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जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन 3 और 4 नवम्बर को

नई दिल्ली : जन संस्कृति मंच का 13 वां राष्ट्रीय सम्मेलन 3 और 4 नवम्बर को सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन, गोरखपुर में होगा। इसमें ‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ पर विचार-विमर्श होगा और अगले दो वर्ष के लिए संगठन की नई कार्यकारिणी व राष्ट्रीय परिषद का गठन होगा। सम्मेलन का उद्घाटन प्रोफेसर रविभूषण करेंगे।

सम्मेलन का उद्घाटन 3 नवम्‍बर को अपराह्न 4 बजे होगा। सम्मेलन में एक दर्जन से अधिक राज्यों के 300 प्रतिनिधि भाग लेंगे। दिल्ली से जेएनयू और दिल्ली विश्‍वविद्यालय के नौजवान साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त प्रोफेसर राजेंद्र कुमार, प्रोफेसर रविभूषण, कवि मंगलेश डबराल, मदन कश्यप, चित्रकार अशोक भौमिक, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक आशुतोष कुमार, गोपाल प्रधान, अवधेश, रंगकर्मी कपिल शर्मा, छायाकार विजय समेत जसम के तमाम राष्ट्रीय पार्षद तथा संगवारी नाट्य ग्रुप के सदस्य सम्‍मेलन में शामि‍ल होंगे। सम्मेलन में कविता, कहानी, नाटक, चित्रकला और फिल्म आदि विधाओं में सक्रिय समूहों के निर्माण की योजना को भी ठोस आकार मिलेगा। हिन्‍दी-उर्दू के बीच के रिश्ते तथा लोकभाषाओं और लोककलाओं के लेकर भी जन संस्कृति मंच की जो योजनाएं हैं, उन पर भी विचार-विमर्श होगा।

सम्मेलन में जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ‘साम्राज्यवाद और समकालीन सांस्कृतिक संकट’ पर पर्चा प्रस्तुत करेंगे। उद्घाटन सत्र के बाद शाम छह बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे जिनमें गोरखपुर की संस्था अलख कला मंच, पटना की हिरावल, बलिया की संकल्प द्वारा जनगीतों व भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति की जायेगी। झारखण्ड की जन संस्कृति मंच की इकाई द्वारा झारखण्डी नृत्य व गीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जायेगा। शाम सात बजे से कवि सम्मेलन होगा जिसमें विभिन्न स्थानों से आए कवियों, कवि‍यित्रियों के अलावा स्थानीय कवि व शायर अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे।

सम्मेलन के दूसरे दिन सुबह दस बजे से चार बजे तक सांगठनिक सत्र चलेगा। इसमें महासचिव द्वारा प्रस्तुत किये गये पर्चे पर विचार-विमर्श होगा। इसके अलावा जसम के पिछले दो वर्षों के गतिविधियों की रिपोर्ट रखी जायेगी और उस पर चर्चा होगी। इसके बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी व राष्ट्रीय परिषद का चुनाव  होगा। शाम पाँच बजे से फिल्म शो का आयोजन होगा। इसमें गोरखपुर-महराजगंज जिले के जंगलों में रहने वाले वनटांगिया लोगों के संघर्ष पर बनी डॉक्यूमेंटरी ‘बिटवीन द ट्रीज’ का प्रदर्शन होगा। इस मौके पर इस डॉक्यूमेंटरी के निर्माता आशीष कुमार सिंह भी उपस्थित रहेंगे। इसके बाद प्रसिद्ध फिल्मकार आनंद पटवर्धन की बहुचर्चित फिल्म ‘जय भीम कामरेड’ दिखाई जायेगी। हिन्‍दी सिनेमा के 100 साल तथा जिन कवियों की जन्मशताब्दी है, उनकी कविताओं पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी भी सम्मेलन का आकर्षण होगी। सम्मेलन स्थल पर पुस्तकों का स्टॉल भी होगा।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय कार्यकारिणी, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

दलित साहित्य विमर्श नहीं, चेतना का साहित्य : तेज सिंह

गोरखपुर : प्रसि‍द्ध आलोचक रामविलास शर्मा की स्मृति में हिन्‍दी आलोचना को  केन्द्रित  कर गोरखपुर में  7 और  8 अप्रैल, 2012 को  आयोजित कार्यक्रम में जातीय भाषा, दलित,  स्त्री  एवं छंद  मुक्त कविता  के  मुद्दों  पर  विमर्श  हुआ। इसमें डा. तेज सिंह  एवं  बजरंग बिहारी तिवारी  (दिल्ली), शम्भू  गुप्त ( वर्धा ), नचिकेता (पटना), अमरनाथ ( कोलकाता ), प्रभा दीक्षित( कानपुर ), मूलचंद  सोनकर  (वाराणसी )  अतिथि  वक्ता  थे। दलित  साहित्य  को  लेकर  सहानुभूति  और  समानुभूति  का  मुद्दा उठा । एक विचार स्थापित हो गया है कि दलित साहित्य-दलितों द्वारा, दलित  के  लिए,  दलित  के  विषय  में  है।

शम्भू  गुप्त  ने कहा  कि  ऐसे  विचार  दलित  साहित्य  को  संकीर्णता  के  घेरे  में  ला  देते  हैं। यह  दलितवाद  पैदा  करता  है  जिसकी  परिणति  है दलित   ब्राह्मणवादइस  दुराग्रह  ने  दलित  साहित्य  का  नुकसान  किया  है। बजरंग  बिहारी  तिवारी  ने  दलित  काव्य  की  आलोचना का  व्यवहारिक  पक्ष  रखा। डा.  तेज  सिंह  ने  कहा  कि  दलित  साहित्य –दलित  विमर्श  नहीं,  बल्कि  दलित  चेतना  का  साहित्य  है।

बहस  में  यह  बात  सामने  आयी  कि  कास्ट, क्लास  और  जेंडर  को  एक साथ  देखने  से  ही  स्त्री  साहित्य  पर  समग्रता  से  बातचीत हो  सकेगी। हिंदी  में  स्त्री  विमर्श  अभी  केवल  पुरुष  सन्दर्भ  में  है। स्त्री  का  चित्रण  स्वतंत्र  व्यक्तित्व  में  होना  चाहिए। महसूस किया  जा  रहा है कि आलोचना में अलग-अलग  खाँचे बन  गये  हैं  और  एक  रणनीति  के  तहत  दलित  और  स्त्री  साहित्य  में विभाजन  कर  उन्हें  मुख्य  धारा में  आने  से  वंचित  किया  जा  रहा  है। हिन्‍दी  की  मुख्य  धारा  वर्चस्ववादी  प्रवृत्ति  की  है  जिसे  तोडा़ जाना  चाहिये। मुख्यधारा  में  दलित  और  स्त्री  को  साथ  ले  कर  चलना  होगा।

कविता  में  छंद  विधा  की  उपेक्षा  के  सवाल  पर  प्रोफेसर  रामदेव  शुक्ल  का  कहना  था  कि  विगत  दो  दशकों  में  बड़ी  संख्या  में  दोहे  और ग़ज़लों  की  रचनाएँ  यह  स्पष्ट  करती  हैं  कि  कविता  छंद  मुक्त  नहीं  हुई  है। कविता  में  यदि  भाषा  है , जीवन  की  लय  है  तो  वह  छंद का  बन्ध  तोड़  कर  आयेगी। नचिकेता  ने  कहा  कि  कविता  न  तो  केवल  छंद  है  और  न  केवल  गद्य, बल्कि  कविता  इन  दोनों  कि द्वंदात्मक  समष्टि  है। प्रोफेसर  चितरंजन  मिश्र  का  कहना  था  कि  अच्छी  कविता  को  न  तो  छंद  से  बाहर  किया  जा  सकता  है  और  न  ही भीतर।

देवेन्द्र  आर्य  ने  छंद  कविता  की  उपेक्षा  को  दलितवाद  से  जोड़ते  हुए  दलित  साहित्यकारों  जैसा  ही  संघर्ष  करने  की  जरूरत बताई। जगदीश  नारायण  ने  छंद  काव्य  को  भाषा  की  आँख  बताते  हुये  काव्य  के  स्वरूप  की  रक्षा  और  भीतरी  ढाँचे  की  मजबूती  के लिये  छंद  की  वापसी  की  ज़रूरत  बताई। अनिल  राय  ने  पूछा  कि  क्या  छंद  में  दुर्बोधता  और  सम्प्रेषण की  समस्या  नहीं  होती और  क्या  छंद  मुक्त  कविता  सुगम  एवं सम्प्रेषणीय  नहीं  होतीं ? वास्तव  में  सम्प्रेषण-संशलिष्ट  एवं  द्विपक्षीय  क्रिया-प्रतिक्रिया व्यापार  है।  अतः  छंद  के  सवाल  को केवल  सम्प्रेषणीयता  से  जोड़  कर  नहीं  देखना  चाहिये। प्रभा  दीक्षित ने कहा कि विधा से ही कविता श्रेष्ठ या कमतर नहीं होती- अंतर्वस्तु आवश्यक है।

प्रतिमानीकरण के सवाल पर कपिल देव ने कहा कि आलोचना ने अपना फलक और मूल्य का दायरा विकसित किया है। कविता अभी अपने स्वरुप निर्माण की प्रक्रिया से गुज़र रही है, जब यह स्थिर होगी तो प्रतिमानीकरण का समय आयेगा। प्रमोद कुमार ने कहा कि कविता देश और काल में सदैव परिवर्तनशील है, यह स्थिर हो ही नहीं सकती। अतः इसका स्वरूप निर्धारण नहीं हो सकता। बजरंग बिहारी तिवारी ने उत्पादक कवि की अवधारणा प्रस्तुत की एवं प्रमिला केपी और अनामिका को उल्लिखित करते हुए प्रतिमान प्रस्तुत किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. तेज सिंह ने कहा कि आलोचना के दो मुख्य काम हैं- रचना का मूल्याँकन और सिद्धांत निरूपण।  प्रतिमान तो समय और समाज की उपज हैं। यह सही है कि छंद से आज आलोचक विमुख हो रहे हैं।

कार्यक्रम का पहला दिन उत्सवधर्मी रहा। भोजपुरी कवि मोती बीए द्वार का उद्घाटन, उर्दू आलोचना के शिखर विद्वान शम्सुर्रहमान फारूकी एवं हिन्‍दी कथाकार, भाषा चिन्तक प्रोफेसर रामदेव शुक्ल का सम्मान,  काव्य संकलन ‘सर्जना के तीन रंग’- जिसमें रामाधार त्रिपाठी ‘जीवन’,  विद्याधर द्विवेदी ‘विज्ञ’ और देवेन्द्र कुमार ‘बंगाली’ की चुनी हुईं कवितायेँ शामिल हैं और सुधा विन्दु त्रिपाठी रचनावली का विमोचन किया गया। तीन महत्वपूर्ण व्याख्यान हुए- समकालीन काव्यालोचना में हिन्‍दी-उर्दू की परम्‍परा पर शम्सुर्रहमान फारूकी, जातीय भाषा और साहित्य पर रामदेव शुक्ल और हिन्‍दी का जातीय साहित्य एवं रामविलास शर्मा पर अमरनाथ ने वक्तव्य दिये। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन देवेन्द्र आर्य और पंकज गौतम ने किया। व्यवस्था रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी ने की।

इस अवसर पर गोरखपुर से केसीलाल, रणविजय सिंह, बीआर विप्लवी, सुरेन्द्र दुबे, गणेश पाण्डेय, अरविन्द त्रिपाठी, नागेन्द्र, हर्षवर्धन शाही, रंजना जैसवाल, हर्ष सिन्हा, दीपक त्यागी आदि भी उपस्थित थे

श्रमिकों महिलाओं ने की स्‍त्री आंदोलन की शुरुआत : उमा चक्रवर्ती

अनिल सिन्हा की स्मृति में कविता पोस्टर का लोकार्पण करते अशोक भौमिक और उमा चक्रवर्ती। साथ में बी. मोहन नेगी और आशुतोष कुमार।

गोरखपुर में 23 से 27 मार्च तक चले छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल पर संस्‍कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-
गोरखपुर : ‘‘आज जो स्त्री आंदोलनों की शताब्दी मनाई जा रही है, उसकी शुरुआत श्रमिक महिलाओं ने की थी। भारत में सौ-सवा सौ साल के दौरान स्त्रियों के संघर्ष का जायजा लेते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने कहा कि उन्नीसवी सदी में जो समाज सुधार का आंदोलन था, वह औरतों की स्थिति पर टिका हुआ था। वह मध्यवर्गीय परिवार के दायरे में सीमित था। जो औरतें खेतों में काम करती हैं, पत्थर तोड़ती हैं, उनकी चर्चा नहीं मिलती। परिवार में औरतों की जिंदगी में क्या और कितना बदलाव लाना है, समाज सुधारक प्रायः यही तय कर रहे थे। हालांकि उस दौर में स्त्रियां क्या सोच रही थीं, इतिहास में इसके साक्ष्य कम मिलते हैं, लेकिन जो साक्ष्य मिले हैं वे बताते हैं कि उस वक्त स्त्रियों का स्वर ज्यादा प्रतिरोधी था। उदाहरण के तौर पर ताराबाई शिंदे और रमाबाई के लेखन और संघर्ष को देखा जा सकता है। ये बातें उन्‍होंने छठे गोरखपुर फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन करते हुए कही। उन्‍होंने कहा कि स्त्री का संघर्ष सिर्फ भौतिक जरूरतों यानी रोजी-रोटी के लिए ही नहीं, बल्कि सोचने, अनुभव करने और अपने आत्म को हासिल करने का भी संघर्ष है। महिला आंदोलन के साथ संस्कृतिकर्म के गहरे रिश्ते के कई अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिला आंदोलन और प्रतिरोधी संस्कृतिकर्म के बीच घनिष्ठ रिश्ता होना चाहिए, इस एकजुटता से ही नाजुल्मी समाज बन पाएगा।’’

अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशाला में बच्चों के साथ उषा श्रीनिवासन।

यह फेस्टिवल मानो इस तरह की एकजुटता की अभिव्यक्ति ही था। शहीद-ए-आजम भगतसिंह के शहादत दिवस के अवसर पर शुरू इस फेस्टिवल के प्रेक्षागृह के प्रवेशद्वार पर प्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की एक मशहूर पेंटिंग लगी थी, जिसमें भगतसिंह निर्भीकता और जोश के साथ फांसी के तख्ते की ओर बढ़ रहे हैं। 23 मार्च क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन के बड़े कवि अवतार सिंह पाश का भी शहादत दिवस है। उद्घाटन सत्र में युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने उनकी कविता ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’ को याद करते हुए प्रतिरोध की सांस्कृतिक धारा को और मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया। जनकवि रमाशंकर यादव और बल्ली सिंह चीमा का काव्यपाठ तथा हिरावल (पटना) और संकल्प (बलिया) द्वारा फैज, गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल की रचनाओं और भिखारी ठाकुर के विदेशिया का गायन भी फेस्टिवल का आकर्षण था। बच्चों के सत्र में उषा श्रीनिवासन के अंतरिक्ष विज्ञान कार्यशाला में सूर्य, चांद, ग्रह, धरती, मौसम आदि के संबंध में ढेर सारी जानकारियां बड़े सहज अंदाज में मिलीं। बच्चों ने ढेर सारे चित्र और रेखांकन बनाए। उन्हें जफर पनाही की फिल्म ‘व्हाइट बलून’ दिखाई गई। पूरे फेस्टिवल के दौरान बी. मोहन नेगी के कविता पोस्टर और युवा चित्रकार अनुपम राय के चित्रों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। प्रेक्षागृह के बाहर लेनिन पुस्तक केंद्र और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से किताबों का स्टाल लगाया गया था। इस मौके पर प्रकाशित स्मारिका का लोकार्पण भी समारोह में हुआ। इस मौके पर उमा चक्रवर्ती ने स्त्री अधिकार आंदोलन और अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों से संबंधित अपने निजी संग्रह में मौजूद पोस्टरों पर आधारित एक महत्वपूर्ण व्याख्यान भी दिया। ये पोस्टर पिछले तीन-चार दशक के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों के ऐतिहासिक साक्ष्य की तरह थे। इमरजेंसी के प्रसंग से शुरू होकर उनका व्याख्यान आज के अघोषित इमरजेंसी के प्रसंग पर पहुंचा। अंतिम पोस्टर विनायक सेन का था, जिसमें नेल्शन मंडेला और आंग सान सूकी के साथ उनकी तस्वीर है और जिसमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है। उमा चक्रवर्ती ने स्पष्ट तौर पर कहा कि आज भारतीय लोकतंत्र गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है।

फेस्टिवल पत्रकार-लेखक-जनसंस्कृतिकर्मी अनिल सिन्हा की स्मृति को भी समर्पित था। अनिल सिन्हा का ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक इस अभियान से गहरा जुड़ाव था। अनिल सिन्हा एक प्रखर जनवादी कला समीक्षक भी थे। इस मौके पर गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत की गई। चित्रकार अशोक भौमिक ने ‘चित्त प्रसाद और भारतीय पेंटिंग की प्रगतिशील परंपरा’ पर पहला अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान बताया कि किस तरह पीपुल्स वार, जनयुद्ध और स्वाधीनता जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के अखबारों में चित्त प्रसाद ने अकाल, लूट और शोषण के चित्र बनाकर चित्रकला और पत्रकारिता को नए आयाम दिए। फेस्टिवल में अनिल सिन्हा की पत्नी आशा सिन्हा का हौसले से भरा एक मार्मिक संदेश भी पढ़ा गया जिसमें यह कहते हुए कि साम्राज्यवाद विरोधी, वामपंथी और लोकतांत्रिक साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों का जो एक विशाल परिवार है, अनिल सिन्हा उसके सदस्य थे, उन्होंने यह संकल्प जाहिर किया है कि वे और उनके बच्चे प्रतिबद्धता की उसी राह पर कायम रहेंगे। अनिल सिन्हा की याद में भगवान स्वरूप कटियार द्वारा लिखी गई कविता के पोस्टर का लोकार्पण भी इस दौरान हुआ। लोकार्पण उमा चक्रवर्ती ने किया।
विभिन्न कलाओं और विधाओं के अंतर्संबंधों के बारे में तो अनिल सिन्हा लिखते ही रहे, एक संगठक के बतौर उनकी गहरी निगाह संस्कृति के क्षेत्र में उभरने वाली नई प्रगतिशील प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर भी रहती थी। इस फेस्टिवल में विभिन्न राज्यों से पहुंचे प्रतिनिधियों ने प्रतिरोध के सिनेमा का राष्ट्रीय नेटवर्क बनाकर उन्हें मानो सही श्रद्धांजलि दी। फिलहाल देश के 22 शहरों और कस्बों में फिल्म सोसाइटी बनाने और फिल्म फेस्टिवल करने का निर्णय हुआ। जो राष्ट्रीय कमेटी बनेगी, उसमें कुछ महत्वपूर्ण फिल्मकार, रंगकर्मी, साहित्यकार, चित्रकार आदि भी शामिल होंगे। प्रतिनिधियों के बीच इसे लेकर पूरी सहमति थी कि इस मुहिम में साम्राज्यवादी पूंजी से पोषित किसी संस्था, सरकार, कारपोरेट या माफिया की कोई मदद नहीं ली जाएगी। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता के सहयोग के बल पर ही विकसित होगा। इसकी नीतियों और रणनीतियों पर हुए विचार-विमर्श में अशोक चैधरी, मनोज सिंह, आशुतोष कुमार, संतोष झा, सुभाषचंद्र कुशवाहा, समता राय, स्वाधीन दास, मदन चमोली, शैलेंद्र, नितिन, अंकुर, भगवान स्वरूप कटियार, अवंतिका आदि शामिल थे।
ऐसा सिनेमा जिसमें जनता के दुख-दर्द और उसके संघर्ष और प्रतिरोध का अक्स हो, उसे उस तक पहुंचाया जाए, इसी मंशा से आज से पांच साल पहले गोरखपुर से ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक अभियान की शुरुआत हुई थी। इस बीच लखनऊ, नैनीताल, दुर्ग, पटना जैसे शहरों में भी इसी नाम से फिल्मोत्सवों का सिलसिला शुरू हुआ। इस बार 23 मार्च से 27 मार्च तक आयोजित छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल इस तरह का सोलहवां आयोजन था।

 

सबा दीवान की फिल्म द अदर सांग का दृश्य ।

यह फिल्म फेस्टिवल इस मायने में खास था कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर इसमें 17 भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्में दिखाई गईं। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने कहा कि पूंजीवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने अन्याय को बढ़ावा दिया है। प्रतिरोध और जनांदोलन आज की जरूरत हैं, इसके लिए संवाद जरूरी हैं। हमारे समाज की जमीनी सचाइयों के मद्देनजर तमाम मुद्दों समेत महिला प्रश्न पर भी गंभीर संवाद होना चाहिए।
यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष मनाने की कोई रस्मअदायगी भर नहीं थी, बल्कि  यह एक तरह से महिलाओं के संघर्ष और सृजनात्मकता के प्रति एकजुटता का इजहार भी था। इस फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों ने देखा कि विषय और सरोकार के लिहाज से हमारी महिला फिल्मकारों का काम कितना महत्वपूर्ण है। ‘व्हेन वीमन यूनाइट’ आंध्र प्रदेश में शराबबंदी के लिए हुए महिलाओं के एक सफल आंदोलन पर केंद्रित फिल्म थी जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया। मानवाधिकार और नागरिक आंदोलनों के लिए ख्यात जी. कन्नाविरन के जीवन और कर्म पर केंद्रित फिल्म ‘द एडवोकेट’ (दीपा धनराज) को भी सजग दर्शकों का साथ मिला। फिल्में खुद जब किसी अभियान का हिस्सा हों, तो वे दर्शकों के बीच बहस को जन्म देती हैं, उन्हें विचारोत्तेजित करती हैं, यह दिखा कश्मीर में अपने लापता परिजनों की तलाश में लगी औरतों के अभियान पर बनाई गई फिल्म ‘व्हेयर हैव यू माई न्यू क्रिंसेट मून?’ (इफत फातिमा) के प्रदर्शन के दौरान। स्त्री की पराधीनता की वजहों की पड़ताल और मुक्ति की तड़प और जद्दोजहद कई फिल्मों में नजर आई। ‘ससुराल’ (मीरा दीवान) ने जहां पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दोयम दर्जे के यथार्थ को अत्यंत मार्मिक तरीके से दर्शाया, वहीं फॉर माया (वसुधा जोशी) में चार पीढि़यों की स्त्रियों के संघर्षों का जायजा लिया गया। समृद्धि और आधुनिकता के चकाचौंध वाली देश की राजधानी दिल्ली में भी औरतें किस कदर असुरक्षित हैं और इस महानगर का पूरा परिवेश किस कदर पुरुष वर्चस्व से भरा है, इस पर से पर्दा उठाया ‘मेरा अपना शहर’ (समीरा जैन) ने। मोरालिटी टीवी और लविंग जेहाद (पारोमिता वोहरा) ने मुनाफाखोरी और सनसनी में डूबे आज के पूंजीवादी मीडिया पर बहस छेड़ी, जो अपने स्वार्थ में अक्सर सामंती नैतिकता, पुलिसिया दमन, सांप्रदायिक-जातीय घृणा और स्त्री पराधीनता के पक्ष में खड़ा हो जाता है। अभिजात्य नैतिकता किस तरह स्त्रियों के श्रम और प्रतिभा का इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें सम्मान से वंचित रखती है, उन्हें उपेक्षित करती है, यह रसूलन बाइ्र्र समेत कई अन्य ठुमरी गायिकाओं की जिंदगी पर केंद्रित फिल्म ‘द अदर सांग’ (सबा दीवान) में दर्शकों ने देखा। ‘कमलाबाई’ (रीना मोहन) प्रथम मूक फिल्म और मराठी नाट्य मंच की मशहूर अभिनेत्री की जिंदगी पर आधारित थी। इसमें कमलाबाई की जीवनीशक्ति देखने लायक थी। ‘गॉडेसेज’ (लीना मणिमेकलै) और ‘सब्जी मंडी के हीरे’ (निलिता वाछानी) रीयल लाइफ के उन नायक-नायिकाओं की जिंदगी की असाधारणता को दर्ज करने वाली फिल्में थीं, जिनके लिए मुख्यधारा की फिल्मों में प्रायः जगह नहीं होती। ‘गॉडसेज’ तमिलनाडु के निम्नवर्गीय महिलाओं की जिंदगी पर केंद्रित थी और ‘सब्जी मंडी के हीरे’ बसों में बाम, पाउडर, पाचक, सूरमा और जादू की किताब बेचने वाले लोगों से संबंधित थी। गागर में सागर की कहावत को चरितार्थ करती भारत में संगीत रिकार्डिंग के सौ वर्ष (कमलिनी दत्त) हो या भक्ति आंदोलन के मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को उजागर करती ‘सबद निरंतर’ (राजुला शाह) या फोटो स्टूडियोज की स्मृतियों के जरिए जनजीवन को समझने की कोशिश करती ‘सिटी ऑफ फोटोज’ (निष्ठा जैन)-इन फिल्मों में अपनी विरासत, स्मृति और परंपरा के प्रति महिला फिल्मकार काफी सचेत दिखीं। उर्दू जबान की अहमियत के प्रति दर्शकों को सोचने को बाध्य करती सियासत, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 418’ (शाजिया इल्मी) भी ऐसी ही फिल्म थी। विकास लोगों की परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए, इस धारणा के साथ उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पसरती उपभोक्तावादी संस्कृति के खतरों से दो-चार कराती ‘दायें या बायें’ (बेला नेगी) को भी दर्शकों ने पसंद किया। इसी तर्ज पर ‘सुपरमैन ऑफ मालेगांव’ (फैजा अहमद खान) को देखें, तो मालेगांव में फिल्म निर्माण का शौकीन एक ग्रुप किस तरह अपनी जरूरतों के हिसाब से कम लागत में फिल्म बनाता है, इसे इस फिल्म ने बड़े दिलचस्प अंदाज में पेश किया।
इस समारोह ने इस ओर संकेत किया कि फिल्म सोसाइटियां अच्छे और जनपक्षधर सिनेमा के निर्माण को भी प्रोत्साहित करने का माध्यम भी बन सकती हैं। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ जनता की जरूरतों की ही उपज है। अब गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने फिल्म निर्माण की ओर भी कदम बढ़ा दिया है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से बनाई जा रही तीन फिल्मों के असंपादित अंश फेस्टिवल में दिखाए गए। पहली फिल्म ‘प्रोटेस्ट’ कसेया में मैत्रेयी प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के आंदोलन पर है, दूसरी फिल्म ‘नाद’ साझी संस्कृति के प्रतीक मुस्लिम समुदाय के नाथपंथी साधुओं और योगियों पर है और तीसरी फिल्म गोरखपुर के इलाके में वर्षों से मौजूद जापानी बुखार की ज्वलंत समस्या से संबंधित है, जिससे 1978 से अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 20000 और गैरसरकारी आंकड़ों के अनुसार एक लाख बच्चों की मृत्यु हो चुकी है।

भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पूरे होने पर आयोजित संगोष्ठी में भाग लेते लालबहादुर ओझा, सुधीर सुमन और पारोमिता वोहरा।

जनकवि विद्रोही पर केंद्रित नितिन के पमनानी की फिल्म- ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ और समीरा जैन की फिल्म- ‘मेरा अपना शहर’ का प्रीमियर भी इस फेस्टिवल में हुआ। श्याम बेनेगल की अपने समय की चर्चित फिल्म ‘भूमिका’ भी दिखाई गई। फेस्टिवल के दौरान भोजपुरी सिनेमा के पचास साल और नया मीडिया, नए मुहावरे, नई मंजिलें विषय पर विचारोत्तेजक बातचीत भी हुई। जिसमें पत्रकार लालबहादुर ओझा, चंद्रभूषण अंकुर, पारोमिता वोहरा, सुधीर सुमन तथा कुमार हर्ष, आशुतोष कुमार, राममणि त्रिपाठी, कपिल देव ने हिस्सा लिया। भोजपुरी सिनेमा पर  बातचीत करते हुए वक्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आज की भोजपुरी फिल्मों का  भोजपुरी इलाके के लोगों के दुख-दर्द और आकांक्षा से कोई वास्ता नहीं है। वे दर्शकों की संवेदना का विस्तार नहीं कर रहीं, बल्कि उसे महज उपभोक्ता बना रही हैं। इसके खिलाफ भोजपुरी में मौलिक और वैचारिक सिनेमा निर्माण करना होगा, फिल्म सोसाइटी मूवमेंट की इसमें सार्थक भूमिका हो सकती है। इंटरनेट, ब्लॉग, फेसबुक आदि सूचनाओं के आदान-प्रदान के नए तरीकों पर बातचीत करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह देखना होगा कि यह हमारे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रतिरोध और हमारी सामूहिकता के लिए कितना मददगार है। प्रो. रामकृष्ण मणि ने कहा कि तकनीक और मीडिया पर जनता का कंट्रोल कैसे हो, हमारी मुख्य चिंता यह होनी चाहिए। डेमोक्रेसी की आड़ में जो झूठ, विभ्रम और गलत तथ्य साम्राज्यवादी मीडिया उसके नक्शेकदम चलने वाली देश की ऑफिसियल मीडिया के जरिए फैलाया जा रहा है, उसके जवाब में जनता का वैकल्पिक मीडिया बनाना होगा।

 

प्रतिरोध का सिनेमा का छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल 23 से

नई दिल्‍ली : प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का सोलहवां और गोरखपुर का छठा फिल्म फेस्टिवल इस बार आधी दुनिया के संघर्षों की शताब्दी  और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा की स्मृति को समर्पित होगा। आयोजन गोकुल अतिथि भवन, सिविल लाइंस, गोरखपुर में होगा।

यह वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में महिला फिल्मकारों और महिला  मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। इसके अलावा जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य और लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा स्मृति को भी छठा फेस्टिवल समर्पित है। इस फेस्टिवल से ही अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत होगी। पहला व्याख्यान फेस्टिवल के दूसरे दिन 24 मार्च की शाम  मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक ‘चित्तप्रसाद और भारतीय चित्रकला की प्रगतिशीलधारा’ पर देंगे।

23 मार्च की शाम 5 बजे प्रमुख नारीवादी चिन्तक उमा चक्रवर्ती के भाषण से फेस्टिवल की शुरुआत होगी। पांच दिन तक चलने वाले फेस्टिवल में इस बार 16 भारतीय महिला फिल्मकारों की फिल्मों को जगह दी गयी है। इन फिल्मकारों में से इफ़त फातिमा, शाजिया इल्मी, पारोमिता वोहरा और बेला नेगी समारोह में शामिल भी होंगी। फेस्टिवल में दो नयी फिल्मों का पहला प्रदर्शन कि‍या जाएगा। ये फिल्में हैं- नितिन के. की कवि विद्रोही की कविता और  जीवन को  तलाशती ‘मैं तुम्हारा कवि हूँ’ और  दिल्ली शहर और एक औरत के रिश्ते की खोज करती समीरा जैन की फिल्म ‘मेरा अपना शहर’। बेला नेगी की चर्चित कथा फिल्म ‘दायें या बाएं’ से फेस्टिवल का समापन होगा।

इस बार दूसरी कला विधाओं को भी प्रमुखता दी गयी है। अशोक भौमिक के व्याख्यान के अलावा उद्घाटन वाले दिन उमा चक्रवर्ती पोस्टरों के अपने निजी संग्रह के हवाले महिला आन्दोलनों और राजनीतिक इतिहास के पहलुओं को खोलेंगी। मशहूर कवि बल्ली सिंह चीमा और विद्रोही का एकल काव्य पाठ फेस्टिवल का प्रमुख आकर्षण होगा। पटना और बलिया की सांस्कृतिक मंडलियाँ हिरावल और संकल्प के गीतों का आनंद भी दर्शक ले सकेंगे। महिला शताब्दी वर्ष के खास मौके पर संकल्प की टीम भिखारी ठाकुर के ख्यात नाटक ‘बिदेशिया’ के गीतों की एक घंटे की प्रस्तुति देंगे। बच्चों के सत्र में रविवार को उषा श्रीनिवासन बच्चों को चाँद-तारों की सैर करवाएंगी।

फिल्म फेस्टिवल में ताजा मुद्दों पर बहस शुरू करने के इरादे से इस बार भोजपुरी सिनेमा के 50 साल और समकालीन मीडिया की चुनौती पर बहस के दो सत्र संचालित किये जायेंगे। इनमें देशभर से पत्रकारों के भाग लेने की उम्मीद है।

गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल से ही 2006 में प्रतिरोध का सिनेमा का अभियान शुरू हुआ था। पांच वर्ष बाद फिर से गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने इस बार एक महत्वपूर्ण पहलकदमी की है। इसके तहत देशभर में स्वंतंत्र रूप से काम कर रही फिल्म सोसाइटियों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन कि‍या जाएगा। फेस्टिवल के दूसरे दिन इन सोसाइटियों का सम्मेलन होगा। इसमें प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के बारे में महत्वपूर्ण विचार-विमर्श होगा और उनके राष्ट्रीय नेटवर्क का निर्माण भी होगा।

इरानी फिल्मकार जफ़र पनाही के संघर्ष को सलाम करते हुए उनकी दो महत्वपूर्ण कथा फिल्मों ‘ऑफ़साइड’ और ‘द व्हाइट बैलून’ को फेस्टिवल में शामिल किया गया है। गौरतलब है कि इरान की निरंकुश  सरकार ने राजनीतिक मतभेद  के चलते जफ़र पनाही को 6 साल की कैद और 20 साल तक किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगा दी है।

आयोजन में शामिल होने के लिए किसी भी तरह के प्रवेश पत्र या औपचारिकता की जरूरत नही है।

 

 

बि‍नायक सेन की रिहाई को लेकर गोरखपुर में प्रदर्शन 10 को

गोरखपुर : मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं बाल चिकित्सक डा बि‍नायक सेन की रिहाई की माँग करते हुए शहर के सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने रविवार, 2 जनवरी को टाउनहाल स्थित गांधी प्रतिमा के समक्ष धरना दिया। जन संस्कृति मंच, पीपुल्स यूनियन फार ह्यूमन राइट्स (पीयूएचआर) और इंकलाबी नौजवान सभा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस धरने में शामिल लोगों ने कहा कि डा सेन को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा देना लोकतंत्र को उम्रकैद देना है। इस मौके पर 10 जनवरी को उनकी रिहाई की माँग को लेकर प्रदर्शन करने की घोषणा की गई।

धरने में वरिष्ठ कवि एवं गीतकार देवेन्द्र आर्य, भाकपा माले के जिला सचिव राजेश साहनी, जनसंस्कृति मंच के संयोजक अशोक चौधरी, संस्कृति कर्मी रामू सिद्धार्थ, गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक एवं पीयूएचआर के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह, असीम सत्यदेव, डा संध्या, आनंद, शिवनंदन, मजदूर नेता तपिश मैंदोला, पीयूएचआर के जिला सचिव श्याम मिलन एडवोकेट, सामाजिक कार्यकर्ता उत्कर्ष सिन्हा, प्रमोद कुमार, सुधीर, अमोल राय, नितेन अग्रवाल, अरविन्द  कुमार, अशोक निषाद, दीनदयाल यादव, बैजनाथ मिश्र, अब्दुल कलाम आदि शामिल हुए। पीपुल्स फोरम के संयोजक प्रो रामकृष्ण मणि अस्वस्थ होने के कारण धरने में शामिल नहीं हो पाए, लेकिन उन्होंने धरने का समर्थन करते हुए कहा छत्त्तीसगढ़ सरकार ने साजिश कर डा सेन को जेल में डालने का काम किया है। धरने में शामिल लोगों ने देश में प्राकृतिक संसाधनों की लूट और आदिवासियों की बेदखली की चर्चा करते हुए कहा कि इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को सत्ता दमन कर रही है। डा सेन को उम्रकैद की सजा उन सभी लोगों को चेतावनी है जो कार्पोरेट लूट के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वक्ताओं ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने बि‍नायक सेन को इसलिए जेल के सींखचों के पीछे किया क्योंकि उन्होंने सलवा जुडूम के अत्याचारों को उजागर किया था।

जहाँ मौत भी एक गिनती है : संजय जोशी

इंसेफेलाईटिस यानी जापानी बुखार गोरखपुर के आसपास के इलाकों के हजारों बच्चों को लील चुका है। वर्षों से चल रही इस महामारी को रोक पाने में सरकार नाकाम है। सरकारी कार्यप्रणाली का वीभत्स नमूना यह है कि इस साल टीकाकरण इसलिए नहीं हो पाया क्‍यों‍क‍ि टीके रखे-रखे खराब हो गए। द ग्रुप, जन संस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसायटी की टीम इस मुद्दे को बार-बार उठा रही है। हाल ही मैं टीम दोबारा प्रभावित क्षेत्र में गई। इस पर तैयार फिल्म को गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा। द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी की रिपोर्ट-
2010 के मई महीने में हम कैमरा टीम के साथ गोरखपुर के आसपास के इलाकों में जापानी बुखार से हुई मौतों की कहानी दर्ज कर रहे थे। जून बीतते-बीतते बारिश का पानी फिर से गोरखपुर के आस-पड़ोस में जमने लगा। एक बार फिर से मस्तिष्क बुखार ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। 1978 से चली आ रही इस बीमारी से यूपी के सरकारी अस्पतालों में अब तक 12 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। गैरसरकारी अस्पतालों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों की सीमित पहुंच के आधार पर कहा जा सकता है कि दिमागी बुखार से मरने वाले बच्चों की संख्या सरकारी अस्पतालों में मौतों से कई गुना अधिक होगी। हजारों बच्चों की मौत के बावजूद सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना पायी है। सरकारी उदासीनता और लापरवाही अपनी गुणात्मक मूर्खताओं के नित नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सरकार 27 वर्ष बाद इंसेफेलाईटिस के एक रूप जापानी इंसेफेलाईटिस के टीकाकरण का फैसला कर पाई, लेकिन चार वर्ष तक टीकाकरण करने के बाद इस वर्ष इसलिए टीकाकरण नहीं हो सका क्योंकि टीके रखे-रखे खराब हो गए।
जून में अखबारों से खबर मिली कि जापानी बुखार से बचाव के लिए जो टीके आये थे, वे प्रशीतन (ठण्ड) की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खराब हो गए और इस कारण टीकों का पूरा बैच निरस्त कर दिया गया। मतलब यह कि जापानी बुखार के विषाणुओं से बचने का इस बरस कोई रास्ता न था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री  अनंत कुमार मिश्र ने भी बचकाना बयान दे डाला कि हमने ग्रामीण इलाकों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को सुविधा सम्पन्न बना दिया है इसलिए बेवजह जिला अस्पतालों में आने का कोई मतलब नहीं है। इसी आपाधापी में अगस्त का महीना  बीत गया और बुखार के विषाणुओं ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। सितम्बर से एक बार फिर मौत की खबरें आनी शुरू हो गयीं। ये अलग बात है कि बच्चों की मौतों की रोज-रोज आने वाली खबरें अभी न्यूज रूम की टीआरपी नीति की नजर में न चढ़ने के कारण अदृष्य पेजों पर हाशिये  पर पड़ी थीं। ऐसे समय में हम भी अपनी कहानी में मौतों को दर्ज करने 8 सितम्बर की सुबह गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज पहुंचे। मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में जगह-जगह मरीजों के परिवार वाले व्यस्त रेल प्लेटफार्म की तरह यहां-वहां ठुंसे पड़े थे। कैमरामेन पंकज ने वार्ड का मुआयना किया और ट्राईपोड़ रख कर फ्रेम बनाने लगा। मई में इसी वार्ड में मस्तिष्क बुखार के इक्का-दुक्का मरीज थे। अब पंकज के हर फ्रेम में कई मासूम बच्चों के चेहरे कैद हो रहे थे। हर बेड पर कम से कम दो-तीन बच्चे और उनका पस्त पड़ा परिवार किसी तरह अटा पड़ा था। हर मां-बाप यही पूछ रहा था कि क्या हुआ उसके बच्चे को ? जूनियर डाक्टर जानता है कि इस बार तो टीका भी नहीं लगा है। इसलिए कमोबेश हर बच्चे को यहां से चुपचाप विदा लेनी है। वह भी बार-बार सिर्फ यही कह रहा था कि मस्तिष्क ज्वर है। इसका निदान कैसे होगा, यह किसी के मस्तिष्क में नहीं था। सारे मस्तिष्क जैसे एक क्रूर होनी को घटते हुए देखने के आदी हो चले थे। अस्पताल की दवाओं और गंदगी की बदबू की तरह बच्चों की मौतें साल दर साल घटने वाली एक रूढ़ि में तब्दील हो चुकी  थी। वार्ड में भीड़ न हो इस समझ से मैं गलियारे की बेंच पर बैठ गया। बगल में बैठी नौजवान मुस्लिम महिला ने सुबकते हुए मुझसे पेन और कागज मांगा। उस पर उसने किसी का मोबाइल नम्बर लिखा। उसका डेढ़ साल का बेटा भी मस्तिष्क बुखार से पीड़ित वार्ड में भरती था। उसके कई हफ्ते बीमारी को समझने में और अपने गाँव-कस्बे में ठोकर खाने में बीत गए।
काश ! मेरे पास कोई जादू होता और मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्र जी से पूछता यह बेचारी किस अस्पताल में जाए। अनंत मिश्र जैसों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में  दाखिल नहीं होंगे और न ही उनके घर तक मच्छर पहुंच सकेंगे।
तभी एक महिला अपनी 12 साल की अचेत बिटिया मधुमिता को गोद में उठाये बदहवास गैलरी में आती दिखाई दी। कुशीनगर के बड़गाँव टोला की उर्मिला और शारदा प्रसाद की बेटी मधुमिता को 15 अगस्त से दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। गाँव और कस्बे में इधर-उधर चक्कर काटने में ही इस परिवार के चार-पांच हजार रुपये खर्च हो गए। मधुमिता का मामा, जो पुलिस की वर्दी में था पहले उत्तेजना और हताशा में सरकार को कोसने लगा, फिर अचानक उसे अपनी वर्दी और नौकरी का खयाल आया तो लगभग बेचारगी में हमसे वीडियो रिकार्डिंग्स को डिलीट करने की मिन्नत करने लगा। मधुमिता को उसका भाई अंशु और पिता दोनों हाथों से उठाकर डाक्टर के केबिन में ले गए। बाहर रह गई उसकी माँ उर्मिला। रोते-रोते उर्मिला ने बताया कि कैसे इस बीमारी ने पूरे परिवार को सड़क पर खड़ा कर दिया है। रक्षाबंधन से शुरू हुए दौरे बंद होने का नाम नही ले रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या उन्होंने अपनी बिटिया को टीके लगवाये थे- लाचारी से भरा न सुनने को मिला।
मै फिर उस मुस्लिम महिला के बगल में जा बैठा। अभी तक उसका फोन नहीं आया था, लेकिन वार्ड की भयावहता से वह अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य का लेकर परेशान थी। इस वजह से वह रो-रोकर हलकान हुए जा रही थी। स्वास्थ्य मंत्री के दावे को चुनौती देने के लिए न्यूज एजेंसी एएनआई की टीम भी वार्ड के बीचों बीच मय ट्राईपौड और कैमरा माइकों में टीवी कंपनियों की नाम वाली तिकोननुमा लकड़ी के पट्टों के साथ तैयार थी। एजेंसी के रिपोर्टर कम कैमरामैन की दुविधा थी कि उन्हें कोई भी डाक्टर आधिकारिक वक्तव्य नहीं दे रहा था। इसके समाधान के लिए उन्होंने हमारे सहयोग के लिए आये गोरखपुर के पूर्व छात्र नेता एवं पत्रकार अशोक चौधरी को घेर लिया। अशोक चौधरी कुछ बोलते कि वार्ड के दूसरे कोने से गगन भेदती चीत्कारों ने हम सबको हिला दिया। यह वार्ड के एक कमरे के बाहर से उठी आवाजें थीं। उस समय ढाई साल के एक बच्चे की मौत की पुष्टि हुई थी। ये चीत्कारें उसी के परिवार की थीं।
बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड में 8 सितम्बर की दुपहर 12 बजे हर दूसरा बच्चा इसी बीमारी का शिकार था। उस वार्ड में हर परिवार अपने ऊपर मंडरा रही मौत से आशंकित था। हम वार्ड के बाहर खड़े थे। बीच बगल के गलियारे से उस नन्हे शिशु के माँ-बाप, दादी, मौसी, चाची का समवेत क्रंदन हमारे ऑडियो चैनलों में रिकॉर्ड हो रहा था। थोड़ी देर बाद उस परिवार का मुखिया, संभवत उस नन्हे शिशु का दादा घुंघराले बालों वाले प्यारे शिशु को तेजी से लेकर बाहर निकला। शिशु को देखने के बाद उस परिवार का क्रंदन वार्ड की छतों को भेदता हुआ सबके भीतर तक घुसकर बेचैन कर रहा था। जब दादा ने बच्चे को पिता को सौंपा तो तब मृत देह की झूली हुई गति से ही समझ में आया कि ये घुंघराले बाल और सलोनी सूरत जल्द ही स्मृति बन कर रह जाएंगे। बदहवास कदमों से उस परिवार ने अपने नन्हे की अंतिम यात्रा एपिडेमिक वार्ड से शुरू की। उस नन्हे शिशु का सलोना चेहरा पूरे वार्ड को गहरी खामोशी और अवसाद में डुबा चुका था। हमने भी अपना ट्राईपौड समेटा और इमरजेंसी वार्ड के पास आ गए; तभी उसी तीव्रता वाली चीखों का शोर हैडफोन के जरिये मेरे कानों तक पहुंचा। दाहिनी तरफ नजर घुमाई तो वही मुस्लिम महिला दहाड़ माकर छाती पीट रही थी, जिसने आधा घंटा पहले मुझे वार्ड के गलियार में किसी परिचित का नम्बर लिखने के लिए पेन और कागज मांगा था। हमारे फ्रेम के क्लोज अप में उसका आंसुओं से भरा चेहरा और हेडफोन पर- अरे कोई मोर बेटवा के जिया दे…का करुण आर्तनाद था।
राघव दास मेडिकल कालेज, गोरखपुर में अपनी फिल्म के लिए मौत की कहानी दर्ज करते हुए हमें सिर्फ 30 मिनट बीते थे और हम दो मौतों को देख चुके थे। अब उस आधी मौत के बारे में पता करने का हौसला मुझ में नहीं बचा था, जो कुशीनगर के बड़गाँव  से आयी उर्मिला अपनी 12 साल की लगभग विकलांग हो चुकी मधुमिता को बचाने में घरबार बेचकर कर्ज में डूबकर हासिल कर चुकी थी।
हम मेडिकल कालेज से लौट रहे हैं। गाड़ी गोरखपुर की भीड़ वाली सड़कों और बरसाती पानी के जमाव के बीच रास्ता बनाते हुए जा रही है। रेलवे स्टेषन पहुंचते एक पत्रकार दोस्त का मैसेज मिला- सिक्स डाइड टूडे इन बीआडी मेडिकल कालेज।
(जनसत्ता, 19 सितम्बर रविवारीय मैगजीन से साभार)

नवकी बीमारी ने बुझाए लाखों चिराग : संजय जोशी

स्वतंत्र फिल्मकार और गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल व जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस यानी नवकी बीमारी की चपेट में आए पूर्वांचल के इलाके में शूटिंग के लिए गए। सरकार अस्पतालों में ही 2005 से अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। बीमारी की मार से पीडि़त परिवारों के दुखों को उन्होंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया। उनके संवदेनशील मन ने व्यवस्था और काइंयापन पर कई सवाल खड़े किए-

मई 2010 के पहले सप्ताह में हम गोरखपुर और आसपास के कस्बों में वीडियो कैमरा टीम के साथ घूम रहे थे। मकसद था इंसेफेलाइटिस के मरीजों और उनके परिवारों की कहानी को दर्ज करना।
यह बीमारी जिसे अभी भी पूर्वांचल के इस इलाके में नवकी बीमारी के नाम से ही जाना जाता है, 1978 में आई। कारण था धान के खेतों में पनपा मच्छर जो कि सूअर के बाड़ों में भी पनपता था। बारिश का मौसम खत्म होते-होते सितंबर से गोरखपुर और आसपास के शहरों में एक अजीब बदहवासी छा जाती है। प्राय: रोज किसी न किसी गांव और कस्बों से लोग अपने बच्चों को लेकर अस्पताल की तरफ भागते हैं। इस बीमारी के ज्यादातर शिकार बच्चे होते हैं। शुरूआत के दो दिन तक तो बीमारी का पता ही नहीं चलता फिर अचानक बुखार का तेज होना, आवाज का चले जाना और लकवा मारना किसी बुरे अंदेशे की इत्तला देता है। प्राय: अस्पताल तक आते-आते बच्चा या तो दम तोड़ देता है या फिर गंभीर रूप से जिंदगी भर के लिए विकलांग हो जाता है। सिर्फ सरकारी अस्पतालों में ही अब तक करीब 17000 बच्चे मर चुके हैं। गोरखपुर के एक पत्रकार के मुताबिक यह नुकसान 20 प्रतिशत ही है क्योंकि सरकारी अस्पताल 20 फीसदी से ज्यादा मरीजों को नहीं देख सकते। फिर तो यह समझिए कि पिछले तीस साल में अब तक तकरीबन एक लाख लोग मर चुके हैं। एक लाख लोगों के मरने के बावजूद यह बीमारी अभी भी राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं पा सकी है और न ही राष्ट्रीय चिंता का। पिछले बरस ही स्वाइन फ्लू को लेकर जिस तरह से हायतौबा मचाया गया, उससे तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पूर्वांचल में गरीबों के बच्चों की मौत भी काफी नहीं है। इसके बारे में गंभीरता से सोचने के लिए, जबकि स्वाइन फ्लू से मुश्किल से मरे आठ-दस लोगों के लिए सारा अमला ज्यादा चिंतित है। शायद मसला गरीब और अमीर होने का भी हैै। हमारी टीम भी इन्हीं सब सवालों की खोज में निकली थी।

होलिया में विकलांगता का अभिशाप

हमारी टैक्सी कैमरा टाइपौड और साउंड उपकरणों के से लदी गोरखपुर से 25 किलोमीटर दूर पिपराइच की तरफ जा रही थी। हमें पिपराइच से सटे दलितों की अधिसंख्या वाले होलिया गांव पहुंचना था। वर्ष 2005 में जापानी इंसेफेलाइटिस महामारी की तरह फैली। तब इस गांव से सर्वाधिक लोग बीमारी की चपेट में आए। गोरखपुर में बच्चों के डाक्टर आरएन सिंह ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट नीप (नेशनल इंसेफेलाइटिस इरेडिक्शन प्रोग्राम) की शुरुआत इसी गांव से की थी। नीप की वजह से गांव में जापानी बुखार से संबंधित सूचना वाला एक बड़ा बोर्ड नजर आया। कैमरामैन के मुफीद फ्रेम के लिए यह बोर्ड बहुत काम का था। कैमरामैन ने गांव को दर्शाने के लिए बोर्ड के साथ धीमा पैन किया।
होलिया गांव हमारे मैग्नेटिक टैप में दर्ज हो गया। डॉ. आरएन सिंह के सहयोगी डॉ. लाल बहादुर सिंह पड़ोसी कस्बे पिपराइच से हमारी मदद के लिए आ गए थे। हम कहानी की तलाश में थे। डॉ. सिंह ने बताया कि हमने इस बीमारी से लोगों को परिचित कराने के लिए स्कूल से प्रयोग शुरू किया है। कैमरामैन, साउंड रिकार्डिस्ट और मै अब कुछ अच्छे दृश्य और साउंड एम्बीयंस मिलने की उम्मीद में उत्साहित थे। हमारी सफेद एयरकंडीशंड इंडिगो कार जल्दी ही नई लोकेशन पर पहुंच गई। स्कूल की प्रार्थना खत्म हो चली थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में व्यस्त थे, लेकिन महान फिल्म टोली के लिए हर चरित्र का रीटेक संभव था। डॉ. सिंह के मित्र को समस्या बताई। तुरंत ही कक्षाओं को रोककर फिर से प्रार्थना की रीटेक की तैयारी शुरू की गई। कैमरामैन ने प्रार्थना सभा के सामने टाइपौड जमाया। प्रार्थना पढऩे वाली मुख्य लड़की की कमीज में रेडियो माइक लगा दिया गया। हवा में तैरता सांउड रिकार्डिस्ट का गन माइक और बूम राड गरीब बच्चों को भविष्य में डींग हांकने का मौका दे रहे थे। प्रार्थना की सभा के बाद मास्टर जी ने बच्चों को बताया कि जापानी बुखार से कैसे बचा जाता है। जल्द ही कट-कट की आवाजें आईं। हम यह भूल गए थे कि मुख्य भाषण मास्टर जी का है। इसलिए अबकी बार रोडियो माइक मास्टर जी की कमीज में टांगा गया और फिर से प्रार्थना सभा का रीटेक हुआ। कुछ बच्चे प्रार्थना की लाइनों से इतर बूम राड में लगे माइक की गति को अपनी आंखों से पकडऩे को बेचैन थे। प्रार्थना के गीतों और राष्ट्रगान की औपचारिकता के बाद मास्टर जी ने स्वच्छता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने बड़े-बूढों को शौच खुले में नहीं, बल्कि शौचालय में करना चाहिए के बारे में समझाना चाहिए। मास्टर जी शायद यह जानते थे कि बिना शौचालय हुए भी भाषण में तो यह कहा ही जा सकता है कि शौच, शौचालयों में करना चाहिए। नीप ने तो सिर्फ शौचालय में ही शौच करना चाहिए, बताने का जिम्मा लिया है। अब गांव में किसी के पास शौचालय बनाने की सामथ्र्य नहीं है तो वह क्या करें! होलिया में जापानी बुखार का टीकाकरण हुआ है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीकाकरण इस बुखार से बचाव का एकमात्र उपाय है। यह भी कि टीका कम से कम तीन नहीं तो दो बार तो जरूर लगना चाहिए। होलिया में 2005 के बाद दूसरे गांवों की तरह एक ही बार टीका लगा है। लेकिन हमारी फिल्म के दृश्य में होलिया के मास्टर साहब के यह पूछने पर कि किसे-किसे टीका लगा है, सभी बच्चे हाथ ऊपर खड़ा कर देते हैं। आडियो चैनल में यह भी दर्ज होता है। यह एक आडियो विजुअल सत्य है, जिसे हमने दर्ज कर लिया और शायद अपनी सुविधानुसार इसे इसी तरह इस्तेमाल भी कर लेंगे। और यदि हम नहीं करेंगे तो कोई और टीम कर ही लेगी।
प्रार्थना सभा के दृश्य के बाद हमें वापस गांव में आना था। अपनी फिल्म को अब विभिन्न केस स्टडी के माध्यम से आगे बढ़ाना था। फिल्म टीम डॉ. सिंह के मार्ग निर्देशन में होलिया गांव के ठाकुर टो्ला में रामसमुझ सिंह का मकान खोज रही थी। रामसमुझ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी पत्नी कुसुम देवी और बेटा मनोज घर चलाते हैं। 2005 के वक्त रामसमुझ की बेटी संजू 13 वर्ष की थी। बीमारी ने संजू की आवाज छीन ली और दिमाग भी। कैमरामैन ने फ्रेम बनाया। फ्रेम में सबसे बाएं बैठी संजू पूरी बातचीत में बुत बनी रही। यह पूछने पर कि आगे चलकर क्या बनना चाहती है तो उसका आवाज खींचकर डा-क्-ट-र कहना बीमारी के विद्रूप चेहरे को बखूबी समझा रहा था। विद्ररूपताएं सिर्फ संजू की विकलांगता से ही नहीं उपजी थीं। थोथी संवेदनओं ने भी कुछ कम इजाफा नहीं किया था। पड़ोस के किसी सम्पन्न जमींदार ने संजू की पढ़ाई-लिखाई और शादी ब्याह का जिम्मा भी लिया था। इस बात को कई लोगों ने कैमरे पर दर्ज हो जाने की नीयत से सुनाया। किसी विकलांग बच्चे पर इतना कुछ करने की मंशा सिर्फ  ढोंग नहीं तो क्या था।
संजू के बनिस्पत पासवान टोला की गीता और ओम प्रकाश का बेटा शैलेश जीवन के ज्यादा करीब थे। शैलेश 2005 में बीमारी के समय चार वर्ष का था। इस बीमारी ने उसकी आवाज को छीन लिया है और हाथ-पैर भी सामान्य नहीं रह पाए हैं। नाम पूछने पर बहुत मुश्किल से वह समय लगाकर खींचकर शै…ले…ष  बोलता है। गनीमत है कि उसका दिमाग एकदम दुरूस्त है। जब हम पासवान टोला पहुंचे तब शैलेष हम उम्र बच्चों के साथ बागीचे में खेलने गया था। शैलेष की मां गीता पासवान घर चलाती हैं और उनके पति होलिया से 25 किलोमीटर दूर गोरखपुर में चाय का ठेला लगाकर घर का खर्च जुगाड़ता है। ठाकुर टोले की कुसुम देवी की तरह उनके पास बेटे की बीमारी से लडऩे के लिए जमीन का सहारा भी नहीं हैं। पासवान टोले की सभी परिवारों के पास जमीन बीघे में न होकर क_े में है। कैमरा मैन ने शैलेष के आने के इंतजार में माहौल दर्ज करने के लिए महिलाओं के समूह को अपने फ्रेम में समेटना शुरू किया। 1930 में इसी होलिया गांव से बमुश्किल 45 किमी दूरी पर सरदार नगर में मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल तीन औरतों को अपने कैनवास में उतार रही थीं। पासवान टोले की ये औरतें अमृता शेरगिल की तीन औरतों जैसी ही मजबूत दिख रही थीं। किसी के पति सूरत तो किसी के पति मुंबई कमाने गए हैं। जिस आंगन में बैठकर हम उनसे बातचीत कर रहे थे वह पुरुषों की परछाई से मुक्त था। बातचीत शैलेष की बीमारी और उससे लडऩे के किस्सों तक ही महदूर थीं। जो इस दौरान हमारे मैग्नेटिक टेप में दर्ज न हो सका, वह था पासवान टोले की औरतों का अकेलापन। शैलेष के आने के बाद माहौल थोड़ा अलग हुआ। शैलेष की विकलांगता उसकी आंखों से दिखती शरारत पर भारी नहीं पड़ रही थी। हमारे अनुरोध पर शैलेष एक बार फिर बागीचे में अपने दोस्तों के साथ खेलने चला गया। कबड्डी की धमाचौकड़ी में शैलेष को छोड़कर हम होलिया गांव से बाहर निकल रहे थे।

सेमरी महेशपुर- जहां पांच घरों में छह मौते हुईं

गोरखपुर से कुशीनगर जाते हुए सड़कों पर विकास का नया मॉडल पसरा पड़ा है। कुशीनगर जहां महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था, में एक बहुराष्ट्रीय संस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से मैत्रेय प्रोजेक्ट स्थापति करने जा रही है। इस प्रोजेक्ट में कुशीनगर के आस-पास के किसानों को उजाड़ा जाएगा। बुद्ध की 500 फीट उंची प्रतिमा उजाड़े गए किसानों के खेत में खड़ी होगी। आत्मिक शांति और ऐशोआराम के लिए दुनियाभर के बौद्ध मतावलंबी कुशीनगर पधारेंगे। इसी कारण गोरखपुर से कुशीनगर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा कर फोर लेन का बनाया जा रहा है। सुकरौली इसी राजमार्ग पर एक उंघता हुआ कस्बा है, जिसकी नींद विकास के इस मॉडल ने तोड़ दी है। सुकरौली से एक रास्ता सेमरी महेशपुर जाता है। होलिया में हम विकलांग बच्चों और उनके परिजनों से मिले थे। सेमरी में हमें जापानी बुखार से हुई मौतों वाले घरों में जाना था। पहला घर जवाहिर और दुर्गावती का था। उनका दस बरस का बेटा तारकेश्वर 2005 में नवकी बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसके जाने से दुर्गावती की दुनिया ही उजड़ गई। मायूसी से उसे याद करते हुए कहती है- अभी होता तो गबरू जवान होता। कैमरामैन ने एडिटिंग की सुविधा के लिए दुर्गावती को दुबारा से अपनी चाय की दुकान पर बैठा लिया है। जब अंगीठी जलाने का उपक्रम चल रहा है और दुर्गावती के प्रोफाइल वाले शाट दर्ज किए जा रहे हैं। फ्रेम में दुकान की अंगीठी में लगी आग से मनमाफिक वार्म टोन मिल रही थी। दुर्गावती के दिल में लगी आग को बुझाने का तरीका हमारे कैमरे में नहीं था। दुर्गावती के घर के पास ही मुश्किल से 50 मीटर की दूरी पर तारकेश्वर का दोस्त जितेंद्र रहता था। 13 बरस का जितेंद्र, उदयभान और सावित्री की आंखों का तारा था। 2005 की बरसात में उसे यह बुखार आया और फिर दो-तीन दिन बाद उसने असर दिखाना शुरू किया। जैसे-तैसे करके यादव दंपति उसे सुकरौली ले गए, लेकिन तब तक सब कुछ पलट गया था। 2005 की महामारी के भेंट जितेंद्र भी चढ़ा। दुर्गावती के घर से निकलते ही हमें याद आया कि तारकेश्वर की कोई तस्वीर हमारी बातचीत के दौरान नहीं उतारी गई। इसलिए जितेंद्र के घर बातचीत पूरी होते-होते हमने उसकी तस्वीर मांग ली। तस्वीर मांगना जैसे पुराने जख्मों को फिर से हरा करना था। पहली बार हमें पता चला कि फिल्म के लिए जरूरी होते हुए भी मृत बच्चे की तस्वीर रखने का चलन ग्रामीणों में नहीं है। उनका कहना सही था कि इससे पुरानी यादें धूमिल पड़ती हैं। इसलिए बच्चों की स्मृति पूरी तरह से नष्ट करना ही अपने दुख को कम करने का एक आसान उपाय है। लालचियों की तरह हम तस्वीर की जुगत में लगे रहे। गुमसुम सावित्री ने मन मारकर कहीं कोने में दुबकी अपने दुलारे जितेंद्र की एक पासपोर्ट साइज की तस्वीर हमें दे दी। एडिटिंग के समय किसी भावनात्मक उभार की उम्मीद के साथ वह तस्वीर मेरे पर्स का एक जरूरी हिस्सा बन गई।
जवान बेटे की मौत वाले घर से कैसे विदा लेते हैं, यह किसी फिल्म स्कूल में सिखाया नहीं जाता। जितनी तेजी और उत्साह से हम यादव दंपति के आंगन में घुसे थे, उतने ही चुपचाप वहां से विदा हो लिए। अब मौत के उत्सव को और देर बनाए रखना किसी के बस में नहीं था। उस आंगन में सिर्फ सावित्री का शून्य में टंगा चेहरा और उदयभान की अपने बेटे की आत्मा को खोजती आंखें हमारा पीछा कर रही थीं। टैक शाट की तरह इसे दर्ज करने की कूव्वत न हमारे लेंस में थी और न मैग्नेटिक टेप में।
गुड्डू शर्मा का घर खोजने समय रास्ते में गांव के प्रधान रामाश्रय सिंह मिल गए। रामाश्रय 2005 से सेमरी महेशपुर के प्रधान हैं। पहली बार उनकी पत्नी ग्राम प्रधान बनी थीं और अपनी पत्नी के कार्यकाल को भी वह अपना ही समझकर गिनते हैं। पहले कैमरा, बूम राड और हैडफोन से अक्रांत टीवी क्रू को देखकर सरकारी भाषा में बतियाते रहे। थोड़ी देर बाद मान की बातें बताने लगे। उन्होंने ईमानदारी से स्वीकारा कि कैसे ऊपर से नीचे तक विकास के लिए आए रुपए का बंटवारा होता है। यह कहने को मजबूर हुए कि महामारी से लडऩे की सभी तैयारियां हवा में हैं। शरमाते और हंसते हुए स्वीकारा कि वह भी विकास की गति से मालामाल हो रहे हैं।
गुड्डू शर्मा तीसेक की उम्र के हैं और मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। बिना पलस्तर की दीवारें उनकी आंशिक बेरोजगारी को सहज ही व्यक्त कर रही थी। वर्ष 2005 में उनकी और पत्नी सुनीता की गोद में तीन साल का खूबसूरत बेटा सत्यम था। नवकी बीमारी ने यहां भी कहर बरपाया और सत्यम बचाया न जा सका। हमारे अनुरोध करने पर एक ग्रुप फोटो मिल गया, जिसमें सत्यम अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ हाथ में गुलदस्ता लिए हुए है। घने काले घुंघराले वालों बाला सत्यम ऐसा लग रहा था कि मानो तुरंत ही तस्वीर से बाहर निकलकर हमारे साथ खेलने लगेगा।
मा-बाप के हाथ से छिटककर तस्वीर अब उनके दूसरे बेटे सियम के हाथ में आ गई। अब सियम फिर से हमें तस्वीर में दिख रहे भाई-बहनों के बारे में बता रहा था। फ्रेम से परे सत्यम की मां सुनीता किसी तरह अपने आंसुओं को रोके थी। एकदम अंधेरे में सत्यम की बुआ अपने बिछुड़ गए भतीजे की याद में खो गई थी। मौत की याद में सब कुछ शांत था। हमारा कैमरा अपने पैन से सब कुछ को धीमे-धीमे मैग्नेटिक टेप में दर्ज कर रहा था। गुड्डू-सुनीता के पांच बरस के दूसरे बेटे सियम को भी गुजर गए भाई की तरह टीका नहीं लगा है। मै अचानक इस आशंका से घिर गया कि क्या इस परिवार का दूसरा गुलदस्ता भी टूट जाएगा? यह पूछने का साहस मेरे पास नहीं था क्योंकि फिल्म टीम टीका न लगने के कारण हुई मौतों की यादों को बखूबी दर्ज कर सकती हैं लेकिन हमारे बूम राड से कोई टीका नहीं लगाया जा सकता।
सियम के काले घुंघराले बालों और शोख चेहरे की याद के साथ हम रामजी गुप्ता के आम के पेड़ के नीचे जमा हो रहे थे। इसी पेड़ के नीचे से 5 सितंबर, 2005 को उनकी प्यारी पोती ज्योति की आखिरी यात्रा निकली। लकड़ी के तख्ते पर ज्योति की दादी रामरती और मां बादामी बैठे थे, हमारे सवालों के जवाब के लिए। मां का आडियो लेवल काफी नीचा था। जैसे ही ज्योति के बारे में रामरती ने बताना शुरू किया बादामी ने हस्तक्षेप कर अपनी बेटी की यादों को रखना शुरू कर दिया। बेटी की याद ने उसके आडियो लेवल को दुरूस्त कर दिया था। वही सब कुछ ज्योति के साथ हुआ जो दूसरे बच्चों के साथ हुआ। एक दिन अच्छी-भली स्कूल से लौटी ज्योति ने पेट दर्द की शिकायत की। फिर बुखार और दूसरे लक्षण। गोरखपुर के महंगे प्राइवेट नर्सिंग होम में इलाज कराने के बाद जो हाथ में आया, वह था डेथ सर्टिफिकेट। हम पता नहीं क्यों इसी डेथ सर्टिफिकेट को तस्वीरें भी विभिन्न कोणों से कैद करते रहे। शायद कहानी को और ज्यादा प्रमाणिक बनाने के लिए या यूं ही सब कुछ दर्ज कर लेने की नीयत से। सभी लोगों की तरह यहां के लोग भी अब किसी पर दोष मढऩे के लिए तैयार नहीं थे। जवाब वही कि जब जान ही नहीं बची तो हायतौबा करने से क्या? बातों-बातों में पता चला कि ज्योति की स्मृति शादी के एक वीडियो कैसेट में मौजूद है। जल्दी ही किसी को भेजा गया, उस वीडियो कैसेट की खोज में। इस बीच समय काटने की गरज से गुप्ता परिवार ने दही-चूड़ा के नाश्ते का अनुरोध किया। सुबह से धूप में घूम रहा कैमरा टीम ने सहज ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रामजी गुप्ता के दालान में कैमरा टीम दही-चूड़ा जीम रही थी। दही गांव के शुद्ध घी को औंटाकर जमाई गई थी और चूड़ा स्थानीय चावल से ही तैयार किया गया था। दही-चूड़ा के बड़े ग्रास के साथ ज्योति की स्मृति हम सबको मृत्यु भोज का आस्वाद करा रही थी और शायद इसी वजह से खूब औंटाए गए दूध का दही मीठा न होकर कसैला प्रतीत हो रहा था।
इस कसैले मृत्यु भोज को अभी और कसीला होना था भल्लन के घर पर। सेमरी महेशपुर से एक किलोमीटर दूर पश्चिम पर स्थिति अति दलित डोम लोगों का बरवा टोला है। 45 वर्ष के भल्लन और 40 की बरफी आठ बच्चों के जनक हैं। 2005 से पहले तक भुल्लन सुअर भी पालते थे। सुअर पालन न सिर्फ  उनके लिए नकदी का इंतजाम करता, बल्कि परिवार को पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध कराता। 2005 का जापानी बुखार सुअरबाड़े को लील गया। इस तो भल्लन और बरफी किसी तरह बर्दाश्त कर गए, लेकिन छह महीने के छोटू और तीन बरस की सोनी की याद को भुलाना बहुत मुश्किल था। पतली नीली प्लास्टिक शीट से बने टैंट में किसी तरह का गुजर-बसर कर रहे भल्लन परिवार के लिए अपने बच्चों को नवकी बीमारी से बचा पाना बहुत मुश्किल था। वे भी दूसरे लोगों की तरह नजदीकी अस्पताल की ओर दौड़े, लेकिन सबसे छोटे छोटू और सात भाइयों की चंपा सोनी को वे न बचा सके। बिना छत वाले घर की जिस चौखट पर बैठकर वे टेलीविजन इंटरव्यू दे रहे थे, जिसमें उनका एक लड़का पूरी तरह से नेमा दिख रहा है, देखकर कोई पूछ ही सकता है कि रत्नगर्भा बरफी अपने बचे हुए छह रत्नों को कैसे बचा पाएगी? हमारी विवशता थी कि अशिक्षित भल्लन परिवार ने अपनी नासमझी में हमें सरकारी नुमाइंदा समझ लिया था। वे बार-बच्चों की मृत्यु का मुआवजा न मिलने की शिकायत करते रहे। हमने भल्लन और बरफी को झूठा दिलासा देकर वहां से विदा ली। वे शायद यह समझ रहे थे कि हमारी रिकार्डिंग से उन्हें मुआवजा मिल जाएगा, जबकि सचाई यह थी कि पैसे की कमी के कारण उनके बच्चे सरकारी अस्पताल की चौखट तक पहुंचकर दर्ज न हुए थे। इसलिए मर कर भी वे सरकारी दस्तावेजों में मरे नहीं थे।

हमारी रिकार्डिंग से क्या किसी परिवार का भला होगा? क्या सरकार ऐसी चुप्प और गमगीन बातचीत से उद्वेलित हो पाएगी जिसमें मौत का हाहाकार नहीं बल्कि सिर्फ यादें और सूनापन हैं? पता नही। कैमरे के पैन और उसमें सब कुछ समेट लेने का कौशल, बूम राड और गन माइक का सटीकपन और दुखद स्मृतियों की पुनरावृत्तियां कुछ और बदल सकेंगी तो निश्चय ही बरफी जैसे तमाम रत्नगर्भाओं के रत्न पूर्वांचल के काम आ सकेंगे।

(समकालीन जनमत, जून,  2010 से साभार)