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विज्ञान परिषद, प्रयाग के सौ साल : अनुराग

vijnana parishad prayag

समाज को चेतना संपन्‍न और प्रगतिशील बनाने के लिए जन-जन तक विज्ञान का ज्ञान पहुंचना जरूरी है। यह महत्‍ती कार्य करते हुए ‘विज्ञान परिषद प्रयाग’ को सौ साल हो गए हैं। हिंदी में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित यह देश की ऐसी एकमात्र संस्था है जो विगत सौ वर्षों से निरंतर यह कार्य कर रही है।

‘विज्ञान परिषद प्रयाग’ की नींव 10 मार्च 1931 को म्‍योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद में रखी गई। उद्देश्य था- हिंदी में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के प्रचार-प्रसार और लो‍कप्रियकरण को प्रोत्‍साहन देना। इसके संस्‍थापक चार सदस्‍यों में डॉक्‍टर गंगानाथ झा(संस्‍कृत), प्रोफेसर हमीदुद्दीन साहेब(अरबी-फारसी), रामदास गौड़ (रसायन विज्ञान) और पंडित सालिगराम भार्गव(भौतिकी) अपने-अपने विषयों के विद्वान थे।

परिषद के पहले सभापति सर सुंदरलाल थे। बाद में डॉक्‍टर एनी बेसेंट, सी.वाई; चिंतामणि, डॉक्‍टर गंगानाथ झा, डॉक्‍टर रामचरण मेहरोत्रा, डॉक्‍टर यशपाल, डॉक्‍टर डी.डी. पंत, प्रोफेसर एम.जी.के. मेनन जैसे विख्‍यात वैज्ञानिक इस परिषद के सभापति रहे। पंडित मदन मोहन मालवीय 12 वर्षों तक परिषद के उपसभापति रहे।

भारत में पुनर्जागरण के साथ-साथ यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस की जाने लगी थी कि विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर भारतीय भाषाओं में भी पुस्तकें उपलब्ध हों। इसके लिए कुछ संस्‍थाओं द्वारा और व्‍यक्तिगत स्‍तर पर थोड़े-बहुत प्रयास भी किए गए। लेकिन, बड़े स्‍तर पर यह कार्य विज्ञान परिषद की स्‍थापना के बाद हुआ।

उस दौरान विज्ञान पत्रिकाएं प्रकाशित नहीं हुआ करती थीं, लेकिन साहित्यिक पत्रिकाओं में विज्ञान से संबंधित विषयों के लेख खूब प्रकाशित होते थे। ‘सरस्‍वती’ के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्‍याम सुंदर दास और गुलाबराय ने साहित्‍य सृजन के साथ-साथ विज्ञान लेखन भी किया। इनके अलावा और उस काल के कई  अन्य लेखकों ने भी वि‍ज्ञान वि‍षयों पर लि‍खा।

विज्ञान परिषद ने विज्ञान साहित्‍य के सृजन को प्रोत्‍साहित करने के लिए अप्रैल 1915 में ‘विज्ञान’ नामक मासिक का पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके पहले संपादक श्रीधर पाठक बने। रामदास गौड़ ने भी कई वर्षों तक इसका संपादन कि‍या। डॉ. गोरखप्रसाद, डॉ. सत्‍यप्रकाश, डॉ. रामचरण मेहरोत्रा, डॉ. हीरालाल नि‍गम, डॉ. देवेंद्र शर्मा जैसे प्रख्‍यात वैज्ञानि‍क इस पत्रि‍का के संपादक रह चुके हैं। यह हिंदी की सबसे पुरानी विज्ञान पत्रिका है और अपने शुरू होने के बाद से निरंतर और बिना किसी रुकावट के प्रकाशित हो रही है। आगामी 14 अप्रैल को इसके प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे।

विज्ञान परिषद ने जब काम शुरू किया था, उस समय शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत कम था। हिंदी में विज्ञान लेखन करने वालों की संख्‍या नगण्‍य थी। इसलिए लोगों को हिंदी में लिखने के लिए बहुत प्रेरित करना पड़ता था। यह बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य था। परिषद ने इस चुनौती को स्‍वीकार किया। ‘विज्ञान’ के तत्‍कालीन संपादक डॉ. सत्‍यप्रकाश ने विभिन्‍न विषयों के लिए संपादक मंडल बनाया। इसमें गोरखप्रसाद (गणित), रामशरण दास (जीवविज्ञान), स्‍वामी हरिशरणानंद (आयुर्विज्ञान) शामिल थे।

हालांकि, उस समय अंग्रेजी और अंग्रेजियत का बोलबाला था। फिर भी, तत्‍कालीन संपादकों और परिषद से जुड़े लोगों ने कई लेखकों को विज्ञान लेखन से जोड़ा और कई पुस्‍तकें हिंदी में लिखवाईं। इनमें सौर परिवार, फोटोग्राफी सिद्धांत और प्रयोग, उपयोगी नुस्‍खे एवं तरकीबें, स्‍वास्‍थ्‍य एवं रोग, हमारी शारीरिक रचना जैसे विषयों को शामिल किया गया। परिषद ने भारतीय वैज्ञानिकों के जीवन एवं कृतित्‍व पर भी कई पुस्‍तकें प्रकाशित कीं जिससे देशवासियों को भारतीय वैज्ञानिकों के कार्यों की जानकारी मिल सके।

विज्ञान के प्रसार में हीरालाल खन्‍ना, रामदास गौड़, गोरखप्रसाद, सत्‍यप्रकाश, फूलदेव सहाय वर्मा, महावीर प्रसाद श्रीवास्‍तव, श्रीरंजन आदि ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्‍होंने अपने व्‍याख्‍यानों के जरिये, आम लोगों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करने का प्रयास किया। देश में आजादी से पहले ही 12वीं तक की विज्ञान की पढ़ाई हिंदी में करने की स्‍वीकृति मिल गई थी। इस तरह इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई हिंदी में होने लगी थी। इसलिए पारिभाषिक शब्‍दकोश की जरूरत पड़ी। इस दिशा में परिषद ने अमूल्‍य योगदान दिया।

इसके अलावा परिषद ने विज्ञान संचारकों और लेखकों की एक लंबी जमात तैयार की। 1950-60 के दशक के मध्‍य में परिषद के विद्वान डॉक्‍टर सत्‍यप्रकाश, डॉक्‍टर गोरखप्रसाद व डॉक्‍टर रामदास तिवारी आदि ने विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नए शोधों को हिंदी में प्रकाशित करने का विचार किया। इसके लिए 1958 में परिषद द्वारा प्रथम हिंदी त्रै‍मासिक शोध पत्रिका ‘विज्ञान परिषद अनुसंधान पत्रिका’ का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इस शोध पत्रिका को देश की प्रमुख सरकारी व अर्धसरकारी वैज्ञानिक संस्‍थाओं के अतिरिक्‍त विश्‍व के 25 से अधिक देशों में भेजा जाता है।

आरंभि‍क वर्षों में परि‍षद का अपना स्‍थायी भवन नहीं था। 1953 में इलाहाबाद वि‍श्‍ववि‍‍द्यालय ने परि‍षद को करीब चार एकड़ भूमि उपलब्‍ध कराई। पंडि‍त जवाहर लाल नेहरू ने 4 अप्रैल 1956 को इसके वर्तमान भवन का शि‍लान्‍यास कि‍या। आगे चलकर चार एकड़ परि‍सर में तीन मंजि‍ला भवन तथा सभागार बना लिया गया। यह इलाहाबाद वि‍श्‍ववि‍द्यालय के वि‍ज्ञान संकाय से लगा हुआ है।

इक्‍कीसवीं सदी के आगमन के कुछ वर्ष पूर्व परि‍षद ने अपनी गति‍वि‍धि‍यों को नए आयाम दिए तथा देश के वि‍भि‍न्‍न नगरों में शाखाएं खोलीं। इनमें जोधपुर, दि‍ल्‍ली, बड़ोदरा, रोहतक, लखनऊ, वाराणसी, चि‍त्रकूट और इलाहाबाद शाखा प्रमुख हैं।

परि‍षद वि‍ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लि‍ए देश की प्रमुख संस्‍थाओं के साथ मि‍लकर जगह-जगह संगोष्‍ठि‍यों और कार्यशालाओं को आयोजन करती है। साथ ही, प्रति वर्ष विज्ञान संबंधी व्याख्यानों का भी आयोजन किया जाता है।

वि‍ज्ञान परि‍षद के पुस्‍तकालय में 1960 से अब तक पि‍छले 50 वर्षों के वि‍भि‍न्‍न अंतरराष्‍ट्रीय शोध जर्नलों का अनूठा संग्रह है। वि‍श्‍वभर के लगभग 25 जर्नल यहां नि‍यि‍मि‍त रूप से आते हैं। हिंदी में लोकप्रि‍य वि‍ज्ञान की अनेक पत्रि‍काएं और हजारों वि‍ज्ञान की पुस्‍तकें भी यहां उपलब्‍ध हैं। परि‍षद ने वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सहयोग से भारत के प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर मेघनाद साहा के समग्र साहित्य के हिंदी अनुवाद का महती कार्य किया है। यह कार्य ‘चिंतन के विवि‍ध आयाम’ शीर्षक के अंतर्गत तीन खंडों में प्रकाशित किया है।  इसके अलावा कई महत्‍वपूर्ण कि‍ताबों का परि‍षद ने अनुवाद कर प्रकाशि‍त कि‍या।

खामोशी से खतरा : अनुराग

book fair

एक धारणा बना दी गई है कि किताबें नहीं बिकतीं। लोग खरीदकर पढ़ना नहीं चाहते। खासकर हिंदी के प्रकाशक तो इस बात का सबसे अधिक रोना रोते हैं। हालांकि इसमें उन्‍हें कम से कम दो लाभ हैं। पहला- सरकारी खरीद के लिए नैतिक लाइसेंस के रूप में इस बात का प्रयोग करते हैं। दूसरा- लेखकों को रॉयल्‍टी देने से छुट्टी मिल जाती है। जन संस्‍कृति मंच ने रामशंकर यादव ‘विद्रोही’ के कविता संग्रह ‘नई खेती’ का प्रकाशन किया। इस संग्रह की छह सौ प्रतियां तीन माह में बिक गईं। दूसरी ओर एक नामी प्रकाशक ने वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी की दो किताबों की एक साल की रॉयल्‍टी 35 रुपये भेजी। कहीं न कहीं खपला तो जरूर है।

तीन-चार साल पहले की बात है। हमारी कॉलोनी में किसी ने नेशनल बुक ट्रस्‍ट को फोन कर दिया। उन्‍होंने तय दिन को किताबों की गाड़ी भेज दी। मुझे भी भ्रम था कि लोग किताबें नहीं खरीदेंगे। लेकिन कई लोगों ने अपने और बच्‍चों के लिए किताबें खरीदीं।

जन संस्‍कृति मंच की किताबों और फिल्‍मों का वितरण देख रहे   बैजनाथ ने बताया कि जसम के वर्ष में ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ के दस आयोजन होते हैं और करीब दस अन्‍य साहि‍त्यिक-सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते है। इनके अलावा समय-समय पर पुस्‍तक प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। हमारे पास अभी अपने और अन्‍य प्रकाशकों के मिलाकर करीब तीस टॉइल्‍स हैं।‍ फिर भी ‘‘हम हर आयोजन में किताबों और फिल्‍मों की डीवीडी की कुल मिलाकर 10 से 15 हजार तक की बिक्री कर लेते हैं। अगर किताबें अच्‍छी और सस्‍ती हों तो लोग छूट भी नहीं मांगते।’’

नई दिल्‍ली में स्थित हिंदी भवन के सामने लक्ष्‍मण राव चाय बेचने के साथ अपनी लिखी किताबें भी बेचते हैं। पहले वह दिल्‍ली और आसपास के स्‍कूलों-कॉलेजों में साइकिल से जाकर किताबें बेचते थे। अब बंद कर दिया है। उन्‍होंने बताया कि हर महीने ग्‍यारह-बारह हजार की किताबें उनके यहां से बिक जाती हैं। उन्‍हें कहीं जाना नहीं पड़ता है।

श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन की किताबों की दुकान में कई बार किताब या पत्रिका खरीदने गया। मुझे याद नहीं आता कि कभी वह दुकान खाली मिली हो। दो-चार लोग किताब खरीदते और पसंद करते मिल जाते थे। अर्बन डिपार्टमेंट ने किताब और पत्रिकाएं बेचना कमर्शियल एक्टिविटी मानकर इसे बंद करवा दिया। लेकिन अधिकांश बडे़ लेखकों और प्रकाशकों के दिल्‍ली में होने के बावजूद उस समय कोई तीव्र विरोध हुआ हो या कोई प्रदर्शन हुआ हो, मुझे याद नहीं पड़ता। कहीं और दुकान खोलने के लिए भी दबाव नहीं बनाया गया। सब ने चुपचाप इसे स्‍वीकार कर लिया। पुस्‍तकों को असली खतारा इस चुप्‍पी से ही है।

दरियागंज में स्थित हिंदी बुक सेंटर को छोड़कर पूरी दिल्‍ली में मेरी जानकारी में इस समय कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहां सभी महत्‍वपूर्ण किताबें मिल सकें। इस दुकान के बारे में अधिकांश लोगों को पता नहीं है और यह काफी अलग भी पड़ती है। देश की राजधानी में हिंदी के अधिकांश महत्‍वपूर्ण प्रकाशक हैं। सभी मिलकर कोई एक ऐसी दुकान नहीं खोल पा रहे हैं, जहां सभी की किताबें रखी जा सकें। प्रकाशकों का इसमें रुचि नहीं लेने का एक महत्‍वपूर्ण कारण सरकारी थोक खरीद का होना है। यह एक ऐसा जरिया है, जिसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आता है। यह कोई रहस्‍य नहीं रह गया है कि मोटा कमीशन देकर प्रकाशक सरकारी आर्डर प्राप्‍त करते हैं। एक बार में एक प्रकाशक की किताबों की निश्चित संख्‍या ही खरीदी जाती है। इसलिए एक ही प्रकाशक ने मुख्‍य प्रकाशन के अलावा अन्‍य नामों से प्रकाशन खोल लिए है। प्रिंट लाइन वाला पेज बदला और मिल गया एक और आर्डर। जब ऐसे शार्टकट से अच्‍छी खासी कमाई हो रही हो तो लोगों पर निर्भर क्‍यों रहा जाए। लेखक को कभी पता ही नहीं चलेगा कि उसकी किस किताब को कितना आर्डर मिला। ऐसे में उसकी किताबों की बिक्री का हिसाब रखने का और न ही रॉयल्‍टी देने आदि का कोई झंझट। सरकार को खरीदी गई किताबों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। सरकारी खरीद के कारण ही प्रकाशक पुस्‍तकों की अनाप-शनाप कीमतें रखते हैं। आर्डर देने वाला खुश और आर्डर पाने वाला भी। हालांकि अब प्रकाशक कम कीमतों में पेपरबैक संस्‍करण उपलब्‍ध कराने लगे हैं। कई नए प्रकाशक भी आए हैं जो अच्‍छी और सस्‍ती किताबें प्रकाशित कर रहे हैं। उनका यह प्रयास लो‍कप्रिय भी रहा है। उन्‍हें लेखकों और पाठकों का पूरा सहयोग मिल रहा है। इससे पाठक की पहुंच पुस्‍तक तक बन रही है। इस संबंध में कीमतें कुछ और कम करने और पेपरबैक्‍स पुस्‍तकों की संख्‍या बढ़ाने की जरूरत है। सरकारी खरीद का मकसद साहित्‍य के प्रचार-प्रचार में सहयोग करना ही रहा होगा, लेकिन जब यह व्‍यवस्‍था पुस्‍तक विरोधी साबित हो रही हो तो इस बंद कर दिया जाए। इसके बदले कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि जो सरकारी मदद मिल रही है, वह प्रकाशक को मिलने की बजाय सीधे पाठक को मिले। सरकार ही विभिन्‍न शहरों में सरकारी स्‍कूल, कॉलेज या संपत्ति में एक दुकान खोले जिसमें प्रकाशक नाममात्र की मासिक राशि खर्च कर अपनी किताबें रख सकें। इससे होने वाली आमदनी से इसका खर्चा चलाया जाए। यहां सवाल उठता है कि क्‍या ऐसी दुकानें चलेंगी। मैं 1989 से 1992 तक उत्‍तरकाशी, उत्तराखंड में रहा। वहां मकान की सीढ़ी के नीचे जो जगह बचती है, उसमें किसी सज्‍जन ने साहित्यिक किताबों की दुकान खोल रखी थी। मैंने ‘भगत सिंह की जेल डायरी’ आदि कुछ किताबें वहां से खरीदी थीं। और लोग भी खरदीते होंगे, तभी तो दुकान चल रही थी। उत्‍तरकाशी देश की सीमा पर स्थित बहुत ही छोटा शहर है। जब वहां किताबें बिक सकती हैं तो बडे़ शहरों और कस्‍बों में क्‍यों नहीं बिक सकतीं। इसके अलावा देश भर में कई लोग पत्रिकाएं और किताबें मंगाकर उन्‍हें पुस्‍तक प्रेमियों को बेचते हैं। हालांकि इसमें उन्‍हें कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और न ही उनका यह मकसद है, लेकिन लोगों तक किताबें पहुंच जाती हैं।

अगर आप कभी साप्‍ताहिक बाजार गए हैं तो वहां पटरी पर किताब बेचते एक-दो लोग जरूर मिले होंगे और ठेली में किताब बेचने वाला भी। यह सही है कि उनके पास धार्मिक किताबें और पत्रिकाएं, फिल्‍मी पत्रिकाएं, कुछ चालू किस्‍म की पत्रिकाएं और उपन्‍यास व साप्‍ताहिक पत्र-पत्रिकाएं अधिक होती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उनके पास प्रेमचंद के उपन्‍यास ‘गोदान’ व ‘गबन’ और कोई कहानी संग्रह, शरतचंद्र का ‘देवदास’ और सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों की जीवनियां भी मिल जाएंगी। इन किताबों को सजावट के लिए दुकानदार नहीं रखते। निश्चिततौर से इन किताबों की बिक्री होती है। दूसरी बात यह है कि अगर चालू किस्‍म की किताबें- पत्रिकाएं खरीदीं और पढ़ी जा रही हैं तो इसका मतलब भी यह है कि लोगों की पढ़ने में रुचि है। बस हम उनकी रुचि को विकसित कर उन्‍हें अच्‍छी किताबों की ओर नहीं मोड़ पा रहे हैं। इसके लिए सामूहिक रूप से प्रयास किए जाएं। प्रकाशक तो किताबों को लेकर लोगों के बीच में जाएं ही, साथ ही लेखकों को लोगों के बीच आना होगा। चारदीवारी के बीच बडे़ से बडा़ साहित्यिक आयोजन करने की बजाए लोगों के बीच छोटे-छोटे आयोजन करना ज्‍यादा उपयोगी है। अभी तक जो आयोजन हो रहे हैं उनमें लेखक वक्‍ता, लेखक श्रोता, लेखक आयोजक, लेखक व्‍यवस्‍थापक। यानी सब कुछ लेखकों के बीच ही हो रहा है, आम आदमी की उसमें कोई भागेदारी नहीं है। मुझे लगता है कि लेखकों को इसकी चिंता भी नहीं है। नहीं तो वह व्‍यवस्‍थापकों से कहते कि एयरकंडीशनर हॉल में आयोजन करने के बजाए किसी कॉलोनी के पार्क में आयोजन करें। कुछ लोग भी जुटेंगे। हो सकता है कि लोगों को शुरू-शुरू में अजूबा लगे, लेकिन बार-बार इस तरह का आयोजन देखकर उनके मन में स्‍वाभाविक रूप से जिज्ञासा उत्‍पन्‍न होगी कि ये लोग क्‍या करते हैं और क्‍यों करते हैं। यह जिज्ञासा उन्‍हें किताबों के नजदीक ले जाने में सहायक होगी।

कई बार स्‍कूलों में बुक स्‍टॉल लगाए जाते हैं। उनमें साधारण और महंगी किताब होने के बावजूद खरीदी जाती हैं। फिर हिंदी प्रका‍शकों के साथ ही ऐसी क्‍या दिक्‍कत है कि उनकी किताबें पाठक नहीं खरीदता।

देश की राजधानी की ही बात करें तो यहां दिल्‍ली सरकार की ओर से जगह-जगह शराब की दुकानें खोली गईं। इसके लिए लोगों के विरोध को नजरअंदाज किया गया। इसकी मुख्‍य वजह राजस्‍व की प्राप्ति है। लेकिन क्‍या एक लोक कल्‍याणकारी सरकार का दायित्‍व केवल मुनाफा कमाना है। लोगों को सुरुचि संपन्‍न बनाना और उनके बौद्धिक स्‍तर को बढ़ाने की प्रति उसका कोई दायित्‍व नहीं है। क्‍यों नहीं दिल्‍ली सरकार पूरी राजधानी में एक भी किताब की दुकान नहीं खोल सकती।

दिल्‍ली कला-संस्‍कृति की भी राजधानी है। केंद्रीय साहित्‍य अकादमी, हिंदी अकादेमी, विभिन्‍न भाषाओं की अकादमी, संगीत-नाटक अकादमी और कई कला-संस्‍कृति से जुडे़ सेंटरों और संस्‍थानों के बावजूद दिल्‍ली में एक भी ऐसी जगह का न होना, जहां लोग अपनी पसंद की किताब देख और खरीद सकें शर्मनाक है। यह हॉल देश की राजधानी के हैं तो अन्‍य जगहों का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। इसमें न तो दोष किताबों का है और नहीं पाठकों का। दोष है तो हमारा, जो कोई व्‍यवस्‍था नहीं कर पा रहे हैं। केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और एनएसडी के पास काफी जगह है। क्‍यों नहीं इनके गेट पर एक बड़ी-सी दुकान बनाई जा सकती, जहां लोगों को आसानी से सभी प्रकाशकों की किताब उपलब्‍ध हो सकें।

पाठकों को किताबों से दूर करने में डाक विभाग की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका है। जितने की किताब नहीं होती है, उससे ज्‍यादा डाक में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में कोई कैसे डाक से किताब मंगाने का साहस कर सकता है। डाक से किताब भेजने में सरकार रियायत दे तो कुछ लाभ होगा।

अगर लोग किताब नहीं खरीदना चाहते हैं तो वे पुस्‍तक मेले में क्‍यों आते हैं। और लोग खरीदते ही नहीं हैं तो मेले में किताब कैसे बिक जाती हैं। कौन खरीदता है उन्‍हें। किताबों की खरीदारी करने वाले दिल्‍ली के ही नहीं, आसपास के राज्‍यों के लोग भी आते हैं। कुल किताबों में जितना कमीशन मिलता है, उससे ज्‍यादा तो आने-जाने में खर्च हो जाता है। इसके बावजूद लोग आते हैं तो इसकी मुख्‍य वजह है, एक ही छत के नीचे सभी प्रकाशकों का मौजूद होना। ऐसे में लोगों को अपनी मनपसंद की किताबें खरीदने में सुविधा होती है। विश्‍व पुस्‍तक मेले-2013 के दौरान पहले दिन तीन लगातार बारिश पड़ने और बहुत ज्‍यादा खराब मौसम होने के बावजूद लोग आए तो अभी भी कहा जाए कि किताबों की खरीदी में किसी की रुचि नहीं है। अगर किसी भी तरीके से देश भर में जगह-जगह किताबें उपलब्‍ध कराई जाएं तो जरूरी बिकेंगी। कम से कम एक बार कोशिश तो करनी ही चाहिए।

(यह लेख संपादित रूप में जनसत्ता में 10 फरवरी 2013 को प्रकाशित हुआ है)

अब शब्‍दों का विश्‍व बैंक बनाने की तैयारी : अनुराग

अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

84वें वर्ष में प्रवेश कर रहे (जन्‍म 17 जनवरी 1930) कोशकार अरविंद कुमार पर लेख-

आधुनिक काल में हिन्‍दी के पहले शब्‍दकोश ‘समांतर कोश’(1996), ‘द हिंदी-इंग्लिश इंग्लिश-हिंदी थिसारस ऐंड डिक्शनरी’(2007) जैसे महाग्रंथ और ‘अरविंद लैक्सिकन’(2011) के रूप में इंटरनैट पर विश्‍व को हिन्‍दी-अंग्रेजी के शब्‍दों का सबसे बड़ा ऑनलाइन ख़ज़ाना देने वाले अरविंद कुमार अब ‘शब्दों का विश्‍व बैंक’ बनाने की तैयारी में जुटे हैं।

उनके डाटाबेस में हिन्‍दी-इंग्लिश के लगभग 10 लाख शब्द हैं। यहाँ शब्द से मतलब है एक पूरी अभिव्यक्ति, उसमें शब्द चाहे कितने ही हों। जैसे : उत्थान पतन, आरोह अवरोह, ज्वार भाटा,, rise and fall, ascent descent, going up and down, tide and ebb, up and down; नभोत्तरित होना, उड़ान भरना, टेकऔफ़ करना, go up in the sky, rise in the sky; क्षेत्र के ऊपर से उड़ना, किसी के ऊपर से उड़ना, overfly, fly across, pass over – एक एक शब्द गिनें तो शब्द संख्या दस लाख से कहीं ऊपर हो जाएगी, अनुमानतः साढ़े बारह लाख।

शब्‍दों को लेकर उनका जुनून अभी भी कम नहीं हुआ है। कुछ दिन पहले किसी ने उनसे पूछा कि आपके डाटा में ‘तासीर’ शब्द है या नहीं। उन्‍होंने चेक किया। शब्द था ‘प्रभाव’ के अंतर्गत। यह उसका अर्थ होता भी है- जैसे दर्द की ‘तासीर’। वह चाहते तो इससे संतोष कर सकते थे, लेकिन उनका मन नहीं माना। हिन्‍दी में तासीर शब्द को उपयोग आम ज़िंदगी में है तो उसका संदर्भ ‘आहार’ या ‘औषध’ की आंतरिक प्रकृति या स्वास्थ्य पर उसके ‘प्रभाव’ के संदर्भ में होता है। उन्‍हें लगा कि इसके लिए एक अलग मुखशब्द बनाना ठीक रहेगा। उन्‍होंने सटीक इंग्लिश शब्द की तलाश शुरू कर दी। लेकिन इसमें उन्‍हें किसी कोश से कोई सहायता नहीं मिली। प्रोफ़ेसर मैकग्रेगर के ‘आक्सफ़र्ड हिंदी-इंग्लिश कोश’ में मिला– effect; action, manner of operation (as of a medicine)। लेकिन ‘तासीर’ के मुखशब्द के तौर इनमें से कोई भी शब्द रखना उन्हें ठीक नहीं लगा। इधर-उधर चर्चा भी की, लेकिन बात नहीं बन रही थी। अंततः वह शब्‍द गढ़ने में लग गये। कई दिन बाद ‘तासीर’ मुखशब्द के साथ अन्य शब्द जोड़ पाए–

तासीर, असर, क्रिया, परिणाम, प्रभाव, प्रवृत्ति, वृत्ति, उदाहरण :‘उड़द की तासीर ठंडी होती है अत: इसका सेवन करते समय शुद्ध घी में हींग का बघार लगा लेना चाहिए।’

effective trait, the manner in which a food item or medicine affects its consumer, effect, impact, manner of operation (as of a food item or medicine), nature, reactive nature, trait.

यह केवल एक उदाहरण है। उनके मन में हर रोज़ कुछ न कुछ नए विचार आते रहते हैं। जो भी नए शब्द सुनते और पढ़ते हैं, हर रोज़ उसे डाटा में ढूँढ़ते हैं और फिर उनके नए संदर्भ डालते हैं। कई बार रात में कुछ ख़याल में आता है। एक रात उनके मन मेँ gubernatorial शब्द उमड़ता घुमड़ता रहा। यह governor का विशेषण ।

गवर्नर के कई संदर्भ हैँ- administrator, प्रशासक; controller, नियंत्रक; electricity regulator, विद्युत रैगुलेटर; ruler, शासक; speed controller, गति नियंत्रक।

भारत में गवर्नर का प्रमुख राजनीतिक प्रशासनिक अर्थ है- representativeand observer of the central government in a state किसी राज्य मेँ केंद्र सरकार का प्रतिनिधि और प्रेक्षक। अमेरिका मेँ गवर्नर chief executive of a state है। वहां राष्ट्रपति की ही तरह इस पद के लिए भी चुनाव होता है। हमारे यहां यह प्रतिनिधि मात्र है, शासन का संचालक नहीं (यह काम हमारे यहां राज्य के मुख्यमंत्री का होता है)। हमारे यहां इसके कई पर्याय हैं जैसे- राज्यपाल, नवाब, निज़ाम, प्रांतपाल, सूबेदार, उप राज्यपाल, गवर्नर जनरल, चीफ़ कमिश्‍नर, मुख्य आयुक्त, लैफ़्टिनैंट गवर्नर, सदरे रियासत (जम्मू और कश्मीर) हैं।

अतः gubernatorial के लिए उन्‍हें एक स्वतंत्र मुखशब्द बनाने की आवश्‍यकता महसूस हुई। जब तक यह ससंदर्भ अपने आप में एक स्वतंत्र प्रविष्टि के तौर पर सही जगह नहीं रखा जाता, तब तक इसके विशेषण gubernatorial को उपयुक्त जगह नहीं रखा जा सकता। वह नहीं चाहते थे कि gubernatorial को ‘गति नियंत्रकीय’ से कनफ़्यूज़ करने का मौक़ा दिया जा जाए। उसके लिये सही जगह वहीं हो सकती है जहाँ उसका सही अर्थ स्पष्ट हो- राज्यपालीय,राज्यपाल विषयक।

आजकल वह डाटा के सम्‍बर्धन के अतिरिक्त परिष्कार और साथ-साथ शब्दों के अनेक रूपों को सम्मिलित करने का काम भी कर रहे हैं। जैसे- जाना के ये रूप जोड़ना- गई, गए, गया, गयी, गये, जा, जाइए, जाइएगा, जाए, जाएगी,जाएँगी, जाएंगी, जाएँगे, जाएंगे, जाओ, जाओगी, जाओगे, जाने, और go के लिए goes, going, went। (डाटा में ये सभी रूप अकारादि क्रम से रखे गए हैं।) क्‍योंकि हिन्‍दी में वर्तनी की कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं, अतः ‘गई’ और ‘गए’ के साथ-साथ ‘गयी’ और ‘गये’ जैसे विकल्प भी जोड़ रहे हैं। ये पद्धतियाँ क्योंकि प्रचलित हैं तो इन्हें अशुद्ध भी नहीं कहा जा सकता। इस बारे में उनका कहना है कि ये भिन्न पद्धतियाँ हिन्‍दी के किसी भी सर्वमान्य वर्तनी जाँचक के बनने बहुत बड़ी बाधा हैं।

यह तो हुई क्रिया पदों के रूपोँ की बात। अब संज्ञाओं को लें तो गौरैया के लिए गौरैयाएँ, गौरैयाओँ, गौरैयाओं; प्रांत/प्रदेश के लिए प्रदेशोँ, प्रदेशों, प्रांतोँ, प्रांतों। (वर्तनी की अनेकरूपता यहाँ भी देखने को मिलती है- अनुनासिक और अनुस्वार के भिन्न प्रचलनोँ के कारण।)

सुबह पांच बजे से

उनका दिन सुबह पाँच बजे शुरू हो जाता है। लगभग सन् 1978 से। और तभी कुल्ला-मंजन कर के शुरू हो जाता है अपने डाटाबेस पर काम। काम सुबह पाँच बजे से शुरू हो कर शाम के लगभग साढ़े छह बजे तक चलता है। लेकिन लगातार नहीं। बीच-बीच मेँ छोटे-छोटे ब्रेक लेते रहते हैं। कभी शेव करने और नहाने के लिए, कभी नाश्ते के लिए, कभी यूँ ही ऊब मिटाने के लिए दस-पंद्रह मिनट, कभी दोपहर खाने के लिए। लगभग चार-पाँच बजे छोटा सा काफ़ी ब्रेक। और साढ़े छह बजे पूर्ण विराम। अब रात के साढ़े नौ बजे तक एकमात्र मनोरंजनपूर्ण कार्यक्रम ही देखते हैं। बीच मेँ आठ से साढ़े आठ बजे तक समाचार।

सर्दी के चार महीने वह बेटे सुमीत के पास आरोवील आ जाते हैं। आजकल वह सपत्‍नीक वहीं हैं। वहाँ उन्‍हें अख़बार सुविधा से नहीं मिल पाते। इसलिए सुबह काम के बीच कभी इंटरनैट पर इंग्लिश और हिन्‍दी समाचारोँ पर सरसरी नज़र डालना, कभी ई-मेल देखना और हर दिन लगभग पंद्रह-बीस मिनट फ़ेसबुक पर छोटी-मोटी टीका, मित्रों की मेल पर पसंद का निशान, किसी-किसी पर छोटी सी टिप्पणी भी उनकी दिनचर्या में शामिल है। निकट के नगर पुडुचेरी में कभी कभार ही कोई हिन्‍दी फ़िल्म आती है। अतः आरोवील में वह समय बच जाता है। कभी-कभी ऊब मिटाने के लिए टीवी पर पुरानी फ़िल्म देख कर काम चला लेते हैं।

चंद्रनगर (गाज़ियाबाद) में रहने के दौरान दिल्ली-गाज़ियाबाद क्षेत्र में बने सिनेमाघरों में अकसर सुबह 12 से पहले की फ़िल्में देखते हैं।

हम सब साथ-साथ

अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार, बेटी मीता और बेटे सुमीत के साथ।

अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार, बेटी मीता और बेटे सुमीत के साथ।

कोशकारिता के अपने जुनून के लिए अरविंद कुमार ने 1978 में ‘माधुरी’ की जमी-जमाई नौकरी छोड़ी। तब से वह केवल इसी काम में लगे हैं। किसी से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली और कोई रचनात्‍मक सहयोग भी नहीं लिया। जो काम करोड़ों के बजट और लम्‍बे-चौड़े स्‍टॉफ के बाद भी कोई संस्‍था नहीं कर पा रही है, उसे अरविंद कुमार ने कर दिखाया।

अरविंद कुमार इतना बड़ा काम कर पाए इसकी एक वजह उन्‍हें परिवार का पूरा सहयोग मिलना ही है। वह बताते हैं कि अम्मा-पिताजी ने कभी उनके किसी फ़ैसले का विरोध नहीं किया। ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ छोड़ी तो उन्होंने उनके निर्णय का स्वागत ही किया। ‘माधुरी’ के लिए मुंबई गए, तो वे ख़ुश थे। छोड़ कर आए तो भी ख़ुश। जो भी उन्‍होंने किया, उनकी अम्‍मा-पिताजी के लिए स्वीकार्य था।

उनके निजी परिवार एकक ने तो इससे भी आगे बढ़ कर, उनका काम में हाथ बँटाया। जब 1973 में ‘माधुरी’ की अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़ने की बात की, तो पत्नी कुसुम ने बड़े उत्साह से उनका समर्थन किया, बल्कि बाद में पूरा सहयोग किया। आरम्‍भ में उनकी भूमिका अरविंद कुमार के बनाए कार्डों का इंडैक्स बनाने की थी। बाद में वह अरविंद कुमार की ही तरह हिन्‍दी कोश में ‘अ’ से ‘ह’ तक जाते-जाते वस्तुओं, वनस्पतियों और देवी-देवताओं के नामों को सही कार्ड बना कर दर्ज़ करने लगीं। अरविंद कुमार का कहना है कि ‘शब्देश्‍वरी’ (पौराणिक नामों का थिसारस) का ढाँचा मेरा है और अधिकांश शब्द तो कुसुम के ही हैँ– नाम हम दोनों का है।’

1976 में नासिक में गोदावरी नदी में सपरिवार स्नान कर के उन्‍होंने ‘समांतर कोश’ का शुभारंभ रिकार्ड करने के लिए एक कार्ड बनाया। उस पर पहले उन्‍होंने, फिर पत्‍नी कुसुम, बेटे सुमीत (सोलह साल) और बेटी मीता (दस साल) ने दस्तख़त किए। एक तरह से यह उन सब की सहभागिता का दस्तावेज बन गया। शायद यही कारण है कि जब भी सुमीत और मीता सहयोग करने लायक़ उम्र में पहुँचे तो अपनी-अपनी तरह से उनके काम के साथ जुड़ते गए।

अरविंद कुमार 1978 में ‘माधुरी’ की नौकरी छोड़कर सपरिवार दिल्ली मेँ मॉडल टाउऩ वाले घर में आ टिके। सुमीत का दाख़िला मुंबई के एक प्रतिष्ठित डॉक्टरी के कालिज में हो चुका था। वह पढ़ाई के दिनों वहीं रहते। मीता नवीं में सरकारी स्कूल में दाख़िल हो गईं। धीरे-धीरे सुमीत ने डॉक्टरी पढ़ाई में सर्जरी में दो गोल्ड मैडल जीते, और कुछ महीनों बाद वह दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में रैज़िडैंट सर्जन बन गए। वहाँ कंप्यूटर लगाए जा रहे थे। यहीं से ‘समांतर कोश’ के काम की तकनीक बदलने की शुरूआत हो गई। कंप्‍यूटर देखकर सुमीत की समझ में यह बात आ गई कि हम जो कार्डों पर काम कर रहे हैं, उस तरह तो वह काम कभी पूरा ही नहीं हो पाएगा। उन्‍होंने अपने पिताजी यानी अरविंद कुमार को इसके लिए सहमत करने की मुहिम ही चला दी।

अंततः अरविंद कुमार सहमत हुए। लेकिन कंप्यूटर के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उधार लेने की हिम्मत भी नहीं थी, और संभावना भी नहीं थी। आख़िर कुछ बचत करने के लिए सुमीत ने साल-डेढ़ साल ईरान में काम ले लिया। यथावश्यक राशि जमा होते ही वापस आ गए।

1993 में कंप्यूटर ख़रीदा गया। अब उसके लिए साफ़्टवेयर चाहिए था जिसे प्रोग्राम कहते हैं। ‘समांतर कोश’ के लिए एक ख़ास तरह के प्रोग्राम की ज़रूरत होती है। यह प्रोग्राम डाटाबेस बनाता है– यानी विशेष प्रकार की सूची, तालिका। अकेला डाटाबेस बनना काफ़ी नहीं होता। उसे वाँछित रिपोर्ट में तब्दील करना होता है। इस काम के संदर्भ में- थिसारस बनाना। इन दोनों ही कामों के लिए अलग-अलग प्रोग्राम चाहिए होते हैं। ये दोनों ही क़ीमती होते हैं। और अरविंद कुमार के बूते से बाहर थे। अतः सुमीत ने ही हिम्मत की। उन्‍होंने किताबें पढ़-पढ़ कर जाना कि डाटाबेस बनाने के लिए उस समय फ़ाक्सप्रो नाम का प्रोग्राम सब से अच्छा है। इधर-उधर सम्‍पर्क बना कर उसका प्रबंध कर लिया। अब फ़ाक्सप्रो से क्या काम लेना है– यह अरविंद कुमार और सुमीत को तय करना था। फिर उस काम के लिए एक उपप्रोग्राम या कंप्यूटरी भाषा मेँ ऐप्लिकेशन लिखनी थी जो फ़ाक्सप्रो पर काम कर सके। अब फिर किताबें पढ़ कर ख़ुद ही सीख कर पहले एक प्रारंभिक ऐप्लीकेशन बनी। जैसे-जैसे ‘समांतर कोश’ की ज़रूरतें बढ़ती गईं, सुमीत उस में नए-नए मौड्यूल जोड़ता गए। अब तक अरविंद कुमार के पास 60,000 कार्डों पर ढाई लाख सुव्यवस्थित शब्द जुड़ चुके थे। उसको कंप्यूटरिकृत करने के लिए डाटा प्रविष्टि कर्मचारी रखा। वह बड़ा मेहनती निकला, और लगभग बेचूक टाइप करने वाला। लगभग नौ-दस महीनों मेँ उसने वह काम पूरा किया। अब और शब्द जोड़ने थे। 1951 से ही अरविंद कुमार हिन्‍दी में टाइपिंग करते आ रहे थे। ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ में अपनी सभी रचनाएं उन्‍होंने टाइपराइटरों पर लिखी थीं। इसका फायदा यह हुआ कि उन्‍हें कंप्यूटर डाटा में नए शब्द जोड़ने में बहुत ज़्यादा समय नहीं लगा। इस बीच सुमीत बंगलौर में डॉक्टरी करने चला गए थे।

समांतर कोश का विमोचन करते राष्ट्रंपति शंकर दयाल शर्मा।

समांतर कोश का विमोचन करते राष्ट्रंपति शंकर दयाल शर्मा।

अतः अरविंद कुमार दंपति भी सुमीत के पास बंगलौर चले गए। वहाँ जाना इसलिए भी ज़रूरी था कि अब भी उन्‍हें नई आवश्यकताओं के लिए प्रोग्राम को परिष्कृत करवाना होता था और इसमें सुमीत सहायक थे। 1990 मेँ मीता की शादी हो चुकी थी। अतः वे सुमीत के पास जाने के लिए स्वतंत्र थे। 1994 में बंगलौर जा पहुँचे। वहां सितंबर 1996 को ‘समांतर कोश’ का काम पूरा हुआ। (इस बीच यह भी तय हो चुका था कि नेशनल बुक ट्रस्ट से किताब छपेगी।) पूरे ‘समांतर कोश’ के प्रिंट आउट निकालकर तीनों नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक अरविंद कुमार (उनका नाम भी अरविंद कुमार था) को सौंपने दिल्ली आए। अक्‍टूबर में प्रिंटआउट दिए। प्रिंटआउट मिलते ही अरविंद कुमार (निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्‍ट) ने मुद्रण विभाग को आदेश दिया कि कोई बड़ा प्रेस तीनों शिफ़्टोँ के लिए बुक कर लें। पाँच हज़ार कापियों के लिए काग़ज़ इकट्ठा ख़रीद लें ताकि सभी 1,800 से पेजों में एक सा काग़ज़ रहे और काग़ज़ न होने के बहाने छपाई न रोकनी पड़े। किताब दिसंबर तक आनी ही चाहिए– राष्ट्रपति जी को समर्पित करने की तारीख़ 13 दिसंबर वह पहले ही समय ले चुके थे– किसी और को बताए बग़ैर!

और इस तरह से ‘समांतर कोश’ के रूप में एक अनमोल खजाना हिन्‍दी को मिल गया। पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। यह तो केवल पूर्वकथा सिद्ध हुई। सुमीत को सिंगापुर मेँ कंप्यूटर की नौकरी मिल गई। बंगलौर से अरविंद कुमार दंपति चंद्रनगर (गाज़ियाबाद) वापस आ गए।

मीता का कहना था कि  अपने डाटा में इंग्लिश शब्दों का समावेश करें। यह बेहद ज़रूरी है। वह इंग्लिश मीडियम से पढ़ रही अपनी बेटी तन्वी को हिन्‍दी सिखातीं तो इंग्लिश के हिन्‍दी शब्द और पर्याय नहीं मिल पाते थे। अरविंद कुमार तत्काल मीता से सहमत हो गए। काम को आगे बढ़ाने का ज़िम्मा भी मीता ने लिया– ‘समांतर कोश’ की एक प्रति पर हाशियों पर सभी मुखशब्दों के इंग्लिश अर्थ लिख दिए। यही ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी’ की शुरूआत बनी।

अब तक सुमीत सिंगापुर की एक साफ़्टवेयर कंपनी मेँ सीनियर वाइस प्रेज़िडैंट बन चुके थे, और मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर के एक अस्पताल के संचालन का कंप्यूटरन करवा रहे थे। अरविंद दंपति उसके पास गए तो वहीं उसने डाटा में इंग्लिश अभिव्यक्तियाँ शामिल करने की ऐप्लिकेशन की पहली प्रविधि लिखी।

कर्म आजीवन आनंद है

अरविंद कुमार के जीवन के तीन मंत्र हैं—

मेहनत मेहनत मेहनत या कहें तो कर्म कर्म कर्म। गीता का यह श्‍लोक हर जगह उद्धृत किया जाता है—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

यहाँ कृष्ण केवल सकाम और निष्काम कर्म के संदर्भ में बात कर रहे हैं। अरविंद कुमार इसे इहलौकिक अर्थ के साथ कुछ और भी जोड़ कर देखते हैं। वह कहते हैं कि ‘कर्म करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हमारा कर्म सफल होगा या नहीं, हमें इस की तो परवाह करनी ही नहीं चाहिए, हम काम पूरा कर पाएँगे या नहीँ– इसकी भी चिंता नहीं करनी चाहिए।’ वह अपने कई उदाहरण देते हैं, ‘दिल्ली आ कर काम शुरू करते ही हमारे घर मॉडल टाउन में भयानक बाढ़ आ गई। सात फ़ुट तक पानी भर आया। अगर हमारे कार्ड ऊपर मियानी में न होते, तो सारी मेहनत धरी धराई रह जाती। इसी प्रकार मुझे 1988 में बेहद भारी दिल का दौरा पड़ा। अगर मैं अस्पताल मेँ ही न होता तो बच नहीं पाता। गुमनाम मर जाता। ऐसी कई घटनाएं जीवन में घटती रहती हैं। यूँ मर भी जाता तो जहाँ तक मेरा सवाल है मैं कर्म करने का पूरा आनंद तो लगतार भोग रहा था। तो मैं कहता हूँ— कर्म आजीवन आनंद है।’

सपना शब्दों के विश्‍व बैंक का

उनका कोश अरविंद लैक्सिकन (http://arvindlexicon.com) इंटरनैट पर है। उनका कहना है कि पर यहीं रुका तो नहीँ जा सकता।

आजकल वह एक तरफ़ तो डाटा के संवर्धन और परिष्कार में लगे हैं तो साथ ही साथ अकारादि क्रम से आयोजित ‘हिंदी-इंग्लिश-हिंदी कोश’ के लिए प्रविष्टियों का चयन कर रहे हैं। ऐसे थिसारसों में इंडैक्स की ज़रूरत नहीं होती। अतः वे अपनी सहजता के कारण लोकप्रिय होते जा रहे हैं। (राजकमल से प्रकाशित उनका ‘अरविंद सहज समांतर कोश’ की लोकप्रियता इसका सबूत है।) अब वह ऐसा द्विभाषी कोश-थिसारस बनाना चाहता हैं, जो कालिज तक के छात्रों की सभी ज़रूरतें पूरी कर सके। उनका विश्‍वास है कि यह काम मार्च, 2013 तक पूरा हो जाएगा।

अरविंद कुमार के कई सपने हैं। उनमें एक महान सपना है ‘शब्दोँ का विश्‍व बैंक’ यानी वर्ल्ड बैंक आफ़ वर्ड्स। उनका कहना है कि ‘यह अभी परिकल्पना और आधारभूत काम करने की स्थिति में है। एक बात ज़ाहिर है यह काम मेरे जीवन मेँ पूरा होना सम्‍भव नहीं है। मेरा काम है इस का आधार तैयार खड़ा करना। काम शुरू होने के बाद कई पीढ़ियाँ ले सकता है और इसके लिए अंतररष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी। समय सीमा तो बन ही नहीं सकती। समांतर कोश के लिए दो साल की सीमा तय की थी। लग गए बीस साल! अभी तो विश्‍व शब्दबैंक की परिकल्पना का आधार जानना बेहतर है। मेरे पास हिन्‍दी और इंग्लिश अभिव्यक्तियों का विश्‍व में सब से बड़ा डाटा है। अब हिन्‍दी के माध्यम से हम भारत की सभी भाषाएं जोड़ सकते हैं। इंग्लिश डाटा के सहारे बाहर की भाषाएं मिलाई जा सकती हैं। भारत में सब से पहले मैं दक्षिण की सर्वप्रमुख भाषा तमिल से आरम्‍भ करना चाहूँगा–  इसके लिए तमिल सहयोगियों की तलाश निजी स्तर पर चल रही है। विदेशी भाषाओं में प्राथमिकता संयुक्त राष्ट्रमंडल की किसी भी आधिकारिक भाषाओं को दी जाएगी। फ्राँसीसी पहले आनी चाहिए।
‘इस परिकल्पना का आधार है यूनिकोड का अवतरण। इसके आने के बाद ही यह सोच पाना सम्‍भव हो सकता था। ऐसे किसी बैंक का महाडाटा बनने का सब से बड़ा लाभ यह होगा कि हम जब चाहें संसार की किन्हीं दो या अधिक भाषाओँ के थिसारस-कोश बना सकेंगे–  जैसे तमिल-हिन्‍दी-फ़्राँसीसी, या भारत की बात लें तो ज़रूरत हो तो गुजराती-बांग्ला-हिन्‍दी, या फिर मलयालम-हिन्‍दी…।’
उनका कहना है कि इस परिकल्पना का तकनीकी आधार है– हमारी विकसित शब्द-तकनीक। इस के ज़रिए हम अपने डाटा में अनगिनत भाषाएं और अनगिनत शब्दकोटियाँ समो सकते हैं। यह  प्रविधि बनाई है डॉक्‍टर सुमीत कुमार ने। और यह लगातार विकसित होती रह सकती है। अभी अरविंद कुमार डाटा को अपडेट करते हैं। उनका कहना कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है। अगले साल तक इसके लिए कोई प्रणाली विकसित हो पाएगी।

अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. की स्‍थापना

अरविंद कुमार ने अक्‍टूबर 2010 में कम्‍पनी अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. की स्‍थापना की। कंपनी का उद्देश्य है भारतीय भाषाओं को संसार भर में ले जाना। अरविंद कुमार इसके संस्थापक और शब्‍द संकलन प्रमुख हैं। अन्य सदस्य हैं कुसुम कुमार, सुमीत और मीता लाल। मीता लाल कम्‍पनी की सीईओ हैं। सुमीत इसके तकनीकी पक्ष के अध्यक्ष हैं।
यह कम्‍पनी अ‍रविंद कुमार के सभी कोशों और अन्य रचनाओं की सर्वाधिकारी है। इसने पेंगुइन से उनकी पुस्तक ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐँड डिक्शनरी’ के सभी अधिकार ले लिए हैं। इस पुस्तक की बिक्री यही कम्‍पनी कर रही है।
अरविंद कुमार की कई पुस्तकें राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुई हैं। उन सब पर उनका सर्वाधिकार है, प्रकाशकों के पास केवल एक बार तीन साल के लिए मुद्रण अधिकार है। उनमें एक ‘सहज समांतर कोश’  के बारे में उनका एग्रीमैंट कुछ इस प्रकार का है– यदि वे लोग हर तीन साल मेँ एक नियत संख्या में किताब बेच पाए तो अगले तीन सालों के लिए उन्हें उसके पुनर्मुद्रण का अधिकार मिल जाएगा। अतः यह कोश उनके पास चलता रहेगा।
नेशनल बुक ट्रस्ट से ‘समांतर कोश’ वापस लेने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। अब तक एनबीटी उसके छह मुद्रण कर चुका है।
21 जून 2011 की शाम को अरविंद कुमार को दिल्ली की हिन्‍दी अकादेमी ने शलाका सम्मान दिया, उसी दिन थाईलैंड से उन के पुत्र डॉ. सुमीत कुमार ने अरविंद लैक्सिकन को www.arvindlexicon.com  पर ऑनलाइन कर दिया।

अरविंद कुमार अकारादि क्रम से संयोजित इंग्लिश-हिन्‍दी और हिन्‍दी-इंग्लिश थिसारसों पर भी काम कर रहे हैं। ये पुस्तकें उनकी कम्‍पनी 2013-14 में प्रकाशित कर पाएगी। इन कोशों की एक ख़ूबी है इंग्लिश में भारतीय शब्द बड़े पैमाने पर संकलन। उनका कहना है कि हमारे छात्र कब तक ऐसे इंग्लिश कोशों पर निर्भर करते रहेंगे जिन में हमारी संस्कृति ही न हो।

बोझिल नहीं, रुचिकर है विज्ञान : अनुराग

devendra mewari

प्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ की समीक्षा-  

दुर्भाग्य की बात है कि पाठ्यपुस्तकों में विज्ञान को बोझिल और तकनीकी रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इससे इसे कठिन विषय मान लेने की धारणा को बल मिलता है। जबकि विज्ञान बहुत ही रोचक विषय है, यदि जिज्ञासा उत्पन्न हो जाए। इस विषय को कैसे रोचक ढंग से लिखा जा सकता है, यह सीखा जा सकता है विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक मेरी विज्ञान डायरी से। डायरी शैली में लिखी गई यह पुस्तक 1 जनवरी, 2008 से 31 दिसंबर, 2010 तक की विभिन्न  तिथियों में लिखी गई है। नववर्ष शीर्षक से पहले अध्याय में मेवाड़ी प्रश्न करते हैं कि समय का हिसाब सबसे पहले किसने जोड़ा होगा ? सबसे पहले कब कहा होगा कि आज अमुक दिन-वार है। किसने बनाए होंगे महीने? दिल्‍ली के विश्‍व पुस्‍तक मेले में कवि कुमार अंबुज के साथ हुई बात को याद करते हैं, जिसमें उन्‍होंने पूछा था कि ‘कोई कैसे कह सकता है कि आज ही अमुक वार है? जैसे मंगलवार, शुक्रवार या कोई अन्‍य वार? या जैसे कई लोग वर्त रख लेते हैं। महिलाएं शुक्रवार का उपवास रखती हैं। यह कैसे पता है कि उसी दिन शुक्रवार है? शुरुआत में थोडे़ ही कोई वार रहा होगा?’ जाहिर सी बात है कि जब पृथ्‍वी बनी होगी, तब न वार रहा होगा न दिन। न ही महीने रहेंगे और न ही साल। यहां पर पाठक के मन में स्‍वाभाविक रूप से उत्‍सुकता जाग जाती है कि समय की गणना कैसे हुई होगी और इस कैसे बांधा गया होगा। इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए वह कुमार अंबुज से बातचीत से शुरू होकर दिन की शुरुआत कैसे हुई, कलैंडर का प्रचलन कब हुआ, इसका आधार क्‍या बना, कैसे-कैसे उसमें संशोधन हुए, कैसे महीनों के नाम पडे़, कितने तरह के कलैंडर प्रचलित हैं आदि बातों को बडे़ ही रोचक ढंग से समाने रख देते हैं। अगर मेवाड़ी इस सब को बताने के लिए सीधे इससे शुरू करते कि दिन की शुरुआत कैसे हुई और महीनों के नाम कैसे पडे़ तो शायद ही कोई इसमें रुचि लेता और यह एक बोझिल किताब बन जाती। इस किताब की यह ही सबसे बड़ी विशेषता है कि किसी भी विषय पर जब हम पढ़ना शुरू करते हैं तो जिज्ञासा मन में उत्‍पन्‍न हो जाती है और वह तब तक शांत नहीं होती, जब तक की उसके बारे में पूरी जानकारी न मिल जाए यानी की पूरा लेख पढ़ना अनिवार्य हो जाता है। रोचक ढंग से लिखे होने के कारण वह हमें बांधे भी रखती है।

विज्ञान के लिए सबसे जरूरी बात जिज्ञासू होना है। जब किसी विषय के बारे में हमारे मन में जिज्ञासा उत्‍पन हो जाएगी तो उसमें रुचि उत्‍पन्‍न होने लगेगी और वह विषय कभी बोझिल नहीं लगेगा। उसे जाने की उत्‍सुकता बन जाएगी। तब उसकी तह तक जाने का प्रयास करेंगे। यह डायरी हमें चीजों को जाने और समझने के लिए जिज्ञासू बनाती है यानी पाठकों में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी विकास करती है।

डायरी लिखने के दौरान बीच-बीच में पड़ने वाली वैज्ञानिक घटनाओं वाली तिथियों पर वह उनके बारे में बताते चलते हैं। 19 मार्च, 2008 को  विश्‍व प्रसिद्ध विज्ञान लेखक आर्थर सी क्‍लार्क का निधन हो गया। 20 मार्च को लिखी टीप में वह इस स्‍वप्‍नदृष्‍टा लेखक के बारे में बहुत सी महत्‍वपूर्ण जानकारी देते हैं। तर्क पर आधारित, विज्ञान सम्‍मत अपनी परिकल्‍पनाओं को उन्‍होंने अपने जीवनकाल में ही साकार होते देख लिया था। उपग्रह संचार इसका शानदार उदाहरण है। 1945 में प्रकाशित अपने लेख ‘एक्‍स्‍ट्रा टेरेस्ट्रियल रिलेज : कैन रॉकेट स्‍टेशंस गिव वर्ल्‍डवाइड रेडियो कवरेज?’में उन्‍होंने विचार रखा कि अगर पृथ्‍वी से 36000 किलोमीटर की ऊंचाई पर संदेशों को रिले करने के लिए उपग्रह स्‍थापित किए जाएं तो विश्‍व भर में संचार संभव हो सकता है। संचार उपग्रहों से संबंधित यह पहली परिकल्‍पना थी जो 25 साल बाद साकार हो गई। इसी तरह वर्ष 1940 के दशक में उन्‍होंने कहा था कि वर्ष 2000 तक मानव चांद पर पहुंच जाएगा। तब लोगों ने उनके इस पूर्वानुमान को मखौल मना लिया, लेकिन यह परिकल्‍पना भी साकार हुई।

इस किताब को पढ़ते हुए पता चलता है कि प्रसिद्ध लेखक और सम्‍पादक मनोहर श्‍याम जोशी विज्ञान के प्रति कितने सजक थे। उन्‍होंने अपने दौर के हिंदी विज्ञान लेखकों की पूरी पीढ़ी को पठनीय विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया। भुट्टे तो हम सभी ने खाए होंगे, लेकिन क्‍या हमें पता है कि हजारों साल पहले दक्षिण अमेरिका की इंका और मध्‍य अमेरिका की मय तथा एजटैक सभ्‍यता कि निवासियों का मुख्‍य भोजन मक्‍का ही था। इंका निवासी फसलों की देवी ‘चिकोमिकॉल’ की पूजा करते थे जिसकी प्रतिमा के बाएं हाथ में सूरजमुखी से सजी ढाल और दाहिने हा‍थ में मक्‍का के दो भुट़्टे दिखाए जाते थे। मक्‍का चोरी पर कड़ी सजा दी जाती थी। राजा के निधन के बाद सात दिन तक सिल पर मक्‍का नहीं पीसी जाती थी। आम को फलों का राजा कहा जाता है। इसका हमारे जीवन में इतना महत्‍व है कि उत्‍सवों और शुभकार्यों में आम के पत्‍ते और लकड़ी इस्‍तेमाल होती है। रामायण और महाभारत में भी आम के उपवनों की वर्णन किया गया है। दशहरी, चौसा, लंगड़ा, नीलम, फजली, सफेदा, बंबइया आदि न जाने कितनी की किस्‍में हैं। क्‍या हमने कभी सोचा कि इन किस्‍मों का नामकरण कैसे हुआ। बनारस में एक लंगडे़ फकीर बाबा के घर के पिछवाडे़ एक खास किस्‍म का पहला पेड़ उगा इसलिए उसका नाम लंगड़ा आम पड़ गया। लखनऊ के पास मलीहाबाद के दशहरी गांव में जन्‍मा दशहरी आम। और फिर मलीहाबाद के हाजी कलीमुद्दीन का एक ही पेड़ पर ढाई हजार किस्‍मों के आमों को पैदा कर दिखाना। ऐसी बहुत सी ज्ञानवर्धक जानकारियों इस किताब में हैं।

जैसे कि लेखक ने पुस्‍तक की भूमिका में लिखा भी है कि इसमें विज्ञान की बातें डायरी शैली में लिखी गई हैं। इन पन्‍नों में विषय की विविधता है। इनमें किस्‍से-कहानियां हैं, यात्रा वृत्‍तांत, जीवनियां, संस्‍मरण, शब्‍द चित्र और समाचार भी हैं। यानी इसमें कई विधाओं का संगम है।  इस डायरी की यह भी विशेषता है कि इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है। हर पन्ने पर विज्ञान की नई जानकारी मिलती है। इसमें दिए गए वैज्ञानिक तथ्य और जानकारियां सभी की समझ में आसानी से आ जाती हैं।

पुस्‍तक – मेरी विज्ञान डायरी
लेखक- देवेंद्र मेवाड़ी
मूल्‍य- 350 रुपये
प्रकाशक- आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
एस.सी.एफ. 267, सेक्‍टर-16
पंचकूला-134113

जनवादी सरकार के समाजवादी फैसले : अनुराग

मनमोहन सरकार से पहले इस तरह की समाजवादी और वैज्ञानिक सोच वाली सरकार स्‍वंतत्र भारत के इतिहास में कभी नहीं आई। भविष्‍य के बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता। वैसे हमारे राजनेताओं में जिस तरह की सोच विकसित हो गई है, उससे तो उम्‍मीद है कि आने वाली सरकारें मनमोहना से भी बढ़कर समाजवादी और वैज्ञानिक सोच की होंगी। वह भारत कितना खूबसूरत होगा, जिसमें एक भी गरीब नहीं बचेगा। बस अमीर ही अमीर होंगे।

करीब चालीस साल पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने नारा दिया था- गरीबी हटाओ। उसके बाद जनता पार्टी, कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी आदि कई पार्टियों की सरकारें आईं और गईं, लेकिन कोई भी गरीबी नहीं हटा सका। इसलिए मनमोहन सरकार ने दिल पर पत्‍थर रखकर गरीबों को ही हटाने का निर्णय ले लिया। एक समझदार शल्‍य चिकित्‍सक बीमारी को जड़ से ही खत्‍म करता है। भले ही इसके लिए रोगी को बीमारी से भी गहरा जख्‍म क्‍यों न देना पडे़। निसंदेह इससे रोगी को तात्‍कालिक तकलीफ होती होगी, लेकिन यह उसी के हित में होता है। देश में सभी समस्‍याओं की जड़ गरीब हैं। इन्‍हें रोटी चाहिए, मकान चाहिए, शि‍क्षा चाहि‍ए, दवा चाहिए और भी न जाने क्‍या-क्‍या। इनकी जरूरतें कभी पूरी ही नहीं होतीं। देश अंतरिक्ष में पहुंच गया, इससे इन्‍हें खुशी नहीं मिलेगी। देश में आलीशान मॉल खुल रहे हैं, बडे़-बडे़ हाईवे बन रहे हैं, लेकिन ये बात केवल रोटी की करेंगे। इतना भी नहीं समझते कि रोटी नहीं मिल रही है तो बोटी खा लो और देश के वि‍कास के बढ़ते ग्राफ को देखकर खुश रहो। कुल मिलाकर गरीब देश के विकास और तरक्‍की में धब्‍बा हैं। सरकार कुछ कठोर निर्णय लेकर देश की बीमारियों की जड़ को ही समाप्‍त कर देना चाहती है तो इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।

महान वैज्ञानिक डार्विन का सिद्धांत है कि पृथ्‍वी पर अस्तित्‍व बचाने के लिए निरंतर संघर्ष चलता रहता है। इसमें दुर्बल नष्‍ट हो जाते हैं और सक्षम बच जाते हैं। इतिहास गवाह है कई जीवों की प्रजातियां संघर्ष न कर पाने के कारण नष्‍ट हो गईं। गरीब नामक प्रजाति भी संघर्ष न कर पाने या खुद को परिस्थिति के अनुकूल नहीं ढाल पाने के कारण नष्‍ट हो जाती है तो इसमें किसी का क्‍या कसूर।

समय-समय पर पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने से खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़े हैं। गरीब खाद्य पदार्थ खरीद नहीं पा रहे हैं और जले में नमक यह कि वे जितने चाहे सबसिडी वाले गैस सिलेंडर खरीद सकते हैं। इसलिए सरकार ने ऐसे सिलेंडर की संख्‍या भी सीमित कर दी है। जब खाना खरीदने की ही औकात नहीं है तो सबसिडी पर सिलेंडर देने का क्‍या फायदा। और जो खरीद सकते हैं, उन्‍हें स‍बसिडी की जरूरत नहीं है।

मनुष्‍य में अधिकांश बीमारियों की जड़ मोटापा यानी अधिक खाना है। महंगाई बढ़ने से लोगों का अनाप-शनाप खाना कम हो जाएगा। वे जैसे-तैसे करके जीने लायक ही खा पाएंगे। इससे वे मोटापा का शिकार नहीं होंगे। और उनका स्‍वास्‍थ्‍य भी ठीक रहेगा। इसके बावजूद यदि कोई नासमझ मोटापा बढ़ा ले तो उसे दुरूस्‍त करने के लिए डीजल, पेट्रोल के दाम फिर बढ़ाए जाएंगे। इससे वह अधिक से अधिक पैदल चलेगा और स्‍वस्‍थ रहेगा। फिर भला उससे धनी कौन होगा। कहा भी गया है- हेल्‍थ इज वेल्‍थ।

नया साल मुबारक : अनुराग

हर तरफ लोग अपने-अपने अंदाज में नये साल का जश्‍न मना रहे हैं और शुभकामनाएं दे रहे हैं। मेरी ओर से भी मुबारकबाद-

सचिन का सौवां शतक लगे
मीडिया में क्रिकेट रहे
नया साल मुबारक !

सोना चालीस हजारी बने
सेंसेक्‍स भी नए कीर्तिमान गढे़
नया साल मुबारक !

गाडियाँ सस्‍ती बनें
अन्‍न के दाम बढें
नया साल मुबारक !

देश को रोबोट प्रधानमंत्री मिले
सत्‍ता के लिए नूरा कुश्‍ती चले
नया साल मुबारक !

भारत अमेरिका बने
बात-बात पर गोली चले
नया साल मुबारक !

किसान आत्‍महत्‍या करें
पूंजीपतियों को कर्ज में छूट मिले
नया साल मुबारक !

शेयर, रीयल स्‍टेट का कारोबार बढे़
टोपी पहनने से भ्रष्‍टाचार मिटे
नया साल मुबारक !

पेड न्‍यूज का चलन बढे़
शीला-चमेली का जादू चले
नया साल मुबारक !

आदिवासी विकास से दूर रहें
सन्‍नी लियोन खबर बने
नया साल मुबारक !

बीमारी के बहाने : अनुराग

देश के कर्णधार और जनता के भाग्‍यविधाता जेल की सलाखें देखते ही बीमार पड़ रहे हैं। कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। लेकिन बीमारी पर किसी का क्‍या वश-

अब यों तो कहने वाले कहते हैं कि बीमारी दुश्‍मन को भी न हो, परन्‍तु अब स्थिति बदल गई है। हर कोई अपने अन्‍दर बड़ी खतरनाक सी बीमारी होने का दावा कर रहा है।

वैसे देखा जाए तो बीमारी हमारी एक ऐसी दोस्‍त है जो ऐन मौके पर काम आकर मुसीबत से बचा लेती है। जब भी कोई झमेला हो और दुनिया जहान साथ छोड़ दे तब बीमारी ही मात्र सहारा है।

जबसे मैंने स्‍कूल जाना शुरू किया तब से लेकर अब तक खुद भी कितनी ही बार इसकी शरण में जा चुका हूँ। स्‍कूल के दिनों में होमवर्क पूरा न होने पर मार से बचने के लिये कह देता कि तबीयत ठीक नहीं है। मम्‍मी स्‍कूल नहीं भेजती। स्‍कूल में अध्‍यापक पूछते कि होमवर्क क्‍यों पूरा नहीं किया तो जवाब होता कि बीमार था। आज कर लूँगा। कॉलेज के दिनों में अपनी प्रिया को घुमाने के लिए घंटा गोल कर देता। यहाँ भी बीमारी ही साथ देती।

जैसे-तैसे पढ़ाई पूरी की। एक आफिस में नौकरी लग गई। प्रिया के साथ रोमांस चलता रहा। फिल्‍म देखने या घूमने का कार्यक्रम बनता तो मैं बीमार पड़ जाता, ‘‘सर, मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है। मुझे छुट्टी चाहिए।’’ मेरे लटके हुए चेहरे को देखकर बॉस के पास एप्लिकेशन पर हस्‍ताक्षर करने के सिवाय कोई और चारा नहीं रहता।

धीरे-धीरे घर वालों को हमारे प्रेम प्रसंग का पता चल गया। हमें अटूट बंधन में बांधने की तैयारी शुरू हो गई। मैंने पन्‍द्रह दिन की छुट्टी की अर्जी दी, परंतु मंजूर हुई दस दिन की। यहाँ भी मुझे बीमारी की शरण में जाना पड़ा। पन्‍द्रह दिन क्‍या, मैं पाँच दिन और छुट्टी काटकर आया। हम दोनों खूब घूमे। खूब मौज-मस्‍ती की। मैंने आते ही बीमारी का डॉक्‍टर का प्रमाण पत्र लाकर बॉस की मेज पर पटक दिया।

बीमारी के कारण ही जगह-जगह बडे़-बडे़ अस्‍पताल खुल रहे हैं। जिन्‍हें बनाने में लाखों मजदूर कार्य कर रहे हैं। अस्‍पताल में लाखों डॉक्‍टर, नर्स और अन्‍य कर्मचारी कार्यरत हैं। हजारों वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। बीमारी नहीं रहेगी तो करोड़ों लोग बर्बाद हो जाएंगे। नए-नए उपकरणों के अविष्‍कार एवं शोध कार्य के रूप में जो तकनीकी विकास हो रहा है, रुक जाएगा।

अरे, तुम सोच रहे हो कि बीमारी केवल गरीबों को सताती है। भई, बीमारी तो सबको समानता से देखती है। बीमारी के लिए न कोई नेता है न कोई जनता, न कोई ऊँच है न कोई नीच, जाति, धर्म का भी यहाँ जरा भी भेदभाव नहीं है। बीमारी समान रूप से सबका संकट मोचन करने के लिए तैयार है।

अब यदि देश के कर्णधार भी बीमारी का कवच पहन रहे हैं तो किसी को ऐतराज क्‍यों ! वे न्‍यायपालिका की पकड़ से या जेल जाने से बचने के लिए खुद को बीमार बता रहे हैं तो क्‍या बुरा कर रहे हैं ? और फिर बीमारी कब, किसको और कहाँ हो जाए, क्‍या कहा जा सकता है। इसलिए किन्‍तु–परन्‍तु के मायाजाल में मत फंसों, तुरन्‍त देश के कर्णधारों और जनता के भाग्‍यविधाताओं की सेवा में लग जाओ।

बस इतना ही। मेरा सिर दर्द हो रहा है…

 

कठमुल्लापन के खिलाफ जुनूनी जंग : अनुराग

जाने-माने कथाकार साजिद रशीद का 11 जुलाई, 2011 को असामयिक निधन हो गया है। श्रद्धांजलि स्‍वरूप उनके बारे में ले‍ख-

दादा ने जमींदारों के खिलाफ बगावत की और एक गरीब औरत के साथ बुरी हरकत करने पर दरोगा और सिपाहियों को पेड़ से बंधवाकर पीटा। पिता की शख्सियत भी दिलकश थी। वह छुआछूत को नहीं मानते थे। इन दोनों के प्रभाव से बना था साजिद  रशीद का चरित्र। उनकी लेखन के साथ-साथ कठमुल्लापन के खिलाफ जंग चलती रही।
साजिद रशीद का जन्म 11 मार्च 1955 को उत्तर प्रदेश के गांव सगडि़हवा (गोंडा) में हुआ। चचा अब्दुरसत्तार ने नवजात शिशु के कान में अजान दी। दादा मुंशी करामत अली सरपंच ने हलवाहे भगवती को पोते की पैदाइश के शगुन पर एक रुपया दिया और चीखकर कहा, ” हे सत्तार, नाम अब्दुर्ररशीद होगा। बंबई में मुहम्मद सिद्दीक के खबर भिजवाय दो।’’
बड़े भाई को तार से खबर देने के लिए सत्तार साइकिल से बीस किलोमीटर दूर उतरौला कस्बे के डाकघर गए और झुटपुटा होने पर हफ्ते भर का पान, घर का जरूरी सामान और असली घी से बनीं मिठाइयों के दोने लेकर आए। भरा-पूरा घर चचा-चची, फूफी, दादी और छह-सात बच्चे। इनमें साजिद का बड़ा भाई अब्दुल अजीज भी था।
भगवती हलवाहे जात के अहीर थे। वे घर के सदस्य की तरह थे। घर के सभी छोटे उन्हें भगवती बाबा कहते थे। छोटों को उनका आदर उसी तरह करना होता था, जिस तरह बाबा करामत अली का। होली में भगवती और उन जैसे हिंदू दोस्त करामत अली के सफेद कुर्ते पर खूब रंग लगाते। तीसरे पहर करामत अली नहाते और मस्जिद में असिर की नमाज पढऩे चले जाते।
करामत अली गडरहिया के जमींदार मलिक अब्दुर्रहमान के यहां सीरवार थे। खेती-बाड़ी बिरसे में मिली थी, लेकिन जमींदारों के लिए करामत अली उस धुनिया बिरादरी के दलित मुसलमान ही थे, जो अपने नाम के आगे सिद्दीकी, शेख और मंसूरी लगाते थे। मलिक बिरादरी ऊँचे कुल वाली ठहरी। इलाके के पठान उनके उमरा में शामिल थे। करामत अली छह फुटे लठैत थे। चार जमात तक पढ़े
थे। साक्षरता और जुर्रत ने उन्हें पिछड़ी बिरादरी में (जिनमें हिंदू भी शामिल थे) बेहद लोकप्रिय बना दिया था। आसामियों पर जमींदारों के बढ़ते जुल्म और जब्र के खिलाफ एक रोज उन्होंने आसमियों की तरफ से लगान देने से इनकार कर दिया और खलिहान की चौथाई में मजदूरों के साथ होने वाली बेईमानी पर लाठी उठा ली। उनकी एक लाठी क्या उठी, गरीबों की लाठियां भी कड़-कड़ा कर बज उठीं। पठानों ने जमींदारों के दस्तरखाने पर सिर्फ पराठे तोड़े थे, वे गुस्से में आए आसमियों से अपनी हड्डियां तुड़वाने को राजी नहीं थे।
उतरौला स्टेट में जमींदारों के खिलाफ पिछड़ी बिरादरी की पहली और सबसे कामयाब बगावत करामत अली की यह गद्दारी थी, जो जमींदारों के लिए नाकाबिले-बर्दाश्त थी। उन्होंने ‘बदजातों के देश’ में छोटों के हाथों जिल्लत उठाने पर, खुदा के बनाए मुल्क पाकिस्तान में जा बसने को तरजीह दी और अपनी जमीनों का सौदा पठानों और मलिकों से किया। लेकिन करामत अली ने लाठी और पांच भाइयों की जमा पूंजी की ताकत से जमीदारों से एक हजार बीघे जमीन झटक ली। ग्राम पंचायत का चुनाव हुआ तो करामत अली पिछड़ों के वोटों की ताकत से ‘सरपंच’ चुन लिए गए। यह बात अशरफ (सवर्ण) मुसलमानों को बहुत नागवार गुजरी थी।
सन् 1960 में जमींदारों के उजडऩे के बाद सरकार की जमींदारी कायम हो गई। इसका ताकतवर पुर्जा है पुलिस। सन् 1965-66 में करामत अली ने उतरौला पुलिस के एक जालिम दरोगा और उसके सिपाहियों को एक गरीब औरत के साथ
बदसलूकी करने पर पेड़ से बांधकर पिटवाया। पुलिस ने बदले की कार्रवाई में कई तरह की क्रिमिनल दफाओं के तहत पूरे करामत खानदान पर मुकदमा कर दिया। यहां तक कि सारे इटई रामपुर को डरा-धमका कर करामत अली के खेतों का पानी बंद करवा दिया। तब सारे पठान और मलिकों ने इकट्ठे होकर पुलिस और प्रशासन के साथ अपनी वफादारी का इजहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे वक्त भगवती और उन जैसे पिछड़ी जाति के किसानों-मजदूरों ने कसम खायी कि करामत अली के खेतों को अगर पानी न मिला तो हम अपने खून से सींचेंगे। करामत अली ने जमींदारों के बाद उतरौला थाने को भी लखनऊ सेशन कोर्ट में सात-आठ मुकदमेबाजी के बाद मात दे दी।
साजिद के पिता मुहम्मद सिद्दीक की शख्सियत अनोखी और दिलकश थी। वह 13 वर्ष की उम्र में घर से भाग गए थे। फकीरों के साथ घूमते रहते। लखनऊ, कानपुर, अलीगढ़, कलकत्ता में छोटे-मोटे काम किए। गर्ज कि पूरे हिंदुस्तान का चक्कर लगाया। अंत में मुंबई पहुंचे। मजबूत कद-काठी थी। बंबई में जीविका चलाने के लिए गुंडों की सोहबत में पड़ गए। जल्द ही उन्होंने जगह बना ली।

यह 1940 की बात है। उन दिनों फिल्मों के टिकट ब्लैक करने का धंधा जोरों पर था। उन्हें एक आदमी को सबक सिखाने के लिए भेजा गया। वह आदमी टिकटों के ब्लैक करने के धंधे का किंग था। मुहम्मद सिद्दीक ग्रांट रोड के मिनर्वा थियेटर गए और डंडे से वार कर दिया। इसी बीच किसी ने किंग को चाकू मार दिया। इलजाम सिद्दीक पर लगा। उन्होंने थाने में सारा किस्सा सुनाया। इंस्पैक्टर अंग्रेज था। उसने उन्हें बचा लिया।
उन्होंने इंस्पैक्टर से कहा कि वह अब इस धंधे में नहीं रहना चाहते। इज्जत की जिदंगी जीना चाहते हैं। इंस्पैक्टर ने अमेरिकन कंपनी ‘फायर स्टोन’ के जनरल मैनेजर के नाम पत्र लिख दिया। उनकी वहां नौकरी लग गई। वह मोल्ड डिपार्टमेंट में उबलते-पिघलते रबड़ को सांचे में डालकर मजबूत टायर बनाने लगे। वह ट्रेड यूनियन के सक्रिय सदस्य की हैसियत से कंपनी के मैनेजमेंट से टकराते रहे। एक दिन यूनियन के सेक्रेटरी भी हुए। वह सिर्फ दस्तखत करना जानते थे। अखबार पढ़वा कर सुनते थे। बीबीसी लंदन उनकी पसंदीदा न्यूज सर्विस थी।
तीन महीने की छोटी उम्र में साजिद ने अभी ठीक से चेहरों और रिश्तों को पहचाना भी न था कि मुहम्मद सिद्दीक ने उन्हें मुंबई बुला लिया। मुंबई के घर में जब उसने आंखें खोली तो घर के माहौल को तमाम भेदभाव से दूर मजहबी पाया। घर की दीवारों पर अल्लाह रसूल और कुरान की आयतों के तुगरों के बीच एक फोटो फ्रेम की हुई लटकी थी। साजिद को लगता कि तरहदार मूंछों और कमान जैसी भंवों वाले, जिसने तुर्की टोपी पहन रखी है, करामत बाबा के दादा जी होंगे। बहुत बाद में उसे पता चला कि वह उसके किसी रिश्तेदार की तस्वीर नहीं थी। वह तो तुर्की के शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क थे। कठमुल्लाओं के कातिल की हैसियत से उनकी शोहरत के बावजूद वह पूरी दुनिया के मुसलमानों
में यूरोप को नीचा दिखाने की वजह से प्रसिद्ध थे। उनकी तस्वीर उप-महाद्वीप के मुसलमानों ने घर-घर लगा रखी थी।
मुहम्मद सिद्दीक छुट्टियों में जब गांव जाते तो दलित हलवाहों को चारपाई पर अपने साथ बिठाते। उनके लोटे से पानी पी लेते। उनकी हथेली पर मली खैनी खा लेते। मार्क्‍स के छोटे-छोटे किताबचों के अध्ययन करने से बहुत पहले साजिद को अपने पिता की तर्जे-जिंदगी ने समानता और इंसानी दर्दमंदी का सबक पढ़ा दिया।
सभी चचा सत्तार से अकसर रात को हफीज जलांधरी की लंबी कविता ‘शाहनाम-ए-इस्लाम’ सुनते। रात को खाने-पीने के बाद सभी उन्हें घेर के बैठ जाते। वे लालटेन की रौशनी में बड़ी कुशलता से ‘शाहनाम-ए-इस्लाम’ पढ़ते और अकीदत से झूम उठते। उनमें भगवानदास काका भी शामिल होते।
मुंबई में साजिद की जिद पर अम्मा उसे रामायण सुनाती। वह जिस गांव की थीं, वहां ब्राह्मणों और अहीरों की बहुतायत थी। रामकथा के पाठ में वह अपनी मां के साथ शरीक होती थीं। इससे वह बहुत अच्छी किस्सा-गो बन गई थीं। वह कहानी इस तरह कहतीं कि खुशी में बच्चे हंसने लगते और दु:ख में रोते। वह जब सीता की अग्नि परीक्षा और उनके धरती में समा जाने का अध्याय सुनातीं तो साजिद रो पड़ता। वह राम को बुरा-भला कहने लगता। अम्मा समझाती, ”ऐसा नहीं कहते बेटे, राम जी भगवान थे और भगवान कभी गलती नहीं करते।’’
अम्मा से सुन-सुनकर साजिद को कहानियां पढऩे का चस्का लग गया। चौथी जमात से ही उसने कहानियां पढऩी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे उसे कहानी कहने का शौक हो गया। वह हमउम्र बच्चों को कहानियां सुनाता। चार-चार, पांच-पांच घंटे मनगढंत कहानियां सुनाता रहता। छठी में बच्चों की कहानियां लिखनी शुरू कर दीं। उसे अपना नाम कामन लगा। उसने सोचा कि अधिकतर मुस्लिम नामों के आगे अब्दुल या मोहम्मद होता है। इसलिए नाम बदलकर कर दिया- साजिद रशीद। साजिद का मतलब है सजदा करने वाला और रशीद का रास्ता दिखाने वाला।
उसके उर्दू के टीचर मौलाना अब्र्दुर रहमान परवाज इसलाही थे। उन्होंने साजिद का टेलेंट भांप लिया। उसे प्रोत्साहित किया। साजिद की कहानियां बच्चों की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। वह सातवीं में था। बिजनौर से बच्चों के लिए प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘गुंचा’ में उसका बाल उपन्यास छपा।
साजिद अपने पिता की अंगुली पकड़कर ट्रेड  यूनियन के दफ्तर और गेट मीटिंगों में कई बार गया। मजदूरों की एकता और अधिकार, बोनस-मैनेजमेंट, मस्जिदे अक्सा, किब्लए अव्वल, फिलस्तीन, अल्फतह, पाकिस्तान जैसे शब्द और नारे उसके कान में पड़ते।
मुहम्मद सिद्दीक मजहबी इंसान थे और साजिद रफ्ता-रफ्ता मजहब में दूर जा रहा था। उसे धार्मिक नैतिकता इंसानी नैतिकता से बहुत कमतर मालूम होने लगी। सांप्रदायिक सौहार्द के लिए शहीद होने वाले गांधी जी के नरकवासी होने की कोई वजह उसकी समझ में नहीं आती। किसी एक संप्रदाय से खुदा के अन्यायपूर्ण लगाव ने उसके कच्चे जहन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या खुदा ने कोई सियासी पार्टी बनाई हुई है, जिसके गलत कारकून को तो हुकूमत में हिस्सा मिलेगा, लेकिन जो मुखालिफ पार्टी में होगा, वह फिर चाहे जितना अच्छा समाज-सेवी हो उसे हुकूमत से बेदखल रखा जाएगा।
मुहम्मद सिद्दीक नमक आंदोलन में जेल गए थे। लेकिन उन्होंने आजादी के बाद कोई सुविधा नहीं ली। बंटवारे के बाद उन्होंने हिंदुस्तान ही की मिट्टी को अपनी कब्र के लिए चुना क्योंकि गांधी जी से कहीं अधिक उन्हें पंडित नेहरू महबूब थे। उनकी शक्लो-सूरत नेहरू से मिलती-जुलती थी। इसलिए वह खादी की सदरी, कुरता-पजामा और सफेद टोपी पहनते थे। यह टोपी उन्होंने अयोध्या में शिलान्यास के रोज उतार दी तो फिर मरते दम (अप्रैल 2000)  तक नहीं पहनी।
साजिद की जिंदगी उस दिन बदल गई, जब मुंबई में भायकला के छोटे से घर में तीसरे पहर मुहम्मद सिद्दीक को दिल का दौरा पड़ा। उस समय साजिद आठवीं जमात में था। कॉलेज जाने के लिए सिर्फ दो जोड़ी कपड़े थे। जेब खर्च उतना ही होता कि शर्मिदंगी से बचा जा सके। वह दोस्तों में अपनी जिंदादिली और दोस्तदारी की वजह से मकबूल था। अब घर की आर्थिक स्थिति और अपनी जेब की कैफियत को देखते हुए दोस्तों की महफिलों से फासला रखने लगा कि रिश्तों को जोडऩे वाली गोंद अमूमन रुपया ही साबित हुआ है। लेकिन साहित्य के कारण एस.सी.सी. तक ऐसी बहुत सारे हमदर्द दोस्त बन गए, जिनसे रिश्ता कायम करने के लिए किसी गोंद की जरूरत न थी। उसके ये हमदर्द दोस्त थे- प्रेमचंद, कृश्‍न चंदर, सआदत हमन मंटो, राजेंद्र सिंह बेदी, चेखव, मोपासां, दोस्तोवस्की और इब्ने सफी।
अहमद सेलर हाई स्कूल, नागपाड़ा में साजिद के साथ दाऊद और उसका भाई साबिर पढ़ते थे। आठवीं के बाद दाऊद ने क्राइम की दुनिया में कदम बढ़ा दिए।
साजिद के मुहल्ले में अरुण गवली रहता था। ऊपर से साजिद का तेज-तर्रार स्वभाव। पूरी संभावना थी कि वह भी अपराधी बन जाता, लेकिन साहित्य ने उसे सही राह दिखाई।
मुहम्मद सिद्दीक दिल के दौरे से बहुत डर गए थे। उन्होंने लंबी छुट्टी ले ली। वह कंपनी में सुपरवाइजर थे। ट्रेड यूनियन के लीडर थे। दो साल तक आधी तनख्वाह मिली। अम्मा सुघड़ गृहणी थीं। जैस-तैसे घर चलता रहा। साजिद के साथ पांचवी से अली हसन और अकबर कुरैशी पढ़ते थे। वे उसके घनिष्ठ मित्र थे जो उसका पूरा खयाल रखते।
दो साल बाद मुहम्मद सिद्दीक कंपनी से इस्तीफा देकर पत्नी के साथ गांव चले गए। साजिद फर्स्‍ट  ईयर में पढ़ रहा था। उसे बड़े भाई के पास छोड़ गए। बड़े भाई पिताजी की ही कंपनी में नौकरी करते थे।
साजिद को पहली कहानी 1972-73 में दिल्ली की पत्रिका ‘वाकयात’ में प्रकाशित हुई। उस पर मंटो की शैली का असर था। उसके फौरन बाद एजाज सिद्दीक ने मासिक ‘शायर’ में उनकी कहानी ‘जर्द चेहरों का ख्वाब’ प्रकाशित की।
साजिद रशीद इस कहानी के जरिए अदब में संजीदगी के साथ दाखिल हुए। साजिद ने इंटर, आर्ट से 1975-76  में की। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। तब तक वह साहित्य बहुत पढ़ चुके थे। उन्हें लगता कि टीचर जो पढ़ा रहा है, उससे अधिक वह जानते हैं। दिमाग में एक बात और बैठ गई कि बड़ा आदमी बनने के लिए पढऩा जरूरी नहीं। दूसरी तरफ भाई का दबाव था कि वह कुछ करें।
सन् 1975 का साल साजिद के शऊर का संगेमील साबित हुआ। इंदिरा गांधी की फासिस्ट हुकूमत के खिलाफ जयप्रकाश नारायण की तहरीक के जुलूस की आखिरी कतार में वह भी शामिल हो गए। लेकिन मोहम्मद सिद्दीक गांव में कांग्रेस से अकीदे की तरह वाबस्ता रहे। साजिद की इमरजेंसी की नीरस दोपहरें और सहमी शामें मिजगांव में उर्दू के वामपंथी शायर और आलोचक बाकर मेहदी के मकान में गुजरने लगीं। वहां नौजवान शायर याकूब राही और अफसाना निगार अनवर खां भी आते। चंदा करके शराब मंगवायी जाती। जब शाम के साये इंदिरा गांधी के राजनीतिक दमन की तरह सख्त और गहरे होने लगते तो ऐसे में खिड़की से कूद कर चे गुएवारा अपनी कैप संभालते हुए बाकर साहब की बगल में आ बैठते। उनकी कैप का सितारा बल्ब की रोशनी में लिश्कारे मारता। बाकर साहब अपनी मजबूत उंगलियों में फंसा क्यूबन सिगार निकालकर एक लंबा कश ले कर साजिद की तरफ बढ़ा देते। वह बड़ी अकीदत से सिगार को होटों से लगा कर उसके धुंए को फेफड़ों में खींच लेते।
बाकर मेहदी के इसरार पर चे गुएवारा बाकर साहब के गिलास से रम का घूंट लेते हुए बोलिविया के जंगलों की दास्तानें सुनाने लगते और साजिद बड़ी उत्सुकता से उनकी कलाइयों पर उन निशानों की तलाश करने लगते, जो सी.आई.ए. एजेंटों के जरिए उन्हें कत्ल करने के बाद उनकी हथेलियों को काट लेने की वजह से बन गए थे। साजिद बाकर मेहदी के मकान में नक्सलवादियों से भी गले मिले। एक रोज याकूब राही दरम्यान कद के एक गंजे सेहतमंद जिस्म वाले शख्स के साथ अचानक बाकर साहब के मकान पर आ धमके। उनके कमरे में दाखिल होते ही बाकर मेहदी ने दरवाजा बंद कर लिया। गंजे आदमी ने कालर वाले बंद गले के कोट में से सुर्ख जिल्दों वाली कुछ किताबें निकालकर साजिद की तरफ बढ़ा दीं। उन्होंने डर और ललक के मिले-जुले जज्बे से किताबों को ले लिया। इस तरह माओ और उनकी किताबों से साजिद की पहली मुलाकात हुई।
इमरजेंसी की मुखालफत ने उन्हें एक रूमानी किस्म के ऐडवेंचर में मुब्तिला कर रखा था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन पर रोज बहसें करते और बजाहिर न दिखायी देने वाली खुफिया पुलिस से आंख-मिचौली करते। इमरजेंसी के खिलाफ कहानियां लिखते। ‘नाखून, दांत और लहू रंग परचम’ साजिद की उन्हीं दिनों की कहानी है। यह कहानी 1976 में आलोचक अतीकुल्लाह ने ‘तनाजुर’ में प्रकाशित की। इसी दौरान उन्होंने इमरजेंसी के दमन के खिलाफ ‘रंगों में जमी बर्फ’ उपन्यास लिखा। इसके छपते ही गिरफ्तारी के डर से इटई रामपुर (जिला-गोंडा अब बलरामपुर) चले गए।
सरदार जाफरी साजिद रशीद के लिए बहुत मोहतरम थे, लेकिन वे इमरजेंसी के दिनों में इंदिरा गांधी की डिक्टेरशिप और इमरजेंसी की हिमायत में उठ खड़े हुए थे। जाफरी साहब भी कामरेड डांगे की तरह पंडित नेहरू के रूमानी सोशलिज्म के बंदी थे। साजिद का मानना है कि जाफरी साहब ने प्रगतिशील आंदोलन को एक साहित्यिक और सामाजिक आंदोलन से ज्यादा नेहरू खानदान का समर्थक बना दिया था। प्राइम मिनिस्टर हाउस के लॉन पर पंडित नेहरू के साथ नेहरूवियन सोशलिज्म की चाय पीते हुए कम्युनिस्टों ने अपने इंकलाब को चाय में शक्कर की तरह घोल कर पी लिया था। जाफरी साहब के अंदर के इंकलाबी ने हिंदुस्तान के सबसे बड़े साहित्यिक आंदोलन की ज्वाला और अपने बागियाना तेवर को नेहरू की शेरवानी में लगे गुलाब के साथ टांक दिया था। अपने आइडियज्म का यह पतन साजिद के लिए तकलीफ देह था।
इमरजेंसी के बाद 1980 में साजिद का पहल कहानी संग्रह ‘रेत घड़ी’ प्रकाशित हुआ। इसके पेश लफ्ज में उन्होंने लिखा-  लोग इतने दु:खी क्यों हैं ? महात्मा बुद्ध के इस दु:ख के पस मंजर में इंसानी दु:खों की दास्तान। सदियों पर छायी हुई है। शायद मेरा अपना दु:ख भी यही है! इस कहानी संग्रह को कोई खास शोहरत नहीं मिली। कहीं कोई समीक्षा नहीं छपी। केवल डाक्टर कमर रईस, असरार गांधी और अली अहमद फातमी ने इस संग्रह की चर्चा की और इसे महत्वपूर्ण कहानी संग्रह माना। साजिद की कहानियां ‘कहानी’, ‘नई कहानी’, ‘संचेतना’, ‘रविवार’ आदि पत्रिकाओं में छपने लगीं।
साजिद रशीद की पहली नौकरी 1977 में दैनिक ‘इंकलाब’ में पार्ट टाइम उपसंपादक की लगी। तनख्वाह 375 रुपए महीना। साजिद की शादी 1975 में पिता जी ने करा दी थी। उन्हें डर था कि तेज मिजाज और जिद्दी साजिद गुंडागर्दी न करने लगे।
साजिद की नौकरी लगने के बाद बड़े भाई ने अलग कर दिया। इससे उन्हें गहरा मानसिक आघात लगा। वह इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। तय हुआ कि भाई जो मकान लेंगे, आधे पैसे साजिद देंगे। भाई ने छब्बीस हजार में मकान लिया। साजिद ने तेरह हजार चुकाए। कभी-कभी स्थिति ऐसी हो जाती कि एक पाव दूध खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते।
साजिद सोशल वर्क भी करते। उसी मुहल्ले में अरुण गवली रहता था। उसने साजिद की चाल के गटर के पास शराब बेचनी शुरू कर दी। साजिद ने विरोध किया। उनके साथ पांच-छह लड़के और थे। इन सबका गैंग था। लीडर साजिद थे। उन्होंने कहा कि गटर में कूड़ा फेंकने चाल की बहू-बेटियां जाती हैं। इससे उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। अरुण गवली को मानना पड़ा।
मुहल्ले में कैरम क्लब खुल गए। इनकी आड़ में ब्राउन शुगर का धंधा होता। साजिद ने उस धंधे को बंद करवाना शुरू कर दिया। मारपीट हुई। लेकिन साजिद की टीम डटी रही। पुलिस की मदद से इन्होंने क्लब तुड़वा दिए। सब गुण्डे एकजुट हो गए। उन्होंने साजिद को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया।
सन् 1983 में जिस दिन भारत ने क्रिकेट वर्ल्‍ड कप जीता, उसी रात साजिद को धमकी मिली कि उस पर कातिलाना हमला होगा। धमकी देने वालों में एक ऐसा बदमाश था, जो हत्या के मामले में सजा काट चुका था। साजिद ने पुलिस से गुहार लगाई। पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। मजबूर होकर साजिद ने अरुण गवली के ब्रेन समझे जाने वाले बाबू रेशम से बात की। बाबू रेशम समझदार किस्म का गुण्डा था। उसने कहा, ”मैं आपको जानता हूं। आप जाओ मैं उसे देख लूंगा।’’ बाबू रेशम ने अपने गैंग के साथ गुण्डों पर अटैक कर दिया। दूसरे दिन गुण्डे छिपते रहे। उन्होंने साजिद को मैसेज भिजवाया कि वे पैर पकड़ते हैं। माफी मांगते हैं। इस तरह साजिद ने कैरम क्लब बंद करवाए।
अन्याय के साथ-साथ कठमुल्लापन के खिलाफ भी साजिद ने लड़ाई लड़ी। मामला
मुस्लिम समुदाय में तलाक  को लेकर था। साजिद का कहना था कि कुरान में लिखा है कि बीवी को एक बार तलाक कहने के बाद उस महिला के मासिक धर्म के बाद दूसरी बार और फिर इसी तरह से तीसरी बार ‘तलाक’ कहने पर ही तलाक होना चाहिए। लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में एक साथ तीन बार तलाक को मान्यता है। साजिद का कहना था कि कुरान में लिखा अहम है या किसी खलीफा का कहा। यह औरत को छोडऩे का आसान रास्ता अपना लिया है। साजिद ने ‘मुस्लिम फॉर सेकुलर डेमोक्रसी’ के माध्यम से कट्टरपंथियों के खिलाफ मुहिम छोड़ दी। वह उसके वाइस प्रेसीडेंट थे। प्रेसीडेंट जावेद अख्तर थे।
साजिद पर 14 अगस्त, 2004 को कातिलाना हमला हुआ। हमलावरों ने उनकी पीठ पर चाकू से वार किए। छत्तीस टांके आए। कुछ धर्मांधता को मानने वाले लेखकों ने कहा कि साजिद पर हमला सही हुआ है। यह धर्म का मामला है। साजिद के लिए टांके लगने से अधिक तकलीफदेह लेखकों का यह रवैया था। लेकिन लेखकों का बड़ा वर्ग साजिद के पक्ष में खड़ा था।

बाल साहि‍त्य पर हर माह लि‍खेंगे रमेश तैलंग

नई दि‍ल्ली : सुप्रसि‍द्ध साहि‍त्यकार रमेश तैलंग ‘लेखक मंच’ के लि‍ए हर महीने प्रकाशि‍त हुए बाल साहि‍त्य पर आलेख लि‍खेंगे। लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कि‍ वह बाल साहि‍त्य से संबंधि‍त नवीनतम प्रकाशि‍त अपनी पुस्तक की दो प्रति‍यां नि‍म्‍न पतों में से कि‍सी पर भी भि‍जवाने का अनुग्रह करें ताकि‍ उनका आवश्‍यकता अनुसार उपयोग कि‍या जा सके।
1. श्री रमेश तैलंग, ए-369 गणेश नगर नंबर-2, शकरपुर, दिल्ली -110092,
ईमेल : rameshtailang@yahoo.com
2. अनुराग, 433, नीति‍खंड- तृतीय, इन्‍दि‍रापुरम, गाजि‍याबाद-201014, उत्‍तर प्रदेश
ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

रुकना मेरा काम नहीं : अनुराग