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साहित्य में पुलिस जैसी भूमिका है आलोचक की : भीमसेन त्‍यागी

सातवें दशक के चर्चित कथाकार भीमसेन त्‍यागी का जन्‍म 19 सि‍तंबर, 1935 को जरवल (बहराइच) में हुआ। उनका बचपन पश्‍चि‍म उत्‍तर प्रदेश के बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में बीता और वहीं प्रारंभि‍क शि‍क्षा हुई। वि‍द्यार्थी जीवन में नि‍र्माण साप्‍ताहि‍क पत्र नि‍काला। तब से ही राष्‍टी्य स्‍तर की प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में रचनाएं प्रकाशि‍त होने लगीं। ’नया जीवन’, ‘सरि‍ता’, ‘मुक्‍ता’ आदि‍ पत्रि‍काओं के संपादकीय वि‍भाग में कार्य कि‍या। ‘नीहारि‍का’ कथा मासि‍क और हिंद पाकेट बुक्‍स के संपादक रहे। ‘जी टेलि‍फि‍ल्‍मस’ में कार्यक्रम परामर्शदाता के पद पर भी कार्य कि‍या। जमीन, नंगा शहर, वर्जित फल, काला गुलाब (उपन्‍यास), जबान, दीवारें ही दीवारें, कमजोर प्‍यार की कहानि‍यां (कहानी संग्रह) और आदमी से आदमी तक (शब्‍द चि‍त्र) उनकी प्रमुख कि‍ताबें हैं। इनके अलावा त्रैमासि‍क पत्रि‍का भारतीय लेखक का संपादन व प्रकाशन। अजीव संयोग है कि‍ उनका देहांत 19 सि‍तंबर (वर्ष 2006) को जन्‍मदि‍न वाले दि‍न हुआ। उनसे यह बातचीत 3 जनवरी, 2002 को की गई थी-

लेखन की तरफ आपका रुझान कब और कैसे हुआ?

लेखन की तरफ आने का निर्णय मेरा चुनाव नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य था। बचपन गांव और कस्बे के मिले-जुले परिवेश में बीता। वहां खुला जीवन था। उससे भी खुली थी प्रकृति। याद आता है कि पहली रचना सरसों के खेत की मेढ़ पर बैठकर सरसों के ही बारे में लिखी थी। उस कविता का अब एक शब्द भी याद नहीं है, लेकिन उसके साथ जो सृजन का थ्रिल था, वह आज भी जस-का-तस मौजूद है। इसके अतिरिक्त कस्बे के जीवन में एक-दो किस्सागो थे, जो राजा-रानी, परियों की कथाओं का वाचन करते थे। बीस-तीस श्रोता देर रात तक एकाग्र होकर सुनते थे। उन श्रोताओं में आठ-दस साल की उम्र का सबसे छोटा श्रोता मैं होता था। उन कहानियों में ऐसी पकड़ बल्कि जकड़ थी जो श्रोताओं को बांधे रखती थी। बाद में आधुनिक कहानियों से परिचय हुआ तो वे भिन्न स्वाद की अच्छी रचनाएं लगीं, लेकिन मन उन्हें कहानी स्वीकार करने को तैयार नही था, क्योंकि कहानी का जो स्वरूप व संवेदना उन किस्सों के माध्यम से मन में अंकित हो गई थी, आधुनिक कहानी उनसे एकदम भिन्न थी।

धीरे-धीरे साहित्य के प्रति रुचि बढ़ती गई और एक दिन पाया कि मैं पठन-पाठन और लेखन के अतिरिक्त और कुछ भी करने के  योग्य नही हूं। मजबूरी में लेखन से जुड़ी पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में स्वीकार किया। वह भी बहुत दिन नहीं चल पाया।

कथ्य और शिल्प में महत्वपूर्ण कौन है?

कथ्य और शिल्प को अलग-अलग करके नहीं आंका जा सकता। हर रचना अपने शिल्प का स्वयं निर्माण करती है। यदि कथ्य के अनुरूप शिल्प नहीं उगता, वह रचना के साथ एकमेएक होकर नहीं आता, तो संपूर्ण रचना नहीं बन पाती। रचना में कथ्य महत्वपूर्ण है तो शिल्प स्वत: महत्वपूर्ण होगा और यदि कथ्य ही महत्वपूर्ण नहीं है तो शिल्प का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

विभिन्न गुटों व आंदोलनों का साहित्य में क्या योगदान रहा है?

दूसरे आंदोलनों की तरह साहित्य में भी आंदोलनों की भूमिका नकारात्मक और सकारात्मक दोनों रही है। आंदोलनों ने वैचारिक धरातल पर समसामयिक सोच को प्रभावित किया और साहित्य में एक सार्थक भूमिका निभाई है। इसके विपरीत आंदोलन व्यक्तिगत गुटबाजी, स्वीकृति की प्यास और दूसरों को टंगड़ी मारकर आगे निकल जाने की अंधी दौड़ का कारण भी बने।

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और प्रसाद के विवाद से शुरू होकर छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और आज के अनेक वाद-विवादों में आंदोलनों की नकारात्मक भूमिका देखी जा सकती है।

प्रगतिवाद ने जहां एक तरफ यथार्थवाद और जनोन्मुख सोच को अभिव्यक्ति दी, वहीं साहित्य में कट्टरता और नारेबाजी को स्थापित किया। इसमें साहित्य और समाज का हित होने के साथ-साथ अहित भी कम नहीं हुआ।

उसके बाद के आंदोलनों में भी यह प्रक्रिया दोहराई जाती रही। असल में साहित्यकार को समाज तथा राजनीति के प्रति सचेत और सजग जरूर होना चाहिए, लेकिन किसी वाद से बंधकर रहना उसकी प्रगति में साधक नहीं, बाधक ही सिद्घ होगा।

साहित्यिक आंदोलनों के पीछे राजनीतिक दलों का दबाव रहा है। राजनीतिक दल जिस तरह श्रमिकों, महिलाओं, युवकों के मोर्चे खोलते हैं, उसी तरह साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी दखल रखना चाहते हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों के साहित्यिक संगठन हैं। वे उनके माध्यम से अपनी राजनीति का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन साहित्यकार राजनीतिक दलों के आपसी वैमनस्य और खींचतान से ऊपर होता है। वह उनसे मार्गदर्शन लेने की बजाए उनकी आलोचना करता है।

चीनी क्रांति के दौरान क्वाओ-मो-जो बहुत महत्वपूर्ण चीनी लेखक थे। वह राजनीति में भी सक्रिय थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माउत्से तुंग ने उनसे पार्टी का वायस-चेयरमैन बनने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि मैं लेखक पहले हूं, पार्टी का कार्यकर्ता बाद में। पार्टी का पद ग्रहण करने का मतलब पार्टी के अनुशासन में रहना और पार्टी के निर्णयों को जस-का-तस स्वीकार करना है। मैं एक लेखक की हैसियत से आलोचना के अपने अधिकार को नहीं खोना चाहता। वह आजीवन पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे, लेकिन कभी भी पार्टी का पद ग्रहण नहीं किया।

हिंदी साहित्य में ग्रामकथा और नगरकथा का विवाद पुराना है। आप इनमें से किसे महत्वपूर्ण समझते हैं?

महत्वपूर्ण विवाद नहीं, लेखन होता है। नगरकथा के लेखकों में भी कुछ का लेखन महत्वपूर्ण है। हिंदी साहित्य की ट्रेजडी यह है कि इसके अधिकांश लेखक शहरी मध्यमवर्ग से आते हैं। जबकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांव में है। यही आबादी असली भारत है।

प्रेमचंद हिंदी के पहले महत्वपूर्ण ग्राम-कथाकार हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन की दरिद्रता, सरलता और साथ ही कांइयापन सहज और सरल रूप में प्रकट हुआ है। प्रेमचंद के पास शिल्प का चमत्कार नहीं, लेकिन उनकी सरलता में ही शिल्प का सर्वोत्तम रूप मिलता है। उनके यहां शिल्प आरोपित नहीं, बल्कि सहज प्रस्फुटित है।

प्रेमचंद के देहावसान के पश्‍चात कथा के रथ की बागडोर जिनके हाथों में आई, वे गांव के नहीं, शहरी मध्यमवर्ग के लेखक थे। जैनेंद्र, अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी जैसे व्यक्तिवादी लेखकों के सामने प्रेमचंद एक पहाड़ की तरह खड़े थे। उसे लांघे बिना वे अपना मार्ग नहीं बना सकते थे। प्रेमचंद को लांघना कठिन था। इसलिए उपरोक्त लेखकों ने उस पहाड़ को छोटा बनाने की प्र्रक्रिया शुरू कर दी। प्रेमचंद पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए। वह कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा-से-ज्यादा उन्हें समाज सुधारक कहा जा सकता है लेखक तो कतई नहीं।

प्रेमचंद-निंदा की यह प्रक्रिया कई वर्ष चलती रही और पाठकों में प्रेमचंद का प्रभाव गिरता-बढ़ता रहा। प्रेमचंद के निधन के करीब 18 वर्ष बाद ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन हिंदी साहित्य की एक विस्फोटक घटना थी। फणीश्‍वरनाथ रेणु के माध्यम से कथा-प्रवाह एक बार फिर असली भारत की ओर मुड़ा। रेणु के साथ प्रेमचंद पर नए सिरे से गंभीर चर्चा शुरू हुई और उनका महत्व निरंतर बढ़ता गया।

साहित्य जगत में अश्‍लीलता को लेकर कई बार विवाद उठे हैं। श्‍लील और अश्‍लील के बारे में आपका क्या मत हैं?

अश्‍लीलता का प्रश्‍न उतना ही पुराना है, जितना स्वयं साहित्य। वास्तव में अश्‍लीलता साहित्य में नहीं बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में हो सकती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्‍लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करनेवाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का ‘यामा-द-पिट’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष संबधों का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में है वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवेदना ‘यामा-द-पिट’ में है, वह उसे विश्‍व के श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।

गोर्की की कहानी ‘एक इंसान का जन्म’ में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए भी कहीं अश्‍लीलता अनुभव नहीं करता।

जगदम्बाप्रसाद दीक्षित की कहानी ‘जिंदगी और गदंगी’ में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्‍लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदु नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता ही है।

साहित्यिक पुरस्कार देने में राजनीति होती है। इससे आप कहां तक सहमत हैं?

पुरस्कारों में राजनीति का दखल होता है, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। नोबेल पुरस्कार से लेकर ज्ञानपीठ और दूसरे देसी पुरस्कारों तक में बार-बार सामने आया है कि उनके पीछे एक निश्‍चि‍त विचारधारा को पुरस्कृत करना और निहित स्वार्थों की पूर्ति करना होता है।

सर्वाधिक कु चर्चित नोबेल के बारे में मान्य सत्य है कि वामपंथी विचारधारा के महानतम लेखकों को यह पुरस्कार नहीं मिला। इन लेखकों में गोर्की, चेखव, दोस्तोवस्की जैसे लेखक भी हैं जो अनेक नोबेल पुरस्कार विजेताओं और स्वयं नोबेल पुरस्कारों से भी भारी पड़ते हैं।

रूसी लेखकों में तोल्सतोय जैसे महान लेखक की भी उपेक्षा की गई। इसके विपरीत कई दहाई ऐसे लेखकों को पुरस्कार दिए गए जिनका आज कोई नाम भी नहीं लेता।

भारतीय परिपे्रक्ष्य में केवल रवीन्द्रनाथ टैगोर को और अब अर्धभारतीय नायपाल को इस पुरस्कार से नवाजा गया, जबकि इसी दौर के शरत, प्रेमचंद, मंटो और तकषि शिवशंकर पिल्लै जैसे महान भारतीय लेखकों, जिनका योगदान रवीन्द्रनाथ टैगोर से अधिक ही है, को यह पुरस्कार नहीं मिला। कारण- रवीन्द्रनाथ का विराट जनसंपर्क और उनकी ऋषितुल्य वेशभूषा का प्रदर्शन था।

नोबेल के अतिरिक्त भारतीय पुरस्कारों में भी यही रणनीति और कूटनीति काम करती रही है। अशोक वाजपेयी और सामान्य कोटि के कवियों को बड़े-से-बड़े पुरस्कार मिलते हैं और उनके समकालीन निश्‍चि‍त रूप से अधिक महत्वपूर्ण रचनाकार उपेक्षित रह जाते हैं।

असल में जो रचनाकार सही मायनों में रचनाकार हैं, उन्हें पुरस्कारों की अपेक्षा नहीं, उपेक्षा करनी चाहिए। वास्तविक पुरस्कारदाता पाठक होता है। पाठक जिसे स्वीकार कर ले, वही सच्चा लेखक है और पाठक का प्यार ही सच्चा पुरस्कार है।

हिंदी साहित्य के पांच महान साहित्यकार?

पांच नाम लेना कठिन है। फिर भी हिंदी के महान साहित्यकारों में प्रेमचंद, यशपाल, निराला, रेणु, नागार्जुन, मुक्तिबोध हैं।

किन लेखकों ने आपको प्रभावित किया?

उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त तोल्सतोय, चेखव, गोर्की, मोपासां, लू-शुन, कामू, हेमिंग्वे, कालिन विल्सन आदि ने किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया।

साहित्य में आलोचक की क्या भूमिका है?

साहित्य में आलोचक की वही भूमिका है, जो समाज में पुलिस की।

अश्‍लील: हरिशंकर परसाई

चैनलों पर अश्‍लील और फूहड़ कार्यक्रमों का प्रसारण धड़ल्‍ले से हो रहा है। कॉमेडी के नाम पर द्व‍िअर्थी डॉयलॉग बोलकर जबरदस्‍ती दांत दिखाए जा रहे हैं। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि समाचारों में भी इन कार्यक्रमों की बेहूदगियों सुर्खियां बनाई जा रही हैं। हालांकि सड़क से लेकर संसद हर कोई इनका विरोध कर रहा है, लेकिन फिर भी इनका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। नया कार्यक्रम शुरू होता है तो वह पहले से ज्‍यादा फूड़ह भी होता है और हिट भी। ऐसा क्‍यों हो रहा है। इसका जवाब देता वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई का व्‍यंग्‍य-

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहां भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएंगे।

उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा- आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएंगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पडे़गा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख्‍ लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा- किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूं। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।

किताब कोई लाया नहीं था।

एक ने कहा- कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।

दूसरे ने कहा- अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।

उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।

तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा- अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।

दसरे ने कहा- अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊंगा।

तीसरे ने कहा- भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूंगी।

चौथे ने कहा- अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।

अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।

(विकलांग श्रद्घा का दौर से साभार)