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बुद्धिमान राजा : फ़ैयाज़ अहमद

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यह कहानी है जंगल के राजा शेर की। शेर और राजाओं की तरह नहीं था। यह राजा था बड़ा चालाक, बड़ा शातिर। हर काम सोच-विचार कर करता। हर निर्णय संभल कर लेता। यही कारण था कि वह वर्षों से राज कर रहा था। कभी-कभार किसी कोने से अगर विरोध की हल्की-सी भी चिंगारी उठती, उस पर फ़ौरन पानी डाल देता। मंत्री से संतरी तक सभी राजा की बुद्धिमानी के क़ायल थे।

एक दिन राजा को अचानक विचार आया कि उसके मंत्रीमंडल में एक भी पक्षी नहीं है। फिर उसने सोचा, ‘क्यों न अपने मंत्रीमंडल में इस बार पक्षियों को भी शामिल कर लिया जाए।’

और राजाओं की तरह यह राजा अपनी राय या अपना विचार किसी पर थोपता नहीं था, क्योंकि उसे थोपने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। उसने बड़ी विनम्रता से अपने दिल की बात अपने मंत्रियों से कही। अब राजा का मन था और उसका विचार, कौन मना करता। सारे मंत्रियों ने बिना सोचे-समझे ‘हाँ’ में सिर हिला दिए। महामंत्री गीदड़ की पक्षियों से कभी नहीं बनती थी। गीदड़ राजा की इस सोच से ख़ुश तो नहीं था मगर ‘ना’ कहने की उसमें हिम्मत नहीं थी। ‘जान की अमान पाऊं तो कुछ कहूँ?’ राजा ने अपने शाही अन्दाज़ में मुस्कराते हुए कहा, ‘‘इजाज़त है!’’ महामंत्री गीदड़ बोला, ‘‘महाराज की सोच कभी ग़लत हुई है? महाराज ने कुछ सोचकर ही पक्षियों को मंत्रीमंडल में शामिल करने का निर्णय लिया होगा। बस एक समस्या है……।’’ महाराज ने बात पूरी ही नहीं होने दी और बड़े प्यार से बोले, ‘‘कैसी समस्या?’’

महराज की इसी अदा पर तो पूरा मंत्रीमंडल जान छिड़कता था। वह कभी गुस्सा नहीं होते थे। फिर भी गीदड़ डर गया और उसने कांपते स्वर में अपनी बात पूरी की, ‘‘…पक्षियों का एक विशाल समूह है, इसमें से कौन उनका प्रतिनिधि बनेगा? और कैसे?’’ राजा मुस्कराए, बारी-बारी से सभी को देखा और बोले, ‘‘एक आम सभा में, मैं ख़ुद पक्षियों का नेता नियुक्त करुँगा। मुनादी करवा दी जाए।’’

मुनादी हो गई। पक्षियों के बीच बड़े उत्साह का माहौल बन गया। हर तरफ़ जश्न मनाया जाने लगा। पटाख़े छूटने लगे। गीत-संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। राजा की जय-जयकार हो रही थी, जैसे राजा ने उन्हें मंत्रीमंडल में जगह नहीं, बल्कि पूरा राज-पाट देने का फैसला कर लिया हो। ख़ैर जो भी हो उनके लिये तो बड़ी बात थी। पहली बार उनकी ओर से किसी को राजा के समक्ष उनकी समस्या रखने का मौक़ा मिल रहा था। उनके लिये यही काफ़ी था। अब उनके सामने एक ही समस्या थी। बहुत बड़ी समस्या!! कौन होगा उनका नेता? कौन लड़ेगा उनकी ओर से? यह विचार आते ही रंग में भंग पड़ गया हो, जैसे। सभी सिर जोड़ कर बैठ गए। तय हुआ कि पक्षियों की एक आम सभा बुलाई जाए। आनन-फ़ानन सभा भी बुला ली गई। सभी पहुँचे, यहाँ तक कि उनके समर्थन में कीड़े-मकोड़े भी आ गए, मगर एक ग़ायब था… भटकू कौवा! वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी अनुपस्थिति को लेकर सभी बातें करने लगे।

‘‘जब मुनादी हो रही थी, उस समय भटकू ही सब से आगे-आगे था।’’

‘‘कहाँ चला गया?’’

‘‘अपने रिश्तेदार के यहाँ तो नहीं चला गया?’’

‘‘इस स्थिति में कोई ऐसा कैसे कर सकता है?’’

‘‘मगर वह है कहाँ?’’

‘‘उसे तलाश किया जाए।’’

‘‘उसे राजमहल की तरफ़ जाते देखा गया है!’’

‘‘मतलब!’’

‘‘आप ख़ुद समझ लीजिये।’’

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘इधर कुछ दिनों से भटकू को कई बार राजमहल की ओर जाते देखा गया है।’’

‘‘हो सकता है, वह उधर किसी और काम से गया हो?’’

सभा में इसी तरह की बातें होती रहीं, मगर उनका नेता कौन होगा, यह तय नहीं हो पाया। अब सभी की नज़र थी आम सभा पर।

आम सभा में सभी ने अपने-अपने कमाल दिखाए। बुलबुल ने गाना सुनाया तो मोर ने नाच दिखाया। मगर बात बन नहीं रही थी। नाचने या गाने से मंत्रीमंडल का काम नहीं चल सकता था। ख़बर लाने-ले जाने के लिये तो कबूतर ठीक था… मगर एक मंत्री के रुप में? नहीं, नहीं… राजा को कुछ जँचा नहीं। जँचता भी कैसे? आँखों में तो कोई और बसा था। शाम होने वाली थी। परिणाम की घोषणा भी करनी थी। राजा उठे। प्यार से थोड़ा ग़ुर्र-ग़ुर्र किया, दहाड़ कर गला साफ़ किया, पंजों को हिला-हिला कर अपनी जनता को अपनी तरफ़ आकर्षित किया, फिर मुस्कराते हुए एक ओर देखा और किसी को मंच पर आने का इशारा किया। भटकू कौवे को मंच पर लाया गया। पूरा मजमा स्तब्ध था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि भटकू को मंत्री बनाया जाएगा। वैसे भटकू ने यहाँ तक पहुँचने में बड़ी मेहनत की थी। इतने पापड़ बेले थे कि ख़ुद लाग़र हो गए थे। लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है? मंत्री तो बन ही गए…सभा समाप्त हो गई। एक बार फिर से पूरा जंगल राजा की जय-जयकार से गूंज उठा।

लेकिन बहुतेरों के मन में एक सवाल था,… ‘भटकू राजा का प्रतिनिधि बना या पक्षियों का?’

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र, बीएसी-2

लोकतंत्र के लिए खतरा : अनुराग

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लगाता है कि यह लोकसभा चुनाव दूरगामी परिणाम वाले होगा, लेकिन डर इस बात है कि यह चुनाव सकारात्मक चीजों के लिए नहीं, बल्कि नकारात्मक बातों के लिए अधिक याद किया जाएगा। इस चुनाव में कुछ ऐसी कुप्रवृत्तियां पनप चुकी हैं, जो कि लोकतंत्र के लिए घातक साबित होंगी। चुनाव के दौरान एक-दूसरे पर आरोप लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार जिस घटिया स्तर के आरोप लगाए जा रहे हैं, यह चिंताजनक है। इसमें छुटभैय्या नेता ही नहीं, बड़े कहे जाने वाले नेता भी पीछे नहीं हैं। इस पर विरोध होने पर ये नेता अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय कुतर्क कर रहे हैं। दुखद यह है कि पार्टियां या तो चुप्पी साध ले रही हैं या बचाव में उतर रही हैं।

लोकतंत्र में असहमति को भी महत्व दिया जाता है। इस चुनाव में असहमति होने पर लोग उग्र होकर अराजकता पर उतर रहे हैं। गाली-गलौच से लेकर मारपीट व हमले तक किए जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव का समर अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, यह कुप्रवृत्ति तेज होती जा रही है। यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। असहमति को सहन न कर पाना एक तरह की बर्बरता है। यह तानाशाही की शुरुआत है। लोकतंत्र में विरोधी की भी बात सुनकर उसका समाधान करने या उसका तर्क संगत जवाब दिया जाता है, लेकिन अब बाहुबल से मुंह बंद करने पर जोर है। राजनेता टुकड़े-टुकड़े करने, जमीन में गाड़ देने जैसी धमकियां नाम ले-लेकर दे रहे हैं। दूसरी ओर एक ने तो चेता दिया है कि जो उनकी पार्टी के नेता को विरोध करेगा, उसे पाकिस्तान भेज दिया जाएगा। कोढ़ की खाज यह कि एक नेता ने तो अपनी कौम को सांप्रदायिक होने की सलाह तक दे दी। इससे अराजकता ही बढ़ेगी और जनहित की बातें पीछे रह जाएंगी।

इस बार के चुनाव की यह भी देन है कि नेता ब्रांड बन गए हैं। पार्टियां साम दाम दंड भेद से दूसरी पार्टी के नेताओं की छवि धूमिल करने और अपनी पार्टी के नेताओ की छवि चमकाने में लगी हैं। इसके लिए करोड़ों खर्च कर पीआरओ कंपनियों की मदद ली जा रही है। पहले नेता अपने और अपनी पार्टियों के कामों का उल्लेख कर और भविष्य की योजनाएं (उन पर अमल कितना होता था, यह दूसरी बात है) लेकर लोगों के बीच जाते थे और अब इस पर जोर है कि लोगों के बीच कैसी बॉडी लैंग्वेज हो, कैसे कपड़े हों, जो उन्हें आकर्षित करे। पार्टियां पैसा पानी की तरह बहा रही हैं। इतना पैसा कहां से और कैसे आ रहा है, इसका लेकर सभी गोलमाल जवाब दे रही हैं। नेताओं के भाषणों पर ताली पीटनेवाली आम जनता भी नहीं सोच रही कि आखिर चुनाव बाद इसका बोझ किस पर पड़ेगा? यह समझना मुश्किल नहीं है कि चुनाव के बाद सरकार चाहे जिसकी बने, जनहित में योजनाएं बनेंगी या उनके लाभ का ध्यान रखा जाएगा, जो पैसा लगा रहे हैं!

इस चुनाव को देखकर यह भी लग रहा है कि भारत में अधिनायकवाद का उदय हो चुका है। पार्टी स्तर पर टिकट वितरण और अन्य फैसले लेने में जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी (भले ही ढोंग सही), अब वह भी नहीं हो रहा है। दूसरी पार्टियों पर ‘एक परिवार का शासन’ का आरोप लगाने वाली पार्टियों में भी सामुहिक विचार-विमर्श के बाद निर्णय लेने के बजाय फैसले थोपे जा रहे हैं। विरोध करने वाले या असहमति जताने वाले को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है या उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। जब पार्टी नेताओं की असहमति बर्दाश्त नहीं हो रही है, तो देश में विपक्षी पार्टियों होती हैं और दूसरी विचारधारा के लोग भी, तब?

पार्टियां ये सब इस दावे के साथ कर रही हैं कि उन्हें देश और आम लोगों की चिंता है। इससे उनकी नीयत पर शक और गहराता है, क्‍योंकि‍ देश व जनता का हि‍त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्‍य होता तो, नि‍चले तबके तक भी सुवि‍धाएं पहुंचतीं, उनका जीवन-स्‍तर सुधरता, न कि‍ केवल कुछ मुट्ठी भर लोग लोकतंत्र की मलाई चाट रहे होते।

अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र : अनिल सिन्हा

हाल ही में (25 फरवरी को) जाने-माने लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा का नि‍धन हो गया है। श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप में उनका यह यात्रावृतांत दि‍या जा रह है-

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

वह एक ठंडा दिन था। 31 दिसंबर, 2008 की मध्य रात्रि, कुहराविहीन, झक्क तारों से भरे आसमान में अमेरिकी बत्तियों की तेज रोशनी तुरंत ही कहीं गुम हो जा रही थी। अमेरिका में और शायद पश्‍चि‍म में भी दो बड़े त्यौहार समारोह होते हैं- बड़ा दिन (क्रिसमस) और नया साल। सैन फ्रांसिस्‍को में नये साल का भारी उत्सव होता है। पूरी बे एरिया (खाड़ी) के शहर से लोग सैन फ्रांसिस्को के घंटाघर के खुले में इकट्ठे होते हैं। पुराने साल की वि‍दाई देने के लिए और नए साल का स्वागत करने के लिए। प्रशांत महासागर की खाड़ी पर बसा सैन फ्रांसिस्को इस समय जन समुद्र की लहरें एक तरह से संभाल नहीं पा रहा है। फ्रीमांट से हम भी सैन फ्रांसिस्को के इस समुद्र में खो गए थे। मेरे लिए नया अनुभव था जहां उम्र और अवस्था, काले-गोर का भेद नहीं था। कोई एक समारोह-उत्सव था जो लोगों को जोड़े हुए था इस घंटाघर चौक से। शीत की परवाह नहीं, लोग कॉफी पी रहे हैं, आइसक्रीम, बर्गर और पेस्ट्री खा रहे हैं, कोक पी रहे हैं और बारह बजने का इंतजार कर रहे हैं। एक दूसरे पर गिरते पड़ते व घंटाघर के नजदीक पहुंचना चाहते हैं। चारों ओर ऊंची अट्टालिकाएं हैं। विशाल होटल सीरीज बल्ब से जगमगा रहे हैं। दूर-दूर तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट (गो की अमेरिका में सार्वजनिक यातायात अच्छा नहीं है) और निजी वाहन का पता नहीं। आज सब प्रतिबंधित हैं और सुरक्षा के जवान चारों ओर छितराए हैं- पूरी तरह से चौकस। बिल्ली की तरह उनकी नजरें चारों ओर घूम रही हैं पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही हैं। बारह बजा और पटाखों और विभिन्न प्रकार की आतिशबाजियों से सैन फ्रांसिस्को जगमगा उठा। ऐसी ही आतिशबाजियां तमाम लोगों के मन में छूट रही थीं। यहां हम विदेशी थे फिर भी पूरा माहौल अच्छा लग रहा था, खुशियों से भरा हुआ और उन युवाओं का तो पूछना ही क्या जिन्होंने प्यार की दुनिया की पहली यात्रा शुरू की थी। अभी तो कुछ ही कदम चले थे। पूरी यात्रा बाकी थी…

हम फ्रीमांट से सैन फ्रांसिस्को ‘बार्ट’ (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट डिस्ट्रिक्ट- इसे बोलचाल में यहां बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट भी कहते हैं) से आए थे। वापसी भी उसी से थी क्योंकि आज निजी वाहन समारोह स्थल तक पहुंच ही नहीं सकते थे। छोटी दूरी की रेल सेवाओं में ‘बार्ट’ सबसे सुव्यवस्थित सेवा मानी जाती है। (कुछ दूरी तक इसे समुद्र के नीचे से भी गुजरना पड़ता है)। कुछ सेवायें सैन फ्रांसिस्को से सीध हैं, कुछ बीच में तोड़कर यानी सेवा बदल कर फ्रीमांट पहुंचती हैं। सुरक्षा का प्रबंध बार्ट में भी है। जिस तरह भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) होते हैं, उसी तरह ‘बार्ट’ में भी बार्ट पुलिस हैं- अपने ‘काम’ में पूरी तरह चाक चौबंद।

31 दिसंबर 2008 की मध्य रात्रि थी पूरी तरह सर्द और हमारे लिए हाड़ भेदने वाली फिर भी बहुत उत्साह के साथ लोगों ने सन् 2009 का स्वागत किया था। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि रात कितनी सर्द है या समय कितनी तेजी से भाग रहा है पर लोगों को पता था कि तीन बजे भोर में अंतिम गाड़ी जाएगी। फिर ट्रेनें विराम लेंगी और सुबह से ही शुरू हो पाएंगी। इसी अहसास के कारण लोगों के समय बंध गए थे और भीड़ लगातार ‘बार्ट’ स्टेशन की ओर भाग रही थी। अमूमन यहां की बसें और ट्रेनें खाली होती हैं पर उस दि‍न सर्द रात में भी ट्रेनें ठसाठस भरीं थी। हम दो बजे तक ही स्टेशन पहुंच पाए तब पता चला कि सीधी फ्रीमांट जाने वाली अब कोई ट्रेन नहीं हैं। हमें बीच के किसी स्टेशन संभवत ओकलैंड में ट्रेन बदलनी होगी। एशियाई मूल के हर उम्र के लोगों से स्टेशन भरा था। उनमें काले लोगों की संख्या ज्यादा थी। अमेरिकी नागरिकों में काले लोगों की संख्या काफी है, फिर भी वे कानूनी दृष्टि से हर चीज में बराबर हैं। जहां मेरिट का मामला है अगर वे उसमें आ जाते हैं तो किसी गोरे अमेरिकी नागरिक को वहां नहीं डाल दिया जाएगा, पर अंदर कहीं एक जातीय श्रेष्ठता का दर्प गोरे अमेरिकी नागरिकों में मौजूद है। कई जगह इसके उदाहरण भी मिलते हैं। व्यवहार में ऐसी जातीय श्रेष्ठता या काले होने के कारण उसे दोयम दर्जे का मानाना दीखता है।

शायद यह संयोग ही होगा कि हमारे आगे युवाओं का एक जत्था चलता रहा। उनमें पांच लड़के और तीन लड़कियां । सभी 20 से 25 वर्ष के आसपास रहे होंगे- पर्व के उत्साह से भरे हुए- बहस, हंसी ठट्ठा, थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे पर उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे उनके युवा- मस्ती व फाकेमस्ती के दिन थे। वे काम भी करते थे, पढ़ भी रहे थे। अपनी प्रेमिकाओं से शादी भी करना चाहते थे और रि‍सेशन (व्यापक छटनी, मंदी, बेरोजगारी) से डरे हुए थे। दुनिया के पहले देश का युवा नागरिक बेरोजगारी व अनिश्‍चि‍त  भविष्य ये चिंतित था। वे इन्हीं बातों को लेकर आपस में बहस भी कर रहे थे और शायद बुश प्रशासन की आलोचना भी जिसने अमेरिका को गारत में डाल दिया। उनकी बातें शायद कुछ सफेद, गोरे बुजुर्गों को अच्छी नहीं लग रही थीं। वे भी हमारे साथ ही चल रहे थे और भीड़ के दबाव के कारण कभी उन्‍हीं की तरफ हो जाते तो कभी हमारी तरफ। वे उन्हें घूर रहे थे। हमारी ओर भी देख रहे थे पर उन्हें अहसास हो गया कि हम एशियाई विदेशी हैं।

ट्रेन आई। भीड़ जितनी उतरी उससे ज्यादा चढ़ गई। हम सब एक ही डिब्बे में चढ़े पर एक किनारे हम थे और दूसरे किनारे आठ युवाओं की वह जत्था और गोरे अमेरिकी। युवाओं का जत्था पहले की तरह  उन्मुक्त होकर बातें कर रहा था, कभी-कभी उनकी आह्लाद भरी चीख हमारे पास भी पहुंच रही थी जिससे लगता था कि गाड़ी की गति के शोर, भीड़ भरे डिब्बे का शोर चीर कर अगर वह हमारे तक पहुंच रही है तो उस आह्लाद में कितना जोश होगा। नये साल के स्वागत ने शायद उनमें आशाएं भर दी थीँ क्योंकि ओबामा उन्हीं की बदौलत उन्हीं की बिरादरी का देश का सर्वशक्तिशाली नेता बन गया था और बुश प्रशासन के विभिन्‍न कदमों के विरुद्ध निर्णय लेने की सार्वजनिक घोषणाएं कर चुका था। खासतौर से इस खाड़ी क्षेत्र और कैलिफोर्निया से उसे भारी समर्थन मिला था।

ट्रेन की गति काफी तेज थी। इस बीच उन गोरे बुजुर्गों में कोई कहीं बार-बार फोन कर रहा था। उनके चेहरों पर संताप व क्षोभ के भाव रहे होंगे। डिब्बे में तेज रोशनी होते हुए भी जहां हम बैठे थे वहां से उनका चेहरा नहीं दिख रहा था। गाड़ी बीच में ही (शायद टवे, ओकलैंड) रुक गई। उसका अंतिम पड़ाव यहीं था। अब हमें दूसरी गाड़ी में सवार होकर फ्रीमांट पहुचना था। डिब्बे में जो सुखद गर्मी थी वह प्लेटफार्म पर आकर लहूलुहान हो गयी। हमने अपने कोर्ट के कालर खड़े कर लिए। मफलर को इस तरह लपेटा जो कान, गला ढंकते हुए सिर पर पहुंचकर टोपी का भी काम दे दे। गो कि यह मौसम यहां पतझड़ का था पर ठंड मेरे लिए दुख पहुंचाने वाली स्थिति तक जा रही थी- रात्रि के ढाई बज रहे थे। इसी समय प्लेटफार्म पर गोली चली, उसकी बहुत धीमी आवाज के बावजूद वह हमें सुनाई दे गई क्योंकि जितने लोग भी यहां चढऩे-उतरने वाले थे सब चुपचाप अगली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, सर्द रातें वैसे भी काफी सन्नाटा भरी होती हैं। गाड़ी दो मिनट बाद आने वाली थी।

गोली की आवाज से हम चौंके। जिस डिब्बे से हम उतरे थे उसी के दूसरे दरवाजे के सामने गोली चली थी और उन आठों में से एक गठीला नौजवान प्लेटफार्म पर खून के बीच तडफ़ड़ाकर शांत हो चुका था। बार्ट पुलिस के एक अधिकारी ने उसे गोली मार दी थी। अधिकारी गोरा था जोहान्स मेहशर्ल। बार्ट पुलिस ने उन्हें घेर रखा था और बाकी लोगों को वहां से हटा रही थी। लोगों को हटाने के लिए महिला पुलिस को तैनात किया गया था। शायद पुलिस लोगों को लिंग संबंधी कमजोरी को जानती थी। पर प्लेटफार्म पर ही बार्ट पुलिस के विरोध में नारे लगने शुरू हो गए। नारे उस जत्थे के बचे सात साथियों ने शुरू किये जो एकदम से प्लेटफार्म के इस पार से उस पार फैल गए। मीडिया ने तत्काल कवर किया। कुछ ही देर में खबर आग की तरह फैल गई। और प्लेटफार्म के बाहर शहर का जो हिस्सा था वहां से भी नारे की आवाजें आ रही थीं। वह लड़का ओकलैंड का निवासी ऑस्कर ग्रांट था। वह काम भी करता था, पढ़ाई भी करता था। उसकी एक बेटी थी और वे फरवरी, 2009 में किसी तारीख को शादी करने वाले थे। बाइस साल के किसी युवा को तड़प कर शांत होते हुए मैंने पहली बार देखा था। इस घटना ने मुझे सन्न कर दिया था। स्टेशन पर ट्रेन आने की जो सूचना आ रही थी वह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी। सन् 1984 में जब भारत में सिख विरोधी दंगा हुआ था, तब लखनऊ जंक्‍शन के बाहर कुछ सांप्रदायिक उग्रवादी हिंदुओं द्वारा मैंने एकसिख युवा को जलाया जाते हुए देखा था। वहां स्टेशन पर पंजाब मेल घंटों से रुकी थी, वह कब आएगी इसकी कोई सूचना नहीं आ रही थी। सारा देश स्थगित था उस दिन। पंजाब मेल से ही आनंद स्वरूप वर्मा, अजय सिंह तथा पार्टी के विभिन्न साथियों को कलकत्ता सम्मेलन में जाना था। मैं उन्हें विदा करने आया था क्योंकि मेरा जाना संभव नहीं हो पाया था। उस एक घटना ने मुझे कई साल तक परेशान किया। आज भी वह समय-समय पर एक काले निशान की तरह उभरता है और असहज कर जाता है- कम से कम उस दिन तो कोई काम नहीं हो पाता। और इतने वर्षोँ बाद एक काले अमेरिकी नागरिक की गोरे अमेरिकी पुलिस के एक हिस्से द्वारा सरेआम पहली तारीख के नव वर्ष पर्व के दिन हत्या कर दिया जाना…

हम जानते हैं कि अमेरिकी पुलिस लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है। उसके लिए वह किसी हद तक जा सकती है (इसके ताजा उदाहरण हावर्ड के प्रोफेसर के साथ बदसलूकी, पिछले दिनों भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम, शाहरुख खां आदि की घटनाओं को लिया जा सकता है)

दरअसल, अमेरिकी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को लेकर बहुत सारे प्रश्‍न उठते रहे हैं। मसलन इस पुलिस पर किसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण है- वहां के कॉरपोरेट घरानों का, राजसत्ता का ? क्योंकि हावर्ड के प्रोफेसर की तमाम दलीलों के बावजूद उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाना और बाद में पुलिस के उस छोटे से अधिकारी को ओबामा द्वारा आमंत्रित कर बियर पिला कर एक तरफ उसे हीरो बना देना और दूसरी तरफ पुलिस की ज्यादतियों को किसी आवरण में लपेट कर जस्टीफाई करना। संभवत: कछ ऐसा ही रुख होगा जिसके कारण घोर जन प्रतिरोध के बावजूद आस्कर ग्रांट के हत्यारे पुलिस अधिकारी को अब तक कोई सजा नहीं हुई। उसने दूसरे दिन ही यानी पहली जनवरी, 2009 को अपने कार्यालय जाकर बड़े अधिकारियों के सामने त्यागपत्र दे दिया जो स्वीकार भी कर लिया गया और व्यापक जन प्रतिरोध व मीडिया की भूमिका के कारण उसके विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया। बस मामला ठंडे बस्‍ते में पड़ गया है गो कि समय-समय पर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी होते ही रह रहे हैं। अमेरिका में इस मानी में व्यापक लोकतंत्र है कि लोग खुले तौर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्हें तंग नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (जिसके सर्वेसवा हैं चेयरमैन बॉब अवेकन) के कुछ फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन जैसे बे एरिया रिवोल्यूशन क्लब, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स आदि ने इस घटना को लेकर 22 मार्च, 2009 को ओकलैंड में एक बड़ा प्रदर्शन किया। उन्होंने जन अदालतें भी लगाईं और पिछले 15 वर्षों में कानून लागू कराने के नाम पर हजारों काले नागरिकों को वहां की पुलिस द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने की एक लिस्ट भी जारी की और सबके विरुद्ध चल रहे मुकदमें को न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने की मांग की। ऐसे कुछ लोगों के नाम हैं- ऑस्कर ग्रांट, अमाडू डिआलो, ताइशा मिलर, जे रॉल्ड हाल, गैरी किंग, अनीता गे, जुलिओ परेड्स, असा सुलिवान, मार्क गार्सिया, रैफेल ग्रिनेत, ग्लेन विलिस, रिचर्ड डी सैन्टिस आदि थे। ये केवल कैलिफोर्निया खाड़ी क्षेत्र के ही काले अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, बल्कि इनमें न्यायार्क के भी लोग हैं। इन्हें गोलियों से, पीट-पीट कर और आंख-मुंह में मिर्ची का चूरा झोंक कर यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया। यह ठीक उसी तरह का कृत्य था जैसा अमेरिका के ईजाद के बाद आम लोगों को भूखे रखकर, बीमारी की हालत में छोड़कर, सोने की जगह न देकर, कोड़ों से पिटाई कर-यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। लगभग तीन सौ साल बाद आज अमेरिका अपने को हर तरह से दुनिया का ‘नंबर वन’ देश घोषित करता रहाता है। ओबामा ने भी अपने शुरुआती भाषण में यही कहा था कि हम दुनिया के नंबर वन देश हैं और भविष्य में भी बने रहेंगे।

मेरे वहां रहते ही एक दूसरी घटना घटी,  बीस साल का ब्रैंडनली इवांस नवंबर, 2008 में सैन फ्रांसिस्को पढ़ाई और नौकरी के लिए सैन्टियागो से आया था। सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध गोल्डेन गेट ब्रिज के पास उसने शेयर में एक फ्लैट लिया था, पर दिसंबर के अंत में गोल्डेन गेट ब्रिज पार्क में उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस जिस तरह से इस मामले की छानबीन में उदासीन दिखाई दे रही है, उससे वहां के लोगों को अंदाज है कि शायद इसमें पुलिस की भी भूमिका है क्योंकि वह इलाका अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण है और सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस।

अमेरिकी पुलिस कानून लागू कराने के लिए तो किसी हद तक जा सकती है पर उसकी केवल यही भूमिका नहीं है- अपराध रोकना उसकी मुख्य भूमिका है। पर अमेरिका में अपराध बेतहाशा हैं चाहे हत्या हो, अपहरण हो, या अपराध के जितने भी रूप हो सकते हें। जि‍स अपराध को हम अपनी आंखों के सामने देख आए हैं, वह अमेरिकी पुलिस की तस्वीर बहुत साफ करती है।

पूरा प्रकरण देखते हुए लगता है कि अपराध जगत में यहां भी कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूंजीपतियों का हाथ है। एक उदाहरण देकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूंगा क्योंकि मेरे फ्रीमांट में रहते हुए यह मामला उछला था। इलेना मिशेल नाम की एक लड़की थी जो 13 वर्ष की उम्र में ही पूरे बे एरिया (खाड़ी क्षेत्र) में आइस स्केटिंग में नंबर एक पर पहुंच गई थी और 30  जनवरी, 1989 के ओलंपिक गेम्स में भागीदारी की उसकी दावेदारी तय हो गई थी। 30 जनवरी, 1989 में उसका अपहरण कर लिया गया। आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। अमेरिका स्टेट डिपार्टमेंट आफ जस्टिस की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैलि‍फोर्निया राज्‍य से पचास बच्‍चों का अपहरण होता है और उनका मि‍ल पाना असंभव सा ही होता है, बल्‍कि‍ वहां के संघीय आंकड़ों के अनुसार गायब बच्‍चों में से केवल एक प्रति‍शत ही 10 वर्षों की अवधि‍ में वापस आ पाते हैं।

फ्रीमांट लौटने के लि‍ए ट्रेन कुछ देर से मि‍ली। भारी मन से हम सवार हुए। ठंड गायब हो चुकी थी और मन पर तकलीफ का एक कुहासा छा गया था। आज भी वह घटना याद आती है तो प्रशांत महासागर की खाड़ी का सारा सौन्‍दर्य ति‍रोहि‍त हो जाता है और रातभर नींद नहीं आती…।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या, अक्‍टूबर, 2009 से साभार)

लोकतंत्र को उम्रकैद: प्रणय कृष्ण

डा. बिनायक सेन को उम्रकैद की सजा के खि‍लाफ देश-वि‍देश में आवाज तेज हो गई है। सत्‍ता के घृणि‍त चेहरे को उजागर करता जन संस्कृति मंच के महासचि‍व प्रणय कृष्ण का आलेख-

25 दिसम्बर, 2010

ये मातम की भी घडी है और  इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी। मातम इस देश  में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और  लडाई- न पाए गए इंसाफ के लिए जो  यहां के  हर नागरिक का अधिकार है। छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और  एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को  भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और  धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष  जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3)  और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के  तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश  करने के  आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी। यहां कहने का अवकाश नहीं   कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं। डा. सेन को  इन आरोपों में 24 मई, 2007 को  गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय  के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितियों में जेल में रहने के बाद,  उन्हें ज़मानत दी गई। मुकादमा उनपर सितम्बर, 2008 से चलना शुरु हुआ। सर्वोच्च   न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी, 2011 तक कर दिया जाए, तो   छत्तीसगढ़ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें। बहरहाल जब यह सज़िश  नाकाम हुई  और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को   पेश   होना पडा, तो   उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए।

डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच  मिले। सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों  की अनुमति से,  जेलर की उपस्थिति में हुईं। डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके  माओवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की। पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था। गुहा को  पुलिस ने 6 मई, 2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया। गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को   गिरफ्तार हुए। बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो  कि एक कपड़ा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था। इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर,  न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके  सम्बंधों  पर कोई प्रकाश    पडता है। पुलिस आजतक भी गुहा और डा़ सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल, किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई। एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के  दौरान टूटते गए। पुलिस ने डा. सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों   के दस्तावेज़, मानवाधिकार रिपोर्टें,  सी.डी़ तथा उनके   कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं। इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो  किसी भी सामान्य पढे़-लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त  नहीं हो  सकतीं। घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश    किया जो  उसके  अनुसार डा. सेन के  घर से मिला था। मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के  दस्तखत नहीं हैं। दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके  घर से प्राप्त वस्तुओं  की लिस्ट में न तो  चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में। घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के   हस्ताक्षर लिए गए थे, लेकिन इस पत्र पर उनके   दस्तखत भी नहीं हैं। ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है। साक्ष्य के   अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो  उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को  डा. सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व  निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस.आई.), को  लिखे एक ई-मेल को   पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को  हंसी का पात्र बनाया। मुनव्वर राना का शेर याद आता है-
“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”
इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द वाइटहाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड  बताया गया.( आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.)। पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा. सेन के  घर से मिले एक दस्तावेज़ के  आधार पर उन्हें शहरों  में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया। यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है। यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट  के  रूप में मौजूद है। कोई भी चाहे इसे देख सकता है। कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के  एक-एक झूठ का पर्दाफाश  होता गया। लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो  आजकल आम बात है। भोपाल गैस कांड़ पर अदालती फैसले को  याद कीजिए। याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के  फैसले को। क्या कारण है कि बहुतेरे लोगों को  तब बिलकुल आश्‍चर्य नहीं होता  जब इस देश के  सारे भ्रष्‍टाचारी, गुंडे, बदमाश, बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?
याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह  की धाराएं कब की हैं। राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है 1870 में लाई गई जिसके   तहत सरकार के   खिलाफ ”घृणा फैलाना”, ” अवमानना करना” और ” असंतोष  पैदा”करना राजद्रोह है। क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके  अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के  काबिल नहीं जिनके  मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बरखा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं ? क्या ऐसी सरकारों के  प्रति हम और आप असंतोष  नहीं  रखते जो   आदिवसियों  के   खिलाफ ”सलवा जुडूम” चलाती हैं,  बहुराश्ट्रीय कम्पनियों  और अमरीका के  हाथ इस देश  की सम्पदा को   दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं। अगर यही राजद्रोह की परिभाशा है जिसे गोरे अंग्रेजों  ने बनाया  था  और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो  हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो  राजद्रोही न हों। याद रहे कि इसी धारा के    तहत अंग्रेजों  ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को  कैद रखा.
डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश  के   उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के   छत्तीसगढ में आदिवसियों के   जीवन में रच-बस गए। बिनायक ने पी.यू.सी.एल के    सचिव के   बतौर छत्तीसगढ़ सरकार को  फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब  किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों  पर घेरा, उन्होंने  सवाल उठाया कि जो   इलाके   नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों  इतनी गरीबी, बेकारी,  कुपोषण  और  भुखमरी है?. एक बच्चों  के   डाक्टर को   इससे बडी तक्लीफ क्या हो  सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों  को  तड़पकर मरते देखे?
इस तक्लीफकुन बात के   बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा. सेन के   घर से कथित रूप से बरामद माओवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित  किए जाने पर कहा कि ”कामरेड उसी को कहा जाता है, जो   माओवादी होता  है ”. तो  आप में से जो  भी कामरेड संबोधित किए जाते हों (हों भले ही न), सावधान रहिए। कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के   सौ पदों   का अनुवाद किया था। कबीर की पंक्ति थी, ”निसिदिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades’। मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के   इस्तेमाल के   लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?
अकारण नहीं है कि जिस  छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के   हत्यारे कानून के  दायरे से महफूज़ रहे,  उसी छत्तीसगढ में नियोगी के  ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे  और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को   उम्रकैद दी गई है। 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था-

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे–
बंब संब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों  में ब़स कांग्रेस  के  साथ भाजपा और  जोड़  लीजिए.
आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड  के दोषी,  निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने  पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है।
मित्रो मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो, जितनी दूर तक हो   हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के  लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश   में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों  जिसके  खिलाफ नई आज़ादी के  एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन।