Tag: संस्‍मरण

हि‍मपात की डायरी : अतुल शर्मा

पहाड़ी क्षेत्रों में हि‍मपात का सि‍लसि‍ला जारी है। मंसूरी में बर्फ पड़ने पर कवि‍ और सामाजि‍क कार्यकर्ता अतुल शर्मा को ऐसी स्‍थि‍ति‍यों में की गई यात्राओं का स्‍मरण हो आया-

मंसूरी से देहरादून तक पैदल यात्रा के कई संस्‍मरण हैं। यहां 16 फरवरी की रात पड़ी बर्फ का ही जि‍क्र अभीष्‍ट है। मंसूरी में बर्फ पड़ी। देहरादून में दो दि‍न बादल घि‍रे रहे। ओले, बारि‍श और सर्द हवाओं ने मोटे स्‍वेटर नि‍कलवा दि‍ए। कुछ समय  पहले जब मैं नींद में था, तब मंसूरी धनौल्‍टी में खूब बर्फ पड़ी। 17 फरवरी सुबह खि‍ली धूप में मन हो रहा था कि‍ बर्फ के पास चल दूं। पहले भी कई बार गया हूँ। मुझे ऐसी यात्राएं याद आ गईं। देहरादून से राजपुर तक बस में गए। वहां से शहंशाही आश्रम से कुछ आगे मंसूरी की तरफ पैदल चल दि‍ए। उस समय चूने की खानें बंद नहीं थीं। वहां छोटे ट्रक जि‍न्‍हें गट्टू कहते थे, उन पर सवार होकर तीन कि‍लोमीटर की चढ़ाई चढ़ गए। वहां से एक छोटी सी पगडंडी से पहाड़ी का एक छोटा हि‍स्सा चढ़कर मंसूरी का पैदल रास्‍ता शुरू हो गया। ये पहाड़ी रास्‍ता झाड़ीपानी तक ले जाता था। बायीं तरफ से दून घाटी दूर तक दि‍खती थी। और इधर छोटा-सा पहाड़ी गांव गुमसुम और ठंड में डूबा हुआ था। पैदल चलना थकाने वाला बि‍ल्‍कुल नहीं था। मेरे साथ सुप्रसि‍द्ध हास्‍य कवि‍ ओमप्रकाश आदि‍त्‍य, गीतकार रमानाथ अवस्‍थी, कथाकार रमेश गौड़ आदि‍ थे। पि‍ताजी ने मेरी ड्यूटी लगा दी इन्‍हें पैदल मंसूरी यात्रा करवाने की। झाड़ीपानी पहुंचने पर पहाड़ और सड़क के कि‍नारे बर्फ दि‍खने लगी थी। सभी पुलकि‍त थे। वहां चाय पी और गुड़ खरीदा। छोटे से पहाड़ी रास्‍ते की घुमावदार सड़कें कुछ देर बाद बर्फ से ढकीं मि‍लीं। गुड़ और ताजी बर्फ खाते हुए आगे नि‍कल पडे़। नीचे के रास्‍ते को इंगि‍त करके ऊपर चल रहे लोगों ने रमानाथ जी का गीत गुनगुनाया था। धीरे-धीरे चलते हुए बर्फ हमारा साथ दे रही थी। पि‍क्‍चर पैलेस मंसूरी से पहले बार्लोगंज में आधे घंटे बैठे। वहां सैलानि‍यों के हि‍मपात और स्‍थानीय लोगों के हि‍मपात में अन्‍तर समझ आया था। पि‍क्‍चर पैलेस पहुंचने से पहले सीढ़ि‍यों, छतों, पेडों की पत्‍ति‍यों से बर्फ झड़ रही थी। मोड़ों के साथ धूप आती और फि‍र पहाड़ी के पीछे छि‍प जाती।

बहुत सालों बाद दि‍ल्‍ली में आकाशवाणी के लि‍ए रि‍कार्डिंग के सि‍लसि‍ले में गया तो वहां वि‍वि‍ध भारती के प्रोडयूसर के रूप में रमानाथ अवस्‍थी मि‍ले। यह 1971 की बात होगी। कवि‍ व रेडि‍यो नाटकों के प्रख्‍यात अभि‍नेता देवराज दि‍नेश से परि‍चय कराया तो अवस्‍थी जी बोले, ‘‘अतुल, तुम्‍हारे साथ पैदल मंसूरी चढ़ गये थे। वहां से लाये छोटे-छोटे पत्‍थर आज भी मेरे बगीचे के पेड के नीचे रखे हैं।’’

#

रातभर बर्फ पड़ी। जब मैं सो रहा था, मुझे बर्फ के कई रंग याद आने लगे। सुबह मुझे याद आया कि‍ एक दूसरी मंसूरी हि‍मपात यात्रा में मैं घनश्‍याम रतूड़ी़ सैलानी के साथ चल रहा था। सैलानी ने प्रसि‍द्ध चि‍पको आन्‍दोलन में जनजागरण का नब्‍बे प्रति‍शत कार्य अपने गीतों से कि‍या था। मुझे इस सूनी सड़क के कि‍नारे चलते हुए एक अंग्रेज दि‍खाई दि‍या। वह अपनी मस्‍ती में चल रहा था। मैंने बर्फ का गोला बनाया और उसकी पीठ पर दे मारा। उसकी कोई प्रति‍क्रि‍या नहीं थी। वह सड़क कि‍नारे खड़ा हो गया। हम लोगों को उसके पास से नि‍कलना पड़ा। वह कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद अंग्रेज पीछे था और हम आगे। एकाएक सोच की चुप्‍पी तोड़ते हुए एक बर्फ का गोला मेरी गर्दन से होते हुए बनि‍यान में घूस गया। अंग्रेज ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘दि‍स इज दे वे। इन्‍जॉय द स्‍नोफॉल।’’ उसने हमसे हाथ मि‍लाया और यह कहकर पगडंडी में गुम हो गया- ‘‘आई एम रस्‍कि‍न बॉंड।’’

#

मंसूरी की पैदल यात्रा रेखा, रंजना, रीता, वि‍क्‍की, बेबी, अलका और कथाकार भीमसेन त्‍यागी (जि‍न्‍हें हम अंकल कहते थे) के साथ हुई। ये यात्रा बड़ी गुमसुम चल रही थी। त्‍यागी जी के लतीफे-ठहाके गुंजते। बर्फ के गोले मारने का खेल शुरू नहीं हुआ था। सब त्‍यागी अंकल से संकोच कर रहे थे। बच्‍चों के साथ बच्‍चा बनने का हुनर उनके पास था। एकाएक बर्फ के गोले मारने की शुरुआत त्‍यागी जी ने कर दी। फिर जो बर्फ के गोलों की भरमार हुई, उससे आसपास के पर्यटक भी अछूते नहीं रहे। हमारा काफि‍ला और बड़ा हो गया। पीछे-पीछे बच्‍चों की फौज और आगे-आगे बर्फ का गोला उछालते त्‍यागी अंकल चल रहे थे।

#

यह आन्‍दोलन के दि‍न थे। उत्‍तराखंड आन्‍दोलन में 100 दि‍न तक उत्‍तरकाशी में कलादर्पण संस्‍था ने प्रभातफेरि‍यां नि‍कालीं। सर्दियों में गि‍रती हुई बर्फ में मेरा गीत गाती हुई टोली पारम्‍परि‍क ढोल दमाऊ के साथ सुबह नि‍कल जाती- ‘वि‍कास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्‍यों/नदी पास है मगर ये पानी से दूर-दूर क्‍यों।’ 0बर्फ पड़ती रहती और आन्‍दोलन की आग भड़कती रहती।

#

कल रात पड़ी बर्फ पूरे गढ़वाल-कुमाऊं के ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ढक गई। कढ़की में ऐसी ही एक सर्द मौसम में डॉक्‍टर कौशि‍क, डॉक्‍टर मधुसूदन कम्‍बल लेकर नि‍कल पडे़ और रात ग्‍यारह बजे ठि‍ठुरती ठंड में फुटपाथों, स्‍टेशनों और दुकानों के बंद शटर के बाहर बि‍ना कम्‍बल के सोते हुए लोगों को कम्‍बल उढ़ाते हुए नि‍कल पडे़। सुबह उठकर जि‍सने कम्‍बल देखा होगा, उसे पता ही नहीं होगा कि‍ उसे ये गर्माहट कि‍सने दी।

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)

माफ करना हे पिता! : शंभू राणा

वरि‍ष्‍ठ लेखक शंभू राणा का अपने पि‍ता पर लि‍खा यह संस्मरण अद्भूत है। पि‍ता पर जि‍स तरह से बेबाकी से उन्होंने लि‍खा है, ऐसा बहुत कम पढ़ने को मि‍लता है-

सभी के होते हैं, मेरे भी एक (ही) पिता थे। शिक्षक दिवस सन् 2001 तक मौजूद रहे। उन्होंने 70-72 वर्ष की उम्र तक पिता का रोल किसी घटिया अभिनेता की तरह निभाया,  मगर पूरे आत्मविश्वास के साथ। लेकिन मैं उन्हें एकदम ही ‘पीता’ नहीं कहने जा रहा। इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे, बल्कि इसलिये कि चाहे जो हो आदमी कुल मिलाकर कमीने नहीं थे। किसी भी आदमी का यही एक ‘दुर्गुण’ बाकी सारे ‘गुणों’ पर भारी है। बाकी शिकायत, बल्कि शिकायतों का कपड़छान तो यही कि उन्होंने पिता के रोल की ऐसी तैसी करके रख दी। न जाने किस बेवकूफ ने उन्हें बाप बना दिया।

उनका बारहवाँ और वार्षिक श्राद्ध तो मैं हरिद्वार जाकर कर आया था। उधार और चंदे के पैसों से, जैसा भी बन पड़ा। आज सोचता हूँ कि कलम से भी उनका तर्पण कर दूँ। ऊपर मैंने शिकायतों का जिक्र किया लेकिन यह तर्पण जाहिर-सी बात है श्रद्धावश ही है, शिकायतन नहीं।

पिता का मेरा साथ लगभग 32 वर्षों तक रहा, लगभग मेरे जन्म से उनकी मृत्यु तक। माँ का साथ काफी कम और वह भी किस्तों में मिला। पिता के साथ यादों का सिलसिला काफी लम्बा है। यादें देहरादून से शुरू होती हैं। मेरी पैदाइश भी वहीं की है। यादें आपस में गुड़-गोबर हुई जा रही हैं, कौन पहले, कौन बाद में। लेकिन शुरू कहीं से तो करना पड़ेगा ही। सबसे पहले दिमाग में जो एक धुँधली-सी तस्वीर उभरती है वह यूँ है- गर्मियों के दिन हैं, पिता बेहद हड़बड़ी में दोपहर को घर आते हैं। शायद दफ्तर से इजाजत लिये बिना आये हैं। मैं बीमार हूँ। मुझे कम्बल में लपेट कर दौड़े-दौड़े डॉक्टर के पास ले जाते हैं। डॉक्टर मुझे सुई लगाता है। पिता लौट कर माँ से कहते हैं- ‘‘डॉक्टर कह रहा था कि आधा घंटा देर हो जाती तो बच्चा गया था हाथ से।’’ उस दिन तो बच्चा हाथ आ गया पर फिर कभी उनके हत्थे नहीं चढ़ा।

एक और तस्वीर है यादों के एलबम में… बारिश हो रही है, सड़क में एड़ियों से ऊपर तक पानी भरा है। मुझे उल्टी-दस्त हो रहे हैं और पिता भीगते हुए पब्लिक नल में सरे बाजार मुझे धो रहे हैं। इन दोनों घटनाओं का जिक्र उन्होंने अपने अंतिम समय तक अक्सर किया कि ऐसे पाला तुझे मैंने। ऐसी बातें सुनकर अपने भीतर से अपना ही कोई अनाम/अदृश्य हिस्सा बाहर निकल कर सजदे में गिर जाता है। और हो भी क्या सकता है? ऐसी बातों का कैसा ही जवाब देना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि बदतमीजी भी। मैं एक आदर्श बेटा नहीं, मगर ‘राग दरबारी’ का छोटे पहलवान भी नहीं हो सकता जो अपने बाप कुसहर प्रसाद से कहता है कि हमने लिख कर तो दिया नहीं कि हमें पैदा करो। तो पिताजी महाराज, ऋणी हूँ तुम्हारा और इस ऋण से उऋण होने की कोई सूरत नहीं। न तुम्हारे जीते जी था, न आज हूँ किसी लायक। जब तक रहे तुम पर आश्रित था, आज दोस्तों पर बोझ हूँ। इनसान के अंदर जो एक शर्म नाम की चीज होती है, जिसे गैरत भी कहते हैं, मैंने उसका गला तो नहीं दबाया पर हाँ, उसके होटों पर हथेली जरूर रखे हूँ। शर्म आती है लेकिन जान कर बेशरम बना हूँ। सच कहूँ तुम्हारे जाने के बाद स्थितियाँ ज्यादा खराब हुई हैं। परिस्थितियों के डार्क रूम में किसी नैनहीन-सा फँसा पड़ा हूँ। कामचोर तो नहीं पर हाँ, एक हद तक निकम्मा जरूर हूँ।

लेकिन यह उऋण होने का खयाल मेरे मन में आ ही क्यों रहा है? मैं तो इस खयाल से सहमत ही नहीं कि माँ-बाप के ऋण से कोई उऋण भी हो सकता है। क्या यह किसी लाले-बनिये का हिसाब है, जिसे चुका दिया जाये? हाँ, लाला बोले, कितना हिसाब बनता है तुम्हारा? हाँ, यार ठीक है ‘वैट’ भी जोड़ो, डंडी मार लो, छीजन काट लो, औरों से दो पैसा ज्यादा लगा लो और कुछ? हाँ, अब बोलो। दो दिन देर क्या हुई यार कि तुमने तो चौराहे पर इज्जत उतार ली। लो पकड़ो अपना हिसाब और चलते-फिरते नजर आओ। आज से तुम्हारा हमारा कोई रिश्ता नहीं। अब ऋण तो कुछ इसी तर्ज में चुकता किया जाता है। क्या माँ-बाप से इस जबान में बात करनी चाहिये? मैं तो नहीं कर सकता। क्यों न हमेशा उनका कर्जदार रहा जाये और एक देनदार की हैसियत से खुद को छोटा महसूस करते रहें। माँ की प्रसव पीड़ा और पिता का दस जिल्लतें झेल कर परिवार के लिये दाना-पानी जुटाने का मोल तुम चुका सकते हो नाशुक्रो कि उऋण होने की बात करते हो?

शहर वही देहरादून, मोहल्ला चक्कूवाला या बकरालवाला जैसा कुछ। पास में एक सूखा-सा नाला या नदी है, जहाँ खास कर सुबह के वक्त सुअर डोलते हैं। कतार में मिट्टी-गारे से बनी खपरैल की छत वाली चार-छ: कोठरियाँ हैं। हर कोठरी में अलग किरायेदार रहता है। कोठरी के भीतर एक दरवाजा है, जो इस कोठरी को उस से जोड़ता है। यह दरवाजा अपनी-अपनी ओर सब बन्द रखते हैं। बाहर-भीतर जाने का दरवाजा अलग है। एक दिन माँ इस दरवाजे की झिर्री में हाथ डाल कर दरवाजे के उस ओर रखे कनस्तरों तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। झिर्री काफी छोटी है, न उसका हाथ पहुँच पाता न मेरा। इस ओर कनस्तर खाली हैं। मुझे भूख लगी है, शायद माँ भी भूखी है। पिता कहाँ हैं, कनस्तर क्यों खाली हैं, पता नहीं। याद नहीं। इस चित्र के चित्रकार भी तुम्हीं हो पिता मेरे। इस तस्वीर को मैं नोंच कर फेंक नहीं सकता एलबम से। लेकिन यह सब कह कर आज तुमसे शिकायत नहीं कर रहा। ऐसा करके क्या फायदा। वैसे भी तुम कभी घरेलू मामलों में जवाबदेह रहे नहीं। सूचना का अधिकार तुम पर लागू नहीं होता था। शिकायत या कहो कि झुँझलाहट मुझे खुद पर है कि मैं इस चित्र का कोई रचनात्मक उपयोग नहीं कर पाया। तब से आज तक यह अनुभव दिमाग की हंडिया में बस खदबदा रहा है। मैं इसे दूसरों के आगे परोसने लायक नहीं बना पाया कि औरों की तृप्ति से मेरा असंतोष कम हो। ऐसी बातों को यूँ सपाटबयानी में कहने से दूसरों के दिलों में सिर्फ दया ही उपजती है जो कि अपने काम की नहीं। अब ऐसा भी नहीं कि हर चीज हमेशा काम की न होती हो, दया-ममता लड़कियों के भी तो नाम होते हैं।

इसी कोठरी में मुझसे तीनेक साल छोटी बहन लगभग इतनी ही उम्र की होकर गुजर जाती है। उससे कुछ समय बाद, जब एक दोपहर पिता मुझे डॉक्टर के पास ले गये थे। बीमार हम दोनों थे, वह कम, मैं ज्यादा। उस बच्ची का नाम याद है, गुड्डी था। माँ, पिता और मेरी जो एक मात्र फोटो मेरे पास है, उसमें वह भी माँ की गोद में है- शहद वाला निप्पल चूसती हुई। पिता कुर्ते की बाँहें समेटे मुझे गोद में लिये बैठे हैं। मैंने उस वक्त किसी बात पर नाराज होकर अपना एक हाथ अपने ही गरेबान में अटका लिया था। वह हाथ आज भी वहीं टँगा है। वैसे मुझे याद नहीं, पर इस तस्वीर को देख कर पता चलता है कि माँ की एक आँख दूसरी ओर देखती थी। दो भाई-बहन मुझसे पहले गुजर चुके थे, दो मेरे बाद मरे। मुझमें पता नहीं क्या बात थी कि नहीं मरा। बाद में पिता ने कई बार मन्नत माँगी कि तू मर जाये तो मैं भगवान को सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँ। यार, नंगा करके चौराहे पर सौ दफे जुतिया लो, पर ऐसी ‘बेइज्जती खराब’ तो मती करो! प्रसाद की रकम पर मुझे सख्त ऐतराज है। कुछ तो बढ़ो। मैं इनसान का बच्चा हूँ भई, चूहे का नहीं हूँ। सवा रुपये में तो कुछ भी नहीं होगा, बुरा मानो चाहे भला। इनसान की गरिमा और मानवाधिकार नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं? भगवान से या शैतान से, जिससे मर्जी हो कह दो कि जो चाहे उखाड़ ले, सवा रुपये में तो हम किसी भी सूरत नहीं मरेंगे। भूखे नंगे रह लेंगे, मरेंगे नहीं। प्रसाद खाकर तुलसीदास की तरह मस्जिद में सो रहेंगे।

फिर याद आता है कि माँ मायके चली जाती है। न जाने कितने अर्से के लिये और क्यों। मैं पिता के पास क्यों रह जाता हूँ जबकि उस उम्र के बच्चे को माँ के पास होना चाहिये? पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगते हैं। दफ्तर में दो-एक लोगों की आज भी याद है। एक दीक्षित जी थे, थोड़ा मोटे से, शकल याद नहीं। बड़ी ही संक्रामक हँसी हँसते थे। एक जल्ला सिंह थे। पिता की तरह चपरासी (बकौल पिता- ‘चढ़ बेटा फाँसी’)। शायद कांगड़ा के रहने वाले थे। जल्ला सिंह एक दिन घर से आयी चिट्ठी पढ़ रहे थे। उसकी एक पंक्ति याद है- कमर झुकाने का समय है, छुट्टी लेकर आ जाओ। मैंने पिता से इसका मतलब पूछा, उन्होंने बताया कि खेती-बाड़ी का समय है। धान यूँ झुक कर रोपते हैं। जल्ला सिंह को आज भी ग्रुप फोटो में नामों का क्रम देखे बिना पहचान लेता हूँ। पिता अर्थ एवं संख्या (सांख्यिकी) विभाग में थे। उनके कहे मुताबिक डीएम साला उनके विभाग के बिना दो कदम नहीं चल सकता। सारे डाटा हमारे पास होते हैं। डीएम हम से घबराता है।

शाम लगभग सात-आठ बजे का समय है। पिता खाना बना रहे हैं। मैं बरामदे में खेल रहा हूँ। गेट खोल कर ऑफिस का कोई कर्मचारी अहाते में दाखिल होता है। पिता उसका कमरा खोल देते हैं। वह आदमी बैठ कर कोई फाइल निपटाने लगता है। पिता फिर रसोई में जुट जाते हैं। करीब आधे घंटे बाद वह आदमी बाथरूम में घुस जाता है और तभी बिजली चली जाती है। पिता लालटेन या मोमबत्ती लेकर दफ्तर के खुले कमरे में जाते हैं। कुछ देर इन्तजार करने के बाद आवाज देते हैं। वह आदमी और जवाब दोनों नदारद। पिता मुझे कंधे में बिठाते हैं और हाथ में डंडा लेकर अंधेरे बाथरूम में ताबड़तोड़ लाठी चार्ज कर देते हैं। जवाब में जब किसी की चीख नहीं सुनाई दी तो उन्होंने नतीजा निकाला कि बिजली चली जाने के कारण वह आदमी बिना बताये चला गया। उनकी इस हरकत का मतलब मैं कभी नहीं समझ पाया। दुर्घटनावश मेरा खोपड़ा डंडे की जद में नहीं आ पाया।

कुछ समय बाद माँ फिर देहरादून आ जाती है। हम पास ही किराये की एक कोठरी में रहने लगते हैं। यह कोठरी पहले वाली से बेहतर है। कतार में चार-पाँच कोठरियाँ हैं, छत शायद टिन की है। मकान मालिक का घर हम से जरा फासले पर है। वह एक काफी बड़ा अहाता था जिसमें आम, लीची और कटहल वगैरहा के दरख्त हैं। अहाते में एक कच्चा पाखाना था जिसकी छत टूट या उड़ गयी थी। जब कोई पाखाने में हो उस वक्त दरख्तों में चढ़ना अलिखित रूप से प्रतिबंधित था। इसी तरह कोई अगर दरख्त में चढ़ा हो तब भी… अहाते में एक ओर मकान मालिक के दिवंगत कुत्तों की समाधियाँ थीं जिनमें वह हर रोज सुबह को नहा-धोकर फूल चढ़ाता था। फूल चढ़ाने के बाद हाथ जोड़ कर शीश नवाता था कि नहीं, भगवान की कसम मुझे याद नहीं।

मकान मालिक लगभग तीसेक साल का था। दुबला पतला, निकले हुए कद का, चिड़चिड़ा-सा, शायद अविवाहित था। परिवार में उसकी विधवा माँ और दो लहीम-शहीम-सी बिन ब्याही बहनें थीं। एक का नाम रागिनी था, दूसरी का भी शर्तिया कुछ होगा। परिवार में एक नौकर था श्रीराम। गठा हुआ बदन, साँवला रंग और छोटा कद। उसके नाम की पुकार सुबह के वक्त कुछ ज्यादा ही होती थी। मालिक मकान के परिवार का मानना था कि इस बहाने भगवान का नाम जबान पर आ रहा है। वे राम पर श्रद्धा रखने वाले सीधे-सच्चे लोग थे, हाथ में गंडासा लेकर राम-राम चिल्लाने वाले नहीं। ऐसे लोग तब अंडे के भीतर जर्दी के रूप में होंगे तो होंगे, बाहर नहीं फुदकते थे। बेचारा श्रीराम अपने नाम का खामियाजा दौड़-दौड़ कर भुगत रहा था। परिवार वाले उसे काम से कम बेवजह ज्यादा पुकारते।

एक दिन सुबह के वक्त मैं खेलता हुआ मकान मालिक के आँगन में जा पहुँचा। सामने रसोई में श्रीराम कुछ तल-भुन रहा था और मुझ से भी बतियाता जा रहा था। तभी अचानक न जाने क्या हुआ कि आँगन में एक ओर बने गुसलखाने का दरवाजा भड़ाम से आँगन में आ गिरा। भीतर मकान मालिक की बहन नहा रही थी। दरवाजा गिरते ही वह उकड़ूँ अवस्था में न जाने किस जानवर की-सी चाल चलती तथाकथित कोने में खिसक गयी- श्रीराम को पुकारती हुई। श्रीराम ने रसोई से निकल कर श्रीकृष्ण की सी हरकतें कीं। उसने दोनों हाथों से टिन का दरवाजा उठाया, उसकी आड़ से गुसलखाने के भीतर एक भरपूर नजर डाल कर दरवाजा चौखट से यूँ टिका दिया जैसे लाठी दीवार से टिकाते हैं। आइये दो मिनट का मौन धारण कर उस लड़की की हिम्मत को दाद दें। ऐसे गुसलखाने कई बार देखे कि जिनके भीतर जाते ही गूँगा आदमी भी गवैया बन जाता है। मगर वैसा चौखट से जुदा, कील-कब्जों से सर्वथा विरक्त दरवाजे वाला बाथरूम फिर देखने में नहीं आया और न नहाती हुई लड़की ही फिर कभी दिखी। समय भी कई बार अजीब हरकत कर बैठता है। अब भला लॉलीपॉप की उम्र के बच्चे को शेविंग किट भेंट करने की क्या तुक है?

शाम का वक्त है। पिता मेरा हाथ थामे द्वारका स्टोर बाजार (शायद यही नाम था) की ओर जा रहे हैं। कंधे में झोला है, झोले में तेल के लिये डालडा का डमरूनुमा डब्बा। राशन लेने निकले हैं। दुकान में भीड़ है। पिता उधार वाले हैं, उनका नम्बर देर तक नहीं आता। मैं काउण्टर से सट के खड़ा हूँ। खड़े-खड़े टाँगें दुखने लगी हैं। छत से टँगे तराजू में जब सामान तोल कर उतारा जाता है तो उसका एक पल्ला पेंडुलम की तरह झूलता है और मैं हर बार अपना सर बचाने के लिये पीछे हटता हूँ। यह दृश्य उधार वाले ग्राहक के प्रति दुकानदार की नापसंदगी के प्रतीक के रूप में मुझे खूब याद है। यह बिम्ब भी अकसर कोंचता है। तगादा-सा करता हुआ यादों के मुहाफिजखाने में कहीं मौजूद है। इसका भी कोई इस्तेमाल नहीं हो पाया।

पिता दफ्तर से दो-एक किलो रद्दी कागज उड़ा लाये हैं, जिन्हें बेच कर कुछ पैसे मिल जायेंगे। शाम के झुरमटे में साइकिल में मुझे साथ लिये कबाड़ी के पास जा रहे हैं। साइकिल दुकान के बाहर खड़ी कर मेरा हाथ थामे पानी-कीचड़ से बचते आगे बढ़ते हैं कि एकाएक बड़ी फुर्ती से मुझे गोद में उठा कर साइकिल की ओर भागने लगते हैं। बहुत देर तक ताबड़तोड़ साइकिल चलाते रहते हैं। साँसें बुरी तरह फूली हुई हैं। मैं कुछ भी समझ नहीं पाता, डरा-सहमा-सा साइकिल का हैंडल कस कर पकड़े हूँ। बाद में पिता बताते हैं कि कबाड़ी की दुकान में सीआईडी का आदमी खड़ा था ताकि उन्हें सरकारी कागज बेचते रंगे हाथ पकड़ ले। पिता के मुताबिक साइकिल ने इज्जत रख दी, वर्ना जेल जाना तय था। उन्हें अपनी साइकिल पर बड़ा नाज था। बकौल उनके वह मामूली साइकिल नहीं थी, रेलवे की थी। रेलवे की साइकिल का मतलब अब वही जानें। शायद ‘रेले’ को रेलवे कहते हों। जहाँ तक मुझे याद है, वह साइकिल उनकी अपनी नहीं थी, किसी की मार रखी थी।

देहरादून की ये यादें सन् 1971 के आस-पास और उसके कुछ बाद की हैं। समय का अंदाज एक घुँधली-सी याद के सहारे लगा पाता हूँ। शाम को रोशनदानों में बोरे ठूँस दिये जाते थे और कमरे के अंदर जलती हुई ढिबरी को गुनाह की तरह छिपाया जाता। बाहर घटाटोप अंधेरा। यकीनन उस समय सन् 71 की भारत-पाक जंग चल रही होगी। उसी के चलते अंधेरे का राज था- ब्लैक आउट। रोशनी से परहेज जंग में ही किया जाता है। न सिर्फ दिये की रोशनी से बल्कि दिमाग पर भी स्याह गिलाफ चढ़ा दिये जाते हैं। जो कोई अपने दिमाग पर पर्दा न डाले, युद्घ के वास्तविक कारणों, जो कि अमूमन कुछ लोगों के अपने स्वार्थ होते हैं, पर तर्कसंगत बात करे, वह गद्दार है। सामान्य दिनों में देश को अपनी माँ कह कर उसके साथ बलात्कार करने वाले अपनी माँ के खसम उन दिनों खूब देशभक्ति का दिखावा करते हैं।

माँ बीमार है, अस्पताल में भर्ती है। पिता दफ्तर, अस्पताल और घर सब जगह दौड़े फिर रहे हैं। मैं दिन भर घर में छोटे भाई के साथ रहता हूँ। यह भाई कब कहाँ से टपका, मुझे याद नहीं। मैं खुद बहलाये जाने की उम्र का हूँ, उसे नहीं बहला पाता। उसे झुलाने, थपकियाँ देने के अलावा बोतल से दूध पिलाता हूँ और अपनी समझ के मुताबिक पानी में चीनी घोल कर देता हूँ। शहद वाले निप्पल से कई बार बहल भी जाता है। उसे बहलाते हुए अकसर मुझे नींद आ जाती है। रोते-रोते थक कर वह भी सो जाता है। गर्मियों के दिन, दरवाजे चौपट खुले हुए।

शाम को पिता दफ्तर से लौट कर खाना बनाते हैं। फिर छोटे भाई को गोद में लिये एक हाथ से दरवाजे में ताला लगाने का करतब करते हैं। कंधे में बिस्तरा, झोले में खाना और चाय का सामान, एक हाथ में स्टोव लिये मुझे साथ लेकर पैदल अस्पताल जाते हैं। अस्पताल के बरामदे में लकड़ी की दो बेंचों के मुँह आपस में जोड़ कर बिस्तरा बिछाया जाता है, जिसमें दोनों बच्चे सो जाते हैं। पिता रात भर माँ और हमें देखते हैं। यह सिलसिला न जाने कितने दिन, लेकिन कई दिनों तक चला। दून अस्पताल की धुँधली-सी यादें हैं। गेट के बाहर सड़क में खाली शीशियाँ बिका करती थीं। तब अस्पताल में अनार के जूस-सा दिखने वाला एक घोल भी मरीजों को मिलता था, जिसके लिये लोग शीशी खरीदते थे। समझदार लोग शीशी घर से लाते, दस-बीस पैसे की बचत हो जाती। यह घोल मिक्चर कहलाता और हर मर्ज में मुफीद मान कर दिया जाता था। मिक्चर स्वाद में शायद कसैला-सा होता था लेकिन मीठा तो हरगिज नहीं।

उन्हीं दिनों कभी मैंने पिता से पूछा कि क्या इंदिरा गांधी तुमको जानती है ? क्योंकि वह खुद को सरकारी नौकर बताते थे और लोग कहते थे कि सरकार इंदिरा गांधी की है। मतलब कि वह इंदिरा गांधी के नौकर हुए। मालिक अपने नौकर को जानता ही है। मेरा सवाल ठीक था। ऐसे ही एक बार मैंने उनसे पूछा, जब मैं तुम्हें याद कर रहा था तब तुम कहाँ थे, क्या कर रहे थे।

देहरादून की यादें बस इतनी-सी है। शायद सन् 74 में देहरादून छूट गया और आज तक फिर कभी वहाँ जाने का इत्तेफाक नहीं हुआ। कई चीजें और वाकयात आज भी यूँ याद हैं जैसे हाल ही की बात हो। पिता का दफ्तर, पास ही में चाय की दुकान, तिराहे पर साइकिल मैकेनिक गुलाटी। उसके बाँये मुड़ कर थोड़ा आगे अहाते के भीतर हमारी कोठरी। चित्रकार होता तो ये सब कैनवस में उकेर सकता था।

फिर पिता का तबादला अल्मोड़ा हो जाता है, बकौल उनके ऑन रिक्वेस्ट। अल्मोड़ा आकर हम गाँव में रहने लगे। पिता गाँव से शहर नौकरी करने आते-जाते हैं। कुछ समय बाद माँ फिर बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हो जाती है। पता नहीं क्या मर्ज था। पिता तीमारदारी और नौकरी साथ-साथ करते हैं। मुझे ननिहाल भेज दिया जाता है। एक दिन नानी के साथ माँ से मिलने गया था। याद नहीं हमारी क्या बातें हुई थीं। स्टूल में बैठा पाँव हिलाता उसे देखता रहा। पिता दहेज में मिले तांबे-पीतल के थाली-परात (जो कि उनकी गैरमौजूदगी के कारण ननिहाल में सुरक्षित थे) बेच-बेच कर दवा-दारू कर रहे थे।

माँ से वह आखिरी मुलाकात थी। माँ की याद मेरे लिये कभी भी भावुक कर देने वाली नहीं रही। ऐसा शायद इसलिये कि उसका मेरा साथ काफी कम रहा। हाँ, मुझे काठ का बना एक गोल डब्बा अकसर याद आता है। धानी रंग के डब्बे में लाल-हरी फूल-पत्तियाँ बनी थीं। माँ का सपना था कि कभी पैसे जुटे तो अपने लिये नथ बनावाऊँगी, यह डब्बा नथ रखने के काम आयेगा। वह डब्बा मैं संभाल कर नहीं रख पाया। माँ साक्षर थी, मुझे पढ़ाया करती थी। गाँव में एक बार उसने मेरे पूछने पर पशुओं की मिसाल देकर बताया कि इनसान के बच्चे भी इसी प्रक्रिया से पैदा होते हैं। मैं हैरान होता हूँ इस बात को सोच कर। ऐसी बातें आजकल की उच्च शिक्षित माँएं भी अपने बच्चों को बताने की जुर्रत नहीं करतीं। तब तो बच्चा अगर किसी बात पर ‘मजा आ गया’ कहता तो तमाचा खाता था। क्योंकि तब माँ-बाप को मजा सिर्फ एक ही चीज में आता था, जिसके नतीजे में कम से कम दर्जन भर बच्चे हर वक्त मजे को बदमजगी में बदल रहे होते, जिन्दगी अजीरन बन जाती।

सुबह का समय है। दिन जाड़ों के धूप निकली है मगर खुद ठिठुरी हुई-सी। आँगन में छोटे मामा मुझे पीट-पीट कर हिन्दी पढ़ा रहे हैं। ऊपर सड़क में जो एक दुकान है, वहाँ से बीच वाले मामा को आवाज देकर बुलाया जाता है। मामा मुझे भेज देते हैं कि जाकर पूछ आऊँ  कि क्या काम है। ताकि अगर कोई बबाली काम हो तो बहाना बनाया जा सके। पाले से भीगे पथरीले रास्ते पर नंगे पाँव चलता हुआ करीब आधा किमी दूर दुकान में जाता हूँ। दुकानदार मुझे लौटा देता है कि तेरे मतलब की बात नहीं, नवीन को भेज। थोड़ी देर बाद मामा आकर बताते हैं कि अस्पताल में माँ चल बसी। तब डाक विभाग के हरकारे डाक के थैले लेकर पैदल चला करते थे। उन्हीं से पिता ने जवाब भिजवाया था। मेरे कॉपी-किताब किनारे रखवा दिये जाते हैं। मेरे लिये सीढ़ियों में बोरा बिछा दिया गया। लोग कहते हैं, देखो कैसा बड़ों की तरह रो रहा है। वे लोग दहाड़ें सुनने के आदी थे। दहाड़ें मारते हुए सर फोड़ने को आमादा आदमी को संभालने और संसार की असारता पर बोलने के सुख से अनजाने ही उन्हें वंचित कर रहा था मैं।

इसके शायद दूसरे ही दिन छोटे मामा मुझे पिता के पास गाँव छोड़ गये, जहां पिता माँ का क्रियाकर्म कर रहे थे। शायद तकनीकी मजबूरी के कारण ऐसा करना पड़ा होगा। मैं काफी छोटा था और चचा-ताऊ  कोई थे नहीं। हिन्दुओं के शास्त्र भारतीय संविधान की तरह काफी लचीले हैं, जैसा बाजा बजे वैसा नाच लेते हैं। चाहें तो हर रास्ता बंद कर दें और अगर मंशा हो तो हजार राहदारियाँ खुल जाती हैं।

माँ के क्रियाकर्म से निपट कर पिता फिर दफ्तर जाने लगे। सुबह मेरे लिये खाना बना कर रख जाते हैं। रात को 8-9 बजे लौट कर आते हैं। टॉर्च और जरकिन लेकर एकाध किमी दूर नौले से पानी लाते हैं। खाना बनाते हैं। उनके लौटने तक मैं दूसरों के घरों में बैठा रहता हूँ। बाद में पिता पानी का जरकिन सुबह साथ लेकर जाते हैं जिसे रास्ते में पड़ने वाले गाँव में रख जाते हैं। शाम को उसी दिशा में नौले जाने का फेरा बच जाता है। मैं दिन भर सूखे पत्ते-सा यहाँ-वहाँ डोलता रहता। दूसरे बच्चों के साथ गाय-बकरियाँ चराने जाता (अपनी कोई गाय बकरी नहीं थी)। दूसरे बच्चों की देखादेखी कीचड़नुमा पानी के तालाब में नहाता, काफल के पेड़ों में चढ़ता-गिरता। लगभग साल भर यूँ ही बीत गया। इसी दरमियान मैं स्कूल भी जाने लगा, कुछ उसी तर्ज पर जैसे गाय-बकरियाँ चराने जाता था और वह भी सीधा तीसरी क्लास में। शायद इसलिये कि मेरी हिन्दी चौथी-पाँचवी के बच्चों से अच्छी थी। मास्टर का बोला हुआ मैं कम या बिना गलती के लिख लेता। शायद इसी बात से मास्टर साहब प्रभावित हो गये हों। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि शिक्षा की बुनियाद रखते ही हिल गयी। इस ऐतबार से मेरी गिनती घोड़े में न गधे में। बाद में दुश्मनों ने काफी समझाया-उकसाया कि भई ऊपर का माला पक्का करवा लो और दीवारों में पलस्तर भी। अब भला झुग्गी की छत भी कहीं सीमेंट और लोहे की हो सकती है।

माँ की मौत के साल बीतते-बीतते पिता जब्त नहीं कर पाये और दूसरी शादी की बातें होने लगीं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुझे बताया गया कि मेरी देखभाल कौन करेगा। घर, खेती-बाड़ी सब वीरान हो जायेंगे। यह सब बहाना था, बकवास था। पिता साफ झूठ बोल रहे थे। कारण शुद्ध रूप से शारीरिक था, इतनी समझ मुझमें तब भी थी (बाकी आज भी नहीं)। पिता अपने निजी, क्षणिक सुख के लिये शादी करना चाह रहे थे। मुझे देखभाल की ऐसी कोई जरूरत नहीं थी और खेती-बाड़ी ऐसी माशाअल्लाह कि आम बो कर भी बबूल न उगे।

पिता ने बड़ा ही अराजक किस्म का जीवन जिया था। अपनी जवानी का लगभग तीन चौथाई हिस्सा हरिद्वार, मुरादाबाद और बिजनौर जैसी जगहों पर किसी छुट्टे साँड-सा बिताया था। बाद में उनके जीजा जी ने पकड़-धकड़ कर उनकी शादी करवायी थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, उनकी शादी उस समय के हिसाब से काफी देर में हुई थी। पिता मुरादाबाद में किसी भाँतू कॉलोनी का जिक्र अक्सर किया करते थे कि गुरु हम वहाँ शराब पीने जाया करते थे़.़.। बाद में मेरे एक दोस्त ने भाँतू कॉलोनी के बारे में जो मुझे मोटा-मोटा बताया, उसे मैं यहाँ जानबूझकर नहीं कह रहा। क्योंकि हो सकता है कि बात गलत हो और भाँतू कॉलोनी का कोई शरीफजादा मुझ पर मुकदमा लेकर चढ़ बैठे। पिता कहते थे कि हमने अपना ट्रांसफर बिजनौर या मुरादाबाद से देहरादून इसलिये करवाया ताकि हम जौनसार की ब्यूटी देख सकें। देखी या नहीं, वही जानें।

तो पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। नतीजतन बाप-बेटे के बीच जो एक अदृश्य मगर नाजुक-सा धागा होता है उसमें गाँठ पड़ गयी, शीशे में बाल आ गया। पिता के पास शायद वह आँख नहीं थी कि उस बाल को देख पाते। उस समय वह सिर्फ अपनी खुशी देख रहे थे। मानो मैं गिनती में था ही नहीं। अगर था भी तो शायद वह मान कर चल रहे थे कि उनकी खुशी में मैं भी खुश हूँ या कुदरती तौर पर मुझे होना चाहिये। मैं इस तरह का बच्चा नहीं था कि पूड़ी-पकवान और हो-हल्ले से खुश हो लेता, बहल जाता। पिता जो कर रहे थे वह मुझे हरगिज मंजूर नहीं था। लेकिन मैं उन्हें रोक भी नहीं सकता था। विमाता से मैं कई सालों तक हूँ-हाँ के अलावा कुछ नहीं बोला। मजबूरी में बोलना भी पड़ा तो ऐसे कि जैसे किसी और से मुखातिब होऊँ। आज भी किसी संबोधन के बिना ही बातचीत करता हूँ। दोषी मेरी नजर में पिता थे, विमाता की क्या गलती? पिता ने मेरे लिये अजीब-सी स्थिति पैदा कर दी थी। मैं उनकी इस हरकत (शादी) को कभी भी नहीं पचा पाया। जाहिर-सी बात कि मैं कोई सफाई नहीं दे रहा, सिर्फ अपनी स्थिति और मानसिक बनावट का बयान कर रहा हूँ। विमाता का व्यवहार कभी मेरे लिये बुरा नहीं रहा। संबंध हमारे चाहे जैसे रहे हों पर मान में मेरी ओर से कोई कमी नहीं और मान मेरी नजर में कोई दिखावे की चीज नहीं।

विमाता की एक बात ने मुझे तब भी काफी प्रभावित किया था। शादी के एकाध महीने बाद वह एक दिन पूड़ी-पकवानों की सौगात लिये मेरी ननिहाल अकेले जा पहुँची कि मुझे अपनी ही बेटी समझना, इस घर से नाता बनाये रखना। ऐसी बातें जरा कम ही देखने में आती हैं। आज मेरे संबंध ननिहाल में चाहे तकरीबन खत्म हो गये हों पर गाँव में मेरा जो परिवार है उसके ताल्लुकात मेरी जानकारी में अच्छे हैं, सामान्य हैं।

इस शादी से पिता शुरुआती दिनों के अलावा कभी खुश नहीं रह पाये। साल भर भी नहीं बीतने पाया कि लड़ाई-झगड़े शुरू हो गये। मनमुटाव का ऐसा कोई खास कारण नहीं, बस झगड़ना था। पिता महिलाओं के प्रति एकदम सामंती नजरिया नहीं रखते थे (उनके कद के हिसाब से सामंती शब्द कुछ बड़ा हो गया शायद)। गाँव में उनका मजाक इसलिये उड़ाया जाता कि यह आदमी अपनी बीवी को तू नहीं तुम कह कर पुकारता है। बावजूद इसके झगड़ा होता था। हाँ, पिता काफी हद तक टेढ़े थे, कान के कच्चे और कुछ हद तक पूर्वाग्रही भी। ऐसे लोग हर जगह होते हैं जो दानों पक्षों के कान भर कर झगड़ा करवाते हैं और खुद दूर से मजा लेते हैं। विमाता का भी यह दूसरा विवाह था, एक तरह की अल्हड़ता मिजाज में काफी कुछ बची रह गयी थी और सौंदर्यबोध का सिरे से अभाव। हालाँकि अपनी नजर में कोई भी फूहड़ नहीं होता, सभी का अपना-अपना सौंदर्यबोध होता है। पिता बड़े सलीकेदार, गोद के बच्चे को भी आप कह कर बुलाने वाले और कबाड़ से जुगाड़ पैदा करने वाले आदमी थे। नहीं निभनी थी, नहीं निभी।

पिता के दिमाग की बनावट बेहद लचकदार थी। वह कई मामलों में वैज्ञानिक सोच रखने वाले, परम्पराओं के रूप में कुरीतियों को न ढोने वाले व्यक्ति थे। उनका गाँव वालों से कहना था कि हमें मडुवा-मादिरा जैसी परम्परागत और लगभग निरर्थक खेती को छोड़ ऐसी चीजें उगानी चाहिये, जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। खुद हमें इन चीजों को खरीदना पड़ता है। मसलन हल्दी, अदरक, गंडेरी, आलू, दालें वगैरा। फलों के पेड़ और फूल भी। हमें शहरों में जाकर बर्तन मलने, लकड़ी बेचने जैसे जिल्लत भरे कामों के करने की जरूरत नहीं है। जहाँ तक जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुँचाने की बात है, अगर सारा गाँव इस काम को करने लगेगा तो बाड़ और पहरे का भी इंतजाम हो जायेगा। एक अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता। उनके दिमाग की बनावट को समझने के लिये एक और मिसाल देने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा। गाँव में कोई किसी को लोटे के साथ अपने खेत में बैठा देख ले (रिवाज दूसरे के खेत में ही बैठने का है) तो गरियाने लगता है कि अरे बेशर्म तुझे गंदगी फैलाने को मेरा ही खेत मिला? बैठा हुआ आदमी बीच में ही उठ कर किसी और के खेत में जा बैठता है। पिता के विचार इस बारे में जरा अलग और क्रांतिकारी थे। उनका कहना था कि एक तो तुम उसके खेत को इतनी महान खाद मुफ्त में दो और बदले में गाली खाओ, क्या फायदा? क्यों न धड़ल्ले से ससुर अपने खेत में जाकर बैठो। खुला खेल फर्रुखाबादी।

एक रोज सीढ़ियों से लुढ़क कर मैं अपना माथा फुड़वा बैठा। लोगों ने घाव में चीनी-चरस ठूँस कर कपड़ा बाँध दिया। कुछ दिन बाद घाव पक कर रिसने लगा, उसमें मवाद पड़ गया। पिता एक दिन मुझे अल्मोड़ा ले आये। जहाँ दो-एक हफ्ते तक घाव की मरहम-पट्टी होती रही और ढेर सारे पेंसिलीन के इन्जेक्शन लगे। पिता मुझे साथ लेकर दफ्तर में रहने लगे। कहीं से एक स्टोव ले आये, अटक-बिटक के लिये सरकारी हीटर था ही। भगौने का ढक्कन तवा, उल्टी थाली चकला, गिलास बेलन बन गया। बैंच-टेबलें खटिया और पर्दे-कुशन बिस्तरा। कुछ ही समय बाद पास ही में किराये की कोठरी (फिर कोठरी) मिल गयी। मेरा दाखिला स्कूल में करवा दिया गया। यह सब सन् 81-82 की बात है।

इसके बाद दो-चार बार गाँव जाना हुआ, पर वहाँ मेरा मन नहीं लगा। मुझे शहर रास आने लगा था। आखिरी बार गाँव मुझे यज्ञोपवीत संस्कार के लिये ले जाया गया। यह तब की बात है जब नवाज शरीफ पहली बार (जाहिर-सी बात है कि पाकिस्तान के) प्रधानमंत्री बने थे। गाँव में रहने का अनुभव बस तीनेक साल का है।

पिता का गाँव आना-जाना लगा रहा। शायद उन्होंने जादू टोना भी एकाध बार करवाया- मेरे गाँव न जाने को लेकर। पिता ने फिर से चार संतानें पैदा कीं। पहली मरी हुई, बाकी तीन स्वस्थ हैं, पर शायद प्रसन्न न हों। उन्होंने संतत्ति के रूप में अपनी अंतिम रचना रिटायरमेंट के बाद प्रस्तुत की। गोया रिटायर कर दिये जाने से खुश न हों और अपनी रचनात्मक क्षमता साबित कर उन्होंने सरकार को मुँहतोड़ जवाब दिया हो।

रिटायर होने के ठीक अगले दिन उन्होंने सड़क में बैठ कर लॉटरी बेचना शुरू कर दिया। ऐसा करने की हार्दिक इच्छा उनकी काफी समय से थी। उनका खयाल था कि जिस दिन वह लॉटरी बेचने लगेंगे उस दिन सब (दूसरे लॉटरी वाले) अपना बिस्तरा गोल कर लेंगे। और कि गुरु, हमारे चारों ओर लोग यूं उमड़ पड़ेंगे जैसे गुड़ में मक्खियाँ लगती हैं। उनका खयाल था कि वह इस धंधे में लखपति़.़. शायद करोड़पति भी बन सकते हैं। उनका कहना था कि हम यहाँ से अपने गाँव तक एक पुल बनायेंगे। वगैरा-वगैरा। हाँ, तो लोग उनके इर्द-गिर्द खूब मँडराये। लोगों ने दो-एक महीने में ही गुड़ में से ‘ड़’ चूस लिया और ‘गु’ छोड़ दिया। अब क्योंकि ‘ड़’ के बिना ‘गु’ अकेला मीठा नहीं होता, इसलिये मक्खियों ने दूसरे बाग-बगीचों का रुख किया। खेल खतम, पैसा हजम। बच्चा लोग बजाओ…, ताली बजाने को कोई मौजूद नहीं था।

उन जैसा स्वप्न विश्लेषक शायद ही कोई दूसरा हो, एक नम्बर वाली लॉटरी के मामले में। मसलन वह कहेंगे कि गुरु हमने कल रात सपने में गाय को सीढ़ी चढ़ते देखा, हमें उसकी चार टाँगें दिखायी दीं। तो चढ़ने का बना चव्वा और चार टाँगों का भी चव्वा ही बनता है। इन दोनों को जोड़ कर बना अट्ठा। मतलब कि आज चव्वा और अट्ठा पकड़ लो और सपोर्ट में रख लो दुक्की। कई दिनों से बंद पड़ी है दुक्की। सपने में अगर शादीशुदा औरत दिखे तो मतलब कि आज जीरो खुलेगा, क्योंकि औरतें बिन्दी लगाती हैं। कुँवारी लड़की का नम्बर अलग बनता था और अगर प्रश्नकर्ता सपने में महिला के साथ कुछ ऐसी-वैसी हरकत कर रहा हो तो उससे कुछ और नम्बर निकलता था। मैं अधिकांश प्रतीकों को भूल गया हूँ, जो कि अद्भुत थे। सपनों से नम्बर निकालने के पीछे जो कारण और तर्क थे वो कल्पनातीत थे। मेरे खयाल में यह सट्टे के तौर-तरीके हैं और पिता ने मैदानी इलाकों में रहते हुए सट्टा न खेला हो, ऐसी गलती उनसे कैसे हो सकती थी?

एक बार किसी ने आकर उन्हें बताया कि मैंने कल रात खुद को हाथी पर बैठे देखा। पिता ने इसका मतलब उन्हें बताया कि आज अट्ठा पड़ेगा। दो-एक दिन बाद वही साहब कहने लगे कि मैं जमीन में खड़ा हूँ। हाथी मेरे बगल में खड़ा है। पिता ने कहा कि आज आप चव्वा पकड़ लें। प्रश्नकर्ता ने कहा ऐसा कैसे? जवाब मिला – अब क्या जिन्दगी भर हाथी में ही बैठे रहेंगे? परसों हाथी में थे तो अट्ठा खुला, आज हाथी से उतर गये हैं तो उसका जस्ट आधा कर लीजिये। कौन-सा कठिन है।

मेरे एक दोस्त ने उन्हें एक काल्पनिक सपना कह सुनाया कि मैंने जंगल में आग लगी देखी तो उस पर पानी डालकर बुझा दिया। प्रश्नकर्ता का मकसद लॉटरी का नम्बर निकलवाना नहीं था, उसे पिता के जवाब में दिलचस्पी थी। पिता ने बिना सोचे जवाब दिया- हाँ ठीक तो है। आपने आग में पानी डाल दिया, आग बुझा दी… बस। बड़ा आसान है। योगेश बाबू, पढ़े-लिखे जवान आदमी हो, इतना भी नहीं समझते कि इस उम्र में ऐसे सपने आते हैं।

दो-एक महीने तक अपने आसपास मक्खियों का भिनभिना महसूस कर पिता अज्ञातवास में गाँव चले गये। करीब छ: महीनों तक हम दोनों ने एक दूसरे की कोई खोज-खबर नहीं ली। मैं इस अर्से में कबाड़ से जुगाड़ पद्धति से जिन्दा रहा। पिता की पेंशन न जाने कहाँ अटक गयी थी। वह ऐसे महारथी थे कि गाँव में रह कर भी हरकारों के जरिये लॉटरी के शेयर मार्केट में अपना दखल बनाये रहे। सपने देख-देख कर नम्बर निकाल रहे थे। लॉटरी हार- जीत रहे थे। अब हरकारे कितनी ईमानदारी बरतते होंगे कहना मुश्किल है। वह छ: महीने बाद अचानक प्रकट भये एक दिन गोर्की जैसी मूछें बढ़ाये हुए। पेंशन चल पड़ी थी।

लॉटरी उनसे तब तक नहीं छूटी जब तक सरकार ने इसे बंद न कर दिया। इस धंधे में असफल रहने का कारण उनकी नजर में मैं था। बकौल उनके- गुरु, हम तो क्या का क्या कर दें, इस शख्स से जो हमें इतना-सा सहयोग मिल जाये। मैंने कब उनके हाथ बाँधे, उन्होंने मेरा कहा कब किया, याद नहीं। जो भी चीज उनके मन मुताबिक न होती, उसका ठीकरा मेरे सर फोड़ा जाता। उन्होंने कुछ ऐसी बातें भी मेरे साथ चस्पा कर रखी थीं कि जिनका मुझ से कोई मतलब नहीं था। उनके कहे मुताबिक वह बीमार पड़ना तब से शुरू हुए जब से उन्होंने भात खाना शुरू किया। वर्ना पहले तो हम उस घर में ही नहीं जाते थे जहाँ चावल पक रहा हो। गुरु, हमारी शादी (पहली) में सात गाँवों की पंचायत बैठी, सिर्फ हमारी वजह से भात का प्रोग्राम कैंसिल कर पूड़ियाँ बनीं। तो चावल वह मेरी वजह से अपनी जान पर खेल कर खाये जा रहे थे। जबकि सच यह है कि मुझे चावल कोई इतने पसंद नहीं कि भात खाये बिना खाया हुआ सा न लगे। पिता सुबह को चावल बना कर परोस दें तो मैं क्या कर सकता था, सिवाय इसके कि चुपचाप खा लूँ और देखने वाले की नजर में अपने बाप की सेहत से खिलवाड़ करता हुआ रंगे हाथों पकड़ा जाऊँ। गुनहगार कहलाऊँ। पिता दूसरों की नजर में बुजुर्ग, सीधे और भलेमानुष, मैं कमीना और बूढ़े बाप को सताने वाला। परिस्थितियाँ कभी भी मेरे अनुकूल नहीं रहीं।

मकान मालिक लोगों की जो जमीन यूँ ही पड़ी-पड़ी कूड़ेदान का काम कर रही थी, पिता ने उसमें शाक-सब्जियाँ उगाना शुरू कर दिया। यह काम वह पहले भी करते ही थे। अब होलटाइमर थे। बारहों महीने मौसम के मुताबिक सब्जी खेत में मौजूद। सब्जी तोड़-तोड़कर पास-पड़ोस में बाँट रहे हैं। इस-उस को दे रहे हैं। पेड़ों को पब्लिक नल से पानी ढोकर सींच रहे हैं। और मजे की बात कि न आप मिर्च खाते हैं न बैगन। बैगन का नाम आपके मुताबिक दरअसल बेगुन है, इसमें कोई गुण नहीं होता। भगवान इसकी रचना भूलवश कर बैठा। अचार के सीजन में बड़े-बड़े केनों में अचार ठुँसा पड़ा है। लहसुन छील-छील कर उँगलियों के पोर गल गये हैं। आपके कथनानुसार कोई खाता नहीं, वर्ना हम तो ससुर टर्रे का भी आचार डाल दें। टर्रा मतलब मेंढक। बड़ियों के मौसम में बड़ी मुंगौड़ियों की रेलम-पेल। बड़ी पिता के मुताबिक स्वास्थ्य खराब करने वाली चीज है, उसकी तासीर ठंडी होती है। एक बार उन्होंने 17 किलो माश की बड़ियाँ बना डालीं। 17 किलो माश को धोना, साफ करना और सिल में पीसना अपने आप में एक बड़ा काम है- संस्था का काम है। पर उन्होंने पीस डाला रो-धोकर मुझे सुनाते हुए रुआँसी आवाज में कि मेरा कोई होता तो माश पीस देता। ऐसे चूतियापे के कामों में सचमुच मैंने कभी उनका साथ नहीं दिया। सिवाय इसके कि अचार का आम या बड़ियाँ छत में सूखने पड़ी हैं, बूँदाबाँदी होने लगी तो उन्हें उठा कर भीतर रख दूँ। सोचने वाले सोचते कि इस आदमी ने अचार-बड़ियों का कुटीर उद्योग खोल रखा है। अच्छा-भला मुनाफा हो रहा है। इसका लड़का अगर थोड़ा हाथ बँटा देता तो क्या बुरा था। आखिर यह बूढ़ा आदमी इतनी मेहनत किसके लिये कर रहा है। सचमुच बेटा इसका नासमझ है और कमीना भी। मुझे कहीं पनाह नहीं थी।

पाव या आधा लीटर दूध को दिन भर में चार-छ: बार उबाल कर उसकी मलाई निकाली जा रही है, फिर 10-15 दिन में उससे घी बन रहा है। आने वाले को दिखाया जाता है- देखिये, हमारे हाथ का घी, मलाई से बनाते हैं हम। देखने वाला वाह करता, मेरा मन उसे तमाचा जड़ने का होता। क्योंकि वह 100 ग्राम जो घी है मैं जानता हूँ वह जैतून और बादाम के तेल से भी महंगा पड़ गया है। और उस पर तुर्रा ये कि अमूमन घी अचानक गायब हो जाता। पूछने पर पता चलता कि फलाँ को दे दिया। बेकार चीज है, खाँसी करता है।

ताश खेलना उन्हें बेहद पसंद था। उनकी नजर में यह एक महान खेल था जो कि दिमाग के लिये शंखपुष्पी और रोगने-बादाम जैसी प्रचलित चीजों से ज्यादा गुणकारी था। उनके मुताबिक अगर बच्चों को अक्षर ज्ञान ताश के पत्तों के जरिये करवाया जाये तो वे जल्दी सीखेंगे और उनका दिमाग भी खुलेगा। जरा ऊँचा सुनते थे, ऐसे मौकों पर मैं चिढ़कर लुकमा देता कि वे बच्चे नौकरी-रोजगार से न भी लग पाये तो जुआ खेल कर रोजी कमा ही लेंगे। सामने बैठा आदमी इस पर हँसने लगता। पिता सोचते कि वह उनकी बात पर हँस रहा है। इसलिये जोश में आकर दो-चार ऐसी बातें और कह जाते। मैंने उन्हें घंटों अकेले ताश खेलते देखा है। ताश में एक खेल होता है ‘सीप’। यह खेल उन्हें ज्यादा ही पसंद था। चाहे जितनी तबियत खराब हो, सीप का जानने वाला कोई आ जाये तो कांखते-कराहते उठ बैठते और खेल जारी रहने तक सब दर्द तकलीफ भूल जाते। अगर दो-एक बाजी हार जाते तो चिढ़ कर खेल बंद कर देते कि- बंद करिये, हमारी तबियत ठीक नहीं। पता नहीं साला केंसर है, न जाने क्या है। जीतने पर उनका जोश बढ़ जाता। फिर सामने वाला खिलाड़ी चाहे गणित में गोल्ड मैडलिस्ट क्यों न हो, उसे सुनना पड़ता कि गुरु, आपका हिसाब बड़ा कमजोर है। कौन पत्ता फेंक दिया, कौन-सा हाथ में है, इत्ता-सा हिसाब नहीं रख सकते।

खिलाने-पिलाने के बड़े शौकीन थे। तरह-तरह के प्रयोग खाने में अकसर होते रहते। करेले की रसेदार सब्जी मैंने उन्हीं के हाथ बनी खायी। सब्जी परोसते हुए उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि असल में करेला ऐसे नहीं बनता। इसे बारीक काट कर तवे में सूखा बनाया जाता है। जरा भी कड़वा नहीं होता। एक बार उन्होंने मेरे कुछ दोस्तों को बुलवा भेजा। आइये गुरु, देखिये आज हमने आपके लिये क्या बनाया है! उस दिन बिच्छू घास की सब्जी बनी थी। शराब मैंने पहली बार उन्हीं के साथ चखी। जब कभी पास में पैसे हों, मूड हो तो कहते वाइन लेगा, है मूड? आज साली ठंड भी है यार। मैं चुपचाप हाथ पसार देता और जाकर पव्वा ले आता। दोनों बाप-बेटे हमप्याला हम निवाला होते, कुल्ला करके सो जाते।

आखिरी दो-तीन सालों में उनका दम बेहद फूलने लगा था इसलिये धूम्रपान छोड़ कर सुर्ती फटकने लगे थे। अब उनकी नजर में सुर्ती भी एक महान चीज थी। एक बार उन्होंने मेरे एक दोस्त को सुर्ती पेश की। दोस्त ने कहा मुझे आदत नहीं है, चूने से मुँह फट जायेगा। पिता ने उसे समझाया- गुरु, शादी से पहले लड़कियाँ भी इसी तरह डरती हैं… बाद में सब ठीक हो जाता है। आपको भी आदत पड़ जायेगी। खाया कीजिये, बड़ी महान चीज है, दिमाग तेज करती है।

कई बार वह ऐसी बातें सिर्फ कहने के लिये कह जाते कि जिसकी निरर्थकता का उन्हें खुद भी अहसास होता। मसलन, गुरु, कुत्ता बड़ा महान जीव होता है। उसके धार्मिक खयालात बहुत ऊँचे होते हैं। उसे अगर रास्ते में दूसरे कुत्ते काट खाने को न आयें तो वह रातोंरात हरिद्वार जाकर नहा आये। मेरा ऐतराज था कि जो कुत्ते उसका रास्ता रोकने को बैठे रहते हैं वो खुद क्यों नहीं उससे पहले हरिद्वार चले जाते? पिता बात बदल देते या चिढ़ जाते।

किसी को अंग्रेजी शराब पीता देखते तो कहते- ये साली बड़ी बेकार चीज है, ठर्रा बड़ी महान चीज है। ठर्रे वाले को राय होती कि ये कोई अच्छी चीज थोड़ा है, आँतें गला देती है। कम लो, अच्छी चीज लो, इंगलिश पिया करो। इसी तरह उनका दिन चाय पीने और चाय की बुराइयाँ गिनवाने में बीतता।

उनका दावा था कि अगर कोई उन्हें सात फाउंटेन पैनों में सात रंग की स्याहियाँ भर कर ला दे तो वे असल जैसा दिखने वाला नकली नोट बना सकते हैं। उनका इतना-सा काम किसी ने करके नहीं दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था चौपट होने से बच गयी। इस नेक काम में मैंने भी सहयोग नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कहा- देखना गुरु, अब अटलजी मैरिज कर लेंगे। सैटल हो गये हैं न। पिता जैसे थे मैंने ठीक वैसे ही कलम से पेंट कर दिये। न मैंने उनका मेकअप किया, न उन पर कीचड़ उछाला। उन्हें याद करने के बहाने माँ, जिसकी याद मुझे जरा कम ही आती है, को भी याद कर लिया और खुद अपने अतीत की भी गर्द झड़ गयी। बात से बात निकलती चली गयी, डर है कहीं रौ में कुछ गैरजरूरी न कह गया होऊँ।

मेरे लिये पिता की दो छोटी सी ख्वाहिशें थीं- एक तो मुझे किसी तरह चार-छ: बोतल ग्लूकोज चढ़ जाये। जिससे मैं थोड़ मोटा हो जाऊँ। मेरा दुबलापन उनके अनुसार सूखा रोग का लक्षण था। ग्लूकोज चढ़ने से मैं बकौल उनके ‘बम्म’ हो जाता। और दूसरी ख्वाहिश थी कि अनाथालय से मेरी शादी हो जाये। जाहिर -सी बात है कि मैंने हमेशा की तरह यहाँ भी उन्हें सहयोग नहीं किया और नतीजतन इतना दुबला हूँ कि मेरी उम्र मेरे वजन से ज्यादा है।

यादों में रहेंगे सदा: सन्तोष कुमार चतुर्वेदी

प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन को पुनर्स्‍थापित करने वालों में महत्‍वपूर्ण कथाकार मार्कण्‍डेय पर उनके साथ कथा पत्रिका में सहायक रहे युवा कवि सन्‍तोष कुमार चतुर्वेदी का संस्‍मरण और लंबी कविता-

कवि केदार नाथ सिंह की एक छोटी कविता ‘जाना’ की पंक्तियां हैं-

मैं जा रही हूं- उसने कह

जाओ – मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

18 मार्च, 2010 को सायं सवा पांच बजे के आसपास आजमगढ़ से जब मार्कण्डेयजी की बड़ी पुत्री डॉ स्वस्ति सिंह का फोन आया कि ‘पापा नहीं रहे’- तब मैंने हिन्दी की इस सबसे खौफनाक क्रिया को शि‍द्दत से महसूस किया। मैं स्तब्ध था क्योंकि ठीक इसी दिन वह दिल्ली से आजमगढ़ लौटने की तैयारियां कर रहे थे। कैफियात एक्सप्रेस से उनको आजमगढ़ लौटना था। इलाहाबाद में हम अपने तरीके से उनकी अगवानी की तैयारियों में लगे हुए थे। लेकिन एक पल में जैसे सब कुछ गड़बड़ हो गया। अब लौट रहा था ताबूत में रखा हुआ उनका पार्थिव शरीर और हम इलाहाबाद जंक्‍शन पर शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, श्री प्रकाश मिश्र, सूर्यनारायण आदि साथियों के साथ सुबह सवा नौ बजे के आसपास अत्यन्त भीगे मन से रीवांचल एक्सप्रेस का इन्तजार कर रहे थे।

मार्कण्डेय सिर्फ एक नाम भर नहीं थे। वे सिर्फ एक कहानीकार, उपन्यासकार, एकांकी लेखक, आलोचक, कवि या सम्पादक भर नहीं थे, सिर्फ नयी कहानी आन्दोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक नहीं थे- अपितु बहुत कुछ और भी थे। इलाहाबाद को जुनून की हद तक चाहने वाले, प्यार करने वाले। जीवन के अन्तिम समय तक गंवई संस्कारों को अपने में सुरक्षित संरक्षित रखने वाले। अपने से जुड़े हुए लगभग सारे लोगों का बहुत बहुत ख्याल रखने वाले। अत्यन्त विनम्र स्वभाव वाले, हर दिल अजीज और सबसे बढ़कर असीम संवेदनाओं से भरे हुए वे एक बेहतर इन्सान थे। उनके चेहरे की चिरपरिचित हंसी हमेशा बहुत कुछ कहती थी। यद्यपि आज वह स्मृतियों में जीवित हैं, अपनी रचनाओं में जीवित हैं, लेकिन एक कटु सच्चाई यह है कि आज उनका न होना इलाहाबाद को बहुत खल रहा है।

जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकान्त वर्मा, सत्यप्रकाश मिश्र के बाद मार्कण्डेय का जाना इलाहाबाद को गहरे तौर पर सूना कर गया है। शेखर जोशी और अमरकान्त जैसे अपने इस अभिन्न मित्र के इस तरह अचानक चले जाने से अवाक और एकदम अकेले पड़ गये हैं। और हम जैसे नये रचनाकारों के लिए, जिन्होंने साहित्य का ककहरा सीखना अभी शुरू ही किया है, तो यह वज्रपात के समान है। उनके होने भर से हम अपने प्रति गहरे तौर पर आश्‍वस्त होते थे। उनके होने भर से हमारा आत्मविश्‍वास जैसे अपने चरम पर होता था।

समय का पहिया भला कब रूका है कि वह हमारे लिए रुकता। समय के प्रवाह के इस क्रम में हम आज जैसे अपना सब कुछ गवां बैठे थे। इसी बीच महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्‍वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित दूरस्थ शि‍क्षा केन्द्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. सन्तोष भदौरिया का फोन आया कि 20 मार्च, 2010 को केन्द्र के हॉल में सायं 5 बजे से मार्कण्डेय जी पर एक श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन है। संयोगवश यह शनिवार का दिन था। पिछले 14-15 वर्षों से शनिवार और रविवार का दिन मेरे लिए वह खास दिन होता था कि जैसे ही घड़ी की सुइयां शाम के 4 बजातीं दादा का फोन आ जाता- ‘क्या कर रहे हो भाई, उठो और जल्दी से आ जाओ। चाय बन रही है। कथा का बहुत सारा काम करना है।’ इतना सुनना होता कि मैं यन्त्रवत तैयार हो कर जल्दी-जल्दी रिक्‍शे से उनके राजापुर स्थित आवास ए डी-2, एकाकी कुंज, मेयो रोड पहुंच जाता, जो हमारे लिए ‘कथा’ का मुख्यालय भी हुआ करता।

जब हम उनके घर पहॅुचते, हमारे लाख मना करने के बावजूद, जैसाकि उनका स्वभाव था, वे अपने हाथों एक प्लेट में मिठाइयां और ठण्डा पानी लाते। मम्मी विद्यावती जी (मार्कण्डेय जी की पत्नी) गठिया के अपने असहनीय दर्द को दरकिनार कर चाय बनातीं। और तब उनकी पसन्दीदा चना लाई और चाय के साथ बातचीत का अन्तहीन दौर शुरू हो जाता। बीच-बीच में हम कथा के लिए लेखकों को कुछ चिट्ठियां लिखते और लेखकों से रचनाओं के लिए फोन करते-कराते। पिछले कई वर्षों से मेयो रोड से गुजरते हुए, जहां उनका आवास एकाकी कुंज है, एक बार भी ऐसा नहीं हुआ होगा कि दादा से मिले बिना हम निकल जायें। और इस 20 मार्च को पहली बार जब जाना भी हो रहा था तो दादा पर ही आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भाग लेने के लिए। इससे बढ़कर विडम्बना मेरे लिए और क्या हो सकती थी।

दादा को सबकी परवाह रहती थी। उनका स्पेस बहुत व्यापक था जिसमें कॉलोनी के घरों में चौका बासन करने वाली निम्न वर्ग की लड़कियां और महिलाएं होती थीं। घर में काम करने वाला बिजली का मिस्त्री होता था। कॉलोनी के छोटे’छोटे बच्चे होते थे तो दूसरी तरफ साहित्य शीर्ष पर आसीन प्रोफेसर नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, शि‍व कुमार मिश्र या नन्द किशोर नवल होते थे। घर पर काम करने वाली महरी का बच्चा बीमार है तो उसे दवाई दिलवाना, अगर उसकी लड़की ने कक्षा 8 पास कर लिया तो नवें दर्जे में एडमिशन दिलवाना, दूध देने वाले के बच्चे के लिए कहीं नौकरी की व्यवस्था कराना, किसी कवि या कहानीकार ने अगर कुछ लिखा है तो उस पर गोष्ठी के आयोजन की व्यवस्था कराना आदि-आदि तमाम तरह की समस्याएं दादा की अपनी समस्या बन जाती थीं। वे खुद आगे आ कर उन सारी समस्याओं के निराकरण का प्रयास करते थे। दूसरी तरफ उनकी चिन्ता का विषय यह भी होता कि वरिष्ठ आलोचक शि‍व कुमार मिश्र को रिटायरमेन्ट के बाद बहुत कम पेन्‍शन मिल रही है। इतनी महंगाई के जमाने में उनका गुजारा कैसे होता होगा। वरिष्ठ आलोचक नन्द किशोर नवल जो वर्ष 2009 में अधिकांश समय तक तमाम बिमारियों से जूझते रहे, के स्वास्थ्य को ले कर भी वे अक्सर चिन्तित दिखायी पड़ते और मेरे जाते ही कहते, ‘सन्तोष जरा जल्दी से नवल जी को फोन मिलाओ। उनके तबियत की खबर ली जाए।’ शेखर जोशी आजकल कहानियां नहीं लिख रहें किसी तरह से उनसे नयी कहानी लिखवानी है। सतीश जमाली का स्वास्थ्य और उनकी आर्थिक दिक्कतें जैसे दादा की अपनी दिक्कतें बन जाती थीं।

संभवतः वर्ष 2009 के दिसम्बर महीने की वह 20 तारीख थी, जब स्वस्ति दीदी उनके गले की समस्याओं के मद्देनजर बनारस हिन्दू विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में उनको दिखलाने के लिए लिवा गयी थीं। जांच के बाद यह पता चला कि उनके गले में फिर से कैन्सर ग्रोथ हो गया है। यह बात दादा को बतायी नहीं गयी थी। लेकिन लगता है कि दादा को इसका आभास अच्छी तरह से हो चुका था। दो साल पहले भी गले के कैन्सर से वे जूझ चुके थे, पर इस बार जैसे उनको सब पता था। उसी दिन रोज की तरह ही जब उनसे मेरी बात हुई तब उन्होंने मुझे बताया- ‘सन्तोष मामला फिर गड़बड़ हो गया।’ मैंने उन्हें मजबूत करने के उद्देश्‍य से कहा- ‘दादा इलाज से सब कुछ ठीक हो जायेगा। आप बिल्कुल चिन्ता मत करिए।’ तब दादा ने कहा -‘हां, ठीक ही कहते हो। लेकिन… चलो… देखा जायेगा।’

और फिर वह भी दिन आया जब दिल्ली के रोहिणी में राजीव गांधी कैन्सर इन्स्टीट्यूट में उनके गले के कैन्सर की पुष्टि हो गयी। 29 जनवरी को उन्हें दिल्ली रेडियोथिरेपी कराने के लिए जाना था। मैं उनसे मिलने तथा स्टेशन तक छोड़ने के लिए उनकी छोटी बेटी डॉ. शस्या ठाकुर के आवास थार्नहिल रोड स्थित टेमेरिन ट्री गया। हमेशा उत्साहित रहने वाले तथा हम सबको हमेशा उत्साहित करने वाले हम सबके दादा आज मुझे पहली बार बहुत हतोत्साहित लगे।

उनका मनोबल बढा़ने के लिए हम तमाम बातें कर रहे थे, गढ़ रहे थे, लेकिन सब जैसे व्यर्थ साबित हो जा रहा था। एक विषाद उनके चेहरे पर साफ-साफ पढा़ और महसूस किया जा सकता था। प्रयागराज एक्सप्रेस पर उन्हें बिठाते हुए और दिल्ली के लिए रवाना करते हुए हम पहली बार बहुत अजीबोगरीब महसूस कर रहे थे। हमारे लिए जैसे अनहोनी का पूर्वाभास था, जिसे नकारने की कोशि‍शों में हम लगे हुए थे। दादा का यह इलाहाबाद का छोड़ना अन्तिम बार का इलाहाबाद का छोड़ना होगा, यह हम कहां जान पाये थे। यह हम कहां स्वीकार कर पाये थे।

दादा के गले की रेडियोथिरेपी एक बार फिर से 01 फरवरी से दिल्ली के रोहिणी के राजीव गांधी कैन्सर इन्स्ट्टीट्यूट में चालू हो गयी। विशेषज्ञ डाक्टरों ने उनकी उम्र और रोग की जटिलता से जुड़ी आगे आने वाली तमाम संभावित दिक्कतों का जिक्र किया। यह भी पता चला कि यह कैन्सर अब उनके फेफडों तक पहुंच चुका है, जो लाइलाज है। स्वस्ति दीदी ने तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद उनके गले की रेडियोथिरेपी कराने का निर्णय लिया। अब हम सबके सामने कोई विकल्प भी तो नहीं बचा था। उनकी उम्र के व्यक्ति के लिए रेडियोथिरेपी और वह भी दो ही साल के अन्दर दुबारा झेल पाना बहुत मुश्‍कि‍ल भरा काम था। फिर भी उनकी रेडियोथिरेपी चालू हुई और फिर वह मौत के साथ दो-दो हाथ करने में मजबूती से जुट गये।

विगत 8-10 सालों से एक ऐसा सिलसिला बन गया था जिसमें प्रायः उनसे रोज ही दसियों बार कथा के संदर्भ में बातचीत होती। हालांकि बीमारी के मद्देनजर मैं अब उनसे बातें करने में संकोच करता, लेकिन वह किसी भी वक्त फोन मिला कर दिल्ली से ही मुझसे तमाम योजनाओं पर बात करने लगते। ‘सपने तुम्हारे थे’ (कविता संग्रह) और ‘पत्थर और परछाइयां’ (एकांकी संग्रह) जो कम्पोज हो गया है, उसे अब छपवा देना है। उसका कवर बेहतर बनवाना है। सरोज सिंह की थिसिस जो प्रेमचन्द पर है, किताब के रूप में जल्दी लानी है। और हां-‘कथा’ के अगले अंक की तैयारियों के लिए क्या कर रहे हो आदि आदि तमाम बातें उनकी जुबान पर होती थीं। मैं उनसे यही कहता- ‘यह सब काम आपके इलाहाबाद लौटने तक हो जायेगा। आप जल्दी से पहले स्वस्थ तो हो जाइए।’ मगर उन्हें तो जल्दी थी। जैसे वे भलीभांति यह जान गये हों कि अब बहुत ज्यादा जीवन नहीं बचा है। कम से कम बच गये इस समय का वे जैसे आदतन पूरा उपयोग कर लेने के लिए बेहद उतावले दिख रहे थे।

इधर फोन पर अक्सर उनका सवाल होता- ‘दिल्ली कब आ रहे हो? जल्दी से आ जाओ। तुमसे तमाम बातें करनी हैं।’ मेरा भी मन उनके बिना इलाहाबाद में कहां लग रहा था। अपने महाविद्यालय से छुट्टी ले कर मैं 09 फरवरी को दिल्ली पहुंचा। मुझे देखते ही दादा पहले की तरह ही जैसे उत्साह से भर गये हों। यद्यपि उनकी बीमारी की स्थिति को देखते हुए हम उनसे कम से कम बातचीत करना चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी बीमारी की परवाह कहां थी। उन्हें तो तमाम बातें करनी थीं। रोज-ब-रोज मन्द पड़ती हुई आवाज भी उनके हौसले को पस्त नहीं कर पायी थी। दस दिनों का दिल्ली का मेरा समय उनके साथ कब और कैसे कट गया, इसका बिल्कुल पता ही नहीं चला। बातचीत का विषय साहित्य से शुरू होता और फिर यह क्रम राजनीति, समसामयिक घटनाओं, खेलकूद, फिल्म, थियेटर आदि तक बिन रूके चलता चला जाता। उनके पास संस्मरणों का अथाह खजाना था। कमलेश्‍वर, दुष्यन्त कुमार से जुड़े हुए…। भैरव प्रसाद गुप्त, उपेन्द्र नाथ अश्‍क, श्रीकृष्ण दास से जुड़े हुए…। माया प्रेस से जुड़े हुए…। प्रतापगढ़ से जुड़े हुए…।

उनके हार्ट अटैक के इलाज के दौरान दिल्ली के साहित्यकारों जैसे मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा, कृष्णा सोबती, राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, अशोक बाजपेयी से जुड़े हुए…। उनके गांव बराई से जुड़े हुए…। प्रतापगढ़ से जुड़े हुए…। और इन सबसे स्वयमेव ही जुड़ जाता उनका अपना इलाहाबाद। जिसके बिना वह हमेशा बेचैन रहते। जहां रहने के वह तमाम बहाने ढूंढते। और जब कभी स्वस्ति दीदी उन्हें आजमगढ़ बुलाने के लिए फोर्स करतीं, तब इलाहाबाद न छोड़ने के हजार बहाने गढ़ते हुए।

अबकी बार दिल्ली में अपना इलाज कराते हुए दादा किसी को भी यह खबर देना नहीं चाहते थे। उनके रहने-सहने का जो अन्दाज रहा है, उसमें वे अपने को दीन हीन दिखने-दिखाने से बचना चाहते थे। दिल्ली पहुंच कर मैंने जब उनकी बीमारी की बात विश्‍वनाथ त्रिपाठी, ममता कालिया, रवीन्द्र कालिया, वीर भारत तलवार, आनन्द प्रकाश, उदभ्रान्‍त, कुमुद शर्मा, संजय जोशी आदि को बतायी तो वह पहले तो मुझे झिड़की पिलाते हुए बोले ‘इसकी क्या जरूरत थी। तुम नाहक ही सबको परेशान करते रहते हो।’ फिर इन लोगों से फोन पर प्रेमपूर्वक बातें करते हुए किसी भी समय मिलने आने की बात कहते। समय-समय पर जब ये लोग आते तब एक बार फिर शुरू हो जाता इनके साथ बातों का… यादों का एक अन्तहीन सिलसिला।

संजय जोशी के मि‍त्र अनुराग दादा का इन्टरव्यू लेना चाहते थे। दादा से जब मैंने इस बात की चर्चा की तो शुरुआती ना-नुकुर के पश्‍चात वह इन्टरव्यू देने के लिए राजी हो गये। अनुराग को 21 फरवरी, रविवार का दिन इसके लिए दिया गया। रेडियोथिरेपी से दादा की आवाज मन्द पड़ने लगी थी। इसके बारे में अनुराग से निवेदन किया गया कि यदि इन्टरव्यू छोटा हो तो दादा की सेहत के लिए बेहतर होगा। लेकिन जैसा कि स्वस्ति दीदी ने बताया इन्टरव्यू का सिलसिला जब शुरू हुआ तो वह लगभग एक घण्टे तक चला। दादा का यह अन्तिम इन्टरव्यू होगा, यह बात हम भला कहां जानते थे।

इन्स्टीट्यूट में इलाज कराते हुए भी दादा ने एक कहानी का सूत्र खोज लिया था। इन्स्टीट्यूट में काम करने वाली एक खूबसूरत नर्स का नाम उन्होंने ‘सुग्गी’ कर दिया था। सुग्गी को लेकर एक से जुड़ कर एक कथानक उनके मन मस्तिष्क में तैयार हो रहे थे। इसी प्रसंग में उनके खयालों में पता नहीं कहां से साइकिल चलाते दुष्यन्त कुमार आ खड़े होते जो घर लौटती सुग्गी के रिक्‍शे से टकरा कर गिर जाने का अभिनय करते। घायल दुष्यन्त कुमार को सुग्गी उठा कर इलाज कराने ले जातीं। और फिर अपनी राह चल पड़ती यह कहानी। इस कहानी में ईरान से इलाज कराने दिल्ली आया वह गोरा चिट्टा शेख भी शामिल हो जाता जो अपने बेटे-बेटी के साथ हमें राजीव गांधी कैन्सर इन्स्ट्टीट्यूट में प्रायः दिखायी पड़ता। मन मस्तिष्क में बुनी गयी उनकी वह कहानी कागज पर उतरने के पहले ही अनाथ हो गयी।

16 मार्च, 2010 की सुबह 8 बजे फुसफुसाती आवाज में दादा का फोन आया- ‘सन्तोष, मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। अब जीने की इच्छा नहीं हो रही।’ बातचीत के दौरान ऐसा लगा जैसे बातों के इस जादूगर की आवाज के तार अब टूट रहे हैं। वह जादूगर जो हमेशा जीवन से भरा रहता। जो जब, जहां, जैसे, जिस तरह चाहता बातों को शुरू करता, नचाता। बातों को मनचाहे सूत्र से जोड़ देता और फिर एक विशि‍ष्ट अन्दाज में अंजाम तक पहुंचा देता। सुनने वाला मन्त्र मुग्ध हो उन्हें और उनकी बातों को एकटक निहारता और सुनता रहता।

मुझे याद नहीं किस सिलसिले में दूधनाथ सिंह ने यह बात कही, पर इस सन्दर्भ में मुझे हमेशा याद आती है कि अगर नामवर सिंह वाचिक परम्परा में आलोचना के शीर्ष पर हैं तो अपने गुरु मार्कण्डेय जी भी वाचिक परम्परा में कथक्कड़ी के शीर्ष पर हैं। इसमें वे बेजोड़ हैं। वाकई इस क्षेत्र में अप्रतिम प्रतिभा के धनी मार्कण्डेय जी की बातों, वृतान्तों, कथाओं, संस्मरणों को हमने बहुत करीब से देखा-सुना-जाना और महसूस किया है, यह बात तो हम फख्र के साथ कह ही सकते हैं।

दादा आज हमारे बीच नहीं हैं। हकीकत होते हुए भी इसे मानने का मन नहीं होता। और जब कभी इसे ले कर मन उदास होने को होता है तो हम इसे आश्‍वस्त करने में जुट जाते हैं कि दादा हमारे पास ही तो हैं। निराला जी की ये पंक्तियां कितनी सच हैं-

मरण को जिसने वरा है

उसी ने जीवन भरा है

दादा हमारे पास हैं- अपनी तमाम स्मृतियों, वृतान्तों, कहानियों और अपनी अन्य रचनाओं और अपने द्वारा सम्पादित कथा के तमाम अंकों में। हमारे स्मरण में है आज भी बिल्कुल जैसे का तैसा उनका जीवन। किसी ने कहा भी तो है – देखने के लिए देखने वाले नजर की जरूरत होती है। सच भी तो यही है। हम वह नजर विकसित कर उनकी बातों, विचारों और सिद्धान्तों को आगे ले जाकर उन्हें जीवित रख सकते हैं। उन्हें किसी संकीर्ण दायरे में तो बांधा ही नहीं जा सकता। उनके इस व्यापक फलक को हम और व्यापक करें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि प्रकट करने का, मेरी समझ से उपयुक्त तरीका हो सकता है।

एक आदमी जिया करता था लगातार

(मार्कण्डेय दादा के लिए)

उनके बारे में तमाम बातें

जानने का दावा कर सकता हूं

बावजूद इसके

एहतियातन यह भी कहा जा सकता है

कि बहुत कुछ नहीं भी जान पाया

उनके बारे में

उनके अन्दरूनी ज़ख्मों के बारे में तो कत्तई नहीं

जिनका टपकना

तमाम कोशिशों के बाद भी

नहीं उतर पाता था

उनके चेहरे पर

जानते हुए भी नहीं जान पाये

जैसे अपने को ही जीते हुए

नहीं जान समझ पाते हम

खुद अपने ही जीवन की पहेली

जीवन भर

जैसे आंखें खुली होने के बावजूद

टंग जाता है इन पर एक ऐसा पर्दा

जिससे हो कर देखते हुए भी

नजर नहीं आता हमें कुछ भी

फिर भी

एक आदमी के तौर पर मैं उनको

बखूबी जानता-पहचानता था

रिश्‍तों के तार को

अपनी  धुन के मुताबिक छेड़ते हुए

गढ लेते थे वे

बातों-बातों में ही

कोई न कोई बात

उनको फुहारों के रूप में

कई बार महसूस किया था मैंने

तपती हुई धूप में जब

धरती का कलेजा

जगह-जगह से फटने लगता था

और किसानों की आंख में

उग आती थी

दिन में ही जोन्ही

उमड़-घुमड़ कर घिर आते थे वे आदतन

आसमान में घटा बन कर

फिर बरसने लगते थे

धरती पर इस कदर

छहर-छहर

कि भीग जाती थी समूची मिट्टी

तब हरियाली झूलने लगती थी

धरती की डाल पर

डाल कर झूला

बेखौफ हो कर

वृक्ष रूप में पाया

जब-जब उनको देखा मैंने

जब कभी आते लोग थके-मांदे

अपनी छांव तले बैठा कर

हांकने लगते वे फौरन

अपनी पत्तियों का बेना

वे खिल उठते अपने फूलों में

किसी के दुख को कम करने खातिर तत्काल ही

और भूखों के आगे तो

अपनी ही पत्तियों के दोने में परोस देते

अपनी ही डाल के पके फल

बिना किसी हिचक के

उनसे बतियाना

हमेशा एक पेड़ से बतियाना था

उसकी हरियाली

और उसकी जड़ों से बतियाना था

दिल खोल कर पूरी-पूरी

देश दुनिया की

सच्ची-मुच्ची बातें

जिसे अक्सर दोहराता था मैं

उनसे बातें करते-करते

सूरज बन कर

दुनिया का अन्धेरा दूर करते

मैंने उन्हें अपनी आंखों देखा था

खुद में वे जलते रहते थे प्रतिपल

जैसे हजारों हाइडोजन बम

फूट पड़े हों एक साथ

और धधक उठा हो

उनका अपना धरातल

लेकिन दूर सुदूर कहीं

फैलने लगा हो उजास

और आसमान की लहरों पर

फिसलता हुआ चांद पड़ने लगा हो शीतल

अपनी करामाती किरनों से

वे जब चाहते रच देते इन्द्रधनुष

तमाम रंगों को समोते हुए

खुद उन तमाम रंगों से होते हुए

आसमान में बिखरे हुए बादल भी

तब उनके किरनों की उजास से

भर-भर आते

टहाटह लाल हो जाते

एक अनोखे अन्दाज में

कथा रूप में तो वाकई बेजोड़ थे वे

कई-कई प्रसंग एक साथ जुड़ते थे उनसे

कई-कई युगों

कई-कई धाराओं को

अपने साथ समाहित करते

कुछ-कुछ सच्चे

तो कुछ झूठे-मुट्ठे लगने वाले अन्दाज में

हकीकत को हू-ब-हू बयां करते

इस कथा में ही कहीं

अपनी चोट से व्यथित नजर आते

दिख जाते वे

और जब कभी कहीं हम

डूबते दिखायी पड़ते

निराशा के भंवर में

भांप जाते वे तुरन्त

आ जाते अपनी पतवार संभालते

हमको हमारी राह दिखलाते

तमाम-तमाम बातें बतलाते

इतना ही जाना मैंने उनको जितना देखा

लेकिन इतना भी नहीं जाना

कि ढाल दूं उन्हें ही

एक कहानी के दायरे में तुरत फुरत

हमारे लिए तो यह भी मुश्‍किल है कि

उन्हें कविता के बीच ला कर रख दूं

जैसे का तैसा

और रही जहां तक नाटक की बात

तो इतना समझ लीजिए

कि कई नाटकों में कई मौकों पर

उनकी आंखें कई-कई बार

नम होते पाया था मैंने

और इसे कहीं से भी

नाटक कहना मुनासिब नहीं

वे तो एक आदमी थे

आदमियत से पूरी तरह से भीगे हुए

जीवन की आपाधापी में

जीवन को बचाते बसाते हुए

आदमी की शक्ल में

एक ठेठ आदमी

अपने घर-बार में मशगूल रहते हुए भी

दूसरों की चिन्ता में

लगातार घुलता हुआ एक आदमी

वे तो एक कहानी थे

दूसरों के जीवन को

अपनी फिक्र में गढ़ते हुए

वे तो बस एक घबराहट थे

प्रतिरोध की आहट

लगातार कम होते जाने से

बेहिसाब घबराये हुए

वे तो एक नदी थे

लगातार…  लगातार…

बहते हुए

अपने पानी से

एक कविता रचते हुए

दोनों किनारों की दूरी को

हर पल पाटते हुए

सच-सच कहूं

तो बस इतना ही जानता हूं मैं उनको

इससे कम या इससे ज्यादा

कुछ भी नहीं

कि लगातार कठोर होते जा रहे समय में

बहुत नरम थे वे

कि लगातार ठण्डे पड़ते जा रहे जमाने में

आंच जैसे गरम थे वे

कि हताशाओं के दौर में

एक गहरी आस से थे वे

कि विश्‍वासघातों के दौर में

एक पक्के विश्‍वास थे वे

बार-बार महसूस किया मैंने

कि एक आदमी

जिया करता था उनके अन्दर

ठीक अपनी ही शर्तों पर

लेकिन अपनी लचक से भरा हुआ भरपूर

विद्रूपताओं और कट्टरताओं के इस दौर में भी

एक आदमी जिया करता था

उनके अन्दर

निरन्तर

अपने धर्म और अपनी जाति के अहम को

लगातार दरकिनार करते हुए

अपने साथ-साथ

हमें भी लगातार

कुछ और अधिक

आदमी बनाते हुए

08.08.2010