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अच्छी कविता समय की जटिलता को समेटती है : वि‍ष्णु नागर

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

अजमेर : ‘‘हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं कि जो आसानी से समझ आ जाए, वह अच्छी और जो समझना जटिल हो, वह खराब कविता है या इसके विपरीत भी। जो कविता समय की जटिलता को समेटती है, वो अच्‍छी कविता है। सामाजिक परिवर्तनों को रेखांकित करना ही कविकर्म है।’’ ये विचार सुविख्यात कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर ने कवि व शिक्षाविद् डॉ. अनन्त भटनागर के नये काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। रविवार 7 मई, 2017 को सूचना केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संग्रह की कविताएं सामाजिक चेतना से संबद्ध हैं और समझने में भी सरल हैं। सरल अभिव्यक्ति कौशल अत्यन्त कठिन कार्य है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि युवा आलोचक डॉ. पल्लव ने कविता के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनन्त भटनागर की काव्यचेतना पर जन आन्दोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रतिष्ठित कवि-स्तंभकार प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं नये तेवर और प्रभावी शब्दावली को लिये हुए हैं।

चित्तौड़गढ़ से आये डॉ. राजेश चौधरी और वरिष्ठ काव्य आलोचक डॉ. बीना शर्मा ने पुस्तक पर विस्तृत आलेख पढ़ते हुए कहा कि वर्तमान की स्थितियों पर केन्द्रित होना इस संग्रह की विशेषता है। मोबाइल फोन, बाजार, नया साल और सेज में नयी सभ्यता के उपादानों को समझने की कोशिश की गई है। संग्रह का दूसरे खण्ड उम्र का चालीसवाँ में नितांत निजी अनुभूतियों के साथ रिश्तों में आते बदलाव को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं। शीर्षक कविता कथ्य में अनूठी और सच्चे स्त्री विमर्श की कविता है। डॉ. रजनीश चारण, कालिंदनंदिनी शर्मा और दिव्या सिंहल ने अतिथियों का परिचय दिया। नगर निगम उपायुक्त ज्योति ककवानी, शचि सिंह और वर्षा शर्मा ने संग्रह की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

स्वागत उद्बोधन में नाटककार उमेश कुमार चैरसिया ने कृति को मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। समारोह का संचालन गीतकार कवयित्री पूनम पाण्डे ने किया। डॉ. बृजेश माथुर ने आभार अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : उमेश कुमार चैरसिया

सहज और ईमानदार अभिव्‍यक्ति ही बड़ी कविता है : विष्‍णु नागर

हरीश करमचंदाणी

जयपुर : वरिष्‍ठ कवि एवं पत्रकार विष्‍णु नागर का कहना है कि आज के समय के सच को सहज रूप से और बेहद ईमानदारी के साथ व्‍यक्‍त करने वाली कविता ही बड़ी कविता है। वह जवाहर कला केन्‍द्र और हिन्‍दी प्रचार प्रसार संस्‍थान द्वारा सुपरिचित कवि हरीश करमचंदाणी के काव्‍य संग्रह ‘समय कैसा भी हो’ पर 11 दिसंबर को आयोजित  लोकार्पण समारोह में मुख्‍य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। उन्‍होंने कहा कि जैसी वैश्विक परिस्थितियाँ बन रही हैं, उनमें साहित्‍य ही मनुष्‍य को बचाने का काम कर सकता है।

अध्‍यक्षता करते हुए वरिष्‍ठ कवि विजेन्‍द्र ने कहा कि मानवीय श्रम और जिजीविषा को व्‍यक्‍त करने वाले कवि ही काल का अतिक्रमण करते हैं। कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. मोहन श्रोत्रिय, कवि नंद भारद्वाज और समालोचक राजाराम भादू ने काव्‍य संग्रह के विविध आयामों पर चर्चा की। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने आरंभ में काव्‍य संग्रह का लोकार्पण किया और हरीश करमाचंदाणी ने कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन प्रेमचंद गांधी ने किया।

प्रस्‍तुति : प्रेमचंद गांधी

कवियों-शायरों की नजर में आजादी

 

आजादी को लेकर देशवासियों ने बहुत से सपने देखे थे। नेताओं ने बड़े-बड़े वायदे किए, लेकिन अंतत: यह आजादी महज सत्ता स्थानांतरण साबित हुई। इसका लाभ एक वर्ग विशेष ही उठा रहा है। इसे लेकर कवियों-शायरों ने समय-समय पर चेताया भी। युवा पत्रकार देवेंद्र प्रताप ने ऐसी ही कुछ रचनाओं का संकलन किया है-

अगस्‍त 1947 में आज़ादी मिलने के कुछ ही समय बाद मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने इस आज़ादी को ‘दाग-दाग उज़ाला’ कहा। उन्‍होंने कहा:
ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शबगुज़ीदा सहर
वो इन्‍तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्‍त में तारों की आख़री मंज़ि‍ल
कहीं तो होगा शबे सुस्‍त मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा, सफ़ीन-ए-ग़मे-दिल……….
अली सरदार जाफ़री ने इस आजादी के बारे में लिखा :

कौन आज़ाद हुआ
किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
मादरे-हिन्‍द के चेहरे पे उदासी वही
कौन आज़ाद हुआ…

खंजर आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए
मौत आज़ाद है लाशों पे गुज़रने के लिए
कौन आज़ाद हुआ…

जब आज़ाद भारत की सरकार ने हकों-अधिकारों की बात करने वालों और जनांदोलनों को कुचलने में अंग्रेजों को भी मात देनी शुरु कर दी तो शंकर शैलेन्‍द्र ने लिखा :
भगतसिंह इस बार न लेना
काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी
सज़ा मिलेगी फांसी की

इप्‍टा ने आम लोगों की आवाज को अल्‍फाज़ दिए :
तोड़ो बंधन तोड़ो
ये अन्‍याय के बंधन
तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो…
हम क्‍या जानें भारत भी में भी आया है स्‍वराज
ओ भइया आया है स्‍वराज
आज भी हम भूखे-नंगे हैं आज भी हम मोहताज
ओ भइया आज भी हम मोहताज

रोटी मांगे तो खायें हम लाठी-गोली आज
थैलीशाहों की ठोकर में सारे देश की लाज

ऐ मज़दूर और किसानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
ऐ छात्रो और जवानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
झूठी आशा छोड़ो…
तोड़ो बंधन तोड़ा…

ख़लीलुर्रहमान आज़मी ने आज़ादी मिलने के दावे को नकार दिया-
अभी वही है निज़ामे कोहना अभी तो जुल्‍मो सितम वही है
अभी मैं किस तरह मुस्‍कराऊं अभी रंजो अलम वही है

नये ग़ुलामो अभी तो हाथों में है वही कास-ए-गदाई
अभी तो ग़ैरों का आसरा है अभी तो रस्‍मो करम वही है

अभी कहां खुल सका है पर्दा अभी कहां तुम हुए हो उरियां
अभी तो रहबर बने हुए हो अभी तुम्‍हारा भरम वही है

अभी तो जम्‍हूरियत के साये में आमरीयत पनप रही है
हवस के हाथों में अब भी कानून का पुराना कलम वही है

मैं कैसे मानूं कि इन खुदाओं की बंदगी का तिलिस्‍म टूटा
अभी वही पीरे-मैकदा है अभी तो शेखो-हरम वही है

अभी वही है उदास राहें वही हैं तरसी हुई निगाहें
सहर के पैगम्‍बरों से कह दो यहां अभी शामे-ग़म वही है

रघुवीर सहाय ने जन-गण-मन के ‘अधिनायक’ के बारे में कहा :
राष्‍ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्‍य विधाता है
फटा सुथन्‍ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्‍लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उने
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

विष्‍णु नागर ने तो राष्‍ट्रगीत की वैधता पर ही सवाल खड़ा कर दिया-
जन-गण-मन अधिनायक जय हे
जय हे, जय हे, जय जय हे
जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय
जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय
हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे
हें-हें, हें-हें, हें-हें, हें
हा-हा, ही-ही, हू-हू है
हे-है, हो-हौ, ह-ह, है
हो-हो, हो-हो, हो-हौ है
याहू-याहू, याहू-याहू, याहू है
चाहे कोई मुझे जंगली कहे।

शलभ श्रीराम सिंह ने लिखा-
तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल, सोच और सोचकर सवाल कर
किधर गये वो वायदे? सुखों के ख्‍वाब क्‍या हुए?
तुझे था जिनका इंतज़ार वो जवाब क्‍या हुए?

तू इनकी झूठी बात पर, न और ऐतबार कर
कि तुझको सांस-सांस का सही हिसाब चाहिए!

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए!

अंत में, शहीदों की ओर से
शहादत थी हमारी इसलिए
कि आज़ादियों का बढ़ता हुआ सफीना
रुके न पल भर को!
पर ये क्‍या?
ये अंधेरा!
ये कारवां रुका क्‍यों है?
बढ़े चलो, अभी तो
काफिला-ए-इंक़लाब को
आगे, बहुत आगे जाना है!

बाबा नागार्जुन ने अपनी विशिष्ट शैली में सवाल खड़ा किया-

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्‍कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्‍चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला
जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्‍बीस
उसीका पन्‍द्रह अगस्‍त है
बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्‍त है…

कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है
कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्‍त है?
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा
मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्‍त है
सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्‍त है
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्‍त है

पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मास्‍टर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
बच्‍चे की छाती में कै ठो हाड़ है!
देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है
फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है
फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है
ग़रीबों की बस्‍ती में उखाड़ है, पछाड़ है
धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्‍छों नहीं! कुच्‍छों नहीं
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
ताड़ के पत्‍ते हैं, पत्‍तों के पंखे हैं
पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है
कुच्‍छों नहीं, कुच्‍छों नहीं…
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है!
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है!
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्‍त है
मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्‍त है
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्‍त है…