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रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

बीनू भटनागर की कवि‍तायें

14 सि‍तम्‍बर 1947 को बुलन्दशहर ( उत्‍तर प्रदेश) में जन्‍मी बीनू भटनागर के लेख, व्‍यंग्‍य, कवि‍तायें आदि‍ रचनाएं वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन कवि‍तायें-

पचास के उस पार

माना कि यौवन के वो क्षण,
खो गये कुछ उलझनों में,
मैं वही हूँ तुम वही हो,
फिर न क्यों,
जी लें वही उन्माद के क्षण।

तुम मेरे हो शांत सागर,
लक्ष्य मेरा,
मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली हूँ,
बाँहें फैला दो ज़रा मैं तो वही हूँ।
महसूस मुझको करा दो मैं नहीं हूँ।

तुम हो इक चट्टान हो संबल मेरा,
फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।
भूल जाओ बालों मे चाँदी के जो तार हैं
भूल जाओ कि हम पचास के उस पार हैं।
फिर से जी लो कुछ पल,
जो हथेली से फिसलकर,
रेत के ढेर में,
ओंस की बूँदों से खो गये हैं।
आज भी मेरे वो पल,
तुम पर उधार हैं।

ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा

दूर गगन पर एक सितारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा,
फिर भी लगता कितना प्यारा।

नीड़ पेड़ का रैन बसेरा,
पक्षी का आकाश है सारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

नदिया का बहता जलधारा,
प्यास बुझाता हरता पीड़ा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

फूलों का मुस्काता चेहरा,
उनपर मंडरता एक भँवरा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

सुर लय पर संगीत की धारा,
तन मन सबे प्रभु पर वारा,
वो तेरा भी है, और है मेरा।

ये मेरा है वह है तेरा,
कितना अर्थहीन ये नारा,
ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा।

नदिया

हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ़ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,
पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो
ये ही हैं कहानियाँ।

सुनीता की कवि‍तायें

12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे चकियाँ में जन्मीं डॉक्‍टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू. से पी-एच.डी. की  है। इनके  लेख–कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्थायी

अख़बारों के चंद पन्नों में सिमटी जिंदगियों में
ताजेपन सा कुछ भी नहीं
रात के पड़े खाने सुबह की तरह
रोते-बिलखते मासूम चेहरे पल के मेहमाँ
गाते-गुनगुनाते मुखड़े होंठो की चुभन
एक क्षण के पश्‍चात ढल जाते हैं रात्रि सरीखे
चंद चर्चाओं के बाज़ार क्षणिक गरम, तवे से
छपाक-छपाक की भड़ास क्षण में गायब
रेत पर गिरे बूंदों के अस्तित्व के मानिंद
बरखा-बहार और मधुवन की मधुर ध्वनि
धड़कनों में शोर मचाते खलबली अभी-अभी
करवट के साथ पन्ने पलटते दृश्य और दृष्टि बदले सभी
परिवर्तित परिवेश की पुकार सुनाई देती कभी-कभी
सुमधुर योजनाओं की ललकार दिखाई देती चहुओर
न रुकने वाली वक्त की सुइयाँ टीम-टीम कर लुप्त होतीं
एक चेहरा उभरता है प्रेयसी के जुल्फों में कैद
चितवन की चंचलता चहक उठती
नयेपन का अंदाज़ पलक झपकने के साथ
बुलबुले से अस्तित्ववि‍हीन हो जाता
खबरों की दुनिया में निरंतर गहमागहमी बनी रहती
निरुउत्तर प्रजा पल्लवित पुण्य बनी हुई
लेकिन भू धरा थमने के जगह डोलती रहती
थिरकती साँसों के लय पर वायु नृत्य करते
नटते, रिझते और रिझाते रम्भाने लगते
पात्र में रखे पानी सा मटमैला और फीका बन जाते
दिखने में धवल और स्वच्छ लगते
भागते, दौड़ते कल्पना के सागर में छलांग लगाते
छलकते आँसू रंगीन चित्रों के गुजरते ही सूख जाते
चिथड़े-चिथड़े सुख की तलाश में निकल पड़ते एक और लम्‍बी यात्रा पर
नंगे, खुले और खुरदरे पैरों के निशान जह-तह बिखरे पड़े
उनकी आवाज़ाही का कोई स्थायी प्रमाण नहीं
नर-शरीर की तरह अस्थायी, क्षणभंगुर और जुगनू की तरह
यहाँ सब कुछ सिमटा हुआ है बिखरे तौर पर
ढेर में तब्दील होते मलबा सा नहीं
बल्कि सपनों के कलेजे पर बिछे फूलों के कतारों की तरह
एक-एक कतरन से तैयार वस्त्र सा सुसज्जित, आकर्षक किन्तु अस्थायी

इस जिंदगी के बदले

इस जिंदगी के बदले
दो जून की रोटी नहीं मिली
सौदों के अम्बार मिले जिनकी वजह से नर्क के द्वार खुले
हँसते-खिलते गुलशन में
पतझड़ सदियों से बने हुए हैं

पगडंडियों से झुरमुट की तरह रौंद दिये गये
एक-एक करके चुने गए उम्मीद के दाने
भेड़-बकरियों में बाँट दिये गये
गर्दन जबह करके जबरदस्ती जुराबे बाँधी गई
कपड़े तार-तार कर दिये गये…!

इस जिंदगी के बदले
खपचालियाँ घोंप-घोंप कर मुरब्बे बना दिये गये
चीनी की जगह नमक रगड़ा गया
स्वाद लेकर चखने के स्थान पर
कसैले पान की तरह थूक दिये गये

खाने के लिये जूठन परोसे गये जैसे ज़ायकेदार छप्पन भोग
छटपटाहट होती रही लेकिन कोलाहल न बन सके
हवन कुण्ड में डाले गये घी की भाँति
धीरे-धीरे जलते हुए बदबू फैलाने लगे
गीली लकड़ी की तरह सुलग-सुलग कर

इस जिंदगी के बदले
मुझे बना दिया गया
आस्मा से गिरती हुई ओसें की बूंदें
पशुओं के आगे पड़े चारे के तिनके की भाँति
बिछा दिये गये अरमान के सारे उपागम

ठहरे हुए पानी के चारों-ओर
फैली हुई बजबजाती काई
जिसके चौमुहाने पर जैसे भिनभिनाती मख्खियाँ
मछली की सी तड़फाड़ाहट
उथल-पुथल करती नसें

इस जिंदगी के बदले
हमें दिये गये
बदलते विस्तर की तरह रोज़ एक नई सेज
उठाये-बिछाए जाते रहे
एक दिन से कई रातों तक
फैले बदबू से गहन घृणा के पात्र बनने तक

बेमज़ा भोजन की तरह
पटक दी जाती थाली सी
वदन माज दिए जाते
पेस्ट से घिसते दाँतों से
मशीन में काट दिये जाते चारे की तरह

इस जिंदगी के बदले
धब्बे लगी दीवार में तब्दील कर दिये जाते
एक नामुराद मुलाजिम की तरह
धकिया दिये जाते
घुटन के मकान में कैद किये जाते

परिंदे के पर काटकर उसे उड़ने पर मजबूर से किये जाते
हथेलियों पर अंगारे रख दिये जाते
बर्फ के टुकड़े मुख में घुसेड़ कर
आँखों में फूलों के सेज सजाये जाते
सिसकी अन्तःपुर में सुरक्षित रह जाती

इस जिंदगी के बदले
खुरपी पकड़ाकर बिराने में ठेल दिये जाते
उड़ती रेतों को पकड़ने की फरमाईश की जाती
घुमड़ते बादलों के झुर्रियों को गिनवाए जाते
एक बैल की तरह बलुहट में जोत दिये जाते

ताबूत में कैद लाश से जुगाली कराई जाती
पर्वत शिखरों पर जमें बर्फ के रेम्बों दिखाये जाते
अनसुनी कहानियों के किस्से दोहराते हुए
गरम तवे पर रोटी सेंकती उसे ठंडा लोहे में परिवर्तित कर दिये जाते
फिर घन पर घन बरसाए जाते
उसके सपाट होने तक

इस जिंदगी के बदले
नेत्रों पर चिलमन चढ़ा दिये गये
झूठे वादों के साथ दगा ही मिले
कुत्तों की तरह बोटी-बोटी नोचकर खाए
भूखे पेट पर रोलर चलाकर
जश्न मनाने की मन्नत मानी गई

धमकियों के दम पर धमनियाँ जब्त कर लिये गये
तपते रेत पर छोड़ दिये गये
महल की नींव रखने के लिये
इमारत के चारों पाए कूल्हों पर टिका दिये
भावी रिश्तों के नाम पर सब कुछ होता रहा

इस जिंदगी के बदले
खच्चर सरीखे लादी ढोते रहे
लगन कभी भी कम न हुई
चाहत के दिये जलते रहे
एक-एक दिन गुजरते गये उम्मीद बंधी रही

सुबह की किरण फूटते ही
हिम्मत की ताकत दुगुने दम से लग जाती
लेकिन बेड़ियों में कैद जिंदगी
अपने अंत की ओर बढ़ रही थी
उसे रोकना मुमकिन न था
हथौड़े की मार से जिस्‍म बेजान हो गये

इस जिंदगी के बदले
यातना के सागर में डुबो दिये गये
खारे पानी से गल गये
हड्डियों का ढ़ाँचा बरकारार रहा
युगों-युगों तक सिला की तरह

लहराते ख़्वाब खो गये
यादों के पट पलकों में खुल रहे हैं
चीनी-जल की तरह घुल गये
जीवन से इस कदर मोह बढ़ता रहा लेकिन उड़ान भरने की मनाही थी
वह आज भी बरौनियों में मसखारे से चिपके हैं

सूरज कुछ कहता

सूरज कुछ कहता है
सदा चुप-चुप रहता है
बंधनमुक्त विचरता है
स्नेहमग्न उलहना देता है।

धूप की तपिस तड़प रही है
अनजाने जख्म से जूझ रही है
कब मुक्त होंगें कर्तव्य से
पीड़ा की वेदना व्यथा सुना रही है।

नीरव में पड़े तन्हा खड़े हैं
दयार्द्र की उम्मीद से भरे हैं
मदांध मानव से गिला है
हम भी प्रेमातुर हेतु बने हैं।

यावज्जीवन के आमरण हैं
प्रतिक्षण के विवरण हैं
कष्टापन्न को सहते हैं
देशार्पण में लगे रहते हैं।

मार्गव्यय का लोभ नहीं है
सदाचार में तल्लीन हैं
व्यभिचार से रिश्ता नहीं है
भयमुक्त संचित नरोत्तम हैं।

नीलाम्बर के वासी हैं
पृथ्वीजन के पोषक हैं
शरणागत के दास हैं
कलाप्रवीण विद्यार्थी हैं।

धर्मविमुख नहीं करते हैं
पथभ्रष्ट के भी हमराही हैं
अँधेरे के दुश्मन हैं
उजाले के देवालय हैं।

पनचक्की से घुमरते हैं
देहलता से लिपटते हैं
नीलकमल से सुसज्जित हैं
पीताम्बर से चमकते हैं।

कनकलता से मिताई है
यहाँ न कोई महाजन है
नगरवास में रहता हूँ
शिलालेख सा अमिट हूँ।

सुनता न कोई आपबीती है
आनंदमग्न लोग स्नेहमग्न हैं
दर्द के रेखांकित से अंजान हैं
बीचोंबीच उभरे, जवाब खामोश हैं।

शोकाकुल करुणा से देखते हैं
मुँहमाँगा वरदान सहश्र पाते हैं
व्याकुल मन बेमतलब भटकते हैं
कर्मभूमि को मालगाड़ी सा ठेलते हैं।

गगन में हरफनमौला से फिरते हैं
पदच्युत का कोई भय नहीं है
देशनिकाला कभी नहीं हो सकता है
हम सृष्टि संचालन के पथगामी हैं।

कमलनयन में उम्मीद बन सजते हैं
पंचतत्व के उत्कृष्टतम स्वामी हैं
पर्णकुटी से महलों तक में रहते हैं
आशाओं के दीपक बन जलते हैं।

छटपटाहट

कहीं दूर से रौशनी आ रही थी
आसमान में बादलों के बीच तारें
मिट्टी के जर्रे-जर्रे में कसक थी
कमरे में बल्ब खमोशी के गीत गा रहे थे
वह दूर खड़ी कुकृत्य को देख रही थी
लब खामोश थे पलाश के पेड़ रो रहे थे
पत्तों की सरसराहट भय चित्र खींच रहे थे
बगल कमरे में लेटी माँ खाँस रही
पीड़ा, दर्द, कसक की आहटें हल्की-हल्की आ रही थीं
पेड़ों पर अपने घोसले में पंक्षी गहरी निद्रा में निमग्न थे
दरवाजे के कोने खड़ी शीतल छाया
अंदर के जलन से लपलपा रहे थे
अपनी गरज बाबली जबरदस्ती घसीटती रही
अफ़यूनी जुनूनी निर्णय से तन-वदन टूट रहा था
अफ़सोस, दिल गड्ढे में धँसता जा रहा था
स्त्री के समक्ष स्त्री का लूट लिया संसार
दम तोड़ दिए आह, सिसकी और लज्जता ने
नोटों की गड्डियाँ आँखों में लहरा रही थीं
नसों में दौड़ते खून पानी के शक्ल अख्तियार करते जा रहे थे
अय तेरी कुरबत, मनमाने सो कर ले
चक्कर काटती धरती घूम कर आ जायेगी दुबारा अपनी जगह
इस काया को छोड़ते ही एक नए छाया में अवतरित होते हुए
आस्मा में टिमटिमायेंगे
उड़ता गप्पा का उपहार देते हुए
कुछ गाँठे खोलते हुए चिंता की लकीरे घिर आईं
बादलों के आँचल न ढक सके
समाज के ताने में गूंथे व्यंगवाणों को।
(एक सच्ची घटना पर आधारित है।)

नागार्जुन की प्रतिबद्धता : राधेश्याम तिवारी

जनकवि‍ नागार्जुन की जनपक्षरता पर वरि‍ष्ठ कवि‍ राधेश्याम ति‍वारी का आलेख-

अपने यहां एक परम्परा है गणेश वंदना की। किसी भी काम को शुरू करने से पहले लोग गणेश की वंदना करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि विरोधी भी शांत रहें, लेकिन नागार्जुन ने एक साथ इतने विरोधी पैदा कर दिए हैं कि उनपर चर्चा करते हुए यह संभव ही नहीं है कि आप सबको खुश रख सकें। नागार्जुन हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जो परम्परा से निकलकर प्रगतिशीलता की ओर प्रवृत्त हुए। बाबा से ऐसा इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि वे संस्कृत के अलावा पाली, बांग्ला आदि भाषाओं से तो परिचित थे ही, मार्क्सवादी विचारधारा के भी करीब आए। नागार्जुन ने भी वंदना की है, लेकिन वह वंदना बुद्ध, मार्क्स्, फ्रायड के अलावा पिशाच और वैताल की। वे गणेश के माध्यम से अपने विरोधियों को खुश नहीं करना चाहते, इसलिए वे पिशाच को पिशाच ही कहते हैं, उसे खुश करने के लिए किसी अलंकार से अलंकृत नहीं करते-
नमस्ते स्तु पिशाचाय
वैतालाय नमो नमः।
नमो, बुद्धाय मार्क्साय
फ्रायडाय च ते नमः।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए आप आसानी से समझ सकते हैं कि उनकी दृष्‍टि‍ में  पिशाच  और वैताल कौन हैं। एक बार जब मैंने बाबा से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘पिशाच कई तरह के होते हैं। जिसके पास जैसे-तैसे बहुत धन इकट्ठा हो गया हो वह धन पिशाच  है, जो अति विनम्र होकर भी पीछे से वार करता हो वह विनम्र पिशाच है और जो ऐसी कविताएं लिखता हो जिसे पाठक तो क्या, स्वयं कवि भी न समझता हो, उसे कवि पिशाच कहेंगे।’’ गनीमत है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि जो आलोचक ऐसी कविताओं को महान बनाने पर उतारू हैं उन्हें आलोचक पिशाच कहेंगे।
नागार्जुन मुलतः राजनीतिक चेतना के कवि हैं। जनपक्षधरता ही उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। जनता से उनका जुड़ा़व विश्वव्यापी है। उनकी यह विश्‍वदृष्टि ही है कि वे दुनिया के तमाम दबे-कुचले लोगों की समस्याओं पर नजरें गडा़ए रखते हैं।
कोरिया समस्या पर उनकी एक कविता है-
‘‘गली-गली में आग लगी है घर-घर बना मसान
लील रहा कोरिया मुलुक को अमरीकी शैतान
जूझ रहे किस बहादुरी से धरती के वे लाल
मुझे रात भर नींद न आती सुन सिऊल का हाल।’’
यहां याद कीजिए गालिब का वह शेर-
‘‘मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती।’’
बाबा ने गालिब की तरह नींद न आने के कारणों को रहस्य नहीं बनाया, बल्कि साफ-साफ बता दिया कि उन्हें रातभर नींद  क्यों नहीं आती। हालांकि उन्हें सांस की भी बीमारी थी। मैंने भी उन्हें रात भर जागते हुए देखा है। जब व्यक्ति को रात में नींद नहीं आये तो वह कुछ सोचता रहता है। यह हो ही नहीं सकता कि रात में जगा व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना सोचे रह जाए। एक बीमार व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के बारे में ही सोचेगा, लेकिन नागार्जुन उस स्थिति में भी अपने सांसों के बारे में न सोचकर उस सिऊल के बारे में सोचते हैं जहां की जनता अमेरिकी आतंकवाद से लोहा ले रही है। यह है बाबा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।
वे मनुष्य को सर्वोपरि मानते हैं और राजनीतिक दलों के विचारों को भी उसी परिप्रेक्ष में देखते हैं। एक घोषित कम्युनिस्ट होकर भी जब नागार्जुन यह लिखते हैं-
‘‘आ गए अब दिन ऐश के
मार्क्स, तेरी दाढ़ी में जूं ने दिए होंगे चीनी अंडे
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बावन अंडे
लाल पान के गुलाम ढोएंगे हंडे
सर्वहारा क्रान्ति की गैस के !
आ गए अब तो दिन ऐश के!’’ तो इसका यही अर्थ है कि वे सत्ता के चरित्र को अलग कर नहीं देखते। वे किसी भी तरह के शोषण के विरूद्ध थे। वह चाहे धर्म के नाम पर हो या विचारधारा के नाम पर। इसमें एक बात मैं और जोड़ना चाहूंगा कि मार्क्सवाद का जितना अहित गैर मार्क्संवादियों ने किया है उससे कहीं अधिक उन लोगों ने किया है जो मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए ही बाबा ने लिखा है-
‘‘दिल में चाहे जो हो/गले में अगर मार्क्‍स है अटका!/बताओ मैं कौन हूं भला?’’ शायद ऐसे ही कम्युनिस्टों के लिए मार्क्‍स ने कहा था- ‘‘मुझे मार्क्सवादियों से बचाओ।’’
नागार्जुन जनता के पक्ष में किसी भी तरह का जोखिम उठाने वाले रचनाकार हैं। वे लक्षणा और व्यंजना में बात करते-करते सीधे अभिधा में भी उतर आते हैं। वे यह मानते हैं कि यह व्यवस्था पूरी तरह भोथरा गई है। इसकी चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि यह लक्षणा और व्यंजना की भाषा नहीं समझती। इसीलिए वे सीधे नाम लेकर कविताएं लिखते हैं। अगर इमरजेंसी के खिलाफ लिख रहे हैं तो सीधे-सीधे नाम लेकर-
‘‘इंदिराजी-इंदिराजी क्या हुआ आपको
सत्ता के मद में भूल गई बाप को।’’
मैं ऐसे कई लेखकों को जानता हूं जो इमरजेंसी में लक्षणा और व्यंजना के इतने कायल हो गए थे कि सार्वजनिक स्थलों की बातें तो दूर, बंद कमरे में भी लक्षणा और व्यंजना में ही बातें करते थे। वही लेखक इमरजेंसी के बाद अपनी रचनाओं के भीतर छूपे विद्रोह की आग को इस तरह उजागर करने लगे मानों दुनिया के सारे क्रांतिकारी उनके पट शिष्य हों। ऐसे ही क्रांतिकारियों के लिए बाबा ने लिखा-
क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
भ्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
कूट-कपट की भीतर घाती
शांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
अर्धशती अभियान मुबारक
अंतरिक्ष अभियान मुबारक
एक आंख का भौतिक बाद
द्वन्द्वात्मक विज्ञान मुबारक।’’
बाबा ऐसे कम्युनिस्ट नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। उनके लिए जनता पहले थी। जो जनता के साथ था, बाबा उसके साथ थे। आप याद करें इमरजेंसी का वह समय जब सीपीआई इमरजेंसी के समर्थन में थी और बाबा भी सीपीआई में ही थे, लेकिन वे जेपी के पक्ष में बिहार की सड़कों पर घूम-घूम कर कविताएं सुना रहे थे-
‘‘एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या ?
बर्बरता के मांग चढे़गा योगी अब क्या ?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की।
जयप्रकाश पर चली लाठियां लोकतंत्र की !
देश में जब जनता दल की सरकार बनी तो बाबा की भी बांछें खिल गईं। उन्होंने उसी उत्साह में यह कविता लिखी-
‘‘शासन बदले, झंडा बदला तीस साल के बाद
नेहरू, शास्त्री और इंदिरा हमें रहेंगे याद
कोटि-कोटि मत पत्र बन गए जादूवाले वाण
मूर्छित भारत मां के तन में वापस आए प्राण
नसबंदी के जोर-जुलुम से मचा बहुत कुहराम
किया सभी ने शासन को अंतिम बार सलाम।’’
लेकिन सत्ता मिलने के बाद जिस तरह जेपी के चेलों का पतन देश ने देखा उससे जनता बुरी तरह मर्माहत हुई। जिस उम्मीद के साथ जनता दल की सरकार बनी वह उम्मीद कुछ ही समय में मटियामेट हो गई। सत्ता के लिए मंडल और कमंडल का जो खेल हुआ सो तो हुआ ही, ऐसे-ऐसे घोटाले भी सामने आये जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। सत्ता पर नए-नए काबिज इन समाजवादियों के पेट इतने बड़े हो गए कि उन्होंने पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा। परिवारवाद को गालियां देने वाले ये नेता खुद परिवारवाद के इतने कायल हो गए कि अपनी निरक्षर पत्नी तक को मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठाने में तनिक संकोच नहीं किया। बाबा ने जब यह सब देखा तो उन्होंने लिखा-
‘‘पूर्ण हुए तो सभी मनोरथ
बोलो जेपी, बोलो जेपी
सघे हुए चौकस कानों में
आज ढूंसली कैसे ठेपी
जोर जुल्म की मारी जनता
सुन लो कैसी चीख रही है
तुमको क्या अब सारी दुनिया
ठीक-ठाक ही दीख रही है।’’
यानी जो दल या व्यक्ति जनता से दूर होता गया बाबा भी उससे दूर होते गए। उनके लिए प्रथमतः और अन्ततः जनता ही थी। उन्हें जनता में विश्वास था। वे यह मानते थे कि जनशक्ति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। अभी हाल में मिश्र की घटनाओं को देखा होगा कि किस तरह वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को जनाक्रोश के कारण पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और उसके बेटे गमाल मुबारक ने आत्महत्या तक की कोशिश की। इसी तरह लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को भी जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। नागार्जुन की कविताएं प्रतिपक्ष की कविताएं हैं। ये कविताएं तानाशाही व्यवस्था के विरूद्ध बार-बार हस्तक्षेप करती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कहने को हम आजाद देश के नागरिक हैं और देश की सीमाओं में कहीं भी रहने को स्वतंत्रा हैं, लेकिन क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर महाराष्ट्र, असम और कश्मीर में जो रह-रह कर तांडव होता रहा है उसका कोई निदान आजतक नहीं निकल पाया। बाबा की कविताओं को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि उन्होंने एक खोजी पत्रकार की तरह खबरे खोज-खोजकर अपनी कविताओं में दर्ज की हैं।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि सूचना के लिए अखबार और दूसरे संचार माध्यमों पर निर्भर रहना सबसे बड़ा भ्रम है। श्री उदय सहाय ने अपने एक लेख में लिखा है कि अपराध की जितनी घटनाएं घटती हैं उनमें मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत घटनाओं को ही मीडिया उजागर कर पाता है। नागार्जुन की कविताओं में ऐसी खबरें भी दर्ज हैं जो मीडिया की नजरों से ओझल हैं या उन्हें ओझल कर दिया गया है। आजादी के बाद हमारे नेताओं ने देश में जिस चरित्र का निर्माण किया ये सारी विद्रूपताएं उसी की देन है। यह क्या कम चिन्ता का विषय है कि आज देश में एक भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ सके। हिन्दूवाद के झंडावरदार ठाकरे क्या कर रहे हैं। उनको सिर्फ महाराष्ट्र और वहां के लोग ही अपने लग रहे हैं। बाबा की नजर वहां भी है। वे लिखते हैं-
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की
गला रहा है दाल ठाकरे
या
कैसा शिव?
कैसी शिव सेना?
कैसे शिव के बैल
चौपाटी के सागर तटपर
नाच रहा है भस्मासुर बिगडै़ल।
यही हाल धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर का भी है। अब वह स्वर्ग न होकर स्वर्गवासियों की धरती बनकर रह गया है। वहां के आका ही जब विखंडनवादी बयान देते नहीं थकते तब दूसरों को क्या कहा जाए। इन लोगों पर केन्द्र का भी कोई अंकुश नहीं है। सबसे चिन्ताजनक स्थिति तो इस देश के बौद्धिक वर्ग की है। ये अपने बौद्धिकता के नशे में वही कर रहे हैं जो दुश्मन किया करते हैं। अरुंधति‍ राय का मामला आपके सामने है। अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद लोकतंत्र एक मजाक बन कर गया है। नेताओं ने लोकतंत्र को भी अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बाबा अपनी एक कविता में लिखते हैं-
‘‘तानाशाही तामझाम है/सोसलिज्म का नारा/पार्लमेंट पर चमक रहा है मारुति का ध्रुव तारा/तेरी पुलिस मिलिटरी/तेरी गोली गोले/ हिंसा की बहती गंगा में/ मां तू आंचल धो ले!
तरुणों की सौ-सौ कलेजियां/तुम पर करूं निछावर/ बना रहे दरबार रात-दिन/ मंत्र पढ़ूं मैं शाबर।’’
यहां यह ध्यान देने की बात है कि यह शाबर मंत्र क्या है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस मंत्र का उल्लेख किया है। बाबा ने इस मंत्र को नये संदर्भ में देखा है। इसी अर्थ में उनकी ‘मंत्र’ कविता भी है। शाबर मंत्र शिव का मंत्र है, जिसका कोई अर्थ नहीं होता। बिना अर्थ के ही जाप करते जाइए। वैसे तो निकालने को कोई कहीं से कुछ भी अर्थ निकाल सकता है। जिसे आप कविता भी नहीं मानते उसमें से भी बड़े-बड़े आलोचक ऐसे-ऐसे अर्थ निकाल लेते हैं कि आप चकित रह जाएंगे। आजकल जो कुछ भी हो रहा है वह सब शाबर मंत्र की तरह ही है। अधिकांश विश्वभर में पढ़ी जाने वाली हिन्दी की कविताएं भी शाबर मंत्र का ही सहोदर हैं। ऐसे में नागार्जुन की कविताएं शुद्ध देसी लगती हैं। सही अर्थ में नागार्जुन भारतीय कवि हैं, जिनकी कविताओं का सरोकार जनता से है। चूंकि जन शब्द जनतंत्र में ही अर्थवान होता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद जनता की समस्याओं पर सबसे अधिक लिखने वाले नागार्जुन हैं। इसीलिए सही अर्थों वे जनकवि हैं। जनतंत्र की दुर्दशा पर वे लिखते हैं-
‘‘सामंतों ने कर दिया प्रजातंत्र का होम
लाश बेचने लग गए खादी पहने डोम
खादी पहने डोम लग गए लाश बेचने
माइक गरजे, लगे जादुई ताश बेचने
इंद्रजाल की छतरी ओढ़ी श्रीमंतों ने
प्रजातंत्र का होम कर दिया सामंतों ने।’’ अतः कह सकते हैं कि नागार्जुन की कलम जनता के इशारे पर चलती है, न कि किसी राजनीतिक दल के इशारे पर। इस ईमानदार जनकवि को याद करने का अर्थ है उनके पूरे समय को याद करना।

बिटिया: नीरज पाल

युवा कवि‍  नीरज पाल की कवि‍ता-

एक गुड़ि‍या के कच्चे रुई के फाहे सी है बिटिया
कभी उछ्लकर कभी बिदककर आटे की चिड़ि‍या है बिटिया
नन्हे पावों की धीमी थाप है बिटिया
सर्दी में गर्म रोटी की भाप है बिटिया
बिटिया पावन गंगाजल है
बिटिया गरीब किसान का हल है
चूड़ि‍यों की खनक, पायलों की झंकार है बिटिया
झरने की मद्दम फुहार है बिटिया
कभी धूप कभी छांव कभी बरसात है बिटिया
गर्मी में पहली बारिश की सौगात है बिटिया
चिड़ि‍यों की चहचाहट कोयल की कूक है बिटिया
हो जिसमे सबका भला वो प्यारा सा झूठ है बिटिया
और किसी मुश्किल खेल में मिलने वाली जीत है बिटिया
दिल को छू जाए वो मधुर गीत है बिटिया
माँ की एक पुकार है बिटिया
मुस्काता एक त्योहार है बिटिया
सच बोलूं तो बिटिया पीड़ा की गहरी घाटी है
क्या किसी ने उसकी पीड़ा रत्ती भर भी बांटी है
अरमानों के काले जंगल उसको रोज जगाते हैं
हम, बिटिया कैसी हो, कह कर चुपचाप सो जाते हैं
हर दुःख को हंसते हंसते बिन बोले सह लेती है
पूरे घर में खुशी बिखेरे बिटिया दुःख में रह लेती है।

नि‍राला जयंती पर कवि‍तायें

हिंदी साहि‍त्य के प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला की जयंती वसंत पंचमी को मनायी जाती है। इस अवसर पर उन पर लि‍खी लेखक/कवि‍ शमशेर, राजेंद्र कुमार, भवानीप्रसाद मि‍श्र, नागार्जुन, शेखर जोशी और रामवि‍लास शर्मा की कवि‍ताएं-

निराला के प्रति : शमशेर

भूलकर जब राह- जब-जब राह भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम को आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वा स बन मेरे लिए-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि ! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते ‘शक्ति औ’ कवि के मिलन का हास मंगलमय,
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कठस्वर में तुम्हारे कवि,
एक ऋतुओं के विहँसते सूर्य !
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह !
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
सधना स्वर से
शांत-शीतलतम।
हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि:
जानता क्या मैं-
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(और विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !

दृष्टि-दान : राजेंद्र कुमार

जहां-जहां हम देख सके
आपनी आँखें
तुमको,
देखा, तुम हो
दिखलाते वहाँ-वहाँ, दुख की
दिपती आँखें,
ऐंठीले सुख की -
जिन्हें देख-छिपती आँखें;
यह दृष्टि तुम्हारी ही है दुख को मिली
दिख गई खुद की ताकत
उसे, अनेक मोर्चों पर-
हार-हार
जिन पर हम सबको
बार-बार डटना ही है
छंटना ही है, वह कोहरा-घना-
दृष्टि को छेंक रहा है जो
यों दृष्टि तुम्हारी मिली
हमारी मिली
वह दृष्टि तुम्हारी
मिली
दिख सकी हमें जुही की कली
‘विजन बन वल्लारी पर … सुहाग-भरी
स्नेह-स्पप्न-मग्न… अमल-
कोमल तनु तरुणी…’
नहीं तो रह जाती वह
किसी नायिका के जूडे़ में खुँसी,
किसी नायक के गले-पड़ी
माला में गुँथी…
कहाँ वह होती यों सप्राण
कि होती उसकी खुद भी
कोई अपनी प्रेम-कथा उन्मुक्त!
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
दिख सकी हमें- तोड़ती पत्थर
वह- ‘जो मार खा रोई नहीं’
रह जाती जो अनदिखी
अन्यथा
इलाहाबाद के पथ पर
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
राम पा गये जिं‍दगी में आने की राह
नहीं तो
भटक रहे होते पुराण के पन्नों पर प्रेतात्म…,
आ रमे हमारे बीच
ठीक हम जैसों
की फि‍क्रों में हुए शरीक
‘अन्याय जिधर हैं, उधर शक्ति’-
यह प्रश्न
विकटता में अपनी
पहले से भी कुछ और विकट है आज,
वह आवाज़-
‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ कहां
गुम हुई,
खोजते हमें निकलना है,
नहीं हम दृष्टि-हीन
फिर हमें प्रमाण पात्रता का देना होगा
फिर शक्ति करेगी हमें
और, हम ही होंगे-
हाँ,  हम ही-पुरुषोत्तम नवीन
(‘आदर्श’, कलकत्ता, 1965 में प्रकाशि‍त)

लफ्फा़ज़ मैं बनाम निराला : भवानी प्रसाद मिश्र

लाख शब्दों के बराबर है
एक तस्वीर !
मेरे मन में है एक ऐसी झांकी
जो मेरे शब्दों ने कभी नहीं आँकी
शायद इसीलिए
कि, हो नही पाता मेरे किए
लाख शब्दों का कुछ-
न उपन्यास
न महाकाव्य !
तो क्या कूँची उठा लूँ
रंग दूँ रंगों में निराला को ?
आदमियों में उस सबसे आला को?
किन्तु हाय,
उसे मैंने सिवा तस्वीरों के
देखा भी तो नहीं है ?
कैसे खीचूँ, कैसे बनाऊँ उसे
मेरे पास मौलिक कोई
रेखा भी तो नहीं है ?
उधार रेखाएँ कैसे लूँ
इसके-उसके मन की !
मेरे मन पर तो छाप
उसकी शब्दों वाली है
जो अतीव शक्तिशाली है-
‘राम की शक्ति पूजा’
‘सरोज-स्मृति’
यहाँ तक कि ‘जूही की कली’
अपने भीतर की हर गली
इन्हीं से देखी है प्रकाशित मैंने,
और जहाँ रवि न पहुँचे
उसे वहाँ पहुँचने वाला कवि माना है,
फिर भी कह सकता हूँ क्या
कि मैंने निराला को जाना है ?
सच कहो तो बिना जाने ही
किसी वजह से अभिभूत होकर
मैंने उसे
इतना बड़ा मान लिया है-
कि अपनी अक्ल की धरती पर
उस आसमान का
चंदोबा तान लिया है
और अब तारे गिन रहा हूँ
उस व्यक्ति से मिलने की प्रतीक्षा में
न लिखूंगा हरफ, न बनाऊंगा तस्वी्र !
क्यों कि‍ हरफ असम्भव है,  तस्वीर उधार
और मैं हूँ आदत से लाचार-
श्रम नहीं करूँगा
यहाँ तक
कि निराला को ठीक-ठीक जानने में
डरूँगा, बगलें झाँकूँगा,
कान में कहता हूँ तुमसे
मुझ से अब मत कहना
मैं क्या खाकर
उसकी तस्वीर आँकूँगा !

निराला के नाम पर : नागार्जुन

बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न  तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।
क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे श्रृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !
राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !
रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ,  मुख से न फूटा वचन ?
क्षेपकों की बाढ़ आयी, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, वेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

संगम स्मृति : शेखर जोशी

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती।
इन्दीवर की कथा रही:
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।
ओ महाप्राण !
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती !
किन्तु न रीती !

कवि : रामविलास शर्मा

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अब कहां यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाटवाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
घूसर संध्या में कवि उदास है बीतराग !
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण,- ज्योति का सहस्नार।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिये लेख,
गाते हैं वन के विहग ज्योति का गीत एक।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।
इन वन्य जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छंट गया तीक्ष्‍ण बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि घूसर प्रकाश।
उस वज्र हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिये विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।
कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक  कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।

छह दि‍संबर एक तलाश : वरवर राव

क्रांतिकारी कवि वरावर राव  की  यह कविता तेलुगु दैनिक आम्ध्राज्योती में 6 दिसम्बर को प्रकाशित हुई थी। इसका हिंदी अनुवाद आर. शांता सुंदरी ने कि‍या है-
न्‍यायधीश शर्मा जी मोहि‍त हो गए
उन टूटे-फूटे खंडहरों के वि‍ध्‍वंस में
सनातन की गंध महसूस हुई शायद
लेकि‍न
देर से बड़ी ख्‍वाहि‍शों के बाद जन्‍में उस बच्‍चे को
हद से ज्‍यादा लाड-प्‍यार दि‍या था शायद
कि‍ वह लाडला सयाना हुआ ही नहीं
वोट डालने की उम्र से पहले ही
चाव से मुनि‍यों के बुलाने पर चला गया जंगल
स्‍त्री समझकर भी हि‍चकि‍चाया नहीं मारने को
धनुष तोड़ने से लेकर बाण चलाने तक
न जाने कैसी-कैसी वि‍शि‍ष्‍ट वि‍द्याएं सीख ली उसने
दुश्‍मनों को ही नहीं
माता-पि‍ता को भी दु:ख देकर मारने वाला
संदेह को ही प्‍यार का प्रमाण मानकर
जीवन-साथी को जंगल के हवाले कर देने वाला
दंडकारण्‍य में और श्रीलंका में
उस जमाने में भी
आपरेशन ग्रीनहंट और आइपीकेएफ
चलानेवाला आदर्श नरेश
देश को खडाऊं का पालन और दासता प्रदान करनेवाला
पि‍रामि‍ड या फासि‍ल की तरह
दर्शन या प्रदर्शन के लि‍ए ही तो
नमन कि‍या जा सकता है
या उपेक्षा की जा सकती है
जाषुवा* ने कहा था—
सांपों को दूध पि‍लाकार
पत्‍थर के देवता को नैवेद्य समर्पित करनेवाले देश में
सांपों के दांत नि‍कल आते
देवताओं के हाथों के हथि‍यार जिंदा हो जाते
और
बाबरी, गुजरात, कन्‍दमाल
मृत्‍यु-क्षेत्र बनते जाते
स्‍वार्थ का वि‍कृत तीसरा पैर उग आया
ओर धरती के लि‍ए
महाबलि‍ को वि‍स्‍थापि‍त करनेवाले वामन को
’सेज’ जन्‍मभूमि‍ के वासि‍यों के लि‍ए
हल चलाने वालों को
अपनी जमीन से बेदखल करने वाले वामन के वारि‍सों को छोड़
हमारी पुण्‍यभूमि‍ में
क्‍या बुद्ध की तरह कोई सयाना ईश्‍वर
पैदा नहीं होगा?
* जाषुवा तेलुगु के बहुत बड़े कवि थे। लगभग सौ साल पहले ही उन्होंने दलितों के समर्थन में और उनके प्रति भेदभाव रखने के खिलाफ कविताएँ लिखीं। लेखन काल(1915-1965)। मानवतावादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हुए।

जवाहर गोयल की कुछ कवि‍ताएं

एक जमाने में नौकरी व कला साधना के बीच नौकरी को चुनने वाले जवाहर गोयल पि‍छले चालीस वर्षों से कला का अनवरत अभ्‍यास करते आ रहे हैं। इस दौरान चि‍त्र बनाना, गल्‍प और कवि‍ताएं लि‍खना उनकी फि‍तरत में शामि‍ल रहा। 36 साल सरकारी नौकरी करने के बाद वह सेवानि‍वृत्‍त हो गए हैं। करीब डेढ़ साल से प्‍लाज्‍मा सेल ल्‍यूकीमि‍या से पीडि‍त हैं। दो बार स्‍टेम सेल टांसप्‍लांट हो चुका है। इस इलाज के दौरान मुंबई/कोलकाता में अपना समय बीताते हुए उन्‍होंने ये कवि‍ताएं लि‍खी हैं। वह मानते हैं कि‍ कवि‍ताएं लि‍खकर और चि‍त्र बनाकर अपनी मानसि‍कता को स्‍वस्‍थ रख पाए-

आओ, जल में जल की छाया देखो

आओ, जल में जल की छाया देखो

बि‍न काया यह माया देखो

सुनो ताप के तले सतह को

देखो धरती के खुले वक्ष को

फैले अक्ष का अट्टहास सुनो

नि‍र्जन पेड़ों में चट्टानों को गि‍नो

जल में अपनी छाया नि‍रखो

लहराते पत्‍थर हि‍लती काया को छू लो

सुन्‍न दोपहरी पेड़ों की माया देखो

आओ, जल में जल की छाया देखो।

यह मेरा शरीर है

यह मेरा शरीर है

गेहूं के दाने की तरह

छि‍लका उजला दाना भारी

जल में डूबा करता अंकुरण की तैयारी

अंकुरि‍त हो हरा जवारा हो जाता है

दाना हो या शरीर, खाली हो जाता है

जवारे में रस है, जीवन का संचरण है

शरीर बस नि‍मि‍त्‍त है गेहूं के दाने की तरह

परि‍धि‍यां

शून्‍य:

शून्‍य वि‍स्‍तृत अपरि‍मि‍त।

ध्‍वनि‍:

ध्‍वनि‍ शून्‍य की धरा।

शब्‍द:

शब्‍द शून्‍य की धरा का वि‍स्‍तार।

शब्‍द धरा का अंकुरण।

शब्‍द धरा का वि‍स्‍तारता संसार।

अर्थ:

आनन्‍द की लयकार।

वास्‍तवि‍क संसार।

लय का ताल।

भ्रम:

शब्‍द में अर्थ होता है एकाकार।

जि‍जि‍वि‍षा

एक आग्रह कुछ करते जाने का

कराता जाता है ढेर सारे काम

ये काम तब नि‍यम बनकर बांध लेते

नि‍यमबद्ध हम करते जाते तमाम काम।

एक आग्रह कुछ समझ पाने का

कराता है काम हरदम सोचते रहने का

सोचा हुआ जब समझ में आता है

इस बात का सुख दे जाता है कि‍ वह पूरा हुआ।

इनका न कोई आदि‍ है न अन्‍त

तब भी एक भ्रम बना रहता

इनका स्‍वयं में असल कुछ होने का।

एक चि‍त्र में भूलवश खोजते हैं हम

आकारों के अर्थ, लकीरों के तर्क

उसके आकाश की शुरुआतें

धब्‍बों में घटनाओं की वजहें

और सैरे (लैंड स्‍केप) में ब्‍योरावार जगहें।

क्‍यों नहीं आग्रहवि‍हीन हो पाते हैं

मुक्‍त बहते स्‍याह या आकार वह

जो आकस्‍मि‍क हुआ उतना ही

जि‍तना वह उभरकर हुआ

पूर्ण कोरी कल्‍पना का खरा

जिसका न अर्थ न आदि‍ न अन्‍त।

कुछ खोना भी कुछ पाना है

बीमारी का अतीत हो न हो

आने वाला कल सदा होता है।

बीता समय याद हो न हो

आने वाला समय बरबस

आज पर हावी रहता है।

समय का मौन साहस सा लगता है

जि‍समें मृत्‍यु भी खो जाती है।

पहाड़ों पर लगातार बारि‍श धुंध हो जाती है

कवि‍ता की तरह पास आती है

गोद में सि‍र रख बेटी की तरह सो जाती है।

जब जीत-हार का झूठापन ढह जाता है

कुछ खोना भी कुछ पाना बन जाता है

अनुभव का ताप चके पर सान चढ़ा जाता है।

धूप भरी बारि‍श में भीगते हम

आने वाले दुखों को अनुमान

दु:ख नहीं नि‍राशा देता है।

अक्‍सर वे दु:ख जो आशंकि‍त होते हैं

आते कभी नहीं हैं, पर

उनका बोझा बढ़ता ही जाता है।

पुराने कर्ज की तरह यह

कभी भी चुकता नहीं है।

देर से जब यह समझ में आता है

दु:ख ही देता है देर हो जाने का।

धूप भरी बारि‍श में भीगते हम

तब सि‍र्फ चकि‍त रह जाते हैं।

अस्‍ति‍त्‍व

वि‍चार और वास्‍तवि‍कता के मध्‍य

हमारा शरीर होता है।

भय और साहस के मध्‍य

हमारी समझ होती है।

अनुभूति‍ और अनुभव के मध्‍य

हमारी संवेदना होती है।

संवेदना और सरोकार के मध्‍य

हमारे प्रयास होते हैं।

प्रयास और साकारता के मध्‍य

हमारा नि‍श्‍चय होता है।

अव्‍यक्‍त ओर व्‍यक्‍त के मध्‍य

हमारा नि‍मि‍त्‍त होता है।

होने और न होने के मध्‍य

हमारा शून्‍य होता है।

छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं

छायाएं हमें अपनी ओर खींचती हैं

तमतमाती धूप की तरह दूर नहीं करतीं

छायाएं बढ़ कर आपस में घुलमि‍ल जाती हैं

संध्‍या में गांवों को, पेड़ों को, पहाड़ को

खींचकर दूर टि‍मटि‍माती लौ तक ले जाती हैं

ध्‍वनि‍यों की तरह स्‍वयं पास आकर छूती हैं

छायाएं सूर्य की तरह अस्‍थि‍यों में जाकर

हमें स्‍नान नहीं करा सकतीं, पर

गोल गुम्‍बद के व्‍योम की तरह

आत्‍मा को इस तरह समो लेती हैं कि‍

वह भी छाया की तरह सब में घुलमि‍ल जाती हैं।

हम जानते नहीं हैं, क्‍योंकि‍ जानना चाहते नहीं हैं

क्‍या तुम सच्‍चे और झूठे देवता में फर्क कर पाते हो ?

क्‍या तुम घृणा के स्रोतों को जान पाते हो ?

क्‍या तुम घृणा को मानवीयता के दायरे में पाते हो ?

जो हम समझ नहीं पाते, उन्‍हें भी जान सकते हैं।

वि‍डंबना है समझ पाना भी एक अर्थ में उसको संगत बनाता है।

घाव को याद रखना भी हमें पीड़ा से बचा सकता है।

पीड़ा से गुजरते, सहने या न सहने की बनि‍स्‍पत

पीड़ा को देख पाना, उससे उबार लेता है।

देख पाना भी क्रमश: साहस बनता जाता है।

घृणा की शर्म में जीते हुए

असकी माया से मोहि‍त हों या अचंभि‍त

भागीदार दोनों हैं।

जो जानते हैं कहते नहीं हैं।

जो अनजान हैं पूछने से कतरा जाते हैं।

पूछ हुए का कोई उत्‍तर नहीं पाते हैं।

आंख-कान-मुंह बंद कर जीना

नहीं जानने के भ्रम का बचाए रखता है

हम उसे झूठ में शामि‍ल नहीं, इस झूठ को भरमाए रखता है

हम जानते नहीं हैं, क्‍योंकि‍ जानना चाहते नहीं हैं।

कुछ कि‍ए बि‍ना

पहाड़ों का नि‍र्भीक मौन

सूर्य की हथेलि‍यों से स्‍नान करता है

उज्‍जवल हरा पेड़ों को संवारता है

वि‍स्‍तीर्ण आयाम गाय की आंखों सा ताकता है

टूटी टांग लि‍ए कौआ फुदककर आगे बढ़ता है

गर्दन मोड़ता है, चोंच खोलता है,

हमें मि‍त्र भाव से देखता है।

कुछ कि‍ए बि‍ना लगातार इतना कुछ होता है

जो नि‍र्भय करता है

मन को भरता है।

भय की पीठ का नाम है साहस

भय की पीठ का नाम है साहस

जो भय को समझने से आप दि‍खता है

भय की तरह सदैव रहता है हमारे साथ।

भय ढोल बजाते आता है

नाचता है गाता है सि‍र पर चढ़ जाता है।

साहस धीरे से चुपचाप आता है।

कुछ भी नहीं कहता है

हमारे पीछे चलता रहता है।

उसकी पदचाप सुनकर ही

हम साथ हैं यह जान पाते हैं।

उसे जानने को न कुछ पूछना होता है

न मुड़कर पीछे देखना होता है

केवल सि‍र उठाकर दूर तक सामने देखते

चलना होता है एक एक कदम

हर बार, हर दम, जब तक न पहुंचे हम।

यह भी जानना अनि‍वार्य होता है

हर एक की तरह हैं हम उनके संग।

समर्थ असमर्थ, अच्‍छे बुरे, समान असमान

साहस सभी में होता है।

जो डरते हैं उनमें भी वह होता है।

बस, उन्‍हें भय की आंखों में देखने में संकोच होता है।

पि‍ता की जि‍म्‍मेदारि‍यां

पि‍ता की अनेक जि‍म्‍मेदारि‍यां में

कुछ आम हैं, कुछ अनि‍वार्य

कुछ को चुनने का है आप पर दारोमदार।

आम है कि‍, उन्‍हें हम सैर पर ले जाएं।

कब क्‍या सपने देखे हमने, उन्‍हें बताएं।

जहां पीछे मुड़कर देखना छोड़ दें वे

वहां तक उनके साथ जाएं।

अनि‍वार्य है, दुनि‍या सबकी है बताएं।

खुदा तर्क से मि‍लता नहीं, जताएं।

चाबि‍यों में तालों का ब्‍योरा छोड़ जाएं।

तब भी कुछ चुनने को छूट जाएगा

जि‍सके लि‍ए थोड़ा वक्‍त बचाएं-

सारी उमर कि‍तना बचपन बजाए रखना है, दि‍खा जाएं।

असल सदा सपनों से छोटा ही रहता है

तब भी इंसान तो सपनों से ही बनता हैं, बता जाएं।

अनगि‍न बूंदों से बनी है आत्‍मा अपनी

हर आत्‍मा में हम भी एक बूंद हैं

इस राग को गूंजते हुए गाएं

गाते-गाते उन्‍हें भी यह जता जाएं।

ठि‍ठके बि‍ना, बस हम जागे हुए रहते हैं

हम स्‍पर्श करते हैं और छुअन नहीं पाते हैं।

चबाते जाते हैं और स्‍वाद को नहीं जानते हैं।

श्‍वास को भीतर तक खींचकर छोड़ देते हैं अनजाने।

देखते हैं साफ-साफ बि‍ना कुछ पहचाने।

ढंकी बर्फ के नीचे जमीन खुरदुरी है, मालूम है।

कहीं भी कुछ छूटा हुआ नहीं है, पर वह अपना नहीं है।

सबके लि‍ए बने रहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते।

समय को छाया में धूप सा सरकते देखते हैं।

अंधेरे को भी दि‍न सा समीप पाते हैं।

कुछ भी चौंकाता क्‍यों नहीं है, जान नहीं पाते।

बैठे रह गए, उठकर न चलने का अफसोस करते हैं।

ठि‍ठके बि‍ना, बस हम जागे हुए रहते हैं।

पि‍ता का स्‍मृति‍ दि‍वस : राधेश्‍याम ति‍वारी

चर्चित कवि‍ राधेश्‍याम ति‍वारी की कवि‍ता-

इधर-उधर हेरतीं

उसकी चंचल आंखें

न जाने कब आकर टि‍क गईं

इस उजबक पर

और फि‍र मुझे ही देखती रहीं

टुकर-टुकर।

जैसे ही उस पर

मेरी नजर पड़ी

अपनी दुधि‍या मुस्‍कान से

उसने कर लि‍या मुझे सम्‍मोहि‍त।

मैंने उसे देखकर

चुटकि‍यां बजाईं

तो खि‍लखि‍ला उठा

मां की गोद में बैठा

वह बालक।

अब आप ही बताएं

कि‍ ट्रेन के सफर में

बि‍ल्‍कुल आपकी सीट के बगल में

मि‍ल जाए ऐसा कोई दोस्‍त

तो यात्रा क्‍यों न हो खुशगवार

हम दोनों की नई-नकोर दोस्‍ती को

ताड़ गई उसकी सांवली आदि‍वासी मां

उसने मुस्‍कराते हुए देखा मेरी ओर

फि‍र उसकी आंखें जाकर ठहर गईं

अपनी गोद के भवि‍ष्‍य पर

कि‍तने साल को है यह मुन्‍ना

मैंने पूछ लि‍या

’’बाबूजी, आज पूरे छह माह को हो गया

’’ठीक आज के ही दि‍न छह माह पूर्व

हुआ था मेरे पि‍ता का नि‍धन।’’

मेरे मुंह से अनायास ही ये शब्‍द नि‍कल गए

वह उदास हो गई

’’तो का आपके भी बापू नहीं हैं

इसके भी बापू मार दि‍ए गए

इसके जनम से कुछ ही दि‍नों बाद

पुलि‍स की गोली से।’’

उसके बाद हम दोनों

शांत रहे कुछ देर

आजू-बाजू बैठे यात्री

रह-रहकर देखते रहे हम दोनों को

उस उदासी में भी

बच्‍चा हंसता रहा

मैंने उसके पांव सहलाए

तो वह फि‍र खि‍लखि‍ला उठा

फि‍र हम दोनों

शामि‍ल हो गए

उसकी खुशी में

थोड़ी देर बाद वह महि‍ला बोली-

‘’बाबूजी, मेरा टेशन आ गया।’’

और कंधे पर

अपना भवि‍ष्‍य उठाए

उतर गई बस्‍तर के

कि‍सी छोटे से स्‍टेशन पर

शाम गहरी थी

दूर टि‍मटि‍माती रोशनी की तरह

वह धीरे-धीरे

ओझल होती जा रही थी

मैं देखता रहा खि‍ड़की से

उस भवि‍ष्‍य को

जो था मां के कंधे पर सवार।

उस घटना के

पूरे बीस बरस बाद

आज फि‍र पि‍ता का स्‍मृति‍ दि‍वस है

और उस बच्‍चे का जन्‍म दि‍न

पता नहीं वह बच्‍चा कहां होगा

बस्‍तर के कि‍सी जंगल में

अपने अधि‍कारों के लि‍ए

संघर्ष कर रहा होगा

या फि‍र नौकरी की मजबूरी में

कर रहा होगा ‘ग्रीन हंट’

आज मैं अपने पि‍ता को याद करते हुए

उस बच्‍चे की लम्‍बी उम्र की

कामना कर रहा हूं।