगों की परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए, इस धारणा के साथ उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पसरती उपभोक्तावादी संस्कृति के खतरों से दो-चार कराती ‘दायें या बायें’ (बेला नेगी) को भी दर्शकों ने पसंद किया। इसी तर्ज पर ‘सुपरमैन ऑफ मालेगांव’ (फैजा अहमद खान) को देखें, तो मालेगांव में फिल्म निर्माण का शौकीन एक ग्रुप किस तरह अपनी जरूरतों के हिसाब से कम लागत में फिल्म बनाता है, इसे इस फिल्म ने बड़े दिलचस्प अंदाज में पेश किया।
इस समारोह ने इस ओर संकेत किया कि फिल्म सोसाइटियां अच्छे और जनपक्षधर सिनेमा के निर्माण को भी प्रोत्साहित करने का माध्यम भी बन सकती हैं। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता की जरूरतों की ही उपज है। अब गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने फिल्म निर्माण की ओर भी कदम बढ़ा दिया है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से बनाई जा रही तीन फिल्मों के असंपादित अंश फेस्टिवल में दिखाए गए। पहली फिल्म ‘प्रोटेस्ट’ कसेया में मैत्रेयी प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के आंदोलन पर है, दूसरी फिल्म ‘नाद’ साझी संस्कृति के प्रतीक मुस्लिम समुदाय के नाथपंथी साधुओं और योगियों पर है और तीसरी फिल्म गोरखपुर के इलाके में वर्षों से मौजूद जापानी बुखार की ज्वलंत समस्या से संबंधित है, जिससे 1978 से अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 20000 और गैरसरकारी आंकड़ों के अनुसार एक लाख बच्चों की मृत्यु हो चुकी है।

भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पूरे होने पर आयोजित संगोष्ठी में भाग लेते लालबहादुर ओझा, सुधीर सुमन और पारोमिता वोहरा।
जनकवि विद्रोही पर केंद्रित नितिन के पमनानी की फिल्म- ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ और समीरा जैन की फिल्म- ‘मेरा अपना शहर’ का प्रीमियर भी इस फेस्टिवल में हुआ। श्याम बेनेगल की अपने समय की चर्चित फिल्म ‘भूमिका’ भी दिखाई गई। फेस्टिवल के दौरान भोजपुरी सिनेमा के पचास साल और नया मीडिया, नए मुहावरे, नई मंजिलें विषय पर विचारोत्तेजक बातचीत भी हुई। जिसमें पत्रकार लालबहादुर ओझा, चंद्रभूषण अंकुर, पारोमिता वोहरा, सुधीर सुमन तथा कुमार हर्ष, आशुतोष कुमार, राममणि त्रिपाठी, कपिल देव ने हिस्सा लिया। भोजपुरी सिनेमा पर बातचीत करते हुए वक्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आज की भोजपुरी फिल्मों का भोजपुरी इलाके के लोगों के दुख-दर्द और आकांक्षा से कोई वास्ता नहीं है। वे दर्शकों की संवेदना का विस्तार नहीं कर रहीं, बल्कि उसे महज उपभोक्ता बना रही हैं। इसके खिलाफ भोजपुरी में मौलिक और वैचारिक सिनेमा निर्माण करना होगा, फिल्म सोसाइटी मूवमेंट की इसमें सार्थक भूमिका हो सकती है। इंटरनेट, ब्लॉग, फेसबुक आदि सूचनाओं के आदान-प्रदान के नए तरीकों पर बातचीत करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह देखना होगा कि यह हमारे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रतिरोध और हमारी सामूहिकता के लिए कितना मददगार है। प्रो. रामकृष्ण मणि ने कहा कि तकनीक और मीडिया पर जनता का कंट्रोल कैसे हो, हमारी मुख्य चिंता यह होनी चाहिए। डेमोक्रेसी की आड़ में जो झूठ, विभ्रम और गलत तथ्य साम्राज्यवादी मीडिया उसके नक्शेकदम चलने वाली देश की ऑफिसियल मीडिया के जरिए फैलाया जा रहा है, उसके जवाब में जनता का वैकल्पिक मीडिया बनाना होगा।
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