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कालिया ने माफी मांगी, नई ज्ञानोदय की प्रतियां वापस

नई दिल्ली: नया ज्ञानोदय में विभूति नारायण राय के विवादास्पद साक्षात्कार में महिला लेखिकाओं के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणी के बाद उठे तूफान को शांत करने के लिए पत्रिका संपादक रवींद्र कालिया ने हिंदी समाज से माफी मांग ली है। साथ ही पत्रिका की प्रतियां वापस ले लीं। ज्ञानपीठ के निर्देशक रवीन्द्र कालिया ने कहा कि बाजार में बची हुई नया ज्ञानोदय की प्रतियां वापस ले ली गई हैं और साक्षात्कार के हिस्से को हटाकर दो-एक दिन में इसे फिर से प्रकाशित कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह के सिलसिले में गोवा प्रवास में होने के कारण वह अपने संपादकीय दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाए।

राय और कालिया का विरोध जारी

नई दिल्ली : नया ज्ञानोदय में प्रकाशित विभूतिनारायण राय के इंटरव्यू में लेखिकाओं के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणी का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसके लिए पत्रिका के संपादक को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराते हुए लेखकों के समूह ने शुक्रवार को ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। उन्होंने पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया के इस्तीफे की मांग की। दूसरी ओर विभिन्न संगठनों ने भी इसके खिलाफ मोर्चा खोल लिया है।
ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करने वाले लेखकों का कहना है कि इसके लिए संपादक सबसे ज्यादा दोषी है क्योंकि उन्होंने महिला विरोधी बातचीत को बगैर संपादन छाप दिया। लेखकों ने कालिया के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की और उन्हें अविलंब हटाने की मांग की। प्रदर्शन को उग्र होता देख भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी आलोक जैन को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने इस मामले को न्यास के सामने उठाने की बात कही।
प्रदर्शन में संजीव, मैत्रेयी पुष्पा, रेखा अवस्थी, भाषा सिंह, सर्वेश, विमल कुमार, जीतेंद्र कुमार, गीताश्री, अनीता भारती आदि ने भाग लिया।
दूसरी ओर लखनऊ की साहित्यिक संस्था प्रतिमान की ओर से आयोजित गोष्ठी में लेखकों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विभूति नारायण की टिप्पणी की कड़ी निंदा की।
डा. कुसुम वाष्र्णेय ने गोष्ठी का संयोजन किया। गोष्ठी में प्रस्ताव पास किया कि पत्रिका के संपादक रवींद्र कालिया ने जिस तरह श्रेष्ठ साहित्यिक मूल्यों की विदाई कर बाजारूपन को प्रश्रय दिया है, यह उसी की कुत्सित परिणति है। यह लेखिकाओं की बेबाक अभिव्यक्ति को भोंथरा करने की सोची-समझी साजिश है। इसके लिए राय और कालिया समान रूप से जिम्मेदार हैं। प्रस्ताव में भारत सरकार और ज्ञानपीठ न्यास से मांग की गई कि दोनों को उनके दायित्व से मुक्त कर दिया जाए। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा, कवयित्री कात्यायनी, नरेश सक्सेना, आलोचक वीरेंद्र यादव आदि ने विचार रखे।
उत्तराखंड की संस्था महिला समाख्या प्रदेश के सभी जिलों में प्रेस कांफे्रंस कर राय की टिप्पणी का विरोध कर रही है।

फिलहाल स्त्री विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है: विभूतिनारायण राय

नया ज्ञानोदय में प्रकाशित चर्चित उपन्यासकार विभूतिनारायण राय के साक्षात्कार की काफी कुचर्चा हुई। कई पाठकों के मन में इसे लेकर जिज्ञासा होगी। इसलिए इसे ज्यों का त्यों साभार प्रकाशित कर रहे हैं। उनसे बातचीत राकेश मिश्र ने की-

राय साहब, नया ज्ञानोदय प्रेम के बाद अब बेवफाई पर विशेषांक निकालने जा रहा है, क्या प्रतिक्रिया है आपकी?

– काफी महत्त्वपूर्ण संपादक हैं रवीन्द्र कालिया। प्रेम पर निकाले गए उनके सभी अंकों की आज तक चर्चा है। इस तरह के विषय केन्द्रित विशेषांकों का सबसे बड़ा लाभ है कि न सिर्फ हिन्दी में बल्कि कई भाषाओं में लिखी गई इस तरह की रचनाएं एक साथ उपलब्ध् हो जाती हैं। साथ ही किसी विषय को लेकर विभिन्न पीढ़ियों का क्या नज़रिया है यह भी सिलसिलेवार तरीके से सामने आ जाता है। साहित्य के गम्भीर पाठकों, अध्येताओं के लिए ये अंक जरूरी हो जाते हैं। अब जब उन्होंने बेवफाई पर अंक निकालने की योजना बनायी है तो वह भी निश्चित तौर पर एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग होगा।

लेकिन आलोचना भी खूब हुई थी उन अंकों की, खासकर कुछ लोगों ने कहा कि इतने महत्त्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर प्रेम और बेवफाई…

– हिन्दी में विध्न सन्तोषियों की कमी नहीं है। आखिर यदि वे इतने ही महत्त्वहीन अंक थे तो इतने बड़े पैमाने पर लोकप्रिय क्यों हुए? मुझे याद नहीं कि कालिया जी के संपादन को छोड़कर किसी पत्रिका ने ऐसा चमत्कार किया हो कि उसके आठ-आठ पुनर्मुद्रण हुए हों। कुछ तो रचनात्मक कुंठा भी होती है। जैसे उन विशेषांकों के बाद मनोज रूपड़ा की एक चलताउ सी कहानी किसी अंक में आयी थी, यह एक किस्म का अतिवाद ही है आप इतने बड़े पैमाने पर लिख जा रहे विषय का अर्थहीन ढंग से मजाक उड़ाएं। फिर लोगों को किसने रोका है कि वे प्रेम या बेवफाई को छोड़कर अन्य विषयों पर कहानी लिखें या विशेषांक न निकालें।

तो बेवफाई को आप कैसे परिभाषित करेंगे?

– बेवफाई की कोई सर्वस्वीकृत परिभाषा नहीं हो सकती। इसे समझने के लिए धर्म, वर्चस्व और पितृसत्ता जैसी अवधारणाओं को भी समझना होगा। यह इस उत्कट इच्छा की अभिव्यक्ति है जिसके तहत स्त्री या पुरुष एक-दूसरे के शरीर पर अविभाजित अधिकार चाहते हैं। प्रेमी युगल यह मानते हैं कि इस अधिकार से वंचित होना या एक-दूसरे से जुदा होना दुनिया की सबसे बड़ी विपत्ति है और इससे बचने के लिए वे मृत्यु तक का वरण करने के लिए तैयार हो सकते हैं। आधुनिक धर्मों का उदय ही पितृसत्ता के मजबूत होने के दौर में हुआ है। इसीलिए सभी धर्मों का ईश्वर पुरुष है। धर्मों ने स्त्री यौनिकता को परिभाषित और नियंत्रित किया है। उन्होंने स्त्री के शरीर की एक वर्चस्ववादी व्याख्या की है। इससे बेवफाई एकतरपफा होकर रह गई है। मर्दवादी समाज मुख्य रूप से स्त्रियों को बेवफा मानता है। सारा साहित्य स्त्रियों की बेवफाई से भरा हुआ है जबकि अपने प्रिय पर एकाधिकार की चाहना स्त्री-पुरुष दोनों की हो सकती है और दोनों में ही प्रिय की नज़र बचाकर दूसरे को हासिल करने की इच्छा हो सकती है।

देखा जाए तो, बेवफाई एक नकारात्मक पद है लेकिन इसका पाठ हमेशा रोमांटिक या लुत्फ देने वाला क्यों होता है?

-वर्जित फल चखने की कल्पना ही उत्तेजना से भरी होती है। यह मनुष्य का स्वभाव है। फिर यहां लुत्फ लेने वाला कौन है मुख्य रूप से पुरुष ! व्यक्तिगत संपत्ति और आय के स्रोत उसके कब्जे में होने के कारण वह औरतों को नचाकर आनन्द ले सकता है, उन्हें रखैल बना सकता है, बेवफा के तौर पर उनकी कल्पना कर उन्हें अपने फैंटेसी में शामिल कर सकता है। पर जैसे-जैसे स्त्रियां व्यक्तिगत संपत्ति या क्रय शक्ति की मालकिन होती जा रही हैं धर्म द्वारा प्रतिपादित वर्जनाएं टूट रही हैं और लुत्फ लेने की प्रवृत्ति उनमें भी बढ़ रही है।

हिन्दी समाज से कुछ उदाहरण….

-क्यों नहीं। पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्य रूप से शरीर केन्द्रित है। यह भी कह सकते हैं कि यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है। लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है। मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथात्मक पुस्तक का शीर्षक `कितने बिस्तरों पर कितनी बार´ हो सकता था। इस तरह के उदाहरण बहुत-सी लेखिकाओं में मिल जाएंगे। दरअसल, इससे स्त्री मुक्ति के बड़े मुद्दे पीछे चले गए हैं। मुझे इसमें कुछ भी असहज नहीं लगता। आखिर पहले पुरुष चटखारे लेकर बेवफाई का आनन्द उठाता था, अब अगर स्त्रियां उठा रही हैं तो हाय तौबा क्या मचाना। बिना जजमेंटल हुए मैं यह यहां जरूर कहूंगा कि यहां औरतें वही गलतियां कर रही हैं जो पुरुषों ने की थी। देह का विमर्श करने वाली स्त्रियां भी आकर्षण, प्रेम और आस्था के खूबसूरत सम्बंध को शरीर तक केन्द्रित कर रचनात्मकता की उस संभावना को बाधित कर रही है जिसके तहत देह से परे भी बहुत कुछ ऐसा घटता है जो हमारे जीवन को अधिक सुन्दर और जीने योग्य बनाता है।

क्या बेवफाई का जेण्डर विमर्श सम्भव है एक पुरुष और एक स्त्री के बेवफा होने में क्या अन्तर है?

-मैंने ऊपर निवेदन किया है कि बेवफाई को समझने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति, धर्म या पितृसत्ता जैसी संस्थाओं को ध्यान में रखना होगा। एंगेल्स की पुस्तक परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति से बार-बार उद्धृत किया जाने वाला प्रसंग जिसमें एंगेल्स इस दलील को खारिज करते हैं कि लंबे नीरस दाम्पत्य से उत्कट प्रेम पगा एक ही चुंबन बेहतर है और कहते हैं कि यह तर्क पुरुष के पक्ष में जाता है। जब तक संपत्ति और उत्पादन के स्रोतों पर स्त्री-पुरुष का समान अधिकार नहीं होगा पुरुष इस स्थिति का फायदा स्त्री के भावनात्मक शोषण के लिए करेगा। असमानता समाप्त होने तक बेवफाई का जेण्डर विमर्श न सिर्फ सम्भव है बल्कि होना ही चाहिए।

हिन्दी साहित्य में तलाशना हो तो पुरुष के बेवफाई विमर्श का सबसे खराब उदाहरण नमो अंधकारम् नामक कहानी है। लोग जानते हैं कि कहानी इलाहाबाद के एक मार्क्सवादी रचनाकार को केन्द्र में रखकर लिखी गई थी। उसमें बहुत सारे जाने-पहचाने चेहरे हैं। इस कहानी के लेखक के एक सहकर्मी महिला के साथ सालों ऐलानिया रागात्मक सम्बंध् रह हैं। उन्होंने कभी छिपाया नहीं और शील्ड की तरह लेकर उसे घूमते रहे। पर उस कहानी में वह औरत किसी निम्पफोमेनियाक कुतिया की तरह आती है। लेखक ऐसे पुरुष का प्रतिनिधि चरित्र है जिसके लिए स्त्री कमतर और शरीर से अधिक कुछ नहीं है। मैं कई बार सोचता हूं कि अगर उस औरत ने इस पुरुष लेखक की बेवफाई की कहानी लिखी होती तो क्या वह भी इतने ही निर्मम तटस्थता और खिल्ली उड़ाउ ढंग से लिख पाती?

बेवफाई कहीं न कहीं एक ताकत का भी विमर्श है। क्या महिला लेखकों द्वारा बड़ी संख्या में अपनी यौन स्वतंत्रता को स्वीकारना एक किस्म का पावर डिसकोर्स ही है ?

-सही है कि बेवफाई पावर डिसकोर्स है। आप भारतीय समाज को देंखे! अर्ध सामन्ती- अर्धऔपनिवेशिक समाज- काफी हद तक पितृसत्तात्मक है। शहरीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा के बढ़ते अवसर या मूल्यों के स्तर पर हो रही उथल-पुथल ने स्त्री पुरुषों को ज्यादा घुलने-मिलने के अवसर प्रदान किए हैं। पर क्या ज्यादा अवसरों ने ज्यादा लोकतांत्रिक संबंध भी विकसित किए हैं? उत्तर होगा- नहीं। पुरुष के लिए स्त्री आज भी किसी ट्राफी की तरह है। अपने मित्रों के साथ रस ले-लेकर अपनी महिला मित्रों का बखान करते पुरुष आपको अकसर मिल जाएंगे। रोज ही अखबारों में महिला मित्रों की वीडियो क्लिपिंग बना कर बांटते हुए पुरुषों की खबरें पढ़ने को मिलेंगी। अभी हाल में मेरे विश्वविद्यालय की कुछ लड़कियों ने मांग की कि उन्हें लड़कों के छात्रावासों में रुकने की इजाजत दी जाए। मेरी राय स्पष्ट थी कि अभी समाज में लड़कों को ऐसा प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है कि वे लड़कियों को बराबरी का साथी समझें। गैरबराबरी पर आधरित कोई भी संबंध अपने साथी की निजता और भावनात्मक संप्रभुता का सम्मान करना नहीं सिखाता। हर असफल सम्बंध एक इमोशनल ट्रॉमा की तरह होता है जिसका दंश लड़की को ही झेलना पड़ता है। पितृसत्तात्मक समाज में स्वाभाविक ही है कि स्त्री पुरुष के लिए एक ट्रॉफी की तरह है…जितनी अधिक स्त्रियां उतनी अधिक ट्रॉफियां।

महिला लेखिकाओं द्वारा बड़े पैमाने पर अपनी यौन स्वतन्त्रता को स्वीकारना इसी डिसकोर्स का भाग बनने की इच्छा है। आप ध्यान से देखें- ये सभी लेखिकाएं उस उच्च मध्यवर्ग या उच्च वर्ग से आती हैं जहां उनकी पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता अपेक्षाकृत कम है। इस पूरे प्रयास में दिक्कत सिर्फ इतनी है कि यह देह विमर्श तक सिमट गया है और स्त्री मुक्ति के दूसरे मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं।

पूंजी, तकनीक और बाजार ने मानवीय रिश्तों को नये सिरे से परिभाषित किया है। ऐसे में यह धारणा आयी है कि लोग बेवफा रहें लेकिन पता नहीं चले। यह कौन सी स्थिति है

-सही है कि बाजार ने तमाम रिश्तों की तरह आज औरत और मर्द के रिश्तों को भी परिभाषित करना शुरू कर दिया है। यह परिभाषा धर्म द्वारा गढ़ी- परिभाषा से न सिर्फ भिन्न है बल्कि उसके द्वारा स्थापित नैतिकता का अकसर चुनौती देती नज़र आती है। आप पाएंगे कि आज एसएमएस और इंटरनेट उस तरह के सम्बंध विकसित करने में सबसे अधिक मदद करते हैं जिन्हें स्थापित अर्थों में बेवफाई कहते हैं। पर आपके प्रश्न के दूसरे भाग से मैं सहमत नहीं हूं। विवाहेतर रिश्तों को स्वीकार करने का साहस आज बढ़ा है। पहली बार भारत जैसे पारंपरिक समाज में लिव इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ा है। लोग ब्वॉय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड जैसे रिश्ते स्वीकारने लगे हैं। हां, यह जरूर है कि यह स्थिति उन वर्गों में ही अधिक है जहां स्त्रियां आर्थिक रूप से निर्भर नहीं हैं।

क्या कलाकार होना बेवफा होने का लाइसेंस है?

-इसका कोई सरलीकृत उत्तर नहीं हो सकता। कलाकार अन्दर से बेचैन आत्मा होता है। धर्म या स्थापित मूल्यों से निर्धारित रिश्ते उसे बेचैन करते हैं। वह बार-बार अपनी ही बनाई दुनिया को तोड़ता-फोड़ता है और उसे नये सिरे से रचता-बसता है। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि उसकी अतृप्ति उसे नये-नये भावनात्मक सम्बंध् तलाशने के लिए उकसाती है। कलाकार के पास अभिव्यक्ति के औजार भी होते हैं इसलिए वह अपनी बेवफाई, जिसमें कई बार दूसरे को धोखा देकर छलने के तत्व भी होते हैं, को बड़ी चालाकी से जस्टिफाई कर लेता है। साधारण व्यक्ति पकड़े जाने पर जहां हकलाते गले और फक पड़े चेहरे से अपनी कमजोर सफाई पेश करने की कोशिश करता है वहीं कलाकार बड़ी दुष्टता के साथ छल सकने में समर्थ तर्क गढ़ लेता है। अकसर आप पाएंगे कि दूसरों को धोखा देने वाले तर्कों को रखते-रखते वह स्वयं उनमें यकीन करने लगता है। यदि एक बार फिर हिन्दी से ही उदाहरण तलाशने हों तो राजेन्द्र यादव की आत्मकथा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। राजेन्द्र अपनी मक्कारी को साबित करने के लिए जिस झूठ और फरेब का सहारा लेते हैं, आप पढ़ते हुए पाएंगे कि मन्नू भण्डारी को कनविन्स करते-करते वे खुद विश्वास करने लगते हैं कि अपने साथी से छल-कपट लेखक के रूप में उनका  अधिकार है।

यह सही कहा आपने, दरअसल हिन्दी में बेवफाई की सुसंगत और योजनाबद्ध शुरुआत नई कहानी की कहानियों और कहानीकारों से ही दिखती है।

-हां, लेकिन उसके ठोस कारण भी हैं। कहानी, उपन्यास, की जिस वास्तविक जमीन को छोड़कर ये मध्यवर्ग की कुंठाओं, त्रासदियों और अकेलेपन को सैद्दांतिक स्वरूप देने में मसरूफ थे, उसमें तो ऐसी स्थितियां पैदा होनी ही थी। यह अकारण नहीं कि ये विख्यात महारथी अपने जीवन काल में ही अपनी कहानियों से ज्यादा अपने (कु) कृत्यों के लिए मशहूर हो चले थे। राजेन्द्र जी तो अपनी मशहूरी अभी तक ढो रहे हैं।

विभूति नारायण राय ने माफी मांगी

नई दिल्लीः महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने एक इंटरव्यू के दौरान महिला लेखकों पर अभद्र टिप्पणी करने के मामले में बिना शर्त माफी मांगी ली है। वह मंगलवार को मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से मिले और उन्हें महिला लेखकों के संबंध में टिप्पणी पर अपना पक्ष रखा। इसके कुछ घंटे बाद ही उन्होंने अपनी टिप्पणी पर खेद जताते हुए बिना शर्त माफी मांग ली।
राय ने लिखित माफीनामे में कहा कि इंटरव्यू के कुछ अंश से कुछ महिला लेखकों की भावनाओं को चोट पहुंची है। एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वीसी के तौर पर मुझे लगता है कि मुझे ऐसे अनुचित शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था, जिससे महिला लेखकों की भावनाओं को चोट पहुंची। मैं इसके लिए माफी मांगता हूं।
राय ने भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित की जाने वाली हिंदी की साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय के साथ इंटरव्यू में महिला लेखकों के चरित्र को लेकर सवाल उठाया था और उन्हें छिनाल कहा था। सिब्बल ने राय की टिप्पणी के लिए उनकी निंदा की थी और कहा था कि उनकी यह टिप्पणी किसी भी तरह से सही नहीं है और इसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 
इस विवाद में राय को बदनामी के साथ एक और नुकसान उठाना पड़ा। नया ज्ञानोदय को प्रकाशित करने वाले ज्ञानपीठ मंडल ने उन्हें अपनी प्रवर परिषद से हटा दिया गया। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि न्यासी मंडल की बैठक में राय को हटाने का निर्णय लिया गया। उनके स्थान पर इसी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह को प्रवर परिषद का सदस्य नियुक्त किया गया।

राय और कालिया माफी मांगे: जसम

दिल्ली: जन संस्कृति मंच ने हिंदी स्त्री लेखन और लेखिकाओं के बारे में विभूति नारायण राय के बयान पर उनसे और नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया से माफी मांगने की मांग की है।
जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि रा. म. गा. ही. वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा एक साक्षात्कार के दौरान हिंदी स्त्री लेखन और लेखिकाओं के बारे में अपमानजनक वक्तव्य की जसम घोर निंदा करता है। यह साक्षात्कार उन्होंने नया ज्ञानोदय पत्रिका को दिया था। हमारी समझ से यह बयान न केवल हिंदी लेखिकाओं की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि उसमें प्रयुक्त शब्द स्त्रीमात्र के लिए अपमानजनक है। बयान हिंदी के स्त्री लेखन की सतही समझ को भी प्रदर्शित करता है। आश्चर्य है कि पूरे साक्षात्कार में यह बयान पैबंद की तरह अलग से दिखता है क्योंकि बाकी कही गई बातों से उसका कोई संबंध भी नहीं है। अच्छा हो कि राय अपने बयान पर सफाई देने की जगह उसे वापस लें और लेखिकाओं से माफी मांगें।
नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया अगर चाहते तो इस बयान को अपने संपादकीय अधिकार का प्रयोग कर छपने से रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने तो इसे पत्रिका के प्रमोशन के लिए, चर्चा के लिए उपयोगी समझा। 
आज के बाजारवादी, उपभोक्तावादी दौर में साहित्य के हलकों में भी सनसनी की तलाश में कई सम्पादक, लेखक बेचैन हैं। इस सनसनी-खोजी साहित्यिक पत्रकारिता का मुख्य निशाना स्त्री लेखिकाएं हैं और व्यापक स्तर पर पूरा स्त्री-अस्तित्व। रवींद्र कालिया को भी इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। जिन्हें स्त्री लेखन के व्यापक सरोकारों और स्त्री मुक्ति की चिंता है, वे इस भाषा में बात नहीं किया करते। साठोत्तरी पीढ़ी के कुछ कहानीकारों ने जिस स्त्री-विरोधी, अराजक भाषा की ईजाद की, उस भाषा में न कोई मूल्यांकन संभव है और न विमर्श। जसम हिंदी की उन तमाम लेखिकाओं व प्रबुद्धजन के साथ है, जिन्होंने इस बयान पर अपना रॊष‌ व्यक्त किया है।

बेबी हालदार : अंधेरे में रोशनी की किरण

घरों में काम करने वाली मामूली-सी नौकरानी बेबी हालदार कैसे लेखिका बन गई, इसकी बेहद प्रेरणादायक और संघर्षपूर्ण दास्तान है। वह जिस घर में चौका-बरतन करती थी, उसके एक कमरे की तीन अलमारियां किताबों से भरी थीं। उनमें बांग्ला की भी बहुत सी किताबें थीं। उन्हें देखकर बेबी के मन में यह बात उठती कि इन्हें कौन पढ़ता होगा? कभी-कभी वह एक-दो किताब खोलकर देख भी लेती। एक दिन डस्टिंग करते समय वह कोई किताब उलट-पलट रही थी, तभी गृहस्वामी प्रबोध कुमार आ गए। उन्होंने उसे किताबें उलटते-पलटते देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं।
अगले दिन वह चाय लेकर आई तो प्रबोध कुमार ने पूछा, ”तुम कुछ लिखना-पढऩा जानती हो?”
बेबी ऊपरी हंसी हंसकर जाने लगी तो उन्होंने फिर पूछा, ”बिलकुल भी नहीं जानतीं?”
बेबी ने सोचा- झूठ क्यों कहूं कि एकदम नहीं जानती। वह बोली, ”छठी तक।”
अगले दिन बेबी आई तो प्रबोध कुमार ने पूछा, ”बेबी, तुमने स्कूल में जो किताबें पढ़ीं, उनमें किन लेखकों व कवियों को पढ़ा? कुछ याद है?”
बेबी ने झट से कहा, ”हां, कई तो हैं। जैसे- रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, शरतचंद्र, सत्येंद्रनाथ दत्त, सुकुमार राय।”
प्रबोध कुमार प्रेमचंद के नाती हैं और खुद एक जाने-माने लेखक हैं। नजरुल उनके प्रिय कवि हैं। नजरुल का नाम सुनकर उनके चेहरे पर चमक आ गई।
उन्होंने पूछा, ”नजरुल का कोई गीत याद है?”
”हां।”
”तो सुनाओ।”
बेबी ने सहजता से नजरुल के एक-दो गीत सुना दिए।
प्रबोध कुमार सोचने लगे- चौबीस घंटे पेट के लिए व्यस्त रहने के बावजूद इसे गीत याद है। इसमें कुछ तो है। किताबें उलटना-पलटना इस बात का संकेत है कि इसमें सोचने-समझने की क्षमता है। फिर क्यों न इसे लिखने-पढऩे के लिए प्रेरित किया जाए?
उन्होंने बेबी के सिर पर हाथ रखा और कुछ क्षण बाद कहा, ”तुम्हें पढऩे-लिखने का शौक है?”
बेबी निराशा से बोली, ”शौक होने से भी क्या? पढऩा-लिखना तो अब होने से रहा?”
प्रबोध कुमार उत्साहित करते हुए बोले, ”होगा क्यों नहीं? मुझी को देखो- अभी तक पढ़ता हूं। मैं पढ़ सकता हूं तो तुम क्यों नहीं पढ़ सकती?”
वह बेबी को ऊपर के कमरे में ले गए। उन्होंने अलमारी में से एक किताब निकाली और पूछा, ”बताओ तो यह क्या लिखा है?”
बेबी संशय में पड़ गयी- पढ़ तो ठीक ही लूंगी। फिर सोचा- लेकिन गलती हो गयी तो।
प्रबोध कुमार बेबी के संशय को समझ गए। उन्होंने कहा, ”पढ़ो, कुछ तो पढ़ो।”
बेबी ने पढ़ा, ”आमार मेये बेला, तसलीमा नसरीन।”
प्रबोध कुमार बोले, ”तुम यही सोच रही थी कि कहीं गलती तो नहीं हो जाएगी। यह किताब तुम ले जाओ। घर पर समय मिले तो पढऩा।”
बेबी किताब लेकर घर चली गई। वह उसमें से रोज एक-दो पेज पढऩे लगी। किताब पढऩे में पहले उसे थोड़ी बहुत दिक्कत हुई, लेकिन धीरे-धीरे दिक्कत दूर हो गयी। किताब पढऩा उसे अच्छा लगने लगा।
कुछ दिन बाद प्रबोध कुमार ने बेबी से पूछा, ”तुम जो किताब ले गई थी, उसे ठीक से पढ़ तो रही हो?”
बेबी ने ‘हां’ कहा तो वह बोले, ”मैं तुम्हें एक चीज दे रहा हूं। तुम इसका इस्तेमाल करना। समझना कि मेरा ही एक काम है।”
बेबी ने उत्सुकता से पूछा, ”कौन-सी चीज?”
प्रबोध कुमार ने अपने लिखने की टेबिल के ड्राअर से पेन-कापी निकाली और बोले, ”इस कापी में तुम लिखना। लिखने को तुम अपनी जीवन कहानी भी लिख सकती हो। होश संभालने के बाद से अब तक जितनी भी बातें तुम्हें याद आएं, सब इस कॉपी में रोज थोड़ा-थोड़ा लिखना।”
बेबी पेन और कॉपी घर ले आई। उस दिन से रोज एक-दो पेज लिखने लगी। और इस तरह शुरू हुई मामूली-सी नौकरानी बेबी हालदार की लेखिका बनने की प्रक्रिया।
बेबी तस्लीमा नसरीन की किताब ‘आमार मेये बेला’ पढ़ चुकी थी। इसलिए उसे अपने साथ घटी किसी भी घटना को लिखने में संकोच या झिझक नहीं हुई और वह बेबाकी से लिखती चली गई।
बेबी के जीवन की शुरुआत पृथ्वी का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर से हुई। वहां उसके बाबा (पिता) नरेंद्रनाथ नौकरी करते थे। इसके बाद वे लोग मुर्शिदाबाद, डलहौजी व पुन: मुर्शिदाबाद रहे। नरेंद्रनाथ उन्हें वहां छोड़कर नौकरी पर चले गए। वह हर महीने खर्च के लिए पैसे भेजते। कुछ महीने तो पैसे नियम से आते रहे, लेकिन फिर कई-कई महीने नागा होने लगी। परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। लेकिन सारे कष्टो के बाद भी बेबी की मां ने बच्चों का पढऩा-लिखना जारी रखा।
एक दिन नरेंद्रनाथ रिटायर होकर घर आ गए। उन्होंने घर के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई। बेबी की मां आर्थिक परेशानियों व पति के दुव्र्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर चली गई।
तमाम कठिनाइयों के बावजूद बेबी ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। कभी-कभी तो बिना कुछ खाए स्कूल जाना पड़ता। एक दिन सहेली के सामने उसके मुंह से निकल गया कि खाने के लिए कुछ नहीं है। नरेंद्रनाथ ने यह बात सुन ली। बेबी जब स्कूल से लौटी तो उन्होंने उसे इतना मारा कि तीन दिन वह उठ नहीं सकी और कई दिन स्कूल नहीं जा सकी।
नरेंद्रनाथ ने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी मां उनकी कोई बात नहीं सुनती, समय पर खाना नहीं देती, बिना कारण बच्चों को पिटवाती।
नरेंद्रनाथ को दुर्गापुर में एक फैक्टरी में नौकरी मिल गई। वहां उन्होंने तीसरी शादी कर ली। वह दूसरी बीवी से झूठ बोलकर बच्चों को साथ ले गए। दुर्गापुर जाने के बाद नरेंद्रनाथ ने बच्चों की पढ़ाई शुरू नहीं करवाई। लेकिन बेबी में पढऩे की इच्छा देखकर उन्होंने कुछ दिन बाद उसे पढऩे के  लिए जेठा (ताऊ) के पास भेज दिया।
बेबी के जेठा के पास रहने से तीसरी मां को घर के काम-काज में असुविधा होने लगी, इसलिए उसे वहां से बुलवा लिया। बेबी की पढ़ाई फिर बंद हो गई। पढ़ाई बंद होने का बेबी को मानसिक आघात लगा। वह सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते अपनी पढ़ाई की चिंता करती। इसके कारण वह बीमार पड़ गई। बाबा ने उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया।
स्वस्थ होने के बाद बेबी अस्पताल में ही थी। एक दिन वह सवेरे सोकर उठी तो उसने देखा कि उसका बिस्तर रक्त से लाल हो गया है। वह भय से रोने लगी। उसका रोना सुनकर नर्स आ गई। नर्स ने तकलीफ के बारे में पूछा, तो बेबी कुछ बोल नहीं सकी। अचानक नर्स की नजर रक्त से सने बिस्तर पर पड़ी। वह समझ गई कि बेबी रक्त देखकर ही रो रही है। वहां और दो-चार लोग जमा हो गए। वे दबी हंसी-हंसने लगे। बेबी के आसपास के रोगियों ने उसे समझाया कि रोओ मत। जब लड़कियां बड़ी हो जाती हैं तो ऐसा ही होता है।
इस घटना के बाद नरेंद्रनाथ का व्यवहार बेबी के प्रति बदल गया। वह उसे डांटते नहीं। किसी काम में भूल होने पर सिर्फ इतना कहते कि तुम अब बड़ी हो गई हो, तुमसे भूल नहीं होनी चाहिए। यह बात बार-बार सुनकर बेबी भी सोचने लगी कि क्या वह सचमुच बड़ी हो गई है।
एक रात बेबी बाहर बने बाथरूम से निकली तो बाबा सामने खड़े थे। उन्होंने उसे प्यार से अपने पास खींच लिया। उनकी आंखों में आंसू थे। बेबी की विमाता दरवाजे की दरार में से झांककर देख रही थी। उस रात के बाद बाबा और विमाता में बेबी को लेकर झगड़ा होने लगा। इससे सारा घर अशांत हो उठा। अशांति के डर से उन्होंने बेबी के पास आना बंद कर दिया और वह भी वहां खड़ी नहीं होती, जहां बाबा होते।
उन्हीं दिनों खेलने-कूदने की उम्र में उसकी शादी कर दी गई। वह भी दोगुनी उम्र के पुरुष से।
चौदह वर्ष से भी कम उम्र में बेबी गर्भवती हो गई। बेबी के पेट में दर्द उठना शुरू हो गया। छह दिन पूरे होने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। सभी लोग उसे अकेला छोड़कर वापस आ गए।
बेबी अकेली पड़ी-पड़ी दर्द से रोने-चिल्लाने लगी। इससे आसपास के रोगियों को असुविधा होने लगी तो उसे दूसरे कमरे में ले जाकर एक टेबिल पर लिटा दिया गया और उसके हाथ-पैर बांध दिए गए। अचानक उसके पेट में इतने जोर से दर्द उठा कि पागल सी हो गई। नर्स दौड़कर डॉक्टर को बुला लायी। डॉक्टर ने बेबी के पेट को बेल्ट से बांध दिया और फिर पेट में कुछ टटोलने के बाद बताया कि बच्चा उलट गया है। नर्स एक और डॉक्टर को बुला लायी। दर्द के मारे बेबी इतनी जोर से हाथ-पैर झटक रही थी कि सब बंधन खुल गए। चारों लोगों ने मिलकर उसे फिर बांध दिया। डॉक्टर ने बच्चे को सर से पकड़कर बाहर निकाल दिया। बेबी का रोना-चिल्लाना बंद हो गया और वह बिलकुल शांत हो गई। अगले दिन उसका पति उसे घर ले आया।
एक दिन बेबी को पता चला कि उसकी दीदी नहीं रही। दीदी को जीजा ने गला घोंट कर मार डाला था। वह अपनी दीदी को देखने जाना चाहती थी। लेकिन पति ने उसे नहीं जाने दिया। उसे लगा- वह एक आदमी की बंदिनी है इसलिए नहीं जा पायी। वह जो कहे वही उसे सुनना होगा, जो कहे वही करना होगा, लेकिन क्यों? जीवन तो उसका है, न कि पति का। फिर उसे पति के कहे अनुसार सिर्फ इसलिए चलना होगा कि वह पति के पास है? कि वह मुट्ठी भर भात देता है। पति उसे जिस तरह रखता है, उस तरह तो कुत्ते-बिल्ली को रखा जाता है। जब वहां उसे सुख-शांति नहीं मिलती तो क्या जरूरी है कि वह पति के पास रहे?
बेबी का बच्चा जब तीन माह का हो गया तो वह पहली बार अपने ससुर के साथ ससुराल गई। वहां उसके बच्चे को खूब लाड़-प्यार मिला। सास बच्चे को मिट्टी में खेलने नहीं देती। लड़का होने के कारण उसे भी कुछ अधिक आदर मिला। वह करीब एक माह वहां रही।
बेबी के पाड़े में षष्टि नाम की एक लड़की थी। बेबी की सबसे ज्यादा उसी से पटती थी। लेकिन उसका वहां आना-जाना उसके पति को पसंद नहीं था। एक दिन बेबी षष्टि के घर गई थी कि उसका पति आ गया। बच्चे को लेकर डरते-डरते वह घर आई तो पति ने बिना कुछ कहे-सुने उसके बाल पकड़ कर लात-घूंसों से मारना शुरू कर दिया। वह जोर-जोर से गाली भी दे रहा था। सड़क पर बहुत से लोग आ-जा रहे थे, लेकिन किसी ने भी उसके पति को नहीं रोका। उसे रोकने के बजाए कुछ लोग वहां खड़े होकर बेबी की पिटाई का मजा लेने लगे।
षष्टि के बारे में पाड़े में लोगऊटपटांग बात करते थे। बेबी उसे खराब नहीं समझती थी। वह सोचती- एक लड़की होकर दूसरी लड़की को खराब क्यों समझूं? पाड़े की किसी कमेटी का लीडर प्रदीप षष्टि के घर जाता था, लेकिन सब लोग उसका आदर करते। बेबी की पाड़े के लोगों से पूछने की इच्छा होती कि यदि यह लड़की खराब है तो तुम्हारा यह लीडर कैसे अच्छा हो गया, जो उसके पास आता है! पाड़े के लोग एक-दूसरे की आलोचना करते रहते थे कि किसकी स्त्री किससे बात करती है, कौन किससे प्रेम कर रहा है, किसकी लड़की किसके साथ भाग गई। उनके  घर में क्या हो रहा है, इस पर उनकी नजर नहीं जाती। किसी का अच्छा खाना-पहनना उन्हें सहन नहीं होता और वे उसके प्रति ईष्यालु हो उठते। बेबी को ये सब बातें खराब लगतीं।
उनके पाड़े में एक लड़का रहता था अजित। वह बेबी को बऊदी (भाभी) कहता। वह उन लोगों से खूब अच्छी तरह मिलता-जुलता और हंसी-मजाक भी करता। बच्चे को ले जाकर छोटी-मोटी चीज दिला देता। धीरे-धीरे यह सब कुछ ज्यादा ही होने लगा। बेबी ने मना भी किया, लेकिन वह नहीं माना।
इससे लोग बेबी को बदचलन समझने लगे, उसका पति उसे मारने-पीटने लगा। तंग आकर वह अपने पति की बातों का जवाब देने लगी।
अजित की हरकतें कम होने की बजाए बढऩे लगीं। पाड़े के लोगों ने उसे मारना-पीटना चालू कर दिया। इस कांड को लेकर लोग तरह-तरह की बातें करते। कुछ लोग अजित को दोषी ठहराते तो कुछ बेबी का भी इसमें दोष मानते।
षष्टि की मां के बुलाने पर एक दिन बेबी उनके घर गई तो पीछे-पीछे उसका पति भी वहां पहुंच गया। उसने बिना किसी से कुछ बोले, पत्थर उठाकर बेबी के माथे पर दे मारा। उसका माथा फूट गया और खून बहने लगा। वह बच्चे को गोद में उठाकर घर आ गई। उसने पूछा कि उसकी क्या गलती थी, जो उसे इस तरह मारा? इतना सुनते ही उसके पति ने एक मोटा बांस उठाया और उसके पीछे दे मारा। इसके कुछ देर बाद ही बेबी के पेट में भयंकर दर्द होने लगा। दर्द असहनीय हो गया। दर्द के मारे वह न उठ सकती थी, न कुछ खा सकती थी और न ही सो सकती थी। रात को भी वह चीखती-चिल्लाती रही और उसका पति आराम से सोता रहा।
तब बेबी अपने बच्चे को साथ ले, अपना पेट पकड़े, मां-रे, बाबा-रे चिल्लाती हुई सामने रहने वाले महादेव के पास गई। बेबी ने महादेव को भेजकर अपने घर से भाई को बुलवाया। बेबी का बड़ा भाई उसे ठेले में लादकर अपने साथ ले गया। उस समय रात के करीब दो बज रहे थे। पति की मार से पेट का बच्चा गिर गया।

एक बार बेबी अपनी पिसिमा (बुआ) के घर गई। वह अपने दु:खमय जीवन के बार में बता रही थी। एक अधेड़ उम्र की औरत वहां खड़ी ये सब बातें सुन रही थी। उस औरत ने कहा कि कपाल में जो लिखा था, वही हुआ। इतनी कम उम्र में इतने बड़े बच्चे की मां बन गई। घर से लड़की को निकालने का बहाना चाहिए था, सो ब्याह कर दिया और नहीं तो क्या? उस औरत को पिसिमा ने जवाब दिया कि जब सब कुछ के लिए कपाल दोषी है तो भगवान ने हाथ, पैर, आंखें क्यों दे रखी हैं, इनकी भी क्या जरूरत थी!
बेबी फिर मां बनने जा रही थी। उसकी तकलीफ और बढ़ गई तो उसके बाबा नरेंद्रनाथ ने उसे कंपनी के अस्पताल में भर्ती करा दिया। लोगों के चले जाने के बाद बेबी को डिलीवरी रूम मे ले जाया गया। वहां चीर-फाड़ के औजार देखकर उसे डर लगने लगा। उसने डाक्टर से कहा कि वह उसे काटे नहीं। उसकी बात सुनकर डाक्टर हंस दिया। रात के दस बजे बच्चा पैदा हुआ। उसके लड़का हुआ था, जबकि वह सोचती थी कि इस बार लड़की हो तो अच्छा रहे।
दो बच्चे होने से घर का खर्च बढ़ गया। बेबी ने सोचा कि कुछ न कुछ करना चाहिए, नहीं तो कैसे काम चलेगा? उसने पाड़े के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। उसके पास काफी बच्चे पढऩे के लिए आने लगे। इस तरह बेबी के पास दो-तीन सौ रुपये हो जाते।
कई वर्ष इसी तरह बीत गए। बेबी का लड़का पांचवीं में पहुंच गया था। ट्यूशन से पहले जितनी कमाई अब नहीं होती थी। इसी दौरान बेबी ने एक लड़की को जन्म दिया।
षष्टि के घर दशहरे पर मां मनसा की पूजा थी। पूजा रात को होने वाली थी। शाम को ढाक बजाने वालों के पीछे-पीछे पूजा के लिए जल लाने के लिए पोखरे की तरफ कलसियां लेकर बेबी भी चल दी। उसका पति रास्ते से ही गुस्से में गालियां बकता हुआ, उसे वापस घर ले गया। घर पहुंचकर वह मारने लपका तो बेबी घर से निकल भागी। वह पाड़े में लुकती-छिपती रही और पति उसका पीछा करता रहा। अगले दिन सवेरे-सवेरे बेबी मंदिर में मंत्र पढ़ रही थी कि तभी किसी ने पीछे से उसके बाल खींचते हुए कहा, ”चल साली, घर चल। अभी तुझे मजा चखाता हूं। ”
बेबी सोचने लगी कि इस तरह कितने दिन काटेगी। बच्चे बड़े हो रहे हैं। छोटा लड़का भी स्कूल जाने लगा है। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर काफी पैसा खर्च हो जाता है, लेकिन पति का इस सबसे कोई मतलब नहीं है। उसने तय कर लिया कि कितने ही कष्ट क्यों न उठाने पड़ें, बच्चों को पढ़ाएगी जरूर, उनके  बाप की तरह निरक्षर नहीं रखेगी। इसी बीच उसका पति बड़े बेटे को ठेले में धक्का लगाने के  लिए ले जाने लगा।
आखिर बेबी ने घरों में काम करने का निश्चय कर लिया। उसे एक घर में काम मिल गया। यह उसकी पहली नौकरी थी। एक-एक कर उसके पास चार-पांच घरों का काम हो गया।
वह बाहर काम करने निकलती और कोई जान-पहचान वाला मिल जाता तो काम-धाम की या इधर-उधर की बातचीत हो जाती। यह उसके पति को बर्दाश्त नहीं होता। किसी के पास उसे खड़ा देख लेता तो घर पहुंचने पर गालियां देता। वह उसे समझाने की कोशिश करती तो पत्थर उठाकर मारने पर उतारू हो जाता। वह सोचती कि काम न करने से भी अशांति और काम करने से भी।
दु:खी मन से वह सोचने लगी कि वह मनुष्य है या जानवर, जो उसका पति उसके साथ ऐसा व्यवहार करता है?
बेबी यह सोचकर कि अब पति के साथ नहीं रहेगी अपने बाबा के पास आ गई। उन्होंने सोचा कि कुछ दिनों में गुस्सा शांत होने पर वह अपने पति के पास चली जाएगी। लेकिन उसने साफ-साफ इनकार कर दिया। इससे वह मुसीबत में पड़ गए। बेबी को लेकर मां बाबा से रोज झगडऩे लगी।
इसी बीच बेबी को अस्पताल में नौकरी मिल गयी। उसे रात की ड्यूटी मिली। अस्पताल में कुछ दिन काम करके उसे लगा कि बच्चों को रात में अकेला छोड़कर ड्यूटी जाना उससे नहीं होगा। इसलिए उसने नौकरी छोड़ दी और अपने बड़े भाई के पास फरीदाबाद जाने का निश्चय कर लिया।

फरीदाबाद में बेबी सवेरे ही खाना बनाकर काम की खोज में निकल जाती। हर जगह उससे यही पूछा जाता कि उसका पति कहां है? जैसे ही वह बताती कि उसका पति साथ नहीं रहता तो फिर कोई बात आगे नहीं चलाता। वह बहुत घूमी-फिरी लेकिन किसी ने उसे काम पर नहीं रखा। भाई और भाभी ने तो जैसे रट ही लगा ली कि पति का घर छोड़ आने से तो उसका मर जाना अच्छा है।
किसी तरह उसे एक कोठी में काम मिल गया। बड़े भाई ने उसके बड़े लड़के को किसी कोठी में लगवा दिया। जहां बेबी को काम मिला, उनका व्यवहार अच्छा नहीं था।
बेबी को दूसरे घर में काम मिल गया। यह प्रबोध कुमार का घर था।
एक दिन अचानक प्रबोध कुमार ने उसकी दिनचर्या के बारे में पूछा और कहा, ”देखो बेबी, तुम समझो, मैं तुम्हारा बाप, भाई, मां, बंधु, सब कुछ हूं। तुम अपनी सारी बात मुझे साफ-साफ बता सकती हो, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगेगा। ” थोड़ा रुककर उन्होंने फिर कहा, ”देखो, मेरे बच्चे मुझे तातुश कहते हैं, तुम भी मुझे यही कह कर बुला सकती हो। ” उस दिन से बेबी प्रबोध कुमार को तातुश कहने लगी। ‘तातुश ‘ पोलिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है तात यानी प्रिय।
बेबी सोचने लगी कि कहीं और भी काम करना चाहिए क्योंकि इतने पैसे में क्या बच्चों को पालेगी और क्या घर का किराया देगी।
प्रबोध कुमार ने समझाया, ”तुम्हें मैंने लिखने-पढऩे का जो काम दिया है, तुम वही करती रहो। तुम देखोगी कि एक दिन यही तुम्हारे काम आएगा। ”
बेबी सवेरे काम पर आती तो प्रबोध कुमार पूछते- कुछ लिखा या नहीं? बेबी ‘हां ‘ कहती तो प्रबोध कुमार बहुत खुश होते। बेबी ने अपना लिखा उन्हें दिखाया। प्रबोध कुमार ने देखा कि बेबी की लिखावट अस्पष्ट है। उसे पढऩा बड़ा मुश्किल है। वर्तनी की अशुद्धि बहुत अधिक हैं। प्रबोध कुमार बेबी का लिखा इसलिए पढ़ व समझ सके, क्योंकि वह सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे हैं। वहां अधिकांश बंगाली छात्र थे। वह उनकी लिखावट के अभ्यस्त थे। इसके अलावा वह संघ लोक सेवा आयोग में परीक्षक भी रहे। वहां बांग्ला की स्क्रिप्ट आती थी। इसलिए बांग्ला की खराब से खराब लिखावट को वह पढ़ और समझ सकते हैं। उन्होंने बेबी को लिखावट सुधारने की सलाह दी। कभी-कभी बेबी को लगता कि लिखने में गलती होगी। यह सोचकर वह नर्वस हो जाती। ऐसे में प्रबोध कुमार उत्साह बढ़ाते। वह कहते कि यह सोचेंगे कि गलती होगी तो कोई नहीं लिख पाएगा। जैसा हो, लिखो। बेबी ने भी गलती व भूल के बारे में सोचना छोड़ दिया।
बेबी को जो घटनाएं याद आईं, लिखती चली गई। प्रबोध कुमार ने उन्हें कालक्रम के अनुसार लगाया और बहुत-सी संदर्भहीन घटनाओं को छोड़ भी दिया।
एक दिन वह काम से वापस आई तो देखा कि घर टूटा हुआ है और सारा सामान बिखरा पड़ा है। वह सोचने लगी कि बच्चों को लेकर अब कहां जाऊं? इतनी जल्दी दूसरा घर भी कहां मिलेगा? केवल बेबी के घर को ही नहीं, बल्कि आसपास के और घरों को भी तोड़ा गया था। बच्चों को अपने पास बैठाकर बेबी रोने लगीं। मां को रोता देख बच्चे भी रोने लगे। उस हालत में किसी को कैसे नींद आती? उस खुली जगह में उन लोगों ने ओस में वह रात किसी तरह काटी। अगले दिन सवेरे बेबी ने तातुश को सारी बात बताई। उन्होंने छत का एक कमरा उसके लिए खाली कर दिया।
अपने जीवन की कुछ घटनाओं को भुलाते रहने की कोशिश में बेबी को कभी-कभी ऐसा लगने लगता जैसे वे घटनाएं उसके नहीं बल्कि किसी और के साथ घटी थीं। ऐसे में बेबी प्रमुख पात्र को अपना नाम दे देती। तब ऐसा लगता मानो, बेबी अपनी नहीं किसी और की दास्तां लिख रही है।
अब तक बेबी जितना लिख चुकी थी, उसे प्रबोध कुमार ने फोटोकापी करके अपने एक बंधु व हिंदी के प्रसिद्ध लेखक अशोक सेक्सरिया के पास कोलकाता भेज दिया। उनका उत्साहवर्धक पत्र आया। उन्होंने लिखा कि प्रिय बेबी, मैं बता नहीं सकता कि तुम्हारी डायरी पढ़कर मुझे कितना अच्छा लगा? मैं जानना चाहता हूं कि इतना अच्छा लिखना तुमने कैसे सीखा? तुम्हारा लेखन उत्कृष्ट है। तुम्हारे तातुश ने सचमुच हीरा खोज निकाला है। यहां मेरे जिन-जिन बंधु-बांधवों ने तुम्हारी डायरी पढ़ी है, वे सभी इसे चमत्कार लेखन मानते हैं। मेरे एक बंधु ने कहा है कि वह तुम्हारी रचना को किसी पत्रिका में छपवाने की व्यवस्था करेंगे, लेकिन उसके पहले तुम्हें अपनी कहानी को किसी मोड़ पर पहुंचाना है। आशा करता हूं- तुम कभी लिखना नहीं छोड़ोगी। इसे पढ़कर बेबी का उत्साह और भी बढ़ गया। उसने सोचा- जब सबको अच्छा लग रहा है तो मैं क्यों न लिखूं?
अब बेबी को लिखने की धुन लग चुकी थी। खाने की मेज पर, रसोई में काम करते हुए और घर में काम करते जहां भी समय मिलता, वह लिखने बैठ जाती। बेबी को सहजता से लिखते हुए देखते प्रबोध कुमार सोचते- हम जब लिखते हैं तो मेज-कुर्सी लगाकर, सिगरेट पीकर मूड बनाना पड़ता है। यह कितनी सहजता से लिखे जा रही है। जिसके अंदर कुछ कहने को है, वह तो कहेगा ही, उसे इन सब चीजों की जरूरत नहीं रहती है।
जेठू के यहां उनके बंगाली बंधु आनंद ने ‘आलो-आंधारि ‘ का पहला खंड पढ़कर लिखा- आपकी रचना अच्छी लगी। स्वयं के जीवन की विभिन्न स्मरणीय घटनाओं को सहज भाव से लेखन के माध्यम से सामने रखना बहुतों के लिए शायद संभव नहीं। अपनी इस सुंदर कोशिश को कभी बंद मत करना। अभ्यास और कोशिश से संभव है कि आप हमें कुछ असाधारण दे सकें। नारी अत्याचार, दुर्दशा और उनके आर्थिक कष्ट के बारे में आप सोचें और लिखने की चेष्टा करें।
बेबी जितना लिखती प्रबोध कुमार रोज दिल्ली में अपने एक बंधु रमेश गोस्वामी को फोन पर सुनाते। फोन पर बात करने के बाद प्रबोध कुमार बेबी से बोले, ”तुमने यह जो लिखा है, मेरे बंधु को बहुत अच्छा लगा, ऐनि फै्रंक की डायरी की तरह। ”
बेबी ने पूछा, ”यह ऐनि फै्रंक कौन है? ”
प्रबोध कुमार ने बेबी को ऐनि फै्रंक के बारे में बताया और एक पत्रिका में से डायरी के कुछ अंश पढ़कर सुनाए।
अशोक सेक्सरिया लगातार उत्साहित करते रहते। उनका पत्र आया- बार-बार जिज्ञासा करना बुरी बात नहीं, जिज्ञासा होने से ही हम लिख पाते हैं। भूलों की चिंता करने लगें तो एक लाइन भी लिखी नहीं जा सकती, इसलिए उनकी चिंता किए बिना लिखना होगा। बाद में अपना लिखा खुद ही सुधार लेना होगा। इसके बाद जिन लोगों का काम ही है लिखना-पढऩा, उनसे इसे कुछ और सुधरवाने की बारी आएगी। लिखने-बैठने से ही लिखा जा सकता है, यह अभिज्ञता तुम्हें निश्चित हो ही गई है। तुम्हारे तातुश ठीक कहते हैं कि भूल होती है तो हो, फिर भी लिखो।
इसी बीच एक दिन बेबी से नरेंद्रनाथ मिलने आए। उन्हें कहीं से पता चल गया कि बेबी कुछ लिख-विख रही है। वह बहुत खुश हुए। जहां पहले बेबी की खोज-खबर नहीं लेते थे, वहीं अब जब-तब फोन कर उसका हाल पूछने लगे। वह बार-बार यह भी जानना चाहते कि उसका लिखना कहां तक बढ़ा, खत्म हुआ या नहीं?
बेबी का उत्साह बढ़ाने वाली शर्मिला भी थीं। वह कोलकाता में पढ़ाती थीं। वह बेबी को बहुत स्नेह करतीं।
उनकी चिट्ठियां आतीं- बेबी एक बार सोचकर देखो कि अपने बाबा को तुम जैसा समझती हो, वैसा वह क्यों हैं? इसका कारण क्या है? थोड़ा उनकी तरह से भी सोचो, जिन्हें तुम माफ भले ही न कर सको। बेबी जो हमें अच्छे नहीं लगते, उन्हें भी माफ किया जा सकता है और वैसा करना ही भला है। ये चिट्ठियां बेबी को खुशी से भर देतीं और उसे सोचने-समझने की नई दिशा प्रदान करतीं।
‘आलो आंधारि ‘ का पहला खंड पूरा हो गया तो  ‘साक्षात्कार ‘ में प्रकाशित हुआ।
उस दिन सवेरे बेबी चाय बनाने किचेन की तरफ जा रही थी कि तभी एक लड़का एक पैकेट दे गया। उसने पैकेट खोला। पैकेट में पत्रिका थी। वह उसे पलटने लगी तो उसमें एक जगह अपना नाम देखा। आश्चर्य से उसने फिर देखा। सचमुच ही उसमें लिखा था, ‘आलो आंधारि ‘- बेबी हालदार। वह खुशी से उछल गई। ”देखो, देखो, एक चीज। ” बोलती हुई ऊपर अपने बच्चों के पास भागी। दोनों बच्चे उसके पास आ गए। बेबी ने पूछा, ”देखो, तो क्या लिखा है? ” बेटी ने एक-एक अक्षर पढ़ा और बोली, ”बेबी हालदार। मां तुम्हारा नाम है।” उसने प्यार से बच्चों को अपने पास खींच लिया। अचानक उसे कुछ याद आ गया। बच्चों से ‘छोड़ो-छोड़ो अभी आती हूं ‘ कहकर खड़ी हो गई। नीचे आते-आते सोचने लगी- मैं भी कितनी बुद्धू हूं। पत्रिका में अपना नाम देख लिया तो सब कुछ भूल गई। वह जल्दी-जल्दी सीढिय़ों से उतरकर तातुश के पास गई और पैर छूकर प्रणाम किया। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया।
लेखिका बनने की बात बेबी के मन में नहीं थी। यह जरूर सोचती थी कि जीवन में जो घटा, यदि उसकी किताब बन जाती तो अच्छा था। सहेलियों से बात करते हुए, वह अकसर यह बात कहती। आज उसकी यह अभिलाषा पूरी हो गई।
‘आलो-आंधारि ‘ बांग्ला में लिखी गई। इसका हिंदी अनुवाद प्रबोध कुमार ने किया। अनुवाद ही पहले प्रकाशित हुआ। ‘आलो-आंधारि ‘ का पहला संस्करण (हिंदी अनुवाद) दिसंबर 2002 में प्रकाशित हुआ। इसका पाठकों ने दिल खोलकर स्वागत किया। इसका दूसरा संस्करण 2003 में प्रकाशित हो गया। मूल बांग्ला में पुस्तक 2004 में प्रकाशित हुई। ‘आलो-आंधारि ‘ का हिंदी के अलावा मलयालम, तमिल, उडिया, असमिया, मराठी, तेलुगु, अंग्रेजी, इतावली, कोरियाई, चीनी, फ्रांसिसी, जर्मन, नार्वेजियन, डच, स्वीडिश में अनुवाद हो चुका है। एनसीईआरटी की ग्यारहवीं कक्षा की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘वितान’ में ‘आलो-आंधारि’ के लगभग पैंतीन पन्नों को पाठ के रूप में शामिल किया गया है।
आज बेबी हालदार एक चर्चित नाम है। लेकिन उसकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है। उसने काम करना नहीं छोड़ा है। 
‘आंलो-आंधारि ‘ छपने के बाद बेबी की दृष्टि में व्यापकता आई है। जहां पहले वह अपने सुख-दु:ख तक सीमित थी, अब उनकी चिंता का विषय समाज है। समाज के गरीब, शोषित तबके के दु:ख-दर्द के बारे में सोचती हैं। उनके आलेख ‘भारतीय लेखक ‘, ‘अक्षर पर्व ‘ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। ‘आलो-आंधारि ‘ के बाद के अनुभवों पर आधारित पुस्तक  ‘ईषत् रूपांतर’ भी प्रकाषित हो चुकी है।