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मेरा ओलियगाँव : शेखर जोशी

शेखर जोशी

शेखर जोशी

वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशीजी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘मेरा ओलियागांव’ के अंश ‘हर शुक्रवार’ के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित हुए हैं। आप भी इन अंशों का आनंद लीजिए-

पक्की फसलों का सुनहरा सरोवर

हिमालय के प्रांगण में अल्मोड़ा जनपद की पट्टी पल्ला बौरारौ के गणनाथ रेंज की उत्तर-पूर्व दिशा में प्राय: 5500 फुट की ऊँचाई पर बसा मेरा ओलियगाँव दो भागों में विभाजित है। इस छोटे से गाँव में मात्र ग्यारह घर हैं। गाँव की बसासत ऊँचाई वाले भाग में  बांज, फयांट, बुरुँश, पयाँ और काफल के वृक्षों से घिरी है। ऊपर की पहाडिय़ों में चीड़ का घना जंगल है।

‘कुमाऊँ का इतिहास’ के लेखक पंडित बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार उन्नाव जनपद अन्तर्गत डोडिया खेड़ा नामक स्थान के प्रकाण्ड ज्योतिषी पंडित सुधानिधि चौबे ने कुँवर सोमचन्द से एक भविष्यवाणी की थी। वह यह थी कि यदि वह उत्तराखण्ड की यात्रा करें, तो उन्हें राज्य की प्राप्ति हो सकती है। तो, कुँवर 22 लोगों के साथ उत्तराखण्ड की यात्रा पर चले और ज्योतिषी जी की वाणी सच साबित हुई। कुँवर सोमचन्द ने कुमाऊँ में चन्द वंश राज्य की स्थापना की। सुधानिधि चौबे ने राज्य का दीवान बनकर चन्द राज्य को विस्तार और स्थायित्व प्रदान किया। सुधानिधि के वंशज इस राज्य के पुश्तैनी दीवान रहे। ज्योतिषी जी के गर्ग गोत्रीय वंशज झिजाड़ गाँव के जोशी कहलाए।

अनुमान किया जा सकता है कि झिजाड़ से कुछ परिवार नौ पीढ़ी पूर्व किसी सुरम्य स्थान की खोज में ओलियागाँव में आकर बस गए।

काठगोदाम-गरुड़ मोटरमार्ग पर मनाण और सोमेश्वर के बीच एक स्थान रनमन है। सड़क के दाँईं ओर खेतों से आगे कोसी नदी प्रवाहित होती है। दड़मिया का पुल पार कर जंगलात की सड़क पर आगे बढ़ें, तो मात्र आधा किलोमीटर चलने पर देवदारु का घना जंगल शुरू हो जाता है, जो प्राय: एक किलोमीटर तक फैला है और उसके बाद चीड़ वन प्रारम्भ होता है। इसी चीड़ वन से घिरा है ओलियागाँव शस्य श्यामल भूमि पर एक कटोरे के आकार में। गाँव के दोनों भागों के बीच कल-कल करती हुई एक छोटी नदी बहती है और उस पार चार मकानों के बाद गिरिखेत का मैदान, देवी थान और फिर सीधी चढ़ाई। इसी पहाड़ पर बहुत ऊपर बहता है, एक झरना। बरसात के मौसम में उस छोटी अनाम नदी की तेज धारा और इस झरने के शुशाट के कारण गाँव के आर-पार के घरों तक अपनी आवाज पहुँचाना मुश्किल हो जाता है।

गाँव की पूरब दिशा में बहुत दूरी पर भटकोट के शिखर दिखाई देते हैं, जिन पर सूर्य की किरण पड़ती हैं तो दिनारम्भ की प्रतीति होती है। इन्हीं शिखरों पर शीतकाल में पहली बर्फबारी होती है, तो ये रजत शिखर चमकने लगते हैं।

ऋतु परिवर्तन के साथ यह कटोरा भिन्न प्रकार के धान्य से भर उठता है। पहले धानी रंग के पादप, फिर खड़ी फसल की हरियाली और जब फसल पक जाती, तो धान्य का यह कटोरा सुनहरे सरोवर का रूप ले लेता है। घास के हाते ऊँची-ऊँची घास का कम्बल ओढ़ लेते हैं।

मैं भाग्यशाली था कि इसी गाँव में श्री दामोदर जोशी और श्रीमती हरिप्रिया जोशी के घर में सन 1932 के पितर पक्ष में तृतीया के दिन मेरा जन्म हुआ। नामकर्ण के दिन पुरोहितजी ने मुझे चन्द्र दत्त नाम दिया था, परन्तु वर्ष 1944 में मामा ने स्कूल में मेरा नाम चन्द्र शेखर लिखवाया। चन्द्र का दिया हुआ नहीं, शीर्ष पर चन्द्र धारण करने वाले शिवजी का पर्याय बना दिया।

हम तीन भाई-बहन थे। मैं उनमें सबसे छोटा था। कहा जाता है कि जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी नाक बहुत चपटी और सिर हांडी जैसा था। लेकिन माता-पिता को अपनी सन्तान कैसी भी हो, बहुत प्यारी होती है। मैं सबका लाड़ला था।

गाँव में हर घर के साथ फल-फूलों के बगीचे थे, पेड़ थे। हम लोगों का बचपन पेड़ों के साथ, पशुओं के साथ और फूल-पत्तियों के साथ बीता। हमने यह भी सीखा कि किस तरह से अनाज बोया जाता है, अनाज उगता है और अनाज काटा जाता है।

खेती में लड़कपन में हमारा कोई विशेष योगदान नहीं होता था, लेकिन हमें इसमें बहुत आनन्द आता था, खास तौर से जब धान की रोपाई होती थी। एक छोटे खेत में बेहन बोया जाता था। उसमें खूब घने पौधे होते थे। जब वे बड़े हो जाते थे, करीब 6-7 इंच ऊँचे, तो उनको वहाँ से उखाड़कर दूसरे खेतों में रोपते थे। उससे पहले जिन-जिन खेतों में रोपाई होनी होती, उनको पानी से खूब सींचा जाता। पानी से भरे खेत में दाँता चलाया जाता, जो कि मिट्टी के ढेलों को तोड़ देता। उससे खेत की मिट्टी समतल हो जाती थी। धान रोपाई का काम पूरे दिन का होता था। बहुत से खेतों में रोपाई होती थी, तो खूब सारे मजदूर लगते थे। वे लोग भी उसको एक उत्सव की तरह से मनाते थे, क्योंकि उस दिन उनको खूब अच्छा खाना मिलता था—रोपाई वाला। उस दिन हलवाहे की विशिष्ट भूमिका होती थी। अगर हलवाहा हुड़किया भी होता, तब तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। हुड़किये का मतलब यह है कि वह डमरूनुमा वाद्य ‘हुड़कीÓ को हाथ में लेकर बजाता और पगड़ी बांध कर खेत में सिर्फ गाता फिरता। कतार में औरतें पूलों में से पौधे लेकर रोपती जातीं। अलग-अलग जगहों पर पूले रख दिए जाते। औरतें पूले खोलकर उनमें से पौधें निकालतीं और रोपती जातीं। हुड़किया चंद्राकार या सीधे पीछे हटता जाता और हुड़की बजाता हुआ गाता जाता। वह कोई कथानक लगा देता—राजा भर्तृहरि या राजा हरिश्चन्द्र का, बम-बम्म-बम… हुड़की की आवाज के साथ। औरतें आखिर में टेक लेतीं और वे भी साथ में गातीं। खेत में जाने से पहले हरेक को रोली और अक्षत का टीका लगाया जाता। उस दिन उनके लिए विशेष किस्म का कलेवा बनाया जाता—मोटी रोटियाँ होती हैं, बेड़ुवा मतलब मंडुवा और गेहूँ की मिली हुईं रोटियाँ, कुछ पूडिय़ां और सब्जी। कलेवा हुड़किया के लिए अलग, हलवाहे के लिए अलग, हलवाहे की पत्नी के लिए अलग और आम महिलाओं के लिए अलग बनता। दिन में सभी के लिए खेत में ही दाल-भात पहुँचाया जाता। सभी भर पेट खाना खाते और उनके बच्चे भी आ जाते। शाम को जब औरतें काम खत्म कर देती थीं, तो हाथ-पैरों में लगाने के लिए उनको थोड़ा-थोड़ा तेल दिया जाता था।

खेतों में बने बिलों में पानी भर जाने से बड़े-बड़े चूहे निकलते थे। शाम को अगर खेत बकाया रह जाता, तो मालिक नाराज न हो जाए, इसलिए हुड़किया हुँकारी लगाता था—’धार में दिन है गो, ब्वारियो…। छेक करो, छेक करो।’ मतलब कि चोटी पर सूरज पहुँच गया है। जल्दी करो, बहुओ, जल्दी करो।

कार्तिक में जब धान की फसल पक जाती थी, तो उसकी पूलियाँ खेत में ही जमा करके रख दी जाती थीं। धान की पेराई के लिए इस्तेमाल होने वाली बाँस की चटाइयाँ को ‘मोस्टÓ कहते थे। ये पतले बाँस की नरसल की चटाइयाँ होती थीं, जो कि 10 फुट बाई 10 फुट या 8 फुट बाइ 8 फुट की होती थीं। ये चटाइयाँ बड़े खेत में बिछा दी जाती थीं और उनमें धान के पूले रख दिए जाते थे। लकड़ी का बड़ा-सा कुंदा रखकर उसमें धान को पछीटा जाता था। पूलियों में जो धान रह जाता, उसे पतली संटियों से झाड़ा जाता था। धान के खाली पराल को अलग करते। चाँदनी रात को पूरी रात यह कार्यक्रम चलता। एकाध बार मैं भी जिद करके इस तरह के कार्यक्रम में गया। कई मजदूर लगे थे। हमारी ईजा भी गई थीं। धान की वह खुशबू और चाँदनी रात, बहुत आनन्द आता था।

धान की पकी फसलों को नुकसान पहुँचाने में जंगली सुअरों का बड़ा हाथ रहता। वे अपनी थूथन से खेत की मिट्टी को खोद कर न जाने क्या ढूँढ़ते रहते। लीलाधर ताऊजी के पास एक भरवाँ बन्दूक थी, जिसमें बारूद, साबुत उड़द के दाने, कपड़े का लत्ता, ठूँस-ठूँस कर ट्रिगर के ऊपरी सिरे पर टोपी चढ़ाने के बाद फायरिंग की जाती, तो सुअर भाग जाते। यह काम देर रात में किया जाता था।

इस बन्दूक से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है, जिसने हमें बचपन में बहुत गुदगुदाया था। हमारी माधवी बुआ की ससुराल मल्ला स्यूनरा में थी, जो हमारे गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था।

उस बार उनका पोता राम अकेला ही अपनी दादी के मायके में आया था। वह 14-15 वर्ष का किशोर बहुत ही दुस्साहसी था। ताऊजी की भरवाँ बन्दूक उनके शयनकक्ष में कोने पर टंगी रहती थी। एक दिन महाशय राम की नजर उस पर पड़ी। उसने साबुत उड़द के दाने, पुराने चिथड़े, कुछ कठोर पत्थर के टुकड़े जमा किए। उसे न जाने कैसे बारूद का पाउडर भी आलमारी में मिल गया था। उसने खूब ठूँस कर बारूद से सना यह सामान बन्दूक की नाल में भरा। अब समस्या ट्रिगर (घोड़ी) में पहनाने वाली टोपी की थी। वह नहीं मिली, तो राम ने ट्रिगर उठा कर छेद के मुँह के सामने जलता चैला (छिलुक) रख दिया। बन्दूक ऊँचाई पर टिकाई हुई थी। उसके अन्दर भरे मसाले में आग लगी, तो बारूद विस्फोट करता हुआ, दीवार के ऊपर रखे ताऊजी के जूते से टकराया। दूसरी तरफ छिद्र से निकली चिंगारी के छींटे राम के कपाल पर जा लगे। खैरियत यह थी कि उसकी आँखें सुरक्षित रहीं। गाँव के लड़कों की तरह वह टोपी पहने रहता था। उस दिन राम ने अपनी टोपी आँख की भँवों तक खींच रखी थी। हादसे के बाद वह बन्दूक को यथास्थान रख आया ।

बाद में ताऊजी जब अपना जूता पहनने लगे, तो उसमें बड़ा-सा छेद देख कर वह चौंके। राम ने उन्हें बताया कि एक काला कुत्ता जूतों के पास बैठा था। शायद उसी की यह कारस्तानी हो। लेकिन जब किसी ने राम की टोपी को ऊपर खिसका कर ठीक से पहनाने की कोशिश की, तो ललाट में चानमारी के निशानों ने उसकी पोल खोल दी। राम अपने गाँव भाग गया।

पकी फसलों, विशेषकर धान के खेतों के बीच से गुजरने का अपना आनन्द होता था। पके धान की मादक गंध तन-मन को एक नई स्फूर्ति से भर देती थी।

धान की पेराई के अलावा मुझे गेहूँ की मड़ाई में भी बहुत आनन्द आता था। गेहूँ की पूलियाँ घर के आँगन के ऊपर वाले खेत में लाकर जमा कर दी जाती थीं। आँगन की खूब अच्छे से सफाई करके लिपाई कर दी जाती थी। जब आँगन सूख जाता, तो पूलियाँ आँगन में फैला दी जातीं। फिर बैलों को गेहूँ की बालियों के ढेर के ऊपर चलाया जाता था। हम बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथ में संटी लेकर चलते थे—’हौ ले बल्दा, हौ ले- हौ ले… कानि कै लालै बल्दा… पुठि कै लालै, हौ ले-हौ ले…’ मतलब बैल राजा चल/धीरे-धीरे चल/कंधे में लाद कर लाएगा, पीठ पर लाद कर लाएगा/बल्दा चल। बैल गेहूँ की पूलियों को अपने पैरों से कुचलकर दानों को अलग कर देते थे। बैल गेहूँ न खा लें, इसलिए उनके मुँह में जाली बांधी जाती थी। बाद में सूपों से या चादरों से हवा करके भूसे को उड़ाया जाता। एक सयाना इधर से, तो दूसरा उधर से चादर पकड़ता और चादर को तेज-तेज ऊपर-नीचे कर हवा करते। इससे भूसा उड़ता जाता और गेहूँ नीचे गिरता जाता। उसके बाद हम बच्चे जहाँ गाय-भैंस चरने जातीं, वहाँ से सूखा हुआ गोबर लेकर आते। पहाड़ में गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि गोबर खेती के लिए बहुत जरूरी होता है, इसलिए उसे बरबाद नहीं किया जाता। गोशाला की रोज सफाई होती। गोबर को गोशाला के बाहर डाल दिया जाता। वहाँ खाद का ढेर लगा रहता। जो घास पशुओं के नीचे बिछाई जाती, वह उनके पेशाब और गोबर में सन कर सुनहरी खाद हो जाती। वही जैविक खाद खेतों में डाली जाती थी। वह खाद फर्टिलाइजर से कहीं ज्यादा अच्छा होती थी।

हम बच्चे सूखा हुआ गोबर लेकर आते थे। उस गोबर का ढेर लगा करके उसमें आग लगा दी जाती थी। उसके जलने से राख बनती। बाँस की चटाइयाँ बिछा कर और उन पर गेहूँ डाल कर उसमें राख डाली जाती। फिर पैरों से उसको मिलाया जाता। राख कीटनाशक दवा का काम करती थी। यह गाँव की विधि थी कि किस तरह से अनाज को सुरक्षित किया जाता था। जिन चटाइयों पर खेती का काम होता था, उनको ऐसे ही लपेट कर नहीं रखा जाता था। उन चटाइयों के लिए बकायदा गोशालाओं में गाय का या अन्य पशुओं का मूत्र कनस्तर में इकट्् ठा किया जाता था। पशुओं के मूत्र को इन चटाइयों पर छिड़का जाता था। उससे एक तो चटाइयों में लचीलापन आ जाता था। दूसरा, कीड़े नहीं लगते थे। इससे ये चटाइयाँ वर्षों चलती थीं। मूत्र सूखने पर चटाइयों को लपेटकर टाँड़ के ऊपर डाल दिया जाता। जब जरूरत हुई, तब निकाल लिया जाता।

हम बच्चे बचपन से ही खेती-बाड़ी के बारे में जान जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ करते भी रहते थे। जैसे—गर्मियों में बैंगन और मिर्च की पौध लगाते। हम अपनी-अपनी क्यारियाँ बनाते थे। फिर उनमें मिर्ची और बैंगन के पौध रोपते थे। भिंडी की पौध नहीं होती थी। भिंडी के बीज बोए जाते। शाम को हम पौधों  में गिलास से पानी डालते थे। फिर पौधों का क्रमिक विकास देखते थे—पौधे बड़े होते जाते। फिर उनमें फूल लगते। इसके बाद उनमें फल लगते। जब पौधों में पहला फल दिखाई देता, तो हमें बहुत खुशी होती। अगर कोई सीधी उंगली से फल की तरफ इशारा कर देता, तो हम टोकते कि ऐसा करने से सड़ जाएगा। उंगली टेढ़ी करके दिखाना होता था कि वह देखो, फल आ गया है।

इस तरह का मनोविज्ञान और लगाव बचपन से वनस्पतियों के साथ था।

पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तरह पतली ककड़ी नहीं होती। वहाँ बड़ा खीरा होता है जिसे कहते ककड़ी ही हैं। खीरे की बेल को कोई सहारा देना पड़ता है। बेलों के सहारे के लिए कोई छोटा पेड़ काटकर या पुराने पेड़ की टहनी को काटकर उसे लगाया जाता था। बेल उस पर लिपट कर चढ़ जाती। पेड़ के सहारे खीरे लटके रहते थे। जब फसल समाप्त हो जाती, तो बेल को निकाल दिया जाता। उसमें छोटे-छोटे खीरे लगे रहते थे। इनकी अब बढऩे की सम्भावना नहीं रहती थी। हम बच्चे उनको निकालकर उन पर सीकों की टाँगें लगाकर बकरे की तरह से उनकी बलि देते थे। ऐसा हमने मन्दिरों में देखा होता था, जहाँ बलि दी जाती थी। मेरी एक कविता है–

काली की बलि पूजा का स्वांग,
रचा लगा तिनकों की टाँग
हरी ककड़ी के अन्तर को छेद
छिन्न कर उसका मस्तक बाँटा प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद।

खट्टे अनार को दाडि़म कहते हैं। पन्सारी के यहाँ चटनी के लिए जो अनार दाना बिकता है, वह दाडि़म का ही बीज होता है। दाडि़म का फूल सिन्दूरी रंग का होता है। आरी के दाँतों की तरह तिकोनी उसकी चार-पाँच पंखुडिय़ाँ होती हैं। उसको उल्टा करके रख देने से फूल खड़ा हो जाता। वे फूल पेड़ों के नीचे खूब गिरे रहते थे। हम उनको इकट्ठा करके लाते और कतार में रखकर बारात निकालते थे। उनमें सींकें लगाकर डोली वगैरह बना लेते. इस तरह के खेल होते थे हमारे जो वनस्पति संसार से हमको जोड़ते थे।

बिगौत की दावत

हमारे घर में गायें थीं। हमारी सबसे प्रिय गाय का नाम बसंती था। वह ईजा के मायके से आई हुई गाय की तीसरी पीढ़ी की थी, इसलिए ईजा उसको बहुत प्यार करती थीं। हम भाई-बहन उसको मौसी कहते थे। मैं जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो कभी-कभी गायों को ग्वाले के पास छोडऩे के लिए ले जाता था। एक बार मैं बसंती के साथ छेड़-छाड़ कर रहा था—कभी उसके थन में हाथ लगा देता, तो कभी उसकी पूँछ को पकड़ कर सिर पर लगा देता।

बसंती ने सींग हिलाकर मना किया, लेकिन मेरी शैतानी बढ़ती गई। पहाड़ी रास्ते घुमावदार होते हैं। आखिर में तंग आकर बसंती ने सिर नीचा करके मेरी टाँगों के नीचे से सींग डाले और मुझे उठाकर ऊपर घुमावदार रास्ते पर रख दिया। जैसे—मुझे सजा दे दी हो। तब में समझ गया कि ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए।

यह बात बसंती के प्रसंग में समझ में आई कि पशु मनुष्य की भाषा कैसे समझते थे। जब खेतों में फसल कट जाती थी, तो पशुओं को कुछ दिनों तक उन्हीं खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। एक बार कोई मेहमान आए, तो उस समय घर में चाय के लिए दूध नहीं था। ईजा ने खेत की तरफ जाकर बसंती को हाँक दी। बसंती ने सिर उठाकर ऊपर देखा। ईजा ने कहा, ”आ बसंती।’’ वह नजदीक आ गई। ईजा के हाथ में गिलास था। ईजा ने उस गिलास में थोड़ा दूध दुहा। फिर ईजा ने बसंती से कहा, ”अभी ठहर’’ और बसंती खड़ी रही। जैसे—सब कुछ समझ रही हो। ईजा घर आईं। गिलास अलमारी में रखा। कटोरदान से एक रोटी निकाल कर बसंती के लिए ले गईं। ईजा ने बसंती को रोटी खिलाकर उसकी पीठ थपथपाकर कहा, ”जाओ’’ तो वह चली गई। इस तरह का सम्वाद पशुओं और मनुष्यों के बीच होता था।

और थोड़ा बड़े होने पर एक और घटना मेरे जीवन में घटी। हमारे गाँव के एक परिवार की गाय सुरमा थी। सफेद रंग की बड़ी खूबसूरत गाय थी। हमारे पंचायती ग्वाले मोहनदा को उस गाय से बहुत लगाव था। सुनते हैं कि वह अपने दिन के कलेवे से एक रोटी बचाकर सुरमा को खिलाते थे। सुरमा भी उनको बहुत प्यार करती होगी। एक बार मोहनदा काफल तोड़ते हुए पेड़ से नीचे गिर गए। वह शाम को जब जंगल से लौटते थे, तो बच्चों के लिए मौसम के हिसाब से जंगली फल लेकर आते थे। वह हम बच्चों के लिए काफल लाने के लिए पेड़ पर चढ़े होंगे, गिर गए। शाम हो गई। सारी गायें अपने-अपने बच्चों की याद कर घर चली आईं, लेकिन सुरमा मोहनदा के पास ही रह गई। मोहनदा उठने में लाचार थे। गाँव वालों ने देखा कि सभी गायें चली आई हैं, लेकिन मोहनदा साथ में नहीं हैं। सुरमा के घरवालों ने देखा कि सुरमा भी नहीं आई है। सब लोग दौड़े-दौड़े जंगल की तरफ गए। वहाँ देखा कि मोहनदा गिरे हुए हैं और सुरमा उनको चाट रही है। मोहनदा को उठा कर लाया गया और पीछे-पीछे सुरमा भी आ गई।

वह ऐसे आई, जैसे—मोहनदा की माँ हो।

हमारे ईजा-बाबू में एक गाय को लेकर खूब मतभेद हुआ था। इसकी याद मुझे आज भी है। हुआ यह कि एक दिन बाबू कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि पड़ोसी  गाँव का एक आदमी अपने ढोरों को चरा रहा है। सभी पशु बहुत दुर्बल हो रहे थे। पैलागी-आशीष के बाद बाबू ने उन पशुओं की हालत पर चिंता जताई, तो वह व्यक्ति अपने पास घास-चारा न होने का रोना रोने लगा। उसने आग्रह किया कि एक गाय बाबू रख लें।

बाबू ने विनोद के लहजे में कहा, ”अब इस हाड़ के पिंजर का गोदान लेने के लिए मैं ही रह गया हूँ?’’

उस व्यक्ति ने फिर जिद की, ”आप वैसे न रखो, तो कुछ दाम दे देना, लेकिन आपके घर में यह पल जाएगी। मेरे घर में तो यह भूखी मर जाएगी और मुझे गोहत्या लगेगी। अच्छी नस्ल की गाय है, पर मुझ अभागे के घर आ मरी।’’

बाबू तब भी सहमत नहीं हुए तो वह गिड़गिड़ाया, ”आप पन्द्रह रुपये ही दे देना। उससे मैं दूसरे पशुओं के लिए घास खरीद लूँगा। मेरे दोनों ‘लुट’ इन्होंने चट कर दिए हैं।’’

उसकी इस दलील पर बाबू पसीज गए। उन्होंने उसे पन्द्रह रुपये देकर गाय हमारे घर पहुँचाने का आदेश दिया।

वह सफेद रंग की कद्दावर गाय थी। उसके सींग बैलों की तरह खूब बड़े थे। थनों के अलावा उसमें कोई भी लक्षण स्त्रैण होने का नहीं दिख रहा था। ईजा की पहली प्रतिक्रिया हुई, ”यह गाय है या बैल?’’

वह व्यक्ति गाय को गोशाला में खूँटे पर बाँधकर चला गया।

कहाँ ईजा की सुन्दर सलोनी बसंती गाय और कहाँ यह हड्डियों का ढाँचा!

नई गाय उपेक्षित ही रही। उस गाय को लेकर ईजा के अलावा दूसरा विरोध पंचायती ग्वाले मोहनदा का था। यह एक अलिखित नियम था कि गाँव में किसी गृहस्थ में किसी पशु की खरीद-फरोख्त हो, तो उसमें मोहनदा की सहमति जरूरी मानी जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ था। मोहनदा गुस्साए हुए थे। दूसरे दिन एक आँख के धनी मोहनदा ने पशुओं को जंगल ले जाते हुए इस गरीब जीव को हाँक कर भगा दिया। वह इधर-उधर डोलती रही।

बाबू ने मोहनदा को पूरी बात बताई, तो वह नरम पड़े, लेकिन ईजा के विचारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह घर की जूठन पूर्ववत अपनी लाड़ली बसंती को देती रहीं और इसकी भरपूर उपेक्षा करती रहीं। लेकिन बाबू हार मानने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह भिगोए हुए भट और दूसरी पौष्टिक चीजें गो-ग्रास के पिण्ड में रखकर उसे खिलाते और उसके लिए अच्छा चारा छाँटकर अलग रखते।

कुछ दिनों बाद उस गाय की काया में सुधार आने लगा। उसके दूध की मात्रा भी बढ़ गई। बाबू कहते, ”इसका दूध अलग से गर्म कर उसे दूसरी ठेकी में जमाया करो। यह अच्छी नस्ल की गाय है। इसके दूध में चिकनाई ज्यादा है। इसके मक्खन में ज्यादा घी निकलेगा।’’ ईजा मुँह बिचकाती, लेकिन बाद में यह बात सच निकली।

उस गाय को हमारे गोठ में मान्यता प्राप्त करने में काफी समय लगा। इसका एक कारण शायद उसका कद और बड़े सींग भी थे और बसंती की तुलना तो थी ही!

गोधूलि में गले में बंधी घंटियों के साथ गायों का जंगल से लौटना बड़ा मोहक होता था। एक मुख्य गाय होती थी। उसके गले में एक गोल खोखल ताम्बे या पीतल का पाइप जैसा होता था। उसके अन्दर टकराने वाला लकड़ी का एक टुकड़ा होता था। जब गाय चलती थी, तो घन-घन-घन-घन-घन की आवाज आती थी। अन्य गायें मुख्य गाय के पीछे-पीछे आती थीं। यह एक संकेत होता था कि गायें लौट आई हैं। घन-घन-घन की आवाज को बछड़े भी सुनते होंगे, तो वे भी अपनी भाषा में खुशी जताने लगते थे। गाय के गले में बंधे पाइपनुमा वाद्य की घन-घन चिडिय़ों की चहचहाट के साथ एक मधुर सांगीतिक रचना प्रस्तुत कर देती थी।

गायें जब जंगल से लौटतीं, तो कभी-कभी, कोई गाय बेचैन-सी दिखाई देती। घर वाले उसकी बेचैनी का कारण समझ जाते और एक छोटे टब में पानी लाकर उसमें मुट्ठीभर नमक घोलकर उसके सामने रख देते। वह ज्यों ही पानी पीती, उसकी नाक के दोनों छेदों से लपलपाती हुई जोंकें बाहर निकलतीं, जिन्हें हाथ से खींचकर बाहर फेंक दिया जाता। जो जोंकें नमकीन पानी में गिर जातीं, वे तत्काल विलीन हो जातीं। जोंकों से मुक्ति पाकर गायें फिर सहज हो जाती थीं। पहाड़ों में गीली जगहों पर जोंकें रहती हैं और पैदल चलने वालों के पैरों से चिपक कर खून चूसने के बाद मोटी होकर अपने आप गिर जाती हैं। आदमी को जब पैर में खुजली होने लगती है, तब उसे इस शोषण का पता चलता। मेरे साथ जब भी ऐसा हुआ, खुजलाने पर उस जगह सूजन आ जाती थी।

जब गायें बियाती थीं, तो सयाने लोग 22 दिनों तक उनका दूध नहीं पीते थे। गाय बियाने के 22वें दिन लापसी बनाई जाती थी और चमू देवता के थान पर चढ़ाई जाती थी। चमू पशुओं के देवता होते हैं। उसके बाद सयाने लोग भी दूध पीने लगते थे। लेकिन इस बीच दूध को गर्म करने पर वह छेने जैसा हो जाता था। पहाड़ में उसे बिगौत कहते हैं और मैदानी इलाके में खिजरी। प्राय: गाय दूध कम देती थी। ऐसा होता नहीं था कि पूरे गाँव के बच्चों को खिजरी खाने के लिए एक साथ बुला लिया जाए। ऐसे में एक-एक घर के बच्चों को बुलाया जाता था। उनको खिजरी दी जाती थी। फिर दूसरे दिन अगले घर के बच्चों को बुला लिया जाता। ऐसे मौके कई आते थे। लोगों की गाय बियाती थी, तो दूध फेंका नहीं जाता था, बच्चों को दिया जाता था। आज भी खिजरी खाने की इच्छा होती है।

गायों के नवजात बछड़ों को कुलाँचे भरते देखने का सुख और उनके साथ हाथ-पैरों के सहारे उछल-कूद करने का सुख जिन बच्चों ने उठाया है, वे ही इसकी ताईद कर सकते हैं।

अन्न और गोरस के प्रति बहुत आदर भाव प्रदर्शित किया जाता था, क्योंकि ये दोनों ही जीवनदायी तत्व माने जाते थे। दूध या दही यदि भूमि पर गिर जाता, तो उसे तत्काल पोंछ दिया जाता था ताकि किसी का पैर उस पर न पड़े। इसी प्रकार अन्न को भी पवित्र माना जाता था।

जीवन का रीटेक हैं शेखर जोशी की कविताएं : प्रो. राजेन्द्र कुमार

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।


इलाहाबाद : इलाहाबाद के साहित्यिक बिरादरी के सबसे खास पुरनिये शेखर जोशी पर जन संस्कृति मंच (कविता समूह) और परिवेश द्वारा बहुत दिन बाद इलाहाबाद वापस आने पर 20 जुलाई 2013 को संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पर ‘नई कहानी के चर्चित कहानीकार शेखर जोशी के बजाय चर्चा के केन्द्र में था शेखर जोशी का कवि रूप जो उनके कहानीकार रूप में विकास का एक हद तक साक्षी भी था’। यह बात उनके प्रथम कविता संग्रह ‘न रोको उन्हे शुभा’ की चर्चा पर प्रायः सभी वक्ताओं द्वारा संज्ञान में ली गई। संग्रह की भूमिका कवि वीरेन डंगवाल द्वारा लिखी गई है और लेखक द्वारा उसका समर्पण कवि हरीशचन्द्र पांडेय के लिए किया गया है। अस्सी पार शेखर जी को अपने बीच पाकर जहाँ शहर का साहित्यिक समाज गदद था वहीं इलाहाबाद के छूटने का दर्द कई बार शेखर जी की आँखों से बाहर आने को आतुर दिखा।

संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में शहर इलाहाबाद के मशहूर कवि हरीशचन्द्र पांडेय को सुनना बेहद महत्त्वपूर्ण रहा। अपने सधे हुए वक्तव्य में उन्होंडने रेखाँकित किया कि शेखर जोशी की कविता में सिर्फ पहाड़ का सौन्दर्य ही नहीं, श्रम का सौन्दर्य भी शामिल है। यथार्थ की जटिलताओं से टकराती उनकी कविताओं में कलात्मक सन्धान के साथ कथ्य भी है। वस्तुतः वह जिस यथार्थ के अनुभव से रूबरू होते हैं, उसकी जटिलताएं कविता में संकेत के रूप में सामने आती हैं और कहानियों में इन्हें विस्तार मिलता है। वह अगर कविता भी लिखते तो उतने ही बड़े कवि होते है जितने बड़े कहानीकार हैं। दिल्ली से आए जन संस्कृति मंच, कविता समूह के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशुतोष कुमार ने शेखर जोशी को श्रम के सौन्दर्य के साथ-साथ श्रम की विडंबना के कवि के रूप में याद किया और कहा कि उनकी कविताओं में कई ऐसे सूत्र मिलाते हैं जिनसे नई कहानी के संघर्ष को भी समझा जा सकता है।

इस अवसर पर बोलते हुए शेखर जोशी ने कविता के सौन्दर्य के बजाए इनकी रचना प्रक्रिया को खोलना महत्त्वपूर्ण समझा। कई कविताओं के पाठ और इनके लिखे जाने की स्थितियों पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि विचलित करने वाली स्थितियों में बनने वाले रचनात्मक दबाव से ही यह कविताएं लिखी जा सकी है। इनका समय करीब 55 से 60 साल के लम्बे अंतराल में फैला हुआ है। मैं नही जानता कि इन कविताओं के पसन्द किए जाने के पीछे इनकी गुणवत्ता है या मेरे प्रति प्यार, लेकिन इनके सृजन के लिए मेरा परिवेश ही मुझे जब-तब प्रेरित करता रहा है। इस अवसर पर उन्होंने सिख विरोधी दंगों के समय लिखी गई लम्बी कविता ‘अखबार की सुर्खियों में चला गया करतार’ के साथ- साथ ‘पाखी के लिए’, ‘अस्पतल डायरी’, आदि कई कविताएं सुनाकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।

अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ आलोचक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि शेखर जी की कविता में परिवेश और उसकी स्मृति-विस्मृति को फिर से जी लेने की इच्छा व्यक्त हुई है। उनकी कविता जीवन का रीटेक है। गोष्ठी के आखिर में दोनो वक्ताओं ने अपनी पसन्द की दो- दो कविताएं सुनाई। शुरुआत में वरिष्ठ कवि शिवकुटी लाल वर्मा, शायर ख्वाज़ा जावेद अख्तर और महान स्त्रीवादी चिंतक शर्मिला रेगे को श्रद्धांजलि दी गई। संयोजन दुर्गाप्रसाद सिंह ने किया जबकि संचालन रामायण राम ने किया। कार्यक्रम में जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, रामजी राय, जी.पी. मिश्र, कहानीकार अनिता गोपेश, नीलम शंकर, कवि संतोष चतुर्वेदी, विवेक निराला, अरुण आदित्य, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव अविनाश मिश्र सहित बड़ी संख्या में छात्र नौजवान शामिल थे।

प्रस्तुति‍ : प्रेम शंकर, राष्ट्रीय सचिव, जन संस्कृति मंच

‘न रोको उन्हें शुभा’ पर परिचर्चा 20 को

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इलाहाबाद : प्रख्यात कहानीकार शेखर जोशी के कविता संग्रह ‘न रोको उन्हे शुभा’ पर परिचर्चा हेतु जनसंस्कृति मंच के कविता समूह और इलाहाबाद विश्वेविद्यालय के छात्रों की संस्था ‘परिवेश’ की ओर से संगोष्ठी का आयोजन 20 जुलाई की शाम 5 बजे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में कि‍या जा रहा है।

नई कहानी की मुख्य धारा के समानांतर इलाहाबाद में अमरकांत, मार्कंडेय और शेखर जोशी मिलकर एक ऐसी त्रयी का निर्माण करते हैं जो नई कहानी को निम्न मध्यवर्गीय यथार्थ के करीब ले जाती है। लेकिन शेखर जोशी के कविता संग्रह ‘न रोको उन्हें शुभा’ का प्रकाशन तथा पिछले दिनों प्रकाशित हुए मार्कंडेय के कविता संग्रह ‘यह पृथ्वी तुम्हे सौपता हूं’ से एक बात और साफ होती है कि कहानी विधा के ये उस्ताद अपने समय और समाज के अनुभवों तथा उसकी रचनात्मक अभिव्यक्तियों को कविता जैसी विधा में भी अभिव्यक्त करते रहे हैं। संग्रह में छपी कवितायें कई चर्चित पत्र–पत्रिकाओं में उस दौर में ही छप चुकी हैं जब इनकी ख्याति बतौर एक कहानीकार हो चुकी थी। जाहिर है इनका संग्रह के रूप में प्रकाशन एक सुखद संयोग है। इस संयोग को कविता केन्द्रित एक सार्थक बहस के रूप में दर्ज़ करने हेतु यह आयोजन किया जा रहा है।

परिचर्चा में जसम कविता समूह के संयोजक युवा आलोचक आशुतोष कुमार, कवि हरीशचन्द्र पांडेय शिरकत करेंगे और प्रख्यात आलोचक-कवि राजेन्द्र कुमार कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे।
इस अवसर पर शेखर जोशी जी की गरिमामय उपस्थिति से श्रोताओं को उनसे रूबरू होने का मौका मिलेगा।

प्रस्तुति‍ : प्रेम शंकर, राष्ट्रीय सह सचिव, जन संस्कृति मंच

नयन-माथे से लगा लूँ, उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ : पुनेठा

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के हाल ही में प्रकाशित पहले कविता संग्रह ‘न रोको उन्‍हें शुभा’ पर युवा कवि-आलोचक महेश चंद्र पुनेठा की समीक्षा-

शेखर जोशी मूलरूप से कहानीकार के रूप में जाने-जाते हैं पर उनके बारे में वीरेन दा का यह कहना बिल्कुल सही है कि कविता गुठली की तरह उनकी कहानी के बीचों-बीच छिपी है। कविता की यही गुठली है जो अंकुरित हो सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘न रोको उन्हें शुभा’ नाम से एक कविता-वृक्ष की तरह हमारे सामने खड़ा है। इस वृक्ष में विविध रूप-रंग-गंध के कविता-पुष्प खिले हैं। इन कविताओं में जीवन और प्रकृति के अनेकानेक दृश्य-छवियाँ-छटाएँ बिखरी पड़ी हैं जो कवि के लम्‍बे जीवनानुभव की निष्‍पत्ति हैं। इन कविताओं में मजदूर और किसान चेतना के दर्शन तो होते ही हैं साथ ही एक सम्‍वेदनशील मन की भावसिक्त लहरें पाठक को भिगोती भी हैं। ये पहाड़ी नदी की तरह न होकर झील की तरह हैं जो ऊपर से देखने पर शांत-अविचलित दिखती हैं पर भीतर से हलचल से भरी हुई होती हैं जिनमें ढेरों मूँगे-शंख-सीपियाँ हैं।

पिछले दिनों युवा उपन्यासकार दयानंद पाण्डेय ने अपने रिपोर्ताज में लिखा कि शेखर जोशी किसान चेतना के नहीं, बल्कि मजदूर चेतना के कहानीकार हैं। मुझे उनका यह मूल्याँकन अधूरा लगा। शेखर जोशी के कहानी संग्रह ‘मेरा पहाड़’ में हमें ऐसी अनेक कहानियाँ मिलती हैं जिनमें पहाड़ी किसान जीवन के संघर्ष दिखाई देते हैं। उसी तरह समीक्ष्य संग्रह की कविताओं में भी। ‘धान रोपाई’, ‘प्रवासी का स्वप्न’, ‘आभार, ‘अन्नप्रसवा!’, ‘स्मृति में रहें वे’ जैसी कविताएं केवल किसान चेतना से लैस कवि ही लिख सकता है। उसे ही ‘धान की बालियों का वह पागल नर्तन’, धान की सुवास तथा उसकी विविध किस्मों की पहचान हो सकती है। वही कवि इस तरह से लोकगीत के बोलों को रेखाँकित कर सकता है- धरती माँ है/देगी, पालेगी, पोसेगी उन्हीं को/जो उसकी सेवा में जाँगर धन्य करेंगे। धान रोपाई का ऐसा सूक्ष्म चित्रण वही कर सकता है जिसने किसान जीवन को नजदीक से देखा-भोगा हो- आज हमारे खेतों में रोपाई थी धानों की/घर में/बड़ी सुबह से हलचल मची रही कामकाज की/खेतों में/हुड़के के थापों पर गीतों की बरषा बरसी/मूँगे-मोती की मालाओं से सजी/कामदारिनों ने लहँगों में फेटे मारे/आँचल से कमर कसी। जो कवि धान के लहराते खेतों के बीच खड़ा रहा हो कभी वही कह सकता है- कल ये फिर हरे-भरे झूमेंगे/मंजरित बालियाँ इठलाएँगी, नाचेंगी/सौंधी बयार मह-मह महकेगी। इन दृश्य-श्रव्य बिम्‍बों को पढ़ते हुए थोड़ी देर के लिए पाठक खुद को धान के खेतों के बीच खड़ा पाता है और उसके नासापुटों में धान की विविध किस्मों की खुशबू समा जाती है। शेखर जोशी को किसान मन की गहरी समझ है। वह उसके मन में उतरना जानते हैं। वह उस नब्ज को पहचानते हैं जिसके सहारे सीधे किसान मन में उतरा जा सकता है। उससे सम्‍वाद स्थापित किया जा सकता है। ‘अस्पताल डायरी-3 : आभार, अन्नप्रसवा!’ कविता इसका उदाहरण है। किसानों के प्रति इतना श्रद्धानवत कोई अन्य नहीं हो सकता है- नयन-माथे से लगा लूँ/उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ…..जो धरा पर सप्तगंधी अन्न-रंगों अल्पना लिखते। उनकी किसान चेतना का एक प्रमाण यह भी है कि वह अपनी कविता के लिये अधिकांश बिम्‍ब-रूपक भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। ‘मिलःनाइट शिफ्ट’ मे ड्यूटी करते हुए थके मजदूर की तुलना वह रस की अंतिम बूँद तक चूस दिए गए ‘गन्ने की सूखी ठठरी’ से करते हैं। उन्हें गबरू जवान जगतार ‘बकरी के छौने सा खिलंदड़ा’ लगता है। अस्पताल में बीमार मास्साब से खेती-बाड़ी की बात करने पर वह उनकी आँखों में ‘रोपाई वाले खेतों की तरलता’ देखते हैं और खेती-बाड़ी की बात करते हुए अपनी हारी-बीमारी और दुःख-चिंताओं को भूल जाते हैं। क्या किसी मध्यवर्गीय बोध के कवि के साथ ऐसा संभव है?

खैर मजदूर चेतना के रचनाकार के रूप में तो शेखर जोशी पहचाने ही जाते हैं। मजदूर जीवन की त्रासदी, शोषण-उत्पीड़न और संघर्ष उनकी नजर से कभी छुपा नहीं रहा। कहानी हो या फिर कविता हर विधा में प्रमाणिक रूप में अभिव्यक्त हुआ। प्रस्तुत संग्रह में ‘मिडनाइट-शिफ्ट’ तथा ‘कारखाना-1 व 2’ इसके उदाहरण हैं। उनके अनुसार मजदूर पुर्जे का प्रतिरूप है जिसका श्रम यंत्रक्रम से चलता है। कारखाना इन पुर्जों का ताना-बाना है जहाँ वह ‘यंत्रवत-यंत्रवेग से’ चलने को विवश है।

किसान-जीवन से प्रेम करने वाला व्यक्ति प्रकृति से प्रेम किए बिना नहीं रह सकता है। शेखर जोशी प्रकृति के प्रति गहरी रागात्मकता के रचनाकार हैं। ‘पहली वर्षा के बाद’, ‘ग्रीष्मावसान’, ‘विदा की बेला’, ‘नदी किनारे’, ‘मुझे अपने में समेटे’, ‘बसंताभास’ आदि कविताओं में प्रकृति के प्रति उनकी यह रागात्मकता देखी जा सकती हैं। उनकी कविताओं में आए लाल गदृगद खिलखिलाते बुरूँश के अरुणमुखी फूल, पार्श्‍व में फैले रजत श्रृंग, उफनती भादो की वेगवती नदी, आकाश ताकते देवदार, पहाड़ी ढलान पर खड़े चीड़ों के झबरीले शावक, भूरी मटमैली चादर ओढ़े बूढ़े पहाड़, कुहरे में ढँकी घाटियाँ, चुप्प सोया ताल, पहाड़ों का गहन विस्तार, घुँघराले बालों वाले खुफिया दोस्त सी लहरदार वसंती हवा, डूबता रवि, घिरती साँझ, झमाझम बरसता पानी, फूटते सोते आदि पहाड़ी अंचल के भू-दृश्य को किसी कुशल चितेरे की तरह चित्रित कर देते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार विश्‍वनाथ त्रिपाठी के नंगालताई गाँव से लौटने पर कवि को अपना गाँव याद हो आता है- वे ढलवाँ छतों वाले घर/सीढ़ी-दर-सीढ़ी  लहलहाती फसलें/निरंतर सम्‍वाद करती नदी/सरगोशियाँ करते चीड़ के लम्‍बे दरख्त/तेज हवा में सफेद हथेलियाँ चमकाती बाँज की टहनियाँ/वन से लौटती गोधन की डार/निकट आता वह घंटियों का मन्द्र स्वर। बड़ी बात यह है कि कवि को अपने गाँव की प्रकृति के साथ ही याद आते- वे संगी/वे साथी/वे स्वजन-परिजन/उन्हीं का दिया है यह जीवन-रस/स्मृति में रहें/रहें, वे आमरण।

कवि को वैज्ञानिक सदी पर गर्व है पर उनका यह गर्व गर्ववादियों की तरह अंधा नहीं है जिसमें गर्व करने वाले को उसकी कमियाँ नहीं दिखाई देती हैं। वह गुण-दोषों पर बराबर दृष्टि रखते हैं- धन्य हो हमारी विज्ञान सम्पन्न सदी/तूने कितना भर दिया हममें आत्मविश्वास/कितनी शक्ति/लेकिन, साथ ही बनाया कितना निरीह/ये चर्नोबिल, ये फुकोशिमा और ये अपना भोपाल।

‘अखबार की सुर्खियों में चला गया जगतार’, ‘मुजफ्फर नगर 94’, ‘उत्तराधिकार’, ‘स्वप्नगाथा’ उनकी अलग तेवर की कविताएं हैं जिनमें कवि की पक्षधरता का पता चलता है। साथ ही भारतीय लोकतंत्र के खोखलेपन को उघाड़ती हैं।

जहाँ तक इन कविताओं के भाषा-शिल्प की बात है, यह कहा जा सकता है कि चिर-परिचित जीवन प्रसंगों से जुड़ी होने के कारण तत्सम बहुल शब्दावली के बावजूद कविता की संप्रेषणीयता बाधित नहीं होती है तथा कविता की लय के चलते गद्य होने से भी बच जाती हैं। ताजे बिम्‍बों और रूपकों से भरपूर होने के कारण कुछ कविताओं को छोड़कर इनकी काव्यात्मकता में भी कमी नहीं आने पायी है। कहीं जरूर इस तरह की चूक हो गई हैं जो थोड़ा चौंकाती भी हैं। जैसे- धानों की हरी मखमल के किनारे/पीली गोट सरसों की…..धान के साथ सरसों का प्रयोग असंगत प्रतीत होता है। इसी तरह कवि का यह कहना समझ से परे है-शुभा!/अभिशप्त हैं पीढि़याँ/लिखने को कविताएं/बुनने को सपने/और अंकित करने को सतरंगी दुनिया।

कवि-कहानीकार शेखर जोशी की चिर इच्छा है- कि डूबकर पानी पीऊँ/जब तक जीना है प्रभु/मस्ती में जीऊँ। जीवटता और जिजीविषा से भरा कवि ही इस तरह की इच्छा रख सकता है। कवि की यह इच्छा अवश्य पूरी हो ताकि मस्ती से जीते हुए हिन्‍दी साहित्य को उनसे कुछ और अनमोल रचनाएं मिल सकें। जीवन के 80वें साल में आए उनके इस कविता-संग्रह का स्वागत होना ही चाहिए जिसके प्रकाशन के पीछे कवि की अपने बीते दिनों की स्मृति को दुबारा जीने की इच्छा रही। इस संग्रह को पढ़ने के बाद मेरा तो मन हो रहा है- नयन-माथे से लगा लूँ/उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ।

पुस्‍तक : न रोको उन्हें शुभा(कविता संग्रह)
कवि : शेखर जोशी
मूल्य-एक सौ पचास रुपये
प्रकाशक : साहित्य भंडार 50, चाहचंद, इलाहाबाद-211003

खट्टी-मीठी यादें : चंद्रकला जोशी

लूकरगंज, इलाहाबाद में अपने घर में चंद्रकला जोशी और शेखर जोशी, नवम्‍बर, 1999।

कथाकार शेखर जोशी की पत्‍नी और हमारी इजा(माँ) चंद्रकला जोशी जी का 23 अक्‍टूबर, 2012 की रात नि‍धन हो गया। मैं उन भाग्‍यशाली लोगों में से हूं जि‍न्‍हें उनकी आत्‍मीयता और स्‍नेह मि‍ला। अपने बारे में लि‍खा उनका संस्‍मरण श्रद्धांजि‍ल स्‍वरूप दे रहे हैं- 

मेरा बचपन राजस्थान के छोटे शहर अजमेर में बीता। मेरे बाबूजी वहाँ एक गवर्नमेंट स्कूल में अंग्रेजी व हिन्‍दी के अध्यापक थे। आठ भाइयों के बीच में मैं ही अकेली बहिन थी। बाद में 18 वर्ष के जवान भाई की मृत्यु के बाद दो बहिनें हुईं। बाबूजी ने तो मेरा पालन-पोषण बिल्कुल लड़कों की तरह किया था। वे पिता कम मित्र अधिक थे।

सन् 1955 में जब मैं बीए में थी तो प्राय: हम वयस्क सहेलियाँ आपस में होने वाले पति के बारे में बहस किया करती थीं। मेरी एक सहेली तो यह भी कहती थी कि भले ही पति काना हो पर पैसे वाला हो। मेरी राय उससे भिन्न थी। मैं कहती थी कि जीवनसाथी जैसा भी मिले मित्र जैसा हो और उसकी रुचि पढऩे-लिखने में हो, भले ही वह पैसा कम कमाता हो।

सावित्री कॉलेज, अजमेर में तो मैंने यूनियन के चुनाव में भी भाग लिया था और सर्वसम्मति से सेकेट्री पद के लिये चुन ली गई थी। सावित्री कॉलेज में एमए की कक्षाएं नहीं थीं। अत: एमए में मैंने अजमेर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिया। वहाँ उस समय प्रिंसिपल साहब वी.वी. जॉन थे। वे बहुत नामी शिक्षाविद् थे। वहाँ वर्ष में एक सप्ताह सोशियल वीक भी मनाया जाता था। उसमें अनेक प्रकार के क्रियाकलाप भी होते थे। मैंने भी डिबेट और नाटकों में भाग लिया था। उसी सप्ताह में एक दिन कवि सम्मेलन और एक दिन मुशायरा भी होता था।

हमारे बड़े भाई साहब इन सम्मेलनों में हमें वहाँ ले जाते थे। वे रात-रात भर वहीं चलते थे। कवि बच्चन जी,  नीरज और राजस्थानी कवि मेघराज ‘सेनाणी’ को तब मैंने पहली बार वहीं सुना था। मुशायरे में अली सरदार जाफरी भी आए थे और उनका ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती मुझे’ आज भी याद है।

बाबू जी ने क्योंकि गवर्नमेंट कॉलेज घर से दूर था,  अत: एक लेडी साइकिल भी मुझे दिलवा दी थी। उस जमाने में स्कूटर आदि का रिवाज नहीं था।

जॉन साहब ने एक और अच्छा काम छात्र-छात्राओं के हित में किया था। कॉलेज की लाइब्रेरी में ओपन सिस्टम कर दिया था। अब हम लोग अपनी पुस्तकें काउंटर पर रखकर जो मन में आए वही किताबें और पत्रिकाएं पढ़ सकते थे। वहीं मैंने ‘कहानी’ पत्रिका में अमरकांत जी की पुरस्कृत कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ और कमलेश्‍वर जी की ‘राजा निरबंसिया’ पढ़ी। भैरव जी ‘कहानी’ पत्रिका के संपादक थे। ‘कहानी’ के ही दूसरे अंक में शेखर जी की ‘कविप्रिया’ पढ़ी। अमरकांत जी की कहानी पढ़कर तो मुझे उस उम्र में भी रोमांच-सा हो आया था।

शेखर जी और मैं विवाह के 8-10 वर्ष पूर्व भी एक-दूसरे से परिचित थे। मेरे बाबूजी और इनके मामा एक-दूसरे के मित्र थे। पढ़ाई इन्होंने भी मामा के यहाँ रहकर ही की थी। अर्थशास्त्र से एम.ए. करने के बाद मैंने फिर मीरशाली से बी.एड. किया था। मीरशाली में हमारा बी.एड. का पहला बैच थ।

सन् 58 में ही मेरी नियुक्ति बीकानेर से लेडी एलगिन में अर्थशास्त्र की प्रवक्ता के पद पर हो गई थी। वहीं ‘कोसी का घटवार’ की एक प्रति इन्होंने मेरे लिए भेजी थी। बाबूजी रिटायर होने के बाद बीकानेर में एक जैन स्कूल के प्रिंसिपल होकर आ गये थे। मैं उनके साथ ही थी। मैंने वह प्रति बाबूजी को भी दिखलाई।

मैंने ‘कोसी का घटवार’ पुस्तक के लिये एक धन्यवाद का पत्र लिखा। वहीं मेरी एक बुआ (स्व. मोहन बल्लभ पंत जी की पत्नी) रहती थीं। मोहन बल्लभ जी वहाँ एक डिग्री कॉलेज में हिन्‍दी के प्रोफेसर पद पर थे। किताब पढ़कर बुआ व फूफाजी की प्रतिक्रिया हुई कि ‘‘क्या इस युवक से तुम्हारा विवाह नहीं हो सकता है?’’ मैंने बाबूजी को अपना विचार बतलाया। विवाह के बारे में इलाहाबाद पत्र लिखा गया। इलाहाबाद से फिर इनका पत्र मेरे लिए आया था। ‘‘कहीं तुम शेखर जोशी के लेखकीय व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तो विवाह के लिये तैयार नहीं हो। वह जीवन भर का फैसला है। कहीं तुम्हें बाद में पछताना न पड़े।’’ पर मैं अपने निर्णय पर अडिग थी। बाबूजी भी थोड़ी सी आनाकानी के बाद तैयार हो गये थे। सम्‍भवत: उनका स्वप्न किसी ऊँचे अधिकारी पद वाले दामाद का रहा होगा। इलाहाबाद रहने का आकर्षण तो ‘कहानी’ पत्रिका पढ़कर भी बहुत हो गया था।

सन् 60 में हमारा विवाह भी हो गया था। विवाह से पूर्व मैंने बीकानेर की नौकरी भी छोड़ दी थी। इलाहाबाद आकर तो मैं बहुत ही प्रसन्न थी। इलाहाबाद में इनके सभी मित्रों अमरकांत जी, भैरव जी, मार्कण्डेय जी ने छोटे भाई की पत्नी की तरह मुझे स्नेह सम्मान दिया। दो वर्ष करेलाबाग में रहकर फिर हम लोग भैरवजी के घर में आ गये थे। भैरव जी लूकरगंज में रहते थे। वे ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका का सम्‍पादन करने दिल्ली चले गये थे। अश्कजी तो प्राय: टहलते हुए हमारे यहाँ आ जाते थे और बार-बार कहते थे, ‘‘शेखर इस पढ़ी-लिखी लड़की को तुमने घर में बिठा रखा है?’’ उस समय इलाहाबाद तो साहित्यकार का अड्डा था। विभिन्न मत वाले साहित्यकार वहीं थे। अश्क जी के घर में साहित्यकारों की बैठकें हुआ करती थीं। बाहर से भी साहित्यकार वहाँ आते थे। साहित्यिक गोष्ठियों में ये हमेशा मुझे अपने साथ ले जाते थे।

सन् 60 के ही अप्रैल माह में अश्क जी के बड़े पुत्र उमेश जी के विवाह में साहित्यकार सम्मिलित हुए थे। राजेन्‍द्र यादव, मन्नू जी, मोहन राकेश, राजेंद्र सिंह बेदी आये थे। मोहन राकेश के ठहाके मैंने तभी सुने थे।

विवाह के तुरन्‍त बाद बाबू जी ने मेरी साइकिल पार्सल करके भेज दी थी। ‘‘पर साइकिल तुम इलाहाबाद में नहीं चलाओगी।’’ यह इनका कहना था।

सन् 62 में ही प्रतुल पैदा हो गया था और लूकरगंज के ही एक स्कूल विद्यावती दरबारी बालिका इंटर कॉलेज से मेरे लिये नियुक्ति का पत्र आ गया था। ‘‘मैं प्रात: 7 बजे से 5 बजे सायं तक वर्कशाप से लौटता हूँ। प्रतुल आया के भरोसे पर नहीं पलेगा। जब मैं 8 वर्ष का था मेरी माँ दिवंगत हो गई थी। मैं चाहूँगा कि मेरे बच्चों को उनकी मां मिले।’’

जीवन में कितनी ही बार अवसर नौकरी करने के आए पर ये हमेशा मेरी नौकरी के विरोध में रहे। कहने लगे सुधाजी  (स्व. अमृतराय की पत्नी) ने भी तो बच्चों के पीछे विधायकी छोड़ दी थी।

विवाह आप चाहे अपने मन से करें अथवा माता-पिता या मित्रों द्वारा तय किया गया हो, आपको सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत से समझौते करने पड़ते हैं।

सावित्री कॉलेज और गवर्नमेंट कॉलेज में तो जागरुक छात्रा की तरह नेतागिरी करती रही थी। यहाँ आकर परिवार की शांति के लिए मेरी नेतागिरी ठप्प हो गई थी।

यूँ 45 वर्ष के वैवाहिक जीवन की अनेक खट्टी-मीठी यादें हैं। शेखर जी को जो मैंने निकट से देखा, वे अपने लेखक मित्रों भैरव जी, अमरकांत जी और मार्कण्डेय जी के साथ जीवन में जब भी सुख-दुख के अवसर आये छोटे भाई की तरह विनम्र और संकोची ही रहे।

वर्कशाप के साथियों शर्मा जी, बसरा जी, गोयल साहब और विनोद जी के बीच ये हमेशा बड़े भाई की तरह रहे। भैरवजी व भाभी जी को दिवंगत हुए कई वर्ष हो गये पर उनके बच्चे, बहुएँ जब भी मिलते हैं, वही पुराना आदर-सम्मान देते हैं।

मेरे मायके और ससुराल के लोग हमेशा सहायक रहे हैं। मेरे छोटे भाई की किडनी फेल हो गई थी। इन्होंने मुझे हमेशा उत्साहित ही किया कि अगर मैं उसे अपनी किडनी दे दूँ तो उन्हें प्रसन्नता ही होगी, उस समय तीनों बच्चे छोटे ही थे।

आज जबकि मेरी दोनों बहुएं नौकरी वाली हैं और इस कारण उन्हें बच्चों को पालने में खासी दिक्कत हो रही है। मुझे लगता है कि उस समय मेरा नौकरी न करना ठीक ही था। लेकिन अब महिलाएं शौक के लिये नहीं, दिन-प्रतिदिन की घर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नौकरी कर रही हैं।

अब जबकि सब बच्चे अपने-अपने इस संसार में व्यवस्थित हो गये हैं। एक-दूसरे का साथ एक पल का भी नहीं छोड़ा जा रहा है। अब यह साथ न छूटे यही कामना है।

(सर्वनाम : 79/ जुलाई, अगस्‍त, सि‍तम्‍बर 2005 से साभार)


गोवा में बेटी कृष्णा और नाती ऋतुराज व देवराज के साथ चंद्रकला जोशी।

शेखर जोशी-कहा बापुरो इंद्र! विश्‍वनाथ त्रिपाठी

कथाकार शेखर जोशी

‘दाज्‍यू’, ‘कोसी का घटवार’, ‘बदबू’ और ‘आशीर्वचन’ जैसी कालजयी रचनाओं के लेखक शेखर जोशी 10 सि‍तम्‍बर को 80 वर्ष के हो गये हैं। इस अवसर पर वरि‍ष्‍ठ आलोचक वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी का संस्‍मरण-

शेखर जोशी को मैंने पहली बार देखा तो वे अमरकांत के ही साथ थे। अनुमानत: 1956 या 57 का बात होगी। काशी विश्‍वविद्यालय में एम.ए. फाइनल में रहा हूंगा या रिसर्च ज्वाइन करने की तैयारी में। मेरे मित्र थे अक्षोभ्येश्‍वरी प्रताप, जो बहुतों के मित्र थे। भारत के सीमावर्ती नेपाल क्षेत्र के समृद्ध ब्राह्मण जमींदार के घर के। एक मकान गोरखपुर-बेतिया हाता में। चलते-पुर्जे। बढ़-चढक़र बोलने वाले। विजयमोहन सिंह के साथी। कहानियाँ लिखते थे। साहित्यकारों से मेल-जोल बढ़ाने में माहिर। कालांतर में दूरदर्शन में उच्च पदाधिकारी- शायद समाचार सम्‍पादक हो गये थे। तब यानी विद्यार्थी जीवन में बिड़ला हॉस्टल में रहते थे। उन्हीं के कमरे में अमरकांत और शेखर जोशी मिले। अक्षोभ्‍येश्‍वरी प्रताप ही मुझे भैरव जी (भैरव प्रसाद गुप्त) के घर ली ले गये थे। इन दोनों का नाम मैंने सुन रखा था। अक्षोभ्येश्‍वरी ने रोब जमाने हुए कि इलाहाबाद के मशहूर साहित्यकारों से उनका रब्त-जब्त है, मुझसे कहा- ये हैं शेखर जोशी और ये हैं-अमरकांत। मिलिए। कल रात को मेरे कमरे में ही थे। मेरे ऊपर यथोचित प्रभाव पड़ा। शेखर जोशी बिल्कुल किशोर लगते थे। देखनउस। नाजुक सुंदर। अच्छे अमरकांत भी लगते थे। वे किशोर नहीं युवक लगते थे। मुझे याद है, मैंने कहा- अमरकांत की कहानी पढ़ी है और शेखर जोशी की फोटो पत्रिका में देखी है। अमरकांत ने चुटकी ली। हँसते रहे। मैंने गौर किया कि शेखर जोशी इस पर दब कर शर्माए नहीं। सहज बने रहे। मुझे लगा कि यह बाहर से देखनउस किशोर अंदर से मजबूत हैं।

इलाहाबाद मैं बहुत जाता था। 1956 में मेरी शादी इलाहाबाद में ही हुई। सबसे ज्यादा भेंट मार्कण्डेय से होती थी। क्योंकि मिंटो रोड मेरी ससुराल से बहुत नजदीक थी। एक बार मार्कण्डेय ने बताया- हम लोग बैठे थे। बालकृष्ण राव आये। सब लोग उठ पड़े। शेखर बैठा रहा। मैंने चुपचाप नोट किया- यह भी अंदर की मजबूती की ही बात है। राव साहब ने ऐसा कुछ किया होगा, वरना शेखर किसी को सम्मान देने में कभी पीछे नहीं रहते। और सम्मान देना वही जानता है, जो अपमाननीय व्यक्तियों का अपमान करना भी जानता हो। यह दृढ़ता महंगी है। कसाला करना पड़ता है। ‘दाज्यू’ की दृढ़ता उसकी वैचारिक एवं जातीय दृढ़ता है। जगदीश्‍ बाबू को देखते ही मदन पर जाता था। जगदीश बाबू के रौब-दाब या टिप पाने के लिये नहीं। मदन का पता चला कि जगदीश बाबू डोटा लाग्यों गाँव के निकटवर्ती गाँव के रहने वाले हैं, तो उसे इतनी खुशी हुई कि संभालता न तो ट्रे उसके हाथों से छूट पड़ती। इसी को आत्मीयता कहते हैं। यह आत्मीयता तोड़ी जागदीश के ‘बाबूपने’ ने। वे इसे संभाल नहीं पाए। उनमें वैसी आंतरिक दृढ़ता नहीं थी। आत्मीयता का प्रतीक रिश्ता था- ‘दाज्यू’ होना। जब उन्होंने ‘दाज्यू’ होने से इन्‍कार किया तो मदन की आत्मीयता अपने आप टूट गई। तुम अगर दाज्यू नहीं तो मेरे कुछ नहीं हो सकते।

आलोचक वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

पात्र रचनाकारों के आत्मीय होते हैं। चारित्रिक दृढ़ता विवेक से आती है। विवेक सकर्मकता के बिना सार्थक नहीं होता।

शेखर की एक कहानी है ‘हलवाहा’। विपत्ति के समय लोग अपनी गृहणी से सलाह-मशविरा करते हैं लेकिन जीवानंद का स्वभाव इसके ठीक विपरीत था। जितनी ज्यादा विपत्ति उस पर पड़ती, वह अंतर्मुखी होता जाता था। गृहणी उसकी मन:स्थिति को समझ रही थी लेकिन कुछ कहने का साहस उसे नहीं होता था।

जीवानंद ने गोठ में घुसकर अपने बैल को थपथपाया। बहुत दिनों बाद उसने इतने ध्यान से अपने इस पशु को देखा था। स्वयं जीवानंद को आश्‍चर्य हुआ कि उसने गाय के अतिरिक्त और किसी पशु की ओर कभी इतना ध्यान ही नहीं दिया था। मालिक का दुलार पाकर खैरा जुलाली करता हुआ टुकुर-टुकुर उसे ताकने लगा, जैसे कह रहा हो- तुम जो कहो, मैं करने को तैयार हूँ।

बैल के बाद जीवानंद गोठ की दीवार पर टंगे हल को देखता है। जीवानंद ब्राह्मण है। ब्राह्मण हल नहीं पकड़ते। अवर्ण हलवाहे छोटे ब्राह्मण किसान जीवानंद का मखौल उड़ाते हैं। कहानी में जीवानंद को हल के बारे में सोचते, बहुत कुछ याद करते चित्रित किया गया है। जीवानंद को निश्‍चय करना है कि वह खेत बेचकर छोटी किसानी से छुट्टी ले कि नहीं। खेत को बिकवाने के लिये दलाल उसे घेरे हैं।

फिर कहानी की घटना- सरणि में अवकाश (स्पेस) है। उसके मन में क्या चल रहा है, यह बिल्कुल नहीं बताया जाता। ऐक्शन भी नहीं वर्णित है। सिर्फ सूचना है। शेखर जोशी द्वारा दी गई सुचना पढऩे के पहले यह जान लेना जरूरी है कि बद्री प्रधान खेत खरीदने की ताक में रहने वाले छद्म हितैषी हैं और पदम जीवानंद से बहाने बनाने वाला अवर्ण हलवाहा।

दूसरे दिन सुबह तडक़े ही अपने आंगन के द्वार पर खड़े बद्री प्रधान ने एक नजर नदी किनारे के अपने खेतों पर डाली। उनका हलवाहा अभी खेत में नहीं पहुँचा था लेकिन बगलवाले जीवानंद के खेत में जुताई शुरू हो गई थी। उन्हें यह सोचकर थोड़ी निराशा हुई कि जीवानंद ने पदम को आखिर राजी कर ही लिया है। बद्री प्रधान अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाये। टहलते-टहलते नदी की ओर चले गये। जो कुछ उन्होंने देखा उसे देख कर उन्हें सहसा विश्‍वास नहीं हुआ और क्रोध, घृणा तथा ग्लानि के कारण उनका सारा शरीर काँपने लगा। कुलघातक जिबुआ स्वयं हल चला रहा था। फाल की टेढ़ी-मढ़ी लकीरें उसके नौसिखुआपन की गवाही दे रही थीं।

जीवानंद के चरित्र में स्वाभिमान के साथ सांस्कृतिक शिष्टता है। स्थितियों का चुपचाप जायजा लेना- दुखों के दागों को तमगा न बनाना और करुणा की याचना न करना। अपने दुख में दूसरों को शरीक न करना, चुपचाप निर्णय लेना और उसे चुपचाप कार्यान्वित करना। शेखर जोशी की आंतरिक दृढ़ता का उनकी सांस्कृतिक शिष्टता से गहरा संबंध है।

मैंने उन्हें उत्तेजित होते कभी नहीं देखा। शब्दों का अपव्यय करते- न वाचन में, न लेखन में देखा। कहते हैं कि सुंदरता किसी तरह के ‘अतिरिक्त’ (सरप्लस) को सहन नहीं कर सकती। आवश्यकता से अधिक यानी बड़बोलापन उनमें है ही नहीं। यही उनकी सुंदरता का कारण और रहस्‍य है। एक खास तरह की सहज प्रसन्नता, मुदित भाव उनमें है, जो वस्तुत: बहुत महंगा सौदा है।

शेखर जोशी को नौकरी, पुरस्कार, सम्मान के लिए जुगाड़ करते किसी ने नहीं देखा। 109 लूकरगंज भैरव प्रसाद गुप्त का पता था। 100 लूकरगंज शेखर का। जब भैरव जी कुछ दिनों के लिए दिल्ली आ गये ‘नई कहानियाँ’ का सम्‍पादन करने, तब 109 में शेखर जी आ गये। भैरव जी दिल्ली से वापस चले आये, तब शेखर फिर 100 लूकरगंज में लौट गये। दोनों किराये के मकान। शेखर जोशी ने अपना पता मुझे देते हुए कहा- भैरव जी का पता मालूम है न। 109 लूकरगंज। उसमें से फालतू अंश निकाल दो तो मेरा पता हो जायेगा। भैरव, मार्कण्डेय, शेखर और अमरकांत में कितनी पटरी बैठती थी! इस चतुष्टयी ने हिन्‍दी कहानी का इतिहास रचा है। इस पर तो अलग से बातचीत होनी चाहिए। मैं भैरव जी के यहाँ जाता तो या तो शेखर वहाँ आ जाते या भैरव जी मुझे शेखर के यहाँ ले जाते। शेखर के यहाँ जाता तो वे अकसर मुझे अमरकांत के यहाँ ले जाते। भैरव जी ने बेनीगंज में मकान बनवाया। वहाँ मुझे पहली बार शेखर ही ले गये। भैरव जी मुझसे नाराज हो गये थे। इसलिए मैं उनसे मिलने में हिचक रहा था। शेखर ने कहा, ‘चलिए, वे कुछ नहीं कहेंगे। आपके आने से वे खुश ही होंगे।‘ मैं भैरव जी के यहाँ गया और रूहअफजा का शर्बत पीने को मिला।

भैरव जी जिससे नाराज होते थे पानी तक नहीं पूछते थे। घर से भगा भी देते थे। एक बार मेरा ऐसा ही स्वागत हो चुका है उनके यहाँ। तब भी शेखर मुझे 109 लूकरगंज ले गये थे। भैरव जी ही मिले। हालचाल पूछा। लेकिन आध घंटा बीतने पर भी कुछ नहीं आया तो शेखर ने ही कहा,  ‘अरे भैरव जी, वे दिल्ली से आये हैं। कुछ पानी, चाय।’ भैरव जी ने कहा, ‘ये तुम्हारे यहाँ से पी आये होंगे।’

मैं उनके पुत्र बबुआ की शादी में नहीं गया था इसी से वे नाराज थे।

भैरव जी जब दिल्ली आये तो उन्हें रहने के लिये सी ब्लॉक मॉडल टाउन में किराये के मकान की व्यवस्था हुई। शेखर दिल्ली आये तो हम और वे भैरव जी का घर ढूँढ़ने निकले। सी ब्लॉक तो पहुँच गये लेकिन मकान नम्‍बर शेखर को ठीक से नहीं याद था। फिर भी हम अनुमान से मकान ढूँढ़ते रहे। लगभग एक घंटे तक ढूँढ़ने पर भी मकान नहीं मिला। हम निराश होकर लौट पड़े। लौटते समय एक मकान को गौर से देखने के बाद शेखर बोले, ‘रुकिए रुकिए, यही मकान भैरव जी का होगा।’ दरवाजे पर एक बहुत पुराने किस्म का ताला लगा था जिसमें कलछुल जैसी लम्‍बी चाभी डालकर उसे खोला जाता था। शेखर ने कहा, ‘इस ताले को मैं पहचानता हूँ। यही 109  लूकरगंज में भी लगता था। भैरव जी वही ताला यहाँ ले आए हैं। नेम-प्लेट की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह ताला तो नेम-प्लेट का भी काम करता है।’

शेखर जोशी कम बोलते हैं। मुस्कराते थोड़ा ज्यादा हैं। जिस स्थिति में लोग 20-25 मिनट तक बोलें, उस स्थिति में शेखर सिर्फ कैंची मुस्कराहट से काम लेते हैं। जब वे मुस्कराएं और साथ में चुटकी से राख झाडक़र सिगरेट का कश मारें तब समझ जाइए। (गनीमत है कि अब सिगरेट करीब-करीब छोड़ चुके हैं।) एक बार उनकी मुस्कराहट का फल भोग चुका हूँ। हुआ यों कि दूधनाथ सिंह ने मुझे कविता सुनाने के लिये घर पर निमंत्रित किया। उन्‍होंने ‘कृष्णकांत’ नामक कविता लिखी थी, सम्‍भवत: श्रीकांत वर्मा पर। कहा कि वे भैरवजी के यहाँ से मझे ले लेंगे। दूधनाथ जी को मैं वामंपंथी के रूप में नहीं जानता था। सो भैरव जी से उनका सम्‍पर्क देखकर मैने सचमुच प्रसन्नतापूर्वक कहा- अच्छा, क्या अपने कोई वाम विचार को कविता लिखी है? लेकिन पता नहीं क्यों, शेखर यह सुनकर मुस्करा दिये। बस, मेरी अभिधा ने नया अर्थ ग्रहण कर लिया। बहरहाल, मुझे उस दिन दोपहर का भोजन तो नहीं मिला, एक लम्‍बा पत्र मिला आतिथेय का। अपनों से असहमति या क्षोभ प्रकट करने का तरीका है!

तब भैरव जी की अश्क से गहरी छनती थी। और शेखर तो भैरव मंडल के सनातन सदस्य। उपेंद्रनाथ अश्क पर एक संस्मरणात्मक टाइप की पुस्तक निकली और जैसा कि होना ही था, अश्क के अनेक रंगीन चित्रों के साथ। शेखर उसमें लिखने का आग्रह नहीं टाल सकते थे। और शेखर ने अश्क पर लिखा। उनके लेख का शीर्षक अश्क की ही एक काव्य पुस्तक से लिया गया था-  ‘मैं चिरका चला’। अश्क की पंक्ति भी यही थी। अंतर केवल ‘चिरका’ और ‘चिर का’ में था।

यहाँ होठों की नहीं कलम की मुस्कान है।

शायद यह मेरे अपने कुटिल मन की लहर हो लेकिन मुझे ‘वर्ष’ में अमरकांत पर लिखे गये लेख का शीर्षक भी कुछ ऐसा ही दिखलाई पड़ता है। अमरकांत होली पर ‘जरि गइले एरी से कपार’ गाते थे। यही शीर्षक शेखर ने अमरकांत के लेख का दिया है। मुझे लगता है- ऐसा तो नहीं कि भैरव मंडली अमरकांत केंद्रित ‘वर्ष’ की योजना से बहुत खुश नहीं थी। खासतौर पर इसलिए कि उसे रवींद्र कालिया निकाल रहे थे। अमरकांत पर शेखर कैसे न लिखें। लेकिन शीर्षक?

आशा करता हूँ कि मेरा यह अनुमान गलत है।

सो शेखर जोशी दिखनउस हैं, प्रतिबद्ध हैं। मित्र-वृती हैं किंतु सपाट नहीं
हैं। काम भर के इलाहाबादी भी हैं और यह कि आप जो भी हों अपनी इच्छा से उन्हें चालित नहीं कर सकते। कांट बी टेकेन फार ग्रांटेड। चंद्रकलाजी से मेरी इस विषय पर बात नहीं हुई है लेकिन मेरा ख्याल है कि सामान्यत: संतुलित शेखर कभी-कभी अपना घोर जिद्दी रूप भी प्रकट करते होंगे।

स्वातंत्रयोत्तर भारत में मध्यवर्ग की संपत्ति में बढ़ोतरी हुई है। हममें से अधिकांश पहले से बेहतर आर्थिक स्थिति में हैं। इस बढ़ोतरी में हिस्सा सिर्फ तिकड़मियों, उठाईगीरों और अवसरवादियों को ही नहीं मिला है। सीधे-सादे ईमानदार लोगों को भी मिला है। निराला और मुक्तिबोध आज होते तो शायद उन्हें वैसी जिंदगी जीने के लिये विवश न होना पड़ता। नागार्जुन, त्रिलोचन उपेक्षित ही नहीं रहे, उन्हें सम्मान-पुरस्कार भी मिले। लेकिन बढ़ोतरी के लुटेरों में और इनमें अंतर है। अंतर कहाँ और किस बात में है?

विचारधारा और प्रतिबद्धता के साथ उसकी आचार संहिता होती है। विधि-निषेध होते हैं। एक बार उत्तरी कोरिया के दूतावास की ओर से दिये गये भेज में गया। भोज ओबेराय में था। वहाँ पीने की भी व्यवस्था थी। मैंने भी एक-दो जाम लिये। अगले दिन पार्टी की ब्रांच मीटिंग में मुझे बताया गया कि भाकपा की आचरण संहिता में विदेशी दूतावासों के प्रीति भोज में शराब पीना निषिद्ध है। आम दुश्प्रचारकों की तरह में भी सोच रहा था कि पार्टी के लोग तो विदेशी दूतावासों में खूब शराब पीते हैं। सो प्रतिबद्धता की आचार संहिता जरूर होती है। कला अपने उत्पादकों और प्रशंसकों को यह संहिता जरूर देती है। कह कर न देती हों किंतु वह सामाजिक चेतना की जलवायु और मौसम में गंध की तरह रची-बसी रहती है। शेखर उन साहित्यकारों में हैं जो निहायत सहज एवं स्वाभाविक ढंग से साहित्य द्वारा दी गई आचार-संहिता का पालन करते हैं। नहीं तो यारों ने- साहित्यकारों ने पिछले अनेक दशकों में क्या-क्या जुगाड़ नहीं किये हैं। ‘अंधेरे में’ के जुलूस बिम्‍ब में मंत्री, उद्योगपति, सेना, पुलिस, गुंडे के साथ आलोचक, कविगण का होना यों ही नहीं। फैंटेसी का यथार्थ आधार है। मुक्तिबोध ने चमचमाते प्रकाश में सुंगधित ईमान की बात की है। और शेखर जोशी की कहानी है ‘बदबू’। यह बदबू कला की नैतिकता का प्रतीक है। जब तक इस बदबू का बोध है, तब तक साहित्यकार की अग्नि जीवित है। शोषक की पूँछ से बांधने वाली रस्सी से अपने को काटकर अलग करने की क्षमता की प्रतीक यह बदबू है।

देखने की बात यह है कि शेखर जोशी ने ‘बदबू’ कहानी लिखी तो उसके अहसास बोध को बनाए रखा। इसी को पूर्ण कलाकार होना कहा जाता है। अब यह न पूछिए कि इस अहसास को बनाये रखने के लिये क्या-क्या करना पड़ता है। और कहीं ज्यादा जरूरी यह जानना है कि क्या-क्या नहीं करना पड़ता।

मध्यवर्गीय ईमानदार लेखक के मन में छोटी-छोटी सुविधा इच्छाओं से उसके आदर्श का निरंतर युद्ध होता है। स्वाधीन भारत में सुविधाएं बढ़ी हैं, चारों तरफ बढ़ी हैं, उन्हें हथियाया गया है। जो लोग इन सुविधाओं को गांजने में सफल हुए हैं, वे पदासीन हैं। उनके बंगलों में गाड़ि‍यां हैं, कुत्ते हैं, बच्चे हैं जो या तो ड्रग्स से आदी हैं या अमेरिका में हैं, प्रेमिकाएं हैं। पुस्तकों के लोकार्पण होते हैं,  सेठों-मंत्रियों की उपस्थिति में उनके सम्मान समारोह होते हैं। साक्षात्कार में पूछा जाता है- देश में सूखा है, सांप्रदायिक दंगे हैं, आपकी क्या राय है? तो वे मुँह बिचका देते हैं। कहते है, ‘‘हम चुप रहेंगे। हमारी कृतियाँ देखो।’’
होंगे ये कुछ लोगों के लिये ईर्ष्‍या के पात्र। इनसे ईर्ष्‍या वे करते होंगे जो इन्हीं की बिरादरी के किंतु असफल लोग हैं। मौका पाते ही ये सब हथिया लेने की फिराक में रहते हैं। कहा भी है :

जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे।

शेखर जोशी जैसे लोग इन सफल लोगों पर मुँह बिचका कर हंसते हैं।

जो तुम्हारा अन्न है मेरे लिये विष है,
और जो मेरा विष है वह तुम्हारा अन्न है।

यह सब लिखने से एक साहित्य नायक जैसे रोमानी संघर्ष पुरुष का जो चित्र बनाता है, शेखर जोशी की मुद्राएं बिल्कुल उससे भिन्न और विपरीत हैं। जिस संघर्ष पुरुषत्व की बात की जा रही है, वह उनके साहित्य और व्यक्तित्व की अंतर्वस्तु है, रूपमुद्रा नहीं।

और यह रूपमुद्रा विहीनता प्रगतिशील जनवादी साहित्यकारों की विशेषता है। साहित्यिक मुद्राओं से रहित सहज व्यक्तित्व। आत्ममुग्धता और आत्मश्रंगार से दूर। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शमशेर, शील, भैरवप्रसाद गुप्ता, अमरकांत, हृदयेश, इजरायल आदि ऐसे ही हैं। शेखर भीड़ में अकेले नहीं हैं। उनके व्यक्तित्व और साहित्य में निजता भी हो यह अलग बात है। यह निजता महत्वपूर्ण है। नागार्जुन, केदारनाथ, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, शमशेर सब प्रगतिशील हैं लेकिन इनकी कविताओं में निजता है। मुझे कबीर, तुलसी, सूर, मीरा याद आते हैं, निराला, प्रसाद, पंत, महादेवी याद आते हैं- जो एक ही साहित्यिक आंदोलन के थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के तेवर अलग हैं।

शेखर की पटरी सबसे ज्यादा अमरकांत से बैठती है। लेकिन उनकी कहानियों के स्वर बिल्कुल अलग हैं। अमरकांत निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के काइयाँपन, निरीह मूर्खता के उद्घाटक हैं, तो शेखर उसी वर्ग की टूटती हुई आस्था को जैसे पात्र में निहित विवेक की शक्ति से जोड़ते हैं। इस जोड़ में रोमान, आदर्श कम, सामान्य भारतीय का विवेक और उसकी व्यावहारिक बुद्धि है। रोमानी पात्र असामान्य होते हैं। वे लाखों में एक होते हैं। लेकिन रोमान आदर्श असंख्य, सामान्य न चमकने वाले व्यक्तियों में भी होता है। शेखर उनको प्रस्तुत करने वाले कथाकार हैं। ये पात्र संकटों से अपने ढंग से लड़ते हैं और उन्हें पार करने का रास्ता भी ढूँढ़ लेते हैं। शेखर की कहानियों में ये न चमकने वाले पात्र कृतिम चकाचौंध को मलिन कर देते हैं। यह निम्नमध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय जीवन की सहजता और श्रम मूल्यों की खोज और स्थापना है- ‘डांगरी वाले’, ‘चिडुआ’ जैसी कहानियों में इसे देखा जा सकता है। शेखर के वृद्ध पात्र हिन्‍दी कथा-साहित्य में अनुपम हैं। स्वतंत्रता के उपरांत जिस द्रुति से जीवन और उसके संबंध बदले हैं, उसकी चोट व्यतीत हुए पात्र कैसे झेल रहे हैं- इसे शेखर जोशी से ज्यादा हिन्‍दी के किसी कथाकार ने नहीं समझा और चित्रित किया है।

गतकालिक संबंधों में जी रहे पात्रों को पुराने संबंधों-संदर्भों में फिर से जीने की छटपटाहट उनकी व्यथा को और मार्मिक बना देती है। उन्हें महाकाल के सामने असहाय खड़ा कर देती है। कहानीकार उस असहायता को अपनापा, सम्मान और करुणा देता है, जिसमें थोड़ा विनोद भी होता है। वृद्धजनों पर लिखी हुई शेखर की कहानियों में विभिन्न कोणों और बोधों के अनेकानेक संश्‍लेष हैं। वे सब मिलकर इन कहानियों की अंतर्वस्तु को जटिलता देते हैं और यह संश्‍लि‍ष्‍ट जटिलता रूप की सहजता का आधार है। ऐसी कहानियाँ राजेंद्र यादव जैसे भूतपूर्व कथाकार नहीं लिख सकते। लिख पाते तो शेखर जोशी को उचित से अधिक मूल्यांकित कहानीकार न कहते।

रचनाकार अपनी रचना में जीता है, अपने पात्रों में जीता है- एक सीमा तक। वह अपनी रचना से स्वतंत्र नहीं होता। रचना में मुक्ति पाने का मतलब- रचना में मन, प्राण का वास करना होता है- यह सब छद्म रचनाकारों को छद्म लगता है लेकिन रचना केवल पाठकों को जीवन नहीं देती, अपने रचयिता को भी देती है।

मैंने शेखर को गम्‍भीर क्षुब्ध तो देखा है, दीन-हीन या ईर्ष्‍यादग्‍ध कभी नहीं देखा। छोटे-से-छोटा पुरस्कार मिलगया तो उसे चुपचाप ग्रहण कर लिया। दूसरों को बड़ा पुरस्कार, सम्मान, नाम मिला तो भी सहज, प्रसन्न, अविचलित। एक बेटी, दो बेटों, पत्नी और अनेक मित्रों, रिश्तेदारों को अपने लेखकीय, गैर लेखकीय अपनापे में समेटे शेखर जोशी किसी मित्र, रिश्तेदार, लेखक की किसी मामूली सी घटना पर मनोयोगपूर्वक घंटों बातें कर सकते हैं- उनकी कोई रिश्तेदार मौसी हलुआ कैसे बनाती हैं, किसी के यहाँ रोटी में कोई खास बात कैसे पैदा हो जाती है, कभी कभार समझा भी देंगे कि चूँकि बात कुमायूँ गढ़वाल की है, आप ठीक से नहीं समझ सकते।

मैं उनके घर बैठा बात कर रहा था कि एक लडक़ी नल से पानी भरते दिखलाई पड़ी। वह किसी से बात भी कर रही थी, पानी भी भर रही थी- शेखर लगभग एक घंटा मुझे बताते रहे कि इस दृश्य को अमरकांत किस तरह लिखते। भैरव जी को पश्‍चि‍म बंगाल की सरकार ने कोई पुरस्कार दिया। वे अपने पोते को लेकर सम्मान ग्रहण करने गये। वहाँ का ब्यौरा विस्तार से दिया।

नागार्जुन की एक प्रेम कथा का वर्णन मौका मिले तो उनसे जरूर सुनिए। नागार्जुन कमरे में हैं- ऊपर कमरे में युवक लेखक और प्रेमिका धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। नागार्जुन कहते हैं- बेटी, मैं उपन्यास लिख रहा हूं। फिर मार्कण्डेय के किस्से। लेकिन सभी में मित्रों के प्रति कोई द्वेष नहीं, दुराव नहीं। ईर्ष्‍या तो उनके पास फटकी ही नहीं। मैं उनकी इस चारित्रिक विशेषता, दृढ़ता से अभिभूत रहता हूं। सोचता हूँ आंतरिक तौर पर इस आदमी में बहुत आत्मविश्‍वास होगा। यानी इसे अपने समाज और साहित्य परम्‍परा पर विश्‍वास होगा, जिससे जुड़ा है- कहा बापुरो इंद्र!

(भारतीय लेखक, जनवरी-मार्च 2003 में प्रकाशि‍त)

जब तक हम हैं जमाना हमारा होगा : शेखर जोशी

कथाकार विद्यासागर नौटियाल और शेखर जोशी।

हाल ही मैं कथाकार विद्यासागर नौटियाल का देहांत हो गया। उन पर कथाकार शेखर जोशी का संस्‍मरण-

कभी-कभी लिखी गई पुरानी डायरी के एक पन्ने में दिनाँक 5 नवंबर 1958 को दर्ज ये पंक्तियाँ आधी शताब्दी पूर्व के उन दिनों की याद दिला देती है जब मैं सुरक्षा विभाग की एक वर्कशॉप में नियुक्ति पाकर इलाहाबाद पहुँचा था और विद्यासागर नौटियाल टिहरी से बनारस हिन्‍दू विश्वविद्यालय में पढ़ने पहुँचे वहाँ छात्र नेता के रूप में सक्रिय थे: 5 नवंबर’58

कल मार्शल आए थे। बनारस वि.वि. में वाडिया की मीटिंग के बाद उन्होंने जो भाषण दिया उसी को बातें कर रहे थे-

I stand here as the representative of the ten thousand or phans of BHU. I call them orphans because their father, the VC has disowned them and their mother, the university, has been murdered by the friends of their father.

उन्हें अफसोस था कि भैरव जी ने उनकी कहानी ‘फुलियारी’ की एडिटिंग कर के हत्या कर दी है। कहानी का अंत जो उन्होंने मूल रूप से दिया था मुझे अच्छा लगा। संघर्ष के इन दिनों में उनकी (लेखक की) मानसिक परिस्थिति की ही प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी।

मुझे याद नहीं कि नौटियाल जी के लिए यह ‘मार्शल’ संबोधन तब बनारस के सभी साथियों के बीच प्रचलित था अथवा भारत-नेपाल सीमा के एक जमींदार परिवार से आये चुलबुले छात्र अक्षोभ्येश्वरी प्रताप मिश्र से मैंने इसे ग्रहण किया था। अक्षोभ्य, जो बाद में ए. प्रताप के रूप में दूरदर्शन के प्रोड्यूसर बने और जिनका असमय ही देहान्त हो गया, उन कई बनारसी साथियों में से एक थे जो तब साहित्य को दुनिया में कदम रखने का प्रयत्न कर रहे थे।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पहाड़ से आये हुये युवाओं ने छात्रसंघों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कालांतर में देश की राजनीति में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कॉमरेड पी.सी. जोशी,  नारायणदत्त तिवारी, हेमवतीनंदन बहुगुणा, पूरनचंद जोशी (आज के प्रसिद्ध समाजशास्त्री) इलाहाबाद और लखनऊ विश्वविद्यालयों के ख्यातिनाम छात्रनेता रहे हैं। उनकी पृष्ठभूमि कुमाऊँ-गढ़वाल के बड़े कस्बों की रही है जहाँ सामाजिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक जागरूकता थी। लेकिन विद्यासागर ने टिहरी के पिछड़े इलाके में आकर बनारस में अपनी धाक जमाई थी, यहाँ यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि मैदानी इलाके के बहुसंख्यक छात्रों के बीच अपनी बोली-बानी और चाल-ढाल से ये पहाड़ी युवा कुछ विशिष्ट लगते होंगे। जैसे- कहा जाता है, एक सज्जन कभी साइकिल चलाना नहीं सीख पाये और पैदल ही पूरा शहर छान मारते थे। यही नहीं, यूनिवर्सिटी से चौक की ओर जाते हुये (पहाड़ की आदत में अनुसार) अपने साथियों को सूचित कर जाते थे, ‘जरा नीचे चौक तक जा रहा हूँ पार्टी दफ्तर में’ या वहाँ से लौटते हुए पार्टी दफ्तर के कार्यकर्ताओं से कहते, ‘अब चलता हूँ, ऊपर यूनिवर्सिटी जाना है’। सुनते हैं, उन्हें याद दिलाना पड़ता था कि यहाँ सब समतल है, नीचे-ऊपर वाला मामला नहीं है। तो ऐसी परिस्थिति में मैदानी इलाके में आकर अपना सिक्का जमा लेना बड़ी बात थी। विद्यासागर नौटियाल का प्रभाव क्षेत्र बनारस तक ही सीमित नहीं था। वह सन् 1958 में मात्र 25 वर्ष की आयु में ऑल इण्डिया स्टूडैण्ट फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए थे।

उन दिनों हिन्‍दी में जिन पत्रिकाओं की धूम थी उनमें हैदराबाद से प्रकाशित ‘कल्पना’ और सरस्वती प्रेस इलाहाबाद से निकलने वाली ‘कहानी’ पत्रि‍कायें प्रमुख थीं। नौटियाल जी की कहानी ‘भैंस का कट्या’ पहली बार 1954 में ‘कल्पना’ में छपी थी और उसकी अच्छी चर्चा रही थी। मार्कण्डेय का कहानी संग्रह ‘पानफूल’ भी ‘कल्पना’  से संबंधित प्रकाशन से ही प्रकाशित हुआ था। बनारस के युवा लेखकों का दल इलाहाबाद पहुँचता और हम लोग भी कभी-कभी बनारस का चक्कर लगा आते। तब बिरला छात्रावास में कविवर विश्वनाथ त्रिपाठी का कमरा, जिसके एक कोने में मेज पर अभिनेत्री नरगिस का फोटो रखा रहता था, हमारा स्थाई अड्डा था। अक्षोभ्येश्वरी प्रताप भी उसी छात्रावास में थे। विजयमोहन सिंह शायद शहर में कहीं अपने निजी आवास में रहते थे। विष्णुचंद्र शर्मा कालभैरव से गुटका पत्रिका ‘कवि’ का संपादन-प्रकाशन करते थे जिसके अगले अंक की सबको उत्सुक प्रतीक्षा रहती थी। केदार जी की नई कविताएँ सुनने का लोभ रहता था। उनसे इलाहाबाद आने का आग्रह करते। नामवर जी अक्सर इलाहाबाद आते रहते थे। वरिष्ठ पत्रकार श्रीकृष्णदास जी के घर पर मार्कण्डेय जी के कमरे में बैठकी जमती और वहीं ‘कहानी’ पत्रिका के लिए मासिक स्तंभ लिखा जाता।

नामवर जी ने जब चकिया-चन्दौली से लोकसभा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से चुनाव लड़ा तब हम कुछ लोग इलाहाबाद से वहाँ पहुँचे थे। नौटियाल कंधे पर माइक रख कर दिन-दिन भर चुनाव प्रचार में जुटे रहे थे। खेतों के रास्ते, पगडंडियों पर धूप में चलते हुए, नारे लगाते लोगों का जुलूस और जोश देखते ही बनता था।

इन प्रारम्भिक मुलाकातों में ही मुझे विद्यासागर नौटियाल की जुझारू प्रकृति और स्पष्टवादिता का परिचय मिल गया था। उनमें एक पहाड़ी आदमी का अक्खड़ स्वभाव और आत्मसम्मान मुझे अपने अनुकूल लगा था। इस स्पष्टवादिता, अक्खड़पन और पहाड़ी स्वाभिमान ने उस बार इलाहाबाद में जो गुल खिलाया वह अप्रत्याशित था।

इलाहाबाद उन दिनों हिन्‍दी साहित्य का केन्‍द्र माना जाता था जहाँ एक ओर हि‍न्‍दी-उर्दू के अनेक प्रख्यात लेखक, कवि, कथाकार प्रगतिशील धारा से जुड़े थे वहीं दूसरी ओर एक अच्छी संख्या ऐसे प्रतिभाशाली रचनाकारों की भी थी जिनकी पहचान प्रयोगवादियों के रूप में की जाती थी। दोनों गुटों के बीच स्वस्थ रचनात्मक प्रतिद्वंद्विता के साथ वैचारिक वाद-सम्‍वाद भी चलता रहता था। सन् 1957 के दिसंबर माह में इलाहाबाद के प्रगतिशील लेखकों की पहल पर वहाँ पर एक अभूतपूर्व लेखक-सम्मेलन का आयोजन किया गया था। हिन्‍दी के प्रायः सभी नये-पुराने लेखक, कवि, कथाकार, नाटककार, आलोचक वहाँ उपस्थित हुए थे, शिवप्रसाद सिंह के साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी, विजयमोहन सिंह, अक्षोभ्येश्वरी प्रताप, विष्णुचंद्र शर्मा और विद्यासागर नौटियाल ने भी बनारस से आकर सम्मेलन में भागीदारी की थी।

लेखक सम्मेलन में सहित्य की विभिन्न विधाओं के लिए अलग-अलग कक्षों में गोष्ठियों की व्यवस्था की गई थी जहाँ उस विधा के रचनाकार और आलोचक अपनी विधागत समस्याओं पर विचार-विनिमय करने वाले थे। कहानी गोष्ठी की अध्यक्षता के लिए यशपाल जी का नाम प्रस्तावित था।

सम्मेलन स्थल पर गोष्ठी प्रारम्‍भ होने से पूर्व हम कुछ मित्रगण आगे होने वाले कार्यक्रम के सम्‍बन्‍ध में चर्चा कर रहे थे। इलाहाबाद में उन दिनों मैं और अमरकांत जी एक ही मुहल्ले में रहते थे। हमारे पड़ोस से ही संस्कृत के विद्वान और वृहद ‘संस्कृत साहित्य का इति‍हास’ के लेखक पंडि‍त वाचस्‍पति‍ गैरोला भी रहते थे जो गढ़वाल के मूल निवासी थे। यूँ गैरोला जी का हिन्‍दी कथा साहित्य से कुछ विशेष लगाव नहीं था लेकिन हम दोनों पड़ोसी कहानीकारों की संगत में उनकी मित्रता भैरवप्रसाद गुप्त और मार्कण्डेय से भी हो गई थी। गैरोला जी भी हम लोगों के साथ श्रोता और दर्शक के रूप में सम्मेलन स्थल पर पहुँचे थे।

उस जमाने में यशपाल हिन्‍दी के शीर्षस्थ जीवित कहानीकार माने जाते थे और मार्क्‍सवाद के प्रति‍ आस्था रखने वालों के लिये तो वह निर्विवाद प्रेरणा स्रोत थे। बातों-बातों में नौटियाल जी ने यशपाल की पहाड़ी पृष्ठभूमि पर लिखी हुई कुछ कहानियों का जिक्र करते हुए अपना मत प्रकट किया कि वह आज यशपाल जी से पूछेंगे कि उन्होंने उन कहानियों में पहाड़ की नारी का ऐसा चित्रण क्यों किया जिसे पढ़कर पाठक के मन में उसके प्रति अस्वस्थ धारण बनती है। फिर अन्य दूसरी बातें होती रहीं और नियत समय पर हम लोगों ने कहानी गोष्ठी वाले कक्ष में प्रवेश किया। वहाँ युवा कथाकारों का विशाल समूह एकत्र था। खूब गहमागहमी हो रही थी। मुझे याद है, कुछ देर बाद बहस शहरी बनाम ग्रामीण कहानी जैसे निरर्थक मुद्दे की ओर मुड़ गई थी। शहरी कथाकारों में राजेंद्र यादव और मोहन राकेश प्रमुख थे तो ग्रामीण कथाकारों में मार्कण्डेय और शिवप्रसाद सिंह! कमलेश्वर कस्बाई कथाकार की अलख जगाए थे। अधिकांश कहानीकार इस प्रकार के विभाजन के पक्ष में नहीं थे।

सहसा एक धमाका हुआ- श्रोताओं के बीच बंद गले का जोधपुरी कोट और चुस्त पैंट पहने एक कृशकाय व्यक्ति ने अध्यक्ष की ओर तर्जनी उठा कर तीखे स्वर में प्रश्न दागा, ‘‘आपने अपनी कहानियों में पर्वतीय नारी का अशोभन चित्रण क्यों किया है?’’ हॉल में सन्नाटा छा गया। यशपाल जी ने शायद कहा था, ‘‘मैं आपके पश्न का उत्तर दूँगा।’’ और गोष्ठी की कार्यवाही पूर्ववत चलने लगी। अपने अध्यक्षीय भाषण के समय यशपाल जी की नजरें क्रुद्ध प्रश्नकर्ता गैरोला जी को खोज रही थीं लेकिन वह प्रश्न दागने के तत्काल बाद ही उठ कर चल दिये थे। उत्प्रेरक बंधुवर नौटियाल भी शायद यशपाल जी के स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो गए थे।

बनारस में रहते हुए विद्यासागर नौटियाल को कॉमरेड रुस्तम सैटिन, प्रो. चंद्रबली सिंह और जगत शंखधर जी से जो राजनीतिक, साहित्यिक संस्कार मिले थे उनका गहरा प्रभव तो था ही, उसके अतिरिक्त मुक्त पहाड़ी जीवन के प्रति दबा-छिपा आकर्षण उन्हें किसी सीमित जैविक दायरे में नहीं बाँध पाया और वह कुलवक्ती पार्टी कार्यकर्ता के रूप मे लौटकर पहाड़ आ गये। अपनी राजनीतिक व्यस्तताओं के चलते नौटियाल के साहित्यिक सरोकार भी कुछ शिथिल पड़ गये और भौगोलिक दूरी के कारण हम लोग परस्पर सम्‍पर्क विहीन हो गए।

याद है, कुछ वर्षों बाद एक दिन गर्मियों की दुपहर में अकस्मात नौटियाल इलाहाबाद में हमारे घर आ पहुँचे। नया सफेद झक्क खद्दर का कुर्ता-पाजामा और हाथ मे छाता लिये हुये। अपनी इस नई झक्क पोशाक में कुछ असहज सा अनुभव करते हुए उन्होंने स्वयं ही खुलासा कि‍या, ‘सुचेता भाभी ने दिया है। सीधे जेल से छूट कर आ रहा हूँ।’ उन दिनों सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। देशभक्तों की कैद में नौटियाल जी ने राजनीतिक कारणों से लम्‍बा वक्त गुजारा है।

विद्यासागर नौटियाल ने देश-विदेश की अनेकों यात्राएँ की हैं। बहुत कुछ देख-सुना है। सम्‍भव है कभी इनके यात्रा संस्मरणों की पूरी पुस्तक ही पढ़ने को मिले। परन्‍तु अभी तो (डॉ. पूरन चंद्र जोशी की तरह) हमें भी उनसे पूछना है कि अपनी सोवियत संघ की यात्राओं के दौरान उन्हें सम्‍भावि‍त विघटन के लक्षणों का आभास हुआ था या नहीं? यदि हाँ, तो उन्होंने इसका उल्लेख कभी अपने लेखन मे किया या बहुत से अन्य लोगों की तरह ‘घर की बात’ समझ कर मौन रखना ही उचित समझा? यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक संक्षिप्त पत्र में उन्होंने मुझे वहाँ की जो स्‍थि‍ति‍ बयान की है वह उनकी पैनी दृष्टि और सामाजिक सरोकारों का प्रत्यक्ष उदाहरण है। दिनाँक 15 नवंबर 2005 को सनीवेल, कैलिफोर्निया से भेजे गये पत्र में विद्यासागर लिखते हैं-

‘मैं यहाँ किसी से ज्यादा सम्‍पर्क कर नहीं पाता। हमारे यहाँ पहुँच जाने के बाद 26 अक्‍तूबर को बेटी विद्युत के बेटे अतिशय ने जन्म लिया, जिसका पूरा नाम यों है- बालसुब्रमण्यन अच्तुत अतिशय। दीपावली उसी नये आये मेहमान के साथ बिताई। अपना समय भी उसके साथ कट जाता है। एक अपार्टमेंट के अन्‍दर रहते हुये अमेरिका को देखने-जानने लगा हूँ। एक डरा हुआ समाज, जिसमें किसी का किसी पर भरोसा नहीं। हर आदमी अपने में मस्त है या उलझा है। आपको होटल में, स्टोर में, पार्क में, सड़क पर या राह में कोई सुन्‍दर सा बच्चा दिखाई दिया। उसकी तरफ देख कर हँसना या कोई इशारा करना तो दूर की बात, हो सके तो उसकी ओर नजर ही मत डालिये। कोई पूछ सकता है- आपने मेरे बच्चे को इशारा क्यों किया? यह प्रश्न हथियार के बल पर भी पूछा जा सकता है।

अपने सबसे पास के पुस्तकालय में गया था एक दिन बेटी का कार्ड लेकर। वहाँ हिन्‍दी की कोई पुस्तक नहीं थी। लाइब्रेरियन ने मदद करनी चाही। कम्प्यूटर पर सूचना एकत्र कर एक दूसरी लाइब्रेरी का पता बताया, जहाँ हिन्‍दी की तीन पत्रिकाएँ आती हैं- सरिता, गृहशोभा और एक ऐसी ही पत्रिका जिसका मुझे नाम तक याद नहीं रह पाया। सनीवेल में भारतवासी चारों तरफ मौजूद मिलेंगे। उनकी संख्या नौ प्रतिशत है। पंजाबी, आंध्रा, तमिल, तेलुगु, गुजराती बड़ी दुकाने मौजूद हैं। सब प्रकार के भारतीय व्यंजन व पकवान उपलब्ध हैं। भारत के कच्चे, पक्के नारियल से लेकर अमूल मक्खन, हल्दीराम का प्रत्येक माल, हर तरह के मसाले, दालें और आंध्रा के चावल से लेकर देहरादून की बासमती तक सब कुछ मिल जाता है। दीवाली के मौके पर सड़क से जिन घरों में लडि़याँ जलती दिखाई देती थीं हम समझ जाते थे कि वे हिंदुस्तानी परिवारों के घर हैं। मेरे निकटतम अपार्टमेंट्स में कई भारतीय परिवार हैं। उनसे हमारी देखा-देखी होती है। दुआ-सलाम नहीं। उनमें से किसी को कभी हमारे घर आना होगा तो पहले फोन कर देंगे कि हम आ रहे हैं। अपने में उलझे हुए लोगों को कोई फुर्सत ही नहीं है।

लकड़ी के दुमंजिला भवन हैं, जिनमें हम रह रहे हैं। मेरे दामाद का कार्यालय यहाँ से बहुत करीब है: सिनाप्सिस एक सॉफ्टवेयर कम्पनी है। उसके भवन कई मंजिला हैं। लेकिन वे भी सब लकड़ी के बने हैं। बाहर से पता नहीं लग सकता कि यह भवन लकड़ी का बना होगा। अंदर बाथरूम तक में गलीचे बिछे हैं। स्नान टब से बाहर करने की कोई सुविधा या जरूरत नहीं। किचन में भी गलीचे बिछे हैं। आधी सर्दी तो यों ही दूर हो जाती है। घर के भीतर का बाथरूम आदि में कहीं भी जूता या चप्पल पहनने का सवाल ही पैदा नहीं होता।’

टिहरी बाँध के औचित्य को लेकर सरकार से एक लम्‍बे संघर्ष के दौर में उन्हें आर्थिक क्षति के साथ बहुत समय भी गँवाना पड़ा। इस दौरान उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ प्रायः स्थगित रहीं। कुछ लोगों को शिकायत रही कि उन्होंने पराजय स्वीकार कर सरकार से अपनी जमीन-जायदाद का मुआवजा ले लिया है। शायद ये ऐसे ही लोग थे जो बाँध की योजना से अप्रभावित होने के साथ दूसरों से ही कुर्बानी देने की अपेक्षा रखते हैं। उन्हीं दिनों दिल्ली में मेरी उनसे भेंट हुई थी। उनके साथ युवा फिल्मकार अनवर जमाल भी थे जिन्होंने टिहरी पर एक वृत्तचित्र बनाया है। मैंने लोगों की शिकायतों के आधार पर मुआवजा स्वीकार करने के औचित्य पर उनसे प्रश्न किया तो उन्होंने बहुत व्यवहारिक उत्तर मुझे दिया था, ‘‘देखों भाई शेखर जी, किसी शहर में आपका मकान है, नगरपालिका वाले किसी योजना के तहत आपसे कहें कि हम यह मकान गिराएँगे, आप मुआवजा लेकर कहीं और बस जाओ। आपकी स्थिति अपने दम पर दूसरा मकान बना लेने की नहीं है और आप जानते हैं नगरपालिका आपके विरोध के बावजूद मकान ढहा ही देगी। तब आप क्या करेंगे? बाल-बच्चों को लेकर सड़क पर तो नहीं आ सकते। चार दीवारें उठा कर उनके ऊपर छत डालने के अलावा आपके पास चारा क्या है?’’ उनका तर्क मुझे ठीक लगा था। विशेष रूप से उस स्थिति में जब मुआवजे का लेन-देन भी एक धंधा बन गया हो और लोग नगरपालिका से साँठ-गाँठ कर मुआवजा लेने के लिए ढाँचे खड़े कर रहे हों। जिनके स्थायी भवन थे उनकी आधी-अधूरी कीमत भी भले सरकार ने दे दी हो लेकिन अपनी जड़ों से विस्थापन का कोई मूल्य चुका सकता है? जब तक आप जीवित रहेंगे आपको दिल में चुभे उस कांटे को बर्दाश्त करना ही होगा।

उत्तर प्रदेश सरकार में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए विधायक कामरेड नौटियाल जब लखनऊ में सक्रिय रहे तब विधानसभा की कार्यवाही में योगदान देते हुए उन्हें एक बार भी सुन पाने का सुयोग मुझे नहीं मिल पाया। उनके भाषणों का पाठ करते हुए कल्पना ही कर सकता हूँ कि बी.एच.यू. का वह भूतपूर्व छात्रनेता वहाँ अपनी चुटीली भाषा में पहाड़ के अनाथों की कथा-व्यथा सुनाते हुए सरकार की कैसी खबर लेता होगा।

विधायकी का एक दौर और तीस वर्ष की वकालत की जीवनचर्या से मुक्ति पाकर विद्यासागर नौटियाल फिर एक बार साहित्य की दुनिया में लौट आए। यह उनके पाठकों और मित्रों के लिए प्रसन्नता का विषय है। कहानियाँ, उपन्यास, संस्मरण, साहित्यिक विमर्श हर विधा में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए वह आज लेखनी के माध्यम से समाज का ऋण चुकता कर रहे हैं।

नौटियाल जी के यात्रा-संस्मरण ‘भीम अकेला’ को पढ़ कर मैंने उसे जातीय स्मृति का दस्तावेज कहा था। मेरी मान्यता है कि केवल भीम अकेला ही नहीं, नौटियाल जी का अधिकांश लेखन जातीय स्मृति का गौरवाशाली दस्तावेज है। यमुना के बागी बेटे, टिहरी, नंदादेवी, श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, मोहन उत्प्रेती, आचार्य डबराल जी की गाथा हमारी जातीय स्मृति की अनमोल धरोहर है।

टिहरी गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों की छवियाँ उनके साहित्य में अपनी सम्पूर्ण अंतरंगता के साथ उपस्थित हैं। आकाश छूती ऊँचाइयों पर हरे-भरे बुग्यालों में अपने पशुओं के साथ एकाकी जीवन बिताने वाले गूजर हों अथवा घाटी में संघर्षशील जीवन व्यतीत करने वाले ग्रामीण, सभी अपनी विशिष्ट मुद्राओं में हमें अपनी जिजीविषा से चमत्कृत कर देते हैं। उनके जीवन प्रसंगों में काठिन्य, करुणा, दैन्य के अतिरिक्त प्रेम, माधुर्य और विनोद भी है। ऐसी विडंबनापूर्ण स्थितियाँ भी हैं जिन्हें पढ़ कर किसी संवेदनशील पाठक के होठों पर मुस्कान उतर आए, आँखें छलछला जाएँ। बिना बोहनी हुए उधार चाय न देने वाले दुकानदार के उधारी ग्राहक नकद चाय पीने वाले ग्राहक के आँगन में सुबह-सबेरे बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह कब सोकर उठे और दुकान की ओर चले। अधीर प्रतीक्षा के बीच वे उसे बीच-बीच में पुकार भी रहे हैं ‘अब उठ जा यार!’ जीवन को खुली आँखों देखने वाले विद्यासागर अबाधगति से रचनारत रहें, यही कामना है।

साहित्य के प्रमुख केंद्रों से दूर बैठकर साहित्य रचना करते हुए नौटियाल जी को निश्चय ही मित्रों के बीच अपनी रचनाएँ पढ़ने और उनका अभिमत जानने की ललक रहती होगी ताकि प्रकाशक को पाँडुलिपि देने से पूर्व वह अपने कृतित्व की नोक-पलक सुधार लें। यूँ, देहरादून में भी एक आत्मीय लेखक समाज है जिसमें हम्माद फारुकी साहब, जितेन्द्र जी, कांतिमोहन ‘सोज’, सुभाष पन्त, ओमप्रकाश वाल्मीकि, अल्पना मिश्र, कुसुम भट्ट, गुरदीप खुराना, विजय गौड़ आदि हैं लेकिन उनका मन होता होगा कि जिनके साथ उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी वे उन्हें पहले की तरह अपनी खरी राय देकर आश्वस्त करें। दिनांक 12 मई 1993 को देहरादून से लिखे गये पत्र में वह कहते हैं-

अप्रैल अंत में त्रिलोचन शास्त्री की अध्यक्षता में सादतपुर में संपन्न एक गोष्ठी में, ‘सूरज सबका है’ का पाठ कर आया। इसके पाँच पृष्ठ कभी ‘सर्वनाम’ में छपे थे।

मैंने डॉ. काशीनाथ सिंह को लिखा है कि वे एक गोष्ठी जुलाई-अगस्त में काशी में आयोजित कर सकें तो लिखें, जिसमें मैं कुछ चुने हुए लोगों को ‘सूरज सबका है’ उपन्यास के कुछ अंश सुना सकूँ। काशी से आते-जाते क्या प्रयाग में एक ऐसी गोष्ठी आयोजित की जा सकेगी? निर्णय आपको करना है। मैं इधर लेखन पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ।

सन् 1930 में टिहरी के सामंती शासन ने रवाई जनता पर निर्मम गोलीचार्ज किया था। उसे तिलाड़ी हत्याकांड के रूप में जाना जाता है। उसी पर एक उपन्यास की तैयारी कर रहा हूँ।

ऐसे सक्रिय रचनाकार के जीवन में एक व्यतिक्रम आ पड़ा। टिहरी बाँध के कारण उन्हें अपना गृहनगर छोड़ कर देहरादून में आकर घर बसाना पड़ा था। यह तब भी गनीमत थी कि वहाँ रहते हुए वह पहाड़ों से दूर नहीं हुए थे। लेकिन जून 2004 में जब मैं गर्मियाँ बिताने ईटानगर (अरुणाचल) गया हुआ था, नौटियाल ने 9 जून 2004 के पत्र में नोएडा से मुझे सूचित किया:

बीमार हूँ। घर में ताला डाल कर यहाँ एम्स में एन्जियोग्राफी करवाई- डॉक्टरों ने सर्जरी के लिए कहा है। छठी मंजिल में दिन गुजारने की विवशता है। यहाँ किसी से सम्‍पर्क नहीं हो पाता। कभी-कभार विष्णु को फोन कर लेता हूँ। हाथ से लिखने की आदत नहीं रह गई है, कंप्यूटर बिखरा पड़ा है। 8 पुस्तकें विजयमोहन जी से माँग लाया था। सोचा सर्जरी के बाद किसने देखा! एक दिन लौटा आया। अब कुछ भी अपने पास नहीं। सुबह को हिन्‍दी-अंग्रेजी अखबार आ जाते हैं, उन्हीं को ताका करता हूँ।

इसी क्षणिक अनिश्चितता की मनःस्थिति के बाद ही अगले पैराग्राफ में उनकी जीवन्तता और सामाजिकता मुखर हो उठी:

आपने हाथ चलाया और कहानी लिख डाली। मेरे लिए यह सबसे अच्छा समाचार है। आपकी श्रीमती जी का स्वास्थ्य आशा है अब पूरी तरह ठीक होगा। ईटानगर में रहते हुये डायरी तो लिख ही सकते हैं। बाद में काम आएगी। आप एक बार अपना आलस्य त्यागिए लिखने के मामले में। हम लोग अगले वक्तों के लोग नहीं हैं। जब तक हम हैं ज़माना हमारा होगा। अमरकांत के बारे में जान-सुन कर अच्छा लगता है। सक्रिय हैं, सब कुछ होने के बावजूद।

इधर मौसम बहुत अच्छा होने लगा है। दिन के बारह बज रहे हैं। बगैर पंखे के कमरे के अंदर बैठ कर यह पत्र लिख रहा हूँ। ‘साक्षात्कार’ में श्रीकांत वर्मा की डायरी प्रकाशित हुई है। अद्भुत है। वहाँ के समाचार दीजिए, अच्छा लगता है।

पुनश्चः निराश भूपेन हजारिका ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है। बेचारे। यह भी सर मुंडवाकर ही हुआ।

कुछ माह पश्चात मैं पत्नी चंद्रकला के साथ नोएडा उनसे मिलने गया। सेक्टर-50 के ए.टी.एस. ग्रीन्स में एक बहुमंजिला इमारत के छठे माले में वह बिस्तर पर लेटे हुये थे। गढ़वाल के दुर्गम डांडों, गहरी घाटियों और आकाश छूते विस्तृत बुग्यालों को अपने पैरों से नापने वाला वह दुर्दान्त पगचारी सीमेंट के जंगल में छठी मंजिल के एक छोटे से कमरे में लाचार पड़ा था। मेरा मन भर आया। लेकिन नौटियाल जी के चेहरे पर बहुत दिनों बाद मिलने की खुशी फैली थी।

मैंने उन्हें केवल दो बार अपने आँसुओं को रोकते हुए देखा है। एक बार जब इलाहाबाद में उनकी बेटी अपने दो छोटे-छोटे बच्चों को अनाथ कर किसी गंभीर बीमारी के कारण चल बसी और दूसरी बार देहरादून के टाउनहॉल में जहाँ उन्हें प्रतिष्ठित ‘पहल’ सम्मान प्रदान किया जा रहा था। लेखकीय वक्तव्य में अपने जीवनानुभवों की चर्चा करते हुए एक प्रसंग पर उनका गला अवरुद्ध हो गया और आँखें भर आई थीं। वह प्रसंग एक सफाईकर्मी वृद्धा से जुड़ा था जो देहरादून के किसी मुहल्ले में घरों की सफाई निबटाकर उन घरों से मिली हुई रोटियां किसी मकान में भूमिगत नौटियाल जी और उनके साथियों के लिए रोज छिपा कर लाया करती थी। विद्यासागर उस अनाम माँ को नमन करते हुए भावुक हो गये थे।

विद्यासागर नौटियाल कई मामलों में एकदम मौलिक आदमी हैं। अपने बेटों के लिए इस्पाती और पंचशील तथा बेटियों के लिए विद्युत और अंतरिक्षा नाम चुनने वाले के लिए किसी ने कभी ‘मार्शल’ जैसा संबोधन चुना था तो वह गलत नहीं था।

अपने जन्मशताब्दी वर्ष में किसी रात नौटियाल जी के स्वप्न में आकर यदि पी.सी. जोशी उनसे कहें, ‘भाऊ, तेरा भवन अभी पूरा नहीं हुआ’ तो वह फिर पूरी शिद्दत के साथ पहाड़ की महागाथा लिखने में जुट जाएँगे।

यही कामना है।
(नोट: कुमाऊँनी में ‘भाऊ’ संबोधन छोटे भाई के लिए किया जा है।)

(शेखर जोशी की पुस्‍तक ‘स्‍मृति में रहें वे’ से साभार)

शेखर जोशी : दबे पाँव चलती कहानियाँ : संजीव कुमार

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के जन्‍मदिन (10 सितम्‍बर) पर उनके रचनाकर्म पर युवा आलोचक संजीव कुमार का आलेख-

बीती सदी का छठा दशक हिन्‍दी कहानी के अत्यंत ऊर्वर दौर के रूप में आज भी याद किया जाता है। अगर हिन्‍दी के दो दर्जन प्रतिनिधि कहानीकारों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो उसमें एक तिहाई से ज़्यादा नाम वही होंगे जिनकी ताज़गी-भरी रचना-दृष्टि ने पचास के दशक में कहानी की विधा को साहित्य की परिधि से उठा कर केन्‍द्र में प्रतिष्ठित कर दिया। उस उभार को अविलम्ब ‘नई कहानी’ की संज्ञा के साथ एक आंदोलन का दरजा हासिल हो गया था।

शेखर जोशी उसी उभार के एक सशक्त प्रतिनिधि हैं। उनका शुमार ‘नई कहानी’ में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़नेवाले कहानीकारों में होता है। ‘दाज्यू’, ‘कोसी का घटवार’, ‘बदबू’, ‘मेंटल’ जैसी उनकी कहानियों ने न सिर्फ़ उनके मुरीदों और प्रशंसकों की एक बड़ी जमात तैयार की है, बल्कि ‘नई कहानी’ की पहचान को भी अपने तरीके से प्रभावित किया है। पहाड़ी इलाक़ों की ग़रीबी और कठिन जीवन-संघर्ष; उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और नाउम्मीदी से भरे औद्योगिक मज़दूर वर्ग के हालात; शहरी-क़स्बाई निम्न और मध्यम मध्यवर्ग के आर्थिक-सामाजिक-नैतिक संकट; धर्म और जाति से जुड़ी घातक रूढि़याँ; दैनन्दिन स्थितियों का वर्गीय चरित्र- ये सभी उनकी कहानियों का विषय बनते रहे हैं। ‘मूड’ को आधार बनाने की बजाय घटनाओं और ठोस ब्यौरों में किस्सा कहनेवाले शेखर जोशी ने इन सभी विषयों को लेकर ऐसी कहानियां लिखी हैं, जो एक ओर विचार-केंद्रित कृत्रिम गढ़ंत से मुक्त हैं, तो दूसरी ओर ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और ‘भोगा हुआ यथार्थ’ के संकरे आशय से भी। इस लिहाज़ से वह अमरकान्‍त और भीष्‍म साहनी की तरह घातक अतियों से कहानी का बचाव करनेवाले रचनाकार हैं।

शेखर हिंदी के सबसे मितभाषी कथाकारों में से हैं। मितभाषी सिर्फ़ इस अर्थ में नहीं कि उन्होंने कम लिखा है, बल्कि इस अर्थ में भी, और यहाँ तो ज़्यादा इसी अर्थ में, कि वह वाचक के रूप में अपनी कहानियों के भीतर और कहानीकार के रूप में कहानियों के बाहर भी अधिक नहीं बोलते। यह संकोच उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की पहचान का बहुत महत्वपूर्ण घटक है… और एक अलग बिन्‍दु से देखें तो उनकी विशिष्‍ट पहचान बनने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा भी। अगर मधुरेश जैसे वरिष्‍ठ कथा-आलोचक को ‘उनके कृतित्व में किसी किस्म की रचनात्मक छलांग का अभाव’ दिखलाई पड़ता है और ऐसा लगता है कि ‘उनके आगे न तो रचनात्मक स्तर पर ही कभी कोई बड़ी चुनौतियां रहीं और न ही अपने सारे वैचारिक आग्रहों के बावजूद संघर्ष और विचार के ऐसे सतेज और प्रखर मुद्दे रहे जो रचनात्मकता में एक अनोखी चमक पैदा करते हैं’(नयी कहानी: पुनर्विचार, प्रथम संस्करण: 1999, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली, पृष्‍ठ 178), तो इसका एक बड़ा कारण शेखर जोशी का कम बोलनेवाला और दावेदारी के स्तर पर एक तरह का दब्बूपन बरतनेवाला कथाकार व्यक्तित्व है- ऐसा कथाकार व्यक्तित्व, जो अपने अदृष्य रहने को ही सबसे बड़ा मूल्य मानता है और इसके लिए जो कुछ ज़रूरी जान पड़े, करता है। मसलन- जिन स्थलों पर सामान्यतः दूसरे लेखकों को ज़्यादा शब्दों और/या ब्यौरों और/या इशारों और/या बलाघात की ज़रूरत महसूस होती है, वहाँ से बगैर किसी विशेष ताम-झाम के गुज़र जाना; कथा-स्थितियों के अर्थगर्भत्व और समृद्धि को समझने/सराहने के लिए पाठक को कोई ‘सर्फेस टेंशन’, ‘धक्का’ या ‘सुराग’ न देना; वाचक की मुद्रा में एक सादगी और साधारणता को बजि़द बनाए रखना  इत्यादि। ऐसे में ‘बदबू’, ‘मेंटल’, ‘बच्चे का सपना’, ‘नौरंगी बीमार है’, ‘समर्पण’, ‘निर्णायक’, ‘गलता लोहा’, ‘हलवाहा’ जैसी कहानियों के होते हुए भी किसी को ‘रचनात्मकता में एक अनोखी चमक पैदा’ करनेवाले ‘संघर्ष और विचार के सतेज और प्रखर मुद्दों’ का अभाव उनमें दिखलाई दे तो क्या हैरत! मधुरेश लिखते हैं, ‘. . . ‘कोसी का घटवार’ जैसी कहानियाँ शेखर जोशी के यहाँ अपवाद जैसी हैं। अपनी रचना-वस्तु के चुनाव की दृष्टि से भी और उससे भी अधिक उसके कलात्मक निर्वाह की दृष्टि से।’ (वही, पृष्‍ठ 178) बात बिल्कुल सही है, पर वह सही होने के साथ-साथ मुकम्मल तब होगी, जब उसमें यह जोड़ दिया जाए कि इसी कलात्मक निर्वाह के चलते किसी गहरी अंतर्दृष्टि के बगैर भी ‘कोसी का घटवार’ कालजयी रचना बन गई, जबकि शेखर जी की अनेक अंतर्दृष्‍टि‍संपन्न कहानियाँ शायद इसीलिए ज़्यादा समय चर्चा में नहीं रह पाईं कि उनका निर्वाह प्रकटतः कलात्मक नहीं था और न ही उनकी प्रस्तुति की मुद्रा में कोई गहरी बात कहने की दावेदारी थी। ये कम बोलने और आहिस्ता बोलनेवाली कहानियाँ हैं- ऐसी कहानियाँ जो अपने पाठक का सम्मान करती हैं, ज़्यादा समझा कर उसकी समझ एवं संवेदनशीलता के प्रति अविश्‍वास प्रकट नहीं करतीं, साथ ही, ‘दिखनेवाली’ कलात्मकता से अछूती हैं, जो कि अंतर्वस्तु की गुणवत्ता के प्रति लेखक के पुख़्ता आत्मविश्‍वास का सूचक है।

शेखर जोशी की कई कहानियों को पीछे कही गई बातों के उदाहरण की तरह पढ़ा जा सकता है। फिलहाल, ‘समर्पण’ को लें। यहाँ लेखक ने प्रतीक-केंद्रित सामाजिक संघर्ष की गतिकी को जिस तरह से चिन्हित किया है, वह असाधारण है। यज्ञोपवीत-धारण के लिए चलनेवाले अभियान की पूरी प्रक्रिया, उसकी शक्तियाँ और सीमाएँ तथा विचारधारात्मक वर्चस्व की टिकाऊ बनावट- इन सबको एक कहानी में समेटना कोई साधारण बात नहीं ! पर शेखर जोशी का यह ‘समेटना’ इतना आयासहीन है कि कहानी की असाधारणता उसमें छुप-सी जाती है और उसे इकहरे तरीके से पढ़ना सिर्फ़ इसलिए मुमकिन हो जाता है कि लेखक की कथन-भंगी उस इकहरे पठन को कहीं से हतोत्साहित नहीं करती। इसीलिए मधुरेश को यह कहानी ‘शि‍ल्पकारों की जागृत चेतना’ की ऐसी कहानी प्रतीत होती है, जिसमें ‘दीवान वंश के वर्तमान उत्तराधिकारियों के आतंक और पेट की ज्वाला’ से भी नष्‍ट न हो पाने वाली उस चेतना को ‘‘वैद्य जी की बुद्धि का चमत्कार डाइनामाइट की तरह तहस-नहस कर देता है।’ कहानी का यह पठन इतना अधूरा है कि ग़लत है, बावजूद इसके कि वैद्य जी की बुद्धि के चमत्कार को आलोचक यह कह कर एक व्यापक संदर्भ देता है कि ‘वह सिर्फ़ वही करते हैं, जो इस धर्म प्रधान देश में सदियों से होता आया है।’ दरअसल, पूरी कहानी प्रतीक पर केंद्रित संघर्ष (नीची जातियों द्वारा जनेऊ-धारण) के उभार और उतार का बयान है और इस सिलसिले में वह प्रतीक-केंद्रित संघर्ष की शक्तियों को विलक्षण तरीके से रेखांकित करने के साथ-साथ उसकी भयावह सीमाओं को भी सामने लाती है। एक आदर्श संतुलन के साथ वह इस बात को चिन्हित करती है कि अगर सामाजिक प्रतीकों की लड़ाई ठोस उत्पादन-संबंधों से जुड़ी लड़ाई का हमक़दम या हिस्सा बन कर नहीं आती, तो अपनी पूरी नैतिक शक्ति के बावजूद वह कमोबेश ऐसे ही ट्रैजिक-कामिक अंत को प्राप्त होने के लिए अभिशप्त है। ‘सेवक जी की अमृतवाणी मन को संतोष दे गई थी, पर तन को संतोष नहीं दे पाई।’ और इसी चीज़ ने उस व्यापक जागृति की रीढ़ तोड़ कर रख दी, जिसे देख ‘पर-पौरुष पर निर्भर दीवान वंश के कीर्तिस्तंभ की नींव’ मालिक लोगों को हिलती प्रतीत होने लगी थी। कितनी बड़ी विडंबना है कि मालिक लोगों के बगैर कुछ किए उनकी यह ‘शंका धीरे-धीरे स्वतः ही निर्मूल सिद्ध होने लगी’; अंततः भेदभाव के जिस प्रतीक को अपने शरीर पर धारण कर शि‍ल्पकारों-हलवाहों ने उसका भेदभावमूलक प्रतीकार्थ नष्‍ट करना चाहा था, उसे अपने ही हाथों उतार फेंका।

   निश्चित रूप से, अगर ‘समर्पण’ के लेखक की कथन-भंगी कहानी के इकहरे पठन को हतोत्साहित नहीं करती, तो यह उसकी कि़स्सागोई का एक दोष है, लेकिन साथ-ही-साथ यह आलोचकों के सराहना-सामर्थ्‍य पर भी एक सवालिया निशान है। क्या अंदाज़े-बयाँ की जटिलता ही कहानी के घटना-कार्य-व्यापार में निहित अर्थगत एवं यथार्थगत जटिलता के प्रति हमें सजग बना पाती है ? और क्या इसीलिए हम सरल व संकोची तरीके से कही गई गहरी बात की गहराई को अनदेखा कर जाते हैं ? क्या घटना-कार्य-व्यापार की योजना अपने-आप में अर्थ-निर्माण की यथेष्‍ट प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लेखक की कथन-भंगी और उसके द्वारा उछाले गए सुराग (क्लूज़) ही उस योजना पर अर्थ का आरोपन कर पाते हैं ? क्या हमारी आलोचना यह मानती है कि सुराग-प्रेम नहीं दिखलाते हुए रचे गए अपेक्षाकृत मुक्तमुखी पाठ वस्तुतः अर्थ की दृष्‍टि‍ से विपन्न पाठ हैं ? अगर हिंदी आलोचना को सचमुच शेखर जोषी के यहाँ रचनात्मकता में अनोखी चमक पैदा करनेवाले संघर्ष और विचार के प्रखर मुद्दों का अभाव दिखलाई देता है, तो उसे इन सवालों से रू-ब-रू होना पड़ेगा।

. . . पर, निस्संदेह, यह हिंदी आलोचना की आम राय नहीं है और इसीलिए पूरी आलोचना को इन सवालों के कठघरे में खड़ा करने की ज़रूरत नहीं। विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने अपने लेख ‘बदलते समय के रूप’ (कुछ कहानियाँ, कुछ विचार, प्रथम संस्करण: 1998, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) में ‘हलवाहा’ कहानी पर विचार करते हुए सहज तरीके से बड़ी बात कहनेवाली शेखर जोशी की इस कला को बिल्कुल सही पहचाना है।*  कई और कहानियों के संदर्भ में शेखर जोशी की इस कला की पहचान होना अभी बाकी है। ‘समर्पण’ की चर्चा हो ही चुकी है; ‘गलता लोहा’, ‘बच्चे का सपना’, ‘निर्णायक’ आदि कहानियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं। गल कर एक नया आकार लेनेवाले धातु की तरह जातिगत पहचान का स्थान वर्गीय पहचान ले रही है, इस कथ्य को बहुत महीन तरीके से सामने लाती है ‘गलता लोहा’ कहानी। जातिवादी एकजुटता के छद्म का

शि‍कार बना मेधावी ब्राह्मण कुमार अपने लोहार सहपाठी के साथ जो वर्गीय एकजुटता महसूस करता है, और उसका व्यक्तित्व-विकास जातिगत आधार पर निर्मित झूठे भाईचारे की जगह मेहनतकशों के जिस सच्चे भाईचारे की प्रस्तावना करता है, वह कहानी के केंद्र में होने के बावजूद ज़रा भी मुखर नहीं है। उसे अमुखर बनाए रखने का सूक्ष्म कला-विवेक यदि शेखर जोशी में न होता, तो शायद कहानी का कथ्य ज़्यादा व्यापक स्तर पर ‘सुना’ जाता। इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि ‘गलता लोहा’ अपने कला-विवेक की ही बलि चढ़ गई। वैसे शेखर जोशी की कई दूसरी कहानियों की तरह ही यह कहानी भी किसी ‘दिखनेवाली’ कला से प्रायः अछूती है- प्रकट रूप में लगभग कलाविहीन। पूर्वदीप्ति की एक बहुप्रयुक्त तकनीक को छोड़ दें तो कलायुक्तियों का सचेत उपयोग बिल्कुल दिखलाई नहीं पड़ता। नाटकीय शैली यानी दृष्यात्मक प्रविधि बहुत कम अंशों में है; पूरी कहानी पर घटनाओं की पिछली श्रृंखला बताते जाने की शैली यानी परिदृष्यात्मक प्रविधि हावी है। मतलब यह कि कलात्मक निर्वाह के अभाव की शि‍कायत बड़ी आसानी से की जा सकती है, अगर आप कला को उसके दृष्यमान उपादानों से ही पहचानते हों, तो। पर यदि आप कथात्मक विधाओं के अंदर ऊँची आवाज़ में न बोलने को एक महत्वपूर्ण कला मानते हैं, तो वह ‘गलता लोहा’ में है। यहाँ स्थितियों के मध्य सम्‍बन्‍ध को रेखांकित करते हुए लेखक बहुत बारीक रेखाओं का उपयोग करता है और कहीं कमज़ोर निगाहों से ये रेखाएं ओझल न रह जाएँ, इस डर से उनकी बारीकी के साथ कोई समझौता नहीं करता। यहाँ तक कि शीर्षक जिस प्रतीकार्थ को अपने में समेटे हुए है, उसकी ओर भी कोई इशारा ज़ाहिरा तौर पर कहानी के भीतर मौजूद नहीं है। उसे कहानी के मर्म के साथ जोड़ कर पढ़ने, या उसी की रोशनी में कहानी का मर्म निर्धारित करने का पूरा दारोमदार पाठक पर है। पाठक से मर्मज्ञता की मांग करनेवाले इस निर्वाह को अगर हम कलात्मक न मानें, तो निश्‍चि‍त रूप से पच्चिकारियों को ही कला का एकमात्र नमूना मानना पड़ेगा !    

वस्तुतः शेखर जोशी की कहानियाँ बड़ी मज़बूती से कला और सौंदर्य की गैररूपवादी धारणा पर टिकी हुई हैं। उनके यहाँ कलात्मक सौंदर्य की सत्ता अंतर्वस्तु के ऐतिहासिक, सामाजिक और नैतिक संदर्भ से परे नहीं है। इस बात के क्या मायने हैं, इसे खुद जोशी जी कहानी ‘सिनारियो’ किसी भी दार्शनिक-सैद्धांतिक लेख के मुक़ाबले अधिक समर्थ ढंग से बता पाती है। ‘सिनारियो’ वृत्तचित्र बनानेवाले एक युवक, रवि की कहानी है। वह अपना कैमरा लेकर एक पहाड़ी गाँव में पहुँचा है। सूर्यास्त के समय सिंदूरी आभा से नहाया हुआ हिमालय का हिम-विस्तार देख वह मंत्र-मुग्ध हो जाता है। हिमालय की इसी शोभा को पर्दे पर जीवंत करने के लिए वह पहाड़ों में आया है। कमेंट्री, पार्श्‍व-संगीत, कालिदास से लेकर पंत तक की काव्य-संपदा का उपयोग- इन सब पर उसने ख़ासा अनुसंधान और चिंतन कर रखा है। जिस घर में वह ठहरा है, वहाँ प्रारूपिक पहाड़ी दरिद्रता के बीच एक बूढ़ी आमां और उसकी बारह-तेरह साल की पोती रहती है। रात को सोने के बाद सुबह-सुबह पता चलता है कि चीड़ के कोयले में दबी आग चूल्हे में बची नहीं रह पाई है और माचिस रखना महंगा पड़ता है, इसलिए चाय बनाने के लिए आग का इंतज़ाम करने की समस्या है। थोड़ी देर बाद रवि देखता है कि आमां की पोती, सरुली एक पीतल का कलछुल लिए पगडंडी के रास्ते कहीं जा रही है। फिर उसी रास्ते वह कलछुल में आग लिए लौटती दिखलाई पड़ती है। घर के पास पहुँचते-पहुँचते अचानक किसी वजह से वह अपना संतुलन खो बैठती है और दूर के बड़े मकान से मांग कर लाए गए अंगारे तुषार भीगी धरती पर बिखर जाते हैं। लगभग बुझ चले अंगारों को जल्दी-जल्दी उठाकर वह कलछुल में रखती है और उन्हें फूंकती हुई घर की ओर भागती है। इस दृष्य को देख अपनी असमर्थता की ग्लानि से भरा हुआ रवि छत से नीचे उतरता है और गोठ के दरवाज़े पर पहुँच कर एक अद्भुत दृष्य देखता है। बच्ची और बुढि़या अंगार के कोने में बची हुई हल्की आंच को फूंक-फूंककर जीवित करने की कोशि‍श में जुटी हुई हैं। धीरे-धीरे आंच का वृत्त फैलने लगता है। फिर उस कलछुल को सूखी फूस और लकडि़यों के बीच रख कर आमां एक फूंक मारती है और लकडि़यां भभककर जल उठती हैं। ‘पूरा गोठ एकबारगी आलोकित हो उठा। चूल्हे के पास बैठी आमां के चेहरे की झुर्रियां जैसे उस सुनहरे आलोक में खिल उठीं।’ इसके बाद कहानी का आखि़री वाक्य है, शेखर जोशी की चिरपरिचित शब्दकृपण शैली में, ‘रवि को सहसा आभास हुआ कि काश ! इस रंगत को वह अपने कैमरे से पकड़ पाता।’

‘सिनारियो’ का सार-संक्षेप देने के बाद इसकी व्याख्या में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत तो नहीं, फिर भी कुछ बातें उल्लेखनीय हैं। कहानी शुरू होती है, हिमालय की सांध्यकालीन रंगत के प्रति कलाकार की ललक के साथ, और एक जिजीविषापूर्ण संघर्ष के बाद हासिल हुए अग्नि-आलोक के प्रति उसके सम्मोहन-भाव पर जाकर ख़त्म होती है। कहानी में हिमालय के सौंदर्य पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है, लेकिन अंतिम प्रसंग में वाचक के कुछ कहे बगैर ही दो सौंदर्य-दृष्‍टि‍यां आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं। इनमें से एक वह है, जो रूप से परे नहीं जाती- हिमशि‍खरों पर रंगों का खेल बिलाशर्त सुंदर है; उसकी सुंदरता का स्रोत दर्शक के किसी ऐतिहासिक-सामाजिक-नैतिक बोध में निहित नहीं है। दूसरी सौंदर्य-दृष्‍टि‍ रूप को विभिन्न सरोकारों और संदर्भों के बीच रख कर देखती है और उनसे जुड़ा ऐतिहासिक-सामाजिक-नैतिक बोध ही रूप को सुरूप या कुरूप बनाता है। कहानी का विकास-क्रम बाद वाले को एक अधिक विकसित सौंदर्य-दृष्‍टि‍ के रूप में प्रस्तावित करता है। लेखक सौंदर्य-दृष्‍टि‍ के मामले में सही-ग़लत, उचित-अनुचित की बहस में नहीं पड़ता और उसकी शैली में ही यह निहित है कि इस तरह की बहस बेमानी है। पर वह बाद वाली दृष्‍टि‍ को अधिक विकसित मानता है, क्योंकि उसमें ‘देखना’ परिस्थितियों की समझ और मानवीय बोध से संपन्न क्रिया है। गोठ में फैले हुए सुनहरे आलोक और उसमें खिली हुई आमां की झुर्रियों के सौंदर्य का पारखी वही हो सकता है, जो इस दृष्य को साकार करनेवाली संघर्ष-यात्रा का साक्षी रहा है और जिसमें संघर्ष तथा जिजीविषा के प्रति एक गहरा नैतिक रुझान है।

यहाँ हठात् याद आता है, शेखर जोशी की एक कहानी ‘आशीर्वचन’ का आखि़री वाक्य, ‘. . . हॉल में बैठे हुए होनहार नई पीढ़ी के कारीगरों की मोहनी सूरत उसकी आँखों के आगे तैर गई।’ वह कौन है, जिसे कारीगरों की नई पीढ़ी ‘होनहार’ लगती है और उनकी सूरत ‘मोहनी’? निश्‍चि‍त रूप से यह कोई प्रबंधक या पूंजीपति नहीं है। यह व्यक्ति है, कारखाने से सेवानिवृत्त होने वाला फोरमैन श्‍यामलाल, जिसने वह ज़माना देखा है, जब ‘कारखाने की एक-एक ईंट रखी गई थी’, जब कारखाने के अंदर ‘सिर उठाने का मतलब सिर कटाना होता था’, जब यहाँ ‘पीने का पानी नहीं मिलता था, कैंटीन नहीं थी, बात-बात पर डिस्चार्ज मिल जाता था’, जिसने ‘ऐसी जीतें’ देखी हैं ‘जिन्हें जीतना आसान नहीं था’, ‘ऐसी हारें’ देखी हैं ‘जिन्हें भूलना आसान नहीं है’। ऐसे व्यक्ति के पास नई पीढ़ी के कारीगरों को देखने की जो नज़र होगी, वह किसी प्रबंधक या पूंजीपति या वर्ग-चेतनाविहीन मज़दूर के पास नहीं हो सकती। इसलिए इन सभी को विज्ञापनों के ‘मॉडलों’ के चेहरे भले ही मोहक लगें, युवा कारीगरों की सूरत मोहक नहीं लग सकती। वहीं श्‍यामलाल को- उसकी विदाई-सभा में से अधीर होकर, बिना उसका भाषण सुने, उन युवा कारीगरों के भागने के बावजूद- यह नई पीढ़ी ‘होनहार’ लगती है और इन कारीगरों की सूरत ‘मोहनी’, क्योंकि उसके पास अपने सपनों और उनके लिए लड़ी गई लड़ाइयों से हासिल हुई एक अलग-सी निग़ाह है।

शेखर जोशी का गैररूपवादी सौंदर्य-बोध हमें वह निग़ाह देता है, जो ऐतिहासिक-सामाजिक-नैतिक बोध की पृष्‍ठभूमि में ‘साधारण’ की सम्मोहकता को देख सकती है। इसी निग़ाह से खुद शेखर जोशी की कहानियों के सौंदर्य को भी पहचान पाना मुमकिन है। उनमें मिलनेवाली गहरी अंतर्दृष्‍टि‍ कहानीकार के सीधा-सादा, नपा-तुला और आहिस्ता बोलने को कलात्मक कथन बना देती है। इसी तर्क से यह समझा जा सकता है कि किसी भी काव्यात्मक युक्ति का उपयोग किए बगैर ‘बच्चे का सपना’ क्यों इतनी काव्यात्मक प्रतीत होती है, ‘निर्णायक’ और ‘मेंटल’ के नायकों के पक्ष में प्रथमदृष्‍टया कोई दलील न देते हुए भी हमें उनका पक्षधर बना देनेवाली किस्सागोई का रहस्य क्या है, ‘हलवाहा’ के आखि़री वाक्य में दिखनेवाली ‘कुलघातक जिबुआ’ के ‘नौसिखिएपन की गवाही’ देती ‘हल के फाल की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें’ कहानी-कला की परिपक्वता की गवाही क्योंकर देती है, ‘बदबू’ का अनमना-सा शि‍ल्प कैसे सर्वनाम-सूचित नायक (वह) के साथ हमारा तादात्म्य कराने वाली अचूक कला बन जाता है और हम उसी नायक के समान एक भयावह अभ्यस्तता का शि‍कार होने से बच जाने की खुशी महसूस कर पाते हैं, नौरंगी के मन को लेकर हमारी कोई भी जिज्ञासा शांत किए बगैर उसके काम पर लौटने की जानकारी के साथ एक झटके में कहानी ख़त्म कर देना कैसे हमारे मन में अनंत अनुगूंजें पैदा करनेवाली युक्ति साबित होता है, इत्यादि।

ऐसा नहीं कि इस तरह की कहानी-कला का पेटेंट हिंदी में शेखर जोशी के पास ही हो, पर वे निश्‍चि‍त रूप से इस कहानी-कला को समझने-समझाने के लिए एक मुकम्मल पाठ हैं।

*विश्‍वनाथ त्रिपाठी के अनुसार, यह ‘इतिहासविरुद्ध यातना’ और उस ‘यातना के संघर्ष’ से निकलनेवाली इतिहासम्मत प्रगति की कहानी है। कहानी के मुख्य पात्र जीवानंद के सामने दुविधा ये है कि वह या तो ज़मीन बेच दे या स्वयं हलवाहा बन जाए। उसके हलवाहे को आजीविका का बेहतर साधन मिल गया है। इधर जीवानंद की ज़मीन पर बद्री प्रधान की नज़रें गड़ी हुई हैं। वह चाहता है कि खेती की मुश्किलें देख कर जीवानंद ज़मीन बेचने का मन बना ले। लेकिन जीवानंद अंततः खुद हल चलाना तय करता है। इसका विश्‍लेषण करते हुए विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने खैरा बैल के प्रति जीवानंद की नवोदित आत्मीयता पर तथा कहानी के अंत पर जो टिप्पणी की है, वह शेखर जोशी की मितकथन-शैली पर भी एक उम्दा टिप्पणी है:
   हम यातना सहने की प्रक्रिया में उससे मुक्ति के लिए छटपटाते भी हैं- मुक्ति का रास्ता भी ढूंढ़ते हैं- यही यातना का संघर्ष है। जीवानंद पदम के न आने, ज़मीन के बंजर हो जाने, उसके बिक जाने और अपमानित होने की जो यातना भोग रहे थे उससे मुक्ति का मार्ग बैल के प्रति आत्मीयता से होकर गुजरता था।
विपत्ति में आत्मीय का स्मरण होता है। शेखर जोशी की इस कहानी में खैरा बैल का जो प्रकरण है वह संक्षिप्त होने पर भी इतना उपयुक्त है कि प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ और रेणु की ‘तीसरी कसम’ की याद आती है। प्रतीकतः खैरा बैल जीवानंद के उस हार न माननेवाले मन का रूप है जो सोच-विचारकर विपत्ति से पराजित नहीं होता बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता खोजता है।
कोई एकालाप नहीं, अंतर्द्वंद्व का कोई चित्रण नहीं। सिर्फ़ संकल्प का मौन- ‘‘सिर झुकाकर वह घर के अंदर घुस गया और हाथ-पैर धोकर संध्या करने लगा।’’
जीवानंद की ज़मीन खरीदने का सपना देखनेवाले बद्री प्रधान ने दूसरे दिन सुबह देखा- ‘‘कुलघातक जिबुआ स्वयं हल चला रहा था। फाल की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें उसके नौसिखिएपन की गवाही दे रही थीं।’’
नौसिखियापन नए जीवन का उदय है। यातना की उपलब्धि।  – पृ0 115-116

यादें और यादें : शेखर जोशी

कथाकार मार्कण्‍डेय

अप्रति‍म कथाकार और ‘कथा’ के संस्‍थापक संपादक मार्कण्‍डेय पर वरि‍ष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी का संस्‍मरण-

जौनपुर जनपद की केराकत तहसील के एक पिछड़े गांव बराईं में किसान परिवार में जन्में, पले-बढ़े ग्राम कथाकार के रूप में समादृत मार्कण्डेय किसी भी रूप में ‘देहाती’ नहीं लगते थे। उनके व्यक्तित्व में एक नफासत थी। एक विशिष्ट किस्म का नागर अभिजात्य जो उनको उनके दूसरे निम्न मध्यवर्गीय साथियों से अलग पहचान देता था। उनके रईसी स्वभाव को लेकर कभी अमरकांत जी ने एक मजेदार संस्मरण ‘राजा का रथ’ लिखा था। मार्कण्डेय में यह गुण यूं ही नहीं आ गया था। उनमें ग्रहणशीलता की अद्भुत प्रतिमा थी और उन्हें जीवन में क्रमश: ऐसा वातावरण मिलता गया जो उनके व्यक्तित्‍व को निखारने में सहायक होता रहा।

लड़कपन में मधुपुर स्टेट के सामन्‍ती वातावरण का संसर्ग, वहां का अभिजात्य और कूटनीति, युवावस्था में प्रतापगढ़ क्षेत्र के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ पं. मुनीश्‍वर दत्त उपाध्याय की निकटता, स्वतंत्रता संग्राम के दौर में उपाध्याय जी की सामन्‍ती शासन के विरुद्ध छेड़ी गई मुहिम का प्रत्यक्ष अनुभव, इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ते हुए विद्वान गुरुजनों और प्रतिभाशाली समवयसी छात्रों से निकट संपर्क फिर प्रसिद्ध पत्रकार और सामाजिक व्यक्तित्व श्री श्रीकृष्णदास के संरक्षण में साहित्यिक जीवन की शुरुआत।

यह कहने में किसी प्रकार की अतिश्योक्ति नहीं होगी कि श्री श्रीकृष्णदास जी का 2-डी मिन्टो रोड बाला वह घर जिसमें मार्कण्डेय के जीवन का महत्वपूर्ण भाग बीता है, साहित्य, कला, संस्कृति और राजनीति का अपनी तरह का केन्‍द्र था। दासबाबू स्वयं बहुपठित व्यक्ति थे। लोक साहित्य और संस्कृति वांग्‍मय में उनकी गहरी पैठ थी। दैनिक ‘अमृत प्रत्रि‍का’ के साहित्य सम्‍पादक के पद पर कार्य करते हुए वह नगर की अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े हुए थे। स्थानीय राजनीतिज्ञों के बीच उनका गहरा सम्मान था। उनके श्‍वसुर विद्यार्थी जी प्रान्‍त के बहुत सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी और कर्मठ कांग्रेसी थे। परम उदार आतिथेय दासजी और सरोज भाभी के घर में हमेशा विद्वान लोगों का आना-जाना लगा रहता था। जीवित विश्‍वकोष के रूप में ख्यात डा. महादेव साहा, नागार्जुन,  डा. नामवर सिंह, डा. कमलेश दत्त त्रिपाठी और पत्रकार प्रेमकपूर वहां पारिवारिक सदस्यों के रूप में मान्य थे। पडो़स में एक ओर एक पुराने बंगले में पं. इलाचन्‍द्र जोशी सपरिवार रहते थे तो साथ वाले घर में अमृतराय और सुधा जी। उनके घर भी लेखकों, विद्वानों का आना-जाना लगा रहता था। एक अन्य पडो़सी लेखक और प्रकाशक श्री ओंकार शरद थे। दासजी उत्सव प्रिय व्‍यक्‍ति‍ थे। नि:संतान दास दंपत्ति के घर में मार्कण्डेय जी के बच्चों के जन्मदिन धूमधाम से मनाए जाते और इन अवसरों महादेवी जी,  प्रो. प्रकाशचंद्र गुप्त, भैरव प्रसाद गुप्त, उपेंद्रनाथ अश्क जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों और सेंट जॉजफ सेमिनरी से जुड़े फादर धीरानंद भट्ट इत्यादि विद्वानों की उपस्थिति सहज-स्‍वाभाविक होती थी। ऐसे प्रेरक साहि‍त्यि‍क, बौद्धिक परिवेश के साथ ही इलाहाबाद नगर का यह कालखंड, जब मार्कण्डेय विश्‍ववि‍द्यालय के छात्र थे, कामरेड पीसी जोशी की उपस्थिति के कारण युवावर्ग को सांस्कृतिक और वैचारिक दृष्टि से प्रगतिवादी धारा से जोड़ने में उत्प्रेरक सिद्ध हुआ था। श्री नेमिचंद्र जैन ने सिविल लाइंस में ‘आधुनिक पुस्तक भण्‍डार’ नाम से प्रगतिशील साहित्य की दुकान खोल ली थी जहां सोवियत संघ से आयातित रूसी क्लासिक्स, पत्र-पत्रिकाएं और मार्क्‍सवादी साहित्य की पुस्तकें पहली बार प्रचुर मात्रा और अल्पमूल्य में उपलब्ध हो जाती थीं। नोमिजी और रेखा जी कलकत्ता प्रवास से ही इप्‍टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर) एसोसिएशन से सक्रिय रूप से जुड़े थे। इलाहाबाद में भी उन्होंने कामरेड जोशी की प्रेरणा से इप्‍टा का गठन किया। ‘आधुनिक पुस्तक भण्‍डार’ मात्र किताबों की दुकान न रहकर वामपंथी रुझान वाले रचनाकारों, रंगकर्मियों बुद्धिजीवियों और छात्रों का अड्डा बन गई थी।

ऐसे प्रेरक समय और वातावरण में मार्कण्डेय ने युनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी कर स्वतंत्र लेखक के रूप में अपनी सृजन यात्रा को गति दी। उनके अंतरंग साथियों में दुष्यंत और कमलेश्‍वर थे जो उन्हीं की तरह लेखनी जीवी बनने का संकल्प लेकर साहित्य के क्षेत्र में अपनी सक्रियता दिखा रहे थे।

सर्जन के क्षणों में मार्कण्‍डेय

उन दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की नियमित बैठकों में हिन्‍दी और उर्दू के साहित्यकार साथ-साथ बैठकर साहित्य चर्चा करते थे। जहां एक ओर डा. भगवतशरण उपाध्याय, भैरवप्रसाद गुप्त, उपेंद्रनाथ अश्क, अमृतराय, प्रकाशचंद्र गुप्त, और शमशेर बहादुर सिंह जैसे वरिष्ठ लेखकों के साथ मार्कण्डेय, कमलेश्‍वर, दुष्यंत कुमार, अमरकांत, ओमप्रकाश श्रीवास्तव जितेन्‍द्र, वंशीधर पण्डा, गंगाप्रसाद श्रीवास्तव इत्यादि नवयुवकों का दल उपस्थिति रहता, वहीं उर्दू के ख्यातनामा शायर फिराक गोरखपुरी, डा.ऐजाज हुसैन, डा. ऐहतशाम हुसैन, महमूद अहमद हुनर, अजमल अजमली इत्यादि लेखक इन बैठकों में शिरकत करते। पी.डब्ल्यू.ए. की इन गोष्ठियों ने नई पीढ़ी को एक ओर वैचारिक आधार दिया तो दूसरी ओर साझा भाषिक संस्कृति का पक्षघर बनने के संस्कार दिए।

पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों में जो साहित्यि‍क पत्रिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी जाती थी और जिसमें प्रकाशित होना गौरव की बात समझी जाती थी, वह दक्षिण भारत के अहिन्‍दी प्रान्‍त से प्रकाशित होने वाली हैदराबाद की मासिक पत्रिका ‘कल्पना’ थी। इसके प्रकाशक श्री बद्रीविशाल पित्ती न केवल साहित्यप्रेमी, बल्कि‍ कला मर्मज्ञ और कला-संग्राहक थे। मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों का जैसा संग्रह उनके पास था वैसा भारत या विदेश में शायद ही किसी अन्य निजी संग्राहक के पास हो। ‘कल्पना’ पत्रिका के अतिरिक्त पित्तीजी के ‘नवहिन्‍द पब्लिकेशन्‍स’ से लोहिया साहित्य की प्रकाशित होता था। प्रारम्‍भ में ‘कल्पना’ के माध्यम से ही मार्कण्डेय की कहानियाँ साहित्य जगत में चर्चित हुईं और उनका पहला कहानी संग्रह ‘पानफूल’ नवहिन्‍द पब्लिकेशन्‍स से ही 1954 में प्रकाशित हुआ था। ‘पानफूल’ संग्रह के प्रकाशन के अवसर पर श्री बद्रीविशाल पित्ती के आमंत्रण पर मार्कण्डेय कुछ दिनों के लिए हैदराबाद गए थे। मार्कण्डेय का यह हैदराबाद प्रवास उनकी कलारुचि को परिष्‍कृत करने में भी सहायक रहा। चित्रकार जगदीश मित्तल ‘कल्पना’ से जुड़े थे। उनके लोकशैली के चित्रों ने मार्कण्डेय को निश्‍चय ही प्रभावित किया होगा। उनके निजी प्रकाशन ‘नया साहित्य प्रकाशन’ की पुस्तकों की सज्जा में इसकी स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। पुस्तकों की आकर्षक प्रस्तुति के लिए ‘नया सहित्य प्रकाशन’ की अपनी धाक थी।

भारतीय कम्युनिस्‍ट पार्टी में महासचिव बी.टी. रणदिवे काल की वैचारिक उग्रता ने प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों को भी प्रभावित किया था। प्रलेस के महासचिव डा. रामविलास शर्मा का तब दूसरा ही तेवर था, यह तथ्य सभी जानते हैं और यह भी निर्विवाद है कि इस वैचारिक कट्टरपन के कारण लेखन में सैद्धांतिक पक्ष को वरीयता देने के क्रम में प्रगतिशील लेखन में एक प्रकार की जड़ता आ गई थी। प्रत्येक साहित्यिक केंद्र में कुछ कट्टरपंथी बुजुर्ग थे तो कुछ नए प्रयोगधर्मी लेकिन वैचारिक रूप से जागरूक युवा तुर्क भी थे। लेखक संघ की बैठकों में रचना की विषयवस्तु को लेकर तीखी बहसें होती थीं। इलाहाबाद में इन युवा तुर्कों को दुहरा विरोध झेलना पड़ता था। एक ओर तो सैद्धांतिक कट्टरपन वाले अपने बुजुर्ग साथी थे, दूसरी ओर ‘परि‍मल’ संस्‍था के प्रयोगवादी रचनाकारों का समूह था, जो कला की स्वायत्तता के हामी और प्रच्छन्नरूप से मार्क्‍सवादी विचारधारा के विरोधी लोग थे। प्रगतिशील लेखकों के इस हिरावल दस्ते में मार्कण्डेय, कमलेश्‍वर, दुष्यंत, अमरकांत, जितेंद्र और ओमप्रकाश श्रीवास्तव अग्रणी थे।

युवा अवस्‍था में मार्कण्‍डेय

सन् 1936 में प्रेमचन्‍द की मृत्यु के बाद हिंदी कहानी नगर केंद्रित हो गई थी। मार्कण्डेय ने अपने कथालेखन की शुरुआत ग्रामीण परिवेश को केंद्र में रखकर की थी और यही उनकी मुख्य कथाभूमि रही। एक अंतराल के बाद ग्रामीण कथा स्‍थि‍ति‍यों की माटी की महक पाठकों के लिए ताजा हवा के झोंके की तरह आई थी। मार्कण्डेय को अपने पहले कथा संग्रह ‘पानफूल’ से ही प्रचुर ख्याति मिली यद्यपि इस संग्रह की कहानियाँ वामपंथी विचारधारा के स्तर पर मुखर नहीं थीं।

‘कल्पना’ पत्रिका का नियमित लेखक होने और बद्रीविशाल पित्ती की निकटता के कारण मार्कण्डेय एक लंबे अरसे तक पत्रिका के हर अंक में साहित्य समीक्षा का एक स्‍तम्‍भ ‘साहित्यधारा’, चक्रधर उपनाम से लिखते रहे थे। उनकी तीखी टिप्पणियों की हर माह पाठकों को उत्सुक प्रतीक्षा रहती थी। इस गुमनाम स्‍तम्‍भकार ने कई स्थापित साहित्यकारों की बाखिया उधेडऩे में कसर नहीं छोडी थी। अंतत: जब उनके नाम का रहस्य खुला तो मार्कण्डेय ने स्‍तम्‍भ लेखन स्‍थगि‍त कर दि‍या। यह स्‍तम्‍भ लेखन उनके आलोचक व्यक्तित्व के निर्माण का प्रारंभ था और यही उनकी आलोचना शैली का मूलाधार थी। कालांतर में भैरव प्रसाद गुप्‍त के संपादन में प्रकाशि‍त ‘नई कहानि‍याँ’ पत्रिका में वह कथा आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इस पत्रिका के लिए छठे दशक में ‘जो लिखा जा रहा है’ स्‍तम्‍भ के अंतर्गत लिखे गए लेखों का संग्रह ‘कहानी की बात’ शीर्षक से 1984 में प्रकाश में आ पाया था। इस पुस्तक के सम्‍बन्‍ध में स्व. भैरवप्रसाद गुप्त की प्रथम पुण्यतिथि (7-4-96) को जनवादी लेखक संघ और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन में आयोजित स्मृति सभा में प्रख्यात आलोचक डा. नामवर सिंह ने अपने व्याख्यान के दौरान विनम्रतापूर्वक कहा था, ‘ …. वह एक दुधमुँहा प्रयास था जो मैंने अपनी उस किताब (‘कहानी नई कहानी’) में कहानी चर्चा में कुछ लेख लिखे, और संयोग कि वह छप भी गई। लेकिन मुँहदेखी नहीं कहता- उससे अच्छे लेख कहानियों के बारे में मार्कण्डेय जी की, ‘कहानी की बात’ नामक किताब में छपे जो बड़े व्यवस्थित, योजनाबद्ध और बेहतर लेख हैं, कहानी के बारे में, कहानी की आलोचना के बारे में निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण लेख हैं।’ वस्तुपरक दृष्टि से देखा जाए तो ‘कहानी की बात’ पुस्तक के चौदह लेखों में मार्कण्डेय का जोर कहानीकार की कमियों की ओर ही अधिक रहा, उसके गुणात्मक पक्ष की ओर उन्होंने कम ही दृष्टिपात किया। यह आकस्‍मि‍क नहीं कि उनका आलोचकीय कृतित्व इसी पुस्तक तक सीमित रह गया। सर्जनात्मक आलोचना की निरंतरता के लिए शायद यह अनिवार्य शर्त है कि वह रचनाकार की रचना प्रक्रिया के प्रति आक्रामक न होकर सम्यक दृष्टि से कृति की पड़ताल करे।

रचनात्मक लेखन के अतिरिक्त मार्कण्डेय अपनी संपादन क्षमता के लिए भी याद किए जाएंगे। मार्कण्डेय का साहित्यवि‍वेक पत्रिका के लिए प्रकाशनार्थ आई हुई रचनाओं के चयन में स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने सितंबर, 1969 में त्रैमासिक ‘कथा’ पत्रिका की शुरुआत की थी। फिर यह पत्रिका अनियतकालीन हो गई। मार्कण्डेय के संपादन में पत्रिका के कुल अंक 14 अंक प्रकाशित हुए। अंतिम अंक अक्टूबर, 2009 में आया जब वह जानलेवा बीमारी से जूझ रहे थे। यह उनकी जिजीविषा का अनूठा उदाहरण है। ‘कथा’ के इन अंकों में समकालीन लेखन का साक्ष्य मिलता है। मार्कण्डेय का लक्ष्य हमेशा नई पीढ़ी के कृतित्व को आगे लाने,  महत्वपूर्ण पुस्तकों की गंभीर समीक्षा द्वारा उनके महत्व को रेखांकित करने और ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर सार्थक विमर्श करने का रहा । यही कारण है कि लंबे अंतराल के साथ प्रकाशित होने के बावजूद ‘कथा’ पत्रिका की पाठकों को सदैव प्रतीक्षा रहती थी।

दुर्गा प्रसाद सिंह, वीरभारत तलवार और मार्कण्‍डेय

मार्कण्डेय के कुशल संपादन में ‘माया’ पत्रिका के भी दो विशेषांक प्रकाशित हुए थे। श्री क्षितिन्‍द्र मोहन मित्र द्वारा संस्थापित ‘माया’ कहानी विधा की पत्रिका थी जो हिंदी तथा अन्य भाषाओं से अनूदित रोचक और पठनीय कहानियों के लिए कई दशकों से विख्यात थी। श्री क्षि‍ति‍न्‍द्र मोहन मित्र के निधन के पश्‍चात साठ के दशक में उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री ओलक मित्र ने प्रकाशन का काम संभाल लिया था। आलोक बाबू व्यापक दृष्टि वाले सुसंस्कृत,  महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे। वह ‘माया’ को एक प्रतिष्ठित सामाजिक, साहित्यि‍क पत्रिका का रूप देना चाहते थे। उन्हीं दिनों श्री श्रीकृष्णदास भी ‘अमृत पत्रिका’ बंद हो जाने के कारण साहित्य सलाहकार के पद पर मित्र प्रकाशन में आ चुके थे।

आलोक मित्र ने प्रयाग कुम्‍भ मेले के अवसर पर ‘माया’ का एक महत्वाकांक्षी विशेषांक संपादित करने का प्रस्ताव मार्कण्डेय के सम्मुख रखा। कुम्‍भ विशेषांक की परिकल्पना में निश्‍चय ही श्रीकृष्णदास जी का भी योगदान रहा होगा। यह सोचा गया कि पूर्ण कुम्‍भ के अवसर पर करोड़ों लोग इलाहाबाद आते हैं इसलिए इस मौके पर ‘माया’ का एक ऐसा विशेषांक प्रकाशित किया जाए जो भारतीय संस्कृति, कला, साहित्य और राजनीति को समाहित करते हुए एक स्मरणीय अंक बन जाए। मार्कण्डेय इस महत्वकांक्षी विशेषांक की तैयारी में जुट गए और लेखकों, राजनीतिज्ञों, चिंतकों, धर्माचार्यों से पत्र व्यवहार शुरू हो गया। कुम्‍भ का समय निकट आता जा रहा है लेकिन नए-नए विषय सूझ रहे हैं और पत्राचार हो रहा है। कुम्‍भ बीत गया, अंक प्रकाशित नहीं हो पाया। अब अंक तैयार हुआ तो पूर्वानुमान की अपेक्षा कम प्रतियां छापी गईं, लेकिन ‘माया’ का यह अभूतपूर्व अंक खूब चर्चित हुआ।

‘माया’ पत्रिका का एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषांक ‘भारत-1965’ मार्कण्डेय के कुशल संपादन में प्रकाशित हुआ था। इस विशेषांक का प्रमुख आकर्षण धर्म पर एक परिचर्चा भी जिसमें सुमित्रानंदन पंत, गुरु गोलवलकर, बाबू संपूर्णानंद, डा. डीडी कौशाम्‍बी, कामरेड बी.टी. रणदिवे, फादर धीरानंद भट्ट और श्री अब्दुल रहमान ने धर्मसंबंधी अपने विचार प्रस्तुत किए थे। अन्य महत्वपूर्ण सामग्री के साथ इस विशेषांक को पठनीय बनाने में कृष्ण बलदेव वैद, अमरकांत, लक्ष्मीनारायण लाल, शेखर जोशी और रवीन्‍द्र कालिया की कहानियों ने भी अपना योगदान दिया था।

हमारे मित्र स्वर्गीय सत्य प्रकाश मिश्र जब-तब विनोद में कहा करते थे कि गुरु (मार्कण्डेय जी) ने गुरुजी (गोलवलकर जी) का पत्र स्वर्ण मंजूषा में किसी बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा है, कभी लाखों में उसकी बोली लगेगी। न जाने गुरुजी की हस्तलिपि में लिखा वह पत्र अब कहां है।

मार्कण्डेय के संपादन में ‘कलम’ का एक अंक चित्रकार अशोक भौमिक की सज्जा के साथ अपनी अंतर्वस्तु के लिए चर्चित रहा था। तब दूधनाथ सिंह के नाटक ‘यमगाथा’ का आंशिक प्रकाशन इसी पत्रिका में पहले-पहल हुआ था। इस अंक में जहां एक ओर युवा कवि देवीप्रसाद मिश्र को उनकी कहानी ‘रात’ द्वारा कुशल कथाकार के रूप में परिचित कराया गया था, वहीं दो स्थापित कथाकारों को कविरूप में प्रस्तुत किया गया था।

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व में आपातकाल की घोषणा के पश्‍चात प्रगतिशील लेखक संघ की भूमिका को लेकर इसके सदस्यों में मतभेद हो गया था और सन् 1982 में जनवादी लेखक संघ की स्थापना की गई थी। मार्कण्डेय जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में इलाहाबाद से भैरवप्रसाद गुप्त के अलावा एक प्रमुख सदस्य थे और इस नए संगठन की इलाहाबाद इकाई को जीवंत बनाए रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि जलेस की नियमित बैठकों में देवीप्रसाद मिश्र, बोधिसत्व, हरीशचंद्र पाण्‍डे, अनिल कुमार सिंह, रविकांत, अंशुल त्रिपाठी, हीरालाल, विवेक निराला और सन्‍तोष कुमार चतुर्वेदी इत्यादि युवा कवियों ने अपनी प्रतिभा का परि‍चय दिया और देखते-देखते राष्ट्रीय स्तर पर इनकी पहचान बनी। इन सभी रचनाकारों को आगे लाने में नि:संदेह ‘कथा’ पत्रिका की भी भूमिका रही। प्रतिष्ठित कवि‍ हरीशचंद्र पाण्‍डे को आग्रहपूर्वक कथा विधा की ओर प्रवृत्‍त करने मे मार्कण्डेय और ‘कथा’ पत्रिका का ही विशेष योगदान है।

इलाहाबाद के अन्य कई उभरते हुए रचनाकारों को ‘कथा’ के माध्यम से आगे लाने में उन्हें अपार संतोष मिलता था। और कालांतर में अपने सहायक सन्‍तोष चतुर्वेदी को स्थानीय युवा रचनाकारों की रचनाओं पर विशेष ध्यान देने का उनका आग्रह रहता था। ‘हम ही उन्हें आगे नहीं लाएंगे तो कौन लाएगा?’ यह उनका मोटो था।

मार्कण्डेय और कमलेश्‍वर की कविवर सुमित्रानन्‍दन पंत जी से निकटता और पंत जी का आकाशवाणी के हिंदी सलाहकार के पद पर होना ही शायद संयोग रहा होगा कि ये दोनों ही मित्र स्क्रिप्ट राइटर के रूप में आकाशवाणी के इलाहाबाद केंद्र से जुड़ गए। जहां कमलेश्‍वर इस प्रभावशाली माध्यम के महत्व को पहचान कर उसके हर पक्ष की बारीकी सीखते हुए इस क्षेत्र में अपनी जगह बनाते गए, वहीं मार्कण्‍डेय अपने मनमौजी स्वभाव के कारण बहुत दिनों तक रेडियो की नौकरी से जुड़े नहीं रह सके। पहली बार ही लखनऊ स्थानांतरण के साथ उन्होंने अपना त्याग-पत्र प्रस्तुत कर दिया और इलाहाबाद आकर अपने तख्त पर आसीन हो गए। ‘कौन जाए जौ़क पर दि‍ल्‍ली की गलियां छोड़कर…।’ कमलेश्‍वर आकाशवाणी से दूरदर्शन में पहुंचे और अंतत: एडिशनल डायरेक्टर जनरल के पद पर उनकी नियुक्ति हुई। किसी की चाकरी मार्कण्डेय के स्वभाव में नहीं थी अन्यथा अवसरों और योग्यता का अभाव नहीं था। दूसरे,  इलाहाबाद का मोह उन्हें कहीं अन्यत्र जाने से रोक देता होगा। स्वतंत्र लेखन के लिए इलाहाबाद बहुत उपयुक्त शहर नहीं है। जो लोग यहां रह कर संघर्ष कर रहे थे उनके लिए मार्कण्डेय का रहन-सहन एक रहस्य बना रहा। लेकिन स्थितियां इतनी सहज नहीं थीं। भरी-पूरी गृहस्थी, बच्चों की अच्छे स्कूलों-कालेजों में पढ़ाई का खर्च, मेहमानबाजी, लोकव्यवहार का स्तरीय निर्वहन करने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ता था। उन दिनों कई लेखक बंधुओं ने पुस्तक प्रकाशन का कुटीर उद्योग चालू कर दिया था। साहित्यिक रुचि के बैंक प्रबंधकों का सहयोग इस उद्योग में बहुत सहायक होता था। लेकिन वार्षिक या अर्द्धवार्षि‍क खाताबंदी पर ओवरड्राफ्ट की रकम लौटाने की जद्दोजहद और फिर दो तीन दिन बाद नए ओवरड्राफ्ट से गाड़ी चालू रखी जाती थी।

मार्कण्डेय संबंधों को निभाना जानते थे। किसी को नौकरी दिलाने, किसी की नौकरी बचाने, किसी के बच्चों का नगर के प्रतिष्ठित स्कूलों में प्रवेश कराने, किसी नए लेखक की पुस्तक प्रकाशित कराने, किसी को व्यवसाय में सहायता करने के लिए वह किसी हद तक जा सकते थे। लेकिन अपनी राजनीतिक पक्षधरता के प्रति पूरी तरह सचेत रहने वाले मार्कण्डेय उस बार पुराने संबंधों के निर्वाह की मजबूरी में अनायास ही धर्मसंकट में पड़ गए थे। लोकसभा के चुनाव में डा. मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद से भाजपा के प्रतिनिधि के रूप में खड़े थे। उनके समर्थन में स्थानीय अखबार में कुछ गणमान्य लोगों की एक अपील प्रकाशित हुई थी। लोगों को उस अपील में मुख्यधारा के एक लेखक और एक प्रसिद्ध लेखिका का नाम पढ़कर आश्‍चर्य हुआ। लेखिका ने तो यह कहकर छुट्टी पा ली कि उन्होंने मार्कण्डेय जी का नाम देखकर हस्ताक्षर कर दिए थे, लेकिन मार्कण्डेय विद्यार्थी जीवन में छात्रावास में अपने सहवासी के प्रति अपनी सद्भावना को कैसे लोगों को समझाते।

मार्कण्डेय के चुंबकीय व्यक्त्तिव में आकर्षक देहवृष्टि के साथ उनकी अद्भुत किस्सागोई भी शामिल थी। किसी घटना अथवा किसी प्रसंग की पुनर्प्रस्तुति वह इस मोहक अंदाज में करते कि कई बार सुना हुआ वह आख्यान फिर से एकदम ताजा लगने लगता और पहली बार सुनने वाला उनकी किस्सागोई का कायल ही हो जाता। कुछ प्रसंग ऐसे थे जिन्हें मार्कण्डेय रस लेकर सुनाते।

पचास और साठ के दशक में जब भी डा. राममनोहर लोहिया इलाहाबाद नगर में आते तो लेखकों, बुद्धिजीवियों के साथ उनकी बैठकी अनिवार्य होती थी। उस बार हिंदुस्तानी अकादमी में एक बड़ी गोष्ठी आयोजित की गई थी। ‘परिमल’ से जुड़े कवि, लेखकों तो वहां उपस्थित थे ही, उनके अलावा नगर के अन्य कई लेखक डा. लोहिया को सुनने के लिए वहां पहुंचे थे। मार्कण्डेय सुनाते थे-

‘….जैसी समाजवादियों की आदत होती है, जब तक कम्युनिस्‍ट को एक-आध लंगड़ी नहीं लगा लेंगे उन्हें चैन नहीं पड़ता। अपने भाषण के दौरान डा. लोहिया ने रहस्योद्घाटन किया कि सोवियत संघ भारतीय लेखकों की पुस्तकों का अपनी भाषाओं में प्रकाशन करने के बहाने उन्हें अपने दूतावास के माध्यम से बहुत रूबल बांट रहा है। भाषण समाप्त होने पर मैंने अपने स्थान से उठकर कहा- डा. साहब, मेरा एक निवेदन है। अभी आपने बतलाया कि सोवियत संघ सरकार भारतीय लेखकों को पैसा बांट रही है। मेरा भी एक छोटा-सा कहानी संग्रह रूसी भाषा में प्रकाशित हुआ है। मुझे बताया गया है कि सोवियत यूनियन वाले कापीराइट के जेनेवा कन्वेन्‍शन को नहीं मानते इसलिए विदेशी लेखकों को रायल्टी नहीं देते। बड़ी मेहरबानी होगी यदि आप मुझे भी मेरी पुस्तक की रॉयल्टी दिखा दें। डा. लोहिया ने तत्काल अपने पीए को आदेश किया कि वह मुझसे पुस्तक के प्रकाशन के संबंध में पूरा विवरण ले लें और सचमुच ही महीने भर बाद दस हजार रुपये का चेक रूसी दूतावास से आ पहुंचा।’

मुझमें वह क्षमता नहीं कि जिस चित्रात्मकता के साथ मार्कण्डेय जी ने उस गोष्ठी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने, एक दुबले-पतले खूबसूरत नौजवान द्वारा डा. लोहिया को चुनौती देने पर उपस्थिति श्रोताओं के आश्चर्यचकित होने और कड़की के दौर में दस हजार रुपये की राशि पाने की प्रसन्नता का वर्णन किया था, उसे लिपिबद्ध कर सकूं। इसका आनंद तो उनके मुंह से सुनने में ही था।

मार्कण्डेय हृदयरोग के उपचार के लिए दिल्ली गए हैं। एम्स में भर्ती हैं। पार्टी से जुड़े लेखक मित्रों, शुभचिंतकों ने कामरेड हरकिशन सिंह सुरजित के मार्फत तत्कालीन केंद्रीय रक्षामंत्री श्री मुलायम सिंह यादव की संस्तुति पर उनके इलाज की राजकीय कोष से व्यवस्था की जुगत बैठाई। दिल्ली से इलाज कराकर लौटे मार्कण्डेय जी घर पर मिजाजपुर्सी के लिए पहुंचे मित्रों को बताते हैं- ‘कामरेड सुरजीत का कहना था कि श्री अमरसिंह तत्काल एम्स पहुंचे। हमसे दुआ-सलाम हुई, हमारा हालचाल पूछा। फिर तमककर बोले- नहीं, मार्कण्डेय जी यहां नहीं रहेंगे। इनको अभी अपोलो भेजिए। डाक्टरों में अफरातफरी मच गई। तत्काल एंबुलेंस बुलाई गई और हम अपोलो पहुंचाए गए। अब वहां मांग हुए कि तीन लाख रुपये अभी जमा कराइए। हम सोंचे कि अच्छी आफत आई लेकिन बाबू अमरसिंह ने अपना ब्रीफकेस मंगाया और ये ल्‍लो। हजार-हजार की गड्डी-पे-गड्डी निकाल के अपने पीए को थमा दी। फिर आने का वादा कर विदा हुए।’

मार्कण्डेय जांच के लिए लखनऊ पीजीआई मे भर्ती कराए गए थे। उन दिनों स्व. विष्णुकांत शास्त्री जी महामहिम राज्यपाल, उत्तर प्रदेश के रूप में राजभवन की शोभा बढ़ा रहे थे। लखनऊ से लौटकर आए तो मिजाजपुर्सी के लिए घर पर पहुंचे मित्रों को वह संपूर्ण विवरण देना नहीं भूलते थे कि किस प्रकार राजभवन से राज्यपाल का मार्कण्डेय जी को देखने आने का समाचार पीजीआई के कार्यालय में पहुंचा तो उनके वार्ड में कैसी अफरातफरी मच गई। एक मित्र पुलिस उच्चाधिकारी ने उनके वार्ड के बाहर एक इंस्पेक्टर की ड्यूटी लगा दी थी। इस दरोगा की उपस्थिति के कारण लोग इस मरीज के बारे में क्या-क्या कयास लगाते थे इत्यादि-इत्यादि…। इन वर्णनों में उनकी मंशा किसी प्रकार की आत्मश्‍लाघा की नहीं,  वरन समाज में भिन्न परिस्थितियों में लोगों के व्यवहार को दर्शाने की होती थी- भले ही निमित्त वह स्वयं रहे हों।

बड़ी बेटी स्‍वस्ति के साथ मार्कण्‍डेय

अमरकांत जी ने कहीं लिख है कि साहित्यकारों की दोस्ती चिरस्थायी नहीं रहती। लेखन के प्रारंभिक दौर में मार्कण्डेय-कमलेश्वर-दुष्यंत की तिकड़ी अटूट समझी जाती थी। लेकिन ‘नई कहानियां’ के ‘मेरा हमदम-मेरा दोस्त’ श्रृंखला में कमलेश्वर राजेंद्र यादव और मोहन राकेश के हमदम बन गए। मार्कण्डेय जी के निकटस्थ लेखकों में कभी शैलेश मटियानी, दूधनाथ सिंह, सत्यप्रकाश मिश्र, लक्ष्मीकांत वर्मा और रामकमलराय भी रहे। भैरवप्रसाद गुप्त उन्हें बहुत मान देते थे। प्रकाशकों में उनके अंतरंग परिमल प्रकाशन के शिवकुमार सहाय भी रहे और रमेशचंद्र ग्रोवर के लिए तो श्री नरेश मेहता के बाद मार्कण्डेय ही मृत्युपर्यंत मित्र, मार्गदर्शक और चिंतक भी बने रहे। अमेठी के श्री जगदीश पीयूष की मार्कण्डेय से निकटता के कारण शैलेश मटियानी और सहाय जी का साथ प्राय: छूट ही गया। शैलेश अकेले ही ‘धर्मयुग’ के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ते रहे। अंतरंगता के बाद अलगाव की खरोंचें भी यदा-कदा मार्कण्डेय जी को अंदर से तोड़ती रहीं। यद्यपि वह प्रकटत: किसी को इसका अभास नहीं होने देते थे।

अपने ‘नया साहित्य’ प्रकाशन से निजी पुस्तकों के अतिरिक्त कई समकालीन लेखकों की पहली पुस्तक के प्रकाशन का श्रेय मार्कण्डेय को जाता है। मेरा पहला कहानी संग्रह ‘कोसी का घटवार’ सन् 1958 में ‘नया साहित्य प्रकाशन’ से ही प्रकाशित हुआ था। इसी क्रम में अमरकांत का संग्रह ‘जिंदगी और जोंक’, ठाकुर प्रसाद सिंह का काव्य संग्रह ‘बंशी और मादल’ तथा केदारनाथ सिंह की एक पुस्तक भी इसी प्रकाशन से आई थी। अपनी पहली पुस्तक को मित्रों, परिचितों और संबंधियों के बीच उदारतापूर्वक बांटने का जो सुख मुझे अपने पहले प्रकाशक से मिला, वैसा फिर कभी संभव नहीं हुआ। मात्र तीन रुपये मूल्य की 116 पृष्ठों की उस पुस्तक की कुल रॉयल्टी से अधिक की पुस्तकें मैंने ले ली होंगी, लेकिन मार्कण्डेय जी ने कभी ‘अभी बाइण्‍डर के यहां से नहीं आईं’ नहीं कहा। अन्य लेखकों का अनुभव जैसा भी रहा हो मेरे लिए अपनी पहली पुस्तक के प्रकाशन का अनुभव बहुत ही सुखद रहा था।

मार्कण्डेय के रहते दैनन्दिन जीवन की समस्याएं सहज ही हल हो जाती थीं। साठ के दशक में आज की तरह फोन की सुविधा सर्वसुलभ नहीं थी। हमारे पड़ोसियों में केवल गृहस्वामी टण्‍डन जी के घर पर ही फोन की सुविधा उपलब्ध थी। मार्कण्डेय के घर पर दो-दो फोन थे, एक दासबाबू का और दूसरा ‘नया साहित्य प्रकाशन’ का। मार्कण्डेय कभी कोई सूचना देने के लिए टण्‍डन जी के फोन का सहारा लेते तो हमें बहुत संकोच हो जाता क्योंकि बहिन जी (श्रीमती टण्‍डन) को नौकर  की अनुपस्‍थि‍ति‍ में सूचना देने के लि‍ए लम्‍बा चक्‍कर लगा कर घर के दूसरे हिस्से में आना पड़ता था। बीच की दीवार के उस ओर से पुकार कर सूचित करने का कायदा नहीं था। मैं अपना संकोच मार्कण्डेय जी से व्यक्त थी कर चुका था, लेकिन जब-तब उनका फोन आ ही जाता। 10 जनवरी, 1966 की सर्द रात में जब हम सोने की तैयारी कर रहे थे तो दरवाजे की घंटी बजी। टण्‍डन जी के मंझले पुत्र कंबल ओढ़ कर सूचना देने आए थे कि कोई फोन आया है कि आपके मित्र शास्‍त्री जी दिवंगत हो गए। शायद टण्‍डन जी ने उनसे कहा हो कि जोशी जी से कहना उनके मित्र का फोन आया है कि कोई शास्त्री जी का निधन हो गया है। संयोग से हमारी मित्र मंडली में एक शास्त्री जी भी थे। मैं दौड़ा-दौड़ा टण्‍डन जी के कमरे में पहुंचा, वह भी चिंतित थे। मार्कण्डेय लाइन पर मिल गए, ‘भई, अभी-अभी लीडर प्रेस से महेंद्र जी का फोन आया है कि ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया है। मैंने सोचा तुम बिना अखबार देखे ही वर्कशाप चले जाओगे तो लौटना पड़ेगा, इसलिए फोन किया था।’ समाचार स्तब्ध कर देने वाला था। उनके अनुज पत्रकार महेंद्र सिंह से टेलीप्रिण्‍टर पर आया समाचार सुन कर उस घर में भी सबकी नींद उड़ गई थी।

मैंने टण्‍डन जी को वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो उन्होंने तत्काल अपने बालसखा पड़ोसी श्री बैजनाथ कपूर को, जो नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे, फोन लगाया और उन्हें नींद से जगाकर इस महत्वपूर्ण दुखद घटना की जानकारी दी।

यह संयोग की बात थी कि कपूरी जी और टण्‍डन जी दोनों ही वृद्धावस्था के कारण श्रवणशक्ति के मामले में कुछ कमजोर हो चले थे इसलिए ऊंचा सुनते और ऊंचा ही बोलते थे। फिर कई दिन तक बीच की दीवार के पार से टण्‍डन जी की किसी आगंतुक से चल रही बातचीत के टुकड़े हमारे कानों तक पहुंचते रहे थे- ‘….जोशी जी के पत्रकार मित्र मार्कण्डेय जी का रात को दस बजे फोन आया तो हमें खबर लगी। हमने तत्काल बैजनाथ जी को फोन मि‍लाया- शहर कांग्रेस कमेटी के अध्‍यक्ष हैं न– सो गए थे। हमने कहा, ‘बैजू भइया, हम बचऊ बोल रहे हैं- अरे बचऊ टण्‍डन। कुछ सुने हो ? लालबहादुर शास्त्री जी नहीं रहे… तब सारे कांग्रेसियन को खबर भई..।’

इसके बाद तो फिर टण्‍डन जी के घर पर मार्कण्डेय जी का फोन आने से हमें किसी प्रकार का संकोच नहीं रहता था। उस घटना के बाद बहिन जी प्रेम से कहतीं, ‘अरे भई आइए। मार्कण्डेय जी का फोन आया है।’

मार्कण्डेय जी के साथ की गई कोलकाता, दिल्ली, गोरखपुर और भोपाल की लंबी यात्राओं की स्मृतियां आज भी मन को गुदगुदा देती हैं। जलेस की मीटिंग के बाद हम लोग दिल्ली से लौट रहे थे। स्लीपर कोच में हम लोगों का आरक्षण था। कानपुर तक डा. शिवकुमार मिश्र जी का भी साथ था। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से गाड़ी छूटने से कुछ ही देर पहले हमारे डिब्बे में सरोज भाभी के संबंधी विनीत ने प्रवेश दिया। वह परेशान दिखाई दे रहे थे। मार्कण्डेय जी ने उनकी परेशानी का कारण पूछा तो उन्होंने बतलाया कि उनकी पत्नी भी साथ हैं, लेकिन रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हुआ। घर की बात थी, मार्कण्डेय जी ने उन्हें आश्‍वस्‍त किया और पत्नी को लिवा लाने का आदेश दिया। उनके लिए निचली बर्थ छोड़कर हम दोनों ऊपर की बर्थ पर चले गए। साइड की ऊपरी बर्थ पर शिवकुमार जी आसीन थे। रेल चली तो बातों का सिलसिला शुरू हुआ। कहां-कहां की बातें। कानपुर की, सागर की, दिल्ली की…। मुख्य वक्ता बुलंद आवाज वाले डा. शिवकुमार मिश्र। उस असुविधाजनक स्थिति में सोने का प्रश्‍न ही नहीं था। बतकही का ही विकल्प था जो शिवकुमार जी के स्मृतिकोष से अटूट चल रहा था। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, रसाल जी,  डा. शि‍वमंगल सिंह सुमन,  डा. नामवर सिंह, अंचल जी, विजय बहादुर सिंह से जुड़े प्रसंग, विश्वविद्यालयों में हिंदी विभागों की राजनीति सभी कुछ चर्चा के केंद्र में आ गए थे। रेल अपनी गति से बढ़ रही थी। आधी रात बीत गई, बातों का सिलसिला चलता रहा। टुण्‍डला निकल गया,  शायद इटावा के निकट पहुंचे थे कि एक अरसिक सहयात्री ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया-

‘श्रीमान जी, आप लोगों की बातों से अंदाज लग रहा है कि‍ आप आलिम लोग हैं,  अब थोड़ा सोने दें तो मेहरबानी होगी।’

इसके बाद जो सन्नाटा खिंचा तो कानपुर स्टेशन पर अपना सामान लेकर विदा लेते हुए शि‍वकुमार मिश्र जी की आवाज से ही नींद टूट पाई और उनके द्वारा खाली की गई बर्थ पर पैर फैलाने की सुविधा मिली।

एक जमाने में आकाशवाणी का गोरखपुर केंद्र प्रतिवर्ष मार्च माह में दो दिन का वृहद ‘हिंद-उर्दू कथा समारोह’ आयोजित करता था। प्रदेशभर के चुनिंदा हिंदी-उर्दू कथाकार और आलोचक वहां निमंत्रित किए जाते। कहानियां पढ़ी जातीं, उन कहानियों पर आलेख पढ़े जाते। बहुत खुशनुमा माहौल में समारोह संपन्न होता। इसके कल्पनाशील संयोजक कार्यक्रम अधि‍शासी श्री तारीक छतारी हुआ करते थे जो बाद में आकाशवाणी से त्यागपत्र देकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चले गए थे। उस बार हमारे इलाहाबादी दल में मार्कण्डेय, ममता काविया, शैलेश मटियानी, नीलकांत, डा. अकिल रिजवी, डा. फातमी और असरार गांधी शामिल थे। अपनी जैवि‍क व्यस्तताओं के कारण कार्यक्रम की समाप्ति के बाद हमने गोरखपुर से इलाहाबाद जाने वाली रात की रोडवेज बस से लौटने का प्रोग्राम बनाया। यह नॉनस्टाप बस रात दस बजे गोरखपुर से रवाना होकर भोर में इलाहाबाद पहुंचा देने का अच्छा साधन साबित हुआ। मार्कण्डेय जी, मैं और ममता जी बस की अगली सीटों पर व्यवस्थि‍त हो गए। हवा में हल्की ठण्‍डक थी। अन्य सहयात्री बहुत कम थे। एकदम आखिरी सीट पर एक किनारे लोई ओढ़कर हाथ में पाथेय लिए अनुज ने अपना डेरा जमा लिया था। रात के अंधकार में बस दौड़ी चली जा रही थी। हम लोग ऊंघ रहे थे। बीच-बीच में पिछली सीट से उठता हुआ एक स्वर सुनाई दे जाता-

तनि धीमें चला हो।

सरवा भागा चला जात हौ।

तनि रोका हो, हमार पाजामुंवा भीग जाई

जा सरवा, न रोकी, नॉन स्टॉप हैई।

नॉन स्टॉप।

नॉन स्टॉप।।

यह स्वगत भाषण कब तक चलता रहा, याद नहीं। भोर में हम लोग इलाहाबाद पहुंचकर अपने-अपने ठिकानों की ओर चल दिए। मार्कण्डेय को चिंता थी कि ममता जी अकेली कैसी जाएंगी। उन्होंने आश्‍वस्‍त किया, दिन खुल गया है, कोई चिंता की बात नहीं।

मार्कण्डेय जी के पास भविष्य के लिए कई योजनाएं थीं। वह स्वस्‍थ रहते तो निश्‍चय ही कुछ योजनाएं फलित हो जातीं। इन योजनाओं में प्रमुख अपने उपन्यासों ‘अग्‍नि‍बीज’ का दूसरा खंड लिखने,  मुंबई कम्यून से किसी जमाने में प्रकाशित ‘नया साहित्य’ के सभी अंकों का और दिसंबर, 1957 में इलाहाबाद में संपन्न हुए अभूतपूर्व लेखक सम्मेलन में पढ़े हुए आालेखों का संग्रह प्रकाशित करने की उनकी इच्छा थी। मार्कण्डेय 1957 में संपन्न लेखक सम्मेलन में आलेख समिति के प्रभारी थे। ‘नया साहित्य’ के अंकों में भी बहुत महत्वपूर्ण सामग्री बिखरी पड़ी है जो प्रगतिशील आंदोलन पर प्रकाश डालती है। यह सारी अप्राप्‍य सामग्री अब जहां भी हो, उसके संरक्षण, प्रकाशन की आवश्यकता बनी रहेगी।

मौत के लिए कोई-न-कोई बहाना बन ही जाता है। किसी ने कहा, तम्बाकू खाने की आदत थी जिस कारण मार्कण्डेय जी को गले का कैंसर हो गया। सच ही, पान-तम्बाकू का शौक उन्हें वर्षों से था। अपने कमरे में एक छोटी टोकरी में पान-सुपारी-तम्बाकू का पूरा सरंजाम रखते थे और चाय-पानी के बाद अपने हाथ से बहुत सलीके से छोटे-छोटे पत्तों में चूना-कत्था लगा कर पान पेश करते। शौकिया तौर पर शुरू करने के बाद पान-तम्बाकू-सिगरेट हम सभी मित्रों की कमजोरी बन गए थे। अमरकांत जी भी पत्रकार जीवन की शुरुआत में खूब सिगरेट फूंकते थे, लेकिन हृदयरोग हो जाने पर उनकी यह आदत छूट गई थी। मैंने कई वर्ष पूर्व एक आत्मीय नवयुवक को मुंह में कैंसर के रोगी के रूप में जाते देखकर पान-तम्बाकू से तौबा कर ली थी। लेकिन मार्कण्डेय जी अपना शौक नहीं छोड़ पाए। नया डैंचर लग जाने के बाद बिना सुपारी के जर्दायुक्त पान खाते। पान न मिलने पर खैनी से भी काम चल जाता। जलेस की गोष्ठियां बारी-बारी से हम लोगों के घरों में हो जाती थीं। एक बार गोष्ठी मेरे घर पर आयोजित थी। मैं जलपान और सदस्यों के बैठने की व्यवस्था में व्यस्त था। सोचा,  युवा साथी आ जाएंगे तो किसी को भेजकर चौराहे से पान-सिगरेट मंगा लूंगा। लेकिन उस दिन सभी सदस्य साथ-साथ ही आए और गोष्ठी की कार्यवाही शुरू हो गई। रचना पाठ के बाद चाय-नाश्ता हुआ तो मार्कण्डेय जी को पान को तलब लगी। पूछा,  पान-वान नहीं मंगाए हो? सिगरेट भी नहीं है? फिर उठकर ताक पर रखे उस पोर्सलीन के रूसी खिलौने के खोखल में झांक आए जिसमें पुराने दिनों में वक्त-जरूरत के लिए खैनी तैयार कर रख देता था और वह भी कई बार उसका आनंद ले चुके थे। अंतत: निराश होकर उन्होंने घोषणा की: ‘शेखर जोशी, तम्बाकू-सिगरेट का सेवन न कर तुम अमर नहीं हो जाओगे।’’

मैं जब-जब पोर्सलीन के उस रूसी खिलौने को देखता हूं तो एक तलबगार नशेड़ी का खीझ भरा यह उपदेश मुझे बरबस याद आ जाता है।

ज.ले. संघ की मीटिंग के लिए मार्कण्डेय, दूधनाथ सिंह और मैं साथ-साथ दिल्ली गए थे। उस बार हम लोग राज्यसभा सांसद का. सरला माहेश्वरी के नार्थ एवेन्यू वाले फ्लैट में टिके थे। श्री अरुण माहेश्वरी और सरला जी को उन्हीं दिनों किसी कारण कोलकाता जाना पड़ गया था। चाय-पान की व्यवस्था के लिए एक सहायक वहां मौजूद था। सुबह की पहली चाय के बाद मित्रों को पान-सिगरेट की तलब लगी तो हम लोग बाहार निकले। उस संवेदनशील और पॉश इलाके में सड़क किनारे दूर-दूर तक कोई दुकान या गुमटी नहीं थी। अचानक फुटपाथ पर एक पुरबिया खेतिहर किस्म का आदमी जो शायद शहर में माली का काम करता हो, कंधे पर गमछा रखे हाथ में खैनी मलता हुआ जाता दिखाई दिया।

‘ए भइया ! तनिक रुका।’ के आग्रह के साथ उस राहगीर को रोका गया। निकट के किसी महत्वपूर्ण स्थान की भौगोलिक स्थिति पूछी गई। गांव-गराम के बारे में, रोजी-रोजगार के बारे में पूछते हुए सूर्ती जैसे निरापद शौक के लिए उसकी प्रशंसा की गई, सिगरेट-बीड़ी से होने वाले नुकसान के बारे में अतिरंजित प्रकाश डाला गया और अंतत: उसका आतिथ्य स्वीकार कर उसे विदा किया गया।

मौत एक दिन निश्‍चि‍त है। उसे कोई रोक नहीं सकता। लेकिन सोचता हूं, काश! मार्कण्डेय जी ने तम्बाकू की यह लत न पाली होती तो शायद बीमारी के दौरान जो यंत्रणा उन्हें भोगनी पड़ी उससे मुक्ति मिलती।

मार्कण्डेय के मनोजगत में एक फादर-फिगर अवस्थित है जो अपने गांव-जवार के लोगों के हितू, सुख-दु:ख के साथी,  उनके रहनुमा की भूमिका में रहते हैं। कभी-कभी यह फादर-फिगर यथास्थिति के पोषक भी लगते हैं। अपनी कहानी ‘बीच के लोग’ में मार्कण्डेय इस फादर-फिगर से मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं। उनकी प्रारंभिक कहानी ‘गुलरा के बाबा’, जिसने उन्हें पर्याप्त ख्याति दिलाई थी, ऐसे ही बाबा के जीवन से अनुप्रेरित होकर लि‍खी गई थी।

‘गुलरा के बाबा’ पूरे पचहथे जवान,  भींट ऐसी छाती और हाथी की सूंड जैसे हाथ, बड़ी-बड़ी तेज आंखें, लोग हनुमान कहते थे बाबा को, हनुमान ! बड़ी गंभीर और बुलंद आवाज थी उनकी। अनजान आदमी तो एक बार डर जाए और चिरई-चुरमुन भी पेड़ों से उड़ पड़ें। लेकिन अब वह शरीर शिथिल पड़ गया था, चमड़े, झूल गए थे और उन पर बेशुमार झुर्रियां पड़ गई थीं।

इन्हीं बाबा के बाग में चैतू अहीर घुस कर सरपत काट रहा था। ‘चैतू अहीर, करीब चौबीस-पच्‍चीस का, काला मजीठ शरीर जैसे कोल्हू का जाट। इसी ने तो बनारस के मशहूर पहलवान झग्गा को पटक दिया था। केवल दो ही मिनट में।’

बाबा ने चैतू को टोका और कल से सरपत न काटने का आदेश दिया तो उसने ढिठाई से उत्तर दिया, ‘ऐसे ही काटूंगा।’

बाबा उस मनबढ़ जवान की मानसिकता समझ रहे थे। उन्होंने उसे चुनौती दी थी, ‘मैं तुम्हारी बातें समझ रहा हूं। अपने दो-एक संगी-साथियों और बूढ़-पुरनियों को भी बुलाए आना- यहीं, यदि तुम मेरा गट्टा टेढ़ा कर दोगे, तो मैं कभी जबान नहीं खोलूंगा और यदि नहीं तो तुम कल से यहां दिखाई न पडऩा।’ दूसरे दिन जोर आजमाइश हुई। चैतू ने दांत पीस-पीस कर जोर लगाया, माथे पर पसीना हो आया, पर बाबा का हाथ टस से मस न हुआ। अब बाबा की बारी थी। चैतू ने हाथ फैलाया और बाबा ने बच्चे की तरह उसे मरोड़ दिया। चैतू चिचिया उठा। बाबा ने छोड़ दिया।

चैतू जब हार गया तो बाबा के छोटे भाई देवीसिंह ने, जो बड़े लठैत थे, अपना गुस्सा जताते हुए कहा, ‘कहो तो दे दूं दो बांस साले की पीठ पर।’ लेकिन बाबा ने देवीसिंह को डांट दिया। संयोग की बात, इसी दौरान अखाड़े में कहीं चैतू की टांग टूट गई। यह खबर देवीसिंह लाए थे, ‘अरे गरूर का यही नतीजा होता है। आज अखाड़े में टूटी, कल हम लोगों की लाठी से टूटती, सरपत काटने आया था।’

खबर सुनकर बाबा ने परसी थाली छोड़ दी। कितनी दूर-दूर से लोग उनके यहां हड्डियां बैठवाने आते हैं, वे यह काम भी जानते हैं। बाबा दुकान से आमाहल्दी, चोट मुसब्बर, सेतखड़ी की पुडिय़ा बंधवा कर चांदनी रात में चैतू के घर की ओर दौड़ पड़ते हैं। सोच रहे हैं- कितना अच्छा लड़ैत है। उस दिन कितना जोर लगाता था। झग्गा कोई मामूली पहलवान थोड़े ही है- दो मिनट में उसे दे मारा। अब तो गांव का नाम यही रखे है।

बाबा ने दर्द से तडफ़ड़ाते चैतू को देखा। टांग कमर के पास वाले जोड़ से सरक गई थी। बाबा ने तेल मंगवाया। फिर तेल लगाकर मांजते-मांजते एकाएक पैर लगाकर उन्होंने चैतू की टांगे हाथ से उठा दी। चट की आवाज हुए और हड्डी बैठ गई। बाबा ने दवा गरम करवाई और चोट पर बांध दी। बाबा ने चैतू का सर अपनी जांघ पर टिका लिया। ऊपर देखा तो चैतू का छप्पर टूटा पड़ा था। ओसार की छान्ह भी सड़ गई थी। दूसरे दिन सुबह-सुबह बाबा ने पच्चीस मजदूर लगाकर सरपत की कटाई कराई और चैतुवा की टूटी छान्ह छवा दी। उनकी परंपरा का संवाहक चैतू अहीर ही उनके बाद गांव का नाम रखेगा इसका बाबा को पूरा यकीन था।

मार्कण्डेय जी भी गुलरा के बाबा की तरह ही आजीवन क्षमाशील रहे, उन्होंने किसी का अहित नहीं किया।

आखिरी बार इलाज के दौरान अस्पताल से निकलते हुए मार्कण्डेय

मार्कण्डेय जी जब-जब उपचार के लिए लंबे समय तक दि‍ल्‍ली रहते तो बेटे संजय और युवा पत्रकार अनुराग से उनके समाचार मिल जाते थे। अंतिम बार जब वह दिल्ली जाने वाले थे, उससे दो दिन पूर्व, 27 जनवरी 2010 को, मैं उनसे मिलने उनके निवास एकांकी कुंज गया था। हम लोग बातें कर रहे थे तभी न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त जी के घर से फोन आया कि वह उनसे मिलने आ रहे हैं। मैं जल्दी में था और यह सोचकर कि स्नेही गुप्ता जी के आने पर तत्काल उठकर चल देना उनके प्रति अशिष्ठता होगी, मैं मार्कण्डेय जी से विदा लेकर लौट आया और वादा किया था कि स्टेशन पर मुलाकात होगी। ज्वरग्रस्तता के कारण मैं चाहकर भी उन्हें विदा देने रात में स्टेशन नहीं जा पाया और यह उनसे अंतिम मुलाकात थी।

‘शेखर, कुछ भी हो सकता है ?’ उन्होंने तब शंकित मन से कहा था, जैसे उन्हें कुछ आभास हो गया हो। बाद में, एक दिन उनका समाचार लेने मैंने दिल्ली स्थित विद्या जी को फोन मिलाया तो उन्होंने सूचना दी, ‘अभी थैरेपी करा कर लौटे हैं, कष्ट में हैं।’ फिर कहा, ‘लीजिए, इनसे बात कीजिए।’

‘रहने दीजिए, उन्हें बोलने में तकलीफ होगी।’ मैंने स्‍थि‍ति‍ का अनुमान कर उन्हें मना किया।

‘नहीं मान रहे हैं,’ विद्याजी का विवश स्वर था।

उन्होंने फोन पर क्या कहा, मैं कुछ समझ नहीं पाया। शायद अपने प्रिय इलाहाबाद नगर के हालचाल जनना चाहते थे। आवाज टूटी हुई थी, जैसे कठिनाई से बोलने का प्रयत्न कर रहे हों। उपचार के दौरान उनकी आवाज में कई परिवर्तन आए थे। पहले वाली पतली आवाज कुछ दिनों खासी दमदार हो गई थी। फिर और परिवर्तन हुए।

18 मार्च 2010 को मार्कण्डेय जी दिल्ली से आजमगढ़ के लिए लौटने वाले थे, लेकिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ही उनका निधन हो गया। पारिवारिक मित्र कैप्टन जेपी सिंह, जो वर्तमान में रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी हैं, के सौजन्य से उनका पार्थिव शरीर रीवांचल एक्सप्रेस से सुबह 9.15 बजे इलाहाबाद पहुंच गया था। समाचार पत्रों के माध्यम से नगरवासियों को उनके निधन की सूचना मिल चुकी थी। सुबह से ही एकांकी कुंज स्थित उनके निवास पर शोकसंतप्त लोगों का जुटना प्रारंभ हो गया था। अनेकों मित्रगण, साहित्यकार, पत्रकार, विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता, कुछ सांसद, विधायक और पार्षद, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, अधिवक्तागण, साहित्यक-सांस्‍कृतिक संस्थाओं से जुड़े लोग, शासन के प्रतिनिधि अधिकारी इत्यादि सभी वर्गों के लोगों उनके अंतिम दर्शन करने, उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देने पहुंच गए थे। दोपहर बाद उनकी शवयात्रा शुरू हए। सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में रसूलाबाद में गंगातट पर उनकी पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन हुई। इलाहाबाद नगर को कभी न छोडऩे वाले मार्कण्डेय अपनी स्मृतियां यहां छोड़कर विदा हो गए।

अपने मित्र डा. सत्यप्रकाश मिश्र की मृत्यु के बाद आत्मीय अग्रज मार्कण्डेय जी के निधन से दुखी कई दशकों के साथी सतीश जमाली ने रुंधे कंठ से कहा, ‘गुरु जिस ठसक से इलाहाबाद में रहे थे उसी ठसक से विदा हुए।’

इस कथन में किसी प्रकार का अतिश्योक्ति नहीं थी।

(‘कथा’ के मार्कण्‍डेय स्मृति विशेषांक (15 मार्च, 2010) से साभार)

मार्कण्डेय को याद करना पूरे युग को याद करना है : शेखर जोशी

इलाहाबाद : मार्कण्डेय को याद करना पूरे युग को याद करना है। 1950-60 का दशक आजादी के बाद के साहित्य का स्वर्णकाल है और इसका केन्द्र इलाहाबाद रहा। उस समय साहित्य में एक साथ कई प्रतिभाएँ आयीं। कई विधाएँ आयीं, उनमें प्रयोग भी खूब हुए। इस दौर में हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्रिकाएँ आयीं। वैचारिक विमर्श और वैचारिक द्वन्द्व भी उस दौर सर्वाधिक रहा। यह बात कथाकार शेखर जोशी ने मार्कण्‍डेय की पहली पुण्‍यति‍थि‍ पर ‘कथा’ के मार्कण्‍डेय वि‍शेषांक के लोकार्पण समारोह में कही। कार्यक्रम का आयोजन इलाहाबाद संग्रहालय में कि‍या गया था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शेखर जोशी ने कहा कि इलाहाबाद फकीरों का शहर था। जिन्होंने फकीराना अन्दाज में अपने को साहित्य के लिए समर्पित कर दिया, उनमें निराला, फिराक़, श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीकान्त वर्मा जैसे लोग थे। इस शहर का उस समय ऐसा आकर्षण था कि बाहर से भी लोग यहीं आते थे। राहुल सांकृत्यायन, भदन्त आनन्द कौत्स्ल्यायन, महादेव साहा, फादर कामिल बुल्के आते थे, जिससे यह शहर सांस्कृतिक उर्जा और जीवन्तता ग्रहण करता था। मैं खुद इसी आकर्षण में आया था, लेकिन सोचा नहीं था कि यहीं का होकर रह जाऊँगा। इसी क्रम में उन्होंने कह कि मार्कण्डेय इस फकीरों की परम्परा में शाही फकीर थे और इस परम्परा को उन्होंने अपने रचनकर्म, सम्पादन और व्यवहार से बनाया और विकसित किया।

दूधनाथ सिंह ने कहा कि कथा को बखानने में और कहानी लिखने में फर्क होता है। मार्कण्डेय के कहानी लेखन में बखानने की कला नहीं है। विचार और कल्पना के मेल से उन्होंने कहानी लिखी और विचार भी बहुत सख्त जो उन्होंने मार्क्सवाद से लिया था। उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय की कहानियाँ उनकी गाँव की रची स्मृतियों का उपख्यान हैं, लेकिन उनमें वर्ग विभाजन है। उनकी कहानियाँ गरीबों, स्त्रियों, जमींदारों के बीच के संघर्ष और अन्तर्विरोध से रचित हैं। जैसे-जैसे गँवई स्मृतियाँ कम हुईं, वैसे-वैसे उनका लेखन कम हुआ। उन्‍होंने कहा कि मार्कण्डेय की भाषा प्रेमचन्द की भाषा से भिन्न है। मार्कण्डेय के यहाँ अवधी-भोजपुरी मिश्रित शब्द हैं। गाँव की भाषा का खड़ी बोली के व्याकरण में अनुवाद है।

रामजी राय ने कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ बखानने की जो कला है वह निरर्थक नहीं है। उसके माध्यम से वे बात करते हैं और आज वह बात ही गायब है। उनकी बातों और यादों के भीतर से सार्थक बातें निकलती थीं। वह पी.सी. जोशी को जब याद करते हैं तो उनकी उस विशेषता की तरफ इशारा भी करते हैं कि मनुष्य निर्माण और संगठन निर्माण कैसे हो ? उन्होंने नई कहानी के सन्दर्भ में मार्कण्डेय को याद करते हुए कहा कि मार्कण्डेय ने नई कहानी में सिर्फ गाँव को लाने का काम नहीं किया,  वह तो औरों ने भी किया। मार्कण्डेय ने नई कहानी में ग्राम को और ग्राम को देखने की नजर को रेखांकित किया। वह अपने लेख ‘ग्राम-चेतना और हिन्दी उपन्यास प्रेमचन्द के बाद’ में कहते हैं कि स्वतन्त्रता बाद के अधिकांश कथाकार प्रेमचन्द की सामाजिक दृष्टि के अनुसार प्रायः परिवर्तन के पक्षधर हैं। लेकिन वे वास्तविकताओं के मात्र निदर्शन से सन्तुष्ट नहीं हैं,  वे सामाजिक यथार्थ की सीमाओं में रहते हुए ऐसे चरित्रों की परिकल्पना करते हैं जो परिवर्तनों के लिए संघर्ष कर सकें, जबकि वास्तविक सामाजिक सन्दर्भों में ऐसे चरित्र उपस्थित नहीं हैं। उनके ऐसा करते ही उन पर सामाजिक स्थितियों को झुठलाने और कल्पना द्वारा आत्मिक चरित्र प्रस्तुत करने का आरोप लग जाता है। आलोचक महोदय कहते हैं कि सामाजिक सन्दर्भों में जब तक ऐसे बदलाव लक्षित न हों, ऐसे चरित्र काल्पनिक माने जायेंगे इसलिए उनमें से कुछ का मानना है कि ‘बलचनमा’ के बालचन की क्रान्तिकारित यथार्थ के उतने नजदीक नहीं है, जितनी श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ का यह कथन कि, ‘वैद्य जी थे,  वैद्य जी हैं और वैद्य जी रहेंगे।’ यद्यपि चरित्रों के परिवर्तन हीन होने की वकालत वही लेखक करता है, जिसका सामाजिक परिवर्तन में विश्वास न हो या वह जो मान चुका हो कि ग्रामीण समाज का यथास्थितिवादी ढाँचा इतना सुदृढ़ है कि वह कभी टूट नहीं सकता। वह शायद आज के इस सत्य को पहचान नहीं पा रहा है कि वह वर्गीय संघर्ष से चाहे न टूटे, लेकिन जातीय आधार ने तो पहले ही चरण में उसे छिन्न-भिन्न कर दिया है। तो हम जब भी मार्कण्डेय पर बात करेंगे तो वह सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज पर भी बात करनी पड़ेगी।

उन्होंने आगे कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ गाँव और शहर विभाजित नहीं है और जो कहते हैं कि मार्कण्डेय ग्राम चेतना के कथाकार हैं वे भी ठीक नहीं हैं। मार्कण्डेय दरअसल आधुनिक चेतना के कहानीकार हैं।

राजेन्द्र कुमार ने कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ आजादी के बाद के गाँव के चित्र मिलते हैं। लेकिन कहीं भी गाँव पर लिखते हुए वे सिर्फ गाँव की दयनीयता ही नहीं दिखाते थे, बल्कि उनकी कहानियों में संघर्ष करता हुआ गाँव है। गाँव के विकास के शासक वर्गीय नाटक के विरुद्ध मार्कण्डेय के विचारों में गाँव का एक विकास का खाका मिलता है। नीलकान्त ने कहा कि मार्कण्डेय अपनी रचना प्रक्रिया में प्रेमचन्द की परम्परा को पकड़ते हैं। उन्होंने ‘गुलरा के बाबा’ कहानी की चर्चा करते हुए कहा कि वह कहानी ‘पंच परमेश्वर’ जैसी तो नहीं है लेकिन पंच परमेश्वर के समानान्तर चलती कहानी है। उन्होंने ‘भूदान’ कहानी को महत्वपूर्ण कहानी मानते हुए कहा कि इस कहानी ने भूदान को लेकर शासक वर्ग के पाखण्ड को उघाड़कर रख दिया है। उन्होंने मार्कण्डेय की कहानी ‘आदर्श कुक्कुट गृह’ की चर्चा करते हुए कहा कि इस कहानी में पंचवर्षीय विकास की हकीकत क्या है, उस पर जबर्दस्त व्यंग्य है। नीलकान्त ने इस कहानी के ट्रीटमेण्ट को अन्तेन चेखव जैसा बताया और कहा कि पढ़ते हुए इस कहानी को अन्तेव चेखव याद आते हैं।

कार्यक्रम में काशी विद्यापीठ वाराणसी से आये सत्यदेव त्रिपाठी ने मार्कण्डेय की कहानियों की भाषा के बारे में दूधनाथ के विचारों का खण्डन करते हुए कहा कि मार्कण्डेय की भाषा ठण्डी दाल में पड़े हुए घी की तरह है। जिसे मिला देने के बाद भी वह छोटे-छोटे खण्डों में बना रहता है। उन्होंने ‘मधुपुर के सीवान का एक कोना’ कहानी की चर्चा की और कहा कि मार्कण्डेय के यहाँ प्रेम की अभिव्यक्तियाँ सूक्ष्म, सांकेतिक और गहन हैं। उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय न होते तो नई कहानी वैसी ही न होती जैसी आज हम लोगों के सामने वह आती है।

झारखण्ड से आये बलभद्र ने मार्कण्डेय की कहानियों को कैसे पढ़ा और समझा जाय इस पर प्रकाश डाला। इस क्रम में उन्होंने ‘गुलरा के बाबा’, ‘सोहगइला’, ‘बीच के लोग’, ‘मधुपुर के सीवान का एक कोना’ कहानी की रचना प्रक्रिया और पाठ पर बातचीत रखी। इस अवसर पर सुधीर सिंह,  क्षमा शंकर पाण्डेय आदि ने भी विचार रखे। मार्कण्डेय को याद करने के लिए शहर के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, आन्दोलनकर्मी, छात्र, पत्रकार, रंगकर्मी बड़ी संख्या में एकत्रित हुए।