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कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।

शि‍क्षा और मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे मुक्तिबोध : महेश चंद्र पुनेठा

मुक्तिबोध

मुक्तिबोध

ज्ञान को लेकर बहुत भ्रम हैं। सामान्यतः सूचना, जानकारी या तथ्यों को ही ज्ञान मान लिया जाता है। इनको याद कर लेना ज्ञानी हो जाना माना जाता है। इस अवधारणा के अनुसार एक ज्ञान प्रदानकर्ता है तो दूसरा प्राप्‍तकर्ता, जिसे पाओले फ्रेरे ‘बैंकिंग प्रणाली’कहते हैं। इसमें शि‍क्षक जमाकर्ता और विद्यार्थी का मस्तिष्‍क बैंक की भूमिका में होता है। शि‍क्षक बच्चे के मस्तिष्‍क रूपी बैंक में सूचना-जानकारी या तथ्य रूपी धन को लगातार जमा करता जाता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि उसे लेने के लिए बच्चा तैयार है या नहीं। शि‍क्षक द्वारा कही बात ही अंतिम मानी जाती है। दरअसल, यह ज्ञान की बहुत पुरानी अवधारणा है। यह तब की है, जब शि‍क्षा की मौखिक परंपरा हुआ करती थी। सूचना, जानकारी या तथ्यों को रखने का रटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इनके हस्तांतरण का यही एकमात्र उपाय हुआ करता था। जो जितनी अधिक सूचना, जानकारी या तथ्यों को याद रख पाता था, वह उतना ही अधिक ज्ञानी माना जाता था। ज्ञान का यह सीमित और आधा अधूरा अर्थ है। वस्तुतः जो लिया या दिया जाता है, वह ज्ञान न होकर केवल सूचना या जानकारी है।

ज्ञान कभी दिया नहीं जा सकता है। ज्ञान का तो निर्माण या सृजन होता है। इसलिए आप दूसरों को सूचना या जानकारी तो दे सकते हैं, ज्ञान नहीं। ज्ञान के साथ बोध का गहरा संबंध है। ज्ञान निर्माण की एक पूरी प्रक्रिया है, जो अवलोकन, प्रयोग-परीक्षण, विश्‍लेषण से होती हुई निष्‍कर्ष तक पहुंचती है। ज्ञान द्वंद्व और संश्‍लेषण से उत्पन्न होता है। अनुभवों और तर्कों की उसमें विशेष भूमिका रहती है। यह माना जाता है कि मनुष्‍य की सारी अवधारणाएं उसके अपने अनुभवों के आधार पर बनती हैं। शि‍क्षा में ज्ञान की यह अवधारणा ‘रचनात्मकतावाद’के नाम से जानी जाती है, जो अपेक्षाकृत नई मानी जाती है। भारतीय शि‍क्षा में इस अवधारणा की गूंज बीसवीं सदी के अंतिम दशक से सुनाई देना प्रारम्भ होती है। लेकिन मुक्तिबोध ज्ञान को लेकर इस तरह की बातें पांचवें दशक में लिखे अपने निबंधों में कहने लगे थे। ज्ञान, बोध, सृजनशीलता, सीखने जैसी अवधारणाओं को लेकर उनके निबंधों में बहुत सारी बातें मिलती हैं। मुक्तिबोध ज्ञान और जानकारी के बीच के इस अंतर को स्पष्‍ट करते हैं। भले ही उनकी यह बात सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में नहीं, बल्कि रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में आती है। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में भी वह सटीक बैठती है। मुक्तिबोध ज्ञान के विकास के बारे में कहते हैं- ‘‘बुद्धि स्वयं अनुभूत विशि‍ष्‍टों का सामान्यीकरण करती हुई हमें जो ज्ञान प्रस्तुत करती है, उस ज्ञान में निबद्ध ‘स्व’से ऊपर उठने, अपने से तटस्थ रहने, जो है उसे अनुमान के आधार पर और भी विस्तृत करने की होती है।…ज्ञान व्यवस्था…जीवनानुभवों और तर्कसंगत निष्‍कर्षों और परिणामों के आधार पर होती है।…तर्कसंगत (और अनुभव सिद्ध) निष्‍कर्षों तथा परिणामों के आधार पर, हम अपनी ज्ञान-व्यवस्था तथा उस ज्ञान-व्यवस्था के आधार पर अपनी भाव-व्यवस्था विकसित करते।…बोध और ज्ञान द्वारा ही ये अनुभव परिमार्जित होते हैं यानी पूर्व-प्राप्त ज्ञान द्वारा मूल्यांकित और विश्‍लेषि‍त होकर, प्रांजल होकर, अंतःकरण में व्याख्यात होकर, व्यवस्था-बद्ध होते जाते हैं।’’  वह पुराने ज्ञान में नवीन ज्ञान को जोड़कर सिंद्धांत व्यवस्था का विकास करने की बात करते हैं। यहीं पर द्वंद्व और संश्‍लेषण की प्रक्रिया चलती है। उनके लिए ज्ञान का अर्थ केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का बोध नहीं, वरन् उत्थानशील और ह्रासशील शक्तियों का बोध भी है।…ज्ञान भी एक तरह का अनुभव है, या तो वह हमारा अनुभव है या दूसरों का। इसलिए वे ज्ञान को काल सापेक्ष और स्थिति सापेक्ष मानते हैं। उसे जीवन में उतारने की बात कहते हैं- ‘‘ज्ञान-रूपी दांत जिंदगी-रूपी नाशपाती में गड़ना चाहिए, जिससे कि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वादन कर सके।’’

आज सबसे बड़ी दिक्कत शि‍क्षा की यही है कि वह न संवेदना को ज्ञान में बदल पा रही है और न ज्ञान से संवेदना पैदा कर पा रही है। फलस्वरूप आज की शि‍क्षा एक सफल व्यक्ति तो तैयार कर ले रही है, लेकिन सार्थक व्यक्ति नहीं अर्थात ऐसा व्यक्ति जो अपने समाज के प्रति जिम्मेदार और हाशि‍ए पर पड़े लोगों के प्रति संवेदनशील हो, जिसके लिए शि‍क्षित होना धनोपार्जन करने में सक्षम होना न होकर समाज की बेहतरी के लिए सोचना हो। ऐसे में यह महत्वपूर्ण बात है कि मुक्तिबोध ज्ञान को संवेदना के साथ जोड़कर देखते हैं। ‘चांद का मुंह टेड़ा है’कविता की ये पंक्तियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं- ‘ज्वलंत अनुभव ऐसे/ऐसे कि विद्युत धाराएं झकझोर/ज्ञान को वेदन-रूप में लहराएं/ज्ञान की पीड़ा/रुधिर प्रवाहों की गतियों में परिणित होकर/अंतःकरण को व्याकुल कर दे।’इसलिए वह यह आवश्‍यकता महसूस करते हैं कि संवेदनात्मक उद्देश्‍य, अपनी पूर्ति की दिशा में सक्रिय रहते हुए, मनुष्‍य के बाल्यकाल से ही उस जीवन-ज्ञान का विकास करे, जो संवेदनात्मक उद्देश्‍यों की पूर्ति करे। संवेदनात्मक उद्देश्‍यों से उनका आशय स्व से ऊपर उठना, खुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना है। दूसरे के मर्म में प्रवेश कर पाना तभी संभव है, जब शि‍क्षा दिमाग के साथ-साथ दिल से भी जुड़ी हो, वह बच्चे की संवेदना का विस्तार करे। इसी कारण ज्ञानात्मक-संवेदना और संवेदनात्मक-ज्ञान की अवधारणा उनकी रचना-प्रक्रिया और आलोचना की आधार रही।

मुक्तिबोध अनुभव को, सीखने और रचना के लिए बहुत जरूरी मानते हैं। कोई भी रचना ‘अनुभव-रक्त ताल’में डूबकर ही ज्ञान में बदलती है। देखिए ‘भूरी-भूरी खाक धूल’कविता की ये पंक्तियां- नीला पौधा/यह आत्मज/रक्त-सिंचिता हृदय धरित्री का/आत्मा के कोमल आलबाल में/यह जवान हो रहा/कि अनुभव-रक्त ताल में डूबे उसके पदतल/जड़ें ज्ञान-संविधा की पीतीं।’वह अनुभव को पकाने की बात करते हैं । देखा जाए तो शि‍क्षा एक तरह से अनुभवों को पकाने का ही काम तो करती है। मुक्तिबोध लिखते हैं ,‘‘वास्तविक जीवन जीते समय, संवेदनात्मक अनुभव करना और साथ ही ठीक उसी अनुभव के कल्पना चित्र प्रेक्षित करना- ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते। उसके लिए मुझे घर जाकर अपने में विलीन होना पड़ेगा।’’ वह सिद्धांत की नजर से दुनिया को देखने की अपेक्षा अनुभव की कसौटी पर सिद्धांत को कसने तथा विचारों को आचारों में परिणित करने के हिमायती रहे। यही है ज्ञान निर्माण या सृजन की प्रक्रिया। ‘ज्ञान अनुभव से ही शुरू होता है। ज्ञान के सिद्धांत का भौतिक रूप यही है।  जब व्यक्ति अनुभवों से सीखना छोड़ देता है, उसमें जड़वाद आ जाता है। कितनी महत्वपूर्ण बात कही है उन्होंने, आज तमाम शि‍क्षाविद् इसी बात को तो कह रहे हैं, ‘‘यह सही है कि प्रयोगों में गलती हो सकती है। भूलें हो सकती हैं। किंतु उसके बिना चारा नहीं है। यह भी सही है कि कुछ लोग अपने प्रयोगों से इतने मोहबद्ध होते हैं कि उसमें हुई भूलों से इंकार करके उन्हीं भूलों को जारी रखना चाहते हैं। वे अपनी भूलों से सीखना नहीं चाहते हैं। अतः वह जड़वादी हो जाते हैं।’’ पर इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मुक्तिबोध प्रयोग और अनुसंधान के नाम पर अब तक मानव जाति को प्राप्त ज्ञान का अर्थात सिद्धांतों से इंकार करते हों। उनका स्पष्‍ट मानना था, ‘‘इसका अर्थ यह कि बदली हुई परिस्थिति में परिवर्तित यथार्थ के नए रूपों का, उनके पूरे अंतःसंबंधों के साथ अनुशीलन किया जाए, उनको हृदयगंम किया जाए।’’  आज इसे ही सीखने का सही तरीका माना जा रहा है। वास्तविक अर्थों में सीखना इसी तरह होता है। यही सीखना स्थाई होता है। सीखने का मतलब कुछ जानकारियों को रट लेना नहीं है। सीखना तो व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। ऐसा परिवर्तन जो चेतना को अधिकाधिक यथार्थ संगत बना दे,  जिसके के लिए मुक्तिबोध अतिशय संवेदनशील, जिज्ञासु तथा आत्म-निरपेक्ष मन की आवश्‍यकता पर बल देते हैं। वह अनुभवों से सीखने की ही नहीं, बल्कि अनुभव-सत्य को जन तक पहुंचाने की बात भी कहते हैं- ‘तब हम भी अपने अनुभव/सारांशों को उन तक पहुंचाते हैं जिसमें/जिस पहुंचाने के द्वारा हम, सब साथी मिल/दंडक वन में से लंका का पथ खोज निकाल सकें।’(‘भूरी-भूरी खाक धूल’)। देखा जाय तो यही शि‍क्षा का असली उद्देश्‍य भी है। यदि शि‍क्षित होने पर हम जनहित में कुछ कर नहीं पाए तो उसकी क्या सार्थकता है?

आज शि‍क्षण में पीयर लर्निंग पर बहुत बल दिया जा रहा है। एन.सी.एफ.2005 में कहा गया है कि सहभागितापूर्ण सीखना और अध्यापन, पढ़ाई, भावनाएं एवं अनुभव को कक्षा में एक निश्‍चि‍त और महत्वपूर्ण जगह मिलनी चाहिए। सहभागिता एक सशक्त रणनीति है। यह माना गया है कि समूह में या अपने साथियों से सीखना अधिक अच्छी तरह से होता है। उक्त दस्तावेज इसके पीछे यह तर्क देता है कि जब बच्चे और शि‍क्षक अपने व्यक्तिगत या सामूहिक अनुभव बांटते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और उनमें परखे जाने का भय नहीं होता है, तो इससे उन्हें उन लोगों के बारे में भी जानने का अवसर मिलता जो उनके सामजिक यथार्थ का हिस्सा नहीं होते। इससे वे विभिन्नताओं से डरने के बजाय उन्हें समझ पाते हैं। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध अपने एक निबंध ‘समीक्षा की समस्याएं’ में लिखते हैं- ‘‘जहां तक वास्तविक ज्ञान का प्रश्‍न है- वह ज्ञान स्पर्धात्मक प्रयासों से नहीं, सहकार्यात्मक प्रयासों से प्राप्त और विकसित हो सकता है।’’  यह अच्छी बात है कि मुक्तिबोध प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा को नकारते हैं। हो भी क्यों न! यह एक पूंजीवादी मूल्य है और मुक्तिबोध समाजवादी समाज के समर्थक रहे। प्रतिस्पर्धा से कभी भी एक समतामूलक या सहकारी समाज नहीं बन सकता है। सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ही एक सुंदर समाज का निर्माण कर सकती है।

सीखने के लिए स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण का होना बहुत जरूरी है। दबाव या भय में कुछ भी सीखना संभव नहीं है। स्वतंत्रता बच्चे को चिंतन और उसे सृजन के लिए प्रेरित करती है। बच्चे में सृजनशीलता के विकास के लिए स्वतंत्रता का होना पहली शर्त है। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध भी कहते हैं- ‘‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य कला के लिए, दर्शन के लिए, विज्ञान के लिए अत्यधिक आवश्‍यक और मूलभूत है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना गतिमान नहीं हो सकती।’’ मुक्तिबोध व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक हैं। उनका मानना है कि भले ही यह एक आदर्श है फिर भी मानव की गरिमा और मानवोचित जीवन प्रदान करने के लिए बहुत जरूरी है। यह जनता के जीवन और उसकी मानवोचित आकाक्षांओं से सीधे-सीधे जुड़ा़ है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। यह सच भी है। हम अपने चारों ओर अतीत से लेकर वर्तमान तक दृष्‍टि‍पात करें तो पाते हैं कि दुनिया में जितने भी बड़े सृजन हुए हैं, वे सभी किसी न किसी स्वातंत्र-व्यक्तित्व की देन हैं। इन व्यक्तित्वों को यदि सृजन की आजादी नहीं मिली होती तो इतनी बड़ी उपलब्धि उनके खातों में नहीं होती। हर सृजन के मूल में स्वतंत्रता ही है। मुक्तिबोध इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं।

इस प्रकार ज्ञान की बदली अवधारणा और बाल मनोविज्ञान की दृष्‍टि‍ से विश्‍लेषण करें तो हम पाते हैं कि मुक्तिबोध का चिंतन बहुत तर्कसंगत और प्रगतिशील है। इसमें शि‍क्षा और मनोविज्ञान को लेकर उनकी गहरी समझ परिलक्षित होती है। एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच से लैस समाज बनाने की दिशा में उनका यह चिंतन बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आज जब ज्ञान को एक खास तरह के खांचे में फिट करने और तैयार माल की तरह हस्तांतरित करने की कोशि‍श हो रही है, तो मुक्तिबोध के ये विचार अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।

शिक्षा का गिरता स्तर जिम्मेदार कौन :   कैलाश मंडलोई

  कैलाश मंडलोई

कैलाश मंडलोई

शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक इस प्रक्रिया से गुजरता हुआ कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। अगर हम शिक्षा की तमाम परिभाषाओं को एक साथ रख दें और फिर कोई शिक्षा का अर्थ ढूंढे़ तो भी हमें कोई ऐसा अर्थ नहीं मिलेगा, जो अपने आप में पूर्ण हो। वर्तमान में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली शिक्षा से लिया जाता है।

शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर जो घमासान मचा है, उस परिप्रेक्ष्य में गाँधी, नेहरू और के. टी. शाह के बीच हुई बहस का एक संस्मरण लिखना जरूरी है।

स्वतंत्रता के पूर्व जब जवाहर लाल नेहरू देश की भावी शिक्षा नीति का मसौदा तैयार कर रहे थे, तो गाँधीजी ने के. टी. शाह से पूछा कि आप भावी भारत की शिक्षा कैसी चाहते है? इस पर शाह ने उत्तर दिया कि हम ऐसी शिक्षा चाहते है जिसमें किसी कक्षा में अगर मैं यह सवाल करूँ कि मैंने चार आने के दो सेब खरीदे और उन्हें एक रुपये में बेच दूँ तो मुझे क्या मिलेगा? तो सारी कक्षा एक स्वर में जवाब दे आपको जेल मिलेगी, दो वर्ष का कठोर कारावास मिलेगा। यह उदाहरण हमें यह बताता है कि हमने स्वतंत्रता के पूर्व शिक्षा की किस नैतिकता की अपेक्षा की थी?

किंतु आज शिक्षा शब्द ने अपने अंदर का अर्थ इस कदर खो दिया है कि आज न उसके अंदर का संस्कार जिंदा है और न व्यवहार। शिक्षा अपने समूचे स्वरूप में अराजकता, अव्यवस्था, अनैतिकता और कल्पनाहीनता का पर्याय बन गई है। शिक्षा के जरिये अब न आचरण आ रहा न चरित्र, न मानवीय मूल्य, न नागरिक संस्कार, न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहसे होती है। और अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है, तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य और अयोग्य कैसे हो सकता है? हालांकि काफी हद तक यह बात सही है कि स्कूलों में कुछ शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। स्‍कूल वक्त पर पहुँचते नहीं हैं। शिक्षक वैसा शिक्षण नहीं करते जो गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की श्रेणी में आता है। आये दिन किसी मुद्दे को लेकर हड़ताल पर चले जाना और स्कूलों की छुट्टी हो जाना आम हो गया है। शिक्षार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय जाते हैं, लेकिन वहां शिक्षक ही नदारद रहते हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न लगना लाजिमी है।

लेकिन यह बात भी सही है कि बहुत से शिक्षक हैं, जो ईमानदारी से पढ़ा रहे हैं। उनके बच्चों में शैक्षिक गुणवत्ता की दक्षताएं हैं। फि‍र सभी शि‍क्षकों दोषी कैसे ठहराया जा सकता है।

उद्देश्यों और मूल्यों का सवाल आते ही कई लोग आदर्शवाद की धारा में बह जाते हैं। वे उन भौतिक परिस्थितियों को भूल जाते हैं जिनसे उद्देश्यों पर अमल किया जाना है, जिनमें मूल्यों को जीवन में उतारा जाना है। शिक्षा के गिरते स्तर के लिए शिक्षक दोषी हैं या यह शिक्षा व्यवस्था और उसको अपने हित में नियंत्रित-निर्मित करने वाली आर्थिक राजनीतिक शक्तियाँ? गिरते स्तर के लिए उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु शिक्षा से जुड़े घटकों यथा समाज, प्रशासन, शिक्षक पाठ्यक्रम स्वयं छात्र इत्यादि पर एक दृष्टि डालना उचित होगा।

शिक्षा के गिरते स्तर के कारण उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होना लाजिमी है। लेकिन इस बात के जिम्मेदार कौन लोग है। इस ओर न तो राजनीतिक मंथन हो रहा और न ही सामाजिक चिंतन किया जा रहा है। बातें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की अक्‍सर सुनने में आती है। किन्तु सुधार कहीं नजर नहीं आता।

कुछ दिनों से शिक्षा विभाग में बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर संकुल स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा एक नाटक खेला जा रहा है। इसमें बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता की जाँच की जा रही है, टेस्ट ले रहे हैं। वह भी कैसे की जो स्कूल 45 प्रतिशत उत्‍कृष्ट घोषित हैं, उनके शिक्षकों को बेसलाइनटेस्ट हेतु पेपर दिये। इसमें दो टेस्ट थे। प्रत्येक टेस्ट में भाषा, गणित और अंग्रेजी की लगभग सभी मूलभूत दक्षताओं पर प्रश्‍न थे। और कहा कि‍ कल प्रथम टेस्ट लेना व परसों अंतिम टेस्ट और आपको प्रथम टेस्ट के बाद अंतिम टेस्ट में बच्चे की गुणवत्ता में सुधार भी बताना है। यह कैसे और कहाँ तक संभव है? शिक्षकों पर दबाव डाला जा रहा है कि उनका स्कूल गुणवत्ता पूर्ण की श्रेणी में आ जाए। जिले, विकास खण्ड, संभाग और राज्य स्तर तक के शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी स्कूलों में जा रहे हैं और निरीक्षण कर रहे हैं। अधिकारी शिक्षकों को फटकारनुमा समझाइश देते हैं कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करें। यह कैसी विडंबना है कि स्कूलों में शिक्षक पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा स्थापित करने का भारी दबाव तो है, मगर उसके लिए तैयार ही नहीं किया गया। उल्टे शिक्षकों को प्रतिमाह प्रशिक्षण के बहाने कक्षा शिक्षण से दूर करने की साजिश रची जा रही है। इसके तहत देश की भोली भाली जनता को यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि शासन को उनके बच्चों की खूब परवाह है। लेकिन उनके जो शिक्षक हैं, वे सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण उनके बच्चे शैक्षिक गुणवत्ता में पिछड़ रहे हैं। सरकार की गलत शिक्षा नीतियों के जो दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं, उनमें सुधार करने कि बजाय इसका ठीकरा शिक्षकों के सिर फोड़ा जा रहा है। यह कहाँ तक उचित है? सरकार दोष देने के बजाय शिक्षकों को क्षमतावान बनाए।’’ यह कहना है शैक्षिक कार्यकर्ता कालूराम शर्मा जी का।

आज इस बात पर भी गौर करना है कि जिन बच्चों की शिक्षा के बारे में सरकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की बात कर रही है, वे बच्चे किस तबके से आते हैं? उनकी सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, शैक्षिक स्थिति के साथ स्वास्थ्य की स्थिति क्या है? क्या ये कारक इन बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे है? यदि हाँ तो फिर सरकार और उनके ये उच्च अधिकारी इस बारे में क्या सोचते हैं और क्या कर रहे हैं?

आज यह स्पष्ट हो चुका है कि सरकार की दोषपूर्ण शिक्षा नीति के साथ सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। वर्षभर शासकीय शिक्षकों से कई प्रकार के गैर शैक्षिक कार्य लिए जा रहे हैं, जिससे वे अपने छात्रों को पूरा समय नहीं दे पाते और उनके छात्र पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। निजी विद्यालय बुनियादी सुविधाओं का उचित प्रबंध रखते हैं। श्री सतीशचन्द्रा के अनुसार, ‘‘आज सरकारी और निजी विद्यालयों में फर्क बहुत साफ नजर आता है। दोनों की पढ़ाई के स्तर में जमीन आसमान का अन्तर है। इसकी एक वजह सरकारी विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के पास अधिकारों का अभाव है। निजी विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के पास असीमित अधिकार होते है।’’ यह शिक्षा के निजीकरण का नकारात्मक पहलू भी है। आज हालात यह है कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं। लोगों का अंग्रेजियत का मोह और साथ ही प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ के कारण 70 से 80 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में दर्ज हो गए हैं।

सरकारी विद्यालय की शिक्षा की आलोचना दलित चिंतक चन्द्रभान प्रसाद भी करते हैं। वे कहते है, ‘‘आज गरीब से गरीब आदमी से बात कीजिए, चाहे वह रिक्शा चालक हो, रेहड़ी लगाता हो या दिहाड़ी मजदूरी करता हो, इनमें से कोई भी अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में नहीं पढ़ाना चाहता। सभी निजी विद्यालयों की ओर भाग रहे हैं, वह भी अंग्रेजी माध्यम की ओर। सर्व शिक्षा अभियान योजना के माध्यम से स्कूल न जाने वाले बच्चों का रुझान स्कूलों की तरफ होना यह साबित करता है कि शिक्षा पाने के लिए हर कोई गंभीर है। लेकिन शासकीय व्यवस्था को देखकर लोगों का मोह भंग हो रहा है। जिससे पैसे वालों के बच्चे निजी स्कूलों मे पढ़ाई करते है। शिक्षा के निजीकरण ने समाज के उच्च वर्गो के स्वार्थ के लिए अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का काम किया है। आज सरकारी स्कूल में समाज के सबसे पिछड़े व अति गरीब वर्ग के बच्चे ही सरकारी शिक्षा का अभिशाप झेलने के लिए विवश हैं।

गौर करने वाली बात है कि जब हमारे देश में शिक्षा के बीच खाईं बनी हुई है, तो उससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होगा। एक तरफ सरकार शिक्षा में सुधार की योजनाएं बनाने में दिलचस्पी दिखाती है, तो दूसरी ओर योजनाओं के सही क्रियान्वयन की ओर कोई सकारात्मक पहल क्यों नहीं की जाती है? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा  का ग्राफ दिन प्रतिदि‍न नीचे की ओर जायेगा। सरकार शिक्षा में किए जा रहे भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाये तो शिक्षा की गुणवत्ता कायम हो सकती है।

बहरहाल, यदि गरीब का बच्चा सरकारी विद्यालय जाता है और उसे सही शिक्षा नहीं दी जाती है और वह शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद अनपढ़ रह जाता है, तो यह सरकार के लिए एक वि‍चारणीय प्रश्न है। सबसे अहम बात यह है कि सरकार शिक्षा में किये जा रहे भेदभाव को मिटाने की ओर पहल करे। देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू हो। सभी के लिए एक जैसा पाठ्यक्रम हो जिससे देश में समरसता का वातावरण बने और शिक्षा के निजीकरण ने अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का जो काम किया है, वह कम हो सके।

बाल मंदिर के पुजारी गिजुभाई : संजीव ठाकुर

15.11.1885-23.06.1939

15.11.1885-23.06.1939

बच्चों के लालन-पालन, विकास और शिक्षा की चिंता करने वाले लोग पूरी दुनिया में हुए हैं। प्रायः सभी ने शिक्षा आदि के प्रचलित तरीकों का विरोध किया है और बच्चों की आजादी की वकालत की है। अपने देश में जिन लोगों ने इस दिशा में चिंतन-मनन किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, अरविन्द घोष, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जाकिर हुसैन, डॉ. अम्बेडकर आदि का नाम ससम्मान लिया जाता है। इस क्षेत्र के नामों में से एक नाम जो इनसे कम महत्त्व का नहीं है, अक्सर लोगों की जुबाँ पर आने से रह जाता है। अक्सर भुला दिया जाने वाला वह नाम है, गुजरात के शिक्षा शास्त्री गिजुभाई का। सच्चाई तो यह है कि काफी अरसे तक लोगों को इस नाम का पता ही नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने और गुजराती में दो सौ से अधिक पुस्तकें लिखने के बावजूद गिजुभाई को गुजरात से बाहर जानने वाले कम ही लोग थे। यह तथ्य तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगता है, जब हमें यह जानने को मिलता है कि गिजुभाई की महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक ‘दिवास्वप्न’ का हिन्दी अनुवाद 1932 में ही हो चुका था।

गिजुभाई के काम को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली दबा सकता है। एक अकेला शख्स! न कोई सरकारी सहायता। न कोई अनुदान! बस अपनी लगन और बच्चों के प्रति लगाव के बल पर वह काम कर डाला, जो किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए भी संभव नहीं है। बच्चों के बीच काम करने के साथ-साथ लेखन के लिए समय निकालना और किसी लेखक से अधिक लिख जाना, इसके अलावा माता-पिता और शिक्षकों के लिए पत्रिका निकालना गिजुभाई जैसे समर्पित और परिश्रमी व्यक्ति के लिए ही संभव था। शुरू में गिजुभाई ने भी कहाँ सोचा था कि उन्हें शिक्षा की दिशा में जाना है? उन्होंने तो वकालत की पढ़ाई की थी और वकालत का पेशा अपनाया था। लेकिन उनकी दिशा बदल गई। उनकी दिशा बदलने का काम किया एक पुस्तक ने जो उन्हें एक मित्र ने पढ़ने को दी थी। ‘मोंटेसरी मदर’  नाम की इस पुस्तक के बारे में स्वयं गिजुभाई ने लिखा है- ‘अगर मुझको किसी ने पहले ही सावधान कर दिया होता कि ‘मोंटेसरी मदर’ नामक पुस्तक पढने से मेरी जीवन-धारा ही बदल जाएगी, जीवन एक नए प्रकाश से जगमगा उठेगा और मुझको एक नई क्रांतिकारी दृष्टि प्राप्त हो जाएगी, तो मेरे जैसा एक वकील इस पुस्तक को अपने हाथ में थामता या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।’ (‘बाल शिक्षण: जैसा मैं समझ पाया’, पृ. 17)

और गिजुभाई केस की वकालत छोड़ बच्चों की वकालत करने लगे, बच्चों के बहुत बड़े वकील बन गए! उन्होंने न केवल बच्चों की आजादी की वकालत की, बल्कि बच्चों को सिखाने-पढ़ाने की परंपरागत पद्धतियों पर भी प्रहार किया और शिक्षा का एक ऐसा मॉडल विकसित कर समाज के सामने रखा कि जिसे अपनाकर समाज बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण तो उपलब्ध करा ही सकता है, प्रताडना और मानसिक दबाव से निजात भी दिला सकता है।

गिजुभाई बच्चों से प्रेम करते थे। वे चाहते थे कि माता-पिता और शिक्षक भी सही मायनों में बच्चों से प्रेम करें। माता-पिता और शिक्षक बालकों के लिए भयहीन माहौल बनाएँ। बिना डाँट-डपट के, बिना मार-पिटाई के उनकी परवरिश करें। उन्हें शिक्षित करें। घर और विद्यालयों को बालकों के सृजनात्मक विकास में बाधक जानकर गिजुभाई बहुत चिंतित होते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘घर और विद्यालय ऐसे स्थल हैं, जहाँ बालकों की सृजनशीलता का सहज स्वाभाविक रीति से विकास होता है और यही वे स्थल हैं, जहाँ उनके सृजन को रोकने, विकृत करने अथवा निर्मूल करने का काम होता है।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, पृ.18)

बच्चों के विकास में सबसे बड़ा बाधक गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट, दंड वगैरह है। गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट या दंड देकर किसी बच्चे को पढ़ाया-लिखाया नहीं जा सकता। ‘अगर ऐसा करने से बालकों की बुद्धि बढ़ सकती हो तो किसी भी बेवकूफ को मारपीट कर बुद्धिमान बना सकते हैं।’ (प्राथमिक शाला में शिक्षक, पृ. 55)

गिजुभाई तो बच्चों को स्वतंत्र वातावरण में रखना और शिक्षित करना चाहते थे। दंड, पुरस्कार, लोभ, लालच से दूर रखकर सच्ची स्वतंत्रता देना चाहते थे। निश्चय ही गिजुभाई के इस स्वतंत्रता-सिद्धांत से स्वतंत्र नागरिक को तैयार किया जा सकता है। लेकिन इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक ले जाने के पक्ष में गिजुभाई नहीं थे। वे यह तो चाहते थे कि बच्चे अपने शरीर से, मन से, आत्मा से स्वतंत्र हों, लेकिन समाज के नियम-कायदे को तोड़कर, सामाजिक परिवेश की उपेक्षा कर गाली-गलौच, मार-पीट करने जैसी आजादी हासिल करना चाहें तो उन्हें ऐसी आजादी न देने के पक्ष में भी गिजुभाई थे। हाँ, बच्चों को स्वनिर्णय लेने और स्वावलंबन की ओर बढ़ाने में गिजुभाई हमेशा आगे रहते थे। उनका तो यह मानना था कि जो बच्चे बड़ों से हर काम पूछकर करते हैं, उन्हें दरअसल रोकने की जरूरत है।

बच्चों को स्वावलंबी बनाने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए गिजुभाई ने यह जरूरी समझा था कि बच्चे छोटे-मोटे काम खुद करें। नहाना, खाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कंघी करना, ऐसे ही काम थे। अपनी शाला में तो गिजुभाई बच्चों से ये काम करवाते ही थे, माता-पिता को भी प्रेरित करते थे कि वे उन्हें ऐसे काम करने से न रोकें।

गिजुभाई बच्चों को पल-पल पिलाए जाते उपदेशों से भी बहुत आहत होते थे। उनका मानना था कि ऐसे उपदेशों से बच्चों का विकास कतई नहीं होता।

गिजुभाई का चिंतन और लेखन बहुआयामी था। एक ओर उन्होंने माँ-बाप को बच्चों के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किताबें लिखीं तो दूसरी ओर शिक्षकों को ‘शिक्षित’ करने के लिए। बच्चों को भाषा-व्याकरण कैसे सिखाएँ? गणित को आसान तरीके से कैसे बतलाएँ? बच्चों को कथा-कहानी क्यों कहें? शिक्षा में चित्रकला, संगीत, कारीगरी को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दें? इन सब पर गिजुभाई ने विस्तार से अपनी कलम चलाई है। इन सब के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियाँ भी लिखी हैं। इन कहानियों के जरिये उन्होंने बच्चों को अलग-अलग तरह की बातें सिखाने का काम किया ही था, कक्षा में बच्चों का मन लगाने का काम भी किया था। खेल-कूद, संगीत, घुमक्कड़ी आदि को अपने विद्यालय में शामिल कर गिजुभाई ने एक ऐसा स्नेहिल वातावरण तैयार किया था कि बच्चे अपने घर ही नहीं जाना चाहते थे। क्या आज ऐसे किसी स्कूल की कल्पना की जा सकती है, जहाँ से बच्चे घर ही नहीं जाना चाहें? ऐसा तो तभी संभव हो सकता है न, जब बच्चों को रोका-टोका न जाए, जबरन ‘ज्ञानी’ न बनाया जाए, उनको अपने मन का काम करने की छूट दी जाए, पढ़ाने की पद्धति अनौपचारिक हो, शिक्षक हाथ में बेंत लेकर चलने के बदले प्यार की छड़ी से काम लें?

अपनी पुस्तक ‘प्राथमिक शाला में शिक्षक’ में गिजुभाई ने विस्तार से लिखा है कि उनके विद्यालय में क्या होना जरूरी है और क्या होना जरूरी नहीं है? इसे पढ़कर पता चलता है कि गिजुभाई कितने मुक्त विद्यालय की चाह रखते थे?

गिजुभाई ने बच्चों का सम्मान किया था, उन्हें प्रेम किया था। इसीलिए उनका ‘बाल मंदिर’ वास्तव में बच्चों की पूजा का स्थान बन सका था और वे शिक्षक न रहकर बच्चों के लिए ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके थे। शिक्षाविद् मधुरी देसाई ने गिजुभाई के व्यक्तित्व के उस पहलू पर गौर करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘गिजुभाई ने माँ जैसी सूक्ष्म दृष्टि और ममता भरी नजरों से बालकों को देखा था और उनके व्यक्तित्व को सजगतापूर्वक विकसित करने का प्रयत्न किया था। सघन मूँछों वाला प्रभावशाली स्वरूप होते हुए भी गिजुभाई बालकों के समीप आ सके और उनका विश्वास पा सके, तभी वे ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके।’ (प्राथमिक शाला में चिट्ठी वाचन, भूमिका)

परंपरागत विद्यालयों में गिजुभाई को बहुत सी बुराइयाँ नजर आती थीं। सजा देना तो एक बुराई थी ही, बालकों को गलत ढंग से पढ़ाना, रटाना, पुरस्कार या लालच देकर कोई काम कराना भी उनकी दृष्टि में बड़ी बुराई थी। इसी तरह गृहकार्य का बोझ देने वाले स्कूल भी उन्हें तनिक न सुहाते थे। गृहकार्य में लगे बच्चों को देखकर गिजुभाई काँप-काँप जाते थे। गृहकार्य बच्चों के लिए उन्हें एक ‘त्रास’ नजर आता था। इतने घंटे पाठशाला में बिताकर आने के बाद गृहकार्य से जूझते बच्चों को देखकर उन्हें दुख होता था। गृहकार्य को वे बच्चों के लिए नुकसानदेह ही मानते थे।

गिजुभाई को बालकों के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ थी। वे शिक्षकों से भी बाल-मनोविज्ञान की समझ की अपेक्षा रखते थे। वे चाहते थे कि शिक्षक हर बात पर बच्चों को रोकें-टोकें नहीं। न ही बच्चों को ‘बेहूदा, आलसी, लापरवाह, ठग, निकम्मा’ आदि कहें। बच्चों पर इन शब्दों से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षक बच्चों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें।

शिक्षा के एक अनिवार्य अंग- परीक्षा को गिजुभाई गैर जरूरी समझते थे। विद्यालयों में ली जाने वाली परीक्षाओं को वे एक ओर मिथ्याभिमान और दूसरी ओर निराशा का जनक मानते थे। परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों में अभिमान का भाव और बुरे अंक लाने वालों में निराशा का भाव देखकर उन्हें निराशा होती थी। विद्यालयों के साथ-साथ घरों में भी तरह-तरह की परीक्षाओं से गुजरते बच्चों को देखकर गिजुभाई को अच्छा नहीं लगता था। दूसरों के हिसाब से ही अपनी जिंदगी जीने का आदी होता आदमी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने लिखा है- ‘परीक्षा शाला में ही नहीं चलती, हमारे घरों में भी तरह-तरह की स्पष्ट-अस्पष्ट परीक्षाएँ चलती हैं। यही कारण है कि आज का मनुष्य अपने भीतर का नहीं रहा, बाहर का बन गया। स्वयं अपने लिए जीने की बजाय बाहर के लिए जीता है। …बाह्य पैमाने पर स्वयं को मापता है और इसी में संतोष एवं सार्थकता का अनुभव करता है। संक्षेप में, वह अपने भीतर से मरकर यानी अपनी आत्मा से मरकर बाहर से यानी शरीर से जीता है।’ (शिक्षक हों तो, पृ. 117)

जाहिर है, मरी हुई आत्मा का मनुष्य मरी हुई जिंदगी ही जिएगा,  मरे हुए समाज का निर्माण ही करेगा। हताशा, कुंठा, अवसाद जैसी मानसिक व्याधियाँ उसे चारों ओर से जकड़ लेंगी।

गिजुभाई बुद्धि की जगह हृदय को महत्त्व देते थे। वे चाहते थे कि बच्चों की बुद्धि से पहले उनके हृदय का विकास हो। ‘क्योंकि अगर मनुष्य का हृदय विकसित हो गया तो उसकी बुद्धि उसे सन्मार्ग पर ले जाएगी।’ इसके लिए वे शिक्षा में संगीत, कला, नाटक, कारीगरी आदि को शामिल करना जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि ‘संगीत व चित्रकला का ज्ञान प्राप्त करने वाला बालक स्पर्धा, द्वेष, क्लेष-तकरार या मारपीट नहीं करेंगे, अपितु वे सौंदर्य के सात्त्विक उपासक बनेंगे। सौंदर्य की सात्त्विक उपासना ने दुनिया में कभी किसी का अहित नहीं किया।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, प्रस्तावना)

गिजुभाई के चिंतन पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को जानने-समझने के बाद हमें यह लगता है कि गिजुभाई ने विदेश के कई शिक्षाशास्त्रियों के साहित्य का अध्ययन-विश्लेषण किया था। और मधुमक्खी की तरह अनेक जगहों से मधु का संचयन कर अपने जीवन में उतारा था। मारिया मोंटेसरी तो उनकी आदर्श ही थीं। इनके अलावा ए.एस. नील, पेस्तालॉजी और प्रोबले के विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया था। लेकिन उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों का अंधानुकरण नहीं किया था। उन्होंने स्वविवेक, स्वानुभव और स्वप्रयोग से भी बहुत कुछ अर्जित किया था। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को भारतीय परिवेश के हिसाब से ही धारण किया था।

गिजुभाई गुजरात के भावनगर में उस समय अपने शिक्षा-संबंधी प्रयोग कर रहे थे, जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। गिजुभाई का काम प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप में ही इस लड़ाई में योगदान तो दे ही रहा था। आजाद बच्चों को तैयार कर प्रकारांतर से वे आजाद देश और आजाद दुनिया ही तो तैयार कर रहे थे। और फिर समय-समय पर वे सीधी तरह आजादी की लड़ाई में शरीक भी तो होते थे। 1930 ईस्वी में बारडोली-सत्याग्रह में शामिल किसानों के बीच वे अपने बच्चों के साथ गए थे। किसानों के छोटे-छोटे बच्चों को एकत्र कर वे उन्हें नहलाते-धुलाते थे, खेलाते थे, गीत-कहानी सुनाते थे, लिखना-पढ़ना सिखाते थे। क्या यह आजादी के आंदोलन में उनका योगदान नहीं था? उन्होंने बच्चों की वानरी सेना बनाकर गाँव-गाँव जाने, प्रभातफेरी निकालने, शराब के ठेकों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग करने का काम भी खूब किया था। तभी तो उनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने लिखा था- ‘गिजुभाई के बारे में कुछ लिखने वाला मैं कौन हूँ? उनके कार्यों ने तो मुझे सदैव मुग्ध किया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनका कार्य आगे बढ़ चलेगा।’ (‘विश्व के शिक्षाशास्त्री’, पृ. 321)

शिक्षा और बच्चों के समुचित विकास की दिशा में गिजुभाई का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। गिजुभाई के विचारों को शिक्षकों तक पहुँचाने हेतु इन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनकी ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक तो सभी शिक्षकों और माता-पिता को निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए। गिजुभाई जैसे शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को अपनाकर शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व के महान् शिक्षाशास्त्रियों की पंक्ति में ससम्मान रखे जाने योग्य गिजुभाई को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जन्म 15 नवंबर 1885 को भावनगर रियासत के चित्तल गाँव में हुआ था और मृत्यु बम्बई में 23 जून 1939 को। उनका पूरा नाम गिरजाशंकर बधेका था। पिता भगवान जी बधेका वकील थे। 12 वर्ष की उम्र में गिजुभाई का विवाह हरिबेन के साथ हो गया था। दुर्भाग्यवश हरिबेन की मृत्यु हो गई। हरिबेन की मृत्यु के बाद 1906 में जड़ीबेन के साथ उनका द्वितीय विवाह हुआ। 1907 में वे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा पर गए थे और 1909 में भारत लौट आए थे। 1910 में बंबई में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की थी और 1913 में हाई कोर्ट में प्लीडर हो गए थे। 1915 में वे शैक्षणिक संस्था ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ के कानूनी सलाहकार बने थे। 1916 से वे दक्षिणामूर्ति में अध्यापन का कार्य करने लगे थे। 1920 में उन्होंने ढाई से पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भावनगर की तख्तेश्वर टेकरी पर ‘बाल मंदिर’ की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन कस्तूरबा गाँधी ने किया था। इस ‘बाल मंदिर’ में बच्चों को वास्तव में मंदिर के देवता की तरह रखा जाता था। 1936 में गिजुभाई ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ से मुक्त हो गए थे। इसी वर्ष कराची में आयोजित बाल मेले में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिरकत की थी। 1938 में राजकोट में उन्होंने एक ‘अध्यापन मंदिर’ की स्थापना की थी। यह उनका अंतिम महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

गिजुभाई ने गुजराती में करीब 225 पुस्तकें लिखी हैं। ‘दिवास्वप्न’, ‘माता-पिता से’, ‘शिक्षक हों तो’, ‘मोंटेसरी पद्धति’, ‘प्राथमिक शाला में शिक्षा-पद्धतियाँ,’ ‘प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा’, ‘चलते-फिरते’ आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘चोर मचाए शोर’, ‘चूहा सात मूँछों वाला’, ‘मुनिया रानी’, ‘नकल बिन अकल’, ‘खड़बड़-खड़बड़’, ‘मेंढक और गिलहरी’, आदि गिजुभाई की पुस्तकें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध हैं। इन कथाओं के जरिये उन्होंने बच्चों को ही नहीं, माता-पिता और शिक्षकों को भी शिक्षित करने का काम किया है।

गिजुभाई की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी बच्चों के माता-पिता और शिक्षक ‘शिक्षित’ हो पाए हैं या नहीं, यह सवाल आज भी उतना ही मौजूँ है। और शायद इसीलिए गिजुभाई की ये पंक्तियाँ भी आज उतनी ही मौजूँ हैं-

‘जब तक बालक घरों में मार खाते हैं
और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय,
बाग-बगीचे और क्रीड़ांगण न बनें
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?’

भारतीय शि‍क्षा सेवा-सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की सिफारि‍शें : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शि‍क्षा में सुधार के लि‍ए सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की दो सि‍फारि‍शें गौर करने लायक हैं। पहली- विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिए एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, जिसकी नियुक्तियां संघ लोक सेवा आयोग करे। दूसरी- आठवीं तक फेल न करने की नीति‍ को बदला जाए। सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की सि‍फारि‍शों और उनके दूरगामी परि‍णामों पर प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

मोदी सरकार द्वारा गठित पांच सदस्‍यीय सुब्रमण्‍यम समिति ने अपनी लगभग दौ सौ पृष्‍ठों की रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सोंप दी है। कुल मोटा-मोटी तैंतीस विषयों पर समिति को विचार करना था और इस समिति के अध्‍यक्ष थे- पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर.सुब्रमण्‍यम, जो प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ अपने प्रखर विचारों, लेखों और सामाजिक सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं। उम्मीद के मुताबिक समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिनमें एक सिफारिश अभूतपूर्व ही कही जाएगी। यह है-विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिए एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, जिसकी नियुक्तियां भी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सिविल सेवा परीक्षा की तर्ज पर हों। विश्‍वविद्यालयी शिक्षा सुधार के लिए यह बहुत जरूरी और दूरगामी कदम होगा। यों शिक्षा समवर्ती सूची में है, लेकिन विश्‍वविद्यालयों के निरंतर गिरते स्‍तर को रोकने के लिए यह तुरंत किया जाना चाहिए। विश्‍वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती में राजनीति, भाई-भतीजावाद, जातिवाद और पिछले दिनों अन्‍य भ्रष्‍टाचार का ऐसा बोलबाला हुआ है कि पंसारी कि दुकान कि नौकरी और विश्‍ववि‍द्यालय कि नौकरी मे अंतर नहीं बचा। रोज-रोज बदलती नेट परीक्षा, पी.एच.डी में उम्र के मापदंडों ने पूरी पीढ़ी का विश्‍वास खो दिया है। फल-फूल रहें हैं, तो राजनीतिक शोधपत्र लाइनों पर खड़े शिक्षक संगठन और उनके नेता। नतीजन बावजूद इसके कि इनके वेतनमान, पदोन्‍नति और अन्‍य सुविधाएं अखिल भारतीय केन्‍द्रीय सेवाओं के समकक्ष है, न इनकी रूचि पढ़ाने में है न शोध में। सिफारिश, भ्रष्‍टाचार के जिस पिछले दरवाजों से इनकी भर्ती हुई है, पूरी उम्र ये शिक्षक और इनके संगठन उन्‍हीं के इशारों पर नाचते रहते हैं। इसीलिए न शोध का स्‍तर बचा है न अकादमिक माहौल का। यही कारण है कि प्रतिवर्ष अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया से लेकर पूरे यूरोप में पढ़ने के लि‍ए भारतीयों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। एक तरफ विदेशी मुद्रा का नुकसान, देश से प्रतिभा पलायन और दूसरा अपने संसाधनों का बेकार होते जाना- बेरोजगारी का बढ़़ना। क्‍या हमारे विश्‍वविद्यालयों  को उस पैमाने पर विश्‍वविद्यालय कहा जा सकता है, जहां कुछ संख्‍या विदेशी छात्रों की हो या मेधावी विदेशी विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसरों, शिक्षकों की? उत्‍तर भारत में तो स्थिति यह है कि दक्षिण भारत का भी शायद ही कोई छात्र मिले। केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों में जरूर उम्‍मीद बची है, लेकिन पतन वहां भी तेजी से जारी है। अखिल भारतीय सेवा का गठन भर्ती की बुनियादी कमजोरी को दूर करेगा। कम-से-कम यू.पी.एस.सी. जैसी संस्‍था की वस्‍तुस्थिकता, ईमानदारी, प्रगतिशील रूख पर पूरे देश को फख्र है। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि मोदी सरकार ऐसी ही भर्ती प्रणाली न्‍यायिक सेवा में भी लाएगी। यही कदम सिद्द करेंगे कि क्‍यों यह पूववर्ती सरकारों से भिन्‍न है।

दूसरी महत्‍वपूर्ण मगर उतनी ही विवादास्‍पद सिफारिश आठवीं तक बच्‍चों को फेल-पास न करने की नीति को उलटना और बदलना है। शिक्षा अधिकार अधिनियम में यह व्‍यवस्‍था की गई कि किसी भी बच्‍चे को आठवीं तक फेल नहीं किया जाएगा। उदेश्‍य यह था कि‍ जो बच्‍चे जल्दी स्‍कूल छोड़ देते हैं, उनको एक स्‍तर तक पढा़ई के लिए स्‍कूल में रोका जा सके। मगर कार्यान्‍वयन की खामियों की वजह से स्‍कूली शिक्षा की गुणवत्‍ता में भयंकर गिरावट आई है और इसलिए देश के अधिकांश राज्‍य इसके खिलाफ हैं। अठारह राज्‍यों में इसे हटाने का अनुरोध केन्‍द्र सरकार से किया है, जिनमें कर्नाटक, केरल, हरियाणा से लेकर दिल्‍ली जैसे राज्‍य भी शामिल हैं। शिक्षा का अधिकार कानून केन्‍द्र सरकार का बनाया हुआ है। अत: वही इसमें राज्‍यों के सुझावों और अब सुब्रमण्‍यम समीति‍ की सिफारिशों के मद्देनज़र परिवर्तन कर सकती है। किसी भी तर्क से केवल स्‍कूल में रोकना ही शिक्षा का मकसद नहीं हो सकता। बच्‍चे को कुछ ज्ञान, जानकारी, लिखना-पढ़ना भी आना चाहिए।

एन.सी.ई.आर.टी. और दूसरी संस्‍थाओं द्वारा समय-समय पर किए सर्वेक्षणों, अध्‍ययनों में यह सामने आया है कि अकेली इस नीति ने शिक्षा का नुकसान ज्‍यादा किया है। हाल के परिणाम भी इसके गवाह हैं। दिल्‍ली के दो स्‍कूलों में कक्षा नौ में लगभग नब्‍बे प्रतिशत बच्‍चे फेल हो गए। कारण आठवीं तक कोई परीक्षा न होने की वजह से उन्‍होंने कुछ सीखने की जहमत ही नहीं उठाई। अधिकांश मामलों में तो वे स्‍कूल भी नहीं आते। सुब्रमण्‍यम समिति ने पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा की अनुशंसा की है और यह भी कि फेल होने वाले छात्र को तीन मौके दिए जाएं और स्‍कूल ऐसे कमजोर बच्‍चों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्‍त व्‍यवस्‍था, सुविधाएं जुटाएं। केवल स्‍कूल प्रशासन ने ही नहीं अभिभावकों ने भी इन सिफारिशों का स्‍वागत किया है। पुरानी नीति में थोड़ा सा बदलाव भी तस्‍वीर बदल देगा।

समिति की कुछ और सिफारिशें पुरानी बातों की पुनरावृत्ति माना जा सकता है। जैसे- विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग, ए.आई.सी.टी.ई का पुनर्गठन जिससे ये संस्‍थाएं और प्रभावी बनाई जा सकें। देश में विदेशी विश्‍वविद्यालयों  को अनुमति भी पुरानी सरकार देना चाहती रही है। देखना यह है कि इन मसलों पर जमीन पर राष्‍ट्रीय हित में परिवर्तन संभव होगा। तीन भाषा फार्मूले पर भी समिति उसी पुरानी नीति पर चलने के लिए कह रही है, जो वर्ष 1968 और वर्ष 1986 की शिक्षा नीति में शामिल था।

भाषा के मसले पर इस समिति से पूरे देश को ज्‍यादा उम्‍मीदें थी और नई मोदी सरकार ने सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं के पक्ष के संदर्भ में इसे लागू भी किया था। वर्ष 2011 में यूपीए सरकार ने मनमाने ढंग से सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में अंग्रेजी लाद दी थी, जिससे भारतीय भाषा में सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या पन्‍द्रह प्रतिशत से घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गयी थी। मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में इसे उलट दिया था। यों एक और समिति वी.एस. पासवान पूर्व सचिव की अध्‍यक्षता में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का जायजा ले रही है और उम्‍मीद है कि यह समिति दूसरी अखिल भारतीय सेवाओं जैसे- वन सेवा, चिकित्‍सा, इंजीनियरिंग आदि में भी भारतीय भाषाओं की शुरुआत करेगी। लेकिन सुब्रमण्‍यम समिति जैसी सर्वोच्‍च स्‍कूली और विश्‍वविद्यालयी दोनों स्‍तरों पर शिक्षा अपनी भाषाओं में देने की सिफारिश करती तो अच्‍छा रहता। सुब्रमण्‍यम उत्‍तर प्रदेश कैडर के अधिकारी रहे हैं, तमिलभाषी हैं और अपनी ताजा किताब ‘टर्निंग पांइट’ में अपने बचपन को याद करते हुए उन्‍होंने भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने की तारीफ और वकालत की है। विद्वानों की इतनी बडी़ समिति से ऐसे राष्‍ट्रीय मुद्दे पर तो देश को उम्‍मीद रहती ही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के सरकारी स्‍कूलों में सुधार (अगस्‍त, 2015) कर्मचारियों को पढ़ाने की अनिवार्यता पर भी समिति और सरकार को दखल देना चाहिए।

समिति की सिफारिशें मानव संसाधन मंत्रालय के पास हैं। उम्‍मीद है समिति की सिफारिशों और जनाकाक्षाओं को मूर्तरूप देने में मंत्रालय विलंब नहीं करेगा। न बार-बार ऐसी समितियां ऐसे क्रांतिकारी सुझाव देती न तुरंत कार्यान्‍वयन करने वाली सरकारें ही सत्‍ता में आतीं। यथास्थितिवाद को ऐसे ही कदम तोड़ेगे।

संवाद से खुली शिक्षा की राह : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

प्रमोद दीक्षित

प्रमोद दीक्षित

यही कोई दो-ढाई वर्ष पहले की बात है। वे जाड़े के दिन थे। उस दिन आसमान में सूरज का कहीं अता-पता न था, बादल हवा के साथ तैर रहे थे। नरैनी बीआरसी में मेरी नियुक्ति के ये शुरूआती दिन थे। मेरे साथ ही चार अन्य सहयोगी भी थे। मैं ठंड दूर करने के लिए हथेलियों को आपस में रगड़ रहा था। लेकिन ठंढ तन-मन में हावी थी। कुछ लकड़ियां जुटाकर हम सबने बाहर खुले में आग तापने का निश्चय किया। हालांकि, लकड़ियां गीली थीं और धुंवा उगल रही थीं, जो आंख-नाक में घुस रहा था। लेकिन इन्ही सीली लकड़ियों में आग भभकने की आशा में हम चारों ओर बैठे बातें कर रहे थे। तभी मेरे मोबाइल की घण्टी बजी। उधर से एक गांव का नाम लेते हुए खण्ड शिक्षा अधिकारी का निर्देश मिला, ‘‘इस गांव में ग्रामीणों ने प्राथमिक विद्यालय में ताला डाल दिया है। आप वहां जाइए। कैसे भी बने, बात करके ताला खुलवाकर शाम तक रिपोर्ट दीजिए।’’ इसके पहले कि मैं कुछ और पूछ पाता फोन कट गया। मैंने उस गांव के बारे में अपने सहयोगियों से कुछ जरूरी जानकारी जुटायी। कुछ अन्य स्रोतों से भी वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास किया तो पता चला कि वह गांव बागैं नदी के उस पार बीहड़ में स्थित है, लेकिन क्षेत्र में उस गांव की पहचान एक पढ़े-लिखे समझदार गांव के रूप में है। वहां के कुछ लोग नौकरियों में भी हैं। मालूम हुआ कि गांव के लोग अध्यापकों के कार्य-व्यवहार से खासे नाराज हैं। यह भी ज्ञात हुआ कि एक स्वयंसेवी संस्था वहां पिछले तीन सालों से आजीविका और शिक्षा के मुद्दे पर काम कर रही है और विद्यालय में ताला डालने के लिए लोगों को उसने ही उकसाया है। जाने से पहले मैंने वहां कार्यरत शिक्षकों से बात कर प्रकरण को समझने की कोशिश की, लेकिन सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। मैंने साथ चलने के लिए सम्बंधित संकुल प्रभारी से सम्पर्क किया तो ज्ञात हुआ कि वह दो दिन से बुखार से पीड़ित हैं और कहीं आ-जा पाने की स्थिति में नहीं हैं। सहकर्मियों ने कुछ अति‍आवश्यक कार्य पूरे करने का रोना रोया। आखिर ओखली में सिर कौन देना चाहेगा। खैर, मरता क्या न करता, मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और अकेले ही चल पड़ा।

वह विद्यालय मेरे कार्यालय से लगभग 25 किमी दूर था। बाइक आगे बढ़ी जा रही थी और कस्बा पीछे छूट रहा था। मैं चिंतित था। मन में अनेक प्रश्न कौंध रहे थे। आखिर गांव के लोगों ने विद्यालय में ताला क्यों डाला होगा? शिक्षकों ने क्या गड़बड़ कर दी होगी? संस्था के लोगों ने गांववालों को ऐसा करने के लिए क्यों उकसाया होगा? इसी उधेड़बुन और मन ही मन सवालों के उत्तर खोजता मुख्य मार्ग से अब मैं सम्पर्क मार्ग में आ चुका था। मार्ग के दोनो ओर दूर-दूर तक फैले धान के खेत मन मोह रहे थे। पकते धान की महक अच्छी लग रही थी। मेंड़ों पर लगे बबूल के पेड़ों से रिसते गोंद को खाते पक्षियों के झुण्ड और उनका कलरव वातावरण में स्वर लहरी बिखेर रहा था। पल भर को मन उनमें रमता और दूसरे ही पल तमाम आशंकाओं से घिर जाता। एक अज्ञात भय मेरी पोर-पोर में समाया जा रहा था। अचानक एक बाज पक्षी बिल्कुल मेरे सिर के ऊपर से किसी ‘फाइटर प्लेन‘ की तरह झपट्टा मारते हुए सामने के खेत से एक चूहे को पंजों में दबोच ले गया और एक सियार दाहिनी ओर के खेत से निकल सड़क पार कर जंगली झाड़ियों में घुस गया। विचारों का जाल एकदम से छिन्न-भि‍न्‍न हो गया और मैं कल्पना लोक से यथार्थ की खुरदुरी पगडंडी पर हिचकोले खाते आगे बढ़ने लगा। अब खेतों की माटी का रंग और बनावट बदलने लगी थी। खेतों में अरहर और ज्वार-बाजरे की फसल अपने यौवन में हवा के साथ बलखाती नाच रही थी। मैं प्रकृति का यह हरापन आंखों में भर लेना चाहता था। मैंने बाइक बन्द की और दोनों हाथों को फैलाकर ताजी हवा को खींच कर फेफड़ों में भर लिया। ऊपर आसमान में बादलों के बीच से सुनहरी किरणें फूट रही थीं। उस समय मैं दुनिया का सबसे खुश आदमी था। लेकिन सामने नजर जाते ही मेरे होश उड़ गये क्योंकि नदी का बालूभरा पाट मेरी परीक्षा लेने को तैयार प्रतीक्षारत था। नदी में पुल नहीं था। एक बारगी लगा कि कहीं रास्ता तो नहीं भटक गया। मैं नदी पार करने के बारे में सोच ही रहा था कि पीछे से किसी ने आवाज दी,‘‘बाबू जी, कैथा-महुआ के पेड़ के नीचे से ढलान मा बस नाक कै सीध चले जाव। कच्चा पुल से नदी पार करतै चढ़ाई मा गांव मिल जाई।’’ मैंने अपने पीछे खेत में काम कर रहे उस वृद्ध किसान से विद्यालय और वहां हुई घटना के बारे में जानकारी ली और धन्यवाद दे आगे बढ़ गया। गांव नदी पार करते ही ऊपर टीले में था। मैं गांव में प्रवेश कर चुका था। अब वह विद्यालय और वहां की भीड़ दिखाई पड़ने लगी थी। मैं अपने आपको मन ही मन तैयार कर रहा था।

जब मैं विद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुंचा तो लगभग आधा दिन बीत चुका था। बाहरी गेट खुला हुआ था। विद्यालय के चैनल और अन्य कक्षा-कक्षों पर दो-दो ताले पड़े हुए थे। कुछ बच्चे अपने बस्ते लिए इधर उधर घूम रहे थे। कुछ बच्चे बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे थे। कुछ गिप्पी-गेंद और कुछ बच्चे एक लकड़ी के फट्टे के बैट और कपड़े के गेंद से क्रिकेट खेल रहे थे। लड़कियों की संख्या काफी कम थी और लगभग छोटी उम्र की थीं। वे अपने एक बड़े समूह में खो-खो खेल रही थीं तो चार लड़कियों का एक छोटा समूह पूरी घटना से बेखबर ‘गोट्टा‘ खेलने में व्यस्त और मस्त था। महिलाएं भी थीं लेकिन उनकी सक्रिय सहभागिता नहीं थीं। वे केवल मूकदर्शक थीं और सम्भवतः विभाग पर दबाव बनाने के लिए उनको प्रयोग किया जा रहा था। वे लम्बा घूंघट काढ़े भीड़ के एक ओर खड़ी आपस में बातें कर रही थीं और घूंघट को केवल दो अंगुलियों से अजीब प्रकार से मोड़कर उन अंगुलियों के बीच में से पूरी भीड और घटनाक्रम़ पर नजर रखे हुए थीं।

शायद, वहां उपस्थित शिक्षक ने मुझे देख लिया था और उत्साह से मेरी ओर लपकते हुए बोल पड़ा, ‘‘साहब आ गये, साहब आ गये।’’ लोगों के चेहरे मेरी ओर मुड़ गये। मैं उनके चेहरों पर आक्रोश और व्यवस्था के प्रति विद्रोह के भाव स्पष्ट पढ़ पा रहा था। मैं उनके और समीप पहुंच चुका था। ऐसी भीड़ से यह मेरा पहला सामना था और मैं अन्दर से डर रहा था। हालांकि, मैंने स्वयं को दृढता और विश्वास से भरा बनाये रखने की पुरजोर कोशिश की हुई थी। लेकिन सच सही था कि मैं किसी अनहोनी और एक अनजाने भय से ग्रस्त था।

मुझे वहां कोई नहीं जानता था। उस शिक्षक ने गांववालों से मेरा परिचय कराया। मैंने गांववालो को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए समझाया, ‘‘देखो, विद्यालय एक सरकारी सम्पति है। बच्चों की पढ़ाई को जबरन रोकना, दरवाजों पर ताला डालना, भवन का दुरुपयोग करना, किसी भी प्रकार की तोड़-फोड़ करना और सरकारी काम में बाधा पहुंचाना अपराध हैं। आपसे अनुरोध है कि सभी ताले खोल दें ताकि पढ़ाई सुचारू रूप से चल सके। आपकी जो समस्यायें या मांगें हैं, वे सब मुझसे कहें। मैं आपकी बात सक्षम अधिकारियों तक पहुंचा कर समाधान निकालने का भरसक प्रयास करूंगा।‘‘

मैंने देखा कि मेरी चेतावनी का उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था। उनकी मांग थी कि बेसिक शिक्षा विभाग का कोई बड़ा अधिकारी आए, तभी ताला खुलेगा और बातचीत होगी। उन लोगों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया और मुझ पर एक साथ हजारों प्रश्नों की बौछार कर दी। मैं संकट में फंस चुका था। मैंने सोचा कि यदि मैंने वहां उपस्थित व्यक्तियों से अब गर्म तेवर में बात की तो मामला और उलझ सकता है। क्योंकि वहां मौजूद हर व्यक्ति उत्तेजित था और आक्रामक भी। जिसके मन में जो आ रहा था, वह बोल रहा था। कुछ किशोर-से लड़के बीच-बीच में चैनल में दो-चार लात भी मार दे रहे थे, शायद विकृत व्यवस्था के प्रति गुस्से के इजहार का उनका अपना तरीका था। भीड़ का एक हिस्सा चारदीवारी को तोड़े दे रहा था। उन्हें लग रहा था कि हिंसक व्यवहार ही समाधान है। वहां जोर-जोर से आवाजें आ रही थीं। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। सब अपनी-अपनी हांक रहे थे। वह भीड़ थी, वहां कोई नेता नहीं था या यह कहूं कि वहां हर कोई अपने आप को दूसरे से ज्यादा बड़ा नेता दिखाने की अघोषित होड़ में शामिल था। उसका कारण था कि निकट भविष्य में ग्राम पंचायत के चुनाव होने वाले थे।

मैंने भीड़ से कहा कि इस तरह हल्ला-गुल्ला और तोड़-फोड़ करने से  किसी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। संवाद से रास्ते खुलते हैं। आपका गुस्सा जायज हो सकता है। लेकिन याद रखिए, गुस्से में भटकाव की सम्भावना हुआ करती है। क्यों न हम सभी आराम से बैठ कर बातचीत करें। विद्यालय और शिक्षकों को लेकर आपकी जो भी समस्यायें हैं, प्रश्न हैं या अपेक्षाएं हैं, बेझिझक कहिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि‍ आपको समाधान मिलेगा। मेरे इस प्रस्ताव पर बुजुर्ग सहमत होते दिखे, लेकिन नये उत्तेजित खून ने उन्हें मोड़ दिया। डोर मेरे हाथ में आते-आते रह गई। एक बार फिर परिसर में नारेबाजी होने लगी। उनमें किसी उच्चाधिकारी से बात करने की जिद थी। मैं लगभग असहाय था, लेकिन हार मानने को तैयार न था। मैंने फिर कोशिश की।

अब मैंने उन बुजुर्ग लोगों, को जो अब तक मेरी बातें ध्यान से सुन रह थे और कहीं न कहीं सहमत थे,  तथा संस्था के कार्यकर्ता से भी आग्रह किया कि ताला खुलवायें। लोकतांत्रिक तरीके से ही समाधान निकलेगा। बातचीत ही अंतिम रास्ता है। मैंने उन लोगों की अपने अधिकारी से भी बात करवाई। आखिर वे ताला खोलने और बैठने को तैयार हो गए।

उन लोगों ने अपने अन्य साथियों से बात कर सभी ताले खोल दिए और शिक्षक बच्चों को कक्षाओं की ओर ले जाने लगे। मैंने संतुष्टि की एक गहरी सांस ली। गला सूख रहा था और उस ठंड में भी मैंने एक गिलास पानी गटक लिया।

मैं किसी कमरे में समुदाय के कुछ चयनित लोगो के साथ बैठना चाह रहा था ताकि शान्त और बेहतर वातावरण में बातें हों और टकराव से बचा जा सकें। लेकिन उन लोगों की इच्छा थी कि बाहर खुले में बैठा जाए ताकि सब लोग अपनी बात रख सकें और बातचीत की पारदर्शिता बनी रहे। विद्यालय से दरियां और प्लास्टिक की चटाइयां निकाल कर बरगद के नीचे चबूतरे पर बिछा दी गईं। लगभग शान्ति थी। हां, कभी-कभी बरगद पर बैठे किसी कौवे की कांव-कांव से नीरवता जरूर भंग होती, लेकिन थोड़ी देर में वह उड़ गया। आकाश में बादलों का छंटना शुरू हो गया था।

अब वहां पर शिक्षकों, अभिभावकों, विद्यालय प्रबन्ध समिति के सदस्यों, पंचायत प्रतिनिधियों एवं गांव के अन्य लोग एक साथ बैठे थे। मैंने अनुरोध किया कि यह एक अच्छा अवसर है कि हम प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी, शिक्षकों से अभिभावकों की अपेक्षाएं तथा शिक्षकों की पालक अभिभावकों से अपेक्षाएं क्या हैं, इस पर बात कर सकते हैं। मैंने एक दांव और चला कि आप सब खुले मन से अपने विचार और सुझाव रखें कि इस विद्यालय को बेहतर कैसे बनाया जाए। बच्चों को एक रचनात्मक वातावरण मिले और बच्चों का बिना बाधा के सीखना संभव हो सके। यह दूसरों के दोष गिनाने का समय नहीं है। हम सबको मिलकर साथ-साथ कदम बढ़ाना होगा, तभी हम सही मायनों में शिक्षा उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेंगे। मैं देख रहा था कि‍ वे शान्त मन एवं स्थिर जरूर थे लेकिन उनमें हरेक के अन्दर एक ज्वालामुखी धधक रहा था और भभकता लावा बाहर निकलने को व्यग्र था।

चुप्पी तोड़ते हुए एक युवा अभिभावक ने कहा कि स्कूल कभी भी समय से नहीं खुलता। बच्चे इधर-उधर खेलते-घूमते रहते हैं और अक्सर लड़ने-झगड़ने लगते हैं। किसी दिन कोई बच्चा चोटहिल हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा। दूसरे कोने से एक बुजुर्ग का आक्रोश फूटा,  ‘‘क्या कारण है कि कक्षा 3, 4 व 5 के बच्चें भी हिन्दी की किताब नहीं पढ़ पाते और गणित के सामान्य सवाल हल करने में कठनाई आती है?’‘ मेरे पास बैठे व्यक्ति, जो शायद कहीं नौकरी करते हैं और छुट्टी में घर आए थे, ने कहा कि यहीं विद्यालय के पास में मेरा घर है और जब मैं यहां होता हूं तो देखता हूं कि शिक्षक बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर पिटाई करते हैं। उन्हें मुर्गा बना देते हैं, गदहा और बेवकूफ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। साहब, क्या ऐसे शब्दों का प्रयोग उचित है? तभी उस बात में जोड़ते हुए एक नवयुवक जो शायद कस्बे के किसी निजी स्कूल में शिक्षक है, ने अपनी बात कही कि यहां के अध्यापक कहते हैं कि बच्चे कुछ सीखते नहीं हैं। मै एक बात जानना चाहूंगा कि उन्होंने सीखने के कैसे और कितने अवसर बच्चों को उपलब्ध कराए हैं? वे बच्चों को कितना समझते हैं? क्या पाठ रट लेना ही सीखना है? तभी पीछे खड़ा एक युवक तीखे स्वर में बोला कि यहां के अध्यापक कक्षा में ही गुटका-तम्बाकू चबाते रहते हैं और बच्चों से ही दुकान से गुटका मंगवाते हैं। क्या यह ठीक आचरण है।

मैं देख रहा था कि अध्यापकों के सिर झुके हुए थे। इन बातों को सुनकर वहां उपस्थित शिक्षकों के चेहरों में तमाम भाव आ-जा रहे थे। उनमें से एक ने कहा कि विद्यालय में हम दो शिक्षक हैं। एक शिक्षामित्र और मैं सहायक अध्यापक। विद्यालय का चार्ज भी मेरे पास है। मुझे विभागीय कार्यों जैसे एमडीएम का खाद्यान्न उठाने, छात्रवृत्ति हेतु बैंक में बच्चों के खाता खोलवाने, बन रहे एकल कक्ष की सामग्री खरीदने एवं अचानक आ गए अन्य कार्यों को करने हेतु न चाहते हुए भी स्कूल से बाहर जाना पड़ता है। बैठकों में संकुल एवं बीआरसी जाना होता है। वहीं शिक्षामित्र का दूरस्थ बीटीसी का प्रशिक्षण बीआरसी में चल रहा है। उसकी ड्यूटी मतदाता सूची संशोधन कार्य में भी बीएलओ के रूप में पिछले छह महीनों से लगी है और तहसील की भागदौड़ बनी रहती है। इसके अलावा वह पल्स पोलियो अभियान में भी अपनी सेवाएं दे रहा है। हममें कमियां हो सकतीं हैं, इसके बावजूद हमारी कोशिश रहती है कि विद्यालय समय से और नियमित खुले। बच्चों को बेहतर शैक्षिक माहौल दे पायें। हमें आपसे सहयोग भी नहीं मिलता। कोई भी बच्चा नियमित नहीं आता है। जो बच्चे एक दिन आते हैं, वो दूसरे दिन नहीं आते और दूसरे दिन आने वाले बच्चे अगले दिन नहीं आ पाते। इस कारण हम विषय को आगे नहीं बढ़ा पाते और वहीं उलझे रहते हैं। जबकि हम देखते हैं कि अभिभावक बच्चों को विद्यालय न भेजकर अपने साथ खेतों पर काम करने ले जाते हैं।

इतना सुनते ही एक प्रौढ व्यक्ति, जो शायद खेतों से सीधे चला आया था और पास ही घास का गट्ठर रखे बैठा था, लगभग चिल्लाते हुए बोला,  ‘‘ देखा साहब, जब लड़कन-बिटियन का स्कूल मा कुछ सीखैं का ना मिली तो हम उन्हैं काहे का इस्कूल भेज कै टाइम बरबाद करी। तौ अपने साथ लेवा जाइत है कि खेती-किसानी का काम सीख लेंय अउर हमार बोझा हल्काय।’’ अन्य गांववासियों ने भी उसकी बात में हां मिलाई और कहा कि यह बात सोलह आने सच है।

मैंने विद्यालय में लड़कियों की कम संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आप लोगों को चाहिए कि लड़कियों को विद्यालय भेजें। लड़कियों के शिक्षित हुए बिना विकास की बात बेमानी है। फिर उन्हें दूसरे घर जाना है। उनका समर्थ और सशक्त होना बहुत जरूरी है। मेरी इस बात पर महिलाओं की ओर से किसी ने कुछ कहा जो मैं दूर होने के कारण सुन न पाया। तब कालेज जाने वाले एक छात्र ने उस महिला की बात को साझा करते हुए कहा कि विद्यालय में कोई शौचालय न होने के कारण वे अपनी सयानी लड़कियों को नहीं भेजते। उसने एक बात अपनी ओर से जोड़ी कि यहां लड़कियों का नाम देर से लिखाते हैं। इस कारण कक्षा 5 तक आते-आते वे 14-15 साल की हो जाती हैं। नरम वातावरण में हमारा संवाद गति पकड़ रहा था और हम सही दिशा में जा रहे थे। लोग बेझिझक अपनी बात कर रहे थे। विद्यालय के प्रति उनकी सकारात्मक सोच को मैं समझ रहा था। तभी किसी के घर से एक लड़का चाय लाया और गिलासों में आठ-दस लोगों को चाय दी। चाय अच्छी थी, चीनी के साथ बहुत हल्का-सा नमक भी डाला गया था। थोड़ी गरमाहट का अनुभव हुआ। बातों का क्रम फिर चल पड़ा। लेकिन अब गुस्सा नहीं एक दूसरे को समझने और सहयोग देते हुए विद्यालय को बेहतर बनाने का दोस्ताना भाव था। संवाद से शिक्षा की राह खुल रही थी।

मेरे ठीक बगल में बैठे गांव के तीस वर्ष तक प्रधान रहे एक वृद्ध ने कहा कि आज जो कुछ भी यहां हुआ उसका खेद है। लेकिन यह लाभ भी हुआ कि वास्तविकता को समझ पाए हैं। मन को पढ़ पाए हैं। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि आज विद्यालय और समाज की दूरी बढ़ी है। विद्यालय के विकास में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। जबकि सरकार विद्यालय के विकास में समाज की भूमिका को महत्व दे रही है। लेकिन शिक्षक कभी भी गांव से सलाह-मशविरा नहीं करते। कभी किसी प्रकार का सम्पर्क नहीं करते। वे मोटर साइकिल से आते हैं और चले जाते हैं। आज शिक्षक एक सरकारी कर्मचारी बन कर रह गया है। जिसमें बच्चों और इस विद्यालय के प्रति अपनेपन का भाव नहीं हैं। समाज से भी कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि यह विद्यालय बहुत पुराना है। अब नया और पक्का भवन जरूर बन गया है, लेकिन इसमें प्राण नहीं हैं। अपने विद्यार्थी जीवन की यादें साझा करते हुए बोले कि तब यह भवन कच्चा था और खपरैल थी। इसकी देखरेख अभिभावक और गांव के अन्य लोग मिलकर करते थे। शिक्षक भी बच्चों से अपने बच्चों जैसा व्यवहार करते थे और कोई भेदभाव नहीं था। शिक्षकों का गांव के प्रत्येक घर में आना-जाना था। और सबके सुख-दुख में सहभागी थे। हम सब ने अपनी शुरुआती पढ़ाई इसी विद्यालय से पूरी की और कई उपलब्धियां हासिल की थीं।

तभी एक बुजुर्ग बोला कि क्या ज्ञान किताबों में ही मिलता है? गांव में तमाम कामों में कुशल और कलाओं में दक्ष लोग हैं, जिनको स्कूल में बुलवा कर बच्चों को सिखवाया जाए तो बच्चें हुनर में भी प्रवीण हो जाएंगे। मुझे उनकी बात में बडा दम नजर आया। मैने अनुरोध किया कि अपनी बात को खुल कर बताएं। उन्होनें कहा कि हमारे गांव में मिट्टी के बर्तन बनाने, बांस से पंखा-डलिया बनाने, जूट से चटाई-पाखरी बनाने के पुस्तैनी काम होते हैं। आज के बच्चे ये काम सीखने में शर्माते हैं। ये कला नष्ट होने की कगार पर है। मेरा सुझाव है कि यदि इन्हे स्कूल से जोड़ दिया जाए तो वे इसके महत्व को समझेंगे और यह कला बची रहेगी।

शाम घिर आई थी। समस्या का समाधान भी लगभग हो चुका था। अब चलने की बेला थी। मैंने सबके सहयोग के लिए आभार ज्ञापित करते हुए अनुरोध किया कि इस विद्यालय में आपने पढ़ा और अब आपके बच्चे भी पढ़ रहे हैं। यह विद्यालय आपका है। यह इस गांव की सम्पति है, साझी विरासत है। इसकी रक्षा करना आपका नैतिक और सामाजिक दायित्व है। सबके चेहरे खिले हुए थे। रोम-रोम से उत्साह छलक रहा था। वे मुझे छोड़ने गांव के छोर तक आए।

उस विद्यालय से बराबर सम्बंध बना रहा। बाद में उस पूरी ग्राम पंचायत के शिक्षकों के साथ खण्ड शिक्षा अधिकारी ने बैठक कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। वे शिक्षक अब वहां नहीं हैं, लेकिन नई भर्ती में तीन नए शिक्षकों की नियुक्ति हो गई है। और हां, एक प्रधान अध्यापक भी पहुंच गए हैं। स्थितियां पहले से अच्छी हैं लेकिन कोई उल्लेखनीय बहुत बड़ा बदलाव हम नहीं कर पाए हैं। हम सबकी सीमाएं हैं। लेकिन गांव सन्तुष्ट है और मैं..? शायद नहीं,  क्योंकि अभी बहुत कुछ करना शेष है।

गंभीर सवालों में शिक्षा : प्रेमपाल शर्मा

suicide

कोटा और दूसरे शहरों में आत्महत्या की खबरों को हत्या कहना ज्यादा सही होगा। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी किसी खबर या घटना पर देश के पुरस्कृत लेखक, बुद्धिजीवियों, कलाकारों ने कभी कोई प्रतिक्रिया न दी, न देंगे। इससे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा क्या हो सकता है, जब बच्चे कुछ आरोपित सपनों को पूरा न कर पाने की हताशा में मां-बाप, समाज, दोस्तों की टेढ़ी, व्यंग्य भरी नजरों से भयभीत अपनी ही जान दे देते हैं। बरसों से यह हो रहा है। मगर इस साल तो अति ही हो गई है। अभी तक अकेले कोटा शहर में दो दर्जन आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। मान कर चलिए कि इससे कई गुना ज्यादा होंगे। दूसरे शहरों में भी और जिन्हें लोकलाज से छिपाया भी जाता रहता है। आखिर दोष किसका है? बच्चों का तो कतई नहीं। वे तो कच्चे मिट्टी हैं जैसा ढालोगे, पकाओगे वैसा ही वे बनेंगे। आत्महत्या से पहले छिपाकर छोड़ी गई पर्चियां दिल दहलाने वाली हैं। ‘यदि मम्मी सेलेक्शन नहीं हुआ तो किसी से नजरें नहीं मिला पाऊंगी। मैं चाहती थी कि आप मुझ पर गर्व करें।’ एक और पर्ची की इबारत, ‘मां मैं बहुत प्रेशर में था। पापा के पैसे भी बर्बाद हुए। मैं मजबूर हूं।’ कोई और देश होता तो पूरा समाज तंत्र सड़कों पर उतर आता।

बीस बरस पहले लंदन के नजदीक एक बच्चे की स्कूल में लाश मिली थी तो हफ्तों अखबारों में यह मौत सुर्खियों में रही थी। यहां पसरी चुप्पी बताती है कि हम सब इन आत्महत्याओं के दोषी हैं। उन्हें उकसाते हैं। दुनिया के सामने हमारे सारे बड़बोले राजनेता इस बात पर तो इतराते हैं कि दुनिया की सबसे नौजवान आबादी भारत में है, लेकिन क्या इन नौजवानों के सपनों को कोई जगह व्यवस्था दे पा रही है? न पढ़ने के लिए पर्याप्त मेडिकल कॉलेज, न अच्छे इंजीनियरिंग या दूसरे शोध संस्थान। आइआइटी जैसे संस्थान कुछ ब्रांड बन गए हैं, लेकिन चौदह लाख परीक्षा देने वाले और सीट मात्र दस हजार। वह भी पिछले कुछ वर्षो में बढ़ी हैं। फिर शेष कहां जाएंगे? दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा। बचे हुए कॉलेजों में फीस तो पूरी मगर न शिक्षक, न कोई पढ़ने की सुविधा। क्यों राज्य दर राज्य सरकारें इतनी नाकारा बन चुकी हैं जो इन कालेजों को ठीक नहीं कर सकतीं, स्कूल तक नहीं चला सकतीं। क्यों कोटा की इन आत्महत्याओं में नब्बे प्रतिशत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों से ही हैं? दबाव या अपराध मां-बाप का।

जब इंजीनियरिंग की डिग्री में पूछ सिर्फ आइआइटी, एनआइटी की बची है तो बच्चे के कानों पर स्कूल के दिनों से ही गूंजने लगते हैं ये शब्द। सपनों, महत्वाकांक्षाओं, गर्वीले भविष्य से धकेले जाते ये बच्चे पहुंच तो गए कोटा जैसे कोचिंग संस्थानों में, लेकिन क्या उस माहौल में रातों-रात फिट हो जाना इतना आसान है? ये मानवीय आत्माएं हैं, निर्जीव रोबोट नहीं। हर कोशिश के बावजूद हजारों बच्चे हताश, निराश, एकाकीपन के कुएं की तरफ बढ़ते जाते हैं।

एक अनुमान के अनुसार मेडिकल, इंजीनियरों की कोचिंग ले रहे लगभग बीस प्रतिशत बच्चे पढ़ाई से हटकर इन व्यसनों की गिरफ्त में आ जाते हैं। दिन-रात वही गणित, भौतिक, रसायन के फॉर्मूले रटते-रटते मानसिक रोगी भी कई बच्चे हो चुके हैं।

यहां शिक्षाविद प्रोफेसर यशपाल की वर्ष 1992 की रिपोर्ट की बातें याद आती हैं। ‘जो बच्चे नहीं चुने जा पाते वे तो पूरी उम्र के लिए कुंठित होते ही हैं, चुने जाने वाले भी इस रटंत पद्वति के चलते बहुत अच्छा नहीं कर पाते। इसका हल पूरी शिक्षा व्यवस्था में ढूंढ़ना होगा और तुरंत। आइआइटी की परीक्षा में पिछले दस बरस में दसियों बार अनगिनत परिवर्तन किए गए हैं। कभी दो चरण कभी तीन, कभी आब्जेक्टिव पर जोर तो कभी 12वीं के नंबरों पर। शिक्षा व्यवस्था में जितने डॉक्टर उतनी तरह की दवाइयां, ऑपरेशन, सर्जरी। मंत्री या तो वे हैं जो हॉवर्ड और कैंब्रिज में पढ़े हैं या वे जो जाति, धर्म के आंकड़ों को ही बांच सकते हैं। आश्चर्य है कि ये दोनों ही पक्ष चुप्पी साधे हैं। नतीजा-न कोचिंग कम हुई, न दूर-दूर के गांवों, कस्बों से कोचिंग के मक्का-मदीना की तरफ बढ़ता पलायन। बढ़ती आत्महत्याओं से भी शिक्षा के नियंताओं के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, क्योंकि इससे वोटों की फसल पर कोई असर नहीं होगा।

गनीमत है कि इन्होंने इन आत्महत्याओं में जाति और धर्म की गिनती नहीं की। इससे भी बुरा पक्ष है देश के इन शीर्ष संस्थानों में पहुंचने वाले छात्रों की प्रतिभा पर प्रश्नचिन्ह। दुनिया भर से मिल रही रिपोर्ट बता रही है कि ये शीर्ष संस्थान लगातार पिछड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पहले एक वैज्ञानिक पत्रकार का कहना था कि आखिर क्या कारण है कि इन शीर्ष संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों में कल्पनाशीलता, अन्वेषण और रचनात्मकता निरंतर ह्रास पर है। पिछले वर्ष आइआइटी रुड़की में पहले ही वर्ष में सत्तर छात्रों का फेल होना क्या बताता है? अंग्रेजी का कहर तो है ही, रटंत शिक्षा की सीमाएं भी साफ हैं। फिर भी इनमें पहुंचने की उतावली या हताशा में आत्महत्याएं?

प्रतिस्पर्धा कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में वे बुनियादी परिवर्तन लाने होंगे जो बच्चों को इतना मजबूत बनाएं कि जीवन में किसी एक-दो परीक्षाओं में पास-फेल होना कोई मायने नहीं रखता। डार्विन, आइंस्टीन से लेकर प्रेमचंद, मंटो की वे जीवनियां पढ़ाई जाएं जिनसे ये जान सकें कि स्कूल या प्रतियोगिता में कुछ नंबरों के कम-ज्यादा होने से खास फर्क नहीं पड़ता। और बच्चों से ज्यादा जरूरी है उनके मां-बाप, स्कूल के टीचरों की मानसिकता को बदलना कि तुम अपने नकली सपनों की खातिर क्यों इन लाड़लों की कुर्बानी देने पर तुले हुए हो। दुनिया भर के शिक्षाविद उस शिक्षा के हिमायती रहे हैं जहां बच्चा मस्ती से पढ़े स्कूल आए, न कि स्कूल और इन कोचिंग संस्थानों की कैद में हताश हो। यूरोप, अमेरिका आदि ने शिक्षा व्यवस्था की इस चूहा दौड़ से बचने के लिए ठोस कदम उठाए हैं और इसका फायदा पूरे समाज को मिल रहा है। लेकिन हमारे यहां तो सामाजिक न्याय और विकास के नाम पर वे बातें जारी हैं जिन पर 15वीं सदी भी शरमा जाए।

एक गंभीर संकेत : अनुराग

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पिछले दिनों समाचार पत्रों में लंदन की एक खबर प्रकाशित हुई कि ‘द फेबुलस बेकर्स’ के सर्वे में बच्चों ने बताया कि पेड़ पर उगती हैं चॉकलेट और फ्रिज से निकलती है स्ट्रॉबेरी। चौंकाने वाली बात यह भी है कि ब्रिटेन का हर दस में से एक बच्चा यही सोचता है कि कई फल पेड़ों पर नहीं, बल्कि कारखाने में बनते हैं। प्रसिद्ध मफिन फर्म ‘द फेबुलस बेकर्स’ ने हाल ही में छह से दस साल की आयु वर्ग के एक हजार बच्चों के बीच यह सर्वे कराया था। इस सर्वे के नतीजे बेहद दंग कर देने वाले हैं। सर्वे के अनुसार दस में से एक बच्चे का मानना था कि सेब पेड़ पर नहीं उगते। चार में से एक यह समझता है कि स्ट्रॉबेरी जमीन के अंदर उपजती है। 10 में से एक ने जवाब दिया कि ये पेड़ पर उगते हैं, जबकि कुछ ने कहा, ये फ्रीज से बाहर आते हैं। बच्चों को लगता है कि चॉकलेट पेड़ों पर उगती हैं। शहद गाय से मिलता है। एक-चौथाई से ज्यादा को यह नहीं मालूम था कि केला पेड़ पर उगता है। 10 में से एक ने बताया कि अंगूर लताओं से नहीं, बल्कि पेड़ से चुने जाते हैं। बच्चे सबसे ज्यादा तरबूज को लेकर भ्रमित हुए। कइयों का मानना था कि यह पानी भरा फल जमीन के अंदर, पेड़ों या झाड़ियों पर उगता है। हालांकि इस पर थोड़ा संतोष किया जा सकता है कि आम को लेकर सबसे ज्यादा सही जवाब मिले और बच्चों ने बताया कि यह पेड़ पर उपजता है।

यह सर्वे रिपोर्ट पढ़कर किसी का मन यह सोचकर मुस्करा सकता है कि बच्चों के जवाब कितने मजेदार और मासूमियत भरे हैं। मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था। लेकिन क्षण भर में ही मेरा मन अवसाद से भर गया कि हम बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं कि वह इतनी मामूली सी बात भी नहीं जानते कि फल पेड़ों पर लगते हैं, न कि कारखानों में बनते हैं। शिक्षा का यह झोल केवल ब्रिटेन का नहीं है। भारत में बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा का भी कमोबेश यही हाल है। बच्चों को ग्लोबल बनाने के नशे में हम उन्हें आसपास की दुनिया से काटते जा रहे हैं। जिस तरह की तथाकथित कान्वेंटी शिक्षा का प्रचलन भारत में बढ़ता जा रहा है, उसमें तो आस-पास की दुनिया को जानने-समझने के अवसर खत्म होते जा रहा हैं। बच्चा सुबह उठेगा, बस या कार से स्कूल जाएगा, वहां पाठ्यक्रम की पुस्तकों से जुझता रहेगा, घर वापस आकर होमवर्क का दबाव, बाकी बचा समय कंप्यूटर और टेलीविजन को समर्पित। पढ़ाई पूरी करके कोई डिग्री और अधिक से अधिक का पैकेज। ऐसे में आसपास की दुनिया को जानने-समझने की न तो कोई गुंजाइश है और न ही बच्चा इसकी जरूरत महसूस करता है। माता-पिता भी इससे खुश रहते हैं कि उनका बच्चा अमेरिका के राज्यों के नाम जानता है और उसे पता है कि दुनिया का सबसे बड़ा झराना कहां है या माइकल जैक्सन के जीवन में क्या-क्या विवाद जुड़े हुए हैं।

इस शिक्षा का दुष्परिणाम यह भी है कि जब बच्चे के मन में ग्लोबल ज्ञान ठूंसा जा रहा है, तो उसकी सपनों की दुनिया भी तो उसी ग्लोब का हिस्सा बनती है। यही वजह है कि जैसे-जैसे बच्चा उच्च शिक्षा की सीढ़ी चढ़ता जाता है, उसे अपने देश में बदबू आने लगती है और कमियां ही कमियां दिखाई देने लगती हैं। नतीजा यह होता है कि वह शिक्षा पूरी करते है ही अमेरिका, कनाडा आदि की ओर रुख कर लेता है। जिन चीजों के बारे में बच्चे को पढ़ाया और समझाया जाएगा, लगाव भी उसका उन्हीं से होगा।

ब्रिटेन की सर्वे रिपोर्ट हम सबके लिए खतरे की घंटी है। देश में जो शिक्षा का मॉडल अपनाया जा रहा है, उसके बारे में पुनर्विचार किया जाए। उसमें इस तरह का बदलाव किया जाए कि बच्चे के मन में आसपास की दुनिया को जानने की ललक पैदा हो? माता-पिता भी थोड़ा समय निकालकर बच्चों को प्राकृतिक स्थलों-नदी, तालाब, खेत, वन क्षेत्र आदि में ले जाएं, तो उन्हें अपने आसपास की दुनिया को जानने-समझने का एक मौका मिलेगा।

अकेले टेक्नोलॉजी नहीं है स्कूलों की बीमारी का इलाज : केंटारो टोयामा

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सन 2013 के बसंत में मैंने एक महीने तक अपनी सुबहें लेकसाइड स्कूल में बिताईं। यह सिआटल का एक प्राइवेट स्कूल है, जहां प्रशांत उत्तरपश्‍चि‍म में रहने वाले भद्रलोक के बच्चे पढ़ते हैं। लाल ईंटों से बना स्कूल का आलीशान परिसर किसी आईवी लीग कॉलेज जैसा भव्य दिखाई देता है और इसकी फीस भी उन्हीं जैसी है। इस स्कूल में गिल गेट्स ने पढ़ा है और यहां अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट के अफसरों के बच्चे पढ़ने आते हैं। जाहिर है, स्कूल में टेक्नोलॉजी की कोई कमी नहीं- शिक्षक स्कूल के इन्टरनेट पर एसाइनमेंट्स पोस्ट करते हैं;  ई-मेल से कक्षाओं को निर्देश देते हैं;  और हर बच्चा लैपटॉप (अनिवार्यतः) और स्मार्टफोन (अनिवार्य नहीं) लेकर स्कूल पहुंचता है।

इस पसमंजर में इनके माता-पिता क्या रुख रहता है, जब वे सोचते हैं कि उनके बच्चों को थोड़ी और खुराक की जरूरत है? मैं यहां एक वैकल्पिक शिक्षक के तौर पर गया था और मुझे कई स्तर के बच्चों की मदद करनी थी। इनमें से कुछ कैलकुलस ऑनर्स करना चाहते थे। ये मेहनती छात्र थे लेकिन उन्हें महज एक शाबासी देने वाले की जरूरत थी, क्योंकि वे कठिन सवालों पर काम कर रहे थे। भारी शिक्षणेत्तर गतिविधियों के बोझ से दबे कुछ अन्य छात्र ज्यामिति और बीजगणित के साथ जूझ रहे थे। मैं इसके लिए आवश्यक सामग्री के चयन और उनके असाइनमेंट्स में उन्हें मदद करता था। एक अन्य समूह को किसी ख़ास मदद की जरूरत नहीं थी। उन्हें बस थोड़ा-बहुत उकसाना पड़ता था ताकि समय पर अपना होमवर्क पूरा कर लें। इतनी विविधता के बावजूद छात्रों में एक बात समान थी- उनके माता-पिता अतिरिक्त पढ़ाई के लिए खुलकर पैसा खर्च कर रहे थे।

मैंने जो कुछ पढ़ाया वह गणित की वेबसाइट्स और खान एकेडमी के फ्री वीडियोज में उपलब्ध था। इतना ही नहीं, हर छात्र को पूरे वक्त इन्टरनेट सेवा मिलती थी। इतनी सारी टेक्नोलॉजी और 9:1 के शानदार शिक्षक-छात्र अनुपात के बावजूद वहां के अभिभावक चाहते थे कि उनके नौनिहालों को किसी वयस्क की ओर से थोड़े और मार्गदर्शन की जरूरत है।

लेकसाइड स्कूल के अभिभावक टेक्नोलॉजी के बजाय बड़ों के मूल्यवान मार्गदर्शन को ज्यादा महत्त्व देने के मामले में अकेले नहीं हैं। दूसरे पढ़े-लिखे पेशेवर अभिभावक भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। सिलिकन वैली के अधिकारी अपने बच्चों को वालड्राफ़ स्कूल में पढ़ाते हैं। इस स्कूल में आठवीं कक्षा तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध है। स्टीव जॉब्स ने एक बार स्वीकार किया था कि ‘वह अपने बच्चों को आई-पैड नहीं देते। घर पर बच्चे कितनी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करेंगे, हमने इसकी सीमा तय की हुई है।’

ये माता-पिता टेक्नोलॉजी विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनके काम के देखते हुए उन्हें डिजिटल धर्म का समर्पित प्रचारक कहा जा सकता है। लेकिन वे स्पष्टतः इस बात में विश्वास नहीं करते कि ज्यादा मशीनें इस्तेमाल कर लेने से शिक्षा अच्छी हो जाती है। उनकी इस समझ की पीछे आखिर राज क्या है?

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पिछला पूरा दशक मैंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एजुकेशनल टेक्नोलॉजी को डिजाइन करने, समझने और पढ़ाने में बिताया। भारत के बंगलुरु शहर में मैंने एक पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) के साथ एक से ज्यादा माउस जोड़कर छात्र की अन्योन्य क्रिया बढ़ाने सम्बंधी एक प्रयोग किया। युगांडा के ग्रामीण इलाके में जब बच्चे एक अंगुली से शिकारी की तरह टाइपिंग का गेम खेलते तो मुझे घबराहट होने लगती। सिआटल, वाशिंगटन में किशोरावस्था से कम आयु के बच्चों की कंप्यूटर साक्षरता की कक्षा में मुझे टेक्नोलॉजी से पैदा होने वाले भटकाव से जूझना पड़ा। इस सभी प्रोजेक्ट्स में मुझे इकलौता और आसान पैटर्न दिखाई दिया। मैं इसे टेक्नोलॉजी का ‘विस्तारण नियम’ (लॉ ऑफ़ एम्प्लीफिकेशन) कहता हूं- टेक्नोलॉजी का प्राथमिक प्रभाव इंसानी ताकत के विस्तार के रूप में प्रकट होता है। इसलिए शिक्षा में टेक्नोलॉजी पहले से मौजूद शैक्षिक धारकता (पेडागॉजिकल कैपेसिटी) में इजाफा कर देती है।

विस्तारण एक स्पष्ट विचार प्रतीत होता है- यह इतना भर कहता है कि टेक्नोलॉजी के औजार से इंसानी ताकत को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन अगर यह इतना स्पष्ट है तो इसके इतने गहन परिणाम होने चाहिए, जो आम तौर पर नजरअंदाज नहीं किये जा सकते। मसलन विस्तारण के मुताबिक़ शैक्षिक टेक्नोलॉजी के बड़े पैमाने पर उपयोग के बहुत कम सकारात्मक परिणाम आये हैं। किन्हीं चुनिन्दा नमूनों को लें, कुछ स्कूल अच्छा कर रहे पाए गए तो कुछ बहुत बेकार। कुछ मामलों में कंप्यूटर शामिल करना फायदेमंद साबित हुआ (पायलट अध्ययन में जिन्हें दिखाया गया है), लेकिन कमजोर स्कूलों के मामलों में इसने उन्हें अपने मुख्य उद्देश्य से ही भटका दिया। कुल मिलाकर परिणाम शून्य ही निकला।

एक अपेक्षाकृत बड़ी समस्या यह है कि स्कूल प्रशासक शिक्षक प्रशिक्षण के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन नहीं करते। जब शिक्षक को ही नहीं पता कि डिजिटल उपकरणों को कैसे शामिल करना है तो टेक्नोलॉजी के जरिये धारकता के विस्तारण की ख़ास गुंजाइश नहीं रह जाती। जब एक प्राइवेट कंपनी मुनाफा कमाने में नाकामयाब होने लगती है तो कोई यह उम्मीद नहीं करता कि अत्याधुनिक डाटा सेंटर, ज्यादा उत्पादन दिलाने वाले सॉफ्टवेयर और सभी कर्मचारियों को नए लैपटॉप देकर परिस्थितियों को उलटा जा सकता है।

और स्कूल के बाहर जो कंप्यूटर हैं, उनका क्या? क्या होता है जब बच्चों को डिजिटल उपकरणों से सीखने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है, जैसा कि टेक्नोलॉजी के बहुत से पैरोकार नसीहत देते हैं? यहां टेक्नोलॉजी बच्चों की प्रवृत्तियों का विस्तार करती है। यकीनन बच्चों में सीखने, खेलने और बढ़ने की स्वाभाविक इच्छा होती है। लेकिन उनमें खेलते हुए खुद को भटका देने की भी स्वाभाविक इच्छा होती है। डिजिटल टेक्नोलॉजी इन दोनों इच्छाओं को विस्तार देती है। इन दोनों का संतुलन बिंदु हर बच्चे में अलग-अलग होता है लेकिन कुल मिलाकर अगर किसी किस्म का वयस्क मार्गदर्शन न हो तो भटकने की प्रवृत्ति प्रभावी हो जाती है। ठीक ऐसे ही निष्कर्ष अर्थशास्त्री रॉबर्ट फैर्ली और जोनाथन रॉबिन्सन को अपने शोध से हासिल हुए। कैलिफोर्निया के कुछ बच्चों को लैपटॉप देकर किए गए शोध में उन्होंने पाया- जिन बच्चों को लैपटॉप दिए गए थे, श्रेणी, कक्षा-स्तरीय परीक्षा परिणाम, उपस्थिति और अनुशासन जैसे तमाम शैक्षिक मानकों पर उनके प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखाई दिया। हालांकि उन्होंने लैपटॉप का इस्तेमाल सोशल मिडिया और वीडियो गेम्स के लिए ज़रूर किया। यानी, अगर आप उन्हें बहु-उपयोगी टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराते हैं, जिसका इस्तेमाल शिक्षा और मनोरंजन, दोनों के लिए किया जा सकता है, तो बच्चे मनोरंजन को ही चुनेंगे। टेक्नोलॉजी खुद बच्चों के रुझान को नहीं बदल सकती, यह उसका विस्तार भर करती है।

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यह जानना कि अमेरिकी शिक्षा को किन बीमारियों ने जकड़ा हुआ है, मुसीबतों के पिटारे को खोलने जैसा है। यह मुसीबत बचपन की गरीबी से जुड़ी हो सकती है या संसाधनों से जूझ रहे स्कूल डिस्ट्रिक्ट की। संभव है शिक्षकों के खराब वेतनमान से इसका संबंध हो या फिर प्राइवेट स्कूलों में जाने की होड़ से। सच्चाई इनमें से कई के मिले-जुले असर में भी निहित हो सकती है, मगर कंप्यूटरों की कमी में तो कतई नहीं। यहां तक कि टेक्नोलॉजी के झंडाबरदार भी नहीं कहते कि अमेरिकी शिक्षा टेक्नोलॉजी की कमी के कारण पतन की ओर जा रही है।

अमेरिका में शिक्षा के बारे में ज्यादातर विमर्श दूसरे देशों से तुलना से पैदा होता है। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट (पीसा) ने 2012 के अपने नतीजों में अमेरिकी छात्रों को गणित में 27वें और रीडिंग में 17वें स्थान पर रखा था। लेकिन समग्र तौर पर भले ही अमरीकी बच्चे पिछड़ते दिखाई पड़ रहे हों, मजबूत बच्चे कतई पीछे  नहीं हैं। उदाहरण के लिए वार्षिक इंटरनेशनल मैथ ओलंपियाड में, जहां प्रत्येक देश अपने बेहतरीन 6 बच्चों को बेहद मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिए भेजता है, अमेरिका लगातार तीन शीर्ष देशों में जगह बनाए हुए है।

लेकिन जैसा कि पीसा के आंकड़े बताते हैं, इसमें शानदार प्रदर्शन करने वाले देश सिर्फ अमीरों के ही नहीं, बल्कि हर बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा का इंतजाम करते हैं। दुर्भाग्य से इस मामले में अगर दुनिया के 33 अमीर देशों से तुलना करें तो अमेरिका का रिकॉर्ड बहुत खराब है। 15 वर्ष तक के बच्चों के नामांकन के मामले में यह तीसरा सबसे कम नामांकन वाला देश है (करीब 20 प्रतिशत अमेरिकी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)। और स्कूल असमानता के लिहाज से अमेरिका सबसे बुरा प्रदर्शन करने वालों में 9वें स्थान पर हैं- यहां अमीर और गरीब बच्चों के बीच प्राप्तांकों में भारी अंतर दिखाई देता है। हर कोई जानता है कि हमारे स्कूल असमान हैं। पर कम लोग स्वीकार करते हैं कि स्कूलों के बीच असमानता असल में वैश्विक स्तर पर हमारे खराब प्रदर्शन का कारण है।

अगर शैक्षिक असमानता ही अहम मुद्दा है तो डिजिटल टेक्नोलॉजी के जखीरे खड़े कर देने से स्थितियां नहीं बदलने वालीं। टेक्नोलॉजी प्रदत्त विस्तारण का यह संभवतः सबसे कम समझा गया पहलू है। एक कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी शिक्षामंत्री अर्ने डंकन ने शिक्षा में टेक्नोलॉजी के उपयोग को बढ़ाने (45 गुना टेक्नोलॉजी और शिक्षक मात्र 25 गुना) की वकालत करते हुए कहा, ‘टेक्नोलॉजी उन गरीबों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण छात्रों के लिए बरबरी के अवसर पैदा करती है, जिनके पास घर में लैपटॉप या आईफोन नहीं हैं’, लेकिन यह सोच एक खुशफहमी से ज्यादा कुछ नहीं; यह भ्रामक है और गलत दिशा में ले जाता है। टेक्नोलॉजी संपत्ति व उपलब्धियों में पहले से मौजूद असमानता को और ज्यादा बढ़ा देती है। ज्यादा शब्दभण्डार वाले बच्चे विकीपीडिया से ज्यादा हासिल करते हैं। वीडियो गेम्स मानसिक रूप से कमजोर बच्चों में भटकाव को बढ़ा देते हैं। अमीर माता-पिता अपने बच्चों के लिए डिजिटल प्रणालियों की प्रोग्रामिंग सिखाने वाला ट्यूटर लगा सकते है, जबकि दूसरे बच्चे इन प्रणालियों को महज चलाना भर सीख रहे होते हैं। स्कूल में टेक्नोलॉजी पहुंच के लिहाज से बराबरी से खेलने के मौके पैदा कर सकती है, लेकिन ऐसे मौके खिलाड़ी के कौशल में कोई इजाफा नहीं करते। शिक्षा के लिहाज से यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यूनिवर्सिटी ऑफ कलिफोर्निया, इरविन में प्रोफेसर और एजुकेशनल टेक्नोलॉजी क्षेत्र के शीर्ष दिग्गजों में शुमार मार्क वार्शौर कहते हैं, ‘स्कूलों में सूचना एवं संचार टेक्नोलॉजी के प्रवेश से असमानता के मौजूदा रूपों का ही विस्तार होता है।’

अगर टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में काम कर रहे अभिभावक अपने बच्चों के मामले में सही हैं, तो अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था को चाहिए कि वह टेक्नोलॉजी को बढ़ाने के बजाय जरूरतमंद बच्चों के लिए अच्छे शिक्षकों के इंतजाम पर ज्यादा ध्यान दे। नजारा बेशक डरावना और चुनौतीपूर्ण है, मगर शैक्षिक अवसरों में असमानता की बीमारी को टेक्नोलॉजी की तगड़ी खुराक से दुरुस्त नहीं किया जा सकता। मुंह बाए खड़ी सामाजिक-आर्थिक खाई को लक्ष्य किए बिना टेक्नोलॉजी खुद ब खुद इसे पाट नहीं सकती, उलटे यह इसे और चौड़ा कर देगी।

(यह लेख केंटारो टोयामा की आने वाली पुस्तक ‘गीक हैरेसी: रेसक्यूइंग सोशिअल चेंज फ्रॉम द कल्ट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ से लिया गया है.)

अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

समान शिक्षा की ओर: अनुराग

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पिछले दिनों पटना में आयोजित एक सम्मेलन में सात साल के बच्चे कुमार राज ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर जोरदार ढंग से जो बातें कहीं, वे चर्चा में रहीं। उसने कहा, ‘दो तरह की शिक्षा व्यवस्था है, अमीरों के लिए अलग, जिनके बच्चे नामी प्राइवेट स्कूलों में पढऩे जाते हैं और गरीबों के लिए अलग, जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढऩे जाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों में शिक्षा का घोर अभाव है। आखिर क्या कारण है कि कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील यहाँ तक कि उस स्कूल के शिक्षक भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहते? यही वजह है कि हम बच्चे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं।’

इस खबर का प्रचार-प्रसार करने वालों की टोन ऐसी थी, कि मानों शिक्षा को लेकर यह चिंताजनक स्थिति केवल बिहार में है, जबकि देशभर में शिक्षा व्यवस्था का कमो बेश यही हाल है। कुमार राज की बात सौ फीसद सही है। सोचने की बात यह है कि जब सात साल के बच्चे को समझ में आ रहा है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब हो (या की जा रही है) रही है और देश में कई तरह ही शिक्षा दी जा रही है, तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, शिक्षामंत्रियों और बुद्धिजीवियों को यह बात क्यों समझ में नहीं आ रही है! या वे जानकर भी अनजान बन रहे है! या उनके लिए समान शिक्षा का मुद्दा गैरजरूरी है! क्या वे भी आम आदमी के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश में शामिल है! क्या वे चाहते हैं कि बच्चे में शिक्षा के दौरान असमानता के बीच बोए जाएँ! फिर समाज में समानता और समरसता की बात करने का क्या तुक है!

केंद्र की सरकारें हों या राज्यों की, सभी सरकारी शिक्षा व्यवस्था से हाथ खींच रही हैं। तथाकथित आंकड़ों और रिपोर्टों से यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था बेकार है, लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ाने नहीं चाहते हैं और निजी स्कूलों में बच्चों को प्रतिशत लगातार बढ़ता रहा है। ये बातें कुछ हद तक सही हैं, लेकिन खराब सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही से सरकारें बच सकती हैं? आजादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी सरकारी स्कूलों मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, पर्याप्त संख्या में अध्यापक नहीं हैं, उनसे वर्ष भर कई गैरशैक्षणिक कार्य कराएँ जाते हैं, तो इन सबके लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। इन सबके लिए भी अध्यापक जिम्मेदार हैं? कुछ आर्थिक रूप से सम्पन्न और मध्यम वर्गीय लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाने चाहते हैं, तो देश केवल इन लोगों का है। गरीब और साधनहीन लोगों के बच्चों की शिक्षा का क्या होगा?

कुमार राज ने अपने भाषण आगे जो बातें कहीं थी, वे भी गौरतलब हैं। उसने कहा कि ‘बड़ा होकर संयोग से इस देश का प्रधानमंत्री बन गया, तो सबसे पहले पूरे देश के प्राइवेट स्कूलों को बंद करवा दूंगा ताकि सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में एक साथ पढ़े सकें। चाहे वह डॉक्टर का बच्चा हो या किसान का। चाहे वह इंजीनियर का बच्चा हो या मजदूर का। तभी इस देश में समान शिक्षा लागू होगी।’

जब सात साल के बच्चे को समझ आ रही हैं कि देश में कैसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, तो देश-विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों को यह सीधी-सादी बात क्यों नहीं समझ में आ रही है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चे की बातें सुनकर बिहार के मुख्यमंत्री के गर्दन उठाना भी मुश्किल हो गया, लेकिन क्या असमान शिक्षा हम सबके लिए शर्मिंदगी की बात नहीं है। यह क्या केवल बिहार का मामला है?

कुमार राज का सुझाव बिल्कुल सही है कि अगर लोग अपने गांव के स्कूलों की निगरानी करें, तो शिक्षा

के हालात में बड़ा सुधार होगा। इस छोटे बच्चे की सीख के बाद भी क्या अभी किसी और बात का इंतजार करने की जरूरत है? अगर हम अभी भी सचेत नहीं हुए, तो चिडिय़ा खेत चुग जाएगी और हम सिर पीटते ही रह जाएँगे।