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आदर्शवाद का ओवरडोज : संजीव ठाकुर

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित परशुराम शुक्ल की यह किताब एक शिक्षक दीनदयाल के आदर्श जीवन और उसके कर्म को दिखलाने का काम करती है। अपनी मेहनत और लगन से आई.ए.एस. बनने वाले दीनदयाल अपने सहयोगियों, अधिकारियों और नेताओें के भ्रष्टाचार से तंग आकर नौकरी छोड़ देते हैं और गाँव में जाकर मास्टरी करने लगते हैं। मास्टरी करते हुए ही वह जाति-पाति के खिलाफ काम करते हैं, गाँव को नशा-मुक्त करवाते हैं, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारते है, किसी साहूकार को ईमानदार बनाते है, प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम चलाते है। आगे चलकर वह आदिवासियों के बीच काम करते हैं और उनकी संगीत-मंडली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं। अपने कामों के कारण वह राष्ट्रपति से सम्मान पाते हैं तो आदिवासियों की संस्कृति पर किताब लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाते हैं यानी हर तरह की सफलता वह पाते हैं। सवाल उठता है कि एक साथ इतने-इतने काम करने वाले मास्टर दीनदयाल क्या असली पात्र हो सकते हैं? बच्चों को पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई इस किताब को नकलीपन बच्चों से भले ही छुपा रह जाए, लेकिन क्या वे इससे जुड़ाव महसूस कर पाएँगे? इससे प्रेरणा ग्रहण कर पाएँगे? क्या आदर्शवाद के इस ओवरडोज को वे पचा पाएँगे? सच्चाई तो यह है कि बच्चे वैसे ही पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं, जो उनके आस-पास के हों? उनके जैसे हों!

इस किताब के जरिए परशुराम शुक्ल ने ‘बाल धारावाहिक’नाम की एक ‘नई’ विधा को स्थापित करने का प्रयास किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया है। ‘बाल धारावाहिक’ को परिभाषित करते हुए भूमिका में उन्होंने लिखा है- ‘बाल धारावाहिक को एक विशिष्ट संरचना वाली ऐसी कहानी शृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी प्रत्येक कहानी अपने पीछे की कहानियों और आगे की कहानियों से स्वतंत्र होती है और संबद्ध भी!’ उनकी इसी परिभाषा के आधार पर इस किताब की परीक्षा करें तो हम पाएँगे कि इस ‘धारावाहिक’के कुछ अध्याय अन्य अध्यायों से सर्वथा स्वतंत्र हो गए हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ और ‘पश्चाताप के आँसू’ ऐसे ही दो अध्याय हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ तो एक लोककथा को परिवर्तित कर इस धारावाहिक में घुसा दिया गया है। इसको पढ़कर पाठक अचरज में पड़ सकते है कि किसी ठाकुर के सेवकों के द्वारा धकेलकर बाहर कर दिए गए दीनदयाल क्या वही दीनदयाल हैं, जो इतने बड़े-बड़े काम करते हैं? इसी तरह ‘पश्चाताप के आँसू’में बेचारे मास्टर दीनदयाल को जिस तरह आध्यात्मिक विषयों का प्रवचनकर्ता बना दिया गया है और किसी दूसरे कथावाचक की दुष्टता का शिकार दिखा दिया गया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल भी लगता है। और कोई गलत नहीं कि ऐसी अनर्गल बातें इस किताब में एक नहीं अनेक हैं।

इस किताब को पढ़कर जो सवाल सबसे अधिक मुखरता से सिर उठाता है वह यह कि क्या साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के पास अच्छी और बुरी चीज को परखने को कोई पैमाना नहीं है? इस स्तरहीन किताब को छपवाकर साहित्य अकादेमी हिन्दी के व्यापक पाठक-वर्ग को आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

पुस्तक: मास्टर दीनदयाल, परशुराम शुक्ल

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 60  रुपये

संजीव ठाकुर की बाल कवि‍ताएं

sanjeev-thakur

संजीव ठाकुर

ताल

पंखा चलता हन-हन–हन
हवा निकलती सन-सन–सन।

टिक-टिक–टिक–टिक चले घड़ी
ठक-ठक–ठक–ठक करे छड़ी।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप
आँधी आती हिप–हिप –हिप।

फू–फू–फू फुफकारे नाग
धू–धू–धू जल जाए आग।

कोयल बोले कुहू-कुहू
पपीहा बोले पिऊ-पिऊ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल
लहर–लहर लहराए बाल ।san

मुश्किल हो गई

पापा जी की टांग टूट गई
अब तो भाई मुश्किल हो गई!
कौन मुझे नहलाएगा ?
विद्यालय पहुंचाएगा ?
सुबह की सैर कराएगा ?
रातों को टहलाएगा ?
चिप्स –कुरकुरे लाएगा ?
कोल्ड –ड्रिंक पिलवाएगा ?
आइसक्रीम खिलाएगा ?
मार्केट ले जाएगा ?

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी
एक छीन ली पापा से
एक झटक ली मामा से
मम्मी ने अपने हिस्से की
दे दी उसको एक पकौड़ी !

फिर आई उसकी थाली
जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी
प्याज और आलू वाली
उसने न दी एक किसी को
खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

कौआ काका

कौआ काका क्या कहते हो
आएँगी मेरी नानी ?
सोच मिठाई की बातें
मुँह में भर आया पानी ।

न जाने क्या–क्या लेकर
आएँगी मेरी नानी
मैं तो तुमको एक न दूँगा
मुझे नहीं बनना दानी !

लेकिन काले कौए काका
अगर नहीं आईं नानी
कौन मुझे दिलवाएगा
प्यारी सी गुड़िया रानी

इस जाड़े को …

इस जाड़े को दूर भगाओ
सूरज भैया जल्दी आओ !

जाड़े में देखो तो कोयल
भूल गई गाना
चिड़ियों के बच्चों ने मुँह में
न डाला दाना !सूरज भैया आओ
थोड़ी गर्मी ले आओ
और हमारे साथ बैठकर
पिज्जा–बर्गर खाओ !साथ रहोगे तो जाड़े की
दाल रहेगी कच्ची
दादी का तो हाल बुरा है
हो जाएगी अच्छी !

गर्मी आ जाए तो चाहे
आसमान में जाना
जाड़े के मौसम में लेकिन
वापस आ जाना

बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र

मिट्ठू : संजीव ठाकुर

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स्कूल से आकर, खाना खाकर रोज की तरह श्रुति बालकनी में खड़ी हो गई थी। उसकी मम्मी किचन में काम कर रही थीं। तभी कहीं से आकर एक तोता रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति उसे देख बहुत खुश हुई। उसने उसे पकडऩा चाहा, मगर वह उड़ गया और दो मिनट बाद फिर आकर रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति ने समझा, ‘जरूर इसे भूख लगी है।‘ वह किचन के अंदर गई और फ्रिज से ब्रेड का टुकड़ा निकालकर ले आई। मम्मी पूछती रह गईं कि ‘क्या ले जा रही हो?’ लेकिन उसने नहीं बताया। मम्मी उसका पीछा करते-करते बालकनी तक आ गईं। मम्मी के आते ही तोता उड़कर चला गया।

श्रुति नाराज हो गई, ”आप क्यों आ गईं? मेरा तोता उड़कर चला गया। मैं उसके लिए ब्रेड लाई थी।’’

”बेटा! तोतों को ब्रेड ज्यादा पसंद नहीं है। उन्हें तो भिगोए चने पसंद हैं और हरी मिर्चें पसंद हैं।’’ मम्मी ने समझाना चाहा।

”तो ठीक है, मैं हरी मिर्च ही ले आती हूँ।’’ श्रुति ने कहा और फ्रिज खोलकर हरी मिर्च ले आई। लेकिन तोता दुबारा नहीं आया। निराश होकर श्रुति सो गई।

अगले दिन फिर जब श्रुति स्कूल से आकर, खाना खाकर बालकनी में खड़ी थी, तोता फिर आ पहुँचा। श्रुति खुश हो गई। बोली, ”आओ, तोता, आओ! मैं तुम्हारे लिए मिर्च लाती हूँ।’’

वह मिर्च ले आई। तोता उसे खाने लगा। श्रुति को देखकर बहुत मजा आ रहा था। वह सोच रही थी, ”अब इसे मिर्च लगेगी और यह ‘आह! आह!’ करने लगेगा।‘’ लेकिन पूरी मिर्च खाने के बाद भी तोता निश्चिंत बैठा रहा।

श्रुति मम्मी को यह बात बताना चाहती थी इसलिए वह अंदर गई। तोते के मिर्च खाने की बात बताई और कहा, ”मम्मी! कल थोड़े चने भिगो देना? मैं तोते को दूँगी!’’

”ठीक है।’’ कहकर मम्मी उसे सोने को ले गई। सोते समय वह तोते की ही बात करना चाहती थी। उसे लग रहा था कि तोते का भी कोई नाम होना चाहिए। पता नहीं उसके मम्मी-पापा ने उसका क्या नाम रखा होगा? उसने अपनी मम्मी से यह बात पूछी। मम्मी ने बताया, ”इसका नाम मिट्ठू है।’’

”अच्छा! बड़ा प्यारा नाम है! आपको कैसे पता चला?’’ श्रुति ने कहा।

”बेटे! सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही हुआ करते हैं।… अब सो जाओ।’’

श्रुति की समझ में नहीं आया कि सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही क्यों होते हैं? लेकिन उसे यह नाम पसंद आया था।

अब वह रोज मिट्ठू की प्रतीक्षा करती। उसके लिए चना-मिर्च एक कटोरे में लेकर बाहर खड़ी रहती। एक दूसरे कटोरे में पानी भी रख लेती। मिट्ठू रोज आता। उछलता, कूदता। मिर्च खाता, पानी पीता और फुर्र हो जाता। अब वह श्रुति के कंधे पर भी चढ़कर बैठ जाता, कभी उसकी हथेली पर भी। लेकिन जैसे ही वह उसे पकडऩा चाहती, वह उड़ जाता।

मम्मी श्रुति के रोज-रोज के इस खेल से ऊबतीं। उसे जल्दी सोने को कहतीं। श्रुति को सोना अच्छा नहीं लगता—मिट्ठू के साथ खेलना अच्छा लगता था। उसने एक उपाय निकाल लिया। मम्मी के साथ वह बिस्तर पर चली जाती और आँखें मूँदकर सोने का नाटक करती। जब उसकी मम्मी सो जातीं तो उठकर बालकनी में चली जाती, और मिट्ठू के साथ खेलती।

एक दिन इसी तरह मम्मी को सुलाकर जब वह बालकनी में गई तो मिट्ठू नहीं आया। वह सोने चली गई। अगले दिन भी वह नहीं आया। उसके अगले दिन भी नहीं। कई दिनों तक वह नहीं आया तो श्रुति परेशान हो गई।

एक दिन मम्मी की डाँट की परवाह न कर उसने पूछ ही लिया, ”मम्मी! अब मिट्ठू क्यों नहीं आता?’’

”तुम्हें कैसे पता कि नहीं आता है? तुम तो सो जाती हो? वह आता होगा।’’

”नहीं मम्मा! मैं तो रोज मिट्ठू से मिलती थी। तुम्हारे सोने के बाद वह आता था।’’

”तो ठीक ही है, नहीं आता है। अब कम-से-कम तुम ठीक से सोओगी तो?’’

”मगर मम्मी, वह आता क्यों नहीं?’’

”क्या पता बेटे?….हो सकता है किसी बहेलिये ने उसे पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया हो? बाजार में बेच दिया हो?’’

”ये बहेलिया क्या होता है, मम्मा?’’

”बेटे! बहेलिया पक्षियों को पकडऩे वाला होता है।’’

”वो तो बहुत खराब आदमी होता है मम्मा!’’

आज सोते समय श्रुति सोच रही थी कि कहीं से उसके पास सचमुच की कोई बंदूक आ जाती तो वह बहेलियों को उसी तरह गोली मार देती, जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है!….पता नहीं उसका मिट्ठू कहाँ चला गया?

बाल मंदिर के पुजारी गिजुभाई : संजीव ठाकुर

15.11.1885-23.06.1939

15.11.1885-23.06.1939

बच्चों के लालन-पालन, विकास और शिक्षा की चिंता करने वाले लोग पूरी दुनिया में हुए हैं। प्रायः सभी ने शिक्षा आदि के प्रचलित तरीकों का विरोध किया है और बच्चों की आजादी की वकालत की है। अपने देश में जिन लोगों ने इस दिशा में चिंतन-मनन किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, अरविन्द घोष, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जाकिर हुसैन, डॉ. अम्बेडकर आदि का नाम ससम्मान लिया जाता है। इस क्षेत्र के नामों में से एक नाम जो इनसे कम महत्त्व का नहीं है, अक्सर लोगों की जुबाँ पर आने से रह जाता है। अक्सर भुला दिया जाने वाला वह नाम है, गुजरात के शिक्षा शास्त्री गिजुभाई का। सच्चाई तो यह है कि काफी अरसे तक लोगों को इस नाम का पता ही नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने और गुजराती में दो सौ से अधिक पुस्तकें लिखने के बावजूद गिजुभाई को गुजरात से बाहर जानने वाले कम ही लोग थे। यह तथ्य तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगता है, जब हमें यह जानने को मिलता है कि गिजुभाई की महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक ‘दिवास्वप्न’ का हिन्दी अनुवाद 1932 में ही हो चुका था।

गिजुभाई के काम को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली दबा सकता है। एक अकेला शख्स! न कोई सरकारी सहायता। न कोई अनुदान! बस अपनी लगन और बच्चों के प्रति लगाव के बल पर वह काम कर डाला, जो किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए भी संभव नहीं है। बच्चों के बीच काम करने के साथ-साथ लेखन के लिए समय निकालना और किसी लेखक से अधिक लिख जाना, इसके अलावा माता-पिता और शिक्षकों के लिए पत्रिका निकालना गिजुभाई जैसे समर्पित और परिश्रमी व्यक्ति के लिए ही संभव था। शुरू में गिजुभाई ने भी कहाँ सोचा था कि उन्हें शिक्षा की दिशा में जाना है? उन्होंने तो वकालत की पढ़ाई की थी और वकालत का पेशा अपनाया था। लेकिन उनकी दिशा बदल गई। उनकी दिशा बदलने का काम किया एक पुस्तक ने जो उन्हें एक मित्र ने पढ़ने को दी थी। ‘मोंटेसरी मदर’  नाम की इस पुस्तक के बारे में स्वयं गिजुभाई ने लिखा है- ‘अगर मुझको किसी ने पहले ही सावधान कर दिया होता कि ‘मोंटेसरी मदर’ नामक पुस्तक पढने से मेरी जीवन-धारा ही बदल जाएगी, जीवन एक नए प्रकाश से जगमगा उठेगा और मुझको एक नई क्रांतिकारी दृष्टि प्राप्त हो जाएगी, तो मेरे जैसा एक वकील इस पुस्तक को अपने हाथ में थामता या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।’ (‘बाल शिक्षण: जैसा मैं समझ पाया’, पृ. 17)

और गिजुभाई केस की वकालत छोड़ बच्चों की वकालत करने लगे, बच्चों के बहुत बड़े वकील बन गए! उन्होंने न केवल बच्चों की आजादी की वकालत की, बल्कि बच्चों को सिखाने-पढ़ाने की परंपरागत पद्धतियों पर भी प्रहार किया और शिक्षा का एक ऐसा मॉडल विकसित कर समाज के सामने रखा कि जिसे अपनाकर समाज बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण तो उपलब्ध करा ही सकता है, प्रताडना और मानसिक दबाव से निजात भी दिला सकता है।

गिजुभाई बच्चों से प्रेम करते थे। वे चाहते थे कि माता-पिता और शिक्षक भी सही मायनों में बच्चों से प्रेम करें। माता-पिता और शिक्षक बालकों के लिए भयहीन माहौल बनाएँ। बिना डाँट-डपट के, बिना मार-पिटाई के उनकी परवरिश करें। उन्हें शिक्षित करें। घर और विद्यालयों को बालकों के सृजनात्मक विकास में बाधक जानकर गिजुभाई बहुत चिंतित होते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘घर और विद्यालय ऐसे स्थल हैं, जहाँ बालकों की सृजनशीलता का सहज स्वाभाविक रीति से विकास होता है और यही वे स्थल हैं, जहाँ उनके सृजन को रोकने, विकृत करने अथवा निर्मूल करने का काम होता है।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, पृ.18)

बच्चों के विकास में सबसे बड़ा बाधक गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट, दंड वगैरह है। गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट या दंड देकर किसी बच्चे को पढ़ाया-लिखाया नहीं जा सकता। ‘अगर ऐसा करने से बालकों की बुद्धि बढ़ सकती हो तो किसी भी बेवकूफ को मारपीट कर बुद्धिमान बना सकते हैं।’ (प्राथमिक शाला में शिक्षक, पृ. 55)

गिजुभाई तो बच्चों को स्वतंत्र वातावरण में रखना और शिक्षित करना चाहते थे। दंड, पुरस्कार, लोभ, लालच से दूर रखकर सच्ची स्वतंत्रता देना चाहते थे। निश्चय ही गिजुभाई के इस स्वतंत्रता-सिद्धांत से स्वतंत्र नागरिक को तैयार किया जा सकता है। लेकिन इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक ले जाने के पक्ष में गिजुभाई नहीं थे। वे यह तो चाहते थे कि बच्चे अपने शरीर से, मन से, आत्मा से स्वतंत्र हों, लेकिन समाज के नियम-कायदे को तोड़कर, सामाजिक परिवेश की उपेक्षा कर गाली-गलौच, मार-पीट करने जैसी आजादी हासिल करना चाहें तो उन्हें ऐसी आजादी न देने के पक्ष में भी गिजुभाई थे। हाँ, बच्चों को स्वनिर्णय लेने और स्वावलंबन की ओर बढ़ाने में गिजुभाई हमेशा आगे रहते थे। उनका तो यह मानना था कि जो बच्चे बड़ों से हर काम पूछकर करते हैं, उन्हें दरअसल रोकने की जरूरत है।

बच्चों को स्वावलंबी बनाने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए गिजुभाई ने यह जरूरी समझा था कि बच्चे छोटे-मोटे काम खुद करें। नहाना, खाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कंघी करना, ऐसे ही काम थे। अपनी शाला में तो गिजुभाई बच्चों से ये काम करवाते ही थे, माता-पिता को भी प्रेरित करते थे कि वे उन्हें ऐसे काम करने से न रोकें।

गिजुभाई बच्चों को पल-पल पिलाए जाते उपदेशों से भी बहुत आहत होते थे। उनका मानना था कि ऐसे उपदेशों से बच्चों का विकास कतई नहीं होता।

गिजुभाई का चिंतन और लेखन बहुआयामी था। एक ओर उन्होंने माँ-बाप को बच्चों के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किताबें लिखीं तो दूसरी ओर शिक्षकों को ‘शिक्षित’ करने के लिए। बच्चों को भाषा-व्याकरण कैसे सिखाएँ? गणित को आसान तरीके से कैसे बतलाएँ? बच्चों को कथा-कहानी क्यों कहें? शिक्षा में चित्रकला, संगीत, कारीगरी को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दें? इन सब पर गिजुभाई ने विस्तार से अपनी कलम चलाई है। इन सब के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियाँ भी लिखी हैं। इन कहानियों के जरिये उन्होंने बच्चों को अलग-अलग तरह की बातें सिखाने का काम किया ही था, कक्षा में बच्चों का मन लगाने का काम भी किया था। खेल-कूद, संगीत, घुमक्कड़ी आदि को अपने विद्यालय में शामिल कर गिजुभाई ने एक ऐसा स्नेहिल वातावरण तैयार किया था कि बच्चे अपने घर ही नहीं जाना चाहते थे। क्या आज ऐसे किसी स्कूल की कल्पना की जा सकती है, जहाँ से बच्चे घर ही नहीं जाना चाहें? ऐसा तो तभी संभव हो सकता है न, जब बच्चों को रोका-टोका न जाए, जबरन ‘ज्ञानी’ न बनाया जाए, उनको अपने मन का काम करने की छूट दी जाए, पढ़ाने की पद्धति अनौपचारिक हो, शिक्षक हाथ में बेंत लेकर चलने के बदले प्यार की छड़ी से काम लें?

अपनी पुस्तक ‘प्राथमिक शाला में शिक्षक’ में गिजुभाई ने विस्तार से लिखा है कि उनके विद्यालय में क्या होना जरूरी है और क्या होना जरूरी नहीं है? इसे पढ़कर पता चलता है कि गिजुभाई कितने मुक्त विद्यालय की चाह रखते थे?

गिजुभाई ने बच्चों का सम्मान किया था, उन्हें प्रेम किया था। इसीलिए उनका ‘बाल मंदिर’ वास्तव में बच्चों की पूजा का स्थान बन सका था और वे शिक्षक न रहकर बच्चों के लिए ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके थे। शिक्षाविद् मधुरी देसाई ने गिजुभाई के व्यक्तित्व के उस पहलू पर गौर करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘गिजुभाई ने माँ जैसी सूक्ष्म दृष्टि और ममता भरी नजरों से बालकों को देखा था और उनके व्यक्तित्व को सजगतापूर्वक विकसित करने का प्रयत्न किया था। सघन मूँछों वाला प्रभावशाली स्वरूप होते हुए भी गिजुभाई बालकों के समीप आ सके और उनका विश्वास पा सके, तभी वे ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके।’ (प्राथमिक शाला में चिट्ठी वाचन, भूमिका)

परंपरागत विद्यालयों में गिजुभाई को बहुत सी बुराइयाँ नजर आती थीं। सजा देना तो एक बुराई थी ही, बालकों को गलत ढंग से पढ़ाना, रटाना, पुरस्कार या लालच देकर कोई काम कराना भी उनकी दृष्टि में बड़ी बुराई थी। इसी तरह गृहकार्य का बोझ देने वाले स्कूल भी उन्हें तनिक न सुहाते थे। गृहकार्य में लगे बच्चों को देखकर गिजुभाई काँप-काँप जाते थे। गृहकार्य बच्चों के लिए उन्हें एक ‘त्रास’ नजर आता था। इतने घंटे पाठशाला में बिताकर आने के बाद गृहकार्य से जूझते बच्चों को देखकर उन्हें दुख होता था। गृहकार्य को वे बच्चों के लिए नुकसानदेह ही मानते थे।

गिजुभाई को बालकों के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ थी। वे शिक्षकों से भी बाल-मनोविज्ञान की समझ की अपेक्षा रखते थे। वे चाहते थे कि शिक्षक हर बात पर बच्चों को रोकें-टोकें नहीं। न ही बच्चों को ‘बेहूदा, आलसी, लापरवाह, ठग, निकम्मा’ आदि कहें। बच्चों पर इन शब्दों से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षक बच्चों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें।

शिक्षा के एक अनिवार्य अंग- परीक्षा को गिजुभाई गैर जरूरी समझते थे। विद्यालयों में ली जाने वाली परीक्षाओं को वे एक ओर मिथ्याभिमान और दूसरी ओर निराशा का जनक मानते थे। परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों में अभिमान का भाव और बुरे अंक लाने वालों में निराशा का भाव देखकर उन्हें निराशा होती थी। विद्यालयों के साथ-साथ घरों में भी तरह-तरह की परीक्षाओं से गुजरते बच्चों को देखकर गिजुभाई को अच्छा नहीं लगता था। दूसरों के हिसाब से ही अपनी जिंदगी जीने का आदी होता आदमी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने लिखा है- ‘परीक्षा शाला में ही नहीं चलती, हमारे घरों में भी तरह-तरह की स्पष्ट-अस्पष्ट परीक्षाएँ चलती हैं। यही कारण है कि आज का मनुष्य अपने भीतर का नहीं रहा, बाहर का बन गया। स्वयं अपने लिए जीने की बजाय बाहर के लिए जीता है। …बाह्य पैमाने पर स्वयं को मापता है और इसी में संतोष एवं सार्थकता का अनुभव करता है। संक्षेप में, वह अपने भीतर से मरकर यानी अपनी आत्मा से मरकर बाहर से यानी शरीर से जीता है।’ (शिक्षक हों तो, पृ. 117)

जाहिर है, मरी हुई आत्मा का मनुष्य मरी हुई जिंदगी ही जिएगा,  मरे हुए समाज का निर्माण ही करेगा। हताशा, कुंठा, अवसाद जैसी मानसिक व्याधियाँ उसे चारों ओर से जकड़ लेंगी।

गिजुभाई बुद्धि की जगह हृदय को महत्त्व देते थे। वे चाहते थे कि बच्चों की बुद्धि से पहले उनके हृदय का विकास हो। ‘क्योंकि अगर मनुष्य का हृदय विकसित हो गया तो उसकी बुद्धि उसे सन्मार्ग पर ले जाएगी।’ इसके लिए वे शिक्षा में संगीत, कला, नाटक, कारीगरी आदि को शामिल करना जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि ‘संगीत व चित्रकला का ज्ञान प्राप्त करने वाला बालक स्पर्धा, द्वेष, क्लेष-तकरार या मारपीट नहीं करेंगे, अपितु वे सौंदर्य के सात्त्विक उपासक बनेंगे। सौंदर्य की सात्त्विक उपासना ने दुनिया में कभी किसी का अहित नहीं किया।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, प्रस्तावना)

गिजुभाई के चिंतन पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को जानने-समझने के बाद हमें यह लगता है कि गिजुभाई ने विदेश के कई शिक्षाशास्त्रियों के साहित्य का अध्ययन-विश्लेषण किया था। और मधुमक्खी की तरह अनेक जगहों से मधु का संचयन कर अपने जीवन में उतारा था। मारिया मोंटेसरी तो उनकी आदर्श ही थीं। इनके अलावा ए.एस. नील, पेस्तालॉजी और प्रोबले के विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया था। लेकिन उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों का अंधानुकरण नहीं किया था। उन्होंने स्वविवेक, स्वानुभव और स्वप्रयोग से भी बहुत कुछ अर्जित किया था। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को भारतीय परिवेश के हिसाब से ही धारण किया था।

गिजुभाई गुजरात के भावनगर में उस समय अपने शिक्षा-संबंधी प्रयोग कर रहे थे, जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। गिजुभाई का काम प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप में ही इस लड़ाई में योगदान तो दे ही रहा था। आजाद बच्चों को तैयार कर प्रकारांतर से वे आजाद देश और आजाद दुनिया ही तो तैयार कर रहे थे। और फिर समय-समय पर वे सीधी तरह आजादी की लड़ाई में शरीक भी तो होते थे। 1930 ईस्वी में बारडोली-सत्याग्रह में शामिल किसानों के बीच वे अपने बच्चों के साथ गए थे। किसानों के छोटे-छोटे बच्चों को एकत्र कर वे उन्हें नहलाते-धुलाते थे, खेलाते थे, गीत-कहानी सुनाते थे, लिखना-पढ़ना सिखाते थे। क्या यह आजादी के आंदोलन में उनका योगदान नहीं था? उन्होंने बच्चों की वानरी सेना बनाकर गाँव-गाँव जाने, प्रभातफेरी निकालने, शराब के ठेकों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग करने का काम भी खूब किया था। तभी तो उनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने लिखा था- ‘गिजुभाई के बारे में कुछ लिखने वाला मैं कौन हूँ? उनके कार्यों ने तो मुझे सदैव मुग्ध किया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनका कार्य आगे बढ़ चलेगा।’ (‘विश्व के शिक्षाशास्त्री’, पृ. 321)

शिक्षा और बच्चों के समुचित विकास की दिशा में गिजुभाई का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। गिजुभाई के विचारों को शिक्षकों तक पहुँचाने हेतु इन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनकी ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक तो सभी शिक्षकों और माता-पिता को निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए। गिजुभाई जैसे शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को अपनाकर शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व के महान् शिक्षाशास्त्रियों की पंक्ति में ससम्मान रखे जाने योग्य गिजुभाई को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जन्म 15 नवंबर 1885 को भावनगर रियासत के चित्तल गाँव में हुआ था और मृत्यु बम्बई में 23 जून 1939 को। उनका पूरा नाम गिरजाशंकर बधेका था। पिता भगवान जी बधेका वकील थे। 12 वर्ष की उम्र में गिजुभाई का विवाह हरिबेन के साथ हो गया था। दुर्भाग्यवश हरिबेन की मृत्यु हो गई। हरिबेन की मृत्यु के बाद 1906 में जड़ीबेन के साथ उनका द्वितीय विवाह हुआ। 1907 में वे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा पर गए थे और 1909 में भारत लौट आए थे। 1910 में बंबई में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की थी और 1913 में हाई कोर्ट में प्लीडर हो गए थे। 1915 में वे शैक्षणिक संस्था ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ के कानूनी सलाहकार बने थे। 1916 से वे दक्षिणामूर्ति में अध्यापन का कार्य करने लगे थे। 1920 में उन्होंने ढाई से पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भावनगर की तख्तेश्वर टेकरी पर ‘बाल मंदिर’ की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन कस्तूरबा गाँधी ने किया था। इस ‘बाल मंदिर’ में बच्चों को वास्तव में मंदिर के देवता की तरह रखा जाता था। 1936 में गिजुभाई ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ से मुक्त हो गए थे। इसी वर्ष कराची में आयोजित बाल मेले में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिरकत की थी। 1938 में राजकोट में उन्होंने एक ‘अध्यापन मंदिर’ की स्थापना की थी। यह उनका अंतिम महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

गिजुभाई ने गुजराती में करीब 225 पुस्तकें लिखी हैं। ‘दिवास्वप्न’, ‘माता-पिता से’, ‘शिक्षक हों तो’, ‘मोंटेसरी पद्धति’, ‘प्राथमिक शाला में शिक्षा-पद्धतियाँ,’ ‘प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा’, ‘चलते-फिरते’ आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘चोर मचाए शोर’, ‘चूहा सात मूँछों वाला’, ‘मुनिया रानी’, ‘नकल बिन अकल’, ‘खड़बड़-खड़बड़’, ‘मेंढक और गिलहरी’, आदि गिजुभाई की पुस्तकें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध हैं। इन कथाओं के जरिये उन्होंने बच्चों को ही नहीं, माता-पिता और शिक्षकों को भी शिक्षित करने का काम किया है।

गिजुभाई की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी बच्चों के माता-पिता और शिक्षक ‘शिक्षित’ हो पाए हैं या नहीं, यह सवाल आज भी उतना ही मौजूँ है। और शायद इसीलिए गिजुभाई की ये पंक्तियाँ भी आज उतनी ही मौजूँ हैं-

‘जब तक बालक घरों में मार खाते हैं
और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय,
बाग-बगीचे और क्रीड़ांगण न बनें
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?’

शहरयार से एक मुकम्मल मुलाक़ात : संजीव ठाकुर

Shahryar

ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरस्कृत उर्दू शायर शहरयार की प्रसिद्धि उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से पहले से ही रही है । उनकी शायरी उर्दू से बाहर– विशेष रूप से हिन्दी के पाठकों के बीच अरसे से पढ़ी–सुनी जा रही है । हालांकि एक सच और है कि शहरयार की प्रसिद्धि में चार चाँद लगाने का काम उनकी उन ग़ज़लों ने किया है जो उन्होंने  फिल्मों– खासकर ‘उमराव जान’ के लिए लिखीं थीं । फिल्म का असर समाज पर ज्यादा व्यापक पड़ता है इसलिए शहरयार का नाम भी ज्यादा लोगों की जुबान पर चढ़ा । लेकिन  शहरयार नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में बने । उन्हें ‘उमराव जान’ के गीतकार के रूप में स्वयं का परिचय देने में परेशानी भी होती थी । प्रेम कुमार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है– “पहले इस इंटरोडकशन पर कि मैंने उमराव जान के लिए गाने लिखे हैं, मुझे उलझन होती थी। लेकिन अब मैंने इस उलझन पर काबू पा लिया है। कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि मैं अपनी अदबी अहमियत की वजह से फिल्म में गया था- और अब अदब में फिल्म की वजह से वापस आ रहा हूँ।“ (पृ.69)

शहरयार साहब ने ऐसी अनगिनत बातें की हैं प्रेम कुमार को दिए साक्षात्कारों में! प्रेम कुमार ने उन साक्षात्कारों को ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार’ नाम से संकलित कर दिया है। वैसे तो इस किताब में संकलित तीन लंबे साक्षात्कारों से शहरयार साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व की काफी बातें निकलकर सामने आती हैं, लेकिन सन 2011 के आठ महीनों की कई बैठकों में कभी किसी, तो कभी किसी मुद्दे पर शहरयार साहब से बात कर तिथिवार जो सामग्री प्रेम कुमार ने प्रस्तुत की है, उसमें शहरयार साहब के जीवन, उनके परिवेश, उनके घर-परिवार, उनके साहित्य आदि की अनेकानेक बातें कभी सायास तो कभी अनायास पाठकों के सामने आ गई हैं। साक्षात्कार करने की प्रेम कुमार की खासियत है कि बहुत कम पूछकर वह किसी से बहुत अधिक कहलवा लेते हैं। प्रेम कुमार की यह खासियत इस किताब में भी बखूवी दिखाई दे जाती है। बहुत ही शालीनता से प्रेम कुमार वैसे सवाल भी पूछ डालते हैं, जिन्हें पूछने में आम-तौर पर किसी को झिझक हो सकती है। मसलन सेक्स, स्त्री-पुरुष संबंध, समलैंगिकता, विवाहेतर संबंध आदि से जुड़े सवाल! जवाब देने वाले शायर शहरयार की ईमानदारी की बात भी कबूल करनी पड़ेगी कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से सवालों के जवाब दिए हैं। अपने बारे में कही उनकी यह बात काबिले गौर है- “सेक्स की जानकारी मुझे बहुत कम उम्र में हो गई थी। ये मेरी बहुत कमजोरी रही। मैं बहुत इमेजिनेटिव था। जिस्म मुझे अट्रेक्ट करता रहा। अच्छी ज़िंदगी गुजारने का बहुत शौक रहा। यही कि अच्छा खाना, अच्छा पहनना, ताश खेलना…! शराब पीना बहुत जल्दी शुरू कर दिया था।“ (पृ.36)

इसी तरह अपनी पत्नी से अलगाव की बात भी वह बड़े आराम से कह जाते हैं। (पृ.75) पत्नी पर बिना किसी दोषारोपण के जिस तरह वह इस हकीकत का बयान करते हैं, वह उनके बड़प्पन का एहसास कराए बिना नहीं रहता। प्रेम कुमार तो उनसे दूसरी शादी के बारे में भी सवाल पूछने से नहीं चूकते! इसके जवाब में वह अपना ही शेर प्रेम कुमार को सुना देते हैं- “बुझने के बाद जलना गवारा नहीं किया/हमने कोई भी काम दोबारा नहीं किया।“

इस किताब को पढ़कर शहरयार साहब के बचपन, घर-परिवार, पिता, बच्चे, मित्र आदि के बारे में पता चलता ही है, धर्म, ईश्वर, आम-आदमी, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री आरक्षण बिल, विश्वविद्यालय, समकालीन साहित्यकारों, हिन्दी के साहित्यकारों आदि के बारे में भी उनके विचारों का पता चल जाता है। मंचों पर शायरी कम पढ़ने के बारे में भी उनका एक खास तर्क था। मंच पर पापुलर शायरी पढ़ने को वह अच्छा नहीं मानते थे- “बहुत पापुलर करना वल्गराइज़ करना भी हो जाता है बहुत बार!” (पृ.26)

शहरयार साहब ने गज़लों से ज्यादा नज़्मो को अपनी शायरी में महत्त्व दिया था, लेकिन लोग उन्हें गज़लकार ही ज्यादा मानते थे। इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था- “आमतौर से जब मेरी शायरी पर बात की जाती है तो आम लोग गज़ल को ही सामने रखते हैं… जबकि मैंने नज़्में गज़लों से ज्यादा लिखी हैं और नयी उर्दू शायरी के सिलसिले में मेरा ज़िक्र मेरी नज़्मों के हवालों से ज्यादा किया जाता है।“ (पृ.64)

और जब प्रेम कुमार शहरयार साहब से उनके ‘साहित्यिक प्रदेय’ के बारे में पूछते हैं तो वह बड़ी विनम्रता से कहते हैं- “हिन्दोस्तान और दुनिया में इतने बड़े-बड़े लोग…. कारनामे करने वाले लोग पैदा हुए हैं…। उस पर… हम अपनी ढपली बजाते रहें…। हमारी क्या विसात… समंदर में कतरा! ऊपर से देखिए…. नुक्ता-नुक्ता नज़र आता है आदमी! नीचे से आप देखते रहें…आईना सामने रखकर खुद को देखते हैं और बड़ा समझते हैं। मगर सच तो यह है…जैसा यगाना चंगेजी का एक शेर है….

‘बुलंद हो तो खुले तुझपे राज़ पस्ती का
इस ज़मीन में दरिया समाए हैं क्या-क्या!’

इस किताब में एक लंबा साक्षात्कार पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज पर भी है। इस साक्षात्कार में फैज के बार में शहरयार साहब ने कई महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। एक प्रस्तुत है-“हाँ, हाँ, मेरी उनसे बारहा मुलाक़ात हुईं। बहुत ही निजी तरह की महफिलें। उन मुलाकातों में कभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की समस्याओं या रिश्तों वगैरह पर बातें नहीं हुआ करती थीं। वो यहाँ या वहाँ के मसायलों के बारे में कभी गुफ्तगू नहीं किया करते थे। वो कहते थे कि हम तो भाई मुहब्बत के सफ़ीर हैं। और इसके अलावा कुछ सोचते नहीं। उनकी पूरी शायरी में भी कोई ऐसी फीलिंग नहीं है जिसमें नफरत, जंग की हिमायत, दूरी फैलाने या फासला पैदा करने वाला कुछ हो। ऐसा कुछ दूर-दूर तक वहाँ नहीं है।“ (पृ.81)

इस किताब की एक और खासियत है कि इसमें प्रेम कुमार ने शहरयार साहब की चुनी हुई शायरी भी पेश कर दी है। इससे यह किताब शहरयार साहब की शायरी से अनजान पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी बन गई है। शहरयार साहब के व्यक्तित्व, उनके जीवन, उनके विचार वगैरह के साथ-साथ उनकी शायरी को पढ़कर पाठक शहरयार साहब से एक मुकम्मल मुलाक़ात इस किताब के जरिये कर सकते हैं। शहरयार साहब के ज्ञानपीठ मिलने के बाद उनसे हुई मुलाक़ात और उनकी मृत्यु के बाद का विवरण भी प्रेम कुमार ने इस किताब में प्रस्तुत कर दिया होता तो यह किताब शहरयार साहब की और मुकम्मल तस्वीर पेश करने में कामयाब होती !

पुस्तक : बातों–मुलाकातों में शहरयार
साक्षात्कारकर्ता : प्रेम कुमार
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ल
मूल्य : 395 रुपये            

संजीव ठाकुर  की बाल कवि‍ताएं

रोते रहते

रोंदूमल जी रोंदूमल
रोते रहते रोंदूमल
बात कोई हो या न हो
बस रोएँगे रोंदूमल !

मम्मी ने कॉफी न दी
पापा ने टॉफी न दी
फिर तो बात बतंगड़ कर
रोएँगे ही रोंदूमल !

किसी से मुँह की खाएँगे
चाहे खुद धकियाएंगे
अपने मन की न कर पाए
तो रोएँगे रोंदूमल !

जा छुपते

चोर एक न उनसे भागे
भौंक –भौंक कर कुत्ते हारे
बच्चों को तो खूब डरा दें
क्योंकि वे होते बेचारे !

गली–मुहल्ले के कुत्ते
होते हैं बीमार
सड़ी-गली चीजें ही हरदम
वो खाते हैं यार !

घर में पलने वाले कुत्ते
ऐयाशी करते
ए सी में सोते हैं
नाज़ों –नखरों में पलते !

चोर देखकर उनकी भी
सिट्टी होती गुम
जा छुपते मालिक के पीछे
नीचे करके दुम !

बहुत मजा आता है

जाड़े की गुनगुनी धूप में
पैर पसारे लेटे
या फिर खाते मूँगफली के
दाने बैठे–बैठे
बहुत मजा आता है भाई 
बहुत मजा आता है !

मक्के की रोटी पर थोड़ा
साग सरसों का लेकर
या फिर गज़क करारे वाले
थोड़ा–थोड़ा खाकर
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

औ अलाव के चारों ओर
बैठे गप–शप करते
बुद्धन काका के किस्से
लंबे–लंबे सुनते
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

गधे का गाना

गधे ने गाया गाना
उल्लू ने पहचाना
बंदर ने उसे माना
मेंढक हुआ दीवाना ।

कोयल ने मारा ताना–
‘तुझे न म्यूजिक आना ‘
गधे को फर्क पड़ा न
गाता रह गया गाना !

चलो चलें हम मॉल

हम जाएंगे शिप्रा मॉल
कोकू ! रख दो अपनी बॉल

रिक्शे से हम जाएंगे
मैक्डोनल्ड में खाएंगेचलने वाली सीढ़ी पर
हम तुम चढ़ते जाएंगे
अंदर मिलती आइसक्रीम
दोनों जमकर खाएंगे ।चम-चम करती दुकानों से
मैं ले लूँगी सुंदर ड्रेस
ले लेना तुम दो–एक गाड़ी
खूब लगाना फिर तुम रेस ।कोकू ! जल्द सँवारो बाल
हम चल रहे शिप्रा मॉल !

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा
अब कैसे नहलाओगी ?
क्या चावल धो पाओगी ?
दाल कहाँ से लाओगी ?
झाड़ू–पोंछा, बर्तन कपड़े
तुम कैसे कर पाओगी ?
सूख रहे जो पौधे बाहर
उनका क्या कर पाओगी ?
कहीं आ गया कोई घर पर
उनको क्या दे पाओगी ?
कितनी बार कहा पापा ने
बात कभी न मानोगी
हो जाएगी खाली टंकी
तब जाकर पछताओगी !

बाहर जाकर खेलो

खेल रहा है बाहर पिंटू
तुम भी घर से निकलो चिंटू !बाहर जाओ, दौड़ो, कूदो
क्या टी॰ वी से चिपके हो ?
कंप्यूटर से खेल रहे तुम
पके आम से पिचके हो !
बाहर खेल रहे हैं बच्चे
तुम उन सबसे छिपके हो ?बाहर जाकर खेलो चिंटू
बाहर खेल रहा है पिंटू !

मुझे सुहाता

मुझे सुहाता मेरी अम्मा
दीपों का त्योहार
अंधकार का दुश्मन होता
दीपों का त्योहार ।

लोग जलाते हैं दीये
घर में और गली में
तरह–तरह बल्ब लगते
घर में और गली में

‘दीपावली मुबारक हो ‘
सब कहते हैं सबको
‘आओ एक मिठाई खा लो ‘
सब कहते हैं सबको !

बस फट–फट आवाज़ पटाखों की
न सुहाती मुझको
बारूद की दुर्गंध ज़रा भी
नहीं सुहाती मुझको !

रोमांचक बचपन: प्रेमपाल शर्मा

badho ka bachpan

‘बड़ों का बचपन’ पुस्‍तक एकलव्‍य, भोपाल का एक बेहद रोचक प्रकाशन है। इसमें संजीव ठाकुर ने दुनिया भर के 29 मशहूर हस्तियों के बचपन की यादें, शरारतें, शिक्षा, दीक्षा आदि दी हैं । देसी-विदेशी और राजनीतिज्ञों से लेकर लेखक, फिल्‍मी हस्तियाँ सभी शामिल हैं । महत्‍वपूर्ण लेखकों में गोर्की, शरतचन्‍द्र चटर्जी, फकीर मोहन सेनापति, अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन, पांडेय बेचैन शर्मा उग्र आदि हैं । बहुत रोमांचक है लेखकों के बचपन को जानना । कितनी गरीबी और संघर्षों में बीता गोर्की का बचपन । बचपन में पिता जल्‍दी गुजर गये तो कभी नानी के घर तो कभी दूसरे पिता के । खाने-पीने तक का ठिकाना नहीं, पढ़ने की बात तो दूर । लेकिन पढ़ने का शौक न जाने कैसे लग गया। इतना कि मॉं के बटुए से पैसे चुराकर परियों की कहानी खरीद लाया । चोरी पकड़े जाने पर खूब पिटाई हुई । गोर्की लिखते हैं कि मुझे पिटने का डर नहीं था, दु:ख हुआ किताब के छिन जाने का । कौन सा काम नहीं किया गोर्की ने बचपन में । रविवार की सुबह बोरी लेकर शहर में निकल जाता और फटे कपड़े, लोहे की कील, पुरानी हड्डियाँ, रद्दी कागज जमा करके कबाड़ी की दुकान में बेच आता । थोड़ा और बड़ा हुआ तो बेकरी में काम करने लगा। इसी बचपन से पैदा हुआ दुनिया का महान कथाकार गोर्की ‘माँ’, ‘मेरा बचपन’ आदि रचनाओं का लेखक।

बंगाल के लेखक शरतचन्‍द्र का बचपन भी ऐसे ही अभावों में बीता लेकिन उतना ही शरारतपूर्ण । हुक्‍के की चिलम में पत्‍थर भर देते तो कभी स्‍कूल की छुट्टी जल्‍दी करने के लिए घड़ी की सूई आगे बढ़ा दी। भूत-प्रेतों को सरेआम चुनौती देने के लिए उन्‍हीं के अड्डे में खेलते । यही व्‍यक्ति आगे चलकर ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकांत’ जैसे महान उपन्‍यासों का लेखक बना । प्रसिद्ध फ्राँसीसी विचारक रूसो ने तो कौन सी शरारत, चोरी और गुंडई नहीं की । न स्‍कूल में टिकता, न किसी काम में । फ्राँस की क्राँति के पीछे रूसो की स्‍वत्रंता की अवधारणा प्रमुख थी । चार्ली चैपलिन की माँ अदाकारा थीं जब उनको गले की बीमारी हुई तो चैपलि‍न को स्‍टेज पर आना पड़ा । आर्थिक परिस्थितियाँ इतनी दयनीय थीं कि चैपलि‍न शाम को नाटकों में काम करते और दिन में अखबार बेचते । खिलौने बनाए, बढ़ई की दुकान पर काम किया । अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन सभी की ऐसी ही कहानि‍याँ । अंग्रेजी के कहर से प्रसिद्ध बंगला लेखिका तसलीमा भी नहीं बचीं । जहाँ गणित और सभी विषयों में खूब नम्‍बर आए अंग्रेजी में सिर्फ तैंतीस । मुश्किल से पास हुईं । डॉक्‍टर पिता ने रात-दिन अंग्रेजी रटाई तो अगली बार नंबर और कम हो गये । आज तसलीमा के नाम पर बंगाली की तीस मशहूर किताबें हैं और अंग्रेजी भी फर्राटे से बोलती हैं ।

राजनेताओं में गाँधी, अम्‍बेडकर, माओ, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्‍त्री, अब्‍दुल कलाम आदि हैं । गाँधी की ईमानदारी को कौन नहीं जानता ? बचपन में चोरी की तो तुरन्‍त गलती भी मान ली पत्र लिखकर । पत्र पढ़कर पिता की आँखों से आँसू बहने लगे । यानी गलती किस से नहीं होती । बड़ी बात है कि उसे स्‍वीकार करना । भूतपूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम का बचपन तमिलनाडु के रामेश्‍वरम में बीता । बचपन में उन्‍होंने भी अखबार बेचे । कौन भूल सकता है अम्‍बेडकर के बचपन को । अछूत माने गये, दुत्‍कारे गये । आज समानता के लिये देश के मसीहा ।

बहुत प्रेरणादायक प्रसंगों से भरी पड़ी है पूरी किताब । बच्‍चे ऐसे किताबें पढ़कर ही पुस्‍तकों की तरफ आते हैं । संजीव ठाकुर का कहना सही है कि मनुष्‍य के जीवन का सबसे सुनहला अध्‍याय बचपन ही होता है । सम्‍भावनाओं का अनंत आकाश लिये ।

एकलव्‍य प्रकाशन को इस सीरिज में और भी पुस्‍तकें अलग-अलग निकालनी चाहिए । जैसे लेखकों का बचपन, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, फिल्‍मी नायक-नायिका आदि । हर बच्‍चे के लिये जरूरी किताब ।

पुस्‍तक : बड़ों का बचपन
लेखक :
संजीव ठाकुर
प्रकाशक :
एकलव्‍य प्रकाशन, ई-10, बी.डी.ए. कॉलोनी, शंकर नगर, शि‍वाजी नगर, भोपाल- 462016
मूल्‍य  :
90 रुपये
पृष्‍ठ  :
175
चित्रांकन :
प्रदीप चिंचालकर