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अलसाई दुपहरी में दबे पाँव : शशांक दुबे

चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन की पुस्‍तक ‘बैकुंठपुर का बचपन’ पर लेखक-पत्रकार शशांक दुबे की समीक्षा-

लिखने-पढ़ने के शौकीन किसी सम्‍वेदनशील पाठक के सिर पर यदि एक पिस्तौल तानकर उससे यह सवाल किया जाये कि साठ के दशक में हिन्‍दी साहित्य का जो शामियाना किसी अमीर की शादी में लगने वाले टैंट की तरह सुदूर फैला हुआ दिखाई देता था, सतर के दशक में उसके घटकर आधे हो जाने, आठवें दशक में एक चौथाई रह जाने और नब्बे के दशक में उसकी हैसियत ‘जंगल की सैर’ में लगाये जानेवाले ‘दस बाय दस’ के टैंट की तरह रह जाने और कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना की परखचियाँ उड़ जाने के बाद भी जिन लोगों ने छपे हुये अक्षरों की ताकत को छोटा नहीं होने दिया उनमे से कोई तीन नाम तत्काल बताओ तो दूसरा और तीसरा नाम लेते वक़्त भले ही उसे पल भर सोचना पड़े, लेकिन ‘कान्‍ति‍ कुमार’ के रूप में पहला नाम लेने में वह कतई देर नहीं लगायेगा। दरअसल ‘काव्यम् शास्त्रम् रसिकम्’ की तथाकथित चौथे दशक की अवधारणाओं के हैंग-ओवर में लिप्त आलोचक भले ही संस्मरण, यात्रा-वर्त्‍तांत, व्यंग्‍य और सिनेमा को साहित्य के हाशिए पर खड़ी विधा मानकर नाक-भौं सिकोड़ते रहे हों, हिन्‍दी साहित्य का गोवर्धन इन्हीं विधाओं के लेखकों ने ही थामा है और लघु-पत्रिकाओं के संसार में अपनी सक्रिय उपस्थिति से पाठकों को सदैव खुशदम करते रहे हैं। आज हर पाठक अपने हाथ आई लघु पत्रि‍का की अनुक्रमणिका पर निगाह मारते वक़्त बाईं और कहीं संस्मरण और दाईं और कहीं कान्‍ति‍ कुमार का नाम देखना चाहता है।

‘लौट कर आना नहीं होगा’, ‘जो कहूँगा सच कहूँगा’, और ‘अब तो बात फ़ैल गयी’ के रूप में रोचक, चित्‍ताकर्षक और ज़र्रा-ज़र्रा पठनीय संस्मरणों की त्रयी लिखने वाले ‘संस्मरण किंग’ कान्‍ति‍ कुमार एक बार फिर अपनी उसी धार और उसी तेवर के साथ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के जरिये उपस्थित हुए हैं। फर्क है तो बस इतना कि जहाँ अब तक वह हमें रामेश्‍वर शुक्ल अंचल, आचार्य रजनीश, शिव मंगल सिंह सुमन, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे नामवरों के बहुविध आयामों से परिचित कराते रहे हैं, इस बार उन्होंने अपने संस्मरणों के केन्‍द्र में समाज के उस तबके को रखा है, जिसकी समाज में उपस्थिति तो है, लेकिन पूरी खामोशी के साथ। यह वह वर्ग है जहाँ केवल हारी-बिमारी में ही फल खाये जाते हैं, जहाँ केवल त्योहार के दिन ही जुआ खेला जाता हैं, जहाँ शादी-ब्याह में कपडे़ खराब होने की परवाह किये बगैर पीठ पर हल्दी के छापे मारे जाते हैं और जहाँ मेहमान के लिये घर में लाई गई मिठाई का पैकेट मेहमान के रवाना होने से पहले कूडे़दान के हवाले कर दिया जाता है। ये वे  लोग हैं, जिनमें न तो किसी बडी़ आकांक्षा की घोडी़ कुलाँचे मार रही है, न किसी बडे़ आक्रोश की चिंगारी खदबदा रही है। चालीस और पचास के दशक के भारतीय कस्बाई मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को सूक्ष्मता से बयाँ करते इन संस्‍मरणों में तत्कालीन समय और समाज पूरी सघनता से मौजूद है। इन्हें रचते हुए कान्‍ति‍जी ने कभी तालाब के किनारे खडे़ होकर ढेला मारा है तो कभी कमीज उतार कर खुद तालाब में उतरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए आम आदमी के जीवन की स्वाभाविक उठापठक को देख कभी पाठक के मुँह से ‘अरे, ये तो अपने जैसे ही हैं’ निकलता है तो कभी किसी का पतन देख यह बात निकलती है-

ऐसे तो न देखो के बहक जाएं कहीं हम,
आखिर तो इक इंसान हैं फरिश्ता तो नहीं हम।

कान्‍ति‍ कुमार के संस्मरणों में जिस प्रकार बचपन की शैतानियाँ हैं, मस्तियाँ हैं, अलसाई दुपहरी में किये जाने वाले प्रयोग और रात के सन्नाटे के रोमांच हैं, साँप को सीता की लट मानकर उनसे छेड़छाड़ की हिम्मत है और चूहों को बिल से खेंच निकालने की निरपेक्षता है, उन्हें वही किशोर हासिल कर सकता है, जो ‘राजा बेटा’ की तरह नहा-धोकर स्कूल पहुँचकर फिर वहाँ से सीधे घर वापस न आए और घर पहुँचकर तुरन्त पट्टेदार पायजामा पहनकर पहले ‘होम वर्क’ और फिर ‘होम के वर्क’ (मसलन बडे़ भाई साहब के कपड़ों की इस्त्री करना या पिताजी के हुक्के में तम्‍बाकू भरना या माँ के चूल्हे के लिये लकडियों की दो फाँक करना जैसे काम) में न जुट जाये। जीवन के तिलस्मी खजाने को कोई ‘रामपुर का लक्ष्मण’ नहीं खोज सकता। इसके लिये तो एक घुमंतू, मनमौजी, अपने परिवेश के प्रति कुछ ज्यादा ही उत्सुक किशोर का जिगर चाहिये।

गाँव के संस्मरण पढ़ते वक्‍त पाठकों को सबसे बडा़ खतरा इस बात का रहता है कि कहीं लेखक के शरीर में यकायक फणीश्‍वरनाथ रेणु की आत्मा न समा जाये। दरअसल होता यूँ है कि लोकप्रिय भाषा में बिल्कुल न समझे जाने वाले या कोई दूसरा ही अर्थ बतानेवाले इन शब्दों से हमारे लेखक कई बार इतने प्रभावित हो जाते हैं कि कई-कई शब्द या वाक्य या मौका लगा तो पूरे के पूरे पैरे पेल देते हैं। ऐसा करते वक्‍त उनका हाथ आँचलिक शब्दकोश पर, सिर आलोचक के कदमों पर और निगाह अकादमी के पुरस्कार पर होती है। लेकिन कान्‍ति‍ कुमार जी का इस प्रकार के अबूझमाड़ में कतई विश्‍वास नहीं है। अव्वल तो वे आँचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत विवक से करते हैं, बिल्कुल खीर में चावल की तरह, चावल में कंकर की तरह नहीं। दूसरे, हर ऐसे शब्द को आम बोलचाल की भाषा में व्याख्यातीत भी करते चलते हैं। मसलन किताब में एक अध्याय है- ‘चरकट्टा’, जिसे पढ़कर प्रभाष जोशी का ‘दारूकुट्टा’ याद आ जाता है (हालाँकि प्रभाषजी ने अपने लेखों में ‘घुन्ना’, ‘भेरू’, ‘लड्डूगुरु’, ‘ढेके दिखाना’ जैसे कई मालवी शब्दों का सटीक प्रयोग किया है, लेकिन दिल्ली के भाई लोगों को यह शब्द मन-कर्म और वचन से अपनेवाला लगा। इसलिये न सिर्फ यह शब्द पॉपुलर हुआ, बल्कि प्रभाषजी ‘दारूकुट्टाफेम’ भी हो गये। बावजूद इसके कि उन्होंने कभी दारू छुई तक नहीं।)। बहरहाल वह इस शब्द को खोलकर बताते हैं कि चरकट्टा यानी चारा काटने वाला। इसी चरकट्टे के बारे में वह आगे लिखते हैं, ‘वह घोडे़ को खरहरा करता। खरहरा यानी लोहे की कंघी’। इस किस्म के बारीक विश्‍लेषणों का लाभ यह होता है कि पाठक स्मृतियों के रोचक संसार में डुबकी लगाकर निकलते-निकलते कच्ची माटी से सने देसज शब्दों की पोटली भी उठाए लिये चलता है, जो आगे चलकर उसे भाषाई दृष्टि से समृद्ध करते हैं। बरसों पहले राज कपूर की फिल्म ‘श्री चार सौ बीस’ में ‘प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यूँ डरता है दिल’ गीत लिखते हुए गीतकार शैलेन्‍द्र ने ‘रातें दसों दिशाओं से कहेगी अपनी कहानियाँ’ पंक्‍ति‍ लिखी थी। तो संगीतकार शंकर (जयकिशन) ने कहा था कि दिशायें तो चार होती हैं, दस कहाँ से आ गईं। तब शैलेन्द्र ने चार लोकप्रिय, चार पैंतालीस डिग्री पर स्थित, एक आकाश और एक पाताल मिलाकर दस दिशायें बताई थीं। शंकर सहमत तो हो गये, लेकिन उन्होंने टिप्पणी की कि मैं तो समझ गया मगर श्रोता कैसे समझेंगे ? शैलेन्द्र का जवाब था, ‘हमारा काम सिर्फ श्रोताओं का मनोरंजन करना नहीं है, उनकी रुचियों का परिष्कार करना भी है।’ कान्‍ति‍जी भी पाठक को आह्लादित करने के साथ-साथ उनके ज्ञान का संवर्धन करते चलते हैं।

कुछ परिवारों में अब भी ऐसी परम्‍परा है जिसके अंतर्गत घर का मुखिया या ऊँची आवाज वाला सदस्य कोई अच्‍छा साहित्‍य पढ़कर सुनाता है और पूरा परिवार उसका लुत्फ लेता है। बेशक प्रतिशत के लिहाज से ऐसे घरों की संख्या काफी छोटी या यूँ कहें कि लगभग नगण्य होगी, लेकिन फिर भी हर शहर मे ऐसे कुछ घर तो होंगे ही। आमतौर पर ऐसे घरों में संस्‍मरण सुनाते वक्‍त वाचक को इस बात का खुटका (भय) समानांतर रूप से सताता रहता है कि अभी कहीं कोई औरत बेपर्दा होगी, अभी कहीं कोई दुःखी आत्मा ेेे के सफिक्स या प्रिफिक्स के साथ आधे अपशब्द कहेगी, अभी कहीं ढक्कन खुलेगा, अभी कहीं गिलास ढुलेगा, यह डर वैसा ही है जैसा मुश्किल दौरों में भारतीय टीम को बैटिंग करते देख लगता है, अब गये-तब गये-सब गये। ‘बैकुंठपुर में बचपन’ पढ़ते वक्‍त ऐसा कोई भय नहीं सताता। सस्वर रचना पाठ करते समय कहीं भी आवाज मंद करने की, कुछ शब्द या पंक्‍ति‍याँ काटने की जेहमत उठाने की कोई जरूरत नहीं। हो भी कैसे ? आखिर आम आदमी के ये संस्मरण आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिये ही तो लिखे गये हैं। इसलिये इन्हें खुलकर पढा़ जा सकता है। सिर्फ पढा़ ही नहीं, गुना भी जा सकता है और आने वाले कल के लिये सहेज कर भी रखा जा सकता है, क्योंकि ये संस्मरण हमें समाज के अमिताभ बच्चन या सचिन तेंदुलकर जैसे ‘सुपर हीरोज’ की स्थूलताओं से नहीं, बल्कि बैंडमास्टर और मुश्किल खाँ जैसे ‘अनसंग हीरोज’ की सूक्ष्मताओं से परिचित कराते हैं।

पुस्‍तक : बैकुंठपुर में बचपन, पृष्‍ठ : 224
प्रकाशक: सामयि‍क बुक्‍स, 3320-21, जटवाड़ा दरि‍यागंज,
एन.एस. मार्ग, नई दि‍ल्‍ली- 110002

बच्चन जी का प के लिए ध : कान्‍ति‍कुमार जैन

मधुशाला के अमर गायक हरि‍वंशराय बच्‍चन को याद कर रहे हैं चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन-

पहिले तो मेरी समझ में यह आया ही नहीं कि प के लिए ध का कोई अर्थ हो सकता है। पत्र हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, ‘मधुशाला’के गायक हरिवंशराय बच्चन का था, इसमें तो कोई शक नहीं था। पत्र के प्रारंभ में सोपान, गुलमोहर पार्क, नई दिल्ली पता बच्चन जी का ही था और अंत में अंग्रेजी के ‘गुड’जैसे हस्ताक्षर भी उन्हीं के थे, पर यह प के लिए ध क्या ? बहुत मगज पच्ची की पर प के लिए ध का रहस्य नहीं खुला तो नहीं खुला। बहुत दिमागी घोड़े दौड़ाने पर सा रे ग म प ध नी सा याद आया पर वे तो संगीत के बोल हैं, बच्चन जी के पत्र में उनकी क्या संगति? उन दिनों न मोबाइल थे, न ही दूरभाष की सहज सुविधा। क्या करूँ? चलें, जौहरी साहब के पास चलें। आदित्य प्रकाश जौहरी बच्चन जी के इलाहाबाद के दिनों के मित्र थे, तेजी जी से बच्चन जी के विवाह में आदित्य जी की बड़ी भूमिका थी- बच्चन जी और जौहरियों के परिवारों में बड़ी अंतरंगता थी। हो न हो, प के लिए ध का रहस्य जौहरी जी जरूर खोल देंगे। उमा जौहरी ग्वालियर कमला राजा कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या थीं। उमा जी जितनी सुंदर थीं, उतनी ही शालीन और जितनी विदुषी थीं, उतनी ही व्यवहार कुशल। वह मूलतः उमा खन्ना थीं। आदित्य प्रकाश जौहरी से विवाह कर वे उमा जौहरी हो गई थीं। शायद उन्हीं जैसी किसी रूपसी को देखकर मध्यकाल के महाकवि देव ने लिखा था- रूप तो खत्रानी को। लगा कि प के लिए ध का रहस्य आदित्य जी या उमा जी में से कोई न कोई अवश्य ही सुलझा देगा। मैंने आदित्य जी को बच्चन जी का वह पत्र दिखाया- जौहरी साहब ने वह पत्र मन ही मन पढ़ा, कुछ मेरी नासमझी पर मुस्काये और पूछा- इसमें समझ में न आने वाली कौन सी बात है? ‘यह प के लिए ध क्या?

जौहरी साहब अपने पुराने यार की आदत जानते थे। जानते थे कि बच्चन जी को हर पत्र का उत्तर देने का व्यसन है। रोज जितने पत्र आते हैं, उनका उत्तर जाना ही चाहिए। पत्रों का उत्तर न देना बदतमीजी है। अब हर पत्र का विस्तृत उत्तर दिया जाये तो समय लगेगा न? इसलिए ‘पत्र के लिए धन्यवाद’हर पत्र के उत्तर में लिखा जायेगा। अन्यथा बच्चन जी की डाक उनकी मेज पर न जाने कब तक पड़ी रहेगी। इसलिए शार्टकट प के लिए ध। डाक कुछ ज्यादा हो गई तो केवल प. ध.।

उस समय तक हिन्दी में संक्षिप्तियों का प्रचलन नहीं हुआ था। लोक सभा में इस मुद्दे पर बहस हो चुकी थी कि हिन्दी में संक्षिप्तियों का रूप क्या हो? अंग्रेजी के एब्रीवियेशंस को देवनागरी में लिखा जाये या हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप हिन्दी शब्दों के आद्याक्षरों से हिन्दी की संक्षिप्तियाँ बनाई जायें। संसद का बहुमत हिन्दी संक्षिप्तियों के लिए देवनागरी के आद्याक्षरों के पक्ष में था। जैसे प्रधानमंत्री के लिए प्रमं। पर उन दिनों के शिक्षामंत्री चाहते थे कि हिन्दी में आद्याक्षर अंग्रेजी के आद्याक्षरों के अनुरूप लिखे जायें जैसे पी.एम.। किसी तेज तर्रार सांसद ने शिक्षामंत्री महोदय की इस जिद के कारणों का खुलासा किया था- शिक्षामंत्री जी का पूरा नाम कालू लाल श्रीमाली था। अंग्रेजी के हिसाब से आद्याक्षरों में वह के.एल श्रीमाली बने रहेंगे और उनका कालूत्व ओझल रह जायेगा, पर हिन्दी में उन्हें काला श्रीमाली बनना पड़ेगा जो उतना ही बुरा होगा, जितना माता-पिता का उनको दिया हुआ नाम है।

बच्चन जी हिन्दी की संक्षिप्तियों को हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप ही रखना चाहते थे इसलिए प के लिए ध। यह तथ्य इसलिए विशेष उल्लेखनीय है कि बच्चन जी इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और कीट्स पर इंग्लैंड से ही उन्होंने पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की थी।

प के लिए ध की गुत्थी तो सुलझ गई थी पर बच्चन जी के नाम की गुत्थी- मेरा पीछा तबसे कर रही थी, जब मैं सातवीं में था। मैं सरस्वती के पुराने अंक पलट रहा था तो 43 या 44 में मुझे उनकी एक कविता दिखी- ‘इस पार प्रिये मधु हो, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा? मुझे कविता का अर्थ तो समझ में नहीं आया, दस या ग्यारह साल के लड़के के लिए इस पार उस पार का रहस्य समझना यों भी कठिन ही था, पर कविता के ऊपर बच्चन जी का चित्र था- चेहरे पर सत्य साईं बाबा की शैली में केश कलाप का घटाटोप पर उससे भी ज्यादा ध्यानाकर्षक थे उनके हस्ताक्षर। वे हस्ताक्षर मुझे अंग्रेजी के ‘गुड’जैसे लगे। मुझे लगा ही नहीं कि बच्चन कवि का नाम होगा और वे कवि के हस्ताक्षर होंगे। कवियों के नाम जो अभी तक पढ़ने-सुनने में आये थे वे रसा, पूर्ण, एक भारतीय आत्मा, हरिऔध, नवीन, प्रसाद, निराला जैसे थे। बच्चन किसी कवि का नाम होगा, यह कल्पनातीत था। अपने अनाकर्षक, अकाव्यात्मक भदेस नामों को आकर्षक, काव्यात्मक, नफीस बनाने के लिए नाथूराम ‘शंकर’बन जाते थे, माखन लाला ‘एक भारतीय आत्मा’ और गुसाईं दत्त ‘सुमित्रानन्दन’। एक यह कवि हैं जो हरिवंशराय जैसे अच्छे खासे, कर्णप्रिय, बढ़िया नाम को पीछे ढकेलकर बच्चन जैसे बचकाने, घरेलू नाम को शिरोधार्य कर रहा है। बच्चन, मुन्नन, मन्नन, अच्छन भी- कहीं कवियों के नाम होते हैं? यह तो बाद में समझ में आया कि छायावाद की उदात्त शैली और विषयवस्तु को नकारने और उससे विद्रोह करने का यह कवि का अपना अंदाज था। यह विद्रोह शायद अनजाने ही घटित हुआ था। बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है- ‘‘वास्तव में बीसवीं सदी के नवजागरण के साथ हिन्दी के प्रायः सभी नवयुवक कवियों ने अपने समाज में अपने को अजनबी पाया होगा। समाज से अपने को अलग करना चाहा होगा, किसी ने नया नाम लेकर, किसी ने नया रूप बनाकर, बाल बढ़ाकर, किसी ने नया परिधान धारण कर।’’

तो यह है बच्चन जी के छतनार बढ़े हुए बालों का राज, उनके नितांत घरेलू नाम का मर्म, प. के लिए ध. लिखने का राज। हम तुम जैसे सामान्य नहीं हैं, हम सामान्य जन से विशिष्ट हैं। बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया है कि उनके हस्ताक्षर की पद्धति मैं ही उनके काव्य का चरित्र, कवि स्वभाव की व्याख्या, कवि के संदेश की विशिष्टता छिपी है।

बच्चन जी चाहे पोस्टकार्ड लिखें, चाहे लेटर हेड पर पत्र, उनका पूरा का पूरा पत्र उनकी लिखावट के कारण भरा-भरा सा दिखाई पड़ता था। वे अपने हस्ताक्षर भी बड़े घुमावदार ढंग से, जैसे सबकुछ समेटते हुए करते। लिखते तो थे बच्चन पर वह प्रथम दृष्ट्या ‘गुड’जैसा दिखाई पड़ता था। लगता है बच्चन जी अपने प्रत्येक कविता के अंत में अपना नाम नहीं लिखते थे, गुड (good) लिखते थे। तुलसीदास जी भी तो कह गये हैं- निज कवित्त कोई लाग न नीका, सरस होय अथवा अति फीका। सुनने वाले या पढ़ने वाले मेरी कविता को नीका, गुड तो बाद में कहेंगे, अभी तो मैं ही अपनी कविता को ‘गुड’ का विशेषण दे रहा हूँ।

असल में ‘नीका’ अथवा ‘गुड’ काव्य वही होता है जो जीवन के आवर्त्त को व्यक्त करने में समर्थ हो। प्रसिद्ध सूफी शायर हाफ़िज ने अपनी प्रेयसी से कहा था कि मैंने रोजे अजल को जो इकरार नामा तेरी जुल्फ पेंचा से किया था, उसी से बंधा हूँ और निकल नहीं सकता।

बच्चन के प्रिय कवि और उनके शोध विषय कीट्स ने हफीज़ के इस कथन से अपने उस काव्य सिद्धांत के लिए बल संचित किया था कि कवि का क्षेत्र जीवन का आवर्त्त है- घेरा, वृत्त। प्रतीक रूप में प्रेयसी की की जुल्फ पेंचा। प्रेयसी की छल्‍लेदार कुतलराशि जो घूम घाम कर उसी जगह आ जाये, जहाँ से वह शुरू हुई थी।

बुंदेलखंड में एक सांप होता है दो मुँहा- कचलेंड या चकलेंड अंग्रेजी में उसे एरिक्स कहते हैं। वह अपने मुँह में अपनी पूँछ दबाये रहता है। बच्चन जी का बचपन ललितपुर में बीता था। वहाँ कचलेंड बहुत होता है। केशवदास और ईसुरी में भी कचलेंड का उल्लेख है। गालिब की एक प्रसिद्ध पंक्ति है- कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक। अर्थात् विजयी वही है जो तेरी जुल्फों को सर कर सके या कोई कितना भी जिये, प्रेयसी की जुल्फों की सर करना नामुमकिन है। वास्तव में एक लता होती है- इश्कपेंचा- गोल गोल घूमकर बढ़ने वाली, बारीक लाल लाल फूलों वाली, दूर से ही चित्त को मोहने वाली। बच्चन जी ने अपने हस्ताक्षरों का आइडिया हफीज़ के जुल्फे पेंचा से लिया था या कचलेंड से या इश्कपेंचा से पता नहीं पर उन्होंने अपनी कविता में, अपने व्यक्तित्व में, अपने दस्तखतों में, पत्र लिखने की अपनी शैली में, अपने बढ़े हुए घुंघराले बालों में, दार्शनिक का पथ नहीं अपनाया, कवि‍ का मार्ग अपनाया। दार्शनि‍क का पथ बाज का पथ होता है जो सीधा चलता है, कवि का मार्ग सर्प का मार्ग होता है- अपने आसपास को घेरता हुआ, परिवेश को अपने कुंडल में लपेटता हुआ। उनकी मधुशाला में यही सर्वकुंडल वाली शैली अपनाई गई है। सांप तो वही है पर हाला, प्याला, मधुशाला, पीनेवाला जैसे कुंडलों से वह जीवन के पता नहीं किन-किन आवर्त्‍तों को घेरता चलता है। ‘मधुशाला’ की प्रत्येक पंक्ति सर्प की काया के समान सुचिक्‍कण, मसृण और लहरदार है- आदि से अंत तक सुसंबद्ध, गतिशील, पिछला शब्द अगले शब्द को गतिशील बनाता हुआ। बच्चन जी की ‘मधुशाला’ के समान लोकप्रिय काव्य आधुनिक हिन्दी में दूसरा नहीं हुआ। प्राचीन और मध्यकालीन काव्य में आल्हाखंड और रामचरित मानस की लोकप्रियता नितांत दूसरे किस्म की है, पर आधुनिक मन को आकर्षित करने वाली, उसे प्रेरित करने वाली कविता तो ‘मधुशाला’ही थी। जिन लोगों ने बच्चन जी को मधुशाला का काव्य पाठ करते हुए सुना और देखा है, वे जानते हैं कि बच्चन जी अपने शब्दों के साथ दोनों हाथों से, दोनों हाथों की अंगुलियों से भी अपने काव्य का मर्म संप्रेषित करते थे- मैं बोला जो मेरी नाड़ी में डोला, जो मेरी रग में घूमा’बच्चन जी का ही सत्य नहीं था, उनके श्रोताओं का भी सच बन जाता था। जिन गंगा जमुनी मुशायरों में बच्चन जी होते थे, उनमें मुशायरे को लूटने का श्रेय यदि किसी कवि के खाते में जाता था तो वह बच्चन जी ही थे। मधुशाला को प्रकाशित हुए अस्सी वर्ष तो हुए ही पर मधुशाला आज भी हिन्दी भाषी युवकों का कंठहार है। आधुनिक काल में जीवन के प्रति, आमुष्मिकता के प्रति जो अनुराग है, उसके पहिले कवि बच्चन हैं। बच्चन हिन्दी के उन कवियों में हैं जो हजारों-हजारों श्रोताओं को अपनी कविता से बाँधे रह सकते थे। बच्चन जी अपने श्रोताओं या पाठकों से जितने अंतरंग थे, आधुनिक हिन्दी का दूसरा कवि नहीं है।

पहिले बच्चन जी के घटाटोपी केश कलाप वाला चित्र और गुड सरीखे दिखने वाले उनके हस्ताक्षर, फिर मधुशाला की रुबाइयाँ, फिर प के लिए ध। बच्चन जी को मैंने सुना भी बहुत था और देखा भी कम नहीं था, पर वह सब समूह में श्रोता के रूप में। मैं कहीं भी रहूं, बच्चन जी से मेरा पत्र व्यवहार निरंतर चलता रहा। वे मेरी पत्नी साधना को और मुझे नये वर्ष की अपनी मंगल कामनाएं भेजते रहे। वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव।

जब मैं 1978 में सागर विश्‍वविद्यालय आया तो बुंदेली पीठ का उत्तरदायित्व भी मुझे मिला। वे बुंदेली की जिन पुस्तकों के लिए मुझे लिखते, मैं उन्हें बराबर भिजवाता। वे अपनी कविता में आल्हा का कुछ उपयोग करना चाहते थे, उन्होंने मेरे द्वारा संपादित ईसुरी पत्रिका के अंत में बुंदेली पीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची में ‘आल्हा खंड’का उल्लेख पढ़ा। उनका 26 जून, 1986 का लिखा हुआ पत्र आया- आपकी पत्रिका ‘ईसुरी’प्राप्त हुई। धन्यवाद। आजकल मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। पढ़ना संभव नहीं हो पाया। शुभकामना। बच्चन।

यह उनका अंतिम पत्र था। इसके पूर्व लगभग साल भर पहिले मुझे एक पत्र और मिला था। उस पर 30 जुलाई, 1985 का दिनांक अंकित था- ‘आपकी ओर से भेजी गई पुस्तक महाकवि जगनिक कृत लोकगाथा आल्हा मिल गई। बहुत बहुत धन्यवाद।’पर इस पत्र में मैं डॉ॰ कान्ति कुमार जैन से डॉ॰ कुन्तल कुमार जैन हो गया था। मैं समझ गया कि पैमाना अब छलकने को है, दिये का तेल खत्‍म होने को है। वे जाल समेटने की तैयारी कर रहे हैं।

बच्चन जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय फरवरी, 69 में हुआ। बच्चन जी अपनी आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूँ’पूरी कर चुके थे और दूसरे भाग‘नीड़ का निर्माण फिर’की योजना बना रहे थे। इस भाग की सामग्री एकत्र करने के लिए वे ग्वालियर आये थे। अपने पुराने मित्र आदित्य प्रकाश जौहरी के अतिथि थे। उनकी पत्नी श्रीमती उमा जौहरी के.आर.जी. कॉलेज की प्राचार्या थीं- बच्चन जी के सम्मान में की गई दावत में जौहरी दम्पत्ति ने जिन लोगों को आमंत्रित किया था उनमें अटल बिहारी वाजपेयी थे, प्रसिद्ध वैज्ञानिक हक्सर साहब और उनकी पत्नी ललिता हक्सर थीं और हम दोनों थे। वाजपेयी जी ऐसी प्राइवेट पाटियों में खूब चहकते हैं- वे पीते नहीं, पर पीने वालों के बहकने-चहकने के लिए कोई अवरोध नहीं बनते थे। हक्सर दंपत्ति बेहद शालीन और गंभीर थे। बचपन जी ऐसे अवसरों पर मितभाषी रहना पसंद करते थे। जब मैं सपत्‍नीक जौहरियों के यहां पहुंचा तो कोठी के बाहर वाले ऊचे चबूतरे पर कुर्सियाँ लगी हुई थीं। उमा जी मेरी प्राचार्या थीं- उन्होंने बच्चन जी से मेरा परिचय कराया। ये कान्ति कुमार हैं, हमारे महाविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर होकर आये हैं।

बच्चन जी को कुछ याद आया- अच्छा अच्छा, वही न जिन्होंने जगदलपुर बस्तर से मेरी कविता नागिन को लेकर मुझे एक पत्र लिखा था। फिर बोले- मैंने हालावाद के विकास पर लिखा माध्यम वाला इनका लेख भी पढ़ा है और अपनी फाइल में उसकी कटिंग रख छोड़ी है। यह मेरे लिए बहुत पुरसकून बात थी कि इतना बड़ा कवि मुझे जानता ही नहीं, मेरे मंतव्यों को महत्वपूर्ण भी मानता है। मैंने अपने उस लेख में हिन्दी में हालावाद का जनक बच्चन जी को नहीं, जबलपुर के केशव प्रसाद पाठक को माना था। मैंने लिखा था कि हिन्दी में हालावाद पाठक जी के फाउंटेन पेन से रिस कर आया। बच्चन जी ने इसका बुरा नहीं माना था। उन्होंने उस लेख के लिए मेरी हौसला अफजाई की। बच्चन जी खुले दिल के, कुंठाहीन प्रसन्न चित्त व्यक्ति थे। दूसरे को मान देने में और अपनों से छोटों का मान बढ़ाने में सिद्ध। बच्चन जी ने उस दिन मेरा मान बढ़ाया था। मैंने कहीं पढ़ा था कि बड़ा आदमी वह होता है जो अपने सामने बैठे छोटे से छोटे आदमी को बड़ा मानता है। बच्चन जी ने उस दिन मुझे जो मान दिया था, वह मैं भूल नहीं पाता- उनके प के लिए ध लिखना भी उनका पत्र लिखने वालों का मान बढ़ाने का ही उपक्रम था।