Tag: वि‍ज्ञान और हम

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी

हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेमपाल शर्मा

vigyan-aur-hum

देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है। ‘विज्ञान और हम’ उनकी नई पुस्‍तक है। असल में, हर लेखक पहले स्थानीय होता है, उसके बाद ग्‍लोबल। अंग्रेजी में इसके लिए एक प्रचलित वाक्य है- लोकल इज ग्लोबल। ‘विज्ञान और हम’ में देवेन्द्र मेवाड़ी ने इसलि‍ए सबसे पहले अपने गाँव, बचपन की बातें बच्चों को बताई हैं, स्‍थानीय भाषा की सुगंध और स्वाद के साथ। स्थानीयता का यह स्पर्श एक अलग मिठास पैदा करता है। किताब और लेखन में चस्का ऐसी ही शुरुआत से पैदा होता है। साधारणीकरण का यह ढंग ही पाठकों में असाधारण पैठ बनाता है। विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के बीच ले जाने के लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती।

पता नहीं यह हमारी शिक्षा पद्धति का दोष हे या उस समाज का जो जीवन को सामान्‍य तर्क से समझने के बजाय उसे पढ़ाई के नाम पर इतना भारी-भरकम उबाऊ बना देता है कि विज्ञान की मोटी-मोटी डिग्रियों वाले भी विज्ञान की सामान्‍य समझ में शून्‍य होते हैं। क्‍या यह कोई अलग से पढ़ने-पढ़ाने, रटने की चीज है? क्‍या रोज आप आकाश में सौरमंडल नहीं देखते? दिन में सूरज उगते ही सारा आकाश चन्‍द्रमा सहित गायब। कितने किस्‍से, रोचक कहानियां गड़ी गई हैं कि‍ताब में। चंदा मामा और इन सितारों के आसपास सदियों से गांवों के किसानों का जीवन और समय का अंदाज इन्‍हीं तारों- हि‍न्नी पैना, सप्तश्री, ध्रुव और उपग्रह चांद के आकार से चलता रहा है। देवेन्द्र मेवाड़ी ने बड़ी सहजता से कोपर्निकस, गैलिलियो, उनकी खोजी दूरबीन आदि‍ के कि‍स्सों के सहारे पूरे सौरमंडल को समझाया है। क्या इस लेख को पढ़ने के बाद बच्चों को कोई चंदामामा की कहानी से गुमराह कर सकता है? शायद नहीं। हां, कविता कहानी में इनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी। विज्ञान और गल्प में यही अंतर है।

अगले लेख में मेवाड़ी जी आकाश से जमीन पर उतरते हैं। एक लंबे पत्र के माध्यम से पृथ्वी, पहाड़ और उसकी पूरी संरचना का एक-एक विवरण देते हैं। रोचकता को बनाए रखने के लिए एलियन भी वहां है, पृथ्वीवासियों को सलाह देते हुए कि कल-कारखाने के धुएं से पूरे वातावरण को बचाने की जरूरत है। बातों ही बातों में पत्र के माध्‍यम से कहना और प्रभावी बना देता है। इससे पत्र लिखने की शिक्षा तो बच्‍चों को मिलेगी ही।

आकाश, धरती के बाद मेवाड़ी जी बच्‍चों को समंदर की सैर कराते हैं- ‘समंदर के अंदर है अनोखी दुनिया’ लेख में। कम रहस्‍यमय नहीं है समन्‍दर। हालांकि कई बच्चों ने समुद्र साक्षात नहीं देखा होगा, लेकिन मीडिया की दुनिया ने क्‍या संभव नहीं बना दिया और शेष पूर्ति यह लेख करता है, एक-एक विवरण के साथ। मछुआरों के साहस, डार्विन ओर उनका जहाज बीगल, समुद्र में रहने वाले लाखों जीवों, वनस्‍पतियों की प्रजातियां। स्‍पंज प्रवाल से लेकर केकड़े, मछली जैलीफिश, व्‍हेल, डाल्फिन-समुद्र की इतनी बडी़ दुनिया। पढ़ते-पढ़ते बच्‍चों का कौतूहल आकाश छूने लगेगा। पूरी प्रमाणिक जानकारी भरा लेख।

‘क्यों तपती है इतनी धरती’ लेख तो देश के मौजूदा सूखे के संकट की याद दिला देता है। नंदू, शेफाली, गार्गी विक्रम, देवीदा की बातों से जो शिक्षा मिलेगी, वह भारी भरकम लेखों से नहीं मि‍ल सकती। ऐसे लेखों की सहजता बच्‍चों पर स्‍थायी असर छोड़ती है और यही विज्ञान लेखक देवेन्‍द्र मेवाड़ी का उद्देश्‍य है। हालांकि ऐसे लेखों की लंबाई कुछ कम होती तो और भी अच्‍छा होता। ‘कैसे कैसे मेघ,’ ‘लो आ गया वंसत’ बच्‍चों के लिए ऐसी ही जानकारि‍यों से भरपूर लेख हैं। पंछियों (पक्षियों) से बच्‍चों को विशेष लगाव होता है, गांव के बच्‍चों को और भी ज्‍यादा। आंगन में फुदकती तरह-तरह की चि‍डि़यों को कौन बच्‍चा भूल सकता है? गायब होती गौरया की चिंता, हम सबकी चिंता है। ‘उड़ गयी गौरियां’ (1 मई 2012) और ‘पेड़ों को प्रणाम’ (5 जून 2012) को लेख के बजाय ‘डायरी’ खंड में रखा जाना चाहिए। देवेन्‍द्र मेवाड़ी की एक और पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ बच्‍चों को बहुत सहज ढंग से अपनी दिनचर्या में घटित अनेक वैज्ञानिक बातों, निरीक्षणों और निष्‍कर्षों को लिखने का मौका देती है। अच्छी शिक्षा ऐसी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है।

बच्चों के जीवन में सैर सपाटा, यात्रा न हो तो मजा ही क्‍या। ‘फूलों की घाटी में’ और ‘बच्चों का वि‍ज्ञान और कवि का कबूतर’ यात्रा-कथा का आनंद देते हैं। ‘ताबीज’ और ‘पर्यावरण के प्रहरी’ जैसे दो छोटे नाटकों को शामिल करने से पुस्तक की उपयोगिता और बढ़ गई है। पुस्तक में तीन वैज्ञानि‍कों की जीवनी भी दी गई है।

ऐसी पुस्तकों को केवल विज्ञान के खांचों में रखना, उनके असर को सीमित करना है। यह पुस्तक बच्चों को उनके पूरे परिवेश से जोड़ती है और साथ ही शिक्षा और शिक्षण की विविध विधाओं– लेख, डायरी, यात्रा, नाटक, कविता और जीवनी से भी। शि‍क्षा का मूल मंत्र भी तो बच्चों को उनके परिवेश से जोड़कर शिक्षित करना है। पुस्तक में हरे जंगल का कवर तो मंत्रमुग्धकारी है ही।

(बालवाणी, नवम्बर-दि‍सम्बर, 2016 से साभार)

पुस्तक: विज्ञान और हम
लेखक : देवेन्द्र मेवाड़ी
कीमत:140, सजिल्द- 260/- रुपये
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजियाबाद-20014
Email- anuraglekhak@gmail.com

पेड़ों को प्रणाम : देवेन्द्र मेवाड़ी

TREE

आज पर्यावरण दि‍वस है। इस अवसर पर पढ़ि‍ए लोकप्रि‍य वि‍ज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की डायरी का अंश। यह डायरी अंश उनकी पुस्तक ‘वि‍ज्ञान और हम’ से लि‍या गया है-

5 जून 2012

सुबह-सुबह सोचा– आज पर्यावरण दिवस है, मुझे भी कुछ करना चाहिए। लेकिन, क्या? कुछ देर सोचता रहा, फिर तय किया कि इस मौके पर मुझे कुछ पेड़ों से गले मिलना चाहिए। उनसे बातें करनी चाहिए। बाहर निकला। चिलचिलाती धूप थी। पारा 44 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा था। लेकिन, पेड़? वे तो इसी आग उगलती धूप में खड़े होंगे। मुझे भी इसी धूप में उनके पास जाना चाहिए। मैं मिला, पांच पेड़ों से गले मिला– अमलतास, बरगद, सिल्वर ओक और पीपल से।

अमलतास सोसायटी के आँगन में ही खड़ा है, जिसे हमारी सोसायटी के बुजुर्ग आर.पी. भटनागरजी ने अपने हाथों से लगाया था। वे आज नहीं हैं। उनका लगाया अमलतास है। हर साल मार्च-अप्रैल में यह अपनी पत्तियाँ गिरा देता है और फिर पूरे पेड़ पर पीले, झुमकों से झूलते फूलों की बहार आ जाती है। यह हमारा अपना देशज पेड़ है। मैंने अमलतास को बाँहों में भरा, तो जैसे मौन रह कर भी वह मेरे कान में बोला, ”भटनागरजी लगा गए मुझे। देखो, आज कितने कीट-पतंगे और पक्षी मेरे पास आकर तुम्हारी दुनिया को गुलजार कर रहे हैं। कोयल आकर गाती है। बुलबुलें चहचहाती हैं। गौरेयाँ, सनबर्ड और नन्ही-सी दर्जिनें मेरी शाखों पर फुदकती रहती हैं। इस बार तो हरियल भी आकर मेरी पत्तियों की ओट में विश्राम कर गए। चीटियों की ये कतारें तुम देख ही रहे हो। दिनभर मेहनत करती हैं। और मैं, मैं अपनी बहार से तुम्हारी खुशियाँ बढ़ाता हूँ।’’

मैंने भी अमलतास को बाँहों में भर कर मौन भाषा में ही उससे कहा, ”जानते हो, स्वीडन के एक विश्व प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी कार्ल लिनीयस तुम्हारा नामकरण कर गए हैं? तुम्हारा वैज्ञानिक नाम तय कर गए हैं– कैसिया फिस्टुला। उन्होंने तुम्हारी दालचीनी की जैसी छाल को देख कर यूनानी भाषा में तुम्हारे वंश का नाम ‘कैसियाÓ और लम्बे, पाइप जैसे फूलों को देखकर तुम्हारी जाति का नाम लैटिन भाषा में ‘फिस्टुला’ रख दिया! लैटिन भाषा में पाइप या बाँसुरी को फिस्टुला ही कहते हैं। तो, भाई अमलतास, हमारे लिए तो आप अमलतास ही हैं, लेकिन सारी दुनिया आपको ‘कैसिया फिस्टुला’ के वैज्ञानिक नाम से फौरन पहचान लेगी। अंग्रेजों ने आपको देखा, तो उन्हें आप अपने यूरोप के फूलदार पेड़ लैबर्नम जैसे लगे। इसलिए उन्होंने आपका नाम रख दिया– इण्डियन लैबर्नम! और हाँ, मुम्बई में तो आपके पेड़ों से सजी एक सड़क का नाम ही है– लैबर्नम रोड।’’

अमलतास के साथ काफी देर तक यों ही खामोशी से बातें करके मैं आगे गेट की ओर बढ़ा, जहाँ इस आवासीय सोसायटी की शुरुआत से ही एक बरगद भी पनपता रहा है। अब वह अच्छा खासा जवान पेड़ बन चुका है और उसकी शाखों से सैकड़ों जटाओं की तरह भूरी हवाई जड़ें झूलती रहती हैं। मेरे फ्लैट की बालकनी से वह साफ दिखाई देता है।

उसके पास जाकर मैंने उसे प्रणाम किया। उसके चौड़े सीने से लगा और उसकी लम्बी जटाओं पर हाथ फेरा। वह दर्द से कराहा और अपनी मौन भाषा में बोला, ”अच्छा किया तुम आ गए। कोई रूक कर मेरी बात ही नहीं सुनना चाहता। न जाने कहाँ की जल्दी में तेजी से आते-जाते रहते हैं। अच्छा, मेरी बात सुनो। मैं जानता हूँ, मेरी कराह सुन तुम्हें दर्द हुआ। सोचो– मुझे कितनी पीड़ा होती होगी? जरा ऊपर देखो। जब भी ऊपर आसमान की ओर अपनी बाँहें फैलाता हूँ, ये तार-बाबू आकर मेरी बाँहें काट जाते हैं। नहीं समझे? अरे, इन बिजली के तारों के रखवाले। मैं कौन-सा छूना चाहता हूँ, इन्हें? छूते ही मेरी बाँहों में तेज सनसनी दौड़ जाती है, इनसे। वह पीड़ा तो मैं ही जानता हूँ ना?

”अब इसमें मेरी क्या गलती, तुम्हीं बताओ? यहाँ मैं लगा था, तो मेरे सिर पर तार खींचने की क्या जरूरत थी? मैं तो चल-फिर कर हट नहीं सकता ना? न कुछ उनसे बोल सकता हूँ। मेरे बोल भी तो केवल वहीं समझेगा, जो मेरा दर्द समझेगा, मेरे पास आएगा। है ना? दिनभर मेरी छाँव में सुस्ताने और मेरे लाल-लाल फल खाने के लिए कितने पंछी आ जाते हैं, कोई जानता है? मेरे फलों पर जान छिड़कती हैं वे।’’

वट वृक्ष की बात सही थी। उसका दर्द समझने की जरूरत है। मैंने उसके सीने को सहलाया और उसने खामोशी से कहा, ”वट भाई, आप तो हमारे सयाने और पूजनीय पेड़ हैं…” कि तभी वट बोला, ”हाँ, जानता हँू। कुछ महिलाएँ आकर यहां दीया जला जाती हैं, आरती करती हैं और रक्षा का धागा लपेट जाती हैं। मेरी नहीं, अपनी और अपनों की रक्षा के लिए! अरे, मेरा दर्द भी तो समझो!’’

मैंने बरगद से कहा, ”अच्छा सुनो बरगद भाई, आपको पता है, कलकत्ता के निकट शिबपुर में भारतीय वनस्पति उद्यान है। उसमें आपका ही बिरादर एक बरगद का पेड़ है, जिसकी उम्र करीब 250 वर्ष है। लगभग डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और उसकी कम-से-कम 2800 हवाई जड़ें हैं। कई जड़ें तो जमीन तक पहुँच कर खूब मोटी हो गई हैं और लगता है, जैसे– वे भी तना ही हैं। वह इतना बड़ा है कि बरगद का पेड़ एक छोटा-मोटा जंगल लगता है! और हाँ, बंगलौर में भी आपका एक बहुत बड़ा बिरादर है। वहाँ लोगों ने उसका नाम ही ‘डोडा अलाडा मारा’ यानी बरगद का बड़ा पेड़ रख दिया है। वह तीन-चार एकड़ में फैला हुआ है। उसकी उम्र लोग 400 साल बताते हैं।’’

बरगद को उसके बुजुर्ग बिरादरों के बारे में सोचता हुआ छोड़ कर मैं आगे बढ़ा और सोसायटी के उस पार दिखाई देते सिल्वर ओक के सदाबहार पेड़ों की जोड़ी के पास पहुँचा। सोचा– बरगद और अमलतास तो हमारे देश के ही अपने पेड़ हैं, लेकिन देखें सुदूर आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के मूल निवासी ये सिल्वर ओक यहाँ कैसा महसूस कर रहे हैं। पास गया तो लगा चिलचिलाती धूप में खड़े सिल्वर ओक जैसे मुस्कुरा रहे हो। फर्न जैसी चमकीली पत्तियों से भरी लम्बी शाखाएँ हवा में फैली थीं और पेड़ों के सिरे आसमान छूने की कोशिश में थे। ऊपर से हरी दिखती पत्तियाँ नीचे से चाँदी-सी चमक लिए थीं। वे ऊँची हरी-भरी शाखाएँ कौवों की एक जोड़ी के मन को शायद काफी भा गई होंगी तभी तो उन्होंने उनमें अपना घोंसला बनाया होगा। जब में सिल्वर ओक के पेड़ों से चुपचाप बातें कर रहा था, तब दोनों काक वहाँ ऊँचाई पर मौजूद थे।

वहाँ खड़े-खड़े मुझे याद आया–  ये ‘ओक’ यानी बाँज की बिरादरी के तो हैं नहीं, फिर इन्हें ‘सिल्वर ओकÓ क्यों कहा गया होगा? इस सवाल के जवाब में मुझे अपने गाँव के बाँज के पेड़ और उनकी चपटी, आरीदार पत्तियाँ याद आईं, जिनकी निचली सतह चाँदी की तरह चमकीली होती है। पत्तियों की इसी चाँदी-सी चमक के कारण इस पेड़ को ‘सिल्वर ओक’ कहा गया होगा।

गर्मियों में जब इन पर बहार आती है, तो इनकी शाखाएँ लम्बे बोतल ब्रुश जैसे पीले-नारंगी फूलों के 8 से 15 सेंटीमीटर लम्बे गुच्छों से भर जाते हैं। इन फूलों से जो फलियाँ बनती हैं, उनमें कड़े पंखदार बीज होते हैं। फलियाँ फटती हैं और बीज हवा में तैरते हुए आसपास जमीन पर आ गिरते हैं। तेजी से बढऩे वाले सुंदर सिल्वर ओक के पेड़ प्राय: घरों की चाहरदीवारी के साथ-साथ या शहर की सड़कों के किनारे लगाए जाते हैं। चंडीगढ़ शहर में इन पेड़ों की शोभा देखते ही बनती है। मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि ऊपर पेड़ पर से आवाज आई– काँव! काँव! सिल्वर ओक के पेड़ों और कौवों की जोड़ी से विदा लेकर मैं अगले पेड़ की ओर बढ़ा, जो दूसरी कालोनी के पास स्कूल के लम्बे-चौड़े प्रांगण में खड़ा था। यानी पीपल का विशाल पेड़।

छुट्टी का दिन था। वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। मैं जाकर उस विशाल पीपल के पेड़ के पास गया, उसके सीने से लगा और प्रणाम करके उसकी जड़ के पास बनी ऊँची मेंड़ पर बैठ गया। गर्मियों की उस तपती दोपहरी में भी पीपल की चमकीली पत्तियाँ हवा के झौंकों से सरसरा रही थीं। उसकी छाँव में मुझे हवा का शीतल झौंका छू गया। मेरे चेहरे पर खुशी के भाव देखकर जैसे पीपल बोला, ”ऐसा खुली हवा और खुला आसमान चाहिए मुझे। बच्चे आते हैं और मेरी छाँव में खूब खेलते हैं। शाखाओं पर पक्षी दिनभर चहचहाते हैं। तब मेरा सीना और भी चौड़ा हो जाता है, समझे?’’ उम्रदराज पीपल ने जैसे मुझसे पूछा।

”समझ रहा हूँ…समझ रहा हूँ।’’ मैंने मन-ही-मन दुहराया। हम आपस में विचारों से ही बातें कर रहे थे। मैंने कहा, ”आप तो हमारे लिए बहुत ही पवित्र वृक्ष हैं। सदियों से हम आपकी पूजा करते आ रहे हैं…’’ अभी मैं अपनी बात कह ही रहा था कि पीपल ने जवाब दिया, ”वह सब तो ठीक, लेकिन कई चिडिय़ों ने मुझे बताया कि तुम लोग पूजा के नाम पर मेरे कई बिरादर पेड़ों के पैताने इतनी गंदगी फैला देते हो कि कोई मनुष्य मेरी छाँव में बैठ भी नहीं सकता। यह कैसी पूजा है? मेरे आसपास साफ-सफाई रखो, मुझे खाद-पानी दो– सबसे बड़ी पूजा तो यही होगी।’’

”आप ठीक कह रहे हैं दादा।’’ मैंने बुजुर्ग पीपल से कहा। फिर उन्हें बताया, ”आपको हम लोग बोधि वृक्ष भी कहते हैं। बिहार के बोध गया में आपका ही बिरादर वह बोधि वृक्ष आज भी है, जिसके नीचे बैठ कर राजकुमार सिद्धार्थ ने तपस्या की थी। उन्हें उसकी छाँव में ज्ञान प्राप्त हुआ था और तब वे भगवान बुद्ध कहलाए। उस पीपल की टहनियाँ बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका, जापान, थाइलैंड, इंडोनेशिया और नेपाल आदि देशों को भेजी गईं। उन टहनियों से वहाँ भी पीपल पनपे।’’

”अब ये बातें तो तुम्हीं जानो, पर अच्छा किया मुझे भी बता दिया।’’

”धन्यवाद दादा। एक बात और। आप और आपके बिरादरों की उम्र तो सैकड़ों, हजारों साल होती है। दीर्घजीवी हैं आप।’’

”दीर्घजीवी तो हैं, अगर आदमी हमें लम्बी उम्र जीने दे तब ना। विकास के नाम पर वे हमें उखाड़ फैंके तो फिर कैसी लम्बी उम्र? तुम्हारे शहरों में और कई सड़कों के किनारों से हमारे बहुत से बुजुर्ग बिरादरों का नामो निशान मिटा दिया गया है।’’ बड़े दर्द के साथ पीपल ने कहा। मैंने उसके सीने से लग कर मन-ही-मन क्षमा माँगी और उसे पुन: प्रणाम करके तपती सड़क पर निकल आया। सड़क पर चलता रहा, चलता रहा और चौराहे पर पहुँच गया, जहाँ दो बेटियाँ एल्सटोनिया यानी सप्तपर्णी की घनी छाँव में बस का इंतजार कर रही थीं।

एल्सटोनिया कड़ी धूप में दम साधे मौन खड़ा था। मैंने उसे छुआ और बाँह के घेरे में लिया। उस शांत-प्रशांत पेड़ को देखकर मैं हैरान हुआ कि अंग्रेेजी में उसे ‘डेविल्स ट्री’ यानी शैतान का पेड़ क्यों कहा गया होगा? खैर, हम आदमियों में भी कई नाम स्वभाव के विपरीत रख दिए जाते हैं। हिन्दी में इसे ‘छतीनÓ शायद इसके घने छत्र के कारण कहा गया होगा। हिन्दी, मराठी में यह सप्तपर्णी भी कहलाता है, जिसका कारण समझ में आता है क्योंकि टहनियों के सिरे से इसकी अकसर सात पत्तियाँ घेरे में निकलती हैं।

एल्सटोनिया शायद मेरी बातें समझ गया था। मुझे लगा– वह कह रहा है– नाम में क्या रखा है भाई? मैंने मन-ही-मन जवाब दिया, ”रखा है छतीन भाई, नाम में बहुत कुछ रखा है। जैसे– आपका वैज्ञानिक नाम हमें बताता है कि आप एल्सटोनिया स्कालेरिस हैं। आपका नाम जाने-माने वनस्पति विज्ञानी सी. एलस्टन के नाम पर रखा गया है, जो कभी स्काटलैंड की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। इसलिए एल्सटोनिया तो है आपका वंश और स्कालेरिस है आपकी जाति। स्कॉलेरिस यानी स्कॉलर मतलब विद्यार्थी। कभी आपके तने से विद्यार्थियों के लिखने के लिए तख्तियाँ बनाई जाती थीं। इसलिए आपकी जाति का नाम स्कॉलेरिस रखा गया।’’ मुझे लगा पढ़ाई-लिखाई से नाम जुड़ा होने के कारण एल्सटोनिया खुश हो गया है। वैसे इसकी असली खुशी तो इसमें बहार आने पर दिखाई देती है। सिरे की टहनियों पर पत्तियों के घेरे के बीच से हरे-सफेद रंग के नन्हे फूलों के गुच्छे निकलते हैं। जिनसे आसपास भीनी-भीनी खुशबू आती रहती है। बाद में उनमें लम्बी-लम्बी पतली खूब फलियाँ लगती हैं, जो शानदार छतीन का नया श्रृंगार करती हैं।

मैं पाँच पेड़ों से मिल कर उनकी बातें सुन चुका था और उन्हें अपनी बातें सुना चुका था। सिर ऊपर सूरज तप रहा था। प्यास लग आई। सहसा याद आया– इतनी तपाने वाली गर्मी में इन पेड़ों की प्यास कौन बुझाता होगा? केवल धरती माँ। उसे भी हम सीमेंट-कंक्रीट से पाट रहे हैं। जब तब माँ धरती में नमी होगी, इनकी जड़ें इन्हें जीवित रखेंगी।….ये पेड़ सदा जीते रहें, यह कामना लेकर मैं घर को लौट आया।

————

पुस्तक- वि‍ज्ञान और हम

लेखक: देवेन्द्र मेवाड़ी

मूल्य : 140 रुपये, सजि‍ल्द : 260 रुपये

प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन

433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम

गाजि‍याबाद-211014

ईमेल :anuraglekhak@gmil.com

गागर में सागर : स्मिता

vigyan aur hum

विज्ञान को अगर रोचक तरीके से लिखा जाए, तो किशोर छात्रों के लिए यह विषय जानकारीपरक होने के साथ-साथ मजेदार भी हो सकता है। विज्ञान को कुछ ऐसा ही बनाने का प्रयास किया है वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी ने। देवेन्द्र लगभग 25 पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें से ज्‍यादातर विज्ञान पर आधारित हैं। ‘विज्ञाननामा’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि प्रमुख किताबें हैं, जो किशोरों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। विज्ञान को सरल और रोचक अंदाज में लिखने के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लेखक उत्तराखंड के नैनीताल जिले से हैं। जो व्यक्ति प्रकृति के बीच ही पला-बढ़ा है, उससे बेहतर प्रकृति को और कौन समझ सकता है?

देवेन्द्र ने ‘वि‍ज्ञान और हम’ में कम शब्दों में विज्ञान के कई पहलुओं को खेल-खेल में बताया है। ‘सुनो मेरी बात’ अध्याय में लेखक ने अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों को याद करते हुए विज्ञान के प्रति अपनी रुचि के पनपने की बात बताई है। आसमान में चमकते सूरज, चांदनी बिखेरते चांद, आकाश में अनगिनत तारों, पहाड़, घाटियों, मैदानों, नदियों, पेड़-पौधों के बारे में भी ढेरों सवाल रहते हैं। अमीर खुसरो की एक पहेली ‘एक थाल मोती भरा..’ की मदद से लेखक ने सौरमंडल के बारे में बड़े ही रोचक अंदाज में बताया है। उन्होंने एक पत्र के माध्यम से पृथ्वी के बारे में कुछ खास जानकारियां दी हैं, जिससे जटिल टॉपिक भी पठनीय बन जाता है। आगे एलियन के माध्यम से पृथ्वी, उसकी गोलाई, लंबाई, भार, केंद्र के तापमान आदि के बारे में बिल्कुल अलग तरीके से पेश किया है। इसके अलावा, समुद्र की अनोखी दुनिया, धरती के तपने और पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण के उपायों के बारे में बड़े ही आकर्षक ढंग से बताया है।

‘ताबीज’ नाटक के माध्यम से उन्होंने अंधविश्वासों के पीछे के सत्य को उजागर करने की कोशिश की है। इस किताब की जान है महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, वैज्ञानिक मेघनाद साहा और माइकेल फैराडे के जीवन की झलकियों की दिलचस्प अंदाज में प्रस्तुति। यदि कहानी के फॉर्मेट और सरल भाषा में बात कही जाए, तो कठिन विषय भी आसानी से समझा जा सकता है। माता-पिता अपने बच्‍चों के लिए यह किताब खरीद कर उनका ज्ञानवर्धन कर सकते हैं।

(दैनि‍क जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण्‍, 08 मई 2016 से साभार)

पुस्‍तक- वि‍ज्ञान और हम
लेखक- देवेन्‍द्र मेवाड़ी
मूल्य – अजि‍ल्‍द-140 रुपये, सजि‍ल्‍द – 260 रुपये
प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजि‍याबाद-201014
ईमेल-anuraglekhak@gmail.com