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सरकारी शिक्षा का भस्मासुर :  महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 आने के बाद देश भर से लगातार सरकारी स्कूलों के बंद होने की खबर आ रही हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में अब तक हजारों सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं। सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या साल दर साल घटती जा रही है। सरकारी स्कूलों के प्रति विश्‍वास लगातार कम होता जा रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले पांच-सात सालों के भीतर सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या अँगुलियों में गिने जाने लायक रह जाएगी।

इसके पीछे सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण है- शिक्षा अधिकार अधिनियम-09 के अंतर्गत 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश देने सम्बन्धी प्रावधान है। इसने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में जनता के रहे-सहे विश्वास को भी ख़त्म करने का काम किया है। यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि इस क़ानून के अंतर्गत व्यवस्था है कि प्रत्येक निजी विद्यालय अपनी कुल छात्र संख्या के 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देगा, जिनका शुल्क राज्य सरकार द्वारा उस विद्यालय के खाते में जमा कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था। पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है। लेकिन उक्‍त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है। जब सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही हो तो भला कोई क्यों अपने बच्चों को कमतर स्कूलों में डालना चाहेगा और जब सरकार निजी स्कूल में पढ़ाने का खर्चा देने को तैयार हो तो फिर भला कोई क्यों अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालेगा। सरकार ने बहुत चालाकी से शिक्षा के निजीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। बहुत जल्दी ही सरकार गरीब बच्चों को वाउचर थमाकर सार्वजनिक शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी। वह दिन दूर नहीं जब दूर-दराज के गांवों में ऐसे निजी स्कूल खुल जाएंगे, जहाँ 75 प्रतिशत बच्चों से भारी-भरकम शुल्क वसूल किया जाएगा और 25 प्रतिशत बच्चों का सरकार से वाउचर प्राप्त किया जाएगा। निजी स्कूलों की पाँचों अंगुलियाँ घी में होंगी। इसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव वंचित/दलित वर्ग के बच्चों पर पड़ना है, क्योंकि वर्तमान में सरकारी स्कूलों में सबसे अधिक बच्चे इसी वर्ग के पढ़ रहे हैं। आज जहाँ इसके शत-प्रतिशत बच्चे निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहां सरकारी स्कूल बंद होने के बाद केवल 25 प्रतिशत ही निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। उनके साथ भी भेदभाव होने की आशंका अलग से रहेगी। जैसा कि जो बच्चे अभी सरकारी खर्चे से निजी स्कूलों में जा रहे हैं, उनके बारे में समय-समय पर भेदभाव की ख़बरें सुनने को मिलती रहती हैं। बताया जाता है कि बहुत सारे निजी स्कूलों ने उनकी एक अलग कैटेगरी बना दी है। एक आशंका और है- वंचित/दलित वर्ग के बच्चों का शिक्षण शुल्क तो सरकार देगी, लेकिन निजी स्कूलों द्वारा शिक्षण शुल्क के अलावा आए दिन लिए जाने वाले शुल्कों का क्या होगा? ये ऐसे शुल्क हैं, जिन्होंने मध्यवर्ग के नाक पर ही दम किया है, गरीब वर्ग इनको कैसे वहन करेगा? जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, सच कहा जाए तो निजी स्कूलों में भी भाषा-गणित और विज्ञान जैसे विषयों को मात्र रटाया जा रहा है। सच्चे अर्थों में जिसे शिक्षा कहा जाता है, जो एक संवेदनशील, विवेकवान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है, उससे निजी स्कूल कोसों दूर हैं। बावजूद इसके उन्हें ही मानक माना जा रहा है।

कैसी विडंबना है कि एक ओर वाउचर देकर बच्चों को निजी स्‍कूलों में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा दूसरी ओर सरकारी स्कूल के शिक्षकों से पूछा जा रहा है कि उनके स्कूलों में छात्र संख्या कम क्यों हो रही है ? प्रकारांतर से उन्हें  इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि शिक्षक से सारे काम खूब करवा जा रहे हैं और उसके मूल काम से उसको दूर किया जा रहा है। गलत सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के प्रति इतना अधिक अविश्‍वास पैदा कर दिया है कि जिन सरकारी स्कूलों में बहुत अच्छी पढा़ई भी हो रही है, वहां भी आज अभिभावक अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। उक्त प्रावधान के आने से पहले तक गरीब परिवार के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में आते थे, लेकिन अब उन्हें भी निंजी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने के झूठे गौरव में डुबाया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार निजी स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी सरकारी स्कूलों में आने के लिए प्रोत्साहित करती। उन कमियों को दूर किया जाता, जिनके चलते सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में कमी आ रही है, लेकिन हो उसका उल्टा रहा है।

वरिष्ठ शिक्षाविद योगेश बहुगुणा का यह कहना सही है कि  सरकारी स्कूलों की जो दुर्दशा है, उन्हें देखकर तो गरीब से गरीब आदमी भी वहां अपने बच्चों को भर्ती नहीं करना चाहेगा। अपवादस्वरूप कुछ अच्छे स्कूल हो सकते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दुर्दशा के मूल कारणों को दूर करने के ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं किए गए। सुधार के नाम पर जड़ का इलाज करने के बजाय उसके तनों को काटने-छांटने और सींचने की नौटंकी ही अधिक की जाती रही है। शिक्षा अधिनियम-2009 में कुछ अच्छे प्रावधान भी हैं। जैसे- हर स्कूल में पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल का मैदान, पर्याप्त कक्षा-कक्ष आदि, लेकिन आठ साल गुजरने को हैं इनकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। आज भी कमोबेश वही स्थित है जो इस अधिनियम के आने से पहले थी। छात्र-शिक्षक मानक के आधार और शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्यों से मुक्त करने की मांग हमेशा से की जाती रही है, पर इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

आश्चर्य होता है कि‍ सरकारी शिक्षा को ख़त्म करने की इतनी गहरी चाल चली गयी है, लेकिन कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं सुनाई दे रही है। औरों की तो छोडिये शिक्षक संगठन भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनके अधिवेशनों में भी इस पर कोई खास चर्चा नहीं होती है। और यदि कोई शिक्षक इस पर बात करता है, तो उसे अजीब सी नज़रों से देखा जाता है। कह दिया जाता है कि‍ यह हमेशा ऐसी ही नकारात्मक बात करता है। वरिष्ठ शिक्षाविद अनिल सदगोपाल के नेतृत्व में ‘अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच’ इस मुद्दे पर लगातार मुखर विरोध करता रहा है। इस बारे में अनिल सदगोपाल ने खूब लिखा भी है लेकिन बहुसंख्यक लोग उसे अनसुना करते रहे हैं। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। इसे देखकर तो लगता है कि आज अगर सरकार एक झटके में सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण की घोषणा भी कर दे तो कहीं कोई ख़ास हलचल नहीं होने वाली है। इस स्थिति के लिए देशी-विदेशी बाजारवादी शक्तियां पिछले पच्चीस वर्षों से वातावरण बनाने में लगी हुई हैं क्योंकि शिक्षा आज मुनाफे का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण से न केवल गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर संकट आएगा, बल्कि स्थायी रोजगार का एक बड़ा क्षेत्र भी समाप्त हो जाएगा।

सरकारी स्कूल में पढ़ाने का सार्थक कदम : अनुराग

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राजधानी दि‍ल्‍ली के मटि‍याला वि‍धानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक गुलाब सिंह ने अपने छोटे बेटे का पब्लिक स्कूल से नाम कटाकर उसका दाखिला
सरकारी स्कूल में करवा दि‍या है। स्थानांतरण प्रमाण-पत्र नहीं मिल पाने के कारण वह निजी स्कूल में पढ़ रहे अपने बड़े बेटे का दाखिला सरकारी स्कूल में नहीं करवाया सके। वह 10वीं कक्षा का छात्र है।अगले वर्ष उसका दाखिला भी सरकारी स्कूल में करवा दिया जाएगा।

ऐसे समय में जब शि‍क्षा का नि‍जीकरण तेजी से हो रहा है और उच्‍च ही नहीं, मध्‍य और नि‍म्‍न वर्ग भी सरकारी स्‍कूलों की अपेक्षा घर-घर दुकान की तरह खुले तथाकथि‍त पब्‍लि‍क स्‍कूलों को प्राथमिकता दे रहा है, वि‍धायक गुलाब सिंह का अपने बच्‍चों को पब्‍लि‍क स्‍कूल से सरकारी स्‍कूल में पढ़ाने का फैसला साहसि‍क और प्रशसंनीय है।

वि‍धायक बेटे के सरकारी स्‍कूल में पढ़ने से उस स्‍कूल की शि‍क्षा और प्राशसि‍नक व्‍यवस्‍था पर सकारात्‍मक असर पडे़गा। इसका लाभ उस स्‍कूल में पढ़ रहे अन्‍य बच्‍चों को भी प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से मि‍लेगा। दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍थि‍ति‍ है कि‍ नौकरशाहों, सरकारी कर्मचारि‍यों, सम्‍पन्‍न लोगों और मध्‍यवर्ग ने भी अपने बच्‍चों को सरकारी स्‍कूलों में पढ़ाना बंद कर दि‍या है। सि‍फारि‍श कराएंगे, मोटा डोनेशन और हर महीने अच्‍छी-खासी फीस देंगे, बीच-बीच में स्‍कूल को चढ़ावा चढ़ाते रहेंगे और
इस सबका रोना भी रोएंगे, लेकि‍न बच्‍चे के लि‍ए स्‍कूल चाहि‍ए ऐसा, जि‍सके नाम के आगे पब्‍लि‍क स्‍कूल, कांवेंट स्‍कूल जैसे शब्‍द जुडे़ हों। उस स्‍कूल में क्‍या पढ़ाया जाता है और कितने योग्‍य अध्‍यापक उस स्‍कूल में हैं, इससे उसे कोई खास मतलब नहीं होता। अभिभावकों ने मान लिया
है कि पब्‍लिक या कांवेट शब्‍द ऐसे ही अच्‍छे स्‍कूल की गारंटी हैं, जैसे सामना खरीदने में आइएसआइ चिह्न का होना। हमारी इसी मानसि‍कता ने सरकार को मौका दे दि‍या है कि‍ वह सरकारी स्‍कूल नहीं खोल रही है और जो खुले हैं, उन्‍हें या बंद कि‍या जा रहा है या पीपीपी मॉडल के नाम नि‍जी हाथों को सौंपा जा रहा है। ऐसे में और सरकारी स्‍कूल खोलने की बात करना भी बेईमानी है।

हर साल की तरह आजकल इस बार फि‍र कई स्‍कूलों में फीस और एनुअल चार्ज में बेतहाशा वृद्धि‍ के खि‍लाफ अभि‍भावकों का आंदोलन चल रहा है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, शासन-प्रशासन से गुहार लग रहे है, कुछ ने न्‍यायालय का दरवाजा भी खटखटाया है और कई जगह तो स्‍कूल प्रबंधन और अभि‍भावकों के बीच झड़प भी हो चुकी है, लेकि‍न इस सबका परि‍णाम क्‍या नि‍कलेगा? बहुत हुआ तो फीस व एनुअल चार्ज में दो-चार प्रतिशत की कमी और मामला रफादफा। अब तो हर साल यह सब एक रस्‍म अदायगी जैसा होना लगा है। शायद ये निजी स्‍कूल वाले भी इसके लिए तैयार रहते हैं। इसलिए वे पहले ही तीस-चालीस प्रतिशत तक बढ़ोत्‍तरी कर देते हैं। ऐसे में पांच-सात प्रतिशत कम करने पर भी उन पर कोई खास असर नहीं पड़ता।

इस समस्‍या का स्‍थाई समाधान शिक्षा के सरकारीकरण में ही है। सरकार स्‍कूल खोले, उनमें व्‍यवस्‍थागत खामियां दूर करे और अध्‍यापकों को गैरसरकारी कार्यों में न लगाए। शिक्षकों को अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। स्‍कूलों में शिक्षा के स्‍तर सुधार होगा तो अभिभावक भी इस ओर कदम बढ़ाएंगे। बकौल उत्‍तराखंड के बागेश्‍वर जिले के गरुड खंड के खंड शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्‍वत उनके खंड के स्‍कूलों में सभी शिक्षकों सहयोग से शिक्षा का स्‍तर बेहतर हुआ है। इसका परिणाम है कि कई अभिभावकों ने अपने बच्‍चों का निजी स्‍कूलों से निकालकर सरकारी स्‍कूलों में एडमिशन कराया है। यह अनुभव बहुत कुछ कहता है।

अभिभावकों को इसके लिए आगे आना होगा। कल्‍पना कीजिए कि किसी मंत्री, सचिव, आइएएस अधिकारी या किसी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति का बच्‍चा सरकारी स्‍कूल में पढ़ता है। वह अपने पिता को स्‍कूल की शिक्षा और वहां की कमियों के बारे में बताता है तो उसका तुरंत और प्रभावशाली ढंग से समाधान होगा।

विधायक गुलाब सिंह का कथन महत्‍वपूर्ण है कि नेता लोगों के बीच बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उस पर खुद अमल नहीं करते। यहां नेताओं के साथ ही अन्‍य लोगों को शामिल कर लिया जाए तो स्‍थिति यही है। विधायक गुलाब सिंह ने तो एक शानदार पहल की है। हम न जाने कब इस ओर कदम बढ़ाएंगे।