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एक विनम्र राजसी व्यक्‍त‍ित्‍व : शेखर जोशी

आज के राजनेताओं के जीने के शाही अंदाज और बड़बोलेपन को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कभी बेहद विन्रम और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले राजनेता भी होते थे। ऐसे ही एक राजनेता थे, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द। वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी का संस्मरण-

राजनीति के शीर्षस्थ महापुरुषों से आत्मीय परिचय कभी नहीं रहा था। पारिवारिक स्तर पर ‘प्रीमियर सैप- पं. गोविन्द वल्लभ पन्तजी का यदा-कदा जिक्र होता, लेकिन लखनऊ या नैनीताल जाकर उनके दर्शन का सौभाग्य कभी नहीं मिला। हमारे निकटस्थ समाजसेवी और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी पंडित हरीकृष्ण पाण्डेजी थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब कुछ व्यवस्थित हो पाए तो उन्होंने अल्मोड़ा- कौसानी मोटरमार्ग पर रणमण (रनबन) में अपने औषधालय की स्थापना की। वन्देमातरम् का संक्षिप्त रूप ‘बंदे’उनका प्रिय अभिवादन शब्द था। श्‍वेत खादी परिधान में ऊनी पंखी लपेटे औषधालय में सुगन्धित औषधियों के बीच हमेशा चार-छह आदमियों से घिरे हुए उन्हें देखना बहुत प्रीतिकर लगता था। पिताजी का उनसे गहरा भाईचारा था। पिताजी से ही जाना था कि कुली बेगार आंदोलन से लेकर सन् 42 के आन्दोलन तक पाण्डेजी ने कुमाऊँ की जनता को जागृत करने के लिए कितना संघर्ष किया, कुर्बानी दी और उनके परिवारजनों ने कैसी यातनाएँ सही थीं। लेकिन पाण्डेजी के प्रफुल्लित चेहरे और सौम्य व्यवहार से उनके भूमिगत जीवन के कष्टों, कारावास की यातनाओं को कोई आभास नहीं मिलता था। वास्तविक सेनानी की तरह उन्होंने इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को सहज स्वीकार किया था। अल्मोड़ा और बरेली जेलों में रहते हुए पाण्डेजी न केवल प्रदेश के प्रायः सभी शीर्षस्थ नेताओं के सम्पर्क में आए वरन उनके प्रीतिभाजन भी बन गए थे।

संभवतः ऐसी ही आत्मियता के कारण उस बार बाबू सम्पूर्णानन्दजी ने अपनी कौसानी यात्रा से लौटते हुए रणमण के औषधालय में पाण्डेजी का आतिथ्य स्वीकार किया था।

यह सन् 1947 की गर्मियों की बात है। मेरा अनुमान है तब सम्पूर्णानन्दजी उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षामंत्री थे। उस घटना के एक दिन पूर्व में पाण्डेजी के औषधालय में पहुँचा था। मेरा रणमण जाना अकारण नहीं था। यह प्रसंग मेरा अपनी प्रारंभिक पाठशाला के लगाव से जुड़ा हुआ है। शायद यह केवल मेरा ही अनुभव नहीं है कि हम ग्रामिण अंचल के लोग जीवनभर अपनी प्रारंभिक शाला से जितनी आत्मीयता से जुड़े रहते हैं उतना अन्य किसी संस्था से नहीं जुड़ पाते। हमारी स्मृतियों में कलम-दवात-पाटी का वह प्रथम साक्षात्कार अपने श्रद्धास्पद गुरु, प्रिय सहपाठियों और विद्यालय की सामान्य इमारत और पेड़-पौधों के साथ हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित रह जाता है। मेरा सौभाग्य था कि मेरे गुरुजनों ने भी मुझे उस पाठशाला से और गहरे जुड़ने के अवसर दिए। संभवतः मेरी कलात्मक रुचि ने उन्हें प्रभावित किया था। इस कारण उनका आग्रह रहता कि मैं प्रतिवर्ष गर्मियों की छुट्टियों में अन्य प्रदेश से घर आने पर अपनी शाला के लिए कोई चित्र या अलंकरण बनाया करूँ। यह मेरे लिए विशेष गर्व का विषय हुआ करता और प्रतिवर्ष मेरा यह प्रयास रहता कि किसी नए विषय पर अपनी कलम कूँची आजमाऊँ और अपनी भेंट शाला में प्रस्तुत करूँ।

उस बार किसी पत्रिका में एक रोचक कैलेंडर देखकर मैंने उसकी रंगबिरंगी अनुकृति तैयार की थी। अपनी भेंट को अधिक प्रभावकारी और टिकाऊ बनाने की इच्छा से मैं अपनी उस कलाकृति को फ्रेम में मढ़वाना चाहता था। गाँव में यह सुविधा सहज संभव नहीं थी। पिताजी ने मेरा मंतव्य जानकर मुझे सुझाव दिया कि औषधालय के गोदाम से प्लाइवुड का टुकड़ा लेकर मैं वहीं बढ़ई से उसे फ्रेम करवा लूँ।

पाण्डेजी मेरी गतिविधियों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने जिज्ञासा की तो मैंने अपनी चपलता में फ्रेम लग चुकने पर उन्हें अपनी कलाकृति दिखाने का वचन दिया। बढ़र्इ ने उस कलाकृति को चौखटे में बाँधकर अपनी कारीगरी से निश्‍चय ही उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि कर दी थी। मैंने सगर्व पाण्डेजी के सम्मुख अपना कृतित्व प्रदर्शित किया और उन्हें उसकी बारीकियाँ समझायीं तो पाण्डेजी ने स्नेह से मुझे चपतियाते हुए साधुवाद दिया। फिर जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो, वह बोले, ‘कल मंत्रीजी आ रहे हैं। उनके जलपान की व्यवस्था करनी है। तुम लोग शहरी बालक ठहरे, सलीके से कर लोगे। बसन्त, तारी को लेकर सुबह आ जाना। इस तस्वीर को आज यहीं रहने दो कल ले जाना।

मैं पाण्डेजी का आशय नहीं समझ पाया था लेकिन तब भी अपनी कलाकृति को वहीं रखकर घर चला आया। दूसरे दिन हम लोग प्रातःकाल ही मंत्रीजी को देखने की उत्सुकता में औषधालय पहुँच गए। मंत्रीजी के स्वागत की सामान्य तैयारियाँ हो रहीं थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षों में मंत्रियों, सांसदों को लेकर आज की-सी आपाधापी, चापलूसी और मुंह दिखौवल नहीं होती थी। ग्रामांचल के थोड़े बहुत सामाजिक लोग ही वहाँ उपस्थित थे। सड़क के मोड़ के उस पार जब किसी मोटरगाड़ी का हार्न सुनाई देता तो सबकी उत्सुक निगाहें उस ओर उठ जातीं। सुबह के समय गरुड़-सोमेश्‍वर से अल्मोड़ा-रानीखेत-काठगोदाम को आने वाली गाड़ियों का क्रम चालू था और हरबार वह उत्सुकता जन्म लेती और फिर भीड़ में निराशा छा जाती।

किंचित् प्रतीक्षा के बाद अंततः मंत्रीजी की लम्बी कार आ पहुँची। पीछे-पीछे और भी दो-तीन छोटी गाड़ियों का काफिल था।

किसी राजसी व्यक्ति को देखने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं स्वीकार करता हूँ कि मंत्रीजी की जैसी भव्य कल्पना मैंने मन ही मन कर रखी थी प्रत्यक्षतः उन्हें वैसा न पाकर मैं निराश ही हुआ था। श्यामवर्ण, दीर्घकेशी सम्पूर्णानन्दजी सहजभाव से कार से उतरकर पाण्डेजी से स्नेहपूर्ण मिले। उनके साथ पारिवारिक महिलाएँ भी थीं लेकिन राजसी आभा से प्रभावित करने योग्य कोई व्यक्तित्व मुझे दिखाई नहीं दिया।

हम लोग चाय-नाश्ते की व्यवस्था में व्यस्त हो गए। बैठक में क्या कुछ वार्तालाप होता रहा इससे हम अनभिज्ञ ही रहे। संभवतः बीते दिनों के संस्मरण दुहराये गए हों, पुराने साथियों को याद किया गया हो या स्थानीय समस्याओं पर चर्चा हुई हो।

जलपान समाप्त हो चुकने पर अचानक मेरी पुकार हुई। मैं चौंक पड़ा। लेकिन पाण्डेजी के आदेश की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। ससंकोच मैं बैठक में उपस्थित हुआ तो पाण्डेजी को सम्पूर्णानन्दजी से मेरा परिचय कराते हुए सुना, ‘यह बालक हमारे मित्र जोशीजी के चिरंजीव हैं। बहुत मेधावी हैं। इसी वर्ष राजपूताना से मैट्रिक की परीक्षा दी है। अब आगे इन्जिनियरिंग में जाना चाहते हैं। इनके लिए किसी प्रकार की छात्रावृत्ति की व्यवस्था हो सकती तो इनकी इच्छा पूरी हो जाती।’

फिर जैसे पाण्डेजी को कुछ याद आया हो, उन्होंने मुझे आदेश दिया, ‘वह चित्र जो तुम कल दिखा रहे थे, उसे लेकर तो आओ।’

अपनी कलाकृति को दूसरे कमरे से ले आने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं था। मैं निरीह भाव से अपनी कृति को लेकर उपस्थित हो गया।

पाण्डेजी ने फिर अतिशयोक्ति की, ‘बहुत मेधावी बालक है, यह अद्भुत चीज बनाई है इन्होंने।’

फिर आदेश हुआ, ‘हाँ, हाँ भाई, बताओ। कल तुमने मुझे कुछ बताया था कि इस तालिका से गणना करके कैसे पिछले सौ वर्ष के दिन-वार निकाल लेते हो।’

वह कैलेंडर यदि मेरी मौलिक सूझबूझ का परिणाम होता तो शायद मुझे वैसी घबराहट नहीं हुई होती। उधार ली हुई प्रतिभा और ऊपर से पाण्डेजी द्वारा अपनी अयाचित प्रशंसा सुनकर मैं असहज हो गया था। लेकिन सम्पूर्णानन्दजी ने बालसुलभ उत्सुकता से गणना की विधि के बारे में अपनी ओर से जिज्ञासा कर मेरा उत्साह बढ़ा दिया, ‘अच्छा, यह बताइए 15 अगस्त, 1947 को क्या वार था।’

मैंने गणना कर वार बताया तो सम्पूर्णानन्दजी ने सहर्ष उसकी पुष्टि की। फिर ऐसी ही किसी महत्त्वपूर्ण तिथि के बारे में जिज्ञासा हुई और मैंने गणना कर सही उत्तर दे दिया।

सम्पूर्णानन्दजी ने अपने व्यवहार से ऐसा प्रदर्शित किया जैसे मैंने कोई अनोखी विधि का आविष्कार कर उन्हें आश्‍चर्य में डाल दिया हो।

मुझे प्रोत्साहित करने के लिए ही जैसे उन्होंने अपनी कन्याओं को संबोधित कर कहा, ‘आप लोग देख रही हैं, कैसा अद़्भुत कैलेंडर इन्होंने बनाया है।’

पाण्डेजी ने मुझे संकेत किया कि मैं वह कलाकृति मंत्रीजी को उपहार स्वरूप भेंट कर दूँ। आज सोचता हूँ वह कितनी साधारण-सी वस्तु थी जिसे पाण्डेजी के आदेश पर मैंने सम्पूर्णानन्दजी को भेंट किया था। लेकिन उसका बड़प्पन था कि उन्होंने उसे एक अमूल्य निधि की भाँति हार्दिक स्वीकार के साथ ग्रहण किया और अपने किसी सहयोगी को उसे कार में सहेज कर रखने का आदेश भी तत्काल दे दिया।

वर्षों बाद, ज्ञान होने पर, सम्पूर्णानन्दजी के कृतित्व और विराट व्यक्तित्व का परिचय मिला। और तब यह सोचकर मुझे आश्‍चर्य होता है कि इतिहास, दर्शन, ज्योतिष और खगोलशास्त्र के महान मनीषी ने उस दिन रणमण में सड़क किनारे पाण्डेजी के औषधालय के छोटे से कक्ष में अपनी विनम्रता का कैसा परिचय दिया था।

लेखक परिवर्तन नहीं कर सकता : अमरकांत

अपनी कहानियों में निम्‍न मध्‍यम वर्ग के काइंयापन को प्रमुखता से चित्रित करने वाले हिंदी के वरिष्‍ठ कथाकार अमरकांत का जन्‍म 1 जुलाई, 1925 को बलिया में हुआ। वह आज भी लेखन में सक्रिय हैं। डॉक्‍टर प्रेम कुमार ने उनके साथ एक दिन बिताकर उनके बचपन की शरारतों से लेकर रचना और जीवन के उतार-चढाव को को जाना-समझा-

एल.आई.जी. फ्लैट का वह छोटा-सा कमरा। छत, दीवारें, फर्श, खिड़कियां, जंगले, लटका झूल-सा रहा  नाममात्र का वह परदा, लकड़ी का सामान्य सा सोफा, एक बेड- सबकुछ उम्रदराज, वृद्ध-वृद्ध सा। इधर-उधर रखी कुछ पत्रिकाएं और दो-तीन पुस्तकें। साफ मालूम हो रहा है कि यह कमरा जरूरत के मुताबिक ड्राइंग रूम भी हो जाता है और डायनिंग-रूम भी। अमरकांतजी के लिए तो यह स्टडी-रूम भी है और स्लीपिंग-रूम भी। सबकुछ एकदम सहज-साधारण-आम आदमी के घर जैसा। एक हद तक तो आम आदमी के आम घर से भी साधारण सा। नीले चौखानेवाला तहमद, कुरता और सामने से खुली एक ऊनी जर्सी पहने सोफे की कुर्सी पर बैठे अमरकांतजी। चेहरे पर उत्साहित-सी चमक, स्फूर्ति भरी दमक। आवाज में तेज-तेज एक खास तरह की धमक, ठनक भी।

बात लेखन के शुरुआती दिनों के जिक्र से शुरू हुई है। प्रश्‍न के बाद कुछ पल की चुप्पी और फिर सोचने, पुराना कुछ याद करने की सी मुद्रा। वह आगरावाली उम्र को याद कर रहे थे- ‘मेरे लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई। तब ऐसा था कि पत्रकार बनना है, हिंदी के लिए कुछ करना है। ‘सैनिक’ आगरा से निकलता था, उसमें गया मैं। एक साल ट्रेनिंग के रूप में रहा, फिर कन्फर्म हुआ। आगरा में तीन साल रहना हुआ। वहां जो भी खट्टे-मीठे अनुभव हुए, वे तो हुए ही, पर मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत वहीं से हुई। वहीं सुअवसर मिला प्रगतिशील लेखक संघ के कुछ लोगों के संपर्क-सामीप्य में आने का।… नहीं, हमारा कोई पूर्व संपर्क नहीं था वहां। हमारे एक मित्र थे- विश्वनाथ भटेले, वही ले गए थे हमें प्रगतिशील लेख संघ में। हमारे परिचय में उन्होंने वहां कहा- गजल गाते हैं ये। तब वहां रामविलास शर्मा थे, धीरेंद्र अस्थाना, राजेंद्र यादव, राजेंद्र रघुवंशी आदि कुछ लोग कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर भी थे। बैठकों में कभी पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, रावीजी भी आते थे। रांगेय राघव उन बैठकों में नहीं आते थे। बहुत सुंदर- आर्यन ब्यूटी जिसे कहते हैं- उस तरह के थे रांगेय राघव। रामविलासजी से तब उनका मतभेद चल रहा था। उनके पास भी हमें विश्वनाथ भटेले ही ले गए थे।

‘दयाल बाग की तरफ घूमने निकल जाते थे हम लोग उनके साथ। बर्कले सिगरेट पीते थे, हमें भी पिलाते थे। खड़े होकर लिखते थे। जब हम उनसे मिले थे, एक साथ छह उपन्यास लिख रहे थे वे। एक-एक वाक्य, पैराग्राफ प्लान कर लेते थे सबका एक साथ।

‘फिर इलाहाबाद का जीवन। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ समूह का एक अखबार था- ‘अमृत पत्रिका’। उसमें अपाइंटमेंट मिल गया तो मैं इलाहाबाद आ गया। इलाहाबाद राजनीति, शिक्षा एवं साहित्य का केंद्र था। इलाहाबाद में कुछ लिखा तो नहीं मैंने, पर दबाव बहुत झेले। जिस अखबार में काम करता था, वहां वेतन को लेकर मालिकों से संघर्ष हो गया। हड़ताल का नोटिस दे दिया गया था। उन सारी एक्टीविटीज में भाग लेना होता। तब पत्रकारों में यूनिटी थी। हिंदी भाषा के प्रति प्रतिबद्ध, थोड़े वेतन में गुजारा। पेपर कैसे लोकप्रिय हो, प्रसार संख्या कैसे बढ़े- यह सबकी चिंता होती थी। आंदोलन शुरू होते ही वातावरण तनावपूर्ण हो गया। उत्पीडऩ शुरू हुआ, लोग निकाले जाने लगे। साहित्य के मोर्चे पर प्रगतिशील लेखक संघ तथा ‘परिमल’ नाम की साहित्यिक संस्थाएं थीं। इनमें विचार की टकराहटें होती रहती थीं। प्रलेस में प्रकाशचंद्र गुप्त, भैरवप्रसाद गुप्त, शमशेर, अमृतराय, दुष्यंत, कमलेश्वर भाई आदि थे और परिमल में धर्मवीर भारती, विजय देव नारायण साही, केशव प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि थे। वर्ष 1954 में मैं बीमार पड़ गया। बी.पी. की शिकायत हुई, फिर हर्ट ट्रबल। शाम की ड्यूटी में अचानक पेन। सांस लेने में तकलीफ। मित्र ने घर पहुंचाया। उस समय इन बीमारियों के बारे में इतनी जागरुकता नहीं थी। नौकरी छोडऩी पड़ी। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में रहा तो स्वस्थ हुआ।‘

अमरकांतजी से मैंने उनके नाम-परिवर्तन के बारे में जानना चाहा है। शांत सी एक हंसी धीमी चाल चलकर उनके होंठों तक आई और धाईं छूने जितनी जल्दी के साथ वापस लौट गई- ‘मैं तब श्रीराम वर्मा था। अमरकांत मेरा पेन-नेम है। 1953 में बदला। मेरी पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ 1953 में ‘कल्पना’ में छपी थी। तभी पेन-नेम ‘अमरकांत’ कर लिया।‘

पहली रचना के छपने की उस खुशी के अहसास का अब कितना कुछ याद रहा है आपको?

‘पहली रचना के छपने की खुशी? देखिए, रचनाओं के छपने की खुशी तो होती है, पर हम उछल जाएं, ऐसा तो नहीं है। मैं जब लिखता हूं तो संदेह में रहता हूं कि कैसी बनी? जब दूसरे लोग बताते हैं तो लगता है कि ठीक बनी। अब तो आदत कुछ ऐसी बन गई है कि खुशी हमारे अंदर अधिक देर तक नहीं रह पाती। बीमारी की वजह से हम बहुत इंडल्ज करना एवॉइड करते हैं। बहुत सी रचनाओं को मैं फिर लिखना चाहता था। जैसे ‘जिंदगी और जोंक’ को दोबारा लिखना चाहता था। असंतोष था। उसी समय अचानक राजेंद्र यादव घर पहुंचे। कहानी हाथ से छीन ली। बहुत फटकारा- ‘ये क्या कर रहे हो? दूसरी कहानी लिखो।‘ लेखक अपनी रचनाओं के बारे में कभी संतुष्ट नहीं होता। तारीफों से खुश होता है, पर विश्वास नहीं होता कि क्या बनी। क्योंकि रचना से अलगाव हो जाता है। हां, तो रचना छप जाए, खुशी तब भी होती है, पर उसका असली मजा तब है जब दूसरा तारीफ करे, उसे स्वीकार करे। मेरे साथ यही होता है। शायद औरों के साथ भी ऐसा होता होगा। लेकिन तारीफ से भी क्या? अपनी रचना जमाने के साथ चलती और विकसित होती है। नए-नए आलोचक नए-नए दृष्टिकोणों से उसकी व्याख्या करते हैं।‘

और अब वे अपनी कुछ चर्चित कहानियों के रचने के क्षणों, आधारों, प्र्रेरणाओं को याद कर सुना-समझा रहे हैं- ‘हमारे छोटे भाई तब इंजीनियर थे आजमगढ़ में। उन्होंने कहा कि थोड़े दिन हमारे यहां रहकर आराम कीजिए। बीमारी के बाद हम सपरिवार उनके यहां रहने चले गए। ‘कहानी’ से पत्र आया कि ‘55 के विशेषांक के लिए कहानी भेजिए। तब मैंने उन्हीं के लिए लिखी थी ‘दोपहर का भोजन’। देर नहीं लगी। असल चीज है फॉर्म। फॉर्म पता है तो तुरंत समझ आ जाता है सब। यदि प्लॉट पता है, पर फॉर्म पता नहीं है तो कई बार लिखकर काटना पड़ता है। फॉर्म कभी पकड़ में आता है, कभी नहीं आता है। समझ नहीं आता कि इस रियलिटी को कैसे प्रेजेंट करें। हर रियलिटी हर फॉर्म में एक्सप्रेस नहीं हो सकती। तो तुरंत लिख गई थी वह- एक सिटिंग में। ‘डिप्टी कलेक्टरी’ अपने एक अन्य भाई के जीवन पर लिखी थी। ‘दोपहर का भोजन’ लिखने के बाद आजमगढ़ से हम बलिया आ गए। वहां हमारी मां थीं, पिताजी थे। पिताजी वकालत करते थे। उम्र भी हो गई थी उनकी। परिवार का बोझा था। किराए का मकान था, वह भी अच्छा नहीं था। नहीं, बलिया के नहीं, हम बलिया के एक गांव ‘नगरा’ के रहनेवाले हैं। नगरा का एक टोला है- भगमलपुर। तो हम बलिया आ गए। धीरे-धीरे स्ट्रेंग्थ गेन कर रहे थे। पत्रकार की नौकरी छूट ही चुकी थी और कोई एक्टीविटी नहीं थी। रेलवे स्टेशन से ‘कहानी’ पत्रिका मंगवा लेता था। एक अंक में अखिल भारतीय प्रतियोगिता के बारे में छपा था। पहले सोचा कि बेकार है इस बारे में सोचना। फिर योजना बनी तीन कहानी लिखने की। जो सर्वोत्तम निकले, उसे प्रतियोगिता में भेज दिया जाए। पहली कहानी ‘जिंदगी और जोंक’ उठाई। सोचा, बहुत मेहनत नहीं करेंगे। थोड़ा-थोड़ा रोज लिखेंगे। अधिक स्ट्रेन नहीं ले सकते थे। रोज थोड़ा-थोड़ा लिखते। आपने पढ़ी है वो कहानी? रजुआ- वो करेक्टर है उसमें। बलिया में ही देखा था उसे हमने। हमारे वाले मुहल्ले का ही था। करीब दस एक दिन लगे होंगे- वह कंपलीट हो गई। इसके पूरा होते ही दूसरी उठा ली। एक दिन की भी देर नहीं की। ये भी हमारे परिवार की थी। भाई लॉ करके बलिया आ गए थे। बलिया जैसे छोटे शहर में रहकर उनका बिना सुविधा, अपने बूते आई.ए.एस. में बैठना। सिंपिलीसिटी के मास्टर थे वे। जटिल से जटिल चीजों को सिंपिलीफाई कर देते। कुछ विषयों में टॉपर। लिखित में नंबर अच्छे आते, पर इंटरव्यू…। इंटरव्यू का जब कॉल आता था तो जैसे ताजी हवा का आना, स्वप्न, आशा का वह उत्साह, पिता की आशाएं, प्रतीक्षा- आप ‘डिप्टी कलक्टरी’ में देख सकते हैं। तीसरी भी लिखी, पर वो नियंत्रण के बाहर हो गई, लंबी हो गई। फाड़कर फेंक दी। नहीं शीर्षक तो अब याद नहीं।

‘’डिप्टी कलक्टरी’ कहानी पुरस्कृत भी हो गई। ‘जिंदगी और जोंक’ का यह हुआ कि अश्कजी उन दिनों ‘संकेत’ नाम से हिंदी में एक साहित्य संकलन निकाल रहे थे। शुरू में कमलेश्वर और मार्कंडेय उससे सहायक संपादक के रूप में जुड़े थे। बाद में कुछ हुआ कि वे अलग हो गए। तो कमलेश्वर ने कहानी भेजने का पत्र लिखा। मैंने ‘जिंदगी और जोंक’ भेज दी। अश्कजी को बहुत पसंद आई। उस संकलन में तब के सभी लेखक छपे थे। मोहन राकेश, शेखर जोशी, राजेंद्र यादव की ‘जहां लक्ष्मी कैद है’, नागार्जुन का ‘वरुणा के बेटे’, परसाई भी थे, ड्रामा भी था, कविताएं भी थीं। ‘कहानी’ का वह विशेषांक महत्वपूर्ण था। बहुत चर्चा हुई। हिंदी क्षेत्र के चारों ओर के पत्र। कहानी के साथ भैरवजी ने अपनी टिप्पणी में एक लाइन यह भी जोड़ दी थी कि इस रचना का लेखक बेकार है और नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। आप देखिए, उसे पढ़कर कितने लोगों ने मुझे नौकरी के लिए पत्र लिखे। यह भी देखिए कि तब कितना असर होता था इन चीजों का। ‘56 के शुरू में ‘कहानी’ का वह अंक और उसके थोड़े बाद ही ‘संकेत’ का अंक। कहानी के पक्ष में एक अभूतपूर्व माहौल। अकल्पनीय। लोग घोषित कर चुके थे कि कहानी की संभावना अब खत्म। कविता के युग की घोषणा हो चुकी थी। ठीक है कि कहानी व्यक्तिवाद, दार्शनिकता या प्रगतिशील राजनीतिक भावुकता में खो गई थी- पर उस दौर में कहानी को वातावरण, वह स्थान मिला कि आज उसकी इतनी पूछ है। नए तेवर, नई भाषा, नए शिल्प के साथ जीवन और समाज को केंद्र में रखकर नई संभावनाएं तब उभरकर आई थीं। कई तरह के लोग लिख रहे थे तब।

‘तो बलिया में दो और आजमगढ़ में एक यानी तीन कहानियां लिखीं हमने उस कठिन दौर में। एक उपन्यास भी लिखा- ‘सूखा पत्ता’।‘ उनका हाथ मेरे कंधे पर आ टिका है- ‘नहीं पढ़ा हो तो पढ़ लीजिए। पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र का जो कच्चापन होता है- वय संधि कहिए उसे, उस पर है। तीन छोटे-छोटे खंड हैं। उसमें एक प्रेमकथा भी है। बाद में हम इलाहाबाद आ गए। ‘दैनिक भारत’ निकलता था तब वहां से। पुराने पत्र में जाने का सवाल नहीं था। वहां वैसे भी ट्रबल चल रहा था। सो ‘दैनिक भारत’ में आ गया। जब से तबीयत खराब हुई, रात में लिखना बंद कर दिया था।‘ और अब तब के इलाहाबाद में बीते कुछ दिन उन्हें याद आ गए हैं- ‘उस जमाने में साहित्य का केंद्र था इलाहाबाद। वैचारिक कहिए या साहित्यिक- विवाद भी यहां खूब थे। भारती, साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी और अन्य अनेक लोग थे। ‘परिमल’ थी, उससे जुड़े लोग थे। उनके मार्गदर्शक अज्ञेयजी थे। प्रयोगवाद के रूप में आंदोलन पहले आया, फिर नई कविता चली। उधर से प्रगतिशील लेखन का विरोध होता ही था। वैचारिक स्तर पर प्रेमचंद पर निशाना साधा जाता था और इधर से व्यक्तिवाद आदि पर। नोक-झोंक चलती रहती, दोनों ओर से गोष्ठियां और सम्मेलन होते रहते। सभी उनमें भाग लेते। आज ऐसा नहीं है। ‘परिमल’ में भारती सबसे आगे रहते थे। साही प्रबुद्ध व्यक्ति थे। गहराई से सोचनेवाले, चिंतक किस्म के थे। तब गतिविधियां बहुत होती थीं- परिमलवालों की भी, प्रगतिशीलों की भी।

‘…नहीं, इंस्पायर होकर नहीं लिखा। बड़ी तकलीफों में लिखा है हमने। आर्थिक समस्याएं बहुत थीं। कोई खास तनख्वाह नहीं थी। शादी हो गई थी। दो बच्चे भी थे। उपन्यास लिखने पड़ते थे। ‘काले उजले दिन’, ‘पराई डाल का पंछी’- हां, बाद में यह ‘सुखजीवी’ करके छपा। इंस्पायर होकर तो पहला उपन्यास ही लिखा- ‘सूखा पत्ता’। श्रीपत राय (कहानी) की नौकरी तक कुछ कहानियां हमने लिखी थीं। मेरा खयाल है, शायद ‘59 में सभी लोग वहां से निकाल दिए गए थे पंद्रह-पंद्रह दिन का नोटिस देकर। मैं संन्यासी, भैरवजी…। उसके बाद ‘अमृत पत्रिका’ में हमारे एक पुराने साथी थे कस्तूरचंद, उन्हें मेरी बेकारी का पता चला तो उन्होंने लिखा कि तुम यहां आ जाओ। वह एक संस्था थी- मैं वहां चला गया। कैंपस में मकान मिला, मजा आया वहां। पर बदमगजी कहां पैदा हो गई, हम नहीं जानते। संभव है, मैंने थोड़ी आलोचना कर दी होगी। आप जानते हैं कि यदि आप व्यवस्था में रहते हैं तो हाथ-पैर बचाकर रहिए। पर लेखक का यह है कि वह ऐसे समय में वाचाल हो जाता है। छह महीने बाद नौकरी का रिन्यूअल होना था, पर हमसे कह दिया गया कि खेद है, आपका रिन्यूअल नहीं हो पाएगा। हमारे लिए तो यह मरण हो गया। सब चीजें कच्ची थीं। बच्चे छोटे थे। उन्हीं दिनों बाद में ‘पराई डाल का पंछी’ लिखा। एडवांस जो मिला, ले लिया। वहां से लखनऊ आ गया। नौकरी कोई थी नहीं, कोई फिक्सड डिपोजिट नहीं, इन्कम नहीं। हवा में थे हम।‘  अजीब-सी, खाली-खाली सी एक खास तरह की हंसी।

‘…तब सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना भी हमारे वाले मुहल्ले राजेंद्र नगर में ही रहते थे। हम लड़ते भी थे, पर एक-दूसरे के काम भी आते थे। वे मेरी बेकारी को लेकर चिंतित थे। आप देखिए कि एक साल तक उन्होंने हर महीने हमें रेडियो के तीन कार्यक्रम दिए। एक कार्यक्रम का पारिश्रमिक तीस रुपये। महीने के नब्बे रुपये हुए। सन् 60 की बात है, तब मकान का किराया था पचास रुपए। कहानी आप रोज तो लिख नहीं सकते, सो और भी कुछ लिख-लिखा लिया। ‘ग्राम्या’ के लिए ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखवाया। श्रीकांतजी ‘कृति’ निकालते थे, उसके लिए लिखा। ‘ग्राम्या’ में तब जो लिखा, वह ‘ग्रामसेविका’ उपन्यास में आया। लस्टम-पस्टम चलता रहा सब। ‘मूस’ भी वहीं लिखी। वह ‘नई कहानी’ में छपी और चर्चित हुई। सर्वेश्‍वर से बहसें अकसर प्रेमचंद को लेकर होतीं। वे कहते- प्रेमचंद का साहित्य नखासगंज का साहित्य है। मैं पूछता- तुम्हारा क्या हजरतगंज का है? खूब नोक-झोंक चलती। इलाहाबाद में भारती से हमारा यह सब चलता रहता था। बहसें होतीं, पर संबंध थे। मैंने वहां से एक स्केच टाइप, थोड़ी ह्यूमरस टाइप एक चीज भेजी- वह ‘धर्मयुग’ में छपी। भारती ने लिखा कि हमें एक महीने में इस तरह की तीन रचनाएं दीजिए। चाहता तो कर सकता था, पर उस ऑफर को मैं नहीं कर सका। बड़ी बाध्यताएं थीं, बहुत संकट थे, मैं कर नहीं पाया, हालांकि उससे मेरा हित होता।‘

अब लखनऊ के उस स्वर्णकाल को याद किया जा रहा है- ‘तब तीन महान उपन्यासकार लखनऊ में रहते थे- नागरजी, भगवतीचरण वर्मा और यशपालजी। इस उपन्यासकारत्रयी पर लखनऊ को गर्व था। श्रीलालजी वहीं पोस्टेड थे, सर्वेश्वर थे, कुंवर नारायण थे। हजरतगंज तब घूमने के लिए एक अच्छी जगह थी। कॉफी हाउस होता था तब वहां, बहुत से लोग आते थे। डिस्कस करते थे। यशपालजी आते थे, पर सात बजे वहां से उठ लेते थे। उस डिसकशंस का वे कहानियों में उपयोग कर लेते थे। श्रीलालजी अंग्रेजी-संस्कृत में कुछ-न-कुछ सूक्ति छोड़ते रहते थे। पढ़े-लिखे विज्ञ हैं वे। अफसर भी थे तब। मजा आता था सुनकर। मैं दोस्तों में श्रोता ही रहा हूं। ज्यादा बोलता नहीं हूं। यूं कभी-कभी बस मजाक भर कर लिया। दूसरों को सम्मान देने की हमेशा मैंने कोशिश की है। स्वयं को सदैव छोटा समझकर ही चला। वह मेरा ही संकोच था कि मैं इन तीन ख्यात लेखकों में से केवल नागरजी के ही निकट पहुंचा।‘ कुछ याद करने की सी खास मुद्रा में रुककर सोचा गया है- ‘एक बार शुक्लजी की कार में बैठकर हम नागरजी के यहां गए। देखा- वे बैठकर सिलबट्टे पर भांग घिस रहे हैं। नागरजी जिद पर आ गए कि तुम भी भांग पीओ। मैंने बहुत कहा कि मैं परहेज से रहता हूं, कभी-कभी सिगरेट पीता हूं, पर भांग या शराब नहीं पीता। वे नहीं माने, थोड़ी-सी पिला दी। उन दोनों ने ठाठ से पी। साइकोलॉजिकल ही रहा होगा कुछ मेरे साथ कि मेरी तबीयत कुछ गड़बड़ हुई।‘ अल्प सा एक विराम फिर आया। जरा देर बाद चहक भरे से फिर बोले, ‘एक रोचक घटना याद आ रही है इस समय, सर्वेश्‍वरजी के अज्ञेयजी से निकट के संबंध थे। सर्वेश्‍वर पहले ए.जी. ऑफिस में थे। ‘परिमल’ में वे थे ही और अज्ञेयजी के कारण ही ‘दिनमान’ में गए। अज्ञेयजी उनके यहां आए हुए थे। नौकर बुलवाने के सिलसिले में मुझे सर्वेश्वरजी की पत्नी से बात करनी थी, इसलिए मैं उनके घर गया। अंदर देखा- उस हॉलनुमा कमरे में अज्ञेयजी चारपाई पर बैठे थे। उनसे पहले मिलना-देखना तो हुआ था, पर बातचीत नहीं हुई थी। वे चिंतनमग्न बैठे थे। मैं बराबर के कमरे में सर्वेश्वर की पत्नी से बात करके चला आया। सर्वेश्‍वर की पत्‍नी ने कहा भी कि ये अज्ञेयजी हैं। शायद संकोच था। दूसरे दिन सर्वेश्‍वर इस बात पर बहुत बिगड़ा। मैंने सफाई दी- ‘पता नहीं उन्होंने मेरा क्या कुछ पढ़ा होगा या नहीं? मैं कैसे इंट्रोड्यूस करता खुद को?’  वह चिल्लाने लगा- ‘वो एक-एक नए लड़के को जानते हैं। सबको पढ़ते हैं।‘ एक दिन सर्वेश्‍वर ने ही कहा कि तुम पंतजी से जाकर क्यों नहीं कहते। वे सरकार के सलाहकार हैं। मैं गया, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। तब तक वे सलाहकार नहीं रह गए थे। फिर स्थितियां इतने अंतिम छोर पर पहुंच गईं कि लखनऊ में रहना मुश्किल हो गया। जो कुछ थोड़ा सामान था, उसके साथ लद-फदकर हम लखीमपुर खीरी पहुंच गए। तब हमारे भाई वहां ज्यूडीशियल अफसर थे। वे वहां राजा की कोठी के एक पोर्शन में रहते थे। राजा के एक भाई थे। उन्हें हमने देखा भी, उनके बारे में सुना भी। बाद में उन्हीं पर केंद्रित एक कहानी लिखी- ‘आकाश-पक्षी’।

‘उसी बीच भैरवजी ने लिखा कि वहां कहां पड़े हो, यहां इलाहाबाद आ जाओ। इलाहाबाद से जब गए थे तो श्रमिक बस्ती में हमारा एक क्वार्टर था। तब दस रुपये किराया था उसका। एक खास मित्र के कहने पर वह क्वार्टर हमने किसी को दे दिया था। देते समय सोचा नहीं था कि लौटना पड़ेगा। दुर्योग कि लौटना पड़ा। उस व्यक्ति का परिवार बस चुका था वहां। उससे कुछ नहीं कहा और खुद कुछ दिन ए.जी. ऑफिस के भाटियाजी के यहां रहा। भैरवजी दिल्ली गए तो उन्होंने शेखर जोशी को अपने घर में रहने को कहा। जोशी भैरवजी के यहां लूकरगंज चला गया और मैं जोशीवाले घर में जा पहुंचा। मेरी कहानियों के साथ वही- 20/5, करेला बाग कॉलोनी वाला ही पता छपता था। ग्रैंड आदमी है जोशी। आप देखिए कि भैरवजी को दिल्ली से जल्दी ही वापस आना पड़ा। और यह देखिए कि शेखर मुझसे कुछ कहने नहीं आए। उनका वह घर जिसमें मैं था, सस्ता था, पर उन्होंने एक दूसरा महंगा मकान ढूंढ़ लिया वहीं लूकरगंज में। मुझसे कुछ नहीं कहा, ताकि मुझे दिक्कत न हो। मैं यहां मित्रों के सहारे ही रहा हूं। ‘60 के अंत में आया था और ‘80 के अंत तक रहा वहां, करेला बाग कॉलोनी में। ‘65 तक स्वतंत्र लेखन की स्थिति रही। अप्रैल ‘65 में माया प्रेस ज्वाइन किया। माया प्रेस से पहले हमने अश्कजी का काम किया था। बच्चों के लिए काफी कुछ लिखवाया था उन्होंने तब हमसे।‘

कुछ ऐसा याद आया है कि देर तक हंसे हैं। हंसी के साथ ‘सर्वसेवा संघ’ में काम करने के दिनों की बात शुरू हो गई है- ‘सर्वोदयी नेता सिद्धराज ढड्ढा से पहले दो-एक बार मुलाकात हो चुकी थी। उनका कार्यालय बनारस में था। वे अपने प्रकाशन पेपर बैक में लाना चाहते थे। सबकुछ की तैयारी मेरे जिम्मे थी। तनख्वाह ढाई सौ रुपये। नीचे जमीन पर बैठते थे सब। पूजा-पाठवाली चौकी जैसी मेज- लंबाई में बैठे हैं सब, पीठ पीछे मसनद, दीवार का सहारा। दो-तीन दिन काम किया। शाम को वहां चाय का इंटरवल होता था। सारे कर्मचारी एक कमरे में होते। इतने स्कैंडल्स- भ्रष्टाचार, सेक्स की इतनी बातें। उफ, सर्वोदयी लोगों का उस तरह स्कैंडल्स में रस लेना। दो-तीन दिन मैं बैठा। अजीब, विचित्र हालत- घड़ी की सुई घुमाई जाती, कोई समय से नहीं आता था। दस बजे वहां पहुंचनेवाला केवल मैं होता था। आखिर होली पर ही मैं इलाहाबाद आ गया। मार्कंडेय ने कहा कि ‘मित्र प्रकाशन’ में जगह खाली है, जाकर मिलो। भैरवजी ने फिर लिखा कि कैसे लोगों के बीच पड़े हो, यहां आ जाओ। ‘65 से 95 तक- तीस साल रहा हूं मित्र प्रेस में। जब ज्वाइन किया तो कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा था। चेक्स डिसओन हो रहे थे।‘ चेहरे पर तृप्ति भरा गर्वीला-सा एक उल्लास है- ‘बाद में इतना डेवलपमेंट… कि क्या कहें… सब देखा।‘

‘…प्रगतिशील लेखक संघ में तब डिवीजन हो गया था। वह उतना सक्रिय नहीं था, जनवादी लेखक संघ बन गया था। पर मैंने ओरिजनल संस्था में रहना उचित समझा। कारण? यही कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी में टूट हुई है तो उसके लिए साहित्यिक संगठन क्यों टूटे। तब हमारे दिन-रात के साथ- मामूली साथ नहीं रहे थे वे- छोड़कर दूसरी ओर चले गए। देखते-देखते सब क्या कुछ हुआ।‘ लंबी-गहरी सांस ली है।

एकदम चुप, गंभीर हो गए हैं। पहली बार हम लोगों के बीच खामोशी का इतना लंबा ठहराव हुआ है। भावुक-सा कुछ जैसे उफनकर बाहर आना चाह रहा हो और उसके ढके रखने की कोशिश में होठ हैं कि ढक्कन की तरह उठ-गिर रहे हैं। आहिस्ता-आहिस्ता। ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ मिलने से जुड़े कुछ संदर्भ-क्षण याद आना शुरू हुए हैं- ‘मैं प्रगतिशील था, पर कम्युनिस्ट नहीं था। फिर भी मुझे 1984 में पुरस्कार मिला। नामवर के कारण मिला। अनएक्सपेक्टिडली मिला। अचानक सुबह-सुबह लंबा-सा एक तार घर आया पुरस्कार मिलने का। और आप देखिए कि एक घंटे बाद मालूम हुआ कि इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई…। चारों तरफ तहलका- 31 अक्टूबर, 1984 बड़ा शॉक लगा। बेहद दु:खद घटना थी वह। किसी को नहीं बताई हमने पुरस्कार मिलने की बात। घर पर कह दिया कि किसी को मत बताना। दफ्तर में मित्रों को भी तब बताया जब स्टेट मोर्निंग खत्म हो गई थी। रूस अगले साल जुलाई 85 में गया… 15 दिन वहां रहा।‘

अचानक तब अमरकांतजी की बीमारी के एक खास दौर की यादें दौड़ी चली आई हैं- ‘सोवियत लैंड से आकर 1986-87 में हम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बेहद दर्द रहता था। रीढ़ की टी.बी. बताई थी। ये छोटेवाले पुत्र थे साथ। हां, दूसरे पुत्र अरुण वद़र्धन- ‘नवभारत’ में हैं, उनकी पत्नी कुमुद शर्मा यूनीवर्सिटी में पढ़ाती हैं। साहित्यकारों ने तो तब जो किया सो किया ही, पर दफ्तर, पत्रकारों और सरकार ने भी सपोर्ट किया। पत्रकारों के सहयोग का ही परिणाम था कि तब के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह घर देखने आए और पचास हजार का अनुदान घोषित किया। डॉक्टर हर सप्ताह आते थे, पर एक पैसा फीस का नहीं लिया। बाद में प्रेस मालिक ने भी किया। करीब डेढ़ साल तक मैं माया प्रेस नहीं गया, पर तनख्वाह तो मिलती ही रही। इंक्रीमेंट भी देते रहे, और भी हेल्प की। मैं एक तरह से तब सारे समाज से कटा हुआ था, पर बहुत मदद मिली। इससे आपको मॉरल ताकत मिलती है और फिर ‘88 के अंत में मैंने री-ज्वाइन किया अपनी ड्यूटी पर। यस, ऐज ज्वाइंट एडीटर…।‘

चाय पीते-पीते बताया जा रहा था- ‘चाय बस सवेरे और शाम को। सुबह दो कप, शाम को एक। कोई आ जाए तो बीच में पी लेते हैं, वैसे नहीं। अब देखिए, आपके साथ हम पी ही रहे हैं। नहीं, टहलने नहीं जा पते। पैर में तकलीफ है… ट्रैफिक सेंस नहीं है लोगों में… कमरे में टहल लेते हैं बस।‘

चाय के बाद सिलसिला फिर से शुरू करने के लिए मैंने पूछा था- कुछ अन्य रचनाओं और रचनाकारों ने भी तो आपके लेखन को प्रभावित किया होगा? बिना एक पल की देर लगाए वे कहने लगे, ‘प्रभाव तो पड़ता है। प्रेमचंद को तो बाद में पढ़ा। शरत को पढ़ा, उनका प्रभाव रहा। करुणा-दया ने प्रभावित किया। उनकी कई रचनाएं पढ़ीं। रवींद्रनाथ टैगोर की छोटी-छोटी कहानियां बहुत पसंद आईं। जैसे- ‘वापसी’, ‘काबुलीवाला’। ‘वापसी’ बहुत अच्छी कहानी है। ‘कफन’, ‘पूस की रात’, और अन्य बहुत-सी मारवेलस कहानियां हैं प्रेमंचद की। जैनेंद्र का ‘त्यागपत्र’ जब पढ़ा तो बहुत अच्छा प्रभाव हुआ। यंगमेंस का जो प्रभाव होता है, वह ‘इफ एंड बट्स’ में नहीं होता। ‘शेखर एक जीवनी’ का अच्छा असर पड़ा। ‘संन्यासी’ को पढ़ा। एक हसरत होती थी कि हम भी ऐसा लिखें। यह भावना आती कि मैं ऐसा लिख सकता। सोचता था कि मैं स्थूल नहीं, सूक्ष्म लिखूंगा। यशपालजी की भी कुछ कहानियां थीं, लेकिन उनमें से कुछ शॉक भी करती हैं। ‘ज्ञानदान’ है जैसे। वैचारिक है वो, पर… ये सब शुरुआती है। फिर अचानक बाहर की कहानियां पढ़ने को मिलीं। गोर्की, टॉल्सटॉय, दोस्तोवस्की आदि को पढ़ा। ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ा। अच्छा लगा- जीवन को समझने की समझ मिली। चेखव की कहानियां थोड़ा बाद में मिलीं। बलिया में था, तब जो मिल गया सो ठीक। ‘सैनिक’ में जाने के बाद कुछ मिला, कुछ खरीदा; पर वो शुरुआती दौर था। उम्र के अनुसार चीजें बदलती जाती हैं। जिस पीरियड में यह सब पढ़ा, हम आंदोलन में बिजी थे। फुरसत नहीं मिलती थी, घूमते-दौड़ते पढ़ते थे। उस समय के इंप्रेशंस अलग तरह के हैं- ताजगी भरे। अपने को उसी तरह का हीरो समझने की भावना। हर पीरियड का अलग इंप्रेशन। आज मैं जो पढ़ता हूं, उसी तरह की चीजें चाहिए…।‘

अब चर्चा के केंद्र में नई कहानी, उसको लेकर गांव-शहर को केंद्र में रखकर चली-चलाई गई बहसें और उस दौर की कहानियों का प्रदेय जैसे कुछ विषय आते जा रहे थे- ‘उस दौर में गांव-शहर की कहानियों का विवाद चला था। उसी दौर में मार्कंडेय, रेणु, शिवप्रसाद सिंह, केशव प्रसाद वर्मा, भैरवप्रसाद गुप्त आदि गांव के कहानीकार थे। ये सब गांव के लोग थे। मेरी समझ से यह बहस वर्चस्व की थी। यह तो है ही कि गांव एक व्यापक चीज है, हिंदुस्तान का रिप्रेजेंटेटिव है। अधिसंख्य जनता गांव में रहती है। इसलिए उस पर लिखना क्रेडिट की बात तो है ही। आप शहर की बात करें तो वहां ऊपर का चिकनापन है, भीतर छल है। आज तो और भी ज्यादा है। तो गांव पर अच्छा लिखना- जैसे प्रेमचंद, रेणु ने लिखा, क्रेडिट की बात तो है ही। शहर की नई संवेदना, नई चीजों और वहां के नए मूल्यों को केंद्र बनाकर राकेश, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव आदि ने लिखा। ‘मैला आंचल’ के साथ आंचलिकता की भी बात चली। मटियानीजी भी अंचल की बात करने लगे। तब इन सब में यह चला कि नया कौन है? नवीनता कहां है? गांव को नया नहीं माना गया, जबकि शहर का यथार्थ, संवेदना, शिल्प- सबकुछ नया माना गया। राकेश अपनी बातों को इसी तरह प्रस्तुत करते थे। खूब बहसें चलीं। यहां इलाहाबाद में भी- ‘परिमल’ में नहीं, पर लेखकों में चलीं। उन बहसों में ही यह तथ्य उभरकर आया कि ‘परिंदे’ नई कहानी के दौर की पहली कहानी है। इसे लेकर खूब विवाद चला। राकेश ने कहा कि ‘परिंदें’ भावुकता से भरी कहानी है…। नहीं, इन बहसों में हम कभी नहीं पड़े, न कभी लिखा। बाद में लिखा। ‘तद्भव’  के लेख को आप पढ़ें। मैं तो पहले से भी और अब भी कहता हूं कि निर्मल बहुत महत्वपूर्ण कहानीकार हैं- पर यह कहना कि वह पहली कहानी है अथवा कोई और या वो- तो ये कोई खास चीज नहीं है। गांव के तो और भी लेखक थे, पर शहरवाले ये तीन- राकेश, कमलेश्‍वर, यादव। भारती भी कुछ दिनों को उनके साथ आ गए थे। बाद में उन्होंने कुछ अच्छी कहानियां लिखीं, पर वे बहस में नहीं थे। और यहां इस प्र.ले. संघ में तो आलोचना ही होती थी उनकी।… मैला आंचल… हां, वो संस्करण जो रेणु ने छापा था, ‘57-58 में पढ़ होगा। पता नहीं किसने दिया, कैसे मिला- बलिया में पढ़ा था। पढ़कर अभिभूत हो गया था तब।

‘क्यों नहीं? उस दौर में परिवर्तन हुए- नवलेखन में तो हुए ही। आजादी के बाद के लेखन में चीजें पहले की तरह तो नहीं ही रहीं। वह जो बौद्धकता थी- चाहे वह क्रांतिकारी बौद्धिकता हो या कलावादी अथवा फ्रायडीयन- वे लोग अपनी चीजों को जीवन से साबित नहीं कर पाए, इसलिए दार्शनिकता से करते थे। हां, जैसे ‘दादा कामरेड’ या ‘सुनीता’ है- ये सब जीवन का टुकड़ा मालूम नहीं होता, बस थोपा जैसा कुछ अनुभव होता है। प्रगतिशील क्रांतिकारिता भी बौद्धिक अधिक थी। तब मध्य वर्गीय बौद्धिकता थी। जीवन को करीब से छूना, स्पर्श करना, विश्‍लेषण करना नहीं था। ये नहीं कि पहली सारी चीजें लुप्त हो गईं, पर उस रूप में नहीं रहीं। आजादी से पहले के जो साहित्यकार थे, वे राष्ट्रीय महत्व या प्राचीन गौरव का बयान करते थे। उसमें भावुकता-बौद्धिकता का होना जरूरी था। यह चेतना छायावाद से आई। साहित्य के विकास का एक पीरियड होता है। ‘दुलाईवाली’ कब लिखी गई? जब लिखी गई तब कच्ची थी। फिर धीरे-धीरे वह पकती गई। गुलामी के काल में जो भावुकता थी, प्रेमचंद ने- शुरू में नहीं, बाद में- उसे बचाया। लेखक और समय भी प्रगति तो करता ही है। तो तब जो नवलेखन था, वह बदला हुआ था। राकेश ने अगर ‘मलबे का मालिक’ लिखी तो वह पहले नहीं, आजदी के बाद ही लिखी जा सकती थी। घटनाएं आपको परिपक्व करती हैं। उस स्थिति में आप घटना पर परिपक्व ढंग से सोचते हैं। तब एक तो यह हुआ कि आप गुलामी से मुक्त हुए। दूसरा यह कि जिन्हें हम हीरो समझते थे, वे वैसे सिद्ध नहीं हुए। यहां भी आप परिपक्व होते हैं। ऐसे में दो ही चीजें हैं- या तो हम उनके पीछे चलें या फिर ठीक सोचें तो उन्हें चेक करें। साहित्यकार संवेदनात्मक रूप से चीजों को पेश करता है, वह राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं करता- कर नहीं सकता। वैसे भी रचना पहुंचती ही कहां है जनता तक! कुछ खास लोग ही पढ़ते हैं उन्हें। परिवर्तन तो राजनीति से होता है। रचनाएं तो चलती रहती हैं, संवेदनाओं का निर्माण-परिष्कार करती रहती हैं। काल बीत जाता है, समय बीत जाता है, लोग रचनाओं से विचार- आधुनिक विचार भी- प्राप्त करते रहते हैं। बिलकुल- जैसे कालिदास, तुलसी, शेक्सपियर की रचनाएं चल रही हैं आज तक।

‘तो- तब परिवर्तन तो हुआ। भाषा, शिल्प में ढीलापन और भावुकता गायब हुई। जीवन को देखने की दृष्टि भी बदलती। नहीं, नई कहानी नाम से कोई कहानी शुरू नहीं हुई। तब शहर, कस्बे या गांव की जो भी कहानी हुई, उसे नई कहानी नाम दे दिया गया। जैसे नई कविता की शुरुआत प्रयोगवाद से हुई, वैसा कुछ कहनी के साथ नहीं था। कविता, कला के जो पश्चिमी आंदोलन थे, उनका अधिकतर प्रभाव कविता पर पड़ा। कहानी पर वैसा प्रभाव नहीं था। बाद में बहसें जरूर हुईं। पहले की अपेक्षा रचनाओं में जो ताजगी, नयापन, नया परिवर्तन आप देखते हैं, उस आधार पर आप यह नाम दे भी सकते हैं। तब हुए नवलेखन की कुछ चीजों को लेकर आप यह कह सकते हैं। पर तब बहस इस दिशा में चल पड़ी कि कौन पहली? तो वह गलत दिशा में चली गई। उसके बाद ‘60 की पीढ़ी- और फिर पता नहीं किस-किस नाम से साहित्य में यह सब चलता रहता है।

‘नहीं, मुझे ऐसा तो कुछ नहीं लगता था तब, लगने का कोई सवाल नहीं। हमारे भी विचार हैं और आपके भी हैं। क्या होता है इससे कि हमें नया या कोई अन्य प्रकार का कहानीकार कह दिया? हम उसमें भी खुश। रचनाकार को हम ऐसे किसी खंभे से बांधकर नहीं रख सकते- और न ही इस तरह बांध देना चाहिए उसे। मैंने न कभी क्लेम किया, न कहा कि मैं नया कहानीकार हूं। रचना या रचनाकार को ऐसे किसी एक पीरियड में सीमित कर देना उचित नहीं। ऐसा किया तो अंत तक उसके बारे में आप वही कहते रहेंगे।‘

स्वर में आवेश युक्त उत्तेजना आ मिली- ‘ऐतिहासिक रूप से ठीक था यह कहना कि नई कहानी का यह काल और लेखक थे…पर…महीप सिंह क्या अंत तक संचेतनावाले ही थे या फिर समांतर…? आदमी एक पीरियड में रहता है, पर विकास भी करता है। किसी एक परंपरा के हैं तो विकास भी करता है। प्रेमचंद की परंपरा का होने का मतलब प्रेमचंद का पिछलगुआ होना नहीं है। जैनेंद्र प्रेमचंद के उत्तराधिकारी हैं- यह कहे जाने का आखिर अर्थ क्या निकलते हैं आप?  आप बताएं, रामविलास जी प्रयोगवादी तार सप्तक के कवि थे- तो उन्हें नई कविता का कवि नहीं मान सकते…? एक जमाने में कुंवर नारायण बीटनिक आंदोलन से बहुत प्रभावित थे, बाद में उन्होंने कहा कि मैं कबीर से प्रभावित हूं। आप बताइए कि किस कुंवर नारायण को मानें? सर्वेश्‍वर दिल्ली जाने के बाद कितने परिवर्तित हुए? और रघुवीर सहाय का सोचें- किसे मानें हम? मैंने एक कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ लिखी और एक ‘हत्यारे’ – दोनों का फर्क देखें। लेखक एक पीरियड में रहता भी है और उसका अतिक्रमण भी करता है। पीरियड की एक सीमा भी होती है और लेखक उसे तोड़ता भी है। तो संवदेनाओं में चेंज होता रहता है- सब में होता है। जागरूक है तो चेंज होगा ही। समय बहुत महत्वपूर्ण चीज है। वह चीजों को, व्यक्तियों को- सबको बदल देता है। बड़े-बड़े तानाशाहों, शासकों, लेखकों सबको धूल में मिला देता है। उनका कृतित्व ही रह जाता है। आपको पता है- तब यह खूब कहा गया कि कहानी मर गई, विश्‍व भर में इसकी संभवानाएं समाप्त। उस तरह की संभावना में नई कहानी के आंदोलन ने वह जमीन तोड़ी, हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाया। कोई आज गुलेरीजी, अज्ञेयजी या नवीनजी का ही छाता लगाकर चले तो क्या यह ठीक है? ठीक हैं, वे सब अपने समय के महत्वपूर्ण लोग थे, पर आज तो स्थितियां बदल गई हैं। लोग बदलते हैं, वेशभूषा में बदलाव आते हैं, अविष्कार होते हैं। हर युग में चीजें बदलती रहती हैं।‘

कुछ क्षण को आए उस आवेश ने उनके चेहरे की रंगत में थोड़ा सा बदलाव ला दिया। उस आवेश से मुक्ति पाने में भी उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। एक जगह चाचाजी का जिक्र करते-करते यकायक रुके- जैसे कोई उल्लसित कर देनेवाली बात याद आई है। लंबी सी हंसी के साथ बोले-  ‘पता नहीं, तब आप पैदा भी हुए थे या नहीं- हम अलीगढ़ गए थे। हां, नौकरी के लिए। वहां एक मिल थी कपड़े की। वहां के तांगे, सुबह आठ से शाम छह तक की वह शिफ्ट, एक-एक महीने बाद शिफ्ट के परिवर्तन की वह सूचना। अच्छा सा एक मेस था। खाना भी अच्छा मिलता था वहां- पर मन नहीं लगा, तीन दिन में चले आए।‘

खाना मेज पर लग चुका है। उनके नाती ने गिलास-प्लेट्स लाने में खूब भाग-दौड़ के साथ अपनी मम्मी का सहयोग किया है। हम लोगों ने खाना शुरू कर दिया है। अब भी वे अनथके, अनवरत कुछ-न-कुछ बताते-सुनाते जा रहे हैं- ‘हां, हम खाना यूं ही हाथ में प्लेट लेकर खाते हैं। तभी से, जब से रीढ़ की हड्डी की ये प्राब्लम हुई।‘ मेरे खाने पर पूरा ध्‍यान है उन्हें- ‘देखो बेटा, मेरा अनुमान सही निकला… चावल उतने चाव से नहीं खाएंगे ये।… नहीं, आप और कुछ लीजिए…संकोच मत कीजिए।…नहीं हम दोपहर को नहीं सोते, शाम को ही लेटते हैं। दोपहर में कभी-कभी ही लेटते हैं।‘

खाने के बाद चर्चा उनके संपादन काल के कुछ खट्टे-मीठ अनुभवों से शुरू हुई। उस चर्चा के बीच ही मैंने अमरकांतजी के शांत-चुप रहने के स्वभाव के बारे में एक-दो प्रश्‍न किए थे। साथ ही साहित्यकारों के बीच चलते रहने वाले आरोप-प्रत्यारोपों, उठा-पटक, खींच-तान आदि के कारणों-परिणामों के बारे में उनकी राय जाननी चाही थी। बड़े सरल-निर्मल भाव से वे कह रहे थे- ‘स्वभाव का सवाल नहीं- पर ऐसा भी नहीं कि आप छेड़ेंगे तो हम जवाब नहीं देंगे। वैसे यह देखिए कि लड़ाइयां कहां होती हैं- दो महात्माओं में, दो औरतों में, दो कुत्तों में, दो विद्वानों में- यानी समानताओं में।‘ कहकर देर तक हंसे हैं। फिर गंभीर होकर कहा जा रहा है- ‘हम आज के थोड़े ही हैं- 1925 का जन्म है। पुराने हुए हम लोग- जबरदस्ती हैं अब यहां। हम चाहते हैं कि लेखक बिरादरी में उदारता हो। कभी-कभी लोग चीजों को समझने में अन्याय कर देते हैं। हम जानते हैं कि आप क्या हैं, पर हम चाहते हैं कि आप भी तो समझें कि हम क्या हैं? जनतांत्रिकता, संवाद, विचार की जो बात है, वह कम अहम नहीं है। मित्र रोज बदलने की चीज नहीं है। किसी कारण उनके विचार बदल भी गए तो उन्हें बदल नहीं देना हमें। विचार तो जमाने के साथ बदल भी जाते हैं, देखने का दृष्टिïकोण भी बदल जाता है। फिर भी यह नहीं कि जमाना बदला तो मित्र भी बदल दें हम। आप मुझे देखिए- मैं मुख्य रूप से राजनीति से होकर आया। राष्ट्रीय आंदोलन से होकर निकले हैं, इसलिए गांधी, नेहरू, लोहिया, जेपी, नरेंद्र देव जैसे लोगों का बहुत प्रभाव रहा। अगर कोई मुझे अपनी धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता समझाना चाहे तो मैं नहीं समझूंगा। मैं वह जानता हूं, मैंने वह सब तब वहां देखा है। मैं एंटी हिंदू, मुस्लिम या सिख हो जाऊं, यह नहीं होगा। ऐसा कहने-समझने वाले को समझना चाहिए। कोई हमें समझाए कि कायस्थ हो तो कायस्थवाद पर चलो, तो यह संभव नहीं है। आप हमसे ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं?  हम यदि आपका सम्मान करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह आपके राजनीतिक विचार का सम्मान है। हमारा जुड़ाव इस राष्ट्रीय से, जनता से है। हम किसी का अपमान नहीं करते, दूसरों के गुणों का सम्मान करते हैं। नहीं, अब नहीं राजनीति में। तब सक्रिय राजनीति में था। खद्दर पहनता था, आंदोलनों में शामिल रहा। इस पर गर्व नहीं कर रहा हूं। तीसमारी नहीं है यह, फर्ज था। उस समय बहुत से नौजवान इस रास्ते पर थे। जो हो सका, बहुत था। हां, जब आगरे में था, तब राजनीति से अलग हो गया था। हां, कारण था उसका।… हम साहित्य की राजनीति में कितना, किस तरह, किसलिए जाएं? पुरस्कार के लिए, पद या सम्मान के लिए? आप हमसे क्या आशा करते हैं? इस उम्र में भी हम यही तमन्ना रखते हैं कि लिखें। यह गर्वोक्ति नहीं है कि हमने धीरे-धीरे ही सही, पर लिखा। ‘42 के आंदोलन पर लिखने की पहले भी तमन्ना थी, पर फुरसत नहीं मिली। अब लिखा- देखिए, इतना मोटा। उन दिनों पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं। पैरेलैटिक हो गई थीं। आपने पढ़ा है? नहीं पढ़ा तो कभी छू तो लीजिए उसे।… अभी सोचा है, एक और बड़े उपन्यास पर लिखें। इच्छा रहती है कि लिखूं। उस बीमारी की अवस्था में भी तय किया था कि सबको लिखूं मैं। सोचता हूं, जो भी कहे, सबको लिखूं। कोशिश करता हूं। ‘इन्हीं हथियारों से’ जब लिखा तब से बेहतर हो गए हैं हम। अब बैठकर भी लिख सकते हैं।‘

व्यक्ति के रूप में आज के हालात पर आप कैसा महसूस करते हैं? प्रश्न करते समय कल्पना नहीं की थी कि इस एक सवाल के उत्तर में इतने मनो-मलाल की बातों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। अन्य अनेक प्रश्नों के जवाबों को सम्माहित करते हुए अमरकांतजी देर तक लगातार बोलते जा रहे थे-  ‘व्यक्ति के स्तर पर मेरे सोचने-महसूस करने का क्या मतलब है आपका? व्यक्ति से क्या मतलब है? राष्ट्रीय की बात करेंगे आप तो व्यक्ति का अर्थ क्या है? सदियों के इतिहास में मानव ने जो प्रगति की है- उसके सारे संस्कार किसी-न-किसी रूप में आप में हैं। आप कहें कि आधुनिक हैं तो आधुनिक कोई हवा में लटकी चीज नहीं है। जो है, सब जमीन पर है। मूल्य-विचार जो भी हैं- आपकी वह जमीन है, आप उस पर खड़े हैं। आप उसमें परिवर्तन भी करना चाहते हैं। मेरी ही नहीं, हर व्यक्ति की करीब-करीब इसी प्रकार की एक स्थिति है। कभी ऐसा भी था कि इनसान नंगा रहता था, उसके पास भाषा नहीं थी, न कोई मूल्य ही था। यहां तक कि आज के सेंस में जो सामाजिकता है, वह भी नहीं थी। तो मानव-मूल्य भी एक्वायर्ड हैं, उन्हें आदमी ने अर्जित किया है। तो आज जो हैं… इतनी यात्रा करके आए हैं। इसमें बहुत सारी चीजें आती हैं। एक जमाने में ये बहुत सारे धर्म यहां नहीं थे। अनीश्वरवाद भी फैला था। मातृसत्तात्मक समाज था, जिसमें स्त्री प्रमुख थी। तो आप देखिए कि इस यात्रा में, यहां तक आने में कितनी जय-परायज भी हैं। बाद में होता यह है कि कुछ मूल्य बचे रह जाते हैं, कुछ व्यर्थ हो जाते हैं। बचे रह गए मूल्यों को लेकर आप प्रगति की यात्रा आगे बढ़ाते हैं। इतिहास के बहुत से अंश किसे मालूम हैं? आज की स्थिति में हम जहां पहुंच रहे हैं- तो केवल हमारा सवाल नहीं है, औरों का भी, सभी का है कि पूरे विश्व के बारे में आप क्या और कैसे सोचते हैं। आप केवल व्यक्ति नहीं हैं, केवल सीमित नहीं हैं। यदि लेखक कहता है कि हम व्यक्तिवादी हैं…व्यक्ति स्वातंत्र्य… मतलब क्या है इसका? व्यक्ति की भी परिभाषाएं परिवर्तित हुईं। पूंजीवाद आया तो व्यक्ति आया। पहले कहा गया कि व्यक्ति धर्म था, सामंत था। पर जब पूंजीवाद आया तो कारखानेवाला सामंत से भी अधिक शक्तिशाली हो गया। तब व्यक्ति स्वातंत्र्य का दर्शन आया। कंसेप्ट यह था कि शासन व्यक्ति के बारे मे कम-से-कम हस्तक्षेप करे। धीरे-धीरे इसकी भी सीमाएं स्पष्ट होने लगीं। फिर वह परिभाषित होने लगा ओर साम्यवाद तक आया। यह क्या ठीक है कि विचारधारा ही लेखन का पर्याय हो जाए? ये तो सभी मानने लगे हैं कि विचारधारा लेखन का पर्याय नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन ने यह दिखाया कि स्वार्थ, सांप्रदायिकता आदि से विघटन होता है, जबकि मेल-मिलाप से समाज जुड़ता है। सोचनेवाले तो आप ही हैं- आप चाहें तो समाज को विघटित कर दें या आप कोशिश करें कि लोग मिल-जुलकर रहें।

‘राजनीति का अर्थ हम यही जानते हैं कि सेवा, जनता की भागीदारी, स्वावलंबन, स्वदेशी, शक्तिशाली बनना है, पर शक्ति दूसरों को बांटना है। शक्ति की सार्थकता उसके व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उपयोग में नहीं है। उसका लाभ दूसरों को देने में है। देना, बांटना, उदारता- यही शक्ति की सार्थकता है। स्वयं को लाभ पहुंचाने पर पर उसका मतलब हो जाता है तानाशाही। शक्ति के लिए आप सिद्धांत बदल दीजिए- जैसा बहुत लोग करते भी हैं- तब तो बात अलग है, पर आज का आदमी देश और समाज के बारे में जरूर सोचेगा। मैं नहीं सोचता कि कोई आदमी अपने समाज के कटा है। तो अब आप ही बताइएं कि हम व्यक्ति के रूप में क्या सोचें? व्यक्ति अकेला नहीं चल सकता। वन में तपस्या करता है, तब भी समाज के बारे सोचता है। यदि आप समाज-विचार की कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते तो फिर सबसे प्यार, यश, प्रतिष्ठा क्यों चाहते हैं? लेखन में इन्हीं चीजों पर विचार करने के बाद ही तो लिखते हैं। इन चीजों से टकराहट होगी ही। उसका आपसे, आपके मित्रों से मतलब भी होगा ही। लेखक जो भी लिखता है, वह उसकी क्षमता, सामर्थ्‍य, उसकी दृष्टि आदि चीजों पर ही निर्भर करता है। यदि वह सामाजिक सच्चाइयों का सामना नहीं करता तो उसके सामने कठिनाइयां तो आएंगी ही। जब वह व्यक्ति के रूप में भी सोचता है, तब भी, मैं नहीं सोचता, कि वह कटे रूप में सोचता है। उसके साथ हमेशा देश, समाज सब है। वह स्वीकार न भी करे तब भी उसके साथ बहुत से संस्कार, विचार, अनुभव हैं। उनसे वह गुजरा है। उसे वे सताते भी हैं। भावनाओं, संवेदनाओं और भाषा के द्वारा जब लेखक अपने अनुभवों को पेश करता है, तब वह इतना सरल काम नहीं है। व्यक्ति की तरह समाज में भी अंतर्विरोध होते हैं। व्यक्ति यदि कुछ बनना चाहता है तो उसे अंदर की बहुत सी प्रवृत्तियों को अवरोध-विरोध करना पड़ता है, तब वह बनेगा। यदि वह कुछ समझना चाहता है, तब भी यही होता है। समाज में अशिक्षा, पिछड़ापन जैसे न जाने कितने अंतर्विरोध हैं। अंतर्विरोध के बीच कैसे रास्ता बनाया जाए, यह समस्या व्यक्ति, लेखक, राजनीतिज्ञ, समाज-  सभी के समाने रहती है। अंतर्विरोध को जाने-समझे बिना आप रचना में वह चीज उभार ही नहीं सकते, जो उभरनी चाहिए। रचना सपाट को जाएगी।

भ्रष्‍ट और अवमूल्यन के इस दौर में साहित्य तथा परिवर्तन को लेकर आप किस तरह सोचते हैं?

‘राजनीति में भ्रष्टचार आदि…। नागरिक के रूप में इन चीजों को लेकर हम भी दुखी होते हैं। बहुत सी चीजों में खुद भी दबे हैं, कुछ उन्हीं चीजों से गुजरते भी हैं, पर इसका सुधार राजनीति ही कर सकती है। आज के समय में वही प्रभावी है। पर हर तरह की राजनीति थोडे ही कर पाएगी यह सब। जब गांधी, लेनिन, माओ जैसे चिंतक, सोचने-विचारनेवाले लोग होते है, तब परिवर्तन होते हैं। परिवर्तन आपके चाहने या भाषण देने से तो नहीं होगा। उसके लिए भारी संगठन करना पड़ता है, समय की सच्चाइयों को जान-समझकर देखना पड़ता है कि वह सब कैसे होगा। यह सब बिना त्याग के तो होगा नहीं। आपने देखा है कि नहीं, आजकल नेता मोटे होते जा रहे हैं। इसलिए कि सक्रियता नहीं है। मोटर है, गोश्त है, शराब है- पर उस तरह की सक्रियता नहीं है नहीं है तो नहीं है। यह हर पार्टी के साथ है। पहलेवाला जमाना अब नहीं है। कोई पार्टी उस तरह अब ठीक नहीं है। लेखक के नाते…? बदलाव? हम एक बात कहते हैं कि हम परिवर्तन थोड़े ही कर सकते हैं। गाली देकर या आलोचना करके हम क्या कर लेंगे? लेखक जो लिखता है उसका तत्काल तो असर पड़ता नहीं है। वह तो संवेदनाएं-भावनाएं बदलने-बनाने का काम करता है। कबीर, तुलसी जैसे कुछ लोग बच जाते हैं, बाद में कुछ रचनाएं बच जाती हैं। समय लगता है। साहित्य में मनुष्य की तुच्छताएं, ग्रेटनेस, जय-पराजय, उसके विचारों, भावनाओं, संस्कृति आदि सारी चीजों से मतलब रहता है। अगर आपने अपने समय के मुनष्य का चित्रण कर दिया तो वह चित्रण जीवित रहता है। जो चीजें दोषों, विकृतियों, गिरावटों के बीच मनुष्य को आगे बढ़ाने, मिलाने, संषर्घ करने का महत्व देती है, बढ़ाती है, वे चीजें हांट करती हैं, आगे चलती हैं ओर हर युग में प्रासंगिक भी होती हैं। महात्माजी ने क्या किया- पचपन करोड़ का पाकिस्तान का जो शेयर था, वह दिलवा दिया, आंदोलन किया- बस यही तो… और उनकी हत्या कर दी गई। इतनी बड़ी ऐतिहासिक शक्ति, मानवता का प्रतिरूप, एक महामानव। चाहा कि लोग एक साथ रहें, लड़कर नष्ट न हो जाएं। देश की एकता के लिए जान दी। इस तरह की कितनी घटनाएं हैं दुनिया में? तब बताइए कि व्यक्ति के रूप में हम क्या सोचें?… हम सोचते हैं कि लिखकर बहुत तीर मार लिया, पर स्थिति है असंख्य लोग अशिक्षित हैं। प्रेमचंद की रचनाएं उनके जमाने में या आज भी कितने किसानों ने पढ़ी होंगी? ड्रामा करने को दिखा दें, पर पढ़ी कितनों ने हैं? परिवर्तन एक लंबी प्रक्रिया है, चलती रहती है।‘

लगा कि बहुत दिनों का दबा-भरा कुछ बाहर आ गया है एक साथ। बोझिल-से हो चले उन कुछ पलों को खिसकाने-हटाने के इरादे से ही मैंने अमरकांतजी से उनके सर्वाधिक महत्वपूर्ण संबंध और बेहतरीन-सी उनकी किसी पसंद के बारे में जानना चाहा था- ‘ऐसा कोई एकाकी संबंध नहीं है। मुझे मित्र पसंद हैं, मित्रता पसंद है- एक जमाने में हमारे बहुत मित्र थे। नहीं, कोई विशेष किस्म जरूरी नहीं। साधारण आदमी भी हमारे मित्र हैं। पसंद करते हैं, बहुत पसंद करते हैं- क्या मतलब? मां, पिता, भाई को कह सकते हैं- पर पसंद तो अलगाव का संबंध है। यह कहकर आप अपने को ऊंचाई दे रहे हैं। इससे कोई चीज व्यक्त नहीं होती। पंसद करना व्यावहारिक शब्द हैं, उसमें आदान-प्रदान है। बहुत हुआ तो आप ऐसा कुछ, कुछ समय के लिए जवानी में कर लेंगे। एक औरत को पसंद कर लेंगे, पर वह सब स्थायी नहीं होता। वे जीवन फानी है- जो जवानी में पसंद, वो बुढ़ापे में विकृति। भाई से जुड़ाव था। राजनीति की बात करें तो बड़े उद्देश्य के लिए जनसेवा, लोगों के सुख-दुख से जुडऩा अच्छा लगता था। हमारे पसंद करने का क्या मतलब? कोई विद्वान है, उसे हम पसंद करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि हम उसका, उसके विचारों को विरोध नहीं कर सकते। राजेंद्र दोस्त रहे, पर उनके दोषों को हम क्यों स्वीकार करें? रिश्ता एकांगी ही हो, यह संभव नहीं। उसे प्यार भी नहीं कह सकते। जैसे गांधी का था कि ‘हर अच्छा सिद्धांत बिना व्यवहार के कीड़ा लगा मीठा फल है।‘ आप में कार्य रूप में परिणत करने की कला यदि नहीं है तो स्‍थायित्‍व संभव नहीं। आप किसी को पसंद कर लें, प्यार कर लें, एक समय तक रद कर लें- सवाल यह है कि वह कसौटी पर कितना टिक सकता है?…जीवन का यह जो खेल है- उसमें पसंद शब्द द्वारा ही यदि आप जानना चाहें तो मुश्किल है। वैसे यह कि मुझे हरी पत्ती पंसद है… सूर्योदय…इनका रंग…सबकुछ बदल जाता है, उसकी परिभाषाएं बदलती रहती हैं। आप यदि जागरूक हैं तो रिश्ते की वास्तविकता को समझते हैं। शुरू में हर रिश्ता अच्छा लगता है। पर इसका कुछ अर्थ नहीं। आपको बहुत सी गलत बातें कोई क्यों पसंद करे? अब जैसे माता है- उसने इतना दिया है कि आप उसका दूसरा रूप सोच ही नहीं सकते। भले ही आज लोग मां की हत्या भी कर देते हैं- फिर भी उसका स्थान कोई ले नहीं सकता। उसको पसंद करना क्या है? हलका शब्द है। फूल पंसद है, पर उसके लिए जान तो नहीं दे सकते। रिश्तों में प्यार …पसंद? उसकी परीक्षा संकट में होती है। यहां यह एक व्यावहारिक पक्ष है।‘

5.45 हो चले थे। हिचकती-सी एक दृष्टि से मैंने अमरकांतजी के चेहरे पर थकान के चिह्न ढूंढने चाहे थे। मैं कुछ कहूं, उससे पहले ही सुनाई दिया- ‘पूछिए आप, जो पूछना है। आपको परेशान करनेवाली जो बात हो, पूछ लीजिए। लिबर्टी है आपको, कुछ भी पूछ लीजिए।‘ एकदम से कुछ नहीं सूझा तो मैंने उनसे उनके बचपन की कुछ शरारतों को याद करने का आग्रह किया। शरारत की बात पर पहले खूब हंसे, फिर बोले, ‘हां, बचपन में मैं शरारती था।‘ अचानक कुछ ध्यान आया है- रुके हैं। अंदर आवाज लगाकर नाती से टीवी पर आ रहे क्रिकेट मैच का स्कोर के बारे में जानना चाहा है। मैच की बात खत्म हुई तो मैंने खेलों के प्रति लगाव के बारे में भी जानने की चाहत व्यक्त की। अब क्रिकेट मैच से उन्होंने स्वयं को अलग कर लिया है- ‘खेलकूद से बहुत लगाव था। इंटर मे हॉकी, फुटबाल, वॉलीबॉल की तो कॉलेज टीम में भी था। ये दो खराब आदतें थीं बचपन में- जैसे लंगी लगा देना… हां, छोटे भाई या नौकर को लगा देते थे…और नाक मल देना। पता नहीं क्या लगता था कि छोटे भाइयों की नाक मल देता था। शरारत बहुत सी हैं, पर ये दो जान लें आप। हां, मार भी खाता था मैं। पिताजी मारते नहीं थे। मां मारती थीं। उनका मारना मालूम नहीं होता था। खेल- ऐसा शौक कि यूनीवर्सिटी में या शहर में कोई भी टूर्नामेंट होता, मैं देखने जरूर जाता था। नहीं, अब नहीं जा पाऊंगा।‘ एकदम खुश, कुछ उत्तेजित से दिखे हैं- ‘एक बार क्या हुआ कि लूकरगंज में फुटबॉल का टूर्नामेंट था। मैं देखने गया। इंटरवल में देखा कि बगल में रेणुजी भी खड़े हैं…। टेनिस खेला नहीं, पर देखते-देखते चीजें जान गया हूं। क्रिकेट का तो पूछना ही नहीं…। अब आंखें काम नहीं करतीं, सो टीवी पर भी नहीं देखता। पर पहले जब घर में रेडियो भी नहीं आया था तो बाहर खड़े होकर सुनता था। खेल मुझे बहुत पसंद हैं। अखबार का खेल पेज आज भी डिटेल में पढऩा चाहता हूं।…फिल्म? नहीं, अब नहीं देख पाता। एक जमाने में बहुत देखता था। अच्छी फिल्म मिले तो शौक है, पर अब अच्छी फिल्म मिलती नहीं। अंग्रेजी-हिंदी बहुत फिल्में देखीं। जिन दिनों पत्रकार था, जितने चाहे सिनेमा के पास मिल जाते थे। आगरा में यह परंपरा थी सिनेमाघर वाले प्रेस शो करते थे, पत्रकारों को सम्मान से बुलाते थे। आगरा कैंटवाले सिनेमाघर में अंग्रेजी फिल्में लगती थीं। साइकिल पर कभी अकेले, कभी किसी को साथ लेकर देखने पहुंच जाते थे। बहुत सी अच्छी फिल्में वहां देखीं। ठीक है कि आजकल डांस करना ज्यादा सीचा चुके हैं, पर केवल वहीं तो फिल्म नहीं है। फिल्म में तो पूरा जीवन होना चाहिए।‘

वो क्षण, वो घटना जब आप बहुत रोए हों?

पलकें हांफने जितनी तेजी से उठ-गिर रही हैं। उनकी उस तेजी ने जैसे भौंहों के सफेद, घने बालों तक को हिला-कंपा दिया है। अब आंखें बंद हैं- ‘या तो डेथ पर रोता हूं, और तो रोने का जो समय आता है, रो नहीं पाता। पिताजी की डेथ पर था भी नहीं, बाद में गया रो नहीं पाया। माताजी, भाई राधेश्याम, अपनी पत्नी और चाचाजी- इनकी डेथ पर रोया। बहुत रोना क्या होता है? रोया। रोना बहुत आसान नहीं है। रोना वह होता है, जब आप रोक न पाएं । स्वाभाविक ढंग से, जैसे बच्चा रोता है, रुलाई आती है। वैसे तो हर संवेदनशील स्थिति में मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं, पर अचानक यूं ही कि जब आप रोक न सकें। सोचते जाते हैं कि नहीं रोऊंगा, आंसू नहीं आएंगे, पर…। इंदिरा गांधी बहुत साहसी थीं, पर संजय गांधी की मौत पर हमने उनका रोना देखा था। इतनी साहसी महिला भी रोक नहीं पाई…।‘

अपमानित महसूस करने से जुड़ी कोई याद?

‘अरे, यह कहां? यह बहुत नाजूक चीज है। इसका क्या कहूं? अपमानित होने का मतलब- दफ्तर में आप काम कर रहे हैं, आपके बॉस ने डांट दिया- तो यह कोई अपमान नहीं है। आपके काम का हिस्सा है यह। अपमान वहां होता है जहां इनसानियत, या जो तकाजे हैं- रिश्तों का उल्लंघन कर देते हैं। जैसे दोस्त हो कोई, उससे आशा करें हम, वह वो न करे। तब एक अपमान-सा मालूम होता है। या फिर आपका कोई सीनियर या बॉस उस रिश्ते का उल्लंघन करके व्यवहार करे और जहां आप शालीनता, नेचर या अन्य वजह से जवाब भी न दे सकें- तो आप अपमानित महसूस करते हैं। तब प्रतिरोध की भावना भी आ सकती है। अपमान तो मिलते रहते हैं जीवन में। इतने लंबे जीवन में कई अवसर आए होंगे- लेकिन इस पर बहुत एक्सप्लेन नहीं करना चाहता हूं। हां, मित्रों से, बॉस से भी आए हैं। कोई उपेक्षा कर दे, मुझे बुरा नहीं लगता, सबसे आशा भी नहीं करता। सबसे करनी भी नहीं चाहिए। बहुत से किस्से हैं- पर उन्हें मैंने अपमान के रूप में लिया ही नहीं। जीवन जीने के सबके अपने तरीके हैं।‘

खुशी या सम्मान का कोई एक क्षण?

‘अरे यार, आप भी क्या..? सम्मानित- तो क्या- समझ नहीं आता। पुरस्कार वगैरह में क्या सम्मानित होना? मुझे थोड़ा-बहुत सम्मान मिला है- अगर हुआ है तो मैं उसके महत्व को समझता हूं। सम्मान का कोई अर्थ नहीं है। कोई काम पूरा हो जाए तो ठीक लगता है। सम्मान से मैं अभिभूत नहीं होता। लोग स्नेह में आकर सम्मान देते हैं। भले ही रचना पढ़ें या न पढ़ें, पर सम्मान हो गया। एक अनजान जैनुइन पाठक जब आपको ऐसा लिख देता है, जो दूसरे लोग कह-देख न पाए हों तो सम्मान की भावना आती है। हां, एक कहानी है मेरी…वो नाम…भूल रहा हूं- अरे गोलू(नाती), वो संग्रह तो ले आओ। संपूर्ण कहानियों का पहला भाग। हां, याद आ गई- ‘गगन बिहारी’-  बहुत लोग इसे एप्रीशिएट कर पाए या न कर पाए- पर एक पाठक ने जिस तरह एप्रीशिएट किया- तब एक बड़े आह्लाद और सम्मान की भावना पैदा हुई। ये सब तो होता है- क्षणिक कुछ होता है। बुरा नहीं लगता, अच्छा लगता है। पर ऐसा नहीं होता कि मनाने या सेलीब्रेट करने लगें। हमारे जीवन में ऐसे अवसर कम आए हैं।‘

अपनी कुछ खराबियां?

बहुत खराबियां हैं। कमजोरियां हैं, उनसे कॉशस रहता हूं। व्यावहारिक नहीं हूं, यह बड़ी भारी कमी है। उन मोर्च पर काफी पिटा हूं। यह भी कि जिस तरह नियमित ढंग से मेहनत करनी चाहिए, मैं नहीं कर पाता हूं। अपनी फीलिंग दूसरे को कन्वे नहीं कर पता। भीतर-भीतर रह जाता है वह सब। पर इसका दूसरों पर ताप या अभिशाप हो, ऐसा भी नहीं है। शारीरिक रूप से पहले से ही कई कमियां रही हैं। डायवर्टिड एनर्जीज हैं। एकोन्मुख एकाग्रता पूरी तरह बढ़ पाना संभव नहीं हुआ। जो करना चाहता था, उसमें इस चीज ने बाधा पहुंचाई। उसके लिए मैं रेस्पांसिबल हूं, कोई और नहीं। चाहता था, एनर्जी एक ही चीज में लगे, पर नहीं लगी। काल्पनिकता- कल्पना में उडऩा-व्यवहार में कुछ नहीं किया तो आपका डायवर्जन तो हो गया।‘

और आपकी शक्ति, पूंजी, ताकत?

‘ताकत यही रही कि मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया है और एक रास्ते पर लगाने की कोशिश की है। अनियंत्रित भावनाओं को नियंत्रित करने की मैंने कोशिश की है, वही मेरी ताकत है। भावनाएं- दुख की, सुख की या और कैसी भी हों- उनमें जब आप अपने को नियंत्रित करेंगे, तभी कुछ कर सकेंगे। सारे विरोधाभासों के बीच से तटस्थ होकर वास्तविकता को देखने की जब एक आदत पड़ जाएगी, तभी आप कुछ कर पाएंगे। दूसरों के साथ क्या होता है, मैं नहीं जानता, पर मेरे साथ ऐसा है। यह न कर पाता तो मैं उड़ ही गया होता। इसमें मेरी वे बीमारियां, जो बार-बार पटकती रही हैं, उनमें स्वयं को नियंत्रित कर कुछ करते रहना- इसे आप ताकत कह सकते हैं, जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष या जीवन के प्रति आस्था कह सकते हैं। आस्था तभी बची रहती है, जब आप नियंत्रित कर पाते हैं अपनी भावनाओं को। मैं इंडल्ज नहीं कर सकता। मेरे पिताजी की शिक्षा थी कि कभी शराब न पीना- पर मैं भी यह जानता हूं कि मैं अधिक शराब पी नहीं सकता। ऐसे ही अत्यधिक उत्साह, अत्यधिक भावनाएं मुझे असमर्थ बना देती हैं। इसलिए मैं किसी चीज पर रिएक्ट नहीं करता। गलत की बात मैं नहीं कर रहा हूं- वैसे गलत हैं भी नहीं- रिश्ते जो अच्छे हैं, कायम हैं। इसमें उनका भी सहयोग है, पर मैं टूटन, बिखराव एफोर्ड नहीं कर सकता। यह मेरी नेचर में भी नहीं है। आप मुझे बहुत मालामाल कर दें, बहुत प्रताडि़त कर दें- हमारी ताकत भावनाओं में उद्वेलित हो जाने या हर चीज पर परेशाना हो जाने में नहीं है। काम करना है तो आपको तटस्थ बनकर रहना पड़ता है। हमारे लिए यह जरूरी है। इसलिए बहुत सी चीजें हमसे नहीं हो पातीं। जो मिल जाता है, बहुत है। जो कर लेता हूं, उसे उपलब्धि मानता हूं। यह स्थिति आज नहीं, पहले से ही है। पहली कहानी आई, तो खुशी हुई, वास्तविक खुशी हुई। तुरंत बाद में यह सोचा कि एक कहानी लिखकर कितना खुश हो सकते हैं? यह तो अभी पहली कृति है, अभी तो हमें बहुत कुछ करना है। इससे अभी क्या मिला? बस वह भावना स्वत: तिरोहित हो जाती है। यह जान-बूझकर नहीं होता, यह प्रक्रिया चलती रहती है। वह उपलब्धि इसलिए लगती है कि हमने एक चीज लिखी, लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं, आपको, आपकी चीज को लोग समझ रहे हैं- इससे ताकत तो मिलती है। पर उसली ताकत वही है कि आप अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके कितना कुछ कर सकते हैं। हार्ट अटैक हुआ यह भावना थी कि मैं कुछ कर न सका। उस बीमारी से बचने के लिए सदैव प्रयासरत रहा। यह हमारी ताकत बन गई- इसलिए कुछ लिख सका। हालांकि भावनाओं में ताकत होती है, पर भावनाओं से दूर बने रहना मेरी ताकत बन गया। मेल-जोल की बातें, दूसरों के सुख-दुख से जुडऩा, व्यक्तिगत भावनाओं से अलग रहकर दूसरों से, समाज से उन्हें जोड़कर देखना- ये ताकत रही है।‘

अब अगला उपन्यास?

‘उपन्यास- एकदम बहुत जल्दी शुरू करने वाले हैं। वह ‘इन्हीं हथियारों से’ जितना बड़ा तो नहीं होगा। सोचता हूं- डिमाई आकार में, चार सौ पेज तक का होना चाहिए। सोचा कि निजी जीवन के जो अनुभव हैं, उन पर लिखूं। कैसे होगा? सोचता हूं, सारी शक्ति लगा देनी चाहिए। उम्र काफी हो गई है- अब शक्ति, क्षमताएं…। उसकी तस्वीर पूरी साफ है। एक दूसरा उपन्यास पत्रकारिता जीवन पर है। कुछ शुरू किया था। ‘प्रभात खबर’ में ‘खबर का सूरज’ करके उसका एक चैप्टर छपा था- उसे लूंगा। यह दूसरी प्राथमिकता है। ऐसा नहीं है कि उसमें इतिहास ही होगा, उसमें हमारी पत्नी भी रहेंगी, हम होंगे, पर कल्पना भी होगी। पर पहली प्राथमिकता तो वो है- जीवन का निचोड़ होगा उसमें- क्या देना है, क्या कहना है- मोटा खाका तो बना लेते हैं, पर लिखते समय अनेक ऐसी दबी चीजें आती हैं, जो एक्सप्लेनेशन मांगती हैं- तभी देखें कि क्या हो।‘

बाहर-भीतर की रोशनी ने रात होने की सूचना दे दी थी। मैं चलने को हुआ ही था कि सुनाई दिया- ‘एकाध और तीर निकाल लीजिए। कोई प्रश्‍न-जिज्ञासा रह न जाए। आप इतनी दूर से आए हैं।‘ तुरंत क्या पूछूं, कुछ तय नहीं कर पाया। हड़बड़ाहट में यूं ही पूछ लिया- ‘क्या कुछ चीजों-बातों का अफसोस या मलाल भी किया है आपने इन दिनों?’ थोड़ी देर चुप रहे। बोले तो कहा, ‘हाइपोथेटिकल है ये भी।‘  ऐसा कुछ याद न आने की बात की। और फिर जैसे मेरा मन रखने को शुरू किया है- ‘अपने बारे में एक यह कि ऐसा आदमी था जिसकी कल्पनाएं बहुत थीं, पर क्षमताएं भी जानता था। एक जमाने मैं बहुत बड़ा राजनीतिक व्यक्ति बनना चाहता था। दूसरा- संगीतकार बनना चाहता था- सुविधाएं नहीं मिलीं। और लेखक बनने का- वह बाद की भावना है। बाद में इच्छा हुई। जेल से छूटकर आए हमारे अनेक साथियों ने जो रूप दिखाए, उससे राजनीति से वितृष्णा हो गई। बचा साहित्यकार होना- तो शरत की कहानियां पढ़कर कुछ प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया। रोमांटिक लेखन था वह। पच्चीस साल की उम्र में, सन् 1950 के करीब पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ लिख पाया। कांशस रूप से साहित्य की ओर आने का प्रयास किया हो, ऐसा नहीं था।  साहित्य जगत से संपर्क भी नहीं था। वह सब आगरा जाकर हुआ। पत्रकारिता, राजी-रोटी, साहित्य आदि की दृष्टि से आगरा ने बहुत दिया। वह मेरी जिंदगी का महत्वपूर्ण शहर है। और बहुत सी चीजें हैं, जिन्हें नहीं कर पाए- पत्नी की बहत सी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाए। दुख तो नहीं कहूंगा इन्हें- पर ये बातें हैं जो मन में रहती हैं। वो इच्छाएं क्या थीं पत्नी की? ये बताना नहीं चाहता, पर मन में रहती हैं।‘

अपनी पत्‍नी के साथ्‍ा अमरकांत

पत्नी की मृत्यु- उनके न रहने को इन दिनों आप कैसे और कितना याद करते हैं?

दोनों हथेलियां सटकर जुड़ गई हैं। समान नामवाली अंगुलियां एक-दूसरे से लिपट-चिपट गई हैं। बंद आंखें बहुत धीमे-धीमे खुली हैं। सिर ऐसे हिला जैसे इनकार किया हो। फिर ‘नहीं, नहीं’ सुनाई दी। होंठ कई बार भिंचे-फड़कते-से दिखे हैं। लिपटी-सोई-सी अंगुलियों से अबोला कुछ इंगित किया है। और अब मुश्किल से सुनी जा सकनेवाली आवाज में कहना शुरू हुआ है- ‘जीवन चल ही रहा था। पत्नी भी बीमार रही थीं। उस फ्रंट पर भी जीवन गड़बड़ था। बीमारी को उन्होंने हंसते-हंसते, बहुत बाहदुरी से काटा…अब? अब तो उनकी डेथ हो गई…।‘ ऐसी खामोशी, ऐसा सन्नाटा कि सुई के रिगने की आवाज भी सुनी जा सके। सहसा माथे पर से चलकर एक प्रकाश-किरण उनके होंठों पर आकर रुकी- ‘बहुत से कथानक, बहुत सी बातें मुझे उन्हीं से प्राप्त हुईं। आपको बताऊं? जब ‘इन्हीं हथियारों से’ लिखा तो मुझे शहीदों की टोली…’ वाला वह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा था। यह गीत उन दिनों जुलूसों में गाया जाता था। गोलियां भी चलती थीं उन जुलूसों पर, लाठियां भी चलती थीं- ये जिक्र है उसमें। पत्नी डेथ बेड पर थीं। मैंने पूछा- क्या है वह गीत? ‘शहीदों की टोली निकली, सर पर बांधे कफनियां हूं…’ ये पहली लाइन है उसकी। उस समय इतना ही बता पाईं- ‘अंग्रेजों का छक्का छूटा, शेखी मिल गई धूल भाई। शेखी मिल गई धूल… कलेजे बिच गोली निकली… सर पर बांधे कफनियां हूं….।‘ देर तक व्याख्या की गई है। अंगुलियां, आंखे सब जैसे आजादी के उस दौर की वीरता, शौर्य और बलिदान को प्रतिबिंबित कर रही हैं, उस दौर पर गर्व कर रही हैं। और अब अपने रोने को रोकती-छिपती-सी आंखें, होंठों पर झिलमिल थिरकती-सी एक हंसी भी और कृतज्ञता के शब्द भी- ‘उस एक ही साल में दो लोगों की मृत्यु। एक तो मेरे भाई राधेश्याम की मृत्यु अगस्त में, एकदम अप्रत्याशित- और उसी साल नवंबर में इनकी- मेरी पत्नी की मृत्यु। ये ऐसे लोग थे- जिन्हें पसंद-वसंद तो क्या कहें- प्रिय थे। इनसे लेखन में, व्यक्तिगत जीवन में लिया-ही लिया था। भाई से ही हमने यह ग्रहण किया था कि सिंपिलीसिटी में कितनी शक्ति है। उनके बिना वास्तविकता की अभिव्यक्ति बहुत कठिन है। पत्नी का क्या कहूं? पत्नी तो पत्नी है। मेरी पत्नी में जीवन के प्रति बेहद उत्साह था। उनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। वह हार मानने वाली नहीं थीं। कठिन-से-कठिन परिस्थति में भी हंसती रहने वाली। और सबसे साहस के साथ जिंदगी जीने के लिए कहने वाली।…नहीं, इन चीजों का हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते। इन्हें आप अवर्णित ही रहने दें। भाई भी पूरा एक किस्सा हैं- कभी संस्मरण लिखूंगा। बहुत सी चीजें लिखीं नहीं जा सकतीं। बड़ा मुश्किल, कठिन है। विस्तार दें तो चीजें बिखर जाती हैं।‘ अमरकांत जी जैसे कद के साहित्यकार का यह कथन उनकी भावनाओं को बड़ी सहज खूबसूरती के साथ व्यक्त कर गया था। भावनाओं के आवेग को थामते-नियंत्रित से करते अमरकांतजी कह रहे थे- ‘अब और क्या कहूं? इतना रचा-बसा है जीवन में वह सब कि कुछ नहीं एक्सप्लने किया जा सकता। ये तो जीवन के हिस्से हैं। हर एक की जिंदगी में आते हैं। जैसे हम समझते हैं, दूसरे उस तरह समझ भी नहीं सकते। जब जैसे भीष्मजी ओर उनकी पत्नी शीलाजी का संबंध था, दूसरे क्या समझेंगे वह सब? उनकी एक रचना से हमें यह लगा कि पत्नी की मृत्यु के बाद कैसा शौक लगा होगा भीष्मजी को।‘

उनके पुत्र और पुत्रवधू गेट पर विदा करने आए थे। ऐसे जैसे कोई अपने परिवार के अत्यंत निकट, आत्मीय व्यक्ति को विदा कर रहा हो। अध-खुले गेट के पास खड़े-खड़े देर तक बातें होती रही थीं। पुत्रवधू का मन टटोना चाहा तो सुनने को मिला, ‘शादी से पहले तो उतना नहीं, पर बाद में पढ़ा है। हां, गर्व होता है। अब तो लगता है कि यहां इस घर में होना बड़ी बात है।‘ मन-ही-मन मैंने भी दोहराया, ‘हां, इस घर में होना बड़ी बात है।‘

 

दाज्यू : शेखर जोशी

कथालेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी का जन्म 10 सितंबर, 1932 को अल्मोड़ा जनपद (उत्तराखंड) के गांव ओलियागांव में एक किसान परिवार में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और दिल्ली में हुई। इंटरमीडिएट में पढ़ाई के दौरान सुरक्षा विभाग में ई.एम.ई. अप्रेंटिसशिप के लिए चयन हो गया। सन् 1951 से ’55 तक दिल्ली में अप्रेंटिसशिप के दौरान उनका प्रगतिशील लेखकों, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और पत्रकारिता जगत से संपर्क हुआ। सन् 1955 से 1986 तक इलाहाबाद के एक सैनिक औद्योगिक प्रतिष्ठान में कार्य किया। इसके बाद वर्कशाप आफीसर पद से त्यागपत्र देकर स्वतंत्र लेखन में सक्रिय।  
उन्होंने पहली कहानी ‘दाज्यू’ सन् 1953 में  ‘पर्वतीय जन’ के लिए लिखी, जो बाद में  ‘संकेत’ में प्रकाशित होकर चर्चित हुई। इस कालजयी कहानी का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पर चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी ने फिल्म का निर्माण किया।
उनको हार्दिक शुमकानाएं। उनकी कालजयी कहानी-

चौक से निकल कर बायीं ओर जो बड़े साइनबोर्ड वाला छोटा कैफे है वहीं जगदीश बाबू ने उसे पहली बार देखा था। गोरा-चिट्टा रंग, नीली शफ्फ़ाफ आंखें, सुनहरे बाल और चाल में एक अनोखी मस्ती- पर शिथिलता नहीं। कमल के पत्ते पर फिसलती हुई पानी की बूंद की सी फुर्ती। आंखों की चंचलता देख कर उसकी उम्र का अनुमान केवल नौ-दस वर्ष ही लगाया जा सकता था और शायद यही उम्र उसकी रही होगी।
 अधजली सिगरेट का एक लंबा कश खींचते हुए जब जगदीश बाबू ने कैफे में प्रवेश किया तो वह एक मेज पर से प्लेटें उठा रहा था और जब वे पास ही कोने की टेबल पर बैठे तो वह सामने था। मानो, घंटों से उनकी, उस स्थान पर आने वाले व्यक्ति की, प्रतीक्षा कर रहा हो। वह कुछ बोला नहीं। हां, नम्रता प्रदर्शन के लिए थोड़ा झुका और मुस्कराया भर था, पर उसके इसी मौन में जैसे सारा ‘मीनू’ समाहित था। ‘सिंगल चाय’ का आर्डर पाने पर वह एक बार पुन: मुस्करा कर चल दिया और पलक मारते ही चाय हाजिर थी।
 मनुष्य की भावनाएं बड़ी विचित्र होती हैं। निर्जन, एकांत स्थान में निस्संग होने पर भी कभी-कभी आदमी एकाकी अनुभव नहीं करता। लगता है, उस एकाकीपन में भी सब कुछ कितना निकट है, कितना अपना है। परंतु इसके विपरीत कभी-कभी सैकड़ों नर-नारियों के बीच जनरवमय वातावरण में रह कर भी सूनेपन की अनुभूति होती है। लगता है, जो कुछ है वह पराया है, कितना अपनत्वहीन! पर यह अकारण ही नहीं होता। उस एकाकीपन की अनुभूति, उस अलगाव की जड़ें होती हैं- बिछोह या विरक्ति की किसी कथा के मूल में।
 जगदीश बाबू दूर देश से आए हैं, अकेले हैं। चौक की चहल-पहल, कैफे के शोरगुल में उन्हें लगता है, सब कुछ अपनत्वहीन है। शायद कुछ दिनों रहकर, अभ्यस्त हो जाने पर उन्हें इसी वातावरण में अपनेपन की अनुभूति होने लगे। पर आज तो लगता है यह अपना नहीं, अपनेपन की सीमा से दूर, कितना दूर है! और तब उन्हें अनायास ही याद आने लगते हैं अपने गांव पड़ोस के आदमी, स्कूल-कालेज के छोकरे, अपने निकट शहर के कैफे-होटल…!
 ‘चाय शा’ब!’
 जगदीश बाबू ने राखदानी में सिगरेट झाड़ी। उन्हें लगा, इन शब्दों की ध्वनि में वही कुछ है जिसकी रिक्तता उन्हें अनुभव हो रही है। और उन्होंने अपनी शंका का समाधान कर लिया-
 ‘क्या नाम है तुम्हारा?’
 ‘मदन।’
 ‘अच्छा, मदन! तुम कहां के रहने वाले हो?’
 ‘पहाड़ का हूं, बाबूजी!’
 ‘पहाड़ तो सैकड़ों हैं- आबू, दार्जिलिंग, मंसूरी, शिमला, अल्मोड़ा! तुम्हारा गांव किस पहाड़ में है?’
 इस बार शायद उसे पहाड़ और जिले का भेद मालूम हो गाया। मुस्करा कर बोला-
 ‘अल्मोड़ा, शा’ब अल्मोड़ा।’
 ‘अल्मोड़ा में कौन-सा गांव है?’ विशेष जानने की गरज से जगदीश बाबू ने पूछा।
 इस प्रश्न ने उसे संकोच में डाल दिया। शायद अपने गांव की निराली संज्ञा के कारण उसे संकोच हुआ था इस कारण टालता हुआ सा बोला, ‘वह तो दूर है शा’ब अल्मोड़ा से पंद्रह-बीस मील होगा।’
 ‘फिर भी, नाम तो कुछ होगा ही।’ जगदीश बाबू ने जोर देकर पूछा।
 ‘डोट्यालगों’ वह सकुचाता हुआ-सा बोला।
 जगदीश बाबू के चेहरे पर पुती हुई एकाकीपन की स्याही दूर हो गई और जब उन्होंने मुस्करा कर मदन को बताया कि वे भी उसके निकटवर्ती गांव ‘……..’  के रहने वाले हैं तो लगा जैसे प्रसन्नता के कारण अभी मदन के हाथ से ‘ट्रेÓ गिर पड़ेगी। उसके मुंह से शब्द निकलना चाह कर भी न निकल सके। खोया-खोया सा वह मानो अपने अतीत को फिर लौट-लौट कर देखने का प्रयत्न कर रहा हो।
अतीत- गांव…ऊंची पहाडिय़ां…नदी…ईजा (मां)…बाबा…दीदी…भुलि (छोटी बहन)…दाज्यू (बड़ा भाई)…!
मदन को जगदीश बाबू के रूप में किसकी छाया निकट जान पड़ी! ईजा?- नहीं, बाबा?- नहीं, दीदी,…भुलि?- नहीं, दाज्यू? हां, दाज्यू!
दो-चार ही दिनों में मदन और जगदीश बाबू के बीच की अजनबीपन की खाई दूर हो गई। टेबल पर बैठते ही मदन का स्वर सुनाई देता-
‘दाज्यू, जैहिन्न…।’
‘दाज्यू, आज तो ठंड बहुत है।’
‘दाज्यू, क्या यहां भी ‘ह्यूं’ (हिम) पड़ेगा।’
‘दाज्यू, आपने तो कल बहुत थोड़ा खाना खाया।’ तभी किसी और से ‘बॉयÓ की आवाज पड़ती और मदन उस बावाज की प्रतिध्वनि के पहुंचने से पहले ही वहां पहुंच जाता! आर्डर लेकर फिर जाते-जाते जगदीश बाबू से पूछता, ‘दाज्यू कोई चीज?’
‘पानी लाओ।’
‘लाया दाज्यू’, दूसरी टेबल से मदन की आवाज सुनाई देती।
मदन ‘दाज्यू’ शब्द को उतनी ही आतुरता और लगन से दुहराता जितनी आतुरता से बहुत दिनों के बाद मिलने पर मां अपने बेटे को चूमती है।
कुछ दिनों बाद जगदीश बाबू का एकाकीपन दूर हो गया। उन्हें अब चौक, केफे ही नहीं सारा शहर अपनेपन के रंग में रंगा हुआ सा लगने लगा। परंतु अब उन्हें यह बार-बार ‘दाज्यूÓ कहलाना अच्छा नहीं लगता और यह मदन था कि दूसरी टेबल से भी ‘दाज्यू’…।
‘मदन! इधर आओ।’
‘आया दाज्यू!’
‘दाज्यू’ शब्द की आवृति पर जगदीश बाबू के मध्यमवर्गीय संस्कार जाग उठे- अपनत्व की पतली डोरी ‘अहंÓ की तेज धार के आगे न टिक सकी।
‘दाज्यू, चाय लाऊं?’
‘चाय नहीं, लेकिन यह दाज्यू-दाज्यू क्या चिल्लाते रहते हो दिन रात। किसी की ‘प्रेस्टिज’ का खयाल भी नहीं है तुम्हें?’
जगदीश बाबू का मुंह क्रोध के कारण तमतमा गया, शब्दों पर अधिकार नहीं रह सका। मदन ‘प्रेस्टिज’ का अर्थ समझ सकेगा या नहीं, यह भी उन्हें ध्यान नहीं रहा, पर मदन बिना समझाये ही सब कुछ समझ गया था।
मदन को जगदीश बाबू के व्यवहार से गहरी चोट लगी। मैनेजर से सिरदर्द का बहाना कर वह घुटनों में सर दे कोठरी में सिसकियां भर-भर रोता रहा। घर-गांव से दूर, ऐसी परिस्थिति में मदन का जगदीश बाबू के प्रति आत्मीयता-प्रदर्शन स्वाभाविक ही था। इसी कारण आज प्रवासी जीवन में पहली बार उसे लगा जैसे किसी ने उसे ईजा की गोदी से, बाबा की बांहों के, और दीदी के आंचल की छाया से बलपूर्वक खींच लिया हो।
परंतु भावुकता स्थायी नहीं होती। रो लेने पर, अंतर की घुमड़ती वेदना को आंखों की राह बाहर निकाल लेने पर मनुष्य जो भी निश्चय करता है वे भावुक क्षणों की अपेक्षा अधिक विवेकपूर्ण होते हैं।
मदन पूर्ववत काम करने लगा।
दूसरे दिन कैफे जाते हुए अचानक ही जगदीश बाबू की भेंट बचपन के सहपाठी हेमंत से हो गई। कैफे में पहुंच कर जगदीश बाबू ने इशारे से मदन को बुलाया परंतु उन्हें लगा जैसे वह उनसे दूर-दूर रहने का प्रयत्न कर रहा हो। दूसरी बार बुलाने पर ही मदन आया। आज उसके मुंह पर वह मुस्कान न थी और न ही उसने ‘क्या लाऊं दाज्यू’ कहा। स्वयं जगदीश बाबू को ही कहना पड़ा, ‘दो चाय, दो ऑमलेट’ परंतु तब भी ‘लाया दाज्यू’ कहने की अपेक्षा ‘लाया शा’ब’ कहकर वह चल दिया। मानों दोनों अपरिचित हों।
‘शायद पहाडिय़ा है?’ हेमंत ने अनुमान लगाकर पूछा।
‘हां’, रूखा सा उत्तर दे दिया जगदीश बाबू ने और वार्तालाप का विषय ही बदल दिया।
मदन चाय ले आया था।
‘क्या नाम है तुम्हारा लड़के?’ हेमंत ने अहसान चढ़ाने की गरज से पूछा।
कुछ क्षणों के लिए टेबुल पर गंभीर मौन छा गया। जगदीश बाबू की आंखें चाय की प्याली पर ही रह गईं। मदन की आंखों के सामने विगत स्मृतियां घूमने लगीं… जगदीश बाबू का एक दिन ऐसे ही नाम पूछना… फिर… दाज्यू आपने तो कल थोड़ा ही खाया… और एक दिन ‘किसी की प्रेस्टिज का खयाल नहीं रहता तुम्हें…’
जगदीश बाबू ने आंखें उठाकर मदन की ओर देखा, उन्हें लगा जैसे अभी वह ज्वालामुखी सा फूट पड़ेगा।
हेमंत ने आग्रह के स्वर में दुहराया, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’
‘बॉय कहते हैं शा’ब मुझे।’ संक्षिप्त-सा उत्तर देकर वह मुड़ गया। आवेश में उसका चेहरा लाल होकर और भी अधिक सुंदर हो गया था।

साहित्य, कला और संस्कृति पर गहरे संकट का दौर : शिवकुमार मिश्र

कोलकाता : प्रख्यात आलोचक व जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र ने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य, कला व संस्कृति गहरे संकट के दौर से गुजर रहा हैं। इस दौर में आदमी की रचनाधर्मिता चुनौतियों के बीच खड़ी है। उन्होंने कहा कि ये निहायत ही रचना विरोधी समय है और साहित्य अभिव्यक्ति का इतना स्खलन पहले कभी नहीं हुआ था। यदि समय का चरित्र यही रहा तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले दिन में आदमी कितना आदमी रह जाएगा। देखा जाए तो आज आदमी का भी क्षरण हो रहा है और बाजारतंत्र हम पर हावी है। शिवकुमार मिश्र ने ये बातें भारतीय भाषा परिषद् सभागार में आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कही। इस मौके पर मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट कि ओर से हिंदी के प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी को चंद्रयान पुरस्कार-2010 से नवाजा गया। संस्था के ट्रस्टी धनराज दफ्तरी ने पुरस्कार स्वरुप जोशी को 31 हजार रुपये की राशि, शॉल व श्रीफल प्रदान किए।
शिवकुमार मिश्र ने कहा कि शेखर जोशी ने औद्योगिक मजदूरों पर कहानियां लिखीं, जिनमें यथार्थ के सही संदर्भों को उभारा। यही नहीं जोशी ने नई  कहानी के तमाम दूसरे लोगों के साथ इसे व्यापक आयाम भी दिया था। उन्होंने कहा कि जोशी की कहानी यथार्थ की व्याख्या करते हुए जरूरी व गैर -जरूरी के बीच के फर्क को स्पष्ट करती है। उन्होंने शेखर जोशी की दाज्यू, कोसी का घटवार, नौरंगी बीमार है आदि कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि जोशी कि कहानियों में यथार्थ का चित्रण हमें मिलता हैं।
कथाकार शेखर जोशी ने कहा कि मैंने बहुत नहीं लिखा और यदि मैं सलीके से लिख पाया और आपकी नजर उस पर पड़ी है तो उसके प्रति आभार प्रकट करता हूं। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनका नहीं, बल्कि उन पात्रों का है जो पाठकों के मन में रच-बस गए हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली प्रवास के दौरान वामपंथी राजनीति की तरफ उनका रुझान होने लगा। जोशी ने कहा कि जो थोडा बहुत मैं सलीके से लिख-पढ़ पाया उसका श्रेय इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल को हैं। इस मौके पर नई पीढ़ी के लेखकों से निवेदन करते हुए जोशी ने कहा कि जो हम लिखें, उसमें कुछ प्रकाश हो, हताशा न हो। उनके मुताबिक साहित्य से हमें कुछ ऐसा भी मिलना चाहिए जिससे प्रेरणा मिले।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक विजय बहादुर सिंह ने लेखक को साहित्य का डेंजर जोन करार देते हुए कहा कि वह (लेखक) हमें बताता है कि समाज कितने हद तक खतरे के निशान से ऊपर जा रहा है। उन्होंने कहा कि संकट के समय समाज में हमेशा आता रहता है। देखा जाए तो कभी-कभी वेदना भी समाज को जागृत करती है। सिंह ने कहा कि कवि व वेदना हमें बताते हैं कि समाज में अभी बहुत कुछ जीवित है। उनके मुताबिक बेचैनी व उकताहट से ही साहित्य बचा रहता है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार प्रकाश चंडालिया ने किया। उन्होंने शेखर जोशी की कहानी दाज्यू का पाठ भी किया। समारोह में डा. कृष्ण बिहारी मिश्र, आलोचक व कथाकार विमल वर्मा, श्रीहर्ष, अरुण महेश्वरी, डा. अमरनाथ, आयोजक संस्था के ट्रस्ट अध्यक्ष प्रीतम दफ्तरी व दलाल टांटिया आदि भी मौजूद थे। धनराज दफ्तरी ने धन्यवाद दिया।

प्रथम चंद्रयान पुरस्कार कथाकार शेखर जोशी को

कोलकाता: हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा  ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार-2010  से नवाजा जायेगा। ट्रस्ट की और से जारी विज्ञप्ति में प्रबंध न्यासी धनराज दफ्तरी ने जानकारी दी कि नई कहानी में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़ने वाले शेखर जोशी को पुरस्कार स्वरूप 31,000 रुपये की राशि भेंट की जाएगी।पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में रविवार 18 जुलाई को आयोजित होगा। समारोह की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक डाक्टर विजय बहादुर सिंह करेंगे, जबकि प्रसिद्द विद्वान डाक्टर शिवकुमार मिश्र, अहमदाबाद मुख्य वक्ता होंगे। कार्यक्रम का संचालन पूर्व सांसद सरला महेश्वरी करेंगी।  इस अवसर पर शेखर जोशी की चचर्ति कहानी दाज्यू का पाठ पत्रकार प्रकाश चंडालिया करेंगे।

एकाकी देवदारु: शेखर जोशी

विकास के नाम पर पेड़ों को काटा जाना आम बात है। कभी हमने सोचा कि वह पेड़ किसी का संगी-साथी और आत्मीय भी हो सकता है। वर्षों बाद कथाकार शेखर जोशी अपने गांव गए तो बचपन के संगी देवदारु को न देखकर उनके मन में ऐसी टीस उठी, मानों कोई आत्मीय बिछड़ गया हो-

हिमालय के आंगन का वन-प्रांतर! और उस सघन हरियाली के बीच खड़ा वह अकेला देवदारु! खूब सुंदर, छरहरा और सुदीर्घ!  सहस्रों लंबी-लंबी बांहें पसारे हुए। तीखी अंगुलियां और कलाइयों में काठ के कत्थई फूल पहने हुए। ऐसा था हमारा दारुवृक्ष- एकाकी देवदारु! हमारी भाषा के आत्मीय संबोधन में ‘एकलु द्यार!’
वृक्ष और भी कई थे। कोई नाटे, झब्बरदार। कोई घने, सुगठित और विस्तृत। कोई दीन-हीन मरभुखे, सूखे-ठूंठ से। बांज, फयांट, चीड़, बुरांश और पांगर के असंख्य पेड़। समस्त वनप्रांतर इस वनस्पति परिवार से भरा-पुरा रहता था- वर्ष-वर्ष भर, बारहों मास, छहों ऋतुओं में।
देवदारु के वृक्ष भी कम नहीं थे। समीप ही पूरा अरण्य ‘दारु-वणि’ के नाम से प्रख्यात था। हजारों-हजार पेड़ पलटन के सिपाहियों की मुद्रा में खड़े हुए। कभी ‘सावधान’ की मुद्रा में देवमूर्ति से शांत और स्थिर तो कभी हवा-वातास चलने पर सूंसाट-भूंभाट करते साक्षात् शिव के रूप में तांडवरत। लेकिन हमारे ‘एकाकी देवदारु’ की बात ही और थी। वह हमारा साथी था, हमारा मार्गदर्शक था। ‘दारुवणि’ जहां समाप्त हो जाती, वहां से प्राय: फर्लांग भर दूर, सड़क के मोड़ पर झाड़ी-झुरमुटों के बीच वह अकेला अवधूत-सा खड़ा रहता था। जैसे, कोई साधु एक टांग पर तपस्या में मग्न हो।
सुबह-सुबह पूरब में सूर्य भटकोट की पहाड़ी के पार आकाश में एक-दो हाथ ऊपर पहुंचते तो उसका प्रकाश पर्वत शिखरों के ऊपर-ऊपर सब ओर पहुंच जाता था। एकाकी दारु के शीर्ष में प्रात: का घाम केसर के टीके से अभिषेक कर देता। रात से ही पाटी में कालिख लगा, उसे घोंट-घाट, कमेट की दावात, कलम और बस्ता तैयार कर हम लोग सुबह झटपट कलेवा कर अपने प्राइमरी स्कूल के पंडितजी के डर से निकलते। गांव भर के बच्चे जुटने में थोड़ा समय लग ही जाता था और कभी-कभार किसी अनखने-लाड़ले के रोने-धाने, मान-मनौवल में ही किंचित विलम्ब हो जाता तो मन में धुकुर-पुकुर लग जाती कि अब पंडितजी अपनी बेंत चमकाएंगे। आजकल की तरह तब घर-घर में न रेडियो था, न घड़ी। पहाड़ की चोटी के कोने-कोने में घाम उतर आया तो सुबह होने की प्रतीति हो जाती थी। ऐसे क्षणों में स्कूल के रास्ते में हमारी भेंट होती थी ‘एकाकी दारु’ से। वही हमको बता देता था कि अब ‘हे प्रभो आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए’ प्रार्थना शुरू हो गई होगी। कि अब गोपाल सिंह की दुकान से हुक्के का आखिरी कश खींचकर मास्टर साहब कक्षा में आ गए होंगे।
‘एकाकी दारु’ के माथे पर केसर का नन्हा टीका देखकर हम निश्चिंत हो जाते थे कि अब ठीक समय पर प्रार्थना में पहुंच जाएंगे। यदि बालिश्त भर घाम की पीली पगड़ी बंध गई तो मन में धुकुर-पुकुर होने लगती थी और हम पैथल की घाटी के उतार में बेतहाश दौड़ लगा देते थे और यदि किसी दिन दुर्भाग्य से सफेद धूप का हाथ भर चौड़ा दुशाला एकाकी दारु के कंधे में लिपट जाता था तो हमारे पांव न स्कूल की ओर बढ़ पाते थे, न घर की ओर लौट पाते थे। किसी कारण घर से स्कूल की और प्रस्थान करते हुए हम मन ही मन ‘एकाकी दारु’ से मनौतियां मनाते कि वह केसर का टीका लगाए हमें मिले।
सांझ को स्कूल से लौटते समय चीड़ के ठीठों को ठोर मारते, हिसालू और किलमौड़े के जंगली फलों को बीनते-चखते, पेड़ों के खोखल में चिडिय़ों के घोंसलों को तलाशते, थके-मांदे ‘दारुवणि’ की चढ़ाई पार कर जब हम ‘एकाकी दारु’ की छाया में पहुंचते तो एक पड़ाव अनिवार्य हो जाता था। कोई-कोई साथी उसकी नीचे तक झुकी हुई बांहों में लेट कर झूलने लगता। कोई उसकी पत्तियों के ढेर पर फिसलने का आनंद लेता। सुबह शाम का ऐसा संगी था हमारा ‘एकाकी दारु’।
वर्षा बाद मैं उसी मार्ग से गांव लौट रहा था। जंगलात की बटिया अब मोटर सड़क बन गई है। परंतु जिस समय उस मोड़ पर सड़क को चौड़ा करने के लिए निर्माण विभाग वाले एकाकी दारु को काट रहे होंगे, रस्सियां लगा कर उसकी जड़-मूल को निकालने का षडय़ंत्र रच रहे होंगे, उस समय शायद किसी ने उन्हें यह न बताया होगा कि यह स्कूली बच्चों का साथी ‘एकाकी दारुÓ है, इसे मत काटो, इसे मत उखाड़ों, अपनी सड़क को चार हाथ आगे सरका लो। शायद सड़क बनवाने वाले उस साहब ने कभी बचपन में पेड़-पौधों से समय नहीं पूछा होगा, उनकी बांहों पर बैठकर झूलने का सुख नहीं लिया होगा और सुबह की धूप के उस केसरिया टीके, पीली पगड़ी और सफेद दुशाले की कल्पना भी नहीं की होगी।
अब वहां सिर्फ एक सुनसान मोड़ है और कुछ भी नहीं।

शेखर जोशी की कविताएं

कारखाना

अभी आठ की घंटी बजते
भूखा शिशु सा चीख उठा था
मिल का सायरन!
और सड़क पर उसे मनाने
नर्स सरीखी दौड़ पड़ी थी
श्रमिक जनों की पांत
यंत्रवत, यंत्रवेग से।

वहीं गेट पर बड़े रौब से
घूम रहा है फोरमैन भी
कल्लू की वह सूखी काया
शीश नवाती उसे यंत्रवत

आवश्यक है यह अभिवादन
सविनय हो या अभिनय केवल
क्योंकि यंत्रक्रम से चलता श्रम
गुरुयंत्रों की रगड़-ज्वाल से
तप जाएं न यंत्र लघुत्तम
है विनय-चाटुता तैल अत्युत्तम।
 

मुजफ्फरनगर 94*

जुलूस से लौटकर आई वह औरत
माचिस मांगने गई है पड़ौसन के पास।
दरवाजे पर खड़ी-खड़ी
बतिया रही हैं दोनों
नहीं सुनाई देती उनकी आवाज
नहीं स्पष्ट होता आशय
पर लगता है
चूल्हे-चौके से हटकर
कुछ और ही मुद्दा है बातों का।
फटी आंखों, रोम-रोम उद्वेलित है श्रोता
न जाने क्या-क्या कह रही हैं :
नाचती अंगुलियां
तनी हुई भंवें
जलती आंखें
और मटियाये कपड़ों की गंध
न जाने क्या कुछ कह रहे हैं
चेहरे के दाग
फड़कते नथुने
सूखे आंसुओं के निशान
आहत मर्म
और रौंदी हुई देह।

नहीं सुनाई देती उनकी आवाज
नहीं स्पष्ट होता आशय
दरवाजे पर खड़ी-खड़ी
बतियाती हैं दोनों।

माचिस लेने गई थी औरत
आग दे आई है।
(*सन्दर्भ : उत्तराखंड राज्य आंदोलन)

धानरोपाई

आज हमारे खेतों में रोपाई थी धानों की
घर में
बड़ी सुबह से हलचल मची रही काम-काज की।
खेतों में
हुड़के की थापों पर गीतों की वरषा बरसी।
मूंगे-मोती की मालाओं से सजी
कामदारिनों ने लहंगों में फेंटे मारे
आंचल से कमर कसी
नाकशीर्ष से लेकर माथे तक
रोली का टीका सजा लिया।

आषाढ़ी बादल से बैलों के जोड़े
उतरे खेतों पर
धरती की परतें खोलीं
भीगी पूंछों से हलवाहों का अभिषेक किया।
सिंचित खेतों में
विवरों से अन्नचोर चूहे निकले
मेढ़ों पर बैठे बच्चों ने किलकारी मारी
दौड़-भंूक कर झबरा पस्त हुआ।

बेहन की कालीनों से उठकर
शिशु पादप सीढ़ी-दर-सीढ़ी फैले।
विस्थापन की पीड़ा से किंचित पियराये
माटी का रस पीकर
कल ये फिर हरे-भरे झूमेंगे
मंजरित बालियां इठलाएंगी, नाचेंगी
सौंधी बयार मह-मह महकेगी।

जब घिरी सांझ
विदा की बेला आई
बचुवा की बेटी ने अंतिम जोड़ सुनाए :
धरती मां है
देगी, पालेगी, पोसेगी उनही को,
जो इसकी सेवा में जांगर धन्य करेंगे।
ऋतुएं पलटेंगी
घाम-ताप, वर्षा-बूंदी, हिम-तुषार
अपनी गति से आएंगे-जाएंगे
रहना सुख से, रहो जहां भी
होगी सबसे भेंट पुन:
जीवित यदि अगले वर्ष रही।

उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूं

डूबता रवि
घिर रही है सांझ
चित्रित गगन-आंगन!

किन अदीखी अंगुलियों ने वर्तुल सप्तरंगी अल्पना लिख दी?
कहां हैं वे हाथ
कितने सुघड़ होंगे?
(अल्पना के रंग साक्षी)
 
क्षणभर देख तो लूं
नयन-माथे से लगा लूं
उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूं।

मैं कि जिसका भाग्य अब तक
सूने चौक, देहरी, द्वार-आंगन से बंधा है।

शायद ये वही हों हाथ
जो धानों की हरी मखमल के किनारे
पीली गोट सरसों की बिछाते
जो धरा पर सप्तवर्णी बीज-रंगों अल्पना लिखते
जो धरा पर सप्तरंगी फूल-रंगों अल्पना लिखते
जो धरा पर सप्तगंधी अन्नरंगों अल्पना लिखते
आहï! कितने सुघड़ होंगे
पात-पल्लव-अन्न साक्षी

नयन माथे से लगा लूं
उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूं।

पहली वर्षा के बाद

भूरी मटमैली चादर ओढ़े
बूढ़े पुरखों से चार पहाड़
मिलजुल बैठे
ऊंघते-ऊंघते-ऊंघते।

घाटी के ओठों से कुहरा उठता
मन मारे, थके हारे बेचारे
दिन-दिन भर
चिलम फूंकते-फूंकते-फूंकते।

बर्फ

फ्रिज से निकालकर
गिलासों में ढाल लेते हैं जिसे
रंगीन पानी के साथ
चुभला भी लेते हैं कभी-कभी
खूब ठंडी-ठंडी होती है
यही शायद आप समझते हैं बर्फ है।

बर्फ जला भी देती है
गला देती है नाक, कान, अंगुलियां
पहाड़ों की बर्फ बहुत निर्मम होती है
बहुत सावधानी चाहिए बर्फ के साथ

अक्सर देखा है
बेपर्दा आंखों को अंधा कर देती है
पहाड़ों की चमकती बर्फ।

अंकित होने दो

मैं कभी कविताएं लिखता था शुभा!
और तुम अल्पना!
चांद तारे
फूल-पत्तियां
और शंखमुद्री लताएं चित्रित करते
न जाने कब
कविताओं की डायरी में
मैं हिसाब लिखने लगा।
कभी खत्म न होने वाला हिसाब
अल्ल-सुबह टूटी चप्पल से शुरू होकर
 देर रात में फटी मसहरी के सर्गों तक फैला
अबूझ अंकों का महाकाव्य

और तुम
अस्पताल, रोजगार-दफ्तर
और स्कूलों की सूनी देहरी पर
मांडती रही वर्तुल अल्पना

साल दर साल!
साल दर साल!!

शुभा!
अभिशप्त हैं पीढिय़ां
लिखने को कविताएं
बुनने को सपने
और अंकित करने को सतरंगी दुनिया।

न रोको उन्हें
लिखने दो शुभा
दीवारों पर नारे ही सही
अंकित होने दो उनके सपनों का इतिहास।

द्विज

यज्ञवेदी
गीत सुस्वर
गृहजाग, समिधा-धूम
ऋचाओं की अनवरत अनुगूंज
रह-रह शंख का उद्घोष!

आज मुनुवां द्विज हो गया है।

अभी कुछ देर पहले
पिता का आदेश पाकर
‘माम भिक्षाम देहिÓ कहता
वह शिखाधारी
दण्डधारी
मृगछाला लपेटे
राह गुरुकुल की चला था
लौट आया बाल-बटु फिर
कर न पाया अनसुनी मनुहार मां की!

गिन रहा अब नोट,
परखता
सूट के कपड़े, घडिय़ां
और भी कितनी अनोखी वस्तुएं
झोली में पड़ीं जो।

मुनुवां मगन है अब
आज मुनुवां द्विज हो गया है।

पर, साथ छूटा हमजोलियों का
अब बीती बात होगी:
वे ताल-पोखर
वे अमराइयां
जूठी-कच्ची कैरियां।
अब सीधे संवाद होगा
अग्नि, सविता औ वरुण से

छह पीली डोरियों से मुनुवां अब बंध गया है
आज मुनुवां द्विज हो गया है।

निराला के प्रति

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती!
इन्दीवर की कथा रही
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।

ओ महाप्राण!
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती!
किन्तु न रीती!!

बहुरूपिया किताबें

विश्व पुस्तक मेला

किताबों के बीच में मुझे सदा ही सुकून मिलता है। यदि किताबें नहीं होतीं तो हमारी क्या स्थिति होती, यह सोचकर ही झुरझुरी-सी होती है। दुनिया का जितना विकास हुआ और ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रचार हुआ है, वह कभी नहीं हो पाता।
जब मैं किसी के व्यवहार से व्यथित होता हूं तो किताबें मुझे समझाती हैं कि मैं व्यक्ति के व्यवहार पर नहीं, मनोवृत्ति पर ध्यान दूं। मैं सोचूं कि यह मनोवृत्ति आई कहां से। इसे बदलने के लिए क्या कर सकता हूं? जब मुझे असफलता मिलती है तो किताबें सबल देती हैं। दुनिया के छल-प्रपंच देखता हूं तो किताबें सच्चे दोस्त सी लगती हैं, जो कुछ भी नहीं छिपातीं। मन उदास होता है तो कोई किताब पढ़ता हूं और उदासी दूर छिटक जाती है। दुनिया में राजनीतिक या सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनके पीछे किताबें रही है। किताबों को क्या कहूं, मैं यह समझ नहीं पाता। कभी एक अच्छे मित्र की तरह लगती हैं तो कभी दादी-नानी की तरह। कभी ज्ञान के खजाने का आभास देती हैं तो कभी इनसे शक्ति मिलती हैं। मुझे तो किताबें बहुरूपिया लगती है।
इन बहुरूपियों से मिलने जा प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में गया। यह ठीक है कि वहां पर ट्रेड फेयर और ऑटो एक्सपो की तरह मारा-मारी नहीं है। इस हिसाब से चहल-पहल कम है। फिर भी, दिल्ली और आसपास के नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुडग़ांव से ही नहीं बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग आ रहे है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक किताबों की दुनिया में खोए हुए हैं। मनपसंद किताब की चाह में विकलांग भी स्टालों को छान रहे हैं। यह किताबों का आकर्षण नहीं है तो क्या है?
प्रकाशक सामान्यत: किताबों की बिक्री के लिए लाइब्रेरियन को कमीशन और सरकारी अधिकारियों को घूस के रूप में हाईबाउंड पर 45 और पेपरबैक्स पर 33 फीसदी तक दे रहे हैं। इसलिए भी किताबों की कीमतों में अनाप-शनाप वृद्धि की जा रही है। पुस्तक मेले में केवल 10 प्रतिशत कमीशन दिया जा रहा है। यहां न किसी को कमीशन देना है और न ही घूस। प्रकाशक हार्डबाउंड पर 35 और पेपरबैक्स पर 25 फीसदी तक कमीशन दें तो बिक्री बढ़ेगी।
बड़ी कंपनियां अपने प्रोडेक्ट के दाम बेतहाशा बढ़ाती हैं तो उन पर 80 प्रतिशत तक का कमीशन भी दे देती हैं। जब प्रकाशकों ने किताबों के दाम मनमर्जी बढ़ाए हुए हैं तो वे क्यों नहीं इस तरह की नीति अपनाते। वे क्यों सरकारी खरीद और लाइब्रेरी में पुस्तकों को खपाने पर निर्भर रहना चाहते हैं। पेंगुइन के स्टाल पर कुछ किताबों पर एक के साथ एक फ्री का ऑफर है। इस तरह के प्रयोग स्वागत योग्य है।
वरिष्ठ साहित्यकार और संपादक पंकज बिष्ट का मानना है कि सरकार किताब के लिए जो मदद करती है, वह सीधे पाठक को जाए, न कि प्रकाशक को। जैसे- खादी पर सरकार छूट देती है। ग्राहक परचेच करता है तो उसे मिलती है। इसी प्रकार किताबों पर छूट मिले।
सरकार प्रकाशकों को सीधे छूट देने की बजाए यह नीति अपना ले कि देश में लगने वाले पुस्तक मेलों में बिकने वाली हर पुस्तक पर छूट दी जाएगी तो निश्चित तौर से बिक्री बढ़ेगी। मेले के आयोजनों की संख्या भी बढ़ाई जाए और आयोजन भी केवल एक ही जगह ने हों। देश के कोने-कोने को कवर किया जाए। किताबों को जनसुलभ बनाने का हर स्तर पर प्रयास जरूरी है। जितनी ज्यादा किताबें बिकेंगी, लेखक और पाठक का तो भला होगा ही प्रकाशक भी लाभ में रहेंगे। किताबों की चाहत कम नहीं हुई है। जरूरत पाठकों तक सही मूल्य पर पहुंचाने की है।
मैं मेले से निकल रहा हूं। चाहकर भी बहुत-सी किताबें नहीं खरीद पाया हूं क्योंकि अभी तक तनख्वाह नहीं मिली है। यह टीस अधिकांश लोगों की है। कुछ विभागों को छोड़कर अधिकांश कर्मचारियों को सात तारीख या इसके बाद ही तनख्वाह मिलती है। इसलिए कई पुस्तक प्रेमियों को उधार लेना पड़ा।
पुस्तक मेले का आयोजन आम आदमी के लिए होता है। इन दिनों उसका सबसे अधिक हाथ तंग रहता है। आयोजकों ने इसका जरा भी ख्याल नहीं रखा। इससे भी किताबों को बिक्री पर असर पड़ रहा है। जब मेला खत्म हो रहा है, यदि तब शुरू हुआ हो तो स्थिति बेहतर होती। 

किताब बिन कैसा जीवन

वरिष्ठ लेखक शेखर जोशी- किताबें आदमी को दिशा देती हैं। एक तरह से अनुपस्थित गुरु की तरह हैं। वे हमें ज्यादा संवेदनशील और विवेकशील बनाती हैं। किताबों के माध्यम से दूसरों के अनुभव और ज्ञान हम तक पहुंचता है। हम उससे सीखते हैं। जैसे- रुसी लेखक मक्सिम गोर्की की आत्मकथा पढ़कर जीवन में आत्मविश्वास पैदा होता है। गांधीजी की आत्मकथा पढ़कर साफ बात कहने की सीख मिलती है।
सुप्रसिद्ध आलोचक मधुरेश- किताबों के बिना अपने जीवन की कल्पना करते हुए डर लगता है। लंबे थकाने वाले सफर के बीच अच्छी किताब ठंडे पानी के गिलास या ताजा हवा के झौंके की तरह लगती हैं।
चर्चित संस्मरणकार कांति कुमार जैन- पुस्तकें इतिहास को हमारा अंतरंग बनाती हैं और भूगोल को हमारा पड़ोसी। पुस्तकें हमें समझदार और संवदेनशील बनाती हैं। जो पुस्तकों से हाथ मिलाते हैं, वे कभी अकेले और अवसादग्रस्त नहीं होते। जो पुस्तकों को दोस्त बनाते हैं और उनके साथ रहते हैं, वे खुशकिस्मत होते हैं।
प्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले- भाषा मुनष्य की प्रकृति की सबसे बड़ी देन है। इस भाषा का सार किताबों में संग्रहित है। हमारे अनुभव और विकास की दिशा की तमाम मंत्रणा किताबों में छिपी है। किताबों के कारण हम आदमी हैं। जैसे मां से प्रेम करते हैं, वैसे ही किताबों से करें तो कभी गरीब और कमजोर नहीं समझेंगे अपने को। भाषा के कारण ही समाज में रहते हैं, वरना जंगल में बसेरा होता। 

पुस्तक

मुझको तो पुस्तक तुम सच्ची
अपनी नानी/दादी लगती
ये दोनों तो अलग शहर में
पर तुम तो घर में ही रहती

जैसे नानी दुम दुम वाली
लम्बी एक कहानी कहती
जैसे चलती अगले भी दिन
दादी एक कहानी कहती
मेरी पुस्तक भी तो वैसी
ढेरो रोज कहानी कहती

पर मेरी पुस्तक तो भैया
पढ़ी लिखी भी सबसे ज्यादा
जो भी चाहूँ झट बतलाती
नया पुराना ज्यादा ज्यादा
एक पते की बात बताऊँ
पुस्तक पूरा साथ निभाती
छूटे अगर अकेले तो यह
झटपट उसको मार भगाती

मैं तो कहता हर मौके पर
ढेर पुस्तकें हमको मिलती
सच कहता हूँ मेरी ही क्या
हर बच्चे की बाँछे खिलती

नदिया के जल सी ये कोमल
पर्वत के पत्थर सी कडय़ल
चिकने फर्श से ज्यादा चिकनी
खूब खुरदरी जैसे दाढ़ी

 (चर्चित कवि दिविक रमेश की कविता)