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‘आनंदम’ की काव्य गोष्ठी सम्पन्न

नई दिल्‍ली : ‘आनंदम संगीत व साहित्य संस्था’ की ओर से 8 अगस्‍त, 2011 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस में मैक्स न्यूयॉर्क के सभागार में मासिक काव्‍य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। इसमें कवि भूपेन्द्र कुमार, प्रेमचंद सहजवाला, मुनव्वर सरहदी, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, सरफराज़ फराज़  देहलवी, शैलेश सक्सेना, चाँद भरद्वाज, अब्दुल हमीद, साज़ देहलवी, अजय अक्स, अब्दुल रहमान मंसूद, लालचंद, अब्दुल रहमान मंसूर आदि कवियों ने काव्यपाठ किये। इसकी अध्यक्षता शायर मुनव्वर सरहदी ने की तथा संचालन ममता किरण ने किया।

देश की वर्तमान स्थिति पर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी के दोहे दो टूक तरीके से बेहद सटीक चोट करते रहे। जैसे-

सुनो अली बाबा सुनो, जनता का यह शोर
कड़े नियंत्रण में रखो, अपने सारे चोर!

अयोध्या विवाद के फैसले पर प्रेमचंद सहजवाला का यह अप्रत्यक्ष किन्तु प्रत्यक्ष सा लगता शेर-

अदालत में गए ईश्‍वर पे हम सब फैसला सुनने,
मगर अफ़सोस सब आए फकत ईश्‍वर नहीं आया।

कवि भूपेन्द्र की कविता की कुछ पंक्तियाँ-

तन का जब जब सौदा करना पड़ता है,
मन को तब तब पल पल मरना पड़ता है।

शायर अब्दुल रहमान मंज़ूर की गज़ल के दो शेर-

सिर्फ इतना सवाल है मेरा,
क्या तुम्हें भी खयाल है मेरा,
तुम जहाँ साथ छोड़ जाओगे,
बस वहीं इंतकाल है मेरा।

अजय अक्स-

यार थे जो पुराने गए,
हाय वो भी ज़माने गए
कृष्ण अब तो सुदर्शन उठा
बांसुरी के ज़माने गए

‘आनंदम’ अध्यक्ष जगदीश रावतानी-

शायरी करने जो लगा हूँ मैं,
लगता है खुद से अब मिला हूँ मैं
अब नहीं चुभते ताने अपनों के
चांदनी धुप और हवा हूँ मैं

सरफराज़ फराज़ देहलवी-

सौंप कर उस बेवफा को ही चरागे  दिल  मियाँ
हमने अपनी जिंदगी में खुद अँधेरा कर दिया

संचालिका ममता किरण ने तरन्नुम में एक मधुर गीत सुनाया जिसने पूरे सभागार का मन मोह लिया-

भीगा भीगा मन डोल रहा/इस आँगन से उस अंगा/यादों की अंजुरी से फिसले/जाने कितने मीठे लम्हे/लम्हों में दादी नानी है

अंत में गोष्ठी अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी ने खट्टे मीठे कई शेर सुनाए जिन से सभागार कहकहों से भर गया। पर प्रारंभ में उन्होंने कुछ गंभीर शायरी भी की-

अपना पाना नहीं रहा मक्सद,
अपना आईन सिर्फ खोना है
कौन समेट लेगा ये नहीं मालूम,
हम को बोना  है सिर्फ बोना है

गोष्ठी को संपन्न करते हुए जगदीश रावतानी ने सभी कवियों को धन्यवाद किया व स्वतंत्रता दिवस की बधाइयाँ दीं।

‘आनंदम’ की काव्य गोष्ठी संपन्न

न्यूयॉर्क : जगदीश रावतानी द्वारा संचालित ‘आनंदम’ संगीत व साहित्य संस्था की काव्य गोष्ठी 4 जुलाई, 2011 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस के सभागार में संपन्न हुई।  इसकी अध्यक्षता विख्यात कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने की तथा मासूम गाज़ियाबादी, लक्ष्मी शंकर बाजपेई, ज़र्फ ‘देहलवी’, बिशन लाल, विशाल ‘बाग’,  भूपेंद्र कुमार, नरेश कुमार, ए.एच ‘साज़’, आसिफ अली’, अजय ‘अक्स’, वीरेंद्र ‘कमर’, पूनम अगरवाल, रवीन्द्र शर्मा ‘रवि’, शांति अगरवाल,  अबुल फैज़ अज़्म, सहरियानवी, दर्द ‘देहलवी’, अहमद अली बर्की ‘आज़मी’, सुरेश यादव,  रंजन अग्रवाल, मुनव्वर ‘सरहदी’, ज़फर आदिल व मोइन अहमद ने भाग लिया।  गोष्ठी का संचालन ममता किरण ने किया।
गोष्ठी में गज़ल, गीत व छंद मुक्त कविता की अच्छी धूम रही.  ज़र्फ देहलवी की एक गज़ल का यह शेर-
दुनिया के लोग खुद पे नज़र फेंकते नहीं
आईना दिखाते हैं मगर देखते नहीं
सभागार मासूम गाज़ियाबादी के शेरों पर वाह-वाह कर के झूम उठा-
कोई पुरखों की ज़मीनें बेच कर भी पुर-सुकूँ
हम गुबारे बेच कर भी सो गए आराम से
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की संक्षिप्त छंद गज़ल-
तू है बादल/ तो बरसा जल
एक शून्य को/ कितनी हलचल.
नाम ही माँ का/ है गंगाजल
‘आनंदम’ संस्थापक जगदीश रावतानी की कविता पर भी खूब वाह वाह की दाद मिली- जल्दी मत कर देर हो जाएगी/ पचास वर्ष की आयु जब होती है पार/ मनुष्य उतावलेपन में डूब करता है विचार/ उतावलेपन में मनुष्य हर कार्य जल्दी जल्दी करने लगता है/ स्वप्न अधूरे ना रह जाएं/ ये सोच कर डरने लगता है…
संचालक ममता किरण ने एक कविता सुनाई ‘शिकायत’-
किताबों के होंठों पर शिकायत है इन दिनों/ की अब उनमें महकता खत रख कर/ नहीं किया जाता/ उनका आदान प्रदान.
गोष्ठी का समापन अध्यक्ष बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने रसीले गीतों को तरन्नुम में गा कर किया-
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे/ जाने किस मछली में बंधन की चाह हो
अंत में जगदीश रावतानी ने सभी कवियों का धन्यवाद करके गोष्ठी संपन्न की.

प्रस्तुति: प्रेमचंद सहजवाला