यह देश है वीर जवानों का अलबेलों का, मस्तानों को… यह गाना चाय की दुकान पर गूंज रहा था। हम लोग बैठे चाय की चुस्की ले रहे थे।
वर्मा बोला, ”जितना बूढ़ा चाय वाला है, उतना ही घिसा-पिटा यह रिकार्ड बज रहा है। जमाना बदल गया है। यह देश तो प्रदर्शनकारियों और उपद्रवियों को हो गया है। इनके पास ऐसे-ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर इनका कार्यक्रम चलता रहता है। इसलिए देश में प्रत्येक दिन कहीं-न-कहीं धरना-प्रदर्शन और तोडफ़ोड़ हो रही है।” वर्मा ने अपनी बात तार्किक ढंग से पूरी की।
वर्मा के इस तर्क ने हमारे बीच में मौन रूप से स्पद्र्धा पैदा कर दी। हमारी आदत है कि हम दूसरे की सही बात को गलत और अपनी गलत बात को भी सही मानते हैं। इसलिए वर्मा के चुप होते ही कपूर बोल पड़ा, ”देखा जाए तो यह देश नेताओं का है। उन्हीं की तूती बज रही है। नेता ही देश के भाग्यविधाता बन गए हैं। इनकी इच्छा ही कानून है। अपने प्रिय नेता की मौत पर लोग आत्मदाह तक कर लेते हैं। ऐसी अंधभक्ति है, नेताओं के प्रति। जैसे गंगा में डुबकी लगाकर लोग पाप धो लेते हैं, वैसा ही नेता बनकर गुंडा, बदमाश, लंपट, मूर्ख आदि देश में सम्मानित और माननीय बन जाता है।”
”कपूर तू भी क्या बात कर रहा है?” झा ने बता आगे बढ़ाई, ”कहने को तो देश नेताओं द्वारा चलाया जा रहा है, लेकिन वास्तव में चलाने वाले तो नौकरशाह हैं। ये ही नेताओं के हाथ, पैर, आंख, कान हैं। नेता कानून बनाते हैं और आदेश देते हैं, लेकिन अमल करना और न करना तो नौकरशाहों के हाथों में है। ये अन्नदाता और मालिक हैं। बुजुर्गों ने सही कहा है कि भगवान रूठ जाएं तो मनाना आसान है, लेकिन हाकिम रूठ जाए तो कोई कुछ नहीं कर सकता।”
”अरे भई, यह क्रिकेटरों का देश है।” बात की डोर खान ने पकड़ ली। ”मैच शुरू होते ही देश का माहौल बदल जाता है। लोग अपने कामधाम छोड़कर कमेंटरी सुनने या मैच देखने लग जाते हैं। जो यह नहीं कर पाते हैं, वे हर पल की स्थिति जानने के लिए बैचेन रहते हैं। जिसे खेलों में जरा भी रुचि नहीं होती, वह भी कम से कम स्कोर तो पूछ ही लेता है। मैच में जीत हो या हार, बड़ी खबर वह ही बनती है। क्रिकेटर मैच खेलकर, मॉडलिंग करके खूब पैसा कमाते हैं। इसके बावजूद मैच फिक्सिंग कर उल्लू-सीधा करते हैं, लेकिन देश में क्रिकेटरों के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ है।”
”यह देश उनका है, जिनकी एक झलक पाने के लिए लोग बेकरार रहते हैं। और वे हैं फिल्म स्टार। आज अधिकतर युवक-युवतियों का सपना फिल्मों में काम करना है। बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी अपना चुनाव प्रचार अभिनेता और अभिनेत्रियों से करवाती हैं। फिल्म स्टारों ने चुनावों में दिग्गज राजनीतिज्ञों को मात दी है।ÓÓ बनर्जी ने हाथ नचा-नचाकर अपना मत प्रकट किया।
मैं ही भला कैसे चुप रहता? ”यह देश साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का है। ये लोग ही अपने विचारों और आदर्शों से समाज को दिशा दे रहे हैं। हर चीज नाशवान है, लेकिन विचार अमर हैं।” मैंने तर्क दिया।
”तुम सब गलत हो।” नेगी ने मेज ठोकी, ”तुम्हारी बातें एक हद तक सही हो सकती हैं, लेकिन कोई बात पूर्णत: सही नहीं है। हकीकत यह है कि देश भ्रष्टाचारियों का है। हर जगह भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है। नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार की कहानियों जग जाहिर हैं। क्रिकेटरों की पोल खुल चुकी है। फिल्म दुनिया से परदा उठ चुका है।” वह मेरी ओर देखकर बोला, ”क्या तुम्हारा साहित्य जगत भ्रष्टाचारियों से अछूता है? किस तरह साहित्य में गुटबाजी, खेमेबाजी होती है, पुरस्कारों के वितरण को लेकर धांधली होती है, विभिन्न साहित्यिक संगठनों के पदों और विदेशी दौरे पर जाने के लिए भाई-भतीजावाद होता है, यह तुम भी भलीभांति जानते हो। प्रकाशक पाठकों तक पहुंचाने की बजाए, कमीशन के बल पर लायब्रेरी में किताबें खपा रहे हैं।” वह धीरे से मुस्कराया, ”अब तुम ही बताओ कि यह देश किस का है?”
हम सभी को मानना पड़ा कि देश भ्रष्टाचारियों का ही है। नेगी का चेहरा जीत के दर्प से चमक उठा।


Recent Comments