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भगत सिंह को लेकर कुछ गैरवाजिब चिंताएं : सुधीर विद्यार्थी

क्रान्‍ति‍कारी लेखक सुधीर वि‍द्यार्थी का आलेख-

1. भगत सिंह को अकादमिक चिंतन या बौद्धिक विमर्श की वस्तु न बनाया जाये। यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रगतिशील और बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का बिन्‍दु बनने से बहुत पहले भगतसिंह लोक के बीच नायकत्व हासिल कर चुके थे। उन पर सर्वाधिक लोकगीत रचे और गाये गये। मुझे खूब याद पड़ता है कि अपनी किशोरावस्था में गाँवों में मेलों और हाटों में पान की दुकानों पर आइने के दोनों तरफ और ट्रकों के दरवाजों पर भगतसिंह की हैट वाली तथा चन्द्रशेखर आजाद की मूँछ पर हाथ रखे फोटुएं हुआ करती थीं। शुरुआत में जनसंघ के लोगों ने भी उन्हें इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए बम फेंकने वाले एक बहादुर नौजवान, जो हँसते हुए फाँसी का फंदा चूमता है, के रूप में जिन्‍दा बनाये रखा। प्रगतिशीलों के विमर्श में तो वे बहुत देर से आये। जानना यह होगा कि भगतसिंह या आजाद की जगह लोक के मध्य है। वहीं से दूसरा भगतसिंह पैदा होगा, अकादमीशियनों के बीच से नहीं।

2. इस समय को पहचानिए कि जहाँ बिग बी के साथ भोजन करने की नीलामी दस लाख रुपये तक पहुँच रही हो, जिस समाज में मुन्नी बदनाम होती है तो फिल्म हिट हो जाती है यानी बदनाम होने में अब फायदा है सो इसे हम बदनाम युग की संज्ञा दे सकते हैं, कॉमनवेल्थ खेलों में जहाँ पग-पग पर हमें गुलाम होने का अहसास कराया जाता हो और हम गुलाम रहकर खुशी का अनुभव भी कर रहे हों; इसी कॉमनवेल्थ का तो कवि शंकर शैलेंद्र ने अपने मशहूर गीत ‘भगतसिंह से’ में विरोध किया था जिसमें कहा गया था- मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से/ रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से। कामनवेल्थ कुटुंब देश का खींच रहा है मंतर से/प्रेम विभोर हुए नेतागण रस बरसा है अंबर से) तो ऐसे निकृष्ट संस्कृति विरोधी और इतिहास विरोधी समय में हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है कि भगतसिंह को याद करने अर्थ केवल एक समारोह अथवा प्रदर्शनप्रियता में तब्दील होकर न रह जाये। मैं मानता हूँ कि भगतसिंह को सेमिनारों और जेएनयू मार्का विश्‍वविद्यालयी चर्चाओं से बाहर निकाल कर उन्हें जनता के मध्य ले जाने की पहल करने का उपयुक्त समय भी यही है।

3. मेरा निवेदन है कि भगतसिंह को कृपया देवत्व न सौंपें और न उन्हें क्रान्‍ति‍ का आदिपुरुष बनायें। भगतसिंह कोई व्यक्ति नहीं थे, अपितु उनके व्यक्तित्व में संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास बोल रहा है। सत्तर साल लम्‍बे क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन ने भगतसिंह को पैदा किया। भगत सिंह उस आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने वाले एक व्यक्ति ही थे। वे स्वयं विकास की प्रक्रिया में थे। कल्पना करिए कि यदि भगतसिंह की जेल में लिखीं चार पुस्तकें गायब न हो गई होतीं तब उनके चिंतन और बौद्धिक क्षमताओं का कितना बड़ा आयाम हमारे सम्मुख प्रकट हुआ होता। दूसरे यह कि आगे चलकर भारतीय क्रान्‍ति‍ के मार्ग पर उन्हें और भी बौद्धिक ऊँचाई हासिल करनी थी। पर इस सबको लेकर उनके मन में कोई गर्वोक्ति नहीं थी,बल्कि एक विनीत भाव से उन्होंने स्वयं सुखदेव को संबोधित करते हुए कहा था कि क्या तुम यह समझते हो कि क्रान्‍ति‍ का यह उद्यम मैंने और तुमने किया है। यह तो होना ही था। हम और तुम सिर्फ समय और परिस्थितियों की उपज हैं। हम न होते तो इसे कोई दूसरा करता। और कितना आत्मतोष था उस व्यक्ति के भीतर जिसने बलिदान से पूर्व यह भी कहा कि आज मैं जेल की चहारदीवारी के भीतर बैठकर खेतों, खलिहानों और सड़कों से इंकलाब जिंदाबाद का नारा सुनता हूँ तो लगता है कि मुझे अपनी जिन्‍दगी की कीमत मिल गई। ….और फिर साढ़े तेईस साल की इस छोटी सी जिन्‍दगी का इससे बड़ा मोल हो भी क्या सकता था।

4. आवश्यक तौर पर देखा यह भी जाना चाहिए कि भगतसिंह के साथ पूरी क्रान्‍ति‍कारी पार्टी थी। हम पार्टी और संपूर्ण आंदोलन को क्यों विस्मृत कर जाते हैं। हम यह क्यों नहीं याद रखते कि भगत सिंह के साथ चन्द्रशेखर आजाद का सर्वाधिक क्षमतावान और शौर्यमय नेतृत्व था। क्या भारतीय क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन का मस्तिष्क कहे जाने वाले कामरेड भगवतीचरण वोहरा पार्टी के कम महत्वपूर्ण व्यक्ति थे जिन्होंने बम का दर्शन जैसा तर्कपूर्ण और बौद्धिक प्रत्युत्तर देने वाला पर्चा ही नहीं लिखा, बल्कि नौजवान भारत सभा और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र आदि उन्होंने लिपिबद्ध किये। हमने विजय कुमार सिन्हा, जिन्हें दल में अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और प्रचार-प्रसार की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, को भी हमने भुलाने योग्य मान लिया। यह सच है कि हम विजय दा से भगतसिंह की एक फुललेन्थ की जीवनी की अपेक्षा कर रहे थे जो उनेक जीवित रहते पूरी नहीं हो पाई। पर मेरा यहाँ जोर देकर कहना यह है कि हमने बटुकेश्‍वर दत्त से लेकर सुशीला दीदी, धन्वंतरि, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य मास्टर रुद्रनारायण सिंह आदि सबको भुलाने देने में पूरी तरह निर्लज्जता का परिचय दिया। हमने इनमें से किसी की शताब्दी नहीं मनाई। यह सब स्वतंत्र भारत में जीवित रहे पर हमने इनमें से किसी क्रान्‍ति‍कारी की खैर खबर नहीं ली। क्या पूरी पार्टी और उसके सदस्यों के योगदान और अभियानों को विस्मृत करके अपनी समारोहप्रियताओं के चलते भगतसिंह को हम उस तरह का तो नहीं बना दे रहे हैं- उतना ऊँचा और विशाल, जिसकी तस्वीर को फिर अपने हाथों से छूना मुश्किल हो जाये हमारे लिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी आत्ममुग्धताओं में ही डूबे यह सब देख समझ ही न पा रहे हों। इससे भविष्य के क्रान्‍ति‍कारी संग्राम को बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष की पूरी और सही तस्वीर को देख पाने में हम सर्वथा असमर्थ होंगे।

5. भगतसिंह के स्मरण के साथ एक खतरा यह भी है कि पिछले कुछेक वर्षों से हम देख रहे हैं कि उन्हें पगड़ी पहनाने का षड्यन्त्र बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। पर पंजाब के उस क्रान्‍ति‍कारी नौजवान का सिर इतना बड़ा हो गया कि अब उस पर कोई पगड़ी नहीं पहनाई जा सकती है। हम वैसा भ्रम भले ही थोड़ी देर को अपने भीतर पाल लें। यद्यपि शताब्दी वर्ष पर तो यह खुलेआम बहुत बेशर्मी के साथ संपन्न हुआ। देखा जाये तो हुआ पहले भी था जब मैं पंजाब के मुख्यमंत्री श्री दरबारा सिंह के आमंत्राण पर 1982 में चण्डीगढ़ में उनसे मिलने आया तो देखा कि उनके कार्यालय में भगतसिंह का जो चित्र लगा है उसमें उन्हें पगड़ी पहनाई गई है। अब विडंबना देखिए कि कोई आज उस पगड़ी को केसरिया रंग रहा है तो कोई लाल। इसमें आरएसएस से लेकर हमारे प्रगतिशील मित्र तक किसी तरह पीछे नहीं हैं। एक सर्वथा धर्मनिरपेक्ष क्रान्‍ति‍कारी शहीद को धर्म के खाँचे में फिट किये जाने की कोशिशों से सवधान रहना चाहिए। यहाँ अपनी बात कहने का हमारा अर्थ यह भी है कि सब भगतसिंह को अपने अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहे हैं। कोई कहता हे कि वे जिन्‍दा होते तो नक्सलवादी होते। उनके परिवार के ही एक सदस्य पिछले दिनों उन्हें आस्तिक साबित करने की असफल कोशिशें करते रहे। यह कह कर कि भगतसिंह की जेल नोटबुक में किसी के दो शेर लिखे हुए हैं जिनमें परवरदिगार जैसे शब्द आए हैं जो उनकी आस्तिकता को प्रमाणित करते हैं। सर्वाधिक तर्कहीन ऐसे वक्तव्यों की हमें निंदा ही नहीं, अपितु इसका विरोध करना चाहिए। यादविन्दर जी को भगतसिंह का लिखा ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा आलेख आँखें खोल कर पढ़ लेना चाहिए। मैं यहाँ निसंकोच यह भी बताना चाहता हूँ कि दूसरे राजनीतिक दल भी बहुत निर्लज्ज तरीके से इस शहीद के हाथों में अपनी पार्टी का झण्‍डा पकड़ाने का काम करते रहे जो कामयाब नहीं हुआ। धार्मिक कट्टरता और पुनरुत्थानवाद के इस युग में भगत सिंह की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की बड़ी पैरोकारी की हम सबसे अधिक जरूरत महसूस करते हैं। लेकिन ऐसे में जब गाँधी और जिन्ना को भी डंके की चोट पर धर्मनिरपेक्ष बताया जा रहा हो, और भाजपा के अलंबरदार स्वयं को खालिस और दूसरों को छद्म धर्मनिरपेक्ष बताते हों तब वास्तविक धर्मनिरपेक्षता जो नास्तिकता के बिना सम्‍भव नहीं है, उसका झण्‍डा कौन उठाए? यह साफ तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्मसमभाव कतई नहीं है जैसा कि हम बार-बार, अनेक बार प्रचारित करते और कहते हैं। यह हमारा सर्वथा बेईमानी भरा चिंतन है जिसका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। विचार यह भी किया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता आखिर कितनी तरह की? रघुपति राघव राजाराम जपने वाले गाँधी भी धर्म निरपेक्ष थे, मजहब के नाम पर मुस्लिम होमलैंड ले लेने वाले जिन्ना भी धर्मनिरपेक्ष थे और भगतसिंह भी। तब इनमें से कौन सही धर्मनिरपेक्ष है, और धर्मनिरपेक्षता आखिर है क्या बला?

6. इधर भगतसिंह को संसद का पक्षधर साबित करने के भी प्रयत्न हुए और हो रहे हैं। संसद में भगतसिंह का चित्र या मूर्ति लगवाने का क्या अर्थ है। जिस संसदीय चरित्र और उसकी कार्यवाहियों के विरोध में उन्होंने, दल के निर्णय के अनुसार पर्चा और बम फेंका, क्या आज उस संसद और उसके प्रतिनिधियों की चाल-ढाल और आचरण बदल कर लोकोन्मुखी और जनपक्षधर हो गया है। यदि नहीं तो क्यों भगतसिंह पर काम करने वाले उन पर पुस्तकें जारी करवाने के लिए किसी सांसद अथवा मंत्री की चिरौरी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। क्या हम वर्तमान संसदीय व्यवस्था के पैरोकार या पक्षधर होकर भगतसिंह को याद कर सकते हैं। आखिर क्यों भगतसिंह की शहादत के 52 वर्षों बाद उनकी बहन अमर कौर को भारत की वर्तमान संसद के चरित्र और उसकी कार्यप्रणाली पर उँगली उठाते हुए वहाँ घुसकर पर्चे फेंकने पड़े, जिसमें उठाए सवालों पर हमें गौर करना चाहिए। पर इस मुक्त देश में पसरा ठंडापन देखिए कि किसी ने भी 8 अप्रैल 1983 को अमर कौर की आवाज में आवाज मिलाकर एक बार भी इंकलाब जिंदाबाद बुलंद नहीं किया, जबकि यह दर्ज रहेगा कि इसी गुलाम देश ने तब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के स्वर में अपना स्वर बखूबी मिला दिया। जानने योग्य यह भी है कि पिछले दिनों संसद में भगतसिंह की जो प्रतिमा लगी उसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं और वहाँ उनके साथ बम फेंकने वाले उनके अभिन्न बटुकेश्‍वर दत्त नदारद हैं।

7. जरूरी है कि भगतसिंह को याद करने और उनकी पूजा या पूजा के नाटक में हम फर्क करें। आज सारे जनवादी और प्रगतिशील राजनीतिक व सांस्कृतिक सामाजिक संगठन भगतसिंह को याद कर रहे हैं। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी भी। यह चीजों को घालमेल करने की घिनौनी कोशिशें हैं ताकि असली भगतसिंह अपनी पहचान के साथ ही अपना क्रान्‍ति‍कारित्व भी खो बैठें। आखिर क्या कारण है कि भगतसिंह आज तक किसी राजनीतिक पार्टी के नायक नहीं बन पाए। यह सवाल बड़ा है कि आजाद की शहादत के बाद हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ को पुनर्जीवित करने के कितने और कैसे प्रयास हुए और वे कामयाब नहीं हुए तो क्यों? और क्यों आजादी के बाद कोई राजनीतिक दल हिसप्रस का झण्‍डा पकड़ने का साहस नहीं कर सका?

8. विचार यह करिए कि अब भावी इंकलाब का आधार क्या होगा। आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और दूसरे सारे युवा क्रान्‍ति‍कारी अधिकांशतः मध्यवर्ग से आए थे। आज पूँजीवादी व्यवस्था और बाजार के अनापशनाप विस्तार ने मध्यवर्ग को नागरिक से उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है। नई पीढ़ी पूरी तरह कैरियर में डूबी है। उसके सपनों में अब देश और समाज नहीं है। वहाँ नितांत लिजलिजे व्यक्तिगत सपनों की कंटीली झाडि़याँ उग आई हैं। समाज टूट रहा है तो सामाजिक चिंताएं कहाँ जन्मेंगी। निम्न वर्ग जिन्‍दगी जीने की कशमकश में डूबा रह कर दो जून की रोटी मुहैया नहीं कर पा रहा है तो दूसरी ओर उच्च वर्ग क्रान्‍ति‍ क्यों चाहेगा? क्या अपने विरुद्ध? ऐसा तो सम्‍भव ही नहीं है। तब फिर क्रान्‍ति‍ का पौधा कहाँ पनपेगा और उसे कौन खाद-पानी देगा। यह बड़ा सवाल हमारे सामने मुँह बाये खड़ा हुआ है और हम हवा में मंचों पर क्रान्‍ति‍ की तलवारें भाँज रहे हैं। हम जो थोड़ा बहुत क्रान्‍ति‍ के नाम पर कुछ करने की गलतफहमियाँ पाल रहे हैं, क्या वह हमारा वास्तविक क्रान्‍ति‍कारी उद्यम है। कौन जानता है हमें। जिनके लिए क्रान्‍ति‍ करने का दावा हम करते रहे हैं, वे भी हमसे सर्वथा अपरिचित हैं। आप जेएनयू के किसी एअरकंडीशंड कमरे में तीसरी मंजिल पर बैठकर तेरह लोग क्रान्‍ति‍ की लफ्फाजी करेंगे तो देश की जनता आपको क्यों पहचानेगी। याद रखिए कि जेएनयू देश नहीं है। पूछिए इस मुल्क के लोगों से छोटे शहरों, कस्बों, देहातों में जाकर अथवा सड़क पर चलते किसी आम आदमी को थोड़ा रोककर इन बौद्धिक विमर्श करने वाले लोगों के बारे में पूछिए तो वह मुँह बिचकाएँगे। वे तो इनमें से किसी को भी जानते बूझते नहीं। तो आप कर लीजिए क्रान्‍ति‍। इस देश की साधारण जनता आपसे परिचित नहीं है। न आप उसके साथ खड़े हैं, न ही वह आपके साथ। ऐसे में क्या आप जनता के बिना क्रान्‍ति‍ करेंगे? लगता है कि इस देश में अब थोड़े से हवा हवाई लोग ही क्रान्‍ति‍ की कार्यवाही को संपन्न करने का ऐतिहासिक दायित्व पूरा कर लेंगे। जनता अब उनके लिए गैरजरूरी चीज बन गई है।

9. आज भाषा का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है। यह आजादी के सवाल से गहरे तक जुड़ा हुआ है। अपनी भाषा के बिना आप आजादी की कल्पना नहीं कर सकते। पर आज सब ओर गुलामी की भाषा सिर माथे और उसकी बुलंद जयजयकार। भाषा का मामला सिर्फ भाषा का नहीं होता, वह संस्कृति का भी होता है। भगतसिंह ने यों ही भाषा और लिपि की समस्या से रूबरू होते हुए अपनी भाषाओं की वकालत नहीं की थी। क्या हम अंग्रेजी के बिना एक कदम भी आगे नहीं चल सकते? भाषा आज सबसे अहम मुद्दा है। हम उस ओर से आँखें न मूंदें और न ही उसे दरकिनार करें। भाषा के बिना राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता।

10. अब तीन अन्य गौर करने वाली बातों पर हम अपना पक्ष और चिंताएं प्रकट करेंगे। वह यह कि आज भी ईमानदारी से भगतसिंह को याद करने वालों को वर्तमान सत्ता और व्यवस्था उसी तरह तंग और प्रताडि़त करती है, जिस तरह साम्राज्यवादी हुकूमत किया करती थी। शंकर शैलेंद्र का ‘भगतसिंह से’ गीत गाने पर संस्कृतिकर्मियों पर यह कह कर प्रहार किया जाता है कि यह गीत 1948 में सरकार ने यह कह कर जब्त किया था कि यह लोकप्रिय चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जनता के मन में घृणा पैदा करता है। मैं स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्‍या शंकर शैलेंद्र के इस गीत पर से 1948 के बाद से अभी तक सरकारी पाबंदी हटी है अथवा नहीं। यदि ऐसा हुआ है तो कब? दूसरा यह कि कई वर्ष पहले पाकिस्तान की फौज हुसैनीवाला से भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के स्मारकों को तोड़कर ले गई। हमने क्यों नहीं अब तक उन स्मारकों की वापसी की मांग पाकिस्तान सरकार से की। क्या वह हमारा राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। और तीसरा विन्दु यह है कि कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक महोत्सव हुआ था, मेला लगा था। यह तब की बात है जब भगतसिंह पर एक साथ कई-कई फिल्में आई थीं यानी हमारे बॉलीवुड को भी क्रान्‍ति‍ करने का शौक चर्राया था। बाजार और बॉलीवुड में यदि भगतसिंह को बेचा जा सकता है तो इसमें हर्ज क्या है। बाजार हर चीज से मुनाफा कमाना चाहता है। पर मैं यहाँ फिल्मों में भगतसिंह को बेचने की बात नहीं कर रहा, न ही इस बात पर चिन्‍ता प्रकट कर रहा हूँ कि उन्होंने तुडुक तुडुक और बल्ले बल्ले करके भगतसिंह जैसे क्रान्‍ति‍कारी नायक को पर्दे पर नाचना दिखा दिया। मैं यहाँ बात कुछ दूसरी कहना चाहता हूँ। लखनऊ के उस मेले में एक रेस्त्रां बनाया गया था जिसका दरवाजा लाहौर जेल की तरह निर्मित किया गया। उसमें बैरों को वह ड्रेस पहनाई गई थी जिसे जेल के भीतर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पहना था। पानी जो वहाँ परोसा जा रहा था उसे काला पानी का नाम दिया गया था और घिनौनापन देखिए कि खाने के नाम पर स्वराज्य चिकन और काकोरी कबाब। यह हद से गुजर जाना है। लखनऊ एक प्रदेश की राजधानी है–सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक दलों का केंद्रीय स्थान। पर सब कुछ कई दिनों तक उस जगह ठीक ठाक चलता रहा। कोई हलचल नहीं। कोई विरोध नहीं। क्या हम वास्तव में मर चुके हैं, क्या हमारे भीतर कोई राष्ट्रीय चेतना शेष नहीं है। क्या हमें अपने राष्ट्रीय नायकों और शहीदों का अपमान कतई विचलित नहीं करता। क्या इतिहास के सवाल हमारे लिए इतने बेमानी हो गए हैं कि वे हमारे भीतर कोई उद्वेलन पैदा नहीं करते। कुछ लोग थोड़े वर्षों से तीसरा स्वाधीनता आंदोलन नाम से एक संगठन चला रहे हैं। शहीदेआजम भगतसिंह के दस्तावेजों को सामने लाने लाने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम करने वाले प्रो. जगमोहन सिंह जी भी उससे जुड़े हैं। पर इस संगठन के चिंतन के प्राथमिक बिन्‍दु पर गौर करिए कि आंदोलन चलाने से पहले ही उसने घोषित कर दिया कि इंडिया गेट को ध्वस्त कर वहाँ शहीदों की बड़ी मीनार बनाना है। क्या यही इस देश का तीसरा स्वतंत्राता युद्ध होगा। कल तक हम अपने बीच बचे रहे जिन्‍दा शहीदों को कोई सम्मान और आदर नहीं दे पाए, उनकी ओर आँख उठाकर भी हमने देखा नहीं, उन्हें ठंडी और गुमनाम मौत मर जाने दिया पर आज उनके ईंट पत्थर के बुत खड़े करने में हमारी गहरी दिलचस्पी है। भगतसिंह को याद करने वाले संगठन कितनी गलतफहमियों में जी रहे हैं यह देखने के लिये आँखों को ज्यादा फैलाने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह भी गौर करने लायक सच्चाई और त्रासदी नहीं है कि वामपंथी और साम्यवादी आंदोलन ही नहीं भगतसिंह के अनुयायी कहे जाने वाले लोगों और संस्थाओं ने भी सैद्धांतिक मीनमेख और थोड़े विमर्शों में स्वयं को अधिक उलझा लिया है। उनके बीच निर्लज्ज किस्म की संकीणताएं भी विद्यमान हैं। भगतसिंह का नाम स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए लिया जाना कतई ठीक नहीं।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या/मार्च 2012 से साभार)

‘जनता के समर्थन से ही इस व्यावसायीकरण को रोका जा सकता है : डॉक्‍टर अनूप सराया

विश्‍व बैंक लगातार तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों को सामाजिक क्षेत्र में वित्तीय कटौती की सलाह देता रहा है और यहां की दलाल सरकारें इन नीतियों को लागू करने में जुटी हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस बात की लगातार कोशिश की जा रही है कि एम्स में अब तक जो सुविधाएं उपलब्ध हैं उनके बदले मरीजों से पैसे लिए जायं जो बाजार की दर पर हों। इसके लिए सरकार की ओर से तरह-तरह के सुझाव पेश किये जा रहे हैं। सारा प्रयास एम्स के बुनियादी चरित्र को बदलने का है। इसी क्रम में वेलियाथन कमेटी का गठन हुआ और प्रधानमंत्री कार्यालय इस कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जोर दे रहा है। ‘प्रोग्रेसिव मेडिकोज ऐंड साइंटिस्ट फोरम’ के सक्रिय सदस्य और एम्स के गैस्ट्राइटिस विभाग में प्रोफेसर डॉ. अनूप सराया का कहना है कि एम्स ऐक्ट के मुताबिक एम्स के कामकाज में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं हो सकता- प्रधनमंत्री भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके स्वरूप में कोई भी बुनियादी तब्दीली संसद में बहस के बिना नहीं की जा सकती है। डॉ. सराया का यह भी कहना है कि  उन संस्थाओं के लिए जो जनता की सेवा के लिए हैं वित्तीय आधर पर स्वायत्‍तता  की अवधरणा ही गलत है। इसके पीछे असली मकसद एम्स को आम जनता की पहुंच से दूर करना है… प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आखिर सरकार एम्स के चरित्र में बदलाव क्यों चाहती है ?

दरअसल स्वास्थ्य संबंधी नीति में भूमंडलीकरण के बाद जो आमूल परिवर्तन आया है उसी का यह असर है। आज ये लोग रेवेन्यू पैदा करने के मॉडल की ओर जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक के स्ट्रक्चरल ऐडजस्टमेंट प्रोग्राम के तहत सामाजिक सुरक्षा में कटौती की नीति जब से बनी है तो स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में भी कटौती की योजना बनी। राजस्व पैदा करने के मॉडल पर ये लोग चलना चाहते हैं और कह रहे हैं कि हम उन लोगों को जिनके लिए बहुत जरूरी है और जो बीपीएल कार्ड होल्डर हैं उनको फ्री कर देंगे। अब सवाल ये है कि बीपीएल कार्ड कौन हासिल कर सकता है। अगर राज्य कहता है कि हमारे यहां गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या ज्यादा है तो केंद्र इस पर सवाल खड़े करता है। बीपीएल के साथ दिक्कत यह भी है कि अगर यह दूसरे राज्य का है तो हो सकता है दिल्ली में इसे स्वीकार न किया जाय। मसलन इंस्टीट्यूट ऑफ बिलिअरी साइंसेज जैसी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं जिसमें केवल दिल्ली का बीपीएल कार्ड होल्डर ही फायदा ले सकता है। अगर दूसरे राज्य से कोई इलाज कराने आ गया और बीपीएल कार्ड उसके पास नहीं है तो क्या आप उसका इलाज नहीं करेंगे?

जो लोग बीपीएल से ऊपर हैं उनमें से भी तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको यहां इलाज कराने की जरूरत पड़ती है।

बिलकुल ठीक कह रहे हैं। जो लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं उनकी भी हैसियत ऐसी नहीं है कि वे अच्छी चिकित्सा के लिए पैसे खर्च कर सकें। अब ये लोग नयी नीति के तहत बहुत सारे लोगों को इलाज से वंचित कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने (इन्क्ल्यूजन) की बजाय अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे दूर करने (एक्सक्ल्यूजन) की नीति पर ये लोग चल रहे हैं। इसके अलावा लगातार व्यावसायीकरण की एक मुहिम चल रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्‍व बैंक के नुस्खे के बाद आप देखेंगे कि स्वास्थ्य के बजट में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। यूपीए ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में कहा था कि इसे तीन प्रतिशत करेंगे जो आज भी डेढ़ प्रतिशत से नीचे ही है। भारत जैसे एक गरीब देश में जहां बड़ी तादाद में लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जहां 77 प्रतिशत लोग 20 रुपये से कम की दैनिक आय पर गुजारा करते हैं वहां अगर आप चिकित्सा को महंगी कर देंगे तो लोगों की क्या हालत होगी। एन सी सक्सेना कमीशन की रिपोर्ट हो या योजना आयोग की ढेर सारी रपटों को अगर आप देखें तो साफ पता चलता है कि इस देश में कितनी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो चिकित्सा पर पैसा नहीं खर्च कर सकते। हालांकि उन रिपार्टों में भी जो उन्होंने प्रति व्यक्ति कैलोरी का मानदंड रखा है वह आईसीएमआर की गाइड लाइंस को अगर देखें या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन की गाइड लाइन देखें तो वह कैलोरी इनटेक भी कम है। यानी अगर आप उसे भी उपयुक्त कैलोरी पर ले आयें तो यह संख्या और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। तो ऐसी हालत में भारत जैसे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की हो जाती है। लेकिन सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और कह रही है कि वह महज प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करेगी। यानी प्राथमिक से ऊपर की जरूरत है तो वह खरीदकर उसका लाभ उठायें। जहां पहले ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ की बात होती थी अब एफोर्डेबुल हेल्थ पर बात होने लगी है। इतना ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी बहुत सारी सेवाएं अब आउट सोर्स की जाने लगी हैं। धीरे-धीरे सरकार अब अपने हाथ खींचने लगी है। नियुक्तियों में भी अगर आप देखें तो मनमाने ढंग से काम हो रहा है। सरकार धीरे-धीरे अपनी संस्थाओं को तबाह करके प्राइवेट संस्थाओं को मदद करने में लगी है।

क्या पिछले 10 वर्षों में एम्स में इसकी कोई झलक मिली है ?

पिछले 10 वर्षों से लगातार इस दिशा में सरकार काम कर रही है। यहां एम्स में पहले 1992-93 में यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की गयी। उसके बाद 1996-97 में उसका विरोध कर हमने उसे रुकवाया। इसी वर्ष के आस पास इन्सेंटिव स्कीम लागू करने की कोशिश की गयी कि जो आय होगी उसका एक हिस्सा डॉक्टरों में बांटा जाएगा। उसको भी हम लोगों ने रुकवाया। हमने कहा कि हमारा सबसे बड़ा इन्सेंटिव यही है कि हमारा मरीज सही सलामत ठीक होकर यहां से चला जाय। हमने कहा कि आप जो भी इन्सेंटिव देंगे वह पैसा गरीब आदमी की जेब से ही निकलकर आयेगा इसलिए हमें उसकी जरूरत नहीं है। हां, आप अगर इन्सेंटिव देना ही चाहते हैं तो सरकार अपने किसी मद से इसकी व्यवस्था कर दे। आप किस तरह का इन्सेंटिव देना चाहते हैं। हमने कहा कि यह तो लूट में हिस्सेदारी होगी जो हमें नहीं चाहिए। फि‍र इन्होंने 2002 में कुछ यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की। फि‍र उसका विरोध हुआ। मेन इंस्टीट्यूट में तो नहीं लगा लेकिन जहां-जहां सेंटर बन गये हैं,  जैसे कार्डियो-न्यूरो सेंटर में- वहां लगा दिया। मेन इंस्‍टीट्यूट में वही जांच निःशुल्क होती है लेकिन इस सेंटर में उसके पैसे देने पड़ते हैं, जबकि वह भी इंस्टीट्यूट का ही हिस्सा है। यह लगभग सन् 2000 से शुरू हुआ। फि‍र इन्होंने 2005 में बाकायदा ‘रेश्‍नलाइजेशन ऑफ चार्जेज’ के नाम पर (जिसे मैं कामर्शियलाइजेशन ऑपफ हेल्थ केयर कहता हूं) हर जांच के,  हर ऑपरेशन के, हर चीज के पैसे लगा दिये। ये शुरू भी हो गया। सितंबर, 2005 से यह लागू हुआ जिसका फि‍र हम लोगों ने लगातार विरोध किया। इसके लिए हम लोगों ने लिखने से लेकर धरना-प्रदर्शन सब कुछ किया। लगातार सांसदों से मिलकर इस मुहिम को चलाया। अंततः आठ महीने बाद उस आदेश को वापस लिया गया। यह भूमंडलीकरण के दौर में हमारी एक बड़ी जीत थी। अब फि‍र से उसको किसी न किसी तरीके से लागू करना चाहते हैं। पहले फैकल्टी का कोई भी व्यक्ति छूट दे सकता था जिसे अब विभागाध्यक्ष तक सीमित कर दिया गया है। इनकी कोशिश है कि किसी तरह फि‍र से पैसा वसूला जाय लेकिन हम लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।

इसका मतलब यहां के डॉक्टरों में एक तरह की चेतना है?

हम लोग लगातार इन मुद्दों पर लड़ते रहे हैं इसलिए कुछ चीजों को रोक पाते हैं।

अच्छा ये बताइए कि वेलियाथन कमेटी का गठन किस मकसद से किया गया?

पहली चीज तो यह समझ लीजिए कि वेलियाथन साहब हैं कौन। वेलियाथन साहब जब श्री चित्रा इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे तो वहां उन्होंने एक रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल लागू किया था। उसके बाद उन्होंने अवकाश ग्रहण करने के बाद मनीपाल ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के खोलने का काम शुरू किया। तो इस प्रकार वेलियाथन साहब इंडस्ट्री के मददगार और रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल की वकालत करने वाले डॉक्टर हैं। इसलिए मनमोहन सिंह और मंटेक सिंह अहलूवालिया की सोच के साथ उनका तालमेल पूरी तरह बैठ गया और उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी गयी। पहली बार जब यहां रेवेन्यू जेनरेशन प्रोग्राम लागू करने की कोशिश की गयी थी उसमें मुंह की खानी पड़ी। दूसरी बार मई, 2006 में यह कोशिश हुई। वह एम्स में आरक्षण विरोधी आंदोलन का दौर था और आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ एम्स में अराजकता का माहौल बन गया। यहां के डायरेक्टर पूरी तरह आरक्षण विरोधि‍यों को समर्थन दे रहे थे। और कांग्रेस में भी एक बड़ा सेक्शन था जो आरक्षण विरोधि‍यों के साथ खड़ा था। अब देखिए कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह प्रोटोकोल तोड़ कर हड़ताली डॉक्टरों से दो बार मिले, जबकि कोई भी प्रधनमंत्री यही कहता कि पहले आप हड़ताल समाप्त करिए फि‍र बात करिए। वह हड़ताल अदालत के आदेश का उल्लंघन करके चल रही थी। उसमें न कोर्ट हस्तक्षेप कर रहा था और न स्थानीय प्रशासन। डॉक्टरों को हड़ताल के लिए टेंट लगवाये जा रहे थे, कूलर लगवाये जा रहे थे और सारी व्यवस्था की जा रही थी। तो पूरी तरह से अराजकता का माहौल था। उसमें यह कमेटी बनायी गयी थी जो इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के तरीकों का सुझाव दे सके। लेकिन उसने उन कारणों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जिसकी वजह से अराजकता पैदा हुई थी। हां, उसने यह जरूर बताया कि एम्स को किस तरह बड़े उद्योगों के लिए उपलब्ध कराया जाय। यह रिपोर्ट तैयार हो गयी। इसमें भी एक बात ध्यान देने की है। कमेटी की रिपोर्ट को इंस्टीट्यूट के निकाय ने स्वीकृति नहीं दी। उस सूरत में इसकी कोई वैधता नहीं थी। तब भी पीएमओ यह बार बार लिख रहा है कि वेलियाथन की सि‍फारिशों को लागू करिए। कैबिनेट मीटिंग में प्रधनमंत्री ने इंस्टीट्यूट को तीन महीने का समय दिया था कि इसे लागू कर दिया जाय। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो रिपोर्ट तैयार की गयी है वह इंस्टीट्यूट के कामकाज के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि इंस्टीट्यूट को इंडस्ट्री के लिए कैसे उपलब्ध कराया जाय। उसका इरादा ही कुछ और है।

तो अगर एम्स पर यह लागू हो जायेगा तो जितने पीजीआई हैं उन पर भी यह लागू होगा ?

देखिए, यह कमेटी इंस्टीट्यूट के लिए बनायी गयी थी। लेकिन सरकार अपनी नीयत साफ कर चुकी है। प्लानिंग कमीशन की मीटिंग के बाद मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने साफ कहा है कि एम्स जैसी संस्थाओं को पीपीपी मोड पर डाल दिया जाय- प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन। लिहाजा जितनी और संस्थायें हैं या बनेंगी वे सभी प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन के तरीके पर ही चलेंगी। अभी तो तमाम कमियों के बावजूद गरीब से गरीब आदमी को भी यहां से राहत मिल जाती है, लेकिन अब यह जो आखिरी उम्मीद है वह भी खत्म हो जायेगी। इसका चरित्र ही बदल जायेगा। गौर करिये कि इस इंस्टीट्यूट को किस लिए बनाया गया था। जब नेहरू मंत्रिमंडल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमृतकौर ने संसद में इसका बिल पेश किया तो उसमें कहा गया था कि इसका मकसद गरीब से गरीब आदमी को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना, राष्ट्र के हित में शोध करना,  चिकित्सा के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना और अध्यापन के नये तरीके विकसित करना है। इसका मतलब अनुसंधान और मरीजों की देखभाल पर मुख्य जोर था।

अब जब आप इंडस्ट्री के साथ जुड़ेंगे तो इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री करेगी, जो कंसल्टेंट हैं वे इंडस्ट्री के लिए काम करेंगे, पढ़ाई पर बुरा असर पड़ेगा, मरीजों की स्वास्थ्य सुविधा पर बुरा असर पड़ेगा और अगर आप इसका व्यावसायीकरण करेंगे तो गरीब से गरीब आदमी को आप इलाज नहीं दे सकेंगे। इसका जो मुख्य उद्देश्य है उससे आप दूर हो जायेंगे। इसलिए बुनियादी चरित्र में कोई भी परिवर्तन अगर आप लाना चाहते हैं तो उसके लिए संसद में बहस की जानी चाहिए।

अभी आपको इसका भविष्य कैसा दिखायी दे रहा है? क्या आप लोग इस बदलाव को रोक पायेंगे?

हम लोग तो इसको रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमको जनता से जितना ही अधि‍क समर्थन मिलेगा और राजनीतिक क्षेत्रों से जो समर्थन मिलेगा उतना ही हम इसे रोक पायेंगे। लेकिन राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि अगर वे इसके प्रति गंभीर होते तो काफी पहले ही इसे रोकने की दिशा में कुछ करते। जहां तक मीडिया का सवाल है, जो मेनस्ट्रीम अखबार हैं और नयी आर्थिक नीति का समर्थन करते हैं, वे हर क्षेत्र की तरह स्वास्थ्य सेवाओं के भी निजीकरण और व्यावसायीकरण के ही समर्थन में आमतौर पर दिखायी देते हैं। इसलिए उन अखबारों में ये खबरें जगह नहीं पातीं।0

क्या स्वतंत्रा रूप से डॉक्टरों का ऐसा कोई समूह है जो आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो और उसकी तरफ से कोई सामूहिक प्रयास किया जा रहा हो?

जब तक हम लोग रेजिडेंट डॉक्टर थे, यह कोशिश हमारी लगातार चलती रही। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का अंतिम अधि‍वेशन 1987 में हुआ। उसमें इस तरह के तमाम मुद्दे हमने उठाये थे और इस पर प्रस्ताव पारित किये थे। इसमें स्वास्थ्य नीति से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट बढ़ाने तक की बातें शामिल थीं। हम लोगों ने मेडिकल संस्थाओं में कैपिटेशन फी का विरोध किया था। आज मानव संसाध्न मंत्रालय, यूजीसी और मेडिकल काउंसिल ये सभी डॉक्टरी की पढ़ाई के निजीकरण और व्यावसायीकरण के पक्ष में हैं। जितने कॉलेज सरकारी सेक्टर में खुले हैं उससे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में हैं। प्रतिभा के इन सारे पुजारियों को उस समय मेरिट की याद आ जाती है जब हम लोग जाति आधरित आरक्षण की बात करते हैं। उन मेडिकल कॉलेजों में जहां सिर्फ पैसे से एडमिशन दिया जाता है वहां इन्हें मेरिट की चिंता नहीं होती। दरअसल जो सुविधाप्राप्त वर्ग है उसने अपने लिए कुछ अपने संस्थान खोल लिए हैं और सरकार अब उन्हीं को मदद करना चाहती है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यूजीसी ने हाल में एक निर्णय लिया है कि वे लोग जो प्राइवेट विश्वविद्यालयों या प्राइवेट कालेजों में भी हैं वे भी रिसर्च ग्रांट के लिए हकदार हैं और आवेदन कर सकते हैं। अब अगर आपने इसकी अनुमति दे दी तो आप देखेंगे कि प्राइवेट संस्थानों के लोगों को ही सारी फेलोशिप जायेगी। इनके निहितार्थों पर गौर करिए। वे लोग जो अभी मेडिकल एजुकेशन की सीट्स के लिए एक एक करोड़ तक दे रहे हैं वो फि‍र धीरे-धीरे यूजीसी से टाईअप करके कुछ फेलोशिप्स भी अपने यहां रख लेंगे। वे कहेंगे आप इतना दे दीजिए हम आपको फेलोशिप दे देंगे। तो जो पैसा अभी रेजीडेंसी का देना पड़ता है वे भी ये संस्थान नहीं देंगे। रेजीडेंसी की जो तनख्वाह देनी पड़ती वे भी न देकर वे फेलोशिप दे देंगे। तो यह सब एक सुनियोजित ढंग से लूट की साजिश चल रही है। प्राइवेट कैपिटल के लिए सब कुछ है, आम जनता के लिए कुछ नहीं। यही निदेशक सिद्धांत बन गया है।

वेलियाथन कमेटी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है या इसकी कुछ सिफारिशों को स्वीकार किया जा सकता है ?

यह जिस भावना से लिखी गयी है उसमें ही यह बात निहित है कि इसका पूरा मकसद बहुसंख्यक गरीब जनता के खिलाफ और सुविधासंपन्न वर्ग तथा उद्योगों के हित में है। इसलिए इसे तो पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है। इसमें सब कुछ आउटसोर्सिंग पर आधरित है। अब इसकी अनुसंधान परिषद (रिसर्च काउंसिल) के ढांचे की परिकल्पना देखिए जिसमें कहा गया है कि उद्योग क्षेत्र से दो लोग होंगे और एक विख्यात वैज्ञानिक होगा। यह वैज्ञानिक भी किसी फर्मास्यूटिकल उद्योग का नामांकित व्यक्ति होगा। इसमें अनुसंधान और शोध को भी उद्योगों के हित के लिए बताया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि एम्स ऐक्ट में संशोध्न कर दिया जाय और इसके निकायों में जिन लोगों को रखा जाय उनमें उद्योग के लोग हों, सीआईआई और पिफक्की से लोग लिए जायं। इंस्टीट्यूट के काम काज के बारे में इन्होंने जिनसे राय मांगी वे सभी उद्योग क्षेत्र से आते हैं। इसमें रिसर्च इंसेंटिव देने की बात कही गयी है जिसके खिलाफ हम 150 लोगों ने हस्ताक्षर करके भेजा कि हमें यह नहीं चाहिए क्योंकि इससे हमारा पूरा ओरिएंटेशन गड़बड़ हो जायेगा, फर्जी रिसर्च किए जाएंगे और फि‍लहाल उसे रोक दिया गया है।

(डॉक्‍टर सराया से यह बातचीत समकालीन तीसरी दुनि‍या के संपादक और वरि‍ष्‍ठ पत्रकार आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा ने की है। समकालीन तीसरी दुनि‍या, जनवरी-2011 से साभार)

 

अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र : अनिल सिन्हा

हाल ही में (25 फरवरी को) जाने-माने लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा का नि‍धन हो गया है। श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप में उनका यह यात्रावृतांत दि‍या जा रह है-

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

वह एक ठंडा दिन था। 31 दिसंबर, 2008 की मध्य रात्रि, कुहराविहीन, झक्क तारों से भरे आसमान में अमेरिकी बत्तियों की तेज रोशनी तुरंत ही कहीं गुम हो जा रही थी। अमेरिका में और शायद पश्‍चि‍म में भी दो बड़े त्यौहार समारोह होते हैं- बड़ा दिन (क्रिसमस) और नया साल। सैन फ्रांसिस्‍को में नये साल का भारी उत्सव होता है। पूरी बे एरिया (खाड़ी) के शहर से लोग सैन फ्रांसिस्को के घंटाघर के खुले में इकट्ठे होते हैं। पुराने साल की वि‍दाई देने के लिए और नए साल का स्वागत करने के लिए। प्रशांत महासागर की खाड़ी पर बसा सैन फ्रांसिस्को इस समय जन समुद्र की लहरें एक तरह से संभाल नहीं पा रहा है। फ्रीमांट से हम भी सैन फ्रांसिस्को के इस समुद्र में खो गए थे। मेरे लिए नया अनुभव था जहां उम्र और अवस्था, काले-गोर का भेद नहीं था। कोई एक समारोह-उत्सव था जो लोगों को जोड़े हुए था इस घंटाघर चौक से। शीत की परवाह नहीं, लोग कॉफी पी रहे हैं, आइसक्रीम, बर्गर और पेस्ट्री खा रहे हैं, कोक पी रहे हैं और बारह बजने का इंतजार कर रहे हैं। एक दूसरे पर गिरते पड़ते व घंटाघर के नजदीक पहुंचना चाहते हैं। चारों ओर ऊंची अट्टालिकाएं हैं। विशाल होटल सीरीज बल्ब से जगमगा रहे हैं। दूर-दूर तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट (गो की अमेरिका में सार्वजनिक यातायात अच्छा नहीं है) और निजी वाहन का पता नहीं। आज सब प्रतिबंधित हैं और सुरक्षा के जवान चारों ओर छितराए हैं- पूरी तरह से चौकस। बिल्ली की तरह उनकी नजरें चारों ओर घूम रही हैं पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही हैं। बारह बजा और पटाखों और विभिन्न प्रकार की आतिशबाजियों से सैन फ्रांसिस्को जगमगा उठा। ऐसी ही आतिशबाजियां तमाम लोगों के मन में छूट रही थीं। यहां हम विदेशी थे फिर भी पूरा माहौल अच्छा लग रहा था, खुशियों से भरा हुआ और उन युवाओं का तो पूछना ही क्या जिन्होंने प्यार की दुनिया की पहली यात्रा शुरू की थी। अभी तो कुछ ही कदम चले थे। पूरी यात्रा बाकी थी…

हम फ्रीमांट से सैन फ्रांसिस्को ‘बार्ट’ (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट डिस्ट्रिक्ट- इसे बोलचाल में यहां बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट भी कहते हैं) से आए थे। वापसी भी उसी से थी क्योंकि आज निजी वाहन समारोह स्थल तक पहुंच ही नहीं सकते थे। छोटी दूरी की रेल सेवाओं में ‘बार्ट’ सबसे सुव्यवस्थित सेवा मानी जाती है। (कुछ दूरी तक इसे समुद्र के नीचे से भी गुजरना पड़ता है)। कुछ सेवायें सैन फ्रांसिस्को से सीध हैं, कुछ बीच में तोड़कर यानी सेवा बदल कर फ्रीमांट पहुंचती हैं। सुरक्षा का प्रबंध बार्ट में भी है। जिस तरह भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) होते हैं, उसी तरह ‘बार्ट’ में भी बार्ट पुलिस हैं- अपने ‘काम’ में पूरी तरह चाक चौबंद।

31 दिसंबर 2008 की मध्य रात्रि थी पूरी तरह सर्द और हमारे लिए हाड़ भेदने वाली फिर भी बहुत उत्साह के साथ लोगों ने सन् 2009 का स्वागत किया था। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि रात कितनी सर्द है या समय कितनी तेजी से भाग रहा है पर लोगों को पता था कि तीन बजे भोर में अंतिम गाड़ी जाएगी। फिर ट्रेनें विराम लेंगी और सुबह से ही शुरू हो पाएंगी। इसी अहसास के कारण लोगों के समय बंध गए थे और भीड़ लगातार ‘बार्ट’ स्टेशन की ओर भाग रही थी। अमूमन यहां की बसें और ट्रेनें खाली होती हैं पर उस दि‍न सर्द रात में भी ट्रेनें ठसाठस भरीं थी। हम दो बजे तक ही स्टेशन पहुंच पाए तब पता चला कि सीधी फ्रीमांट जाने वाली अब कोई ट्रेन नहीं हैं। हमें बीच के किसी स्टेशन संभवत ओकलैंड में ट्रेन बदलनी होगी। एशियाई मूल के हर उम्र के लोगों से स्टेशन भरा था। उनमें काले लोगों की संख्या ज्यादा थी। अमेरिकी नागरिकों में काले लोगों की संख्या काफी है, फिर भी वे कानूनी दृष्टि से हर चीज में बराबर हैं। जहां मेरिट का मामला है अगर वे उसमें आ जाते हैं तो किसी गोरे अमेरिकी नागरिक को वहां नहीं डाल दिया जाएगा, पर अंदर कहीं एक जातीय श्रेष्ठता का दर्प गोरे अमेरिकी नागरिकों में मौजूद है। कई जगह इसके उदाहरण भी मिलते हैं। व्यवहार में ऐसी जातीय श्रेष्ठता या काले होने के कारण उसे दोयम दर्जे का मानाना दीखता है।

शायद यह संयोग ही होगा कि हमारे आगे युवाओं का एक जत्था चलता रहा। उनमें पांच लड़के और तीन लड़कियां । सभी 20 से 25 वर्ष के आसपास रहे होंगे- पर्व के उत्साह से भरे हुए- बहस, हंसी ठट्ठा, थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे पर उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे उनके युवा- मस्ती व फाकेमस्ती के दिन थे। वे काम भी करते थे, पढ़ भी रहे थे। अपनी प्रेमिकाओं से शादी भी करना चाहते थे और रि‍सेशन (व्यापक छटनी, मंदी, बेरोजगारी) से डरे हुए थे। दुनिया के पहले देश का युवा नागरिक बेरोजगारी व अनिश्‍चि‍त  भविष्य ये चिंतित था। वे इन्हीं बातों को लेकर आपस में बहस भी कर रहे थे और शायद बुश प्रशासन की आलोचना भी जिसने अमेरिका को गारत में डाल दिया। उनकी बातें शायद कुछ सफेद, गोरे बुजुर्गों को अच्छी नहीं लग रही थीं। वे भी हमारे साथ ही चल रहे थे और भीड़ के दबाव के कारण कभी उन्‍हीं की तरफ हो जाते तो कभी हमारी तरफ। वे उन्हें घूर रहे थे। हमारी ओर भी देख रहे थे पर उन्हें अहसास हो गया कि हम एशियाई विदेशी हैं।

ट्रेन आई। भीड़ जितनी उतरी उससे ज्यादा चढ़ गई। हम सब एक ही डिब्बे में चढ़े पर एक किनारे हम थे और दूसरे किनारे आठ युवाओं की वह जत्था और गोरे अमेरिकी। युवाओं का जत्था पहले की तरह  उन्मुक्त होकर बातें कर रहा था, कभी-कभी उनकी आह्लाद भरी चीख हमारे पास भी पहुंच रही थी जिससे लगता था कि गाड़ी की गति के शोर, भीड़ भरे डिब्बे का शोर चीर कर अगर वह हमारे तक पहुंच रही है तो उस आह्लाद में कितना जोश होगा। नये साल के स्वागत ने शायद उनमें आशाएं भर दी थीँ क्योंकि ओबामा उन्हीं की बदौलत उन्हीं की बिरादरी का देश का सर्वशक्तिशाली नेता बन गया था और बुश प्रशासन के विभिन्‍न कदमों के विरुद्ध निर्णय लेने की सार्वजनिक घोषणाएं कर चुका था। खासतौर से इस खाड़ी क्षेत्र और कैलिफोर्निया से उसे भारी समर्थन मिला था।

ट्रेन की गति काफी तेज थी। इस बीच उन गोरे बुजुर्गों में कोई कहीं बार-बार फोन कर रहा था। उनके चेहरों पर संताप व क्षोभ के भाव रहे होंगे। डिब्बे में तेज रोशनी होते हुए भी जहां हम बैठे थे वहां से उनका चेहरा नहीं दिख रहा था। गाड़ी बीच में ही (शायद टवे, ओकलैंड) रुक गई। उसका अंतिम पड़ाव यहीं था। अब हमें दूसरी गाड़ी में सवार होकर फ्रीमांट पहुचना था। डिब्बे में जो सुखद गर्मी थी वह प्लेटफार्म पर आकर लहूलुहान हो गयी। हमने अपने कोर्ट के कालर खड़े कर लिए। मफलर को इस तरह लपेटा जो कान, गला ढंकते हुए सिर पर पहुंचकर टोपी का भी काम दे दे। गो कि यह मौसम यहां पतझड़ का था पर ठंड मेरे लिए दुख पहुंचाने वाली स्थिति तक जा रही थी- रात्रि के ढाई बज रहे थे। इसी समय प्लेटफार्म पर गोली चली, उसकी बहुत धीमी आवाज के बावजूद वह हमें सुनाई दे गई क्योंकि जितने लोग भी यहां चढऩे-उतरने वाले थे सब चुपचाप अगली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, सर्द रातें वैसे भी काफी सन्नाटा भरी होती हैं। गाड़ी दो मिनट बाद आने वाली थी।

गोली की आवाज से हम चौंके। जिस डिब्बे से हम उतरे थे उसी के दूसरे दरवाजे के सामने गोली चली थी और उन आठों में से एक गठीला नौजवान प्लेटफार्म पर खून के बीच तडफ़ड़ाकर शांत हो चुका था। बार्ट पुलिस के एक अधिकारी ने उसे गोली मार दी थी। अधिकारी गोरा था जोहान्स मेहशर्ल। बार्ट पुलिस ने उन्हें घेर रखा था और बाकी लोगों को वहां से हटा रही थी। लोगों को हटाने के लिए महिला पुलिस को तैनात किया गया था। शायद पुलिस लोगों को लिंग संबंधी कमजोरी को जानती थी। पर प्लेटफार्म पर ही बार्ट पुलिस के विरोध में नारे लगने शुरू हो गए। नारे उस जत्थे के बचे सात साथियों ने शुरू किये जो एकदम से प्लेटफार्म के इस पार से उस पार फैल गए। मीडिया ने तत्काल कवर किया। कुछ ही देर में खबर आग की तरह फैल गई। और प्लेटफार्म के बाहर शहर का जो हिस्सा था वहां से भी नारे की आवाजें आ रही थीं। वह लड़का ओकलैंड का निवासी ऑस्कर ग्रांट था। वह काम भी करता था, पढ़ाई भी करता था। उसकी एक बेटी थी और वे फरवरी, 2009 में किसी तारीख को शादी करने वाले थे। बाइस साल के किसी युवा को तड़प कर शांत होते हुए मैंने पहली बार देखा था। इस घटना ने मुझे सन्न कर दिया था। स्टेशन पर ट्रेन आने की जो सूचना आ रही थी वह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी। सन् 1984 में जब भारत में सिख विरोधी दंगा हुआ था, तब लखनऊ जंक्‍शन के बाहर कुछ सांप्रदायिक उग्रवादी हिंदुओं द्वारा मैंने एकसिख युवा को जलाया जाते हुए देखा था। वहां स्टेशन पर पंजाब मेल घंटों से रुकी थी, वह कब आएगी इसकी कोई सूचना नहीं आ रही थी। सारा देश स्थगित था उस दिन। पंजाब मेल से ही आनंद स्वरूप वर्मा, अजय सिंह तथा पार्टी के विभिन्न साथियों को कलकत्ता सम्मेलन में जाना था। मैं उन्हें विदा करने आया था क्योंकि मेरा जाना संभव नहीं हो पाया था। उस एक घटना ने मुझे कई साल तक परेशान किया। आज भी वह समय-समय पर एक काले निशान की तरह उभरता है और असहज कर जाता है- कम से कम उस दिन तो कोई काम नहीं हो पाता। और इतने वर्षोँ बाद एक काले अमेरिकी नागरिक की गोरे अमेरिकी पुलिस के एक हिस्से द्वारा सरेआम पहली तारीख के नव वर्ष पर्व के दिन हत्या कर दिया जाना…

हम जानते हैं कि अमेरिकी पुलिस लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है। उसके लिए वह किसी हद तक जा सकती है (इसके ताजा उदाहरण हावर्ड के प्रोफेसर के साथ बदसलूकी, पिछले दिनों भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम, शाहरुख खां आदि की घटनाओं को लिया जा सकता है)

दरअसल, अमेरिकी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को लेकर बहुत सारे प्रश्‍न उठते रहे हैं। मसलन इस पुलिस पर किसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण है- वहां के कॉरपोरेट घरानों का, राजसत्ता का ? क्योंकि हावर्ड के प्रोफेसर की तमाम दलीलों के बावजूद उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाना और बाद में पुलिस के उस छोटे से अधिकारी को ओबामा द्वारा आमंत्रित कर बियर पिला कर एक तरफ उसे हीरो बना देना और दूसरी तरफ पुलिस की ज्यादतियों को किसी आवरण में लपेट कर जस्टीफाई करना। संभवत: कछ ऐसा ही रुख होगा जिसके कारण घोर जन प्रतिरोध के बावजूद आस्कर ग्रांट के हत्यारे पुलिस अधिकारी को अब तक कोई सजा नहीं हुई। उसने दूसरे दिन ही यानी पहली जनवरी, 2009 को अपने कार्यालय जाकर बड़े अधिकारियों के सामने त्यागपत्र दे दिया जो स्वीकार भी कर लिया गया और व्यापक जन प्रतिरोध व मीडिया की भूमिका के कारण उसके विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया। बस मामला ठंडे बस्‍ते में पड़ गया है गो कि समय-समय पर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी होते ही रह रहे हैं। अमेरिका में इस मानी में व्यापक लोकतंत्र है कि लोग खुले तौर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्हें तंग नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (जिसके सर्वेसवा हैं चेयरमैन बॉब अवेकन) के कुछ फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन जैसे बे एरिया रिवोल्यूशन क्लब, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स आदि ने इस घटना को लेकर 22 मार्च, 2009 को ओकलैंड में एक बड़ा प्रदर्शन किया। उन्होंने जन अदालतें भी लगाईं और पिछले 15 वर्षों में कानून लागू कराने के नाम पर हजारों काले नागरिकों को वहां की पुलिस द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने की एक लिस्ट भी जारी की और सबके विरुद्ध चल रहे मुकदमें को न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने की मांग की। ऐसे कुछ लोगों के नाम हैं- ऑस्कर ग्रांट, अमाडू डिआलो, ताइशा मिलर, जे रॉल्ड हाल, गैरी किंग, अनीता गे, जुलिओ परेड्स, असा सुलिवान, मार्क गार्सिया, रैफेल ग्रिनेत, ग्लेन विलिस, रिचर्ड डी सैन्टिस आदि थे। ये केवल कैलिफोर्निया खाड़ी क्षेत्र के ही काले अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, बल्कि इनमें न्यायार्क के भी लोग हैं। इन्हें गोलियों से, पीट-पीट कर और आंख-मुंह में मिर्ची का चूरा झोंक कर यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया। यह ठीक उसी तरह का कृत्य था जैसा अमेरिका के ईजाद के बाद आम लोगों को भूखे रखकर, बीमारी की हालत में छोड़कर, सोने की जगह न देकर, कोड़ों से पिटाई कर-यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। लगभग तीन सौ साल बाद आज अमेरिका अपने को हर तरह से दुनिया का ‘नंबर वन’ देश घोषित करता रहाता है। ओबामा ने भी अपने शुरुआती भाषण में यही कहा था कि हम दुनिया के नंबर वन देश हैं और भविष्य में भी बने रहेंगे।

मेरे वहां रहते ही एक दूसरी घटना घटी,  बीस साल का ब्रैंडनली इवांस नवंबर, 2008 में सैन फ्रांसिस्को पढ़ाई और नौकरी के लिए सैन्टियागो से आया था। सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध गोल्डेन गेट ब्रिज के पास उसने शेयर में एक फ्लैट लिया था, पर दिसंबर के अंत में गोल्डेन गेट ब्रिज पार्क में उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस जिस तरह से इस मामले की छानबीन में उदासीन दिखाई दे रही है, उससे वहां के लोगों को अंदाज है कि शायद इसमें पुलिस की भी भूमिका है क्योंकि वह इलाका अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण है और सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस।

अमेरिकी पुलिस कानून लागू कराने के लिए तो किसी हद तक जा सकती है पर उसकी केवल यही भूमिका नहीं है- अपराध रोकना उसकी मुख्य भूमिका है। पर अमेरिका में अपराध बेतहाशा हैं चाहे हत्या हो, अपहरण हो, या अपराध के जितने भी रूप हो सकते हें। जि‍स अपराध को हम अपनी आंखों के सामने देख आए हैं, वह अमेरिकी पुलिस की तस्वीर बहुत साफ करती है।

पूरा प्रकरण देखते हुए लगता है कि अपराध जगत में यहां भी कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूंजीपतियों का हाथ है। एक उदाहरण देकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूंगा क्योंकि मेरे फ्रीमांट में रहते हुए यह मामला उछला था। इलेना मिशेल नाम की एक लड़की थी जो 13 वर्ष की उम्र में ही पूरे बे एरिया (खाड़ी क्षेत्र) में आइस स्केटिंग में नंबर एक पर पहुंच गई थी और 30  जनवरी, 1989 के ओलंपिक गेम्स में भागीदारी की उसकी दावेदारी तय हो गई थी। 30 जनवरी, 1989 में उसका अपहरण कर लिया गया। आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। अमेरिका स्टेट डिपार्टमेंट आफ जस्टिस की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैलि‍फोर्निया राज्‍य से पचास बच्‍चों का अपहरण होता है और उनका मि‍ल पाना असंभव सा ही होता है, बल्‍कि‍ वहां के संघीय आंकड़ों के अनुसार गायब बच्‍चों में से केवल एक प्रति‍शत ही 10 वर्षों की अवधि‍ में वापस आ पाते हैं।

फ्रीमांट लौटने के लि‍ए ट्रेन कुछ देर से मि‍ली। भारी मन से हम सवार हुए। ठंड गायब हो चुकी थी और मन पर तकलीफ का एक कुहासा छा गया था। आज भी वह घटना याद आती है तो प्रशांत महासागर की खाड़ी का सारा सौन्‍दर्य ति‍रोहि‍त हो जाता है और रातभर नींद नहीं आती…।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या, अक्‍टूबर, 2009 से साभार)