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गुम चोट : रेखा चमोली

रेखा चमोली

 नीलिमा हतप्रभ है। उसे समझ नहीं आ रहा, यह सब क्या हो रहा है। सीमा के पिताजी, मनोज की दादी, पडो़स के दिनेश चाचा और बाकि सारे लोग क्यों उसकी माँ पर इतना गुस्सा हो रहे हैं।

उसकी माँ तो चुपचाप अपना काम कर रही थी। वह भी बडी मैडम से पूछकर। सारे बच्चे मैडम के साथ कक्षा में काम कर रहे थे। अचानक बाहर शोर होने पर जब मैडम बाहर देखने आयीं तो वे सब भी पीछे-पीछे बाहर आ गये। बाहर आकर देखा, उनके गाँव के खूब सारे लोग बडी़ जोर-जोर की आवाज में बातें कर रहे हैं। उनकी बातों में अपनी माँ का नाम सुनकर वह पहले चौंकी, फिर घबरा गयी। शोर सुनकर उसकी माँ भी रसोईघर से बाहर आ गयी। सबने माँ को घेर लिया। वे सब माँ से बहुत नाराज थे। नीलिमा ने माँ की ओर देखा। माँ के चेहरे पर डर देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये। पिछले कई दिनों से जो अन्जाना डर उसे महसूस हो रहा था, उसके चलते उसे आज कुछ बुरा होने की आशंका होने लगी। वह दरवाजे का कोना थामकर चुपचाप एकटक माँ को देखने लगी। बडी़ मैडम ने लोगों से आराम से बैठकर बात करने को कहा, पर वे फिर भी शोर मचाते रहे।

‘‘मैडम जी, मेरे नातियों ने दो दिन से स्कूल में खाना नहीं खाया।’’ मनोज की दादी ने बडी़ मैडम से कहा।

‘‘क्यों ? क्यों नहीं खाया उन्होंने खाना?’’ बडी़ मैडम ने पूछा।

‘‘आपने जो नयी भोजनमाता लगायी है, उस कारण।’’

‘‘नयी भोजनमाता ने क्या खाना अच्छा नहीं बनाया या साफ-सफाई से नहीं बनाया।’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम तो सब समझती हो। यहाँ ये बच्चे इसके हाथ का बना खाना खाएँगे और घर आकर हमारे साथ खाना खाएँगे तो हमारा धर्मभ्रष्ट होगा कि नहीं। हम तो इन बच्चों का जूठा भी खाते हैं।’’ गोलू के दादाजी आगे आकर बोले, ‘‘हम जानते हैं, तुमने तो अपनी ड्यूटी निभानी ही थी, पर इन लोगों को तो विवेक होना चाहिये कि नहीं?’’

‘‘ये आप किस जमाने की बात कर रहे हैं?’’ नीरा मैडम बोलीं।

‘‘हम इसी जमाने की बात कर रहे हैं, मैडम जी। आप अभी के अभी नीलिमा की माँ को स्कूल से बाहर करो वरना ठीक नहीं होगा।’’ सीमा के पिताजी ने गुस्से से कहा।

‘‘हमने तो इसके घरवाले को पहले ही समझाने की कोशिश की थी, पर वो माना ही नहीं।’’पीछे से एक आवाज आयी।

बडी़ मैडम बार-बार आराम से बैठकर बात करने को कह रही थीं, पर लोग उनकी बात सुनने को राजी ही नहीं हो रहे थे। इतने में कुछ लोगों ने रसोई में जाकर खाना गिरा दिया और बाकि सामान भी इधर -उधर फेंक दिया। मनोज की दादी ने नीलिमा की माँ को रसोई के पास से खींचकर बाहर निकाला और जोर से धक्का दिया, जिससे वह नीचे गिर पडी़। नीलिमा दौड़कर माँ के पास गयी, तो मनोज की दादी ने ‘पीछे हट छोकडी़’ कहकर उसे दूर धकेल दिया।

नीलिमा रोने लगी। उसका छोटा भाई भी उसके पास आकर रोने लगा। मैडम और बाकि सारे लोगों की बातें सुनकर नीलिमा को ध्यान आया कि पिछले दो दिनों से उसकी माँ दूसरी भोजनमाता के साथ मिलकर स्कूल का खाना बना रही थी और पिछले दो दिनों से ही कुछ बच्चे स्कूल में खाना नहीं खा रहे थे। उन्हें मैडम ने डाँटा, जबरदस्ती खाना खाने बिठाया, लेकिन उन्होंने भूख नहीं है या मन नहीं कर रहा, कहकर खाना खाने से मना कर दिया। इस पर मैडम ने कहा कि कुछ दिनों में सब फिर से खाना खाने लगेंगे।

इन्होंने तो सारा खाना गिरा दिया। अब कहाँ से खाएँगे बच्चे खाना, नीलिमा सोचने लगी। अभी दो दिन पहले तक तो सब ठीक चल रहा था। उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को सुबह जगाती, उनका हाथ मुँह धुलाती, स्कूल के लिए तैयार करती और दोनों भाई-बहन चल पड़ते स्कूल की तरफ। जिस दिन माँ को जंगल या खेतों में काम करने जल्दी जाना होता, उस दिन उसके पिता या दादी उन्हें तैयार करते। कभी-कभी जब सब लोग जल्दी काम पर चले जाते तो पडो़स की दादी या बुआ उन्हें आवाज देकर जगाते। उस दिन नीलिमा खुद को ज्यादा जिम्मेदार महसूस करती। वह छोटे भाई को जगाती, उसका नित्यक्रम करवाकर, हाथ-मुँह धुलवाकर तैयार करती। माँ की रखी रोटी और गुड टोकरी में से निकालकर खुद भी खाती, भाई को भी खिलाती। अगर स्कूल के लिए देर हो रही होती तो गुड को रोटी के अन्दर रखकर भाई के हाथ में दे देती, जिसे वह रास्ते में खाते-खाते जाता। कभी-कभी उसका भाई उठने में बहुत नखरे दिखाता, तब उसका मन करता कि उसे दो थप्पड लगा दे, पर थप्पड लगाने से वह रोने लगता और बहुत देर में चुप होता। इसलिए वह उसे कोई-न-कोई बहाना बनाकर उठाती। रास्ते में उन्हें और भी बच्चे मिलते। सारे बच्चे गपियाते, बतियाते, धकियाते, मस्ती करते स्कूल की तरफ चल पड़ते। स्कूल पहुँचकर स्कूल की सफाई करते, प्रार्थना करते, कविता-कहानी कहते-सुनते, कक्षा में काम करते। मध्यान्तर होने पर सारे बच्चे आँगन में लाइन बनाकर बैठते। भोजनमाता राहुल की माँ सबको बारी-बारी से दाल-भात परोसती। सारे बच्चे खाना खाते, अपनी-अपनी थाली धोते और खेलते। शुरू-शुरू में कुछ बच्चे अपनी थाली उठाकर बाकि बच्चों से दूर जाकर बैठते थे। कुछ बच्चे रसोई में ही खाना खाते थे। नीरा मैडम ने सारे बच्चों को एक साथ बिठाकर भोजनमाता को खाना परोसने को कहा, तबसे सारे बच्चे एक साथ बैठकर ही खाना खाते हैं। उसने कई बार नीरा मैडम को यह कहते हुए सुना कि ‘यह सब स्कूल में नही चलेगा। दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गई और हम इन्हीं सब बातों में उलझे पडे़ हैं।’

कुछ दिनों पहले स्कूल में सारे अभिभावकों की एक बैठक हुई थी, जिसमें नीलिमा के पिताजी भी आए थे। उन्होंने घर आकर बताया कि स्कूल में एक और भोजनमाता की नियुक्‍त‍ि होने वाली है और नियमानुसार वह भोजनमाता अनुसूचित जाति की व बीपीएल कार्ड वाली ही होनी चाहिए। उन्होंने कल ही नीलिमा की माँ की अर्जी देने की बात घर में कही।

‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया। कैसे बनाएगी तेरी बुवारी(बहू) स्कूल में खाना। उसका बनाया खाना बामनों और ठाकुरों के बच्चे कैसे खाएँगे?’’ दादा जी ने कहा।

‘‘खाएँगे कैसे नहीं। मेरी बुवारी को क्या खाना बनाना नहीं आता? वैसे भी उसे कौन सा अकेले खाना बनाना है। जोशी भाभी जी तो हैं ही वहाँ।’’

‘‘फालतू बात मत कर बेटा, शादी-ब्याह में तो तेरी बुवारी जाती नहीं खाना खाने कि वहाँ उसे सबसे बाद में खाना खाना पड़ता है। वो भी कोई दूसरा किनारे पर लाकर दे, तब। दाल-भात, हलवा-पूरी सब एक साथ मिलकर ‘कल्च्वाडी’ बन जाता है। अभी भी तेरी माँ ही जाती है, शादी-ब्याह में खाना लेने। तेरी बुवारी तो कहती है कि वैसे खाने से तो भूखा रहना ही ठीक है।’’

‘‘पिताजी, घर गाँव की बात और है, स्कूल में ऐसा कुछ नहीं होगा। सरकार चाहती है कि स्कूल में छोटा-बडा़, जात-पात का भेदभाव न रहे। बच्चों के मन में किसी तरह की हीनभावना न रहे, जिससे कि आने वाले समय में हमारे समाज से ये कुप्रथाएँ हमेशा के लिए खत्म हो जाएँ। इसलिए सरकार ने यह नियम निकाला है कि भोजनमाता अनुसूचित जाति की भी होनी चाहिए।’’

‘‘सरकार के चाहने से कुछ नहीं होता, बेटा। सरकार के चाहने से मदनू का बाप प्रधान बन गया तो बता, गाँव के कितने लोगों ने खाना खा लिया, उसके घर पर। अरे चार लोग उसके साथ बाहर कहीं चाय भी पीते हैं, तो अपना गिलास पहले ही अलग कर लेते हैं। बेटा क्यों पड़ रहा है इस चक्कर में, क्‍यों बैर ले रहा है सबसे, नी खाने देगा दो रोटी चैन से इस गाँव में।’’

‘‘पिताजी, क्या तुम यह चाहते हो कि जो दुर्व्‍यवहार  तुम्हारे-मेरे साथ हुआ, वो हमारे बच्चों के साथ भी हो। तुम भूल सकते हो, पर मैं वो दुत्कारना, हमारे साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करना, हमें अपना जडखरीद गुलाम समझना, वो सब नहीं भूल सकता। हम सब सहन करते रहे तो क्या हमारे बच्चे भी करेंगे, नहीं बिल्कुल नहीं। मैं मर जाऊॅगा, पर अर्जी वापस नहीं लूँगा।’’

‘‘लेकिन बेटा।’’

‘‘पिताजी! तुम चुप रहो, मैंने जो सोच लिया वो सोच लिया। किसी-न-किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी। देख लेंगे, जो होगा।’’

उसके पिता, दादाजी, दादी, चाचा, माँ सब देर तक जाने क्या-क्या बातें करते रहे। नीलिमा दादी की गोद में लेटे-लेटे सुनती रही। उसे भी ध्यान आया, पिछली बार जब वह दीपिका की बुआ की शादी में गयी थी, तो गुलाबजामुन देने वाले रविन्दर ने कैसे उसे डाँटा था और बाद में आने को कहा था। लेकिन जब सूरज और निशा ने गुलाबजामुन माँगें थे तो उन्हें कुछ भी नहीं कहा और गुलाबजामुन दे दिए थे। स्कूल में भी जब भोजनमाता बच्चों से पानी मॅगवाती तो उसे मना कर देती और डाँट देती। और उस दिन, जब पकड़न पकडा़ई खेलते-खेलते वह गरिमा के पीछे दौड़ते हुए उसकी रसोई तक पहुँच गयी थी, तो उसकी दादी ने उसको गाली देते हुए कैसे बाहर भेजा था। वह समझ नहीं पाती कि ऐसा उसी के साथ क्यों होता है, स्कूल में तो वह सारे बच्चों के साथ खेलती, पर घर आकर वे ही बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ खेलने लगते और उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। जब उनकी तरफ वाले नल पर पानी बन्द हो जाता तो वह बडे़ धारे पर पानी भरने जाती। वहाँ या तो उसकी बारी सबसे बाद में आती या फिर कोई महिला किनारे पर ही अपने बर्तन से उसका बर्तन भरकर उसे जाने को कहती। जबकि उसका मन पानी की मोटी धारा के नीचे भीगने, पानी पीने का हो रहा होता। कभी-कभी जब धारे पर कोई न होता, वह देर तक पानी से खेलती, हाथ-मुँह धोती, धारे के नरसिंह वाले मुँह पर प्यार से हाथ फेरती, इधर-उधर देखकर पता लगाना चाहती कि धारे के अंदर इतना पानी आता कहाँ से है। ऐसे में अगर ऊपर मोहल्ले से कोई पानी भरने आ जाता तो वह जल्दी से पानी भरकर लौट आती। पीछे से उसे सुनाई पड़ता, ‘‘सारा धारा गन्दा कर दिया।’’ वह जानती थी कि‍ वह आदमी पहले धारा खूब धोएगा फिर पानी भरेगा। वह सोचती- मैंने धारा कैसे गन्दा कर दिया। जब धारे के नीचे कपडे़ धोते हैं, नहाते हैं, बर्तन धोते हैं, तब तो धारा गन्दा नहीं होता! उसकी माँ तो कपडे़ धोने गधेरे पर ले जाती है। माँ कपडे़ धोती है और वह अपने भाई के साथ उन्हें पत्थरों पर सुखाने डालती है। बडा़ मजा आता है। गर्मियों में उनकी माँ उन्हें वहाँ नहला भी देती है।

कभी-कभी वह अपने भाई को लेकर ऊपर वाले मुहल्ले में खेलने जाती तो उसे वहाँ कोई-न-कोई ऐसा जरूर मिल जाता, जो बिना बात उनको वहाँ से डाँट कर भगा देता। वह घर आकर अपने पिता से उसकी शिकायत करती तो वह हँसकर उसकी बात टाल देते, पर वह देखती कि हँसने के बावजूद उसके पिता के चेहरे पर अजीब सा भाव आ जाता। उसके पिता दसवीं फेल थे और खच्चर चलाते हैं। उनकी बडी़ इच्छा है कि वह और उसका भाई खूब पढ़ें-लिखें और बडा़ आदमी बनें। वह कक्षा तीन में पढ़ती है और उसका भाई एक में। वह खूब मन लगाकर पढ़ती है। उसकी दोनों मैडम उससे बहुत प्यार करती हैं। जब भी स्कूल में कोई आता है, तो उसका नाम लेकर कुछ-न-कुछ बात जरूर करती हैं। उसे यह सब बडा़ अच्छा लगता है। उसे नीरा मैडम बहुत अच्छी लगती है। वह सारे बच्चों से प्यार से बात करती हैं। उनके साथ खेलती हैं और कभी-कभी उन्हें स्कूल के आसपास घूमाने भी लेकर जाती हैं। उसने सोचा है कि‍ वह भी बडी़ होकर मैडम बनेगी।

दूसरे दिन उसके पिता स्कूल में अर्जी दे आए। उसके बाद उनके घर में अक्सर उसके दादाजी और पिता में बहस होने लगी। उसके दादाजी बार-बार उसके पिता से अर्जी वापस लेने के लिए कहते, पर उसके पिता ने तो जैसे इस मामले में दादाजी की बात न मानने की कसम ही खा रखी थी। नीलिमा को अपने घर में छिडी़ इस बहस से इतना ही लेना-देना था कि खाना खाते समय अनचाहे ही उसे यह सब सुनना पड़ता था। एक बार उसने अपनी माँ से पूछा भी कि दादाजी उसको भोजनमाता क्यों नहीं बनना देना चाहते तो माँ ने ‘तेरे मतलब की बात नहीं है’ कहकर डपट दिया था। इसी तरह की बहस स्कूल में बडी़ मैडम और नीरा मैडम के बीच भी होती रहती। नीलिमा का ध्यान अपने आप इस बहस की तरफ चला जाता क्योंकि बहस के बीच में उसकी माँ को लेकर भी बातें होतीं। बडी़ मैडम नहीं चाहती थीं कि उसकी माँ भोजनमाता बने। इस पर नीरा मैडम कहती, ‘‘नियमानुसार जो ठीक है, वो ही होना चाहिए। हम जैसे पढे़-लिखे लोग सामाजिक कुरीतियों से नहीं लडे़ंगे, तो कौन लडे़गा।’’ बीच-बीच में और लोग भी स्कूल में आकर भोजनमाता बनने की बात करते। जब स्कूल में साहब आए तो बडी़ मैडम ने उनसे कहा, ‘‘आपने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया। मैं किस-किस को समझाऊँ।’’

‘‘मैडम, हम क्या करें। नौकरी करनी है तो सरकारी आदेशों का पालन करना ही होगा। वैसे भी आपके स्कूल में अनुसूचित जाति के बच्चे बहुत ज्यादा हैं।’’ साहब ने कहा था।

नीलि‍मा को पता था कि‍ वह और उसका भाई भी अनुसूचित जाति के बच्चे हैं क्योंकि उन्हें छात्रवृत्ति मिलती है। एक बार गरिमा ने पंचगारे खेलते हुए जल्दी आउट होने पर उसे गाली भी दी थी, ‘‘तुम्हें तो छात्रवृत्ति भी मिलती है। फिर भी तुम गरीब हो! भिखमंगे कहीं के!’’ उसकी क्या गलती, अगर गरिमा को छात्रवृत्ति नहीं मिलती तो। वो भी बन जाए अनुसूचित जाति की। उसके पिताजी तो कागज बना कर लाए थे। मैडम को दिया था। ये अनुसूचित जाति क्या होता है, हम क्यों हैं अनुसूचित जाति के, सारे बच्चे अनुसूचित जाति के क्यों नहीं हैं, फिर सबको छात्रवृत्ति मिलती, गरिमा भी मुझसे नाराज नहीं होती। वह जाने क्या-क्या सोचती। जब माँ से कुछ पूछती तो माँ कहती, बडी़ होकर समझ जाएगी। उसे अपने बडे़ होने का इन्तजार होता।

कुछ भी हो नीलिमा और उसका भाई दोनों बहुत खुश थे। अब उनकी माँ भी रोज उनके स्कूल आएगी। जब वह स्कूल में उनको खाना देगी तो क्या के शर्माएँगे। दोनों भाई-बहन जाने क्या-क्या सोचते। नीलिमा सोचती- अगर उनको स्कूल में कोई बच्चा तंग करेगा तो वह उसकी शिकायत अपनी माँ से कर देगी। राहुल कितनी तडी मारता है, अपनी माँ की और उसकी माँ सब बच्चों को डाँटती रहती है। जैसे कि हमारी मैडम होगी हुँअ।

नीलिमा की माँ उठो! लो पानी पी लो। नीरा मैडम की आवाज से उसका ध्यान टूटा। नीरा मैडम उसकी माँ को उठाती हैं। उसकी माँ के नाक से खून निकल रहा है, जिसको वह अपने धोती के पल्लू से साफ करने की कोशिश कर रही है। रसोई घर के बाहर दाल-भात गिरा पडा़ है। बच्चों की थालियाँ इधर-उधर बिखरी हैं। नीलिमा अपनी माँ के पास जाना चाहती है, पर जा नहीं पा रही। उसका भाई उससे चिपक कर खडा़ रो रहा है। अचानक नीलिमा ने अपने भाई का हाथ पकडा़, अपना व उसका बस्ता उठाया और दौड़ पडी़ अपने घर की ओर। वह जल्द से जल्द अपने पिता के पास पहुँच जाना चाहती थी।

आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

‘स्कूल’ का नाम लेते ही हम सबके दिल-दिमाग में स्कूल की एक परम्परागत छवि उभरती है जिसमें एक भवन है, शि‍क्षक और शि‍क्षिकाएं हैं, घण्टी है, एक पूर्व निर्धारित कार्य योजना यानी समय सारिणी है, समय सारिणी से संचालित कुछ नीरस जड़ कक्षाएं हैं, और कक्षाओं में हैं डरे सहमे बच्चे। बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं, उनके मन में स्कूल आने की न तो ललक है और न ही उत्साह। उनके फीके चेहरे और स्वप्नहीन सूखी आंखों में उदासी और भय पसरा है। बच्चे जो समाज का भविष्य हैं, लेकिन जिनमें सीखने का आनन्द मर चुका है। क्या नहीं लगता है कि वे बच्चे जिनके कंधों पर परिवार और समाज की एक बड़ी जिम्मेवारी आने वाली है, वे मजबूत, कुशल और अन्दर से कुछ सीख पाने के आनन्द के भाव से भरे-भरे हों।

लेकिन नैराश्‍य की इस स्कूली मरुभूमि में कुछ स्कूल मरूद्यान की भांति जीवन की आस जगाने वाले भी हैं। जहां बचपन कलरव करता है। जहां बच्चों में प्रवाहमान ऊर्जा कुछ नया रचने को आतुर है, जहां कबाड़ में भी कला एवं सृजन के नव आयाम दिखाई पड़ते हैं। जहां कल्पना को विकसित करने को विस्तृत फलक उपलब्ध है और आजादी भी। तो आइए मिलते है दो ऐसे ही स्कूलों से जहां न कोई घण्टी है न कोई समय सारिणी। और हां, कक्षाएं भी नहीं हैं। पहले स्कूल का नाम है- ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल‘ भोपाल। प्रश्‍न उठता है कि आखिर यह कैसा स्कूल है और इसके पीछे क्या उद्देश्‍य रहे होंगे और परम्परागत स्कूलों से यह किन मायनों में अलग हैं।

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल भोपाल।

स्कूल के अकादमिक समन्वयक, अनिल सिंह जानकारी देते हैं, ‘‘शैक्षिक क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था ‘एकलव्य’ में काम करने वाले तीन व्यक्ति प्रमोद मैथिल, राजेष खिंदरी और टुलटुल बिश्‍वास एक ऐसे स्कूल का सपना देख रहे थे, जहां शि‍क्षक और छात्र एक धरातल पर खड़े होकर एक साथ सीखने-सिखाने की यात्रा आरम्भ करें, न कोई आगे न कोई पीछे, सब साथ-साथ बढ़ें, कदम-दर-कदम। जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी बात रखने की पूरी आजादी हो और सवाल उठाने का अधिकार भी। जहां हाथ में हुनर हो और मन में कुछ नया सीख पाने का आत्मविश्‍वास भी। तो तीनों ने मार्च 2012 में 6 बच्चों के साथ ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल’ की शुरुआत की।’’

किराये के भवन में संचालित आनन्द निकेतन स्कूल के एक पूरे दिन की गतिविधियां बच्चों को न केवल रिझाती हैं, बल्कि स्वतः सृजन की ओर उन्मुख भी करती हैं। सुबह का पहला सत्र आरम्भ होता हैं दौड़ भाग और कुछ एक्सरसाईज करने से। लेकिन वहां न तो कोई सीटी होती है न कोई निर्देश, और न पहले से तय कोई टीचर। बस बच्चे अपने मन से जो समझते हैं, उसे करते रहते हैं और एक-दूसरे को देखकर एक क्रम बना लेते हैं। सुबह नौ से पौने दस के बीच स्कूल का छोटा मैदान रंगबिरंगी तितलियों से सज जाता है, क्योंकि बच्चों की कोई यूनीफार्म तय नहीं है और विभिन्न रंगबिरंगी पोषाकों में बच्चे तितलियां और फूल ही तो हैं। सूरज की बढ़ती चमक के साथ ही शुरू होता है ‘मार्निंग गैदरिंग’ के रूप में दिन का संगीतमय, रोचक और मस्ती भरा दूसरा सत्र। इसे हम प्रार्थना सत्र भी कह सकते हैं पर यह परम्परागत स्कूली प्रार्थना सत्र से बिल्कुल अलग और ताजगी भरा है। यहां सब बच्चे मिलकर हर्ष-उल्लास और हास-परिहास के साथ विविध भावों एवं रस से ओतप्रोत गीत गाते हैं। ये गीत हिन्दी सहित विविध भारतीय भाषाओं-बोलियों यथा पहाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, भोजपुरी, बांग्ला, झारखण्डी, तमिल और अंग्रेजी में हैं, जिन्हे बच्चों ने शि‍क्षकों के साथ मिलकर खुद चुना है। इनसे बच्चे न केवल विविध भाषाओं के सौन्दर्य से परिचित होते हैं, साथ ही अपने अनुभव को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन गीतों में जीवन के विविध पक्षों के चटकीले रंग समाहित हैं। प्रकृति से अनुराग एवं सह अस्तित्व है। नदी, पर्वत, धरती, जंगल, पक्षियों से संवाद है। मित्रता है, सबके लिए न्याय है और समानता व समरसता के उदात्त भाव भी। गीतों की सुरीली तान, लय, ताल, स्वरों का आरोह-अवरोह और ढपली एवं ढोलक की थाप। बस मन बंध सा जाता है और एक ऐसे विश्‍व की कल्पना में खो जाता है जहां आनन्द है बस अनिर्वचनीय आनन्द।

आनन्द निकतन डेमोक्रेटिक स्कूल का अगला सत्र ‘पोडियम’ कहलाता है, बच्चों की अपनी बातचीत करने और पिछले दिन के कामों की समीक्षा का सत्र। यह स्कूल की अद्भुत और महत्वपूर्ण गतिविधि है। पिछले दिन स्कूल में क्या कुछ घटित हुआ, कौन सी कहानी-कविता सुनी, कहां गये, क्या चित्रकारी की और उसमें कौन से रंग भरे। कैसा लगा, कौन-सी गतिविधि मजेदार थी और कौन-सी बोरिंग। घर और स्कूल दोनों जगह के अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति यहां देखी जा सकती है। यहां बच्चे लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन का सुमधुर परिवेश बनाते एवं जीते हुए दिखाई देते हैं। अपनी बात कहने और दूसरों की बातें धैर्य से सुनने एवं महत्व देने का पाठ अनायास सीख जाते हैं। स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं हैं, बल्कि उम्र वर्ग के समूह हैं। 3 से 4 वर्ष, 4 से 5 वर्ष, 6 से 8 वर्ष, 8 से 10 वर्ष, और 10 से 12 वर्ष के बच्चों के अलग-अलग पांच समूह है, जिन्हें क्रमश: बटरफ्लाई, बडर्स, स्क्वैरल, पीकॉक और डीयर नाम से जाना जाता है। यह नाम बच्चों ने अपने लिए खुद चुने हैं। बच्चे अपने समूहों में ही पोडियम की गतिविधि करते हैं, जिसमें उनके साथ एक फैसिलिटेटर होता है। फैसिलिटेटर बच्चों की अभिव्यक्ति को पोडियम रजिस्टर में अक्षरश: उनके कहे अनुसार ही दर्ज करता जाता है। बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति का यह मंच स्कूल की ताकत और पहचान है। बच्चों में इससे न केवल अपनी बात रखने का तरीका आया है, बल्कि कहने में निर्भीकता, स्पष्टता और तार्किकता भी बढ़ी है। फैसलिटेटर को भी पिछले दिन की कक्षाओं में की गई गतिविधियों का आभास मिलता है। इस गतिविधि‍ में नित नए प्रयोग होते रहे हैं। शुक्रवार के दिन बड़े बच्चों के लिए स्कूल द्वारा दिए गए या खुद से चुने विषय पर तैयारी करके बोलने की शुरुआत हुई है, इसे बच्चों ने ही आकार दिया है। इसके अतिरिक्त लिखने-पढ़ने की दक्षता वाले बच्चे पिछले दिन का विवरण अपने पोडियम रजिस्टर में लिख कर लाते और पढ़कर सुनाते हैं। पोडियम के लिए बच्चों में उत्सुकता, गंभीरता और उतावलापन बताता है कि यह उनके लिए कितना खास और रुचिपूर्ण सत्र होता है।

पोडियम सत्र के बाद बच्चे नाश्‍ता करने हेतु कुछ देर का अवकाश लेते हैं। फिर प्रारम्भ होता है ‘डे प्लानिंग’ यानी अपने समूहों में दिनभर की योजना बनाने का सत्र। बच्चों की शत-प्रतिशत भागीदारी, आपसी संवाद, नोक-झोक एवं सामान्य तरीके से व्यक्ति और संसाधन की उपलब्धता, सबकी सहमति और सुविधा, व्यावहारिकता, निरंतरता, जरूरत और उपयोगिता के आधार पर बच्चे दिनभर की गतिविधियों की योजना और क्रम तय करते हैं। इससे बच्चों में जहां खुद निर्णय लेने और उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का भाव आता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी रुचि, पसंद और जरूरत को भी जगह दे रहे होते हैं। यहां किए गए निर्णयों में अहम नहीं टकराते, बल्कि सामूहिक निर्णय करने एवं उदारमन से स्वीकारने का संस्कार जन्मता है।

अब बच्चे अपनी तय कार्य योजना के अनुसार विभिन्न अकादमिक कक्षों में जाते हैं, जहां पहले से ही फैसलिटेटर अपनी तैयारी के साथ मौजूद होते हैं। इन अकादमिक कक्षों में विषय की प्रकृति के अनुकूल रिसोर्स मैटेरियल, बच्चों के काम का डिस्प्ले मैटेरियल और दूसरी सहायक शि‍क्षण की सामग्री होती है, जो बच्चों को विषय से सहजता से जोड़ती है। ये कक्ष भी अनूठे हैं, लैंग्वेज एण्ड इन्क्वैरी रूम,  आर्ट एण्ड एस्थेटिक रूम, सेंस ऑफ हिस्ट्री एण्ड सोसाइटी रूम, चाइल्ड साईंटिस्ट रूम और रूम फार न्यूमरेसी एण्ड लाजिक। औपचारिक स्कूली ढांचे में बच्चों की रूढ़ कक्षाएं होती हैं, जिनमें बच्चे सुबह से शाम तक एक ही कक्ष में बैठे रहते हैं और शि‍क्षक आते-जाते रहते हैं। इसके उलट आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल में फैसिलिटेटर अकादमिक कक्ष में होते हैं और बच्चे अपनी योजना के अनुसार उस क्रम से अकादमिक कक्षों में जाते हैं। इससे जहां एक तरफ तो फैसिलिटेटर को अपने कक्ष में तैयारी करने का अवसर मिलता है और वह अपने कक्षों को लगातार बेहतर बना रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को एक अकादमिक कक्ष से निकलकर दूसरे अकादमिक कक्ष में जाने का अवसर मिलता है। वह उन्हें एक विषय की प्रकृति के प्रभाव से निकलकर दूसरे में जाने की सुगमता देता है। कक्ष बदलने से नए अकादमिक कक्ष का वातावरण उस विषय के साथ जीवंत जुड़ाव बनाने में मददगार होता है।

तत्पश्‍चात आधे घंटे के लंच ब्रेक में सभी बच्चे और शि‍क्षक एक साथ बैठकर अपने-अपने टिफिन साझा करते हैं और इस तरह संगत व साथ खाने का मजा लेते हैं। सब्जियों, अचारों, रोटी, पूडी, पराठों का आदान-प्रदान इस सत्र को खास बनाता है। लंच के बाद बच्चे अपनी तय की हुई योजना के अनुसार अकादमिक कक्षों में जाते हैं और अंतिम सत्र में खेलकूद होता है। इसमें शि‍क्षक भी बच्चों के साथ खेलते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों बच्चों के साथ कबड्डी खेलते हुए अनिल जी के बायें हाथ में चोट लगी थी। पर पूरी तन्मयता एवं जिजीविषा के साथ खेलना जारी था, क्योंकि चोटें खेलों का एक हिस्सा ही तो हैं।

स्कूल प्रायः 9 बजे प्रारम्भ होता है और 3 बजे छुट्टी हो जाती है। जरूरत के अनुसार बच्चे 5 बजे तक भी स्कूल में रह सकते हैं और अभिभावक उन्हें सुविधानुसार स्कूल से ले जाते हैं। साढ़े 3 से साढे़ 4 बजे तक फैसिलिटेटर अपनी शेयरिंग मीटिंग में एक-एक बच्चे की भागीदारी और उसकी लर्निंग पर बारीकी से बातें करते हैं। इस मीटिंग में हर फैसिलिटेटर को हर कक्षा के बारे में और हर बच्चे के बारे में जानकारी हो रही होती है। फैसलिटेटर एक दूसरे को फीडबैक और सुझाव भी देते हैं। शनिवार का दिन बड़े बच्चों के लिए स्वतंत्र रूप से अपना काम करने का होता है। इसमें वे अपने असाईनमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, एक्सपेरीमेंट्स या फिर स्पेशल क्लास करते हैं। कोशि‍श होती है कि बच्चों को इसमें फैसिलिटेटर की कम से कम जरूरत पड़े। शनि‍वार का दिन फैसिलिटेटर्स के लिए भी अगले सप्ताह की प्लानिंग, सत्रों और गतिविधियों के लिए शि‍क्षण सामग्री निर्माण करने और बच्चों के पोर्टफोलियो (स्टूडेण्ट्स फाईल) अपडेट करने का दिन होता है। हर क्षण ऊर्जा और रचनात्मकता से भरा हुआ दिन सभी को बेहतर करने को उत्साहित और प्रेरित करता है।

आनन्द निकेतन स्कूल के बारे में बताते हुए अनिल सिंह कहते हैं, ‘‘जीवन का लक्ष्य है आनन्द प्राप्त करना, लेकिन परम्परागत शि‍क्षा में खुशी के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए एक ऐसी जगह बनाने की जरूरत थी जहां बच्चे खुश रह सकें। टीचर्स और अभिभावक भी आनन्द ले सकें। स्कूल बच्चों के लिए उनके घर का विस्तार हो। और सबसे बढ़कर अपने लिए खुद तय करने के मौके हो। उसी सोच का परिणाम है- आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। कक्षा आठवीं तक की मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में आज 65 बच्चे अध्ययनरत हैं जो विविध सामाजिक स्तर एवं आय वर्ग से आते हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यवसायी, कर्मचारी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के बच्चे एक समावेशी और बालमैत्री पूर्ण परिवेश में 5 शि‍क्षकों के साथ विविध गतिविधियों के माध्यम से हर पल सीखते-सिखाते हैं। यहां पाठ्यपुस्तकों का बंधन, अनुशासन की जकड़न, बोझिल नीरस कक्षाएं, बस्ते का बोझ और परीक्षाओं का भय नहीं है, बल्कि एक प्रकार का खुलापन है, आजादी है, हक है और मौके हैं। कुछ सत्रों में प्रायः अभिभावक भी शामिल होते हैं। सतत् और व्यापक मूल्यांकन पद्धति है। हर बच्चे की प्रोफाईल है जिसमें स्कूल में बच्चे की सत्रों में सहभागिता, अन्य बच्चों एवं शि‍क्षकों से व्यवहार एवं उसके रुझान, अभिव्यक्ति, अभिभावकों व सहपाठियों के विचार आदि के समग्र प्रदर्शन के आधार पर सामूहिक निर्णय होता है। यहां बच्चे को उसकी रुचि और समझ अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है। सच कहूं तो यहां हम सब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और सीखने-सिखाने की कोई जल्दबाजी भी नहीं है।’’

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल की अधिगम की इस रसवती धारा में बच्चे और शि‍क्षक अवगाहन कर नित नवीन तौर तरीके विकसित करते रहेंगे। मुझे विश्‍वास है- स्कूल का परिवेश बच्चों के मधुर हास्य और कोमल सृजन से सदैव जीवन्त बना रहेगा। प्रेम, न्याय एवं समतायुक्त एक अहिंसक लोकतांत्रिक समाज रचना की ओर उनके अनथके कदम बढ़ते रहेंगे।

इधर लगभग दो दशकों से शि‍क्षा विषेशकर प्राथमिक शि‍क्षा क्षेत्र की चुनौतियों एवं सतह पर उभरे सवालों से जूझते हुए समाधान की दिशा में सार्थक कदम बढ़े हैं। इस पहलकदमी को शि‍क्षा की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ये प्रयास जहां सरकारी स्तर पर राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शि‍क्षा अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसमें स्कूलों में ढांचागत बदलाव करते हुए किसी बच्चे की शि‍‍क्षा प्राप्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने की एक कोशि‍श की गई हैं, वहीं विस्तृत शैक्षिक फलक पर निजी प्रयासों से भी शि‍क्षा के गुणात्मक सुधार हेतु कुछ उल्लेखनीय नवीन प्रयास हुए है। आपको ऐसे ही एक स्कूल से परचित कराने जा रहा हूं जिसने प्राथमिक शि‍क्षा की परम्परागत छवि, शि‍क्षण एवं मूल्यांकन पद्धति तथा धारणा को न केवल तोड़ा है, बल्कि एक विकल्प भी प्रस्तुत किया है। हालांकि उसके नाम से कहीं दूर-दूर तक भी आभास नहीं होता कि यह किसी स्कूल का नाम है। आप नाम जानना चाहेंगे ? तो लीजिए नाम हाजिर है- ‘इमली महुआ’। पड़ गए न आप अचरज में कि यह कैसा नाम है, क्या कभी ऐसा भी नाम होता है किसी स्कूल का। पर यह सच है और इमली महुआ स्कूल ने अपने प्रदर्शन से एक राह बनायी है जिस पर चलकर विद्यालयों की एक कैदखाने की बन गई छवि से मुक्ति पाकर बालमैत्रीपूर्ण लोकतांत्रिक परिवेश रचा जा सकता है।

इमली महुआ स्कूल के बारे में जानकारी देते हुए संस्थापक प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘इमली महुआ स्कूल छत्तीसगढ़ राज्यान्तर्गत बस्तर के जंगल के बीच कोंडागांव जिला के मुरिया एवं गोंड़ जनजाति बहुल गांव बालेंगापारा में स्थित है। पास में तीन गांव है- कोकोड़ी, कोदागांव और जगड़हिन पारा। ये सभी गांव स्कूल से 3 से 4 किमी की दूरी पर हैं। यह स्कूल नर्सरी से कक्षा 8 तक संचालित हैं। वर्तमान सत्र में 40 बच्चे अध्ययनरत हैं, जो 3 से 15 आयु वर्ग के हैं। वर्तमान में स्कूल का अपना भवन है, पर स्कूल की शुरुआत ‘घोटुल’ में 2 बच्चों, जिसमें एक लड़की थी, और 3 शि‍क्षकों के साथ अगस्त 2007 में हुई थी। यहां कोई परीक्षा नहीं होती है। स्कूल को वित्तीय मदद ‘आकांक्षा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चैन्नै’  द्वारा दी जाती है, जोकि एक सत्र में अधिकतम 60 बच्चों के लिए निश्‍चि‍त है। स्कूल के तीन चौथाई बच्चे मुरिया एवं गोंड़ जनजाति के हैं। शेष बच्चे अनुसूचित और पिछड़ी जातियों यथा कलार, गांडा एवं पनका जाति समूहों से सम्बंधित हैं। 90 प्रतिषत बच्चे पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं।’’

इसके पहले कि मैं इमली महुआ स्कूल के बारे में विस्तार से बात करूं, मुझे लगता है कि हम उस आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को समझने का प्रयास करें जिनके बीच ‘स्कूल’ काम कर रहा है। इससे जहां हम एक ओर आदिवासी जीवन के रीति-रिवाज, ज्ञान, परम्परा एवं विश्‍वास की एक झलक देख सकेंगे, साथ ही स्कूल की राह आ रही कठिनाइयों, चुनौतियों एवं शि‍क्षकों के समर्पण को भी जान-समझ सकेंगे। आजादी के 68 साल बाद भी बालेंगापारा का चतुर्दिक वनवासी जीवन विकास से दूर एवं आधुनिकता से अछूता है। वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीते हैं। अपनी आजीविका एवं भोजन के लिए वे खेती और शि‍कार पर आश्रित हैं। मछली पकड़ना, छोटे जानवरों खरगोश, सुअर आदि का शि‍कार करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। पशुपालन भी करते हैं, पर दूध के लिए नहीं, बल्कि गोश्‍त के लिए। क्योंकि आदिवासी समाज दूध पर बछड़े का ही हक मानता हैं, मनुष्‍य का नहीं। आदिवासी समाज अपने बच्चों के साथ इज्जत से बर्ताव करता है। माता-पिता बच्चों के स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। छोटे बच्चों से काम नहीं करवाया जाता हालांकि बच्चे अपने बड़ों को काम करते हुए देखकर काम करने का तरीका सीख जाते हैं और बड़े होने पर उनकी मदद करते हैं। आदिवासी समाज में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। परस्पर सहयोग भावना इन्हें मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी भावना को सम्मान देते हुए स्कूल में भी कोई प्रतिस्पर्धा आयोजित नहीं की जाती। आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर स्कूल बन्द कर दिया जाता है क्योंकि वे स्कूल को खुशि‍यों का घर मानते हैं और ऐसे मौके पर स्कूल खोलना उनके प्रति असंवेदना का ही प्रदर्शन होगा। आदिवासी समाज, विशेषरूप से मुरिया और गोंड जानजातियों में अपने बच्चों को परम्परागत ज्ञान,  नृत्य,  संगीत एवं कला सीखने-सिखाने की संस्था ‘घोटुल’ होती है, जिसमें एक बड़े कुटीर में सभी युवक-युवतियां शाम से सुबह तक निवास करते हैं। इसमें अपना जीवन साथी चुनने की भी छूट होती है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहां वे पारिवारिक और सांसारिक समझ विकसित करते हैं। हालांकि यह चलन शहरी संस्कृति के दबाव एवं बाहरी लोगों के दखल से अब बहुत कम हो गया है।

इमली महुआ स्कूल।

विद्यालय का आरम्भिक नाम रखा गया था ‘इमली महुआ नई तालीम सेण्टर फार लर्निंग’। पर यह बच्चों के लिए याद कर पाने और बोलने के लिए बहुत लम्बा था, तो बच्चो ने आपसी निर्णय से एक नया नाम चुना- ‘इमली महुआ स्कूल’। स्कूल बारहों महीने सोमवार से शनिवार प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक लगता है। हरेक बच्चे का नाम किसी न किसी कक्षा में अंकित होता है, पर बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक स्कूल में कक्षाओं की बजाय आयु आधारित बच्चो के चार समूह थे जो सपरी (3-5 वर्ष), सेमर (7-12 वर्ष), सीताफल (8-10 वर्ष) और सूरजमुखी (11-15 वर्ष) नाम से पहचाने जाते थे। यहां पढ़ाये जाने वाले विषयों में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी, विज्ञान, पर्यावरण शि‍क्षण/सामाजिक बदलाव, योग, संगीत, मिट्टी का काम, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई जैसे विषय शामिल हैं। स्कूल के शि‍क्षण की माध्यम भाषा हिन्दी के और हल्बी हैं। क्लास बच्चों की मांग पर होती है। बोर होने पर बच्चे मना कर देते हैं। बच्चे रोजाना कई अलग-अलग तरह की गतिविधियां करते हैं और पढ़ाई भी उन्हीं का एक हिस्सा है। लूडो, कैरम, सांप-सीढ़ी, शतरंज, क्रिकेट के साथ ही लकड़ी के गुटकों और मांटेसरी की शैक्षिक सामग्री से भी अनेक आकृतियां बनाते-बिगाड़ते हुए बच्चे खेलते रहते हैं। दरअसल, यह खेलना भी एक प्रकार का सीखना है। कुछ बच्चे दिनभर खेलते हैं। स्कूल में न तो घण्टी बजती है, न स्कूल का गेट बंद होता है। बच्चे कभी भी आ सकेते हैं और जब चाहें घर जा सकते हैं। समय का आकलन सूरज को देखकर कर लेते हैं। बड़े बच्चे घर का काम करके आते हैं। यहां कक्षाएं और टाइम टेबिल का बंधन नहीं हैं। खुला सत्र भी होता है जिसमें बच्चे कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं। हर बच्चा अलग-अलग चीजें करता है। एक ही समय में कुछ बच्चे सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी का काम करते हैं तो कुछ तबला-हारमोनियम पर अभ्यास कर रहे होते हैं। हम प्रत्येक दिन छोटी चैकियों पर बहुत सारी किताबें और लर्निंग मैटेरियल इस तरह से बिछा देते हैं कि बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें और तब वे अपनी रुचि एवं सुविधा अनुसार सामग्री चुन लेते हैं और शि‍क्षक के साथ काम करते हैं। फिर दो घण्टे बाद मिलते हैं तब हाजिरी ली जाती है और बातचीत करते हैं। दोपहर का समय सामूहिक भोजन का समय होता है। बच्चे भोजन अपने घरों से लाते हैं, पर हरेक दिन कुछ बच्चे टिफिन नहीं ला पाते, तब स्कूल से उतनी थालियां ली जाती हैं और सभी बच्चे एवं शि‍क्षक अपने टिफिन में से भोजन का थोड़ा हिस्सा थालियों में क्रमश: रखते जाते हैं। इस प्रकार टिफिन साझा करते हुए बच्चे भोजन का आनन्द लेते हैं। सप्ताह में एक बार पूरे स्कूल का एक साथ लाईब्रेरी क्लास होती है जहां बच्चे पुस्तकों को पढ़ने के साथ-साथ उनका रखरखाव, रजिस्ट्ररों में पुस्तकें दर्ज करने एवं उनको एक पहचान संख्या देने, पुस्तकें निर्गत करने एवं जिल्दसाजी करने जैसे काम सीखते हैं। गत सत्र में पास के सरकारी स्कूल के बच्चे भी शामिल हो जाते थे, लेकिन अब उनका आना बन्द हो गया है।

शुक्रवार के दिन स्कूल आधे दिन का होता है और शुरुआत सामूहिक गान से होती है। उसके बाद स्कूल की सफाई, रखरखाव, मरम्मत और सामान की गिनती का वक्त होता है जिसमें बाल्टी, मग, लोटा, झाड़ू आदि की गिनती होती है। कच्चे फर्श की गोबर से लिपाई की जाती है। साढ़े दस बजे तक ये काम निबटाने के बाद सामूहिक नाश्‍ते का समय होता है और तब चने, मौसमी फल, खजूर, आदि मिल बांटकर खाते हैं। वैसे कुछ साल पहले तक शुक्रवार की दोपहर के बाद का समय हाट जाने का होता था और सूरजमुखी समूह के बच्चे अपने बनाये हुए मिट्टी के काम- खिलौने, घड़े आदि बाजार बेचने जाते थे और स्कूल के लिए सप्ताह भर का राशन एवं हरी सब्जियां लाते थे, पर अब इसमें बदलाव किया गया है और लगातार बदलाव करते रहना ही इमली महुआ की खूबी है। लेकिन ये बदलाव बच्चों का सामूहिक निर्णय है जो संवाद आधारित होता है। स्कूल में बच्चे अपनी दिनचर्या खुद तय करते हैं। पढ़ने के लिए कोई भी किसी बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता। प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘यहां हरेक को छूट और स्वतंत्रता है। आजादी के कारण हम फलते-फूलते हैं और उसके अभाव में मुरझाते हैं।’’

शनिवार का दिन बाहर घूमने का दिन होता है। छोटे बच्चे दो समूहों में जंगल या किसी पहाड़ी पर पिकनिक मनाने जाते हैं। बड़े बच्चे साईकिल से आसपास के गांवों, महत्वपूर्ण इमारतों, सांस्कृतिक स्थानों की यात्रा पर जाते हैं। यह यात्रा 20 से 50 किमी तक की हो सकती है। स्वाभाविक है कि वापसी पर वे अपने अनुभव लिखते हैं और अन्य बच्चों के साथ साझा करते हैं। रविवार का दिन आराम और आगामी कार्य योजना बनाने का होता है। एपीसीटी  की ओर से प्रत्येक बच्चे को छात्रवृत्ति दी जाती है, जो बच्चे और उसकी मां के संयुक्‍त खाते में जमा की जाती है।

स्कूल की अब तक की शैक्षिक-सामाजिक यात्रा पर खुशी जताते हुए प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘आदिवासी बच्चों को ऐसी शि‍क्षा दी जाए, जिससे उनकी विशि‍ष्‍ट सभ्यता बरकरार रहे और नई समस्याओं एवं चुनौतियों से निबटने की कुशलता पैदा हो। तीन-चार साल तक शि‍क्षण पद्धति शि‍क्षक केन्द्रित थी और बच्चों के हित का निर्णय शि‍क्षकों के हाथ में था। लेकिन स्कूल ने देखा कि आदिवासी जीवन में हरेक व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो स्कूल ने भी बदलाव किया। अब यहां किसी मुद्दे पर सबकी राय ली जाती है और एक सामूहिक निर्णय लिया जाता है। हरेक का एक वोट निश्‍चि‍त होता है। समय-समय पर निर्णयों की समीक्षा भी होती है। साल में एक बार बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं ताकि बच्चे शहरी जीवन की वास्तविकता को नजदीक से समझ सकें। अमीर से अमीर व्यक्ति के घर ले जाते हैं और गरीब व्यक्ति के घर भी। पिछलें दिनों कुछ रेड लाईट एरिया और रैनबैक्सी के मालिक के बंगले पर ले गए थे। फुटपाथ पर जिंदगी जीते लोगों से भी भेंट होती है ताकि बच्चों का अनुभव विस्तृत हो सके और बडे़ होने पर बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को कहीं अधिक गंभीरता के साथ निर्वाह कर सकें। हम यहां हमेशा के लिए नहीं आए हैं। वर्ष 2030 तक हम यहां रहेंगे, पर हमें विश्‍वास है, तब तक स्कूल संचालन के लिए पर्याप्त लोग तैयार हो चुके होंगे।’’

‘इमली महुआ स्कूल’ के परिवेश में लोक का संस्कार है और जीवन का लययुक्त प्रवाह भी। यहां श्रम के प्रति सम्मान है तो जिजीविषा का आह्वान भी। यहां बच्चों को उनके बालपन के निश्‍छल व्यवहार के साथ जीने की स्वीकृति है न कि पग-पग पर बड़ों का हस्तक्षेप और आपत्ति। यहां पल-पल रचनात्मक उत्साह और उल्लास है और कुछ नया गढ़ पाने का विश्‍वास भी। यहां के प्रयोग को हम प्राथमिक शि‍क्षा के क्षेत्र में एक सार्थक पहल के रूप में देख सकते हैं।

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन : अनुपम मिश्र

अनुपम मि‍श्र

अनुपम मि‍श्र

सेंट्रल इंस्‍टीट्यूट ऑफ एजूकेशन के 67वें स्थापन दि‍वस के अवसर पर 19 दि‍संबर 2014 को दि‍या गया अनुपम मि‍श्र का भाषण-

कोई एक सौ पचासी बरस पहले की बात है। सन् 1829 की। कोलकाता के शोभाबाजार नाम की एक जगह में एक पाठशाला की, स्कूल की स्थापना हुई थी। यह स्कूल बहुत विशिष्ट था। इसकी विशिष्टता आज एक विशेष व्यक्ति से ही सुनें हम। विनोबा इस स्कूल में 21 जून सन् 1963 में गए थे। उन्होंने यहां शिक्षा को लेकर एक सुन्दर बात-चीत की थी। उसके कुछ हिस्से हम आज यहाँ दुहरा लें और फिर आगे की बात-चीत इसी किस्से से बढ़ सकेगी।

विनोबा कहते हैं कि इस स्कूल से कई महान विद्यार्थी निकले हैं। इनमें पहला स्थान शायद रवीन्द्रनाथ का है। उनकी स्मृति में इस स्कूल में एक शिलापट्ट भी लगाया गया है। स्कूल इस पट्ट में बहुत गौरव से बताता है कि यहाँ रवीन्द्रनाथ पढ़ते थे। यह बात अलग है कि उस समय रवीन्द्रनाथ को भी मालूम नहीं था कि वे ही ‘रवीन्द्रनाथ’ हैं। और न स्कूल वालों को, उनके संचालकों को मालूम था कि वे आगे चल कर ‘रवीन्द्रनाथ’ होंगे।

यह स्कूल गुरुदेव का आदरपूर्वक स्मरण करता है। लेकिन गुरुदेव भी उस स्कूल का वैसे ही आदर के साथ स्मरण करते हों- इसका कोई ठीक प्रमाण मिलता नहीं। हाँ, एक जगह उन्होंने यह जरूर लिखा है कि, मैं पाठशाला के कारावास से मुक्त हुआ, स्कूल छोड़कर चला गया। यानी इस स्कूल में उनका मन लगा नहीं। चित्त नहीं लगा। पर स्कूल वालों ने तो अपना चित्त उन पर लगा ही दिया था।

विनोबा फिर इस प्रसंग को स्कूल से बिलकुल अलग एक और संस्था से जोड़ते हैं। स्कूल संस्था है गुणों के सर्जन की तो यह दूसरी संस्था है दुर्गुणों के विसर्जन की। जीवन में कुछ भयानक गलतियाँ, भूले हो जाएँ तो ऐसा माना जाता है कि उन भूलों को, गलतियों को मिटाने का काम इस संस्था में होता है। यह संस्था है कारावास, जेल। इसमें सामान्य अपराधियों के अलावा सरकारें, सत्ताएँ, तानाशाह आदि कई बार ऐसे लोगों को भी जेल के भीतर रखते हैं, जो उस दौर की सत्ता के हिसाब से कुछ गलत काम करते माने जाते हैं। पर बाद में तो समाज उन्हें अपने मन में एक बड़ा दर्जा दे देता है।

विनोबा कहते हैं कि जिस किसी कारावास में बड़े-बड़े लोग बन्दी बनाकर रखे जाते हैं, बाद में उन लोगों के नाम भी वहाँ एक पत्थर पर, एक बोर्ड पर लिख दिए जाते हैं। वे यहाँ थे- इस पर कारावास को बड़ा गौरव का अनुभव होता है और वह उसे अब सार्वजनिक भी कर देना चाहता है।

नैनी जेल में नेहरूजी, यरवदा जेल में गाँधीजी और मंडाले में लोकमान्य तिलक और साउथ अफ्रीका की ऐसी ही किसी जेल में नेल्सन मंडेला का नाम पत्थर पर उत्कीर्ण मिल जाएगा।

स्कूल और कारागार तो एक-दूसरे से नितान्त भिन्न, एकदम अलग-अलग संस्थाएँ होनी चाहिए- एकदम अलग-अलग स्वभाव की व्यवस्थाएँ होनी चाहिए। इन्हें चलाने वाली बातें अलग भी होनी चाहिए। कारागार की समस्याएँ भी पूरी दुनिया में लगभग एक-सी हैं और स्कूल की समस्याएँ भी लगभग एक-सी। कारागार में सुधार होना चाहिए- इसे कहते सब हैं, मानते सब हैं, पर कभी एकाध किरण चमक जाए, दो-चार योगासन सिखा दिए जाएँ, हॉलीवुड और उसी की तर्ज पर बॉलीवुड भी एकाध फिल्म बना दे- इससे ज्यादा कुछ हो नहीं पाता। कारागार सुधर नहीं पाते और कभी तो लगता है कि हमारे स्कूल तक वैसे बनने लगते हैं। किसी भी महीने के अखबार पलट लें, स्कूलों में क्या-क्या नहीं हो रहा।

रवीन्द्रनाथ ने विनोबा के शब्दों में कहें तो सदोष और तंग तालीम के कारण अपने स्कूल को कारावास कहा था। लेकिन विनोबा पूछते हैं कि इन स्कूलों में यदि आज भी ऐसी ही तालीम दी जाती है तो सोचने की बात है आखिर इनका सुधार कब होगा। स्कूल ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चे मुक्त मन से सीखें।

तो इसी कठिन काम में, स्कूलों को कारागार न बनने देने में आप सब लोग जुटे हैं। न जाने कब से लगे हैं। यह संस्था, सीआईई शिक्षण के विराट संसार में अभिनव प्रयोगों को प्रोत्साहन देने के लिए ही बनी थी। इसके उद्घाटन के अवसर पर मौलाना आजाद का दिया गया भाषण अभी भी हमारी धरोहर की तरह है। पढ़ना, पढ़ाना और पढ़ाने वालों को पढ़ाना- ऐसी तीन स्तर की स्कूल व्यवस्था में क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या कमी है, क्या अच्छाई है- यह तो आप सब मुझसे बेहतर ही जानते हैं। मैं उस काम के लिए यों भी अयोग्य ही साबित होऊंगा। खुद पढ़ने में, पढ़ाने में मेरी कोई खास गति नहीं थी। पुराने किस्से-कहानियों में नचिकेता का किस्सा मुझे बचपन में बहुत भा गया था। नचिकेता की मृत्यु विषयक जिज्ञासा, यम से उस बालक का संवाद आदि बातों से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। उस कहानी में एक जगह नचिकेता, जिसे स्वागत भाषण कहते हैं- वैसे कुछ बुदबुदाता है। उसी बुदबुदाहट में यह पता चलता है कि नचिकेता कोई बहुत होशियार छात्र नहीं रहा है। न वह अगली पंक्ति का छात्र था और न कोई पिछली पंक्ति का। जरा औसत किस्म का छात्र था वह। मैं भी ऐसा ही औसत दर्जे का छात्र रहा, पढ़ाई के अपने पूरे दौर में।

इस औसत दर्जे पर मैंने और आगे सोचा। कोई अध्ययन जैसा, निष्कर्ष जैसा काम तो नहीं किया पर इसे दूसरी पीढ़ी को भी सौंपने का काम सहज ही कर लिया था मैंने।

प्राथमिक शिक्षा के दौर में अपने जीवन की जब पहली परीक्षा देकर मेरा बेटा कुछ चिन्तित-सा घर लौटा तो मैंने पूछ ही लिया था कि क्या बात है ऐसी। उत्तर था पर्चा अच्छा नहीं हुआ। वह और आगे कुछ बताता, उससे पहले ही मैंने पूछा कि तुम्हारी कक्षा में और कितने साथी हैं। उत्तर था- चालीस।

तब तो किसी-न-किसी को चालीसवाँ नम्बर भी आना पड़ेगा। वह तुम भी हो सकते हो। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं होगी और तुम्हें भी नहीं होनी चाहिए।

यह जो नम्बर गेम चल पड़ा है, इसका कोई अन्त नहीं है। कृष्ण कुमारजी ने बहुत पहले एक सुन्दर लेख लिखा था, शायद आज से कोई छह बरस पहले- जीरो सम गेम। इस खेल में किसी को कोई लाभ नहीं हो रहा, लेकिन हमारी एक-दो पीढ़ियों को तो इसमें झोंक ही दिया गया है।

घर का कचरा तो कभी-कभी दरी के नीचे भी डाल कर छिपा दिया जाता है पर समाज में यदि यह भावना बढ़ती गई कि 90 प्रतिशत से नीचे का कोई अर्थ नहीं तो हर वर्ष हमारी शिक्षण संस्थाओं से निकले इतने सारे, असफल बता दिए गए छात्र कहाँ जाएँगे। कितनी बड़ी दरी चाहिए नब्बे प्रतिशत से कम वाले इस नए कचरे को छिपाने के लिये? मीटरों नहीं किलोमीटरों लंबी-चौड़ी दरी। लगभग पूरा देश ढँक जाए इतनी बड़ी दरी बनानी पड़ेगी। फिर दरी के नीचे छिपे नब्बे के नीचे वाले भला कब तक शान्त बैठेंगे- दरी में वे जगह-जगह छेद करेंगे, उसे फाड़ कर ऊपर झांकेंगे।

मैंने तय किया था कि आज आप सबके बीच में दो ऐसे स्कूलों का किस्सा रखूँगा जो इस 90-99 के फेर से बचे रहे। इनमें से एक तो ऐसा बचा कि उसने 90-99 के फेर को अपने आस-पास के लोगों तक को ठीक से समझाया और एक ऐसा काम कर दिखाया जो हम खुद भी नहीं कर पाते- उसने समाज में अच्छी शिक्षा के दरवाजे खोले, मगर अपने दरवाजे बन्द कर दिए।

99 का फेर हमारे बच्चों में अपूर्णता की ग्लानि भरता है। वह उन्हें जताता रहता है कि इससे कम नम्बर आने पर तुम न अपने काम के हो, न अपने घर के काम के और न समाज के काम के। फिर वे खुद ऐसा मानने लगते हैं, उनके माता-पिता भी उन्हें इसी तरह देखने लगते हैं। फिर ये तीनों विभाजन एक ही रूप में समा जाते हैं। वह रूप है रोज-रोज बढ़ता बाजार। तुम बाजार के काम के नहीं। तुम पूरे नहीं हो, पूर्ण नहीं। अपूर्ण हो। निहायत बेवकूफ हो। खुद पर भी बोझा हो, हम पर भी बोझा। हर साल ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जो बताते हैं कि 99 न आ पाने का, अपूर्णता का बोझा कितना भारी हो जाता है कि उस बोझ को उठाकर जीवन जीने के बदले इन कोमल बच्चों को, किशोर छात्रों को अपनी जान दे देना, आत्महत्या करना ज्यादा ठीक लगता है।

उन स्कूलों पर आने से पहले एक बार फिर विनोबा का सहारा ले लें। वे रवीन्द्रनाथ के स्कूल वाले प्रसंग में ही एक बहुत ऊँची बात कहते हैं। वे बच्चों को भी उतना ही पूर्ण मानते हैं, जितने पूर्ण उनके माता-पिता हैं। वे ईशउपनिषद के पूर्णमदः पूर्णमिदम का उल्लेख करते हैं। यह भी पूर्ण, वह भी पूर्ण। माँ-बाप भी पूर्ण, बच्चे भी पूर्ण और उनके शिक्षक भी पूर्ण। यदि माँ-बाप की अपूर्णता देखकर बच्चे को शिक्षा दोगे तो पहले तो छात्र अपूर्ण दिखेगा और फिर माँ-बाप शिक्षक में भी अपूर्णता देखने लगेंगे।

यह जरा कठिन-सी बात लगती है- पूर्णता और अपूर्णता की। लेकिन बच्चे को पूर्ण समझ कर तालीम देने लगें तो कल शिक्षण का ढँग ही बदल जाएगा। विनोबा कहते हैं कि‍ इसके लिए बच्चे के आस-पास की सारी सृष्टि आनन्दमय होनी चाहिए। स्कूल भी आनन्दमय होना चाहिए। तब स्कूल में छुट्टी का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह कोई सजा तो नहीं है। वह तो आनन्द का विषय है।

ऐसी बातें ‘दूर की कौड़ी’ लगेंगी। पर समय-समय पर अनेक शिक्षाविदों ने, शिक्षा शास्त्रियों ने, क्रान्तिकारियों तक ने, उन सबने जिनने समाज की शिक्षा पर कुछ सोचा-समझा था- उनने आकाश कुसुम जैसी कल्पनाएँ की तो हैं। उनके नाम देशी भी हैं, विदेशी भी। पढ़ाने का पूरा शास्त्र जानने वाले आप सब उन नामों से मुझसे कहीं ज्यादा परिचित हैं। और इसमें भी शक नहीं कि निराशा के एक लम्बे दौर में साँस लेते हममें से ज्यादातर को लगेगा कि ऐसा होता नहीं है।

लेकिन दून या ऋषि जैसे परिचित नामों से अलग हट कर पहले हम एक गुमनाम स्कूल की यात्रा करेंगे आज।

स्कूल का नाम नहीं पर वहाँ पहुंचने के लिए कुछ तो छोर पकड़ना पड़ेगा न। इसलिए गाँव के नाम से शुरू करते हैं यह यात्रा। गाँव है- लापोड़िया। जयपुर जिले में अजमेर के रास्ते मुख्य सड़क छोड़कर कोई 20-22 किलोमीटर बाएँ हाथ पर।

यहाँ नवयुवकों की एक छोटी-सी टोली कुछ सामाजिक कामों में, खेलकूद में, भजन गाने में लगी थी। गाँव में एक सरकारी स्कूल था। पर सब बच्चे उसमें जाते नहीं थे। शायद तब सरकार को भी ‘सर्व शिक्षा अभियान’ सूझा नहीं था। गाँव में पुरखों के बने तीन बड़े तालाब थे, पर वे न जाने कब से टूटे पड़े थे। बरसात होती थी पर इन तालाबों में पानी नहीं टिकता था। अगल-बगल से बह जाता था। इन्हें सुधारे कौन। पंचायत तो ग्राम विकास की योजनाएँ बनाती थी! और उन योजनाओं में यह सब तो आता नहीं था।

गाँव में पशु- बकरी, गाय, बैल काफी थे। और चराने के लिए ग्वाले थे। ग्वाले ज्यादातर बच्चे ही थे, किशोर, जिन्हें आप सब शायद ‘दूसरा दशक’ के नाम से भी जानते हैं। गोचर था जरूर पर हर गाँव की तरह इस पर कई तरह के कब्जे थे। घास-चारा था नहीं वहाँ। इसलिए ये ग्वाले पशुओं को दूर-दूर चराने ले जाते थे।

नवयुवकों की छोटी-सी टोली इन्हीं बच्चों में घूमती थी। किसी पेड़ के नीचे बैठ उन्हें भजन सिखाती, गीत गवाती। इस टोली के नायक लक्ष्मण सिंह जी से आप पूछेंगे तो वे बड़े ही सहज ढंग से बताते हैं कि कोई बड़ा ऊँचा विचार नहीं था हमारे पास। न हम नई तालीम जानते थे, न पुरानी तालीम और न किसी तरह की सरकारी तालीम। शिक्षा का कहने लायक कोई विचार हमें पता नहीं था।

यह किस्सा है सन् 1977 का। दिन भर ऐसे ही गाते-बजाते पशु चराते। एक साथी थे गोपाल टेलर। इतनी अंग्रेजी आ गई थी कि दर्जी के बदले टेलर शब्द ज्यादा वजन रखता है बस। तो गोपाल टेलर को लगा कि दिन में तो ये सब काम होते ही हैं, रात को एक लालटेन जला कर कुछ लिखना-पढ़ना भी तो सीखना चाहिए।

सरकारी स्कूल था पर उसमें तो भरती होना पड़ता था, रोज दिन को जाना पड़ता था। रात को कोई क्यों पढ़ाएगा? सरकारी शाला के समानान्तर कोई रात्रि शाला खोलने जैसी भी कोई कल्पना नहीं थी। सरकार के टक्कर पर कोई प्राइवेट स्कूल भी खोलने की न तो इच्छा थी, न हैसियत। लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि अच्छे विचारों को उतारने में समय लगता है, मेहनत लगती है, साधन लगते हैं- यह सब भी हमें कुछ पता नहीं था। नहीं तो हम तो इस सबसे घबरा जाते और फिर कुछ हो नहीं पाता। हमारे पास तो बस दो चीजें थीं- धीरज और आनन्द।

गाँव को पता भी नहीं चला और गाँव में सरकारी स्कूल के रहते हुए एक ‘और’ स्कूल खुल गया। हमें भी नहीं पता चला कि यह कब खुल गया। स्कूल खुल ही गया तो हमें पता चले उसके गुण। कौन से गुण और क्या ये सचमुच गुण ही थे। यह सूची बहुत लम्बी है। आप जैसे शिक्षाविद इन पर काम करेंगे तो हमें इन गुणों को और भी समझने का मौका मिलेगा।

किससे करवाते उद्घाटन, क्यों करवाते उद्घाटन जब पता ही नहीं कि यह स्कूल कब खुल गया? स्कूल का नाम भी नहीं रखा था, नाम तो तब रखते जब होश रहता कि कोई स्कूल खुलने जा रहा है। जब बिना नाम का स्कूल खुल ही गया तो फिर तो यही सोचने लगे कि स्कूल का नाम क्यों रखना। क्या यह भी कोई जरूरी चीज है?

नेताओं के नाम पर बने स्कूलों की कमी नहीं, क्रान्तिकारियों, शहीदों, सन्तों, मुनियों, ऋतुओं, ऋषियों और तो और जात-बिरादरी के ऊँचे और छुटभैये नेताओं के नाम पर भी सब तरफ स्कूल हैं ही। पर सचमुच अगर पूरे देश में हर गाँव में स्कूल खोलने हों तो कोई पाँच-सात लाख नामों की जरूरत पड़ेगी। नया क्या हो पाएगा तो कुछ मत करो। गुमनाम स्कूल चल पड़ा। बच्चों से कहाँ जा रहे हो जैसे प्रश्न पूछने वाले लोग थे नहीं। न पोशाक थी न वर्दी थी, बस्ता बोझ वाला भी नहीं था, बिना बोझ वाला बस्ता भी नहीं था। स्कूल जैसा कुछ था नहीं तो नाम किसका रखते!

भवन नहीं था, न अच्छा, न गिरता-पड़ता। चलता-फिरता स्कूल था। आज यहाँ, कल वहाँ। गर्मी के मौसम में बड़े बरगद के नीचे, ठण्ड के दिनों में खुले में धूप के साथ। प्रश्न पूछने वालों की क्या कमी। कोई पूछ ही बैठे कि और बरसात के दिनों में कहाँ लगाओगे स्कूल? तो उत्तर मिलता कि सब बच्चे तो किसान-परिवार से हैं। बरसात में वे सब अपने खेतों में काम करते हैं। यानी तब छुट्टी रखी जाएगी क्या? उत्तर मिलता कि नहीं। उन दिनों हमारे बच्चे गुणा-भाग सीखते हैं। गुणा-भाग कैसा? भगवान का गुणा-भाग। एक मुट्ठी गेहूँ बोने से जो पौधे उगेंगे, उनकी बाली गिन कर तो देखो। प्रकृति का विराट गुणा-भाग समझने का इतना सुन्दर मौका कब मिलेगा। सारे सरल और कठिन गुणा-भाग, दो दूनी चार जैसे सारे पहाड़ों का पहाड़, गणित का पहाड़ भी खेती के गुणा-भाग से छोटा ही, बौना ही होगा। यह नया बीज-गणित, बीजों का गणित जीवन के शिक्षण का भाग है।

कक्षाओं का शुरू में विभाजन नहीं था पर धीरे-धीरे पहली टोली के बच्चे आगे बढ़े तो, वे अपने आप दूसरी कक्षा में आ गए। वे अपने पीछे जो खाली जगह कर आए थे, उसमें अब उत्साह से एक नई जमात आ गई। पर पहली कक्षा में पढ़ा क्या? कौन-सा पाठ्यक्रम? कोई बना बनाया ढाँचा नहीं रखा गया था। जो अक्षर ज्ञान सरकारी स्कूल में पढ़ाया जाता था, या कहें नहीं पढ़ाया जाता था, उसे यहाँ बिना डाँटे-फटकारे पढ़ा दिया था। और साथ में अनगिनत नई बातें, जानकारियाँ पाठ्यक्रम के अलावा भी। कुछ पचास पेड़-पौधों के नाम तो उन्हें आते ही थे, लेकिन अब उन नामों को लिखना भी आ गया था।

पहली से दूसरी कक्षा के बीच यों कोई दीवार तो नहीं थी, भवन ही नहीं था फिर भी बच्चों को लगा कि स्कूलों में परीक्षा होती है तो हमारी परीक्षा कब होगी? नवयुवकों की टोली खुद कोई बड़ी पढ़ी-लिखी तो थी नहीं। आपस में बैठ दो-चार तरह के प्रश्न- भाषा, अक्षर ज्ञान, गिनती आदि के बना लिए। एकाध वर्ष इस तरह से पर्चे बने, पर्चे जाँचे भी गए और पास-फेल बताने के बदले बच्चों को बुलाकर उनकी गलतियाँ वगैरह जो थीं, वो सब समझा दीं और उन्हें अगली कक्षा में भेज दिया।

फिर इस टोली को लगा कि जीवन में प्रश्न पूछना भी तो आना चाहिए बच्चों को। क्यों न हम उन्हें अभी से प्रश्न पूछना सिखाने लगें। इससे हम भी कुछ नया सीखेंगे और वे भी। तय हुआ कि हरेक छात्र एक प्रश्न पत्र खुद बनाएगा। बीस छात्रों की कक्षा में एक ही विषय पर बीस प्रश्न पत्र तैयार हो गए। यह भी निर्णय किया गया कि उन्हें आपस में पत्तों की तरह फीट कर एक दूसरे में बाँट दिया जाए। देखा गया कि सभी प्रश्न पत्र ठीक-ठाक बने थे, न बड़े सरल न बहुत कठिन। उत्तरों की जाँच टोली के सदस्यों ने ही की।

एकाध वर्ष इसी तरह चला। फिर यह बात भी ध्यान में आई कि प्रश्न जब बच्चे बना ही रहे हैं तो उत्तर पुस्तिका की जाँच हम क्यों करें! यह काम भी बच्चों पर डाल कर देखना चाहिए। आखिर जीवन में अपना खुद का मूल्यांकन सन्तुलित ढँग से करना भी आना चाहिए। न अपने को कोई तीसमारखाँ समझे और न दूसरों से गया गुजरा। सहज आत्मविश्वास से बच्चों का मन खुलना और खिलना चाहिए। प्रश्न भी तुम्हीं पूछो, उत्तरों की जाँच-पड़ताल भी तुम्हीं करो, अब। टोली की जरूरत पड़े तो मदद ली जा सकती है। निष्पक्षता दूसरों के प्रति और अपने प्रति भी सीखनी चाहिए। अपना हाथ जगन्नाथ जैसे मुहावरे पढ़ तो लो पर उन्हें अपने से दूर ही रखो।

इस गुमनाम स्कूल का कोई संचालक मण्डल नहीं था। अध्यक्ष, सदस्य, मन्त्री, प्रधानाचार्य, कोषाध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं था। महीने में कुल जितना खर्च होता, उतना चन्दा माता-पिता से मिल जाए तो फीस क्यों लेना। कई बार कोई कहता कि फसल कटने पर हम कुछ दे पाएँगे, अभी तो है नहीं। स्कूल में कोई रजिस्टर नहीं था, इसलिए फीस, हाजरी, किसने दिया पैसा, किसने नहीं- ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड नहीं रखा गया।

बच्चे पढ़ रहे थे, खेल रहे थे, आनन्द कर रहे थे। गाँव में इन नवयुवकों की टोली की एक संस्था भी थी- ग्राम विकास नवयुवक मण्डल। उसमें कई तरह के मेहमान आते थे। कभी आस-पास से तो कभी दूर-दूर से भी। टोली उन मेहमानों से भी कहती कि थोड़ा समय निकालें और हमारे बच्चों से भी बातें करें।

क्या बातें? कुछ भी बताएँ जो आपको ठीक लगे। एक वर्ष में 25-30 विजिटिंग फैकल्टी। तरह-तरह की जानकारियाँ। स्कूल चल पड़ा मजे-मजे में।

इधर, इन बच्चों के चेहरों पर सचमुच ज्ञान की एक चमक-सी दिखने लगी थी। जो परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेज रहे थे, वे भी अब कभी-कभी इस विचित्र स्कूल में आने लगे थे। उन्हें भी यहाँ का वातावरण खुला-खुला-सा दिखा। डाँट-फटकार, मारा-पीटी कुछ नहीं। बच्चे महकते-से, चहकते-से दिखते थे। कुछ परिवारों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकाल कर इस स्कूल में डाल दिया।

नवयुवकों की टोली को लगा कि एक ही गाँव में कम-से-कम शिक्षा को लेकर होड़ नहीं मचनी चाहिए। लक्ष्मण सिंह जी एक दिन सरकारी स्कूल चले गए। प्रधान मास्टरजी से मिले। बड़ी विनम्रता से उन्हें भी अपने स्कूल आने का निमन्त्रण दिया। कहा ये भी आपके ही बच्चे हैं, आपका ही स्कूल है। यहाँ थोड़ी भीड़ ज्यादा हो गई थी तो वहाँ कुछ कर लिया है।

धीरे-धीरे वहाँ के एकाध मास्टर इधर भी आने लगे। वे यहाँ के बच्चों में ज्यादा रमने लगे। एक बड़ा अन्तर तो समझदारी का था। उधम यहाँ बिलकुल नहीं था। बचपन था, बचपना नहीं था। उमर में सयाने हुए बिना बच्चे व्यवहार में कितने सयाने हो सकते हैं- इसका कुछ चित्र उभरने लगा था।

इस बीच गाँव के तीनों टूटे तालाब भी नव-युवकों की टोली और उनकी संस्था को बाहर से मिली कुछ मदद से बन गए थे। यहाँ पानी कम ही बरसता है। कोई 24 इंच। पर अब जितना भी बरसता उसे रोकने का पूरा प्रबन्ध हो गया था। तब आई बारी गाँव के गोचर को ठीक करने की, कब्जे हटाने की। फिर इस आन्दोलन में इस स्कूल के सभी बच्चों ने भाग लिया। कभी-कभी तो ठण्ड की रातें गोचर में रजाई ओढ़ कर पहरा देते हुए भी कटीं- अपने माता-पिता के साथ।

गाँव में सभी जातियों के परिवार हैं। चोरी-छिपे कई परिवार आस-पास के हिरण, खरगोश का शिकार करते थे। गोचर उजड़ जाने से इनकी संख्या भी कम हो गई थी। पर गोचर सुधरने लगा तो वन के ये छोटे पशु भी आने लगे।

तब गाँव लापोड़िया ने सबकी बैठक कर शिकार न खेलने का संकल्प लिया। इसका स्कूल से यों कोई खास सम्बन्ध नहीं दिखेगा पर शहर के अपने बच्चे स्कूलों की तरफ से कभी-कभी चिड़ियाघर जाते हैं न। लापोड़िया गाँव ने अपने पूरे क्षेत्र को खुला चिड़ियाघर घोषित किया। सब की निगरानी से। इसमें स्कूल ने भी साथ दिया। जगह-जगह वन्य प्राणियों के संरक्षण, संवर्धन के बोर्ड बना कर लगा दिए गए और उस इबारत को लोगों के मन में भी उतारने की कोशिश की गई।

इस खुले चिड़ियाघर में शहरों के चिड़ियाघरों की तरह भले ही शेर, हाथी या जिराफ न हों लेकिन जो भी जानवर और पक्षी थे वे इस स्कूल की तरह ही खुले में घूमते थे और उनके बीच घूमते थे ये बच्चे।

स्कूल की कक्षाएँ आगे बढ़ती गईं। पहली दूसरी हो गई, दूसरी तीसरी। इस तरह जब पहली बार सातवीं कक्षा आठवीं बनी तो आठवीं की बोर्ड की ऊँची दीवार बच्चों के सामने खड़ी थी। सन् 1985 की बात होगी। अब तक तो वे खुद अपनी परीक्षा लेते थे, खुद ही प्रश्न बनाते थे, खुद ही अपने उत्तरों को सावधानी से जाँचते थे। अब उन्हें दूसरों के बनाए प्रश्न-पत्र मिलने वाले थे। उनके उत्तर भी कोई और जाँचने वाले थे। लेकिन बच्चों को, इस टोली को और उनके माता-पिता को भी इसकी कोई खास चिन्ता नहीं थी। बोर्ड की परीक्षा के अदृश्य डर से यह स्कूल मुक्त था।

पूरी तैयारी थी पहली बार आठवीं की इस अपरिचित बाधा से मिलने की। सब बच्चों के फॉर्म राज्य शिक्षा बोर्ड में प्राइवेट छात्र की तरह जमा कराए गए। वहीं के सरकारी स्कूल में उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली। अपने स्कूल में परीक्षा भी अपनी ही थी। तुरन्त परिणाम आ जाता था। यहाँ शिक्षा मण्डल का विशाल संगठन था। पूरे राज्य में फैला हुआ। इसलिए परिणाम आने में लम्बा इन्तजार करना पड़ा। पर जो बच्चे परीक्षा दे चुके थे, उन्होंने इस बीच में स्कूल आना बन्द नहीं किया। वे हमेशा की तरह आते रहे। नई-नई चीजें करते रहे, अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाते भी रहे।

परिणाम आया। इस गुमनाम स्कूल की पूरी कक्षा इस दीवार को मजे में फांद गई थी। परिणाम शत-प्रतिशत था।

बच्चों की संख्या भी बढ़ चली थी, इसलिए शिक्षकों की जरूरत भी पड़ी। पर यह संख्या दो या तीन से ज्यादा कभी नहीं हो पाई। बाकी पढ़ाई बच्चे मिलकर करते। बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा को पढ़ाते। अंग्रेजी, विज्ञान और गणित में थोड़ा अभ्यास रखने वाले रामनारायण बुनकर किसी और शहर से विवाह कर गाँव में आई राजेश कंवर ने मदद दी। पर ये भी बच्चों को पढ़ाने की कोई डिग्री नहीं रखते थे। पढ़ाते-पढ़ाते सीखते गए, सिखाते गए।

बच्चे सन् 1985 के बाद हर साल आठवीं की एक दीवार कूदते-फाँदते रहे। हाँ, स्कूल की इमारत तो कभी-भी नहीं बनी, पर कुछ वर्ष बाद पाठ्यक्रम की किताबें बढ़ने लगीं। तो कुछ नई खरीद करनी पड़ी। इन किताबों-कॉपियों को रोज-रोज घर से भारी बस्ते में लाना और फिर स्कूल से वापस घर ले जाने के नियम भी बड़े लचीले रखे गए। चाहो तो ले आओ, चाहो तो ले जाओ। एक घर में किसी कोने में बनी आलमारियों में सबके बस्ते रखने का इन्तजाम भी हो गया था। जिसे होमवर्क कहा जाता है वह यहाँ नहीं था। यों भी घर में कोई कम काम होते हैं क्या? घर के ऐसे कामों में माता-पिता का हाथ बटाना भी तो एक शिक्षण ही है।

स्कूल में जब ठीक मानी गई संख्या में शिक्षक ही नहीं थे तो चपरासी जैसा पद भी कहाँ होता। देश भर के, शायद दुनिया भर के स्कूलों में बजने वाली घण्टी यहाँ नहीं बजती थी। इसलिए दिन का समय अलग-अलग विषयों के घण्टों में बाँटा नहीं जाता था।

आज भाषा पढ़ रहे हैं तो दो-चार दिन भाषा, व्याकरण, उच्चारण, विभक्तियाँ- सब कुछ अच्छे-से पढ़ समझ लो। फिर बारी गणित की आ गई तो दो-चार दिन गुणा-भाग का मजा लो। कभी-कभी तो एक ही विषय पूरे हफ्ते चल जाता। पचास मिनट की तलवार किसी के सिर पर नहीं लटकती थी। न शिक्षक पर न छात्र पर।

फि‍र स्कूल में किसी घर से एक अखबार भी आने लगा। बड़े बच्चों को किताबों के अलावा अखबार पढ़ने की भी इच्छा हो तो वह पूरी की जानी चाहिए। सभी घरों में यों भी अखबार नहीं आता था। फिर बच्चों ने अखबार की खबरों पर टिप्पणी भी देना, अपनी पसन्द, नापसन्द भी बताना शुरू किया। फिर वे थोड़ा आगे बढ़े। खुद हाथ का लिखा दो-चार पन्ने का एक अखबार भी निकालने लगे। स्कूल का नाम नहीं था, अखबार भी बिना नाम का। हफ्ते में एक बार। हाथ से गाँव की, स्कूल की, खेती-बाड़ी की, आस-पास की खबरें, टिप्पणियाँ लिखी जातीं। गाँव से 20 किलोमीटर दूर जयपुर-अजमेर सड़क पर दूदू कस्बे में फोटो कॉपी मशीन थी। शहर आते-जाते किसी के हाथ से हस्त लिखित सामग्री भेज दी जाती। कोई सौ प्रतियाँ वापस आ जातीं। इसे बच्चों के अलावा गाँव के बड़े लोग भी खरीदते और चाय तक की दुकानों पर इसे पढ़ा जाने लगा था। आठ आना या एक रुपया दाम भी रखा गया ताकि फोटो कॉपी का खर्च निकल आए। कोशिश की जाती कि अधिक-से-अधिक बच्चे इसमें अपनी राय रखें, कुछ-न-कुछ सब लिखें। ऐसा स्कूल चला सकने वाली टोली, उसका गाँव अभी एक और विचित्र प्रयोग करने जा रहा था।

गाँव ने शिकार बन्द कर दिया था। वन्य प्राणियों का संरक्षण गाँव खुद कर रहा था। खुले चिड़ियाघर का जिक्र पहले आ ही चुका है।

गाँव के तीनों तालाब ठीक होकर अब लबालब भरने लगे थे। एक तालाब पर चुग्गा भी रखा जाने लगा था। हर घर अपनी फसल से कुछ अनाज निकाल कर इस चुग्गा-घर में बनी एक कोठरी में जमा करने लगा था। यहाँ से इसका एक अंश रोज निकाल कर एक विशेष बने चबूतरे पर डाल दिया जाता था। इस चबूतरे पर बिल्ली-कुत्ते झपट नहीं सकते थे। आस-पास की कई तरह की चिड़ियों के झुण्ड यहाँ बेफिक्र आते और दाना चुगते थे। सुबह से शाम तक चहचहाहट बनी रहती थी।

चूहे कहाँ नहीं हैं। लापोड़िया में खूब थे। किसानों के घरों में कहीं-न-कहीं तो अनाज की बोरियाँ होंगी ही। एक दिन लक्ष्मण सिंह जी को लगा कि हम सब घरों में चूहों को पकड़ने के लिए पिंजरे रखते हैं। पकड़ते तो खुद हैं पर फिर बच्चों को पिंजरा पकड़ा कर कहते हैं, बाहर छोड़ कर आओ या मार दो। पेड़ बचा रहे हैं, वन्य प्राणी बचा रहे हैं, लेकिन घर के प्राणी को मार रहे हैं।

इस चूहे ने हमारा भला ऐसा क्या बिगाड़ा है? बम्बई के सिद्धि विनायक मन्दिर में पूजा करने बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोगों के जाने की खबरें छपती हैं, कैलेण्डरों में तरह-तरह के गणेशजी मिलते हैं और उन्हीं के पास बैठा रहता है यह चूहा। पर हम उसे न जाने कब से मारे चले आ रहे हैं। न सन्त उसे बचाते हैं, न मुनि लोग, न सरकारें। अरे वो तो चूहा मारने के लिए इनाम भी देती हैं। अनाज का दुश्मन नम्बर एक मानती है सरकार चूहों को।

गाँव के कुछ लोग मिलकर बैठे। बातचीत चली कि इस पर क्या किया जा सकता है। सबने माना कि अनाज भी बचे और चूहा भी। प्रयोग के तौर पर गाँव की आबादी से दो-चार कदम की दूरी पर एक चूहा घर बनाने का निर्णय हुआ। न जीव दया का नारा। न अहिंसा को परमधर्म बताने का कोई ऊँचा झण्डा। बस प्रकृति को समझकर अपना कर्तव्य निभाने की एक कोशिश भर करने की बात थी।

कोई दस बीघा जमीन इस काम के लिए निकाली गई इस चूहा घर के लिए। एक तरह की झाड़ी से बाड़ लगाई ताकि एकदम बिल्ली कुत्ते न घुस पाएँ। सबको बता दिया गया कि घरों में चूहों को पकड़ें तो मारे नहीं, इस चूहा घर में लाकर उन्हें छोड़ दें।

घर के कोनों में दुबके चूहे जब यहाँ दस बीघा में छूटने लगे तो उन्हें कैसा लगा- ये तो टीवी वाले उनसे कभी पूछ ही लेंगे। पर जो यहाँ आया उसने अपने शानदार बिल बनाने शुरू कर दिए। कुछ ही समय में चूहा घर आबाद हो गया, बस्ती बस गई। गाँव में चील, उल्लू भी हैं, साँप भी, बिल्ली भी हैं, चूहे भी। प्रकृति में सब कुछ सबके सहारे मिल-जुलकर चलता है।

गाँव में चूहा घर बना गया। वहाँ के पेड़ों पर जो चिड़ियाँ बैठतीं उनकी बीट से तरह-तरह की घास के बीज नीचे गिरते। चूहा घर में बिल बन गए, आस-पास घास उग आई। उन्हें जितना भोजन चाहिए उतना मिल गया, जितनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, घास के कारण उतनी सुरक्षा मिल गई और जितने चूहे इन चील, उल्लुओं को चाहिए, उतने उन्हें मिल ही जाते होंगे।

चूहा घर बने अब दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। गाँव में चूहों की आबादी नहीं बढ़ी है। प्रकृति सन्तुलन खुद रखती है। खुद चूहे आजादी का महत्व जानते हैं। शायद वे खुद अपनी आबादी पर नियन्त्रण रखे हैं।

तो क्या घरों में चूहे एकदम खत्म हो गए हैं अब वे घरों में नहीं आते? लक्ष्मण सिंह जी बड़े ही सहज ढँग से उत्तर देते हैं कि देखिए, आप भी कभी-कभी घर का खाना खाते-खाते अघा जाते हैं तो किसी दिन होटल में, ढाबे में चले ही जाते हैं। इसी तरह एकाध बार ये चूहे भी अपना घर छोड़ कर हमारे घरों में आकर हलवा-पूरी या कुछ तो भी खा जाते हैं पर अब प्रायः वे घरों के भीतर वैसे नहीं रहते जैसे पहले रहते थे। अब उनके अपने घर हैं, आरामदेह बिल हैं- यह जीवन उनके लिए ज्यादा स्वाभाविक है, सहज है। शायद ज्यादा आनन्द का है। घर के कारागार से उनकी मुक्ति हुई है।

कारागार से फिर स्कूल को याद कर लें। लापोड़िया ने स्कूल को आनन्दधाम बनाया। फिर देखा कि गाँव का सरकारी स्कूल भी थोड़ा-थोड़ा सुधर चला है। नवयुवकों की इस टोली ने फिर सन् 2006 में तय किया कि हमें किसी की होड़ में तो स्कूल चलाना नहीं था। तो क्यों न इसे अब बन्द कर दें।

सृजन किया था जैसे चुप-चाप, उसी तरह एक दिन उस स्कूल का विसर्जन कर दिया। न नाम था, न भवन, न बैंक में कोई खाता था, न कोई संचालक मण्डल, न ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें स्कूल बन्द करने के बाद किसी तरह की बेरोजगारी का सामना करना पड़ता। या कि वे धरना देते दरवाजे पर। सबने मिलकर शुरू किया था। सबने मिल कर उसे सिरा दिया, उसका विसर्जन कर दिया।

विसर्जित होकर यह विचार पूरे गाँव में फैल गया है। लोग अच्छी बातें सीखने की कोशिश करते हैं, बुरी बातों को विसर्जित करने का प्रयास करते हैं। सब अच्छा सीख गए, सब बुरा मिटा दिया- ऐसा तो नहीं कह सकते पर इसी लम्बे दौर में इस क्षेत्र में 9 वर्ष का भयानक अकाल पड़ा था। आधे से कम बरसात गिरी थी, पर गाँव में एक बूँद पानी की कमी नहीं थी। गाँव के तीनों तालाब ऊपर से सूख गए थे पर इनने गाँव के भूजल को इतना सम्पन्न बना दिया था कि कोई सौ कुँओं में से एक भी कुँआ सूखा नहीं था, नौ साल के अकाल में। पूरे दौर में ठीक-ठीक फसल होती रही हर खेत में। गाँव के बच्चों को दूध तक मिलता रहा, वहाँ के गोचर के कारण। जयपुर की सरस डेयरी को भी इस अकालग्रस्त गाँव से सबसे पौष्टिक दूध मिला। सरकार ने उसका प्रमाणपत्र भी दिया था तब।

फिर कोई चार साल पहले इस इलाके में इतना अधिक पानी गिरा कि जयपुर शहर में भी बाढ़ आ गई, आस-पास के कई गाँव डूबे थे तब। पर लापोड़िया बाढ़ में डूबा नहीं। उसके तालाबों ने फिर सारा अतिरिक्त पानी आने वाले दौर के लिए समेट लिया था।

लापोड़िया गाँव ने न तो सरकारी स्कूल की निन्दा की, न कोई निजी प्राइवेट स्कूल उसकी टक्कर पर खोला, न किसी कारपोरेट को, कम्पनी को उसकी सामाजिक जिम्मेदारी जता कर शिक्षा में सुधार की योजना बनाई। उसने ममत्व, यह तो मेरा है, मान कर एक गुमनाम स्कूल खोला, शिक्षण को कक्षा की दीवारों से उठा कर पूरे गाँव में फैलने का विनम्र प्रयास किया और फिर उसे चुपचाप समेट भी लिया। एक भी पुस्तिका या कोई लेख इस प्रयोग को अमर बनाने के लिए उसने छापा नहीं।

शुरू में हमने दो स्कूलों की चर्चा करने की बात रखी थी। दूसरा स्कूल लापोड़िया गांव से थोड़ा अलग स्वभाव का है। यह पंजाब के गुरुदासपुर जिले के तुगलवाला गाँव में चल रहा है। पर यह लापोड़िया की तरह गुमनाम नहीं है। शिक्षा के कड़वे दौर में इस मीठे स्कूल का नाम है- बाबा आया सिंह रियाड़की स्कूल। सन् 1925 में यहाँ के एक परोपकारी बाबा आया सिंह ने इसकी स्थापना पुत्री पाठशाला के रूप में की थी। गुरुमुख परोपकार उमाहा उनका घोष वाक्य था- यानी गुरु का सच्चा सेवक परोपकार भी बहुत चाव से, आनन्द से करे।

यह विद्यालय यों कोई 15 एकड़ में फैला हुआ है पर बहुत चाव से, आनन्द से काम करने के कारण आस-पास के अनेक गाँवों के मनों में, उनके हृदय में इस स्कूल ने जो जगह बनाई है, उसका तो कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता। यहाँ प्राथमिक शाला- यानी पहली कक्षा से एम.ए. तक की शिक्षा दी जाती है। छात्राओं की संख्या है लगभग 3000। इसमें से कोई 1000 छात्राएँ अपने पास के घरों से आती हैं। दूर के गाँवों की कोई 2000 छात्राएँ यहाँ छात्रावास में रहती हैं। पढ़ाई का खर्च महीने के हिसाब से नहीं, वर्ष के हिसाब से है। रोज आने-जाने वालों की फीस लगभग एक हजार रुपए सालाना है। जो यहीं रहती हैं, उन्हें पढ़ाई, आवास और भोजन का खर्च लगभग 6,600 रुपया देना होता है। पूरे वर्ष का। जिन परिवारों को यह मामूली-सी फीस भी ज्यादा लगे- उनसे एक रुपया भी नहीं लिया जाता। भरती होने के लिए आने वाली किसी भी छात्रा को यहाँ वापस नहीं किया जाता। सचमुच, विद्यामन्दिर के दरवाजे हरेक के लिए खुले हैं।

3000 छात्राओं वाले इस शिक्षण संस्थान में बहुत गिनती करें तो शायद दस-पांच शिक्षक मिल जाएँगे। पढ़ाई का, पढ़ाने का सारा काम छात्राएँ ही करती हैं। बड़ी कक्षाओं की छात्राएँ अपने से छोटी कक्षाओं को पूरे उत्साह से पढ़ाती हैं। सैल्फ टीचिंग डे हमारे स्कूलों में होता है पर यहाँ तो सेल्फ टीचिंग इयर है पूरा।

सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, इतने बड़े शिक्षण संस्थान का पूरा प्रबन्ध छात्राओं के हाथ में ही है। यह काम दरवाजे पर होने वाली चौकीदारी से लेकर प्रधानाध्यापक के कमरे तक जाता है। साफ-सफाई, बिजली-पानी, इतनी बड़ी संख्या में छात्राओं का नाश्ता, दो समय का भोजन, तीन-चार मंजिल की इमारतों की टूट-फूट, नया निर्माण- सारे काम छात्राओं की टोलियाँ मिल बाँट कर करती हैं। संस्थान के रोजमर्रा के सब काम निपटाने के बाद इन्हीं छात्राओं की टोलियाँ जरूरत पड़ने पर आस-पास के गाँवों में सामाजिक विषयों पर, कुरीतियों पर, भ्रूण हत्या, नशाखोरी जैसे विषयों पर जन-जागरण के लिए पद यात्राओं पर भी निकल पड़ती हैं।

यह एक ऐसा संस्थान माना जाता है जहाँ पंजाब के प्रायः सभी मुख्यमंत्री, राज्यपाल वर्ष में एकाध बार माथा टेकने आ ही जाते हैं। पर इस संस्थान ने आज तक पंजाब सरकार से मान्यता नहीं माँगी है। सरकार ने मान्यता देने का प्रस्ताव अपनी तरफ से रखा तो भी स्कूल ने विनम्रता से मना किया है।

इसके संचालक श्री सरदार स्वरन सिंह विर्क का कहना है कि बच्चों की फीस से, खेती-बाड़ी, फल-सब्जी के बगीचों से इतना कुछ मिल जाता है कि विद्यालय को सरकार से मदद लेने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर शासन की मान्यता का मतलब है शासन के तरह-तरह के नियमों का पालन। ज्यादातर नियम व्यवहार में उतारना कठिन होता है तो लोग उन्हें चुपचाप तोड़ देते हैं। फिर झूठ बोलना पड़ता है। ना, यह सब यहाँ होता नहीं। इस स्कूल को इस इलाके में सच की पाठशाला के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ छात्राएँ बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाएँप्राइवेट छात्र की तरह देती हैं।

पूरे देश में परीक्षाओं में नकल करने के तरह-तरह के नए तरीके, नई तकनीकें खोजी जा रही हैं। पंजाब के परीक्षा में नकल एक बड़ी समस्या है। नकल रोकने के फ्लाइंग दस्ते तक हैं। लेकिन गाँव तुगलवाला की यह संस्था नकल के बदले छात्राओं की अकल और उनके संस्कारों पर जोर देती है। यह बताते हुए थोड़ा अटपटा भी लगता है कि यहाँ नकल पकड़ने वाले को एक बड़ा इनाम दिए जाने का बोर्ड तक लगा है !

शुरू में कहीं विनोबा की एक बात कही थी- छात्र भी पूर्ण, उसके माता-पिता भी पूर्ण और शिक्षक भी पूर्ण। यहाँ शिक्षण का काम तीन चरणों में होता है। पहले में एक शिक्षिका पचास छात्राओं को पढ़ाती है। फिर दस-दस के समूहों को पढ़ाया जाता है। इन समूहों में कोई छात्रा किसी कारण से कुछ कमजोर दिखे तो उसे अपूर्ण, मूर्ख नहीं माना जाता- तब उसे एक अलग शिक्षिका समय देती है और उसे कुछ ही दिनों में सबसे साथ मिला दिया जाता है।

शिक्षा के स्वावलम्बन की ऐसी मिसाल कम ही जगह होंगी- केवल गेहूँ, धान ही पैदा नहीं होता। इतनी बड़ी रसोई शाला का पूरा आटा यहीं पिसता है, धान की भूसी यहीं निकाली जाती है। गन्ना पैदा होता है तो गुड़ भी यहीं पकता है, सौर ऊर्जा है, गोबर गैस है। काम दे चुकी छोटी-सी-छोटी चीज़ भी कचरे में नहीं फेंकी जाती- सब कुछ एक जगह इकट्ठा करने वाली टोली है और फिर इस कबाड़ से क्या-क्या जुगाड़ बन सकता है- उसे भी देखा जाता है। बची चीजें बाकायदा कबाड़ी को बेची जाती हैं और उसकी भी पूरी आमदनी का हिसाब रखा जाता है।

सर्व धर्म समभाव पर विशेष जोर देने की बात ही नहीं है। वह तो है ही यहाँ के वातावरण में। दिन की शुरुआत सुबह गुरुवाणी के पाठ से होती है। परिसर की सफाई रोज नहीं होती। सप्ताह में एक बार। क्योंकि 3000 की छात्र संख्या होने पर भी कोई कहीं कचरा नहीं फेंकता। स्वच्छता अभियान यहाँ बिना किसी नारे के बरसों से चल रहा है।

आप सभी शिक्षा के संसार में बाकी संसार की तरह आ रही गिरावट की चिन्ता कर रहे हैं, उसे अपने-अपने ढँग से सम्भाल भी रहे हैं। आज सब चीजें, सुरीले से सुरीले विचार अन्त में जाकर बाजार का बाजा बजाने लग जा रहे हैं। शिक्षा की दुनिया में शिक्षण अपने आप में एक बड़ा बाजार बन गया है। पर जैसे बाजार में मुद्रास्फीति आई है ऐसे ही शिक्षा के बाजार में भी यह मुद्रास्फीति आ गई है। पहले सन्तरामजी बी.ए. से काम चला लेते थे। आज तो पीएचडी का दाम भी घट गया है।
हम में से कई लोगों को इसी परिस्थिति में आगे काम करना है। जो पढ़ाई आज आप कर रहे हैं, वह आगे-पीछे आपको एक ठीक नौकरी देगी- पर शायद इसी बाजार में। प्रायः साधारण परिवारों से आए हम सबके लिए यह एक जरूरी काम बन जाता है। इसलिए आप सबको एक छोटी-सी सलाह- नौकरी करें जीविका के लिए। लेकिन चाकरी करें बच्चों की। हम अपनी नौकरी में जितना अंश चाकरी का मिलाते जाएँगे, उतना अधिक आनन्द आने लगेगा।

विनोबा से हमने आज की बात प्रारम्भ की थी। उन्हीं की बात से हम विराम देंगे। यह प्रसंग बहुत सुन्दर है। इसे बार-बार दुहराने में भी पुनर्रुक्ति दोष नहीं दिखता। उनके शब्द ठीक याद नहीं। भाव कुछ ऐसे हैं:

पानी जब बहता है तो वह अपने सामने कोई बड़ा लक्ष्य, बड़ा नारा नहीं रखता कि मुझे तो बस महासागर से ही मिलना है। वह बहता चलता है। सामने छोटा-सा गड्ढा आ जाए तो पहले उसे भरता है। बच गया तो उसे भर कर आगे बढ़ चलता है। छोटे-छोटे ऐसे अनेक गड्ढों को भरते-भरते वह महासागर तक पहुँच जाए तो ठीक। नहीं तो कुछ छोटे गड्ढों को भर कर ही सन्तोष पा लेता है।

ऐसी विनम्रता हम में आ जाए तो शायद हमें महासागर तक पहुँचने की शिक्षा भी मिल जाएगी।

सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा

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दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोनों ही खुद भी खिलखिलाते हैं और दुनिया को भी। मैं बात कर रहा हूं, सोसाइटी के एकदम बगल में बने सरकारी स्कूल की। चिल्लागांव का स्कूल। लगभग तीन हजार बच्चे पॉश कॉलोनियों के बीचों बीच। लेकिन इसमें इन सोसाइटियों का एक भी बच्चा पढ़ने नहीं जाता। बीस वर्ष के इतिहास को भी टटोलें तो भी नहीं। प्राचार्य ने खुद बताया था- ‘बीस-तीस हजार की आबादी वाली सोसाइटियों का एक भी बच्चा, कभी भी इस सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा।‘ असमानता के ऐेसे द्वीप हर शहर में बढ़ रहे हैं। उनके लिए अलग और आभिजात्य बेहद महंगे स्कूल हैं। इनमें कई स्कूल किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी या बिल्डर के हैं। दरअसल, ऐसे सभी निजी स्कूल ऐसे ही मालिकों के हैं। पुराने धंधों की बदौलत एक नया धंधा स्कूल का, जो अब पुराने सारे धंधों से ज्यादा चमकार लिए है।

खैर, मेरे अंदर सरकारी स्कूल से छूटे बच्चों की खिलखिलाहट हिलोरे ले रही है। पूरी सड़क भरी हुई। बच्चे-बच्चियों दोनों। पैदल चलता अद्भुत रेला। कुछ बस स्टैंड की तरफ बढ़ रहे हैं, तो कुछ चिल्लागांव की तरफ। जब से मेट्रो ट्रेन आई है, पास के अशोक नगर, नोएडा तक के बच्चे इस सरकारी स्कूल में लगातार बढ़ रहे हैं। जमुना के खादर में बसे यू.पी, बिहार के मजदूरों का एक मात्र सहारा भी है, यह सरकारी स्कूल। जिस स्कूल को यहां आसपास की संभ्रांत कॉलोनियों के बाशिंदे गंदा और बेकार मानते हैं, चिल्ला गांव, खादर के बच्चों के लिए इस स्कूल का प्रांगण बहुत महत्त्व रखता है। केवल स्कूल ही तो है, जहां वे खेल पाते हैं। चीजों की कीमत वे जानते हैं, जिन्हें मिली न हो। भूख हो या नींद या जीवन की दूसरी सुविधाएं। अभाव ही सौन्दर्य भरता है।

कभी-कभी इन हजारों बच्चों की खिलखिलाहट को नजदीक से सुनने का मन करता है। सरकारी स्कूल के न गेट पर एक भी कार, न स्कूटर। न स्कूली बस। और तो और नन्हें-मुन्ने बच्चों तक को लेने आने वाले भी नहीं। कौन आएगा? मां किसी अमीर के घर काम कर रही होगी और पिता कहीं मजदूरी कर रहे होगा। इन्हें उम्मीद भी नहीं। इन के पैरों ने चलना खुद सीखा है। इसके बरक्स तीन सौ मीटर के फासले पर ही एक निजी स्कूल है। उसे उसके अंग्रेजी नाम ए.एस.एन. से ही सभी जानते हैं, आदर्श शिक्षा निकेतन के नाम से नहीं। स्कूल प्रबंधन भी नहीं चाहता कि‍ हिन्दी नाम से पहचाने जाना। हिन्दी नाम से स्कूल का शेयर भाव नीचे आ जाएगा। फिर धंधा कैसे चमकेगा? बड़ी-बड़ी फीस, किताबों, ड्रेस, स्कूल बस के अलग पैसे और फिर रुतबा। इसी रुतबे का खामियाजा पड़ोस की सार्वजनिक सड़क को भुगतना पड़ता है। सुबह स्कल खुलते और बंद होते दोनों वक्त ए.एस.एन. की विशाल पीली-पीली बसें आड़ी-तिरछी प्रवेश करती, लौटती, गुर्राती, कंडक्‍टर के हाथों से पिटती-थपती, जो कोहराम मचाती हैं, उससे वहां के पॉश बाशिंदे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठे कुढ़ते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। कारण या तो उनके बच्‍चों पर इस स्‍कूल ने उपकार किया है अथवा निकट भविष्य में उन्हें दाखिले के लिए भीख मांगनी पड़ सकती है। इन अपार्टमेंटों में प्रसिद्ध पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और फिल्मकार भी हैं, जो अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए किसी की भी र्इंट से र्इंट बजा देंगे। लेकिन इन स्कूलों की इतनी ऊंची फीस, शोर और शोषण के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोल सकते। पड़ोस की सड़कें और फुटपाथ इन स्कूलों से त्रस्त हैं। किनारे बैठे सब्जी-ठेले वालों को भी स्कूल में होने वाले सत्संग के दिन भगा दिया जाता है! कोई है पूछने वाला कि स्‍कूल-मदरसों में सत्‍संग, कीर्तन का क्या काम?

जहां सरकारी स्कूल के गेट पर एक भी कार, स्कूटर नहीं था, इन निजी स्कूलों के गेट पर सैकडों कारें लगी होती हैं। यहां बच्चे कम, कारें ज्यादा दिख रही हैं। इसीलिए बच्चों की चहचहाट के बजाये कार के हार्न की आवाजें। दो बजे से पहले ही इनके अभिभावक अपनी बड़ी-बड़ी कारें ए.सी. चालू कर के ऐसे सटा कर लगाते हैं कि उनके चुन्नू मुन्नू और वयस्क बच्चे भी स्‍कूल के दरवाजे से निकलते ही उसमें आ कूदें। इन कार और बसों ने थोड़ी देर के लिए पूरी सड़क रोक दी है। केवल यहां नहीं पूरे शहर में। एक-एक बच्चे को कभी-कभी लेने वाले दो-दो। बावजूद इसके इन मोटे-मोटे बच्चों के चेहरों पर उदासी, थकान क्यों पसरी हुई है? सरकारी स्कूल के बच्चे इन्हीं कारों के बीच बचबचाकर रास्ता तलाशते गुजर रहे हैं और मुस्करा भी रहे हैं।  वाकई सड़क अमीरों की, स्कूल और देश भी। गरीबों का तो बस संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में समाजवाद, समानता जैसे कुछ शब्द लिखे हुए हैं। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा!

फोटो : कमल जोशी

फीस की फाँस : अनुराग

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हर साल नया शैक्षिक सत्र होने के साथ ही लगभग शत-प्रतिशत निजी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन और अभिभावक आमने-सामने आ जाते हैं। मुद्दा वहीं जो पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है- फीस में अत्यधिक वृद्धि और मनमाना एनुअल चार्ज। कई स्कूलों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि पुलिस बुलानी पड़ती है। मजेदार बात यह है कि इसी दौरान कुछ अभिभावक अपने बच्चों का एडमिशन कराने के लिए  इन्हीं स्कूलों के प्रबंधकों के आगे नाक रगड़ रहे होते हैं। उनके हर नियम-कायदे को मानने को लेकर उनका जवाब होता है, केवल ‘हां’। जरूरत पडऩे पर किसी की सिफारिश कराई जाती है। और इन सबके बावजूद डोनेशन तो देनी ही है। कैसी विडम्बना है कि आज अपने बच्चे के एडमिशन के लिए चिरौरी करने वाले ये माता-पिता भी अगले साल आंदोलनकारी अभिभावकों में शामिल हो जाएंगे। जब से देश में निजी स्कूलों का दौर शुरू हुआ है, एक भी अभिभावक ऐसा नहीं मिलेगा, जिसने बच्चा का एडमिशन कराते समय स्कूल प्रबंधन से हर साल बढऩे वाली फीस और एनुअल चार्ज के बारे में चर्चा की हो। या यह शर्त रखी होगी कि हर साल इतने प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढ़ाओगे और एनुअल चार्ज नहीं देंगे। जब सब कुछ स्कूल प्रबंधकों की मर्जी से हो रहा है तो बाद में हायतौबा मचाने का क्या तुक है?
कमीज सौ-पचास रुपये से लेकर हजारों रुपये में आती है। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से ब्राड की कमीज खरीद लेता है और महंगी होने की शिकायत भी नहीं करता। निजी स्कूल भी ब्रांड बन गए हैं। हमें अपने बच्चों की अच्छी-बुरी शिक्षा से कोई मतबल नहीं है। हमें उनके लिए शिक्षा के ब्रांड की चिंता है ताकि समाज में कमीज के टैग की तरह इसका भी प्रदर्शन कर सकें।
यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मूल सोसाइटी के स्कूल की ब्रांच तो गिनी-चुनी हैं, बाकी तो उन्होंने फ्रेंचाइजी दी हुई हैं।
पिछले दिनों एक स्कूल के आंदोलनरत अभिभावकों से मिलने हुआ। सभी की आर्थि और सामाजिक स्थिति काफी अच्छी थी। वे धरना-प्रदर्शन कर चुके थे। जनप्रतिनिधियों से लेकर सीबीएसई के चेयरमैन से भी कई बार मिल चुके थे। गरमागरम बहस हो रही थी। सभी का लहू खौल रहा था। मैंने सुझाव दिया कि आप अपने क्षेत्र में सरकारी स्कूल की मांग क्यों नहीं करते? हर साल होने वाला यह झंझट ही खत्म हो जाएगा। सभी ने मुझे ऐसे घूर कर देखा, मानो मैंने
उन्हें आत्महत्या करने के लिए कह दिया हो।
इससे बड़ा भ्रम कुछ नहीं हो सकता कि निजी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती है। अधिकांश स्कूलों में ‘शिक्षा के उद्देश्य’ को लेकर ही सन्नाटा है, तो बाकी मुद्दों पर बात ही क्या की जाए। कोई भी व्यवसाय शुरू करने से उसकी विशेषज्ञता हासिल की जाती है या दो-चार साल कहीं काम करके अनुभव जुटाया जाता है। लेकिन स्कूल तो प्रापटी डीलर, डेयरी वाला, नेता-अभिनेता कोई भी खोल लेता है। बस पैसा होना चाहिए। इन स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्ति के क्या मापदंड है, यह अबूझ पहेली है। नियुक्ति के बाद उन्हें कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। फिर वहां बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा कैसे मिल सकती है? अधिक पैसे वसूलने के लिए आलीशान बिल्डिंग, महंगा फर्नीचर, हर क्लास में एसी और कंप्यूटर लगा देने भर से तो अच्छी शिक्षा बच्चों को नहीं मिल सकती। सरकारी स्कूलों में अध्यापक की नियुक्ति के लिए शिक्षा से जुड़ी विशेष डिग्री या सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। नियुक्ति से पहले ट्रेनिंग दी जाती है और समय-समय पर वर्कशाप आदि को भी आयोजन किया जाता रहता है। कौन-कौन से और कि‍तने निजी स्कूल अपने यहां अध्यापकों की नियुक्ति से पहले और बाद में यह प्रक्रिया अपनाते हैं। फिर इन स्कूलों के शिक्षक कैसे
श्रेष्ठ शिक्षक हो सकते हैं?

अकेले टेक्नोलॉजी नहीं है स्कूलों की बीमारी का इलाज : केंटारो टोयामा

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सन 2013 के बसंत में मैंने एक महीने तक अपनी सुबहें लेकसाइड स्कूल में बिताईं। यह सिआटल का एक प्राइवेट स्कूल है, जहां प्रशांत उत्तरपश्‍चि‍म में रहने वाले भद्रलोक के बच्चे पढ़ते हैं। लाल ईंटों से बना स्कूल का आलीशान परिसर किसी आईवी लीग कॉलेज जैसा भव्य दिखाई देता है और इसकी फीस भी उन्हीं जैसी है। इस स्कूल में गिल गेट्स ने पढ़ा है और यहां अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट के अफसरों के बच्चे पढ़ने आते हैं। जाहिर है, स्कूल में टेक्नोलॉजी की कोई कमी नहीं- शिक्षक स्कूल के इन्टरनेट पर एसाइनमेंट्स पोस्ट करते हैं;  ई-मेल से कक्षाओं को निर्देश देते हैं;  और हर बच्चा लैपटॉप (अनिवार्यतः) और स्मार्टफोन (अनिवार्य नहीं) लेकर स्कूल पहुंचता है।

इस पसमंजर में इनके माता-पिता क्या रुख रहता है, जब वे सोचते हैं कि उनके बच्चों को थोड़ी और खुराक की जरूरत है? मैं यहां एक वैकल्पिक शिक्षक के तौर पर गया था और मुझे कई स्तर के बच्चों की मदद करनी थी। इनमें से कुछ कैलकुलस ऑनर्स करना चाहते थे। ये मेहनती छात्र थे लेकिन उन्हें महज एक शाबासी देने वाले की जरूरत थी, क्योंकि वे कठिन सवालों पर काम कर रहे थे। भारी शिक्षणेत्तर गतिविधियों के बोझ से दबे कुछ अन्य छात्र ज्यामिति और बीजगणित के साथ जूझ रहे थे। मैं इसके लिए आवश्यक सामग्री के चयन और उनके असाइनमेंट्स में उन्हें मदद करता था। एक अन्य समूह को किसी ख़ास मदद की जरूरत नहीं थी। उन्हें बस थोड़ा-बहुत उकसाना पड़ता था ताकि समय पर अपना होमवर्क पूरा कर लें। इतनी विविधता के बावजूद छात्रों में एक बात समान थी- उनके माता-पिता अतिरिक्त पढ़ाई के लिए खुलकर पैसा खर्च कर रहे थे।

मैंने जो कुछ पढ़ाया वह गणित की वेबसाइट्स और खान एकेडमी के फ्री वीडियोज में उपलब्ध था। इतना ही नहीं, हर छात्र को पूरे वक्त इन्टरनेट सेवा मिलती थी। इतनी सारी टेक्नोलॉजी और 9:1 के शानदार शिक्षक-छात्र अनुपात के बावजूद वहां के अभिभावक चाहते थे कि उनके नौनिहालों को किसी वयस्क की ओर से थोड़े और मार्गदर्शन की जरूरत है।

लेकसाइड स्कूल के अभिभावक टेक्नोलॉजी के बजाय बड़ों के मूल्यवान मार्गदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने के मामले में अकेले नहीं हैं। दूसरे पढ़े-लिखे पेशेवर अभिभावक भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। सिलिकन वैली के अधिकारी अपने बच्चों को वालड्राफ़ स्कूल में पढ़ाते हैं। इस स्कूल में आठवीं कक्षा तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध है। स्टीव जॉब्स ने एक बार स्वीकार किया था कि ‘वह अपने बच्चों को आई-पैड नहीं देते। घर पर बच्चे कितनी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करेंगे, हमने इसकी सीमा तय की हुई है।’

ये माता-पिता टेक्नोलॉजी विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनके काम के देखते हुए उन्हें डिजिटल धर्म का समर्पित प्रचारक कहा जा सकता है। लेकिन वे स्पष्टतः इस बात में विश्वास नहीं करते कि ज्यादा मशीनें इस्तेमाल कर लेने से शिक्षा अच्छी हो जाती है। उनकी इस समझ की पीछे आखिर राज क्या है?

* * * * *

पिछला पूरा दशक मैंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एजुकेशनल टेक्नोलॉजी को डिजाइन करने, समझने और पढ़ाने में बिताया। भारत के बंगलुरु शहर में मैंने एक पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) के साथ एक से ज्यादा माउस जोड़कर छात्र की अन्योन्य क्रिया बढ़ाने सम्बंधी एक प्रयोग किया। युगांडा के ग्रामीण इलाके में जब बच्चे एक अंगुली से शिकारी की तरह टाइपिंग का गेम खेलते तो मुझे घबराहट होने लगती। सिआटल, वाशिंगटन में किशोरावस्था से कम आयु के बच्चों की कंप्यूटर साक्षरता की कक्षा में मुझे टेक्नोलॉजी से पैदा होने वाले भटकाव से जूझना पड़ा। इस सभी प्रोजेक्ट्स में मुझे इकलौता और आसान पैटर्न दिखाई दिया। मैं इसे टेक्नोलॉजी का ‘विस्तारण नियम’ (लॉ ऑफ़ एम्प्लीफिकेशन) कहता हूं- टेक्नोलॉजी का प्राथमिक प्रभाव इंसानी ताकत के विस्तार के रूप में प्रकट होता है। इसलिए शिक्षा में टेक्नोलॉजी पहले से मौजूद शैक्षिक धारकता (पेडागॉजिकल कैपेसिटी) में इजाफा कर देती है।

विस्तारण एक स्पष्ट विचार प्रतीत होता है- यह इतना भर कहता है कि टेक्नोलॉजी के औजार से इंसानी ताकत को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन अगर यह इतना स्पष्ट है तो इसके इतने गहन परिणाम होने चाहिए, जो आम तौर पर नजरअंदाज नहीं किये जा सकते। मसलन विस्तारण के मुताबिक़ शैक्षिक टेक्नोलॉजी के बड़े पैमाने पर उपयोग के बहुत कम सकारात्मक परिणाम आये हैं। किन्हीं चुनिन्दा नमूनों को लें, कुछ स्कूल अच्छा कर रहे पाए गए तो कुछ बहुत बेकार। कुछ मामलों में कंप्यूटर शामिल करना फायदेमंद साबित हुआ (पायलट अध्ययन में जिन्हें दिखाया गया है), लेकिन कमजोर स्कूलों के मामलों में इसने उन्हें अपने मुख्य उद्देश्य से ही भटका दिया। कुल मिलाकर परिणाम शून्य ही निकला।

एक अपेक्षाकृत बड़ी समस्या यह है कि स्कूल प्रशासक शिक्षक प्रशिक्षण के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन नहीं करते। जब शिक्षक को ही नहीं पता कि डिजिटल उपकरणों को कैसे शामिल करना है तो टेक्नोलॉजी के जरिये धारकता के विस्तारण की ख़ास गुंजाइश नहीं रह जाती। जब एक प्राइवेट कंपनी मुनाफा कमाने में नाकामयाब होने लगती है तो कोई यह उम्मीद नहीं करता कि अत्याधुनिक डाटा सेंटर, ज्यादा उत्पादन दिलाने वाले सॉफ्टवेयर और सभी कर्मचारियों को नए लैपटॉप देकर परिस्थितियों को उलटा जा सकता है।

और स्कूल के बाहर जो कंप्यूटर हैं, उनका क्या? क्या होता है जब बच्चों को डिजिटल उपकरणों से सीखने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है, जैसा कि टेक्नोलॉजी के बहुत से पैरोकार नसीहत देते हैं? यहां टेक्नोलॉजी बच्चों की प्रवृत्तियों का विस्तार करती है। यकीनन बच्चों में सीखने, खेलने और बढ़ने की स्वाभाविक इच्छा होती है। लेकिन उनमें खेलते हुए खुद को भटका देने की भी स्वाभाविक इच्छा होती है। डिजिटल टेक्नोलॉजी इन दोनों इच्छाओं को विस्तार देती है। इन दोनों का संतुलन बिंदु हर बच्चे में अलग-अलग होता है लेकिन कुल मिलाकर अगर किसी किस्म का वयस्क मार्गदर्शन न हो तो भटकने की प्रवृत्ति प्रभावी हो जाती है। ठीक ऐसे ही निष्कर्ष अर्थशास्त्री रॉबर्ट फैर्ली और जोनाथन रॉबिन्सन को अपने शोध से हासिल हुए। कैलिफोर्निया के कुछ बच्चों को लैपटॉप देकर किए गए शोध में उन्होंने पाया- जिन बच्चों को लैपटॉप दिए गए थे, श्रेणी, कक्षा-स्तरीय परीक्षा परिणाम, उपस्थिति और अनुशासन जैसे तमाम शैक्षिक मानकों पर उनके प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखाई दिया। हालांकि उन्होंने लैपटॉप का इस्तेमाल सोशल मिडिया और वीडियो गेम्स के लिए ज़रूर किया। यानी, अगर आप उन्हें बहु-उपयोगी टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराते हैं, जिसका इस्तेमाल शिक्षा और मनोरंजन, दोनों के लिए किया जा सकता है, तो बच्चे मनोरंजन को ही चुनेंगे। टेक्नोलॉजी खुद बच्चों के रुझान को नहीं बदल सकती, यह उसका विस्तार भर करती है।

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यह जानना कि अमेरिकी शिक्षा को किन बीमारियों ने जकड़ा हुआ है, मुसीबतों के पिटारे को खोलने जैसा है। यह मुसीबत बचपन की गरीबी से जुड़ी हो सकती है या संसाधनों से जूझ रहे स्कूल डिस्ट्रिक्ट की। संभव है शिक्षकों के खराब वेतनमान से इसका संबंध हो या फिर प्राइवेट स्कूलों में जाने की होड़ से। सच्चाई इनमें से कई के मिले-जुले असर में भी निहित हो सकती है, मगर कंप्यूटरों की कमी में तो कतई नहीं। यहां तक कि टेक्नोलॉजी के झंडाबरदार भी नहीं कहते कि अमेरिकी शिक्षा टेक्नोलॉजी की कमी के कारण पतन की ओर जा रही है।

अमेरिका में शिक्षा के बारे में ज्यादातर विमर्श दूसरे देशों से तुलना से पैदा होता है। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट (पीसा) ने 2012 के अपने नतीजों में अमेरिकी छात्रों को गणित में 27वें और रीडिंग में 17वें स्थान पर रखा था। लेकिन समग्र तौर पर भले ही अमरीकी बच्चे पिछड़ते दिखाई पड़ रहे हों, मजबूत बच्चे कतई पीछे  नहीं हैं। उदाहरण के लिए वार्षिक इंटरनेशनल मैथ ओलंपियाड में, जहां प्रत्येक देश अपने बेहतरीन 6 बच्चों को बेहद मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिए भेजता है, अमेरिका लगातार तीन शीर्ष देशों में जगह बनाए हुए है।

लेकिन जैसा कि पीसा के आंकड़े बताते हैं, इसमें शानदार प्रदर्शन करने वाले देश सिर्फ अमीरों के ही नहीं, बल्कि हर बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा का इंतजाम करते हैं। दुर्भाग्य से इस मामले में अगर दुनिया के 33 अमीर देशों से तुलना करें तो अमेरिका का रिकॉर्ड बहुत खराब है। 15 वर्ष तक के बच्चों के नामांकन के मामले में यह तीसरा सबसे कम नामांकन वाला देश है (करीब 20 प्रतिशत अमेरिकी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)। और स्कूल असमानता के लिहाज से अमेरिका सबसे बुरा प्रदर्शन करने वालों में 9वें स्थान पर हैं- यहां अमीर और गरीब बच्चों के बीच प्राप्तांकों में भारी अंतर दिखाई देता है। हर कोई जानता है कि हमारे स्कूल असमान हैं। पर कम लोग स्वीकार करते हैं कि स्कूलों के बीच असमानता असल में वैश्विक स्तर पर हमारे खराब प्रदर्शन का कारण है।

अगर शैक्षिक असमानता ही अहम मुद्दा है तो डिजिटल टेक्नोलॉजी के जखीरे खड़े कर देने से स्थितियां नहीं बदलने वालीं। टेक्नोलॉजी प्रदत्त विस्तारण का यह संभवतः सबसे कम समझा गया पहलू है। एक कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी शिक्षामंत्री अर्ने डंकन ने शिक्षा में टेक्नोलॉजी के उपयोग को बढ़ाने (45 गुना टेक्नोलॉजी और शिक्षक मात्र 25 गुना) की वकालत करते हुए कहा, ‘टेक्नोलॉजी उन गरीबों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण छात्रों के लिए बरबरी के अवसर पैदा करती है, जिनके पास घर में लैपटॉप या आईफोन नहीं हैं’, लेकिन यह सोच एक खुशफहमी से ज्यादा कुछ नहीं; यह भ्रामक है और गलत दिशा में ले जाता है। टेक्नोलॉजी संपत्ति व उपलब्धियों में पहले से मौजूद असमानता को और ज्यादा बढ़ा देती है। ज्यादा शब्दभण्डार वाले बच्चे विकीपीडिया से ज्यादा हासिल करते हैं। वीडियो गेम्स मानसिक रूप से कमजोर बच्चों में भटकाव को बढ़ा देते हैं। अमीर माता-पिता अपने बच्चों के लिए डिजिटल प्रणालियों की प्रोग्रामिंग सिखाने वाला ट्यूटर लगा सकते है, जबकि दूसरे बच्चे इन प्रणालियों को महज चलाना भर सीख रहे होते हैं। स्कूल में टेक्नोलॉजी पहुंच के लिहाज से बराबरी से खेलने के मौके पैदा कर सकती है, लेकिन ऐसे मौके खिलाड़ी के कौशल में कोई इजाफा नहीं करते। शिक्षा के लिहाज से यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यूनिवर्सिटी ऑफ कलिफोर्निया, इरविन में प्रोफेसर और एजुकेशनल टेक्नोलॉजी क्षेत्र के शीर्ष दिग्गजों में शुमार मार्क वार्शौर कहते हैं, ‘स्कूलों में सूचना एवं संचार टेक्नोलॉजी के प्रवेश से असमानता के मौजूदा रूपों का ही विस्तार होता है।’

अगर टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में काम कर रहे अभिभावक अपने बच्चों के मामले में सही हैं, तो अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था को चाहिए कि वह टेक्नोलॉजी को बढ़ाने के बजाय जरूरतमंद बच्चों के लिए अच्छे शिक्षकों के इंतजाम पर ज्यादा ध्यान दे। नजारा बेशक डरावना और चुनौतीपूर्ण है, मगर शैक्षिक अवसरों में असमानता की बीमारी को टेक्नोलॉजी की तगड़ी खुराक से दुरुस्त नहीं किया जा सकता। मुंह बाए खड़ी सामाजिक-आर्थिक खाई को लक्ष्य किए बिना टेक्नोलॉजी खुद ब खुद इसे पाट नहीं सकती, उलटे यह इसे और चौड़ा कर देगी।

(यह लेख केंटारो टोयामा की आने वाली पुस्तक ‘गीक हैरेसी: रेसक्यूइंग सोशिअल चेंज फ्रॉम द कल्ट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ से लिया गया है.)

अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

गंभीर खतरे में स्कूल : रोहित धनकर

rohit dhankar

राजस्थान सरकार ने हाल ही में 17,000 से ज्यादा स्कूलों को बंद करने का फैसला किया। इसी तरह महाराष्ट्र ने 14,000 और उड़ीसा ने 195 स्कूलों को बच्चों के बेहद कम नामांकन की बिना पर बंद करने का फरमान जारी किया। ये कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक (सरकारी) शिक्षा व्यवस्था के पतन के स्पष्ट संकेत हैं।

उधर, प्राइवेट स्कूल व्यवस्था के दुर्गुणों को समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी होगा। हाल ही में, एक अभिभावक ने अपने बेटे के स्कूल के अध्यापकों के उस रुख के बाबत बताया जो उसकी कमजोरी को लेकर था। विज्ञान, समाज विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापकों ने पिता से बच्चे की कमजोरियों को दुरुस्त करने की मांग की! हैरान-परेशान पिता के सवाल थे, “बच्चे के कक्षाकार्य पूरा न करने या स्कूल में दुर्व्यवहार करने आदि से निपटने की जिम्मेदारी क्या अध्यापक की नहीं है? अगर मेरा बच्चा घर में शैतानी करता है या हमारे कहने पर पढ़ता-लिखता नहीं है तो अभिभावक के बतौर उसे समझाना-बुझाना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए हम अध्यापक से शिकायत करने नहीं जाते। मगर आजकल अध्यापक हर बात पर माता-पिता से क्यों शिकायत करते हैं?” पिता के मुताबिक, “बच्चे की पढ़ाई-लिखाई के लिए अध्यापक को जिम्मेदार होना चाहिए, जिस प्रकार उसकी कापी-किताब, पेन-पेन्सिल आदि की व्यवस्था के लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं।”

यह प्रवृत्ति जो अब तक मझोले और आला दर्जे के प्राइवेट स्कूलों में दिखा करती थी, अब सस्ते निजी स्कूलों में भी जगह बना रही है।

 सरकारी स्कूलों का पतन

सरकारी स्कूल मर रहे हैं, क्योंकि वे काम नहीं करते। इस समस्या की शुरुआत 1950 के दशक के अंतिम वर्षों और 60 के दशक में तब हुई, जब स्कूलों की संख्या में इजाफे के साथ-साथ बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। अधिकतर राज्यों में, शिक्षक बहुत कम पगार पाते थे और स्कूल प्रशासन अक्षम था। राजस्थान जैसे राज्य में बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त किये गए। इस सब बातों ने शिक्षा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया। शिक्षकों का उत्साह जाता रहा और वे असंतुष्ट हो गए।

कुछ राज्य सरकारों ने 1950 के दशक के बीतते-बीतते स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी पंचायती राज पर डालनी शुरू की। इस कदम से स्कूल में स्थानीय राजनेताओं का दखल बढ़ गया और वे शिक्षकों के तबादलों में हस्तक्षेप करने लगे। इसके अलावा कम सुविधाओं, कम पगार, समय पर पगार देने में कोताही जैसे अनेक कारणों से शिक्षक स्कूलों से गैर-हाजिर रहने लगे। परिणामस्वरूप नए-नए उभर रहे शिक्षक संघों में आत्म-केन्द्रीयता की प्रवृत्ति पैदा होने लगी। स्कूल के कामकाज और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जगह वे अपनी सुविधाओं व फायदों को तरजीह देने लगे। उनके इस रुख के लिए उन्हें शायद ही कोई जिम्मेदार ठहराए।

समस्याओं को गंभीरतापूर्वक सुलझाने के बजाय शिक्षा योजनाकारों व प्रशासकों ने शिक्षा की बढ़ती ज़रूरतों के मद्देनजर फौरी व चालू उपायों को प्राथमिकता दी। कई ऐसे महत्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने इस मानसिकता को तैयार करने में भूमिका निभाई, जैसे- ज्यादा स्कूलों की मांग, धन व अन्य संसाधनों की कमी, वोट की राजनीति का दबाव और सरोकार का अभाव। यह मानसिकता 60 के दशक के बाद लागू किए गए सभी शैक्षिक कार्यक्रमों में देखी जा सकती है- अनौपचारिक शिक्षा, शिक्षा कर्मी, डीपीईपी और सर्व शिक्षा अभियान। प्रत्येक स्तर पर इन कार्यक्रमों की आलोचना हुई और अनेक शिक्षाविदों ने इनकी अवधारणा और नियोजन में मौजूद समस्याओं के बारे में स्पष्ट रूप से आगाह किया। लेकिन इन कार्यक्रमों को कई स्वाभाविक समर्थक भी मिले जिन्होंने इनके पक्ष में तरह-तरह के कुतर्क गढ़ डाले और उन्हें शैक्षिक बदलाव के उदाहरणों के बतौर आगे बढ़ाया।

 स्कूल का विचार

इन कार्यक्रमों के साथ बुनियादी समस्या यह रही कि इन्होंने स्कूल की अवधारणा को कमजोर किया। स्कूल का स्पष्ट उद्देश्य है- सीखना। और सीखने की प्रक्रिया शिक्षक और छात्र, दोनों से तल्लीनता की अपेक्षा करती है। विचारों के सतत एवं सुसंगत अन्वेषण के लिए तथा बौद्धिक श्रम व मानसिक अनुशासन के लिए निर्धारित समय व स्थान चाहिए। यह सब संभव नहीं अगर क्या सीखना है और कैसे सिखाना है, जैसे सवालों के समुचित उत्तर न तलाशे जाएं। इसलिए एक व्यवस्थित स्थान के रूप में स्कूल अपेक्षा करता है कि शिक्षक में बच्चों की बौद्धिक व भावनात्मक ज़रूरतों की पेशेवर समझ और उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता तथा शिक्षणशास्त्रीय निर्णय की क्षमता हो। जब इन सब ज़रूरतों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता है तो स्कूल का विचार ही विद्रूप हो जाता है। पिछले पांच दशक से शिक्षा व्यवस्था दरअसल यही कुछ कर रही है।

उदाहरण के रूप में, अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में करोड़ों रुपये खर्च किये गए और यह योजना पूरे देश में 1960 दशक के अंतिम वर्षों से 1990 दशक की शुरुआत तक चली। इस परियोजना में शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण और शैक्षिक योजना के पेशेवर ज्ञान के विचार की पूरी तरह उपेक्षा की गयी। इस प्रकार पूरे देश में एक सन्देश फैलाया गया कि कोई भी पढ़ा सकता है। इसने स्कूलों के लिए अलग से समुचित जगह के विचार को दरकिनार कर यह साबित करने की कोशिश की कि शिक्षा के लिए किसी तरह के बुनियादी ढांचे की खास ज़रूरत नहीं है। इसने शिक्षक व छात्र दोनों की बौद्धिक ज़रूरतों की उपेक्षा की। कुल मिलाकर इसने शिक्षा, शिक्षक और स्कूल के विचार का अवमूल्यन किया।

जब तक इस गड़बड़झाले की असफलता का पता चलता, कई अन्वेषक राजस्थान में शिक्षा कर्मी जैसी अन्य पहलकदमियों के साथ हाज़िर हो गए। डीपीईपी कार्यक्रम भी लागू किये जाने के लिए लगभग तैयार था। सर्व शिक्षा अभियान समेत ऐसे तमाम कार्यक्रमों में पेशेवर ज्ञान, बौद्धिक श्रम, बच्चों के प्रति संवेदनशीलता और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत जैसी बातों के बीच संतुलन बैठाने की कतई कोशिश नहीं हुई। कभी संवेदनशीलता को शैक्षिक ज्ञान के बरक्स खड़ा किया और कभी शिक्षक की स्कूल में लगातार मदद को उसके शैक्षिक ज्ञान के बरक्स। अच्छी शिक्षा की जरूरतों की स्पष्ट समझ के अभाव तथा पिछली खराब नीतियों का सीधा परिणाम आज स्कूलों के खात्मे के रूप में दिखाई पड़ रहा है।

 बाजार का प्रवेश

इस बीच, शिक्षा की स्थिति से चिंतित अभिभावकों की बेचैनी को भुनाने के लिए निजी क्षेत्र आगे आ गया। आज प्राइवेट स्कूल दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि जहां सरकारी स्कूल व्यवस्था पतन की ओर अग्रसर है, वहीं प्राइवेट व्यवस्था बेहतर से बेहतरीन होती जा रही है।

यह झूठी धारणा संभवतः जान-बूझकर फैलाई जा रही है। प्राइवेट स्कूल मुनाफे के लिए काम करते हैं; यह तथ्य ही अपने आप में बच्चों के विकास की परवाह करने वाले अच्छे स्कूल की अवधारणा के विपरीत है। एक अच्छा स्कूल वह होता है जहां ज्ञान संजोया जाता है, जहां बुद्धि का विकास होता है, जहां बच्चे के प्रति संवेदनशीलता होती है और जहां आवश्यक संसाधनों की कमी नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में स्कूल मालिक अवधारणाओं की समझ की जगह प्रतियोगिता पर जोर देते हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर जानकारियों को रटने का दबाव होता है- और यह बात समझ का घोर अवमूल्यन करती है। वास्तविक समझ अवधारणात्मक स्पष्टता की मांग करती है। यह एक कठिन प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है। प्राइवेट स्कूल स्वभावतः रट्टा आधारित पहली विधि को प्रोत्साहित करते हैं। दूसरे शब्दों में, वे एक अच्छे स्कूल की अपेक्षाओं का अवमूल्यन कर सीखने के मूल विचार को ही दरिद्र बना देते हैं।

इन सब के आगे, प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था का सबसे हानिकारक पहलू कुछ और है- प्राइवेट स्कूल बच्चे के नैतिक विकास, समझ के विकास और व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। उनका आदर्श एक कंसल्टेंट एजेंसी की तरह काम करने का होता है। अगर किसी बच्चे में कोई नैतिक या व्यवहारगत समस्या है तो ये स्कूल अभिभावक से उसे ठीक करवाने को कहेंगे। बच्चे की शैक्षिक कमजोरी के लिए ये प्राइवेट ट्यूशन करवाने की सलाह देंगे। किसी भी स्थिति में ये अपनी बुनियादी शैक्षिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। इस तरह उनकी भूमिका बेहद सीमित हो जाती है, जो ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के अनुकूल है। ये स्कूल की अवधारणा का ही दिवाला निकाल देते हैं।

सरकारी स्कूलों में बच्चों के न पहुंचने और प्राइवेट स्कूलों में स्कूल की अवधारणा के ही सीमित हो जाने की इस दोहरी बीमारी के कारण स्कूल आज गंभीर खतरे में हैं। एक समाज के बतौर ऐसा प्रतीत होता है हम इस अहसास से बहुत दूर हैं कि सभ्यताएं शिक्षा पर निर्भर होती हैं और शिक्षा की प्राथमिक जगह स्कूल है। अगर स्कूल मरते हैं तो सभ्यताओं का भी पतन होता है। जब तक हम शिक्षा की समझ, नियोजन और कार्यान्वयन में श्रम की जरूरत को मान्यता नहीं देंगे, इस अधोगति को रोक नहीं सकेंगे और हमारे स्कूल या तो बंद हो जायेंगे या कंसल्टेंसी सेवाओं में बदल जायेंगे। उनकी जगह ट्यूशन की दुकानें खुल जायेंगी। बेशक इन स्थितियों को उलटने के लिए सही राजनीतिक और आर्थिक फैसलों की दरकार होगी, पर ये फैसले अगर गहरी शैक्षिक समझ के बिना लिए जाएंगे तो सफल नहीं होंगे।

 (28 अक्टूबर, 2014 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित आलेख, अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)