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खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है  : महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

सोशल मीडि‍या का कैसे सार्थक प्रयोग कि‍या जा सकता है, इसकी बानगी कवि-शि‍क्षक महेश चंद्र पुनेठा का ‘बाखली’ के सपांदक गि‍रीश चंद्र पाण्‍डेय द्वारा लि‍या यह साक्षात्‍कार है। फेसबुक के माध्‍यम से हुई इस बातचीत में लेखन के लि‍ए समीक्षा अथवा आलोचना की भूमि‍का, दक्षि‍णपंथ व वामपंथ, साहित्य में ‘लोक’, छंदबद्ध और छंदमुक्त कवि‍ता, शि‍क्षण में दीवार पत्रि‍का की भूमि‍का आदि‍ वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों पर लंबी बातचीत हुई है-

मुख्यतया किसी पुस्तक की समीक्षा के पैरामीटर्स क्या होते हैं ?

बहुत कठिन सवाल है।

आपके लिए कठिन नहीं है।

इस पर तो आमने-सामने बैठकर ही चर्चा हो सकती है। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि किसी किताब में क्या खास है और उसकी क्या सीमाएं हैं? इन दोनों पक्षों को लेकर समीक्षा में बात होनी चाहिए।

खास किसके लिए?

खास का मतलब नया या मौलिक, समाज को आगे ले जाने के लिए। मानवता के पक्ष में भी कहा जा सकता है।समीक्षा ऐसे प्रश्न भी खड़े करती है जो नई बहस को जन्म देते हैं। समीक्षा किसी भी पहलू को देखने का समीक्षक का अपना पक्ष भी होती है।

समीक्षक सीमाएं किस मायने में तय करता है?

सीमाओं का मतलब उसकी नजर में कथ्य-विचार -शिल्प और भाषाई की दृष्टि से उसमें क्या कमी रह गयी हैं? क्या वह रचना कहीं मानवीय मूल्यों के विरोध में तो नहीं खड़ी है?उसकी पक्षधरता किसी ताकतवर के साथ तो नहीं है? वह यथार्थ को भ्रमित तो नहीं करती हैं? आदि।

बहुत सारे समीक्षक लेखक का चेहरा देखकर समीक्षा करते हैं या फिर ये कहूँ समीक्षा करते ही नहीं। ऐसा क्यों होता है?क्या ये उस लेखक और पुस्तक के साथ अन्याय नहीं?

बिलकुल यह समीक्षा का बहुत बड़ा संकट है। आज समीक्षा किसी को स्थापित या किसी को खारिज करने के लिए ही अधिक हो रही है।निश्चित रूप यह लेखक और पुस्तक के साथ ही नहीं, साहित्य और समाज के प्रति भी अन्याय है।खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है।

समीक्षा और छिद्रान्वेषण में अंतर को किस तरह समझा जा सकता है?

समीक्षा में समीक्षक पुस्तक की ताकत और कमजोरी दोनों बताता है और छिद्रान्वेषण में खोज-खोजकर कमियों को सामने रखता है। उसका उद्देश्य केवल रचना या रचनाकार की कमजोरियों को उजागर करना और उसे खारिज करना होता है।

क्या वाकई कोई समीक्षा या टिप्पणी पुस्तक को या लेखक को ऊंचा या नीचा स्तर दे सकती है। इसमें आपको कुछ घालमेल नहीं दि‍खता?

बिल्कुल देती ही है। लेखक को उठाती भी हैं और गिरा भी देती हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं, जहाँ समीक्षा ने लेखक को सामने लाने का काम किया। और बहुत सारे उदाहरण ऐसे भी हैं, जहां समीक्षा ने किसी रचनाकार के प्रति भ्रम फैलाकर पाठक के मन में उसकी गलत छवि प्रस्तुत करने का काम किया। क्योंकि सामान्य पाठक तो समीक्षक की कही बात को महत्वपूर्ण मानकर उसी अनुसार अपनी राय बनाता है।

क्या ये माना जाए कि‍ पुस्तक लिखने के बाद उसकी समीक्षा होना जरूरी है?

जरूरी जैसा तो कुछ नहीं है। लेकिन समीक्षा होने से नये पाठकों तक किताब की जानकारी पहुंचती है। वह अधिक पढ़ी जाती है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं। खुद रचनाकार को भी अपने लेखन की सीमाओं का पता चल पाता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित होता है। विमर्श भी आगे बढ़ता है।

पुस्तक के शीर्षक और उसके अंतर्निहित तत्वों का तादात्म्य कैसे होना चाहिए। बहुत सारे शीर्षक रोचक होते हैं, पर तत्व उतना रोचक नहीं। इस पर आपका मन्तव्य?

केवल शीर्षक के रोचक होने से काम नहीं चलेगा। मुख्य बात तो किताब की विषयवस्तु ही है। उसे ताकतवर होना चाहिए। यदि उसमें दम नहीं है तो लिखना बेकार।

वर्तमान में हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे नाम जो समीक्षाकर्म वाकई निष्पक्ष होकर कर रहे हैं?

नाम बहुत सारे हैं, किस-किस के नाम लिये जाएं ? विशेषकर कुछ युवा बहुत उम्मीद जगाते हैं।

जितने नाम भी अभी सूझ रहे हों, बताएं।

दरअसल, नाम लेने में नाम छूटने का खतरा अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति की पढ़ने और देखने की अपनी सीमा होती है। हम केवल उन्हीं का नाम ले सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा होता है लेकिन कोई जरूरी नहीं कि जो हमने पढ़ा हो वह सब महत्वपूर्ण ही हों और जिन्हें नहीं पढ़ पाए हैं, वे महत्वपूर्ण न हों। फिर एक व्यक्ति ने जितना पढ़ा होता है, उससे कई गुना उससे अपढ़ा छूट जाता है।

यानी आप उस खतरे से बचना चाहते हैं?

माना जा सकता है। अनावश्यक विवाद मुझे पसंद नहीं है।

आप भी समीक्षा कर्म और आलोचना से जुड़े रहे हैं।किन पुस्तकों की समीक्षा करते-करते आपने खुद के लेखन में परिवर्तन पाया है?

सीखना तो हर नई किताब पढ़ने के बाद होता ही है। हर नई किताब ने मेरे लेखन में कुछ न कुछ परिवर्तन किया,  भले ही वह एक कमजोर किताब ही क्यों न रही हो। उसने मुझे बताया कि अपने लेखन में किन बातों से बचना चाहिए। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, भगवत रावत, विजेंद्र, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, हरीश चन्द्र पाण्डेय, जीवन सिंह, रमाकांत शर्मा आदि कवि-आलोचकों पर लिखते हुए मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विशेषरूप से यह कि जनपक्षधरता, जीवन में ईमानदारी-सादगी, जन और प्रकृति से निकटता, जमीन व समाज से लगाव किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को कितना ऊंचा उठा देता है? इससे लेखन में कितनी गहराई और व्यापकता आ जाती है? मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि किसी भी रचनाकार पर लिखने से पहले उनके लिखे को गहराई और विस्तार से जानूं-समझूं। इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ न कुछ नया जानने-समझने को मिला।

आपने बड़ा सधा हुआ जबाब दिया है। इस सूची में कोई युवा तो नहीं दिख रहा।

युवाओं की एक लम्बी सूची है, जिन पर मैं निरंतर लिखता रहा हूँ। उतने नाम गिनाने यहाँ संभव नहीं हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर मित्रों के बार-बार आग्रह पर लिखा। इसको आप मेरी बेमानी भी कह सकते हैं। लेकिन यह मेरी कमजोरी रही है कि मैं मित्रों के आग्रह को नजरंदाज नहीं कर पाता हूँ। समीक्षा लिखने के चलते कुछ मित्रों के साथ संबंधों में खटास भी आई।

क्या उन युवाओं के साथ अन्याय नहीं होगा, नाम न लेकर?

अन्याय जैसा कुछ नहीं है क्‍योंकि‍ मेरे नाम लेने या न लेने से किसी के कद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है।

एक थोड़ा-सा अटपटा सा प्रश्‍न जिसे पूछ ही लेता हूँ। कोई ऐसा उदाहरण किसी युवा के लेखन में आपकी समीक्षा के बाद बदलाव देखा गया हो?

मैं एक अदना सा पाठक और पाठक की प्रतिक्रिया से किसी के लेखन में भला क्या परिवर्तन आएगा मित्रवर।

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आपके लिखने या न लिखने से फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई भी समीक्षा परिवर्तन लाती है। इसे आपने खुद माना है।

वह समीक्षा लिखने वाले के व्यापक अनुभव और गहरी दृष्टि पर निर्भर करता है। जहाँ तक मेरा सवाल है, न मेरे पास ऐसा कोई व्यापक अनुभव है और न ही कोई गहरी दृष्टि। मैं तो अभी खुद सीख रहा हूँ। साहित्य और समाज को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

जब हम साहित्य में समीक्षा की बात करते हैं तो वाम और दक्षिण दो पक्ष प्रमुख रूप से मिलते हैं। दोनों पक्षों की समीक्षा में मूलभूत अंतर क्या दिखता है?

वाम और दक्षिणपंथ की समीक्षा में वही अंतर है, जो इन दोनों विचारधाराओं के जीवन दृष्टि और साहित्य में है। दरअसल, हम किसी भी रचना का मूल्यांकन अपनी जीवन दृष्टि के आधार पर ही करते हैं। दुनिया को हम कैसे देखते हैं और उसे कैसा बनाना चाहते हैं? इसी आधार पर हम हर क्षेत्र का अन्वेषण-विश्लेषण करते हैं। कोई रचना या समीक्षा कर्म भी इसका अपवाद नहीं है। दक्षिणपंथ यथास्थितिवादी और परम्परावादी होता है। वह परम्परा में ऊपरी सुधार कर उसे मूलरूप में ही बनाए रखना और आगे ले जाना चाहता है। अतीत के प्रति अति मोहग्रस्त रहता है। अतीत में उसे अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ नजर आती हैं। उसे पुरानी समाजिक और राजनीतिक व्यवस्था और नियम-कानूनों से भी कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। पुराने जीवन मूल्यों को ही स्थापित और संरक्षित करना चाहता है। सामाजिक असमानता को भी जस्टीफाई करता है। इसके विपरीत वामपंथ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करता है और परम्परा के उन्हीं मूल्यों को आगे ले जाने का समर्थन करता है, जो प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस होते हैं। साथ ही एक समतावादी समाज के निर्माण में सहायक होते हैं। जीवन के प्रति यही दृष्टि उनके लेखन में भी अभिव्यक्त होता है। दोनों पक्ष समीक्षा के दौरान रचना में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुकूल मूल्यों की पड़ताल और उसका खंडन-मंडन करते हैं।

वैसे क्या एक प्रश्न नहीं उठता कि समीक्षा पक्ष की प्रतिपक्ष को करनी चाहिए। वो ज्यादा लोकतान्त्रिक होती?

तब तो प्रत्येक रचना खारिज ही होगी। कोई भी रचना कसौटी में फिट नहीं बैठेगी, क्योंकि हर विचारधारा की अपनी-अपनी कसौटी होती है।

क्या यह भी सामन्तवाद की श्रेणी में नहीं आएगा कि आप अपने पक्ष को श्रेष्ठ मानते हैं। जरूरी नहीं कि‍ आपका पक्ष ही सही हो। दूसरा पक्ष भी हमेशा गलत तो हो नहीं सकता। इस पर क्या कहेंगे?

तब विचारधाराओं पर ही बात करनी पड़ेगी कि कौन सी विचारधारा अधिक जनपक्षीय, प्रगतिशील, मानवीय और वैज्ञानिक है?  इतिहास को खंगालना पड़ेगा। पुराने अनुभवों को देखना होगा। लेकिन यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि हर विचारधारा की कसौटी तो अलग-अलग होती ही है। आप ही बताइये क्या किसी राजतन्त्र का मूल्यांकन, लोकतान्त्रिक कसौटी के आधार पर किया जा सकता है?

क्या यह माना जाए कि प्रतिपक्ष हमेशा गलत होता है

बिलकुल नहीं। पक्ष भी गलत हो सकता है। पर उसका निर्धारण किसी भी मूल्य, मान्यता तथा विचार को इतिहास के विकास क्रम में द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखने पर ही हो सकता है। भले ही अंतिम सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है, लेकिन हर देश-काल-परिस्थिति का अपना सत्य तो होता ही है। हमें उस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।

साहित्य में ‘लोक’ एक ऐसा शब्द है, जिसे कवि, कथाकार, उपन्यासकार या कहूँ लेखक, समीक्षक, आलोचक सब अपने को लोक के नजदीक दिखाना चाहते हैं। इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है? लोक के प्रति दया भाव या लोक के प्रति आस्था ?

लोक से नजदीकी दिखाने के सबके अलग-अलग कारण रहे हैं। कुछ के लिए यह लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम है तो कुछ के लिए प्रतिबद्धता का। जो लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि वे लोक के कितने नजदीक हैं,  वे लोक के मीठे-मीठे या उत्सवधर्मी रूप को अपनी रचनाओं में व्यक्त करते हैं और लोकधर्मी होने का भ्रम पैदा करते हैं। बिलकुल उसी तरह से जैसे आज बहुत सारे लोग महोत्सवों में लोकगीत-नृत्य की प्रस्तुति कर या फिल्मों में लोक धुनों और लोकसंस्कृति का इस्तेमाल कर खुद को लोक संस्कृति का सच्चा समर्थक और संरक्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। जो लोक के प्रति प्रतिबद्ध होते हैंख्‍ वे लोक के संघर्षधर्मी, सामूहिक, सहकारी और प्रतिरोधीस्वरूप को अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। लोक को द्वंद्वात्मक रूप से देखते और दिखाते हैं। लोक की ताकत के साथ-साथ उसकी कमजोरियों को भी रेखांकित करते हैं। वे लोक को महिमामंडित नहीं, बल्कि जागरूक या चेतना संपन्न करते हैं। वे न दया दिखाते हैं और न ही आस्था। दरअसल, लोक को इन दोनों की ही आवश्यकता नहीं है। उसे तो अभिजात्य वर्ग द्वारा उसके खिलाफ की जा रही दुरभिसंधियों के प्रति सचेत कर उठ खड़े होने को ताकत देने वालों की जरूरत है। लोक की सामूहिक ताकत का अहसास कराने की आवश्यकता है।

एक मुकम्मल कविता जैसी कोई चीज भी होती है क्या?

दुनिया में मुकम्मल तो कुछ भी नहीं है। हो भी नहीं सकती है। ऐसा होगा तो फिर ठहराव आ जाएगा। जीवन का सौन्दर्य उसकी गतिशीलता में और परिवर्तनशीलता में ही है। हमेशा आगे बढ़ने में। क्या आप किसी नदी को देखकर कह सकते हैं कि‍ यह मुकम्मल नदी है या किसी पेड़ को देखकर कि यह मुकम्मल पेड़ है यानी कविता एक नदी की तरह है, प्रवाहमान होना ही उसका जीवंत होना है। कविता का काम हमें अधिक मानुष बनाना है, अर्थात अधिक संवेदनशील बनाना। हमारी संवेदनाओं का अधिकाधिक विस्तार करना। जीवन के सारतत्व तक पहुंचाना। सामान्यतः जिसे लोग नहीं देख पा रहे हैं, उसे दिखाना। यह तभी हो सकता है, जब वह नदी के सामान हमेशा प्रवाहमान हो ताकि उसमें नित नया जल प्रवाहित हो सके। वह छोटी-बड़ी धाराओं-सरिताओं को अपने में समाते हुए चले। वह गंदे नालों को भी अपने में मिलाकर उन्हें भी शुद्ध कर दे। अपने किनारे बसे जनों को अपना सर्वस्व देकर उनके जीवन में नया जीवन और नई स्फूर्ति का संचार कर दे। खुरदुरे पत्थरों को चिकना कर दे और कठोर चट्टानों पर सुन्दर आकृतियाँ गढ़ दे। यह सब करते हुए किसी तरह का कोई भेदभाव न करे। अंत में सबको एक समुद्र का नागरिक बना दे।

लोग मानते हैं कि छंद मुक्त कविता जब से प्रचलन में आयी तब से कविता ने अपनी जमीन खोई है। छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई को किस रूप में देखते हैं, आप?

मुझे नहीं लगता है कि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई जैसी कोई बात है। यह खाई हमारे पाठ्यपुस्तकीय संस्कारों ने पैदा की है। पाठ्यपुस्तकों में हमेशा से छंदबद्ध कविता पढ़ने के कारण कविता को लेकर एक संस्कार बन गया है कि कविता का मतलब एक छंदबद्ध रचना। जबकि छंदबद्ध हो जाने मात्र से कोई रचना कविता नहीं हो जाती है। कविता अपने मितकथन, नवीनता, रूपकात्मकता, लय और सरसता से बनती है। अपनी लाक्षणिकता और व्यंजना से बनती है। उसमें विचारबोध, भावबोध और इन्द्रियबोध का सही तालमेल होना जरूरी है। यदि छंदबद्धता में ही कविता की लोकप्रियता होती तो आज भी वह कविता जो छंदों में लिखी जा रही है, उसी तरह लोकप्रिय होती। जैसे सूर-तुलसी-कबीर की कविता। हाँ, यह जरूर स्वीकार करना पड़ेगा कि कविता के नाम पर आज जो लयहीन लद्धड़ गद्य लिखा जा रहा है, जिसमें शब्दस्फीति बहुत अधिक है और बिम्बों, प्रतीकों और रूपकों की घोर उपेक्षा करते हुए शुष्क विचार व्यक्त किए जा रहे हैं, जिसमें इन्द्रियबोध और भावबोध सिरे से नदारत है। उसने कविता से पाठकों को दूर किया है। कविता के नाम पर जो अमूर्त और दुरूह गद्य लिखा जा रहा है, उससे बचने की आवश्यकता है।

कविता पढ़ी सबसे ज्यादा जाती है। पर कविता को वो सम्मान नहीं मिल पाता जो एक कहानी को मिलता है और चर्चा भी कम ही होती है। इसके क्या कारण हो सकते हैं?

मुझे नहीं लगता है कि कविता का सम्मान कम है या कम चर्चा होती है । अच्छी रचना किसी भी विधा में हो, उसको सम्मान भी मिलता है और चर्चा भी होती है। दरअसल, खराब या नकली कविता इतनी अधिक लिखी जा रही है कि उसके ढेर में अच्छी कविता कुछ दब सी गयी है। फिर हर पाठक की अपनी-अपनी रुचि होती है। मैं तो आज भी सबसे अधिक कविता ही पढ़ता हूँ। सबसे अधिक मन कविताओं में ही रमता है। किसी भी पत्रिका में सबसे पहले कविता ही पढ़ता हूँ। हाँ, यह जरूर है कि कविताओं को कुछ ठहरकर पढ़ने की जरूरत पड़ती है। बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है।

क्या आपको यह नहीं लगता कि कविता के प्रति नैराश्य भाव बढ़ा है। कवि भी तो कहानी की तरफ पलायन कर रहे हैं?

किसी कवि द्वारा कहानी लिखना न नैराश्य भाव है और न ही पलायन। हर विधा की अपनी सीमा होती है और हर जीवनानुभव की अपनी मांग। कभी-कभी रचनाकार को लगता है कि वह अपनी बात को किसी विधा विशेष में अच्छी तरह नहीं कह पाया है। कुछ ऐसा है, जो उस विधा विशेष की सीमाओं में बंध नहीं पा रहा है तो वह किसी अन्य विधा में अपनी बात कहने की कोशिश करता है। विषयवस्तु और जीवनानुभवों की प्रकृति के अनुसार विधाओं के बीच आवजाही चलती रहती है। यह सामान्य प्रवृत्ति है। हमेशा रही है। बहुत सारे समर्थ कवि हैं, जिन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी या अन्य विधाओं में भी रचना की है। कभी-कभी यह भी होता है जो बात हम छोटी से कविता में कह जाते हैं, वह एक बड़े उपन्यास में भी नहीं कह पाते हैं। हर विधा की अपनी-अपनी ताकत और प्रभाव है। किसी को कमतर नहीं माना जा सकता है। जहाँ सुई की जरूरत है वहां सुई का ही इस्तेमाल करना होगा। जहाँ संबल की जरूरत है, वहां सुई का मोह छोड़ना ही पड़ेगा।  क्या इसे हम पलायन कह सकते हैं?

बिल्कुल नहीं।

पर ऐसा देखने में आता है कि पहले कविता लिखने वाला कवि कहानी की और रुख करता है। उसके पीछे शायद जीवनानुभवों का दबाव रहता हो।

कहीं इसके पीछे महत्वाकांक्षा तो नहीं?

महत्वाकांक्षा कैसी?

यश भी हो सकता है?

यश तो अच्छी कविता लिखने पर भी मिलता ही है। यश का संबंध विधा से नहीं, बल्कि लेखन के स्तर से होता है।

आप अपने को समीक्षा कर्म में कविता में सहज पाते हैं या कहानी या अन्य किसी विधा में?

मैं कविता में ही खुद को सहज पाता हूँ।

सबसे पहली कविता या संकलन जिस पर आपने कलम चलायी?

विजेंद्र जी के एक कविता संग्रह पर मैंने पहली समीक्षा लिखी जो वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुई।

उस पर विजेंद्र जी की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने खुद अपना संग्रह भिजवाया था। कौन नहीं चाहता है कि उसके लिखे पर कोई बात करे।

अधिकतर देखा जाता है कि लोग समीक्षा करवाना तो चाहते हैं, परंतु सच्ची और खरी समीक्षा को पचा नहीं पाते।

आपने बिल्कुल सही कहा। सच कहो तो यह समीक्षा के सामने बहुत बड़ा संकट है। हर रचनाकार चाहता तो है कि उसकी रचना की समीक्षा हो, उस पर लिखा जाए। इस चाह में कोई बुराई भी नहीं है। आखिर कोई भी रचनाकार लिखता ही इसलिए है कि उसका लिखा हुआ पढ़ा जाए। उस पर बात हो ताकि उसकी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। लिखे की सार्थकता भी यही है। लेकिन अधिकांश रचनाकारों की अपेक्षा रहती है कि उनके लिखे पर अच्छा-अच्छा ही कहा या लिखा जाए। उसकी खूब प्रशंसा हो। यदि आप दो-चार पंक्तियों में भी उनकी सीमा बता दो या उस ओर संकेत भी कर दो तो वे नाराज हो जाते हैं। इस सबके चलते मैं इधर अब समीक्षा करने से ही बचता हूँ। बहुत सारे मित्रों ने बोलचाल कम कर दी, जबकि पहले उनके साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। वैसे तो मैं किसी भी किताब के मजबूत पक्ष पर ही अधिक लिखता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि कमजोर ढूंढ़ने चलो तो बड़े से बड़े रचनाकार के यहां बहुत सारा कमजोर मिल जाएगा। कोई भी रचनाकार ऐसा नहीं हो सकता है( जिसका लिखा हुआ सब कुछ श्रेष्ठ ही हो। इसलिए जब कभी बहुत जरूरी लगता है तो सीमाओं की ओर भी संकेत कर देता हूँ, लेकिन मेरा अनुभव है कि अधिकतर रचनाकार ऐसा पसंद नहीं करते हैं। एक और अनुभव रहा है मेरा- कुछ रचनाकार अपनी किताब भेजने के बाद तब तक समय-समय पर फोन करते रहते हैं, जब तक उनकी किताब की समीक्षा न लिख दी जाए और जब लिख दी जाती है तो यह सिलसिला बंद हो जाता है।

यह प्रवृति अधिकांश किस वयवर्ग के लेखकों में पायी जाती है?

ऐसे रचनाकारों में जो पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद अपनी एक पहचान बना चुके होते हैं। जिनकी एक-दो किताबें भी आ चुकी होती हैं।

वही कहना चाह रहा था- समीक्षा से जुड़ा कोई अप्रिय वाकया।

इतना बड़ा तो कुछ नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाए। छुटपुट प्रवृत्तियों के बारे में जिक्र कर ही चुका हूं।

आप समीक्षा के अलावा शिक्षा से भी जुड़े हुए है- एक संपादक के रूप में और एक शिक्षक के रूप में। क्या समीक्षा और संपादन दोनों एक-दूसरे के सहायक होते हैं या कठिनाई महसूस होती है?

जिस तरह से शिक्षा और साहित्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसी तरह लेखन और संपादन भी। इसलिए इनको करते हुए मुझे कभी कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई, बल्कि यह कहना चाहिए कि मदद ही अधिक मिली। साहित्य ने शिक्षा की और शिक्षा ने साहित्य की समझदारी बढ़ाने का ही काम किया। मुझे लिखने का शौक नहीं होता तो शायद मैं बहुत सारी शिक्षा की वे किताबें नहीं पढ़ पाता, जो मैंने पढ़ीं। साहित्य में अभिरुचि ने शिक्षण में भी मेरी बहुत सहायता की। साहित्य ने मुझे बच्चों और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और रचनात्मक बनाया। मेरा तो मानना है कि हर शिक्षक को रचनाकार और साहित्य का गहरा पाठक होना चाहिए। साहित्य हमारी कल्पनाशीलता, दृष्टि और संवेदना का विस्तार करता है। एक शिक्षक के लिए ये तीनों जरूरी होते हैं। एक रचनाकार-शिक्षक बच्चों में अभिव्यक्ति कौशल और भाषाई दक्षताओं का अधिक अच्छी तरह विकास कर सकता है। उनके भीतर पढ़ने की आदत डाल सकता है। बालमन को अधिक अच्छी तरह से पकड़ सकता है। साहित्य और शिक्षा मुझे जुड़वा भाई-बहन की तरह लगते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि विज्ञान-गणित के शिक्षकों को भी साहित्य का पाठक होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो वे इन विषयों को और अधिक रोचक तरीके से पढ़ा सकते हैं।

एक सामान्य पाठक अगर कविता को पढ़ने और समझने का तरीका पूछ बैठे तो उसे किस तरह समझाया जा सकता है?

सूत्र जैसा तो कुछ नहीं है। दरअसल, यह संस्कार जैसा कुछ है, जिसे धीरे-धीरे ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर, न केवल कविता बल्कि जीवन को भी पढ़ने की जरूरत होती है। उस जीवनानुभव से गुजरने की भी जरूरत पड़ती है, जिस पर कविता लिखी गयी गई अर्थात उन स्रोतों तक जाना पड़ता है, जहाँ से कविता का उद्गम हुआ है। कविता को चलते-फिरते नहीं समझा जा सकता है। उसके पास ठहरना पड़ता है। संवाद करना पड़ता है। उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है। कविता शब्दों में नहीं होती है। शब्दों में खोजोगे तो भटक जाओगे। कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। वह तो शब्दों के ओट में या दो शब्दों या फिर वाक्यों के अंतराल में भी हो सकती है। कभी-कभी तो कविता जहाँ शब्दों और पक्तियों में खत्म हो जाती है, वहां से शुरू होती है। इसलिए कविता को समझने के लिए धैर्य जरूरी है और साथ में अभ्यास भी। यही विशेषता है जो कविता को अन्य विधाओं से अलगाती है। अस्तु न कविता लिखना आसान है और न उसे समझना। कभी-कभी कविता जब शब्दों और पंक्तियों में खत्म हो जाती है, तब वहां से शुरू होती है। इसको सामान्य पाठक किस रूप में समझे। कविता को समझने को लेकर प्रतिष्ठित कवि वीरेन डंगवाल की कविता की ये पंक्तियाँ मुझे सटीक लगती हैं- जरा सम्हल कर/धीरज से पढ़/बार-बार पढ़/ठहर-ठहर कर/आँख मूंदकर आँख खोलकर/गल्प नहीं है/कविता है यह।

अलेक्सेई तोल्स्तोय ने कहीं कहा है कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्खन को काटना है। इसे आप किस रूप में मानते है? कविता जहां खत्म होती है, वहां से शुरू होती है, से आपका क्या आशय है?

बहुत सारी कवितायें जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से शुरू होती हैं हमारे मन मस्तिष्क में। पाठक उन्हें रचता है। कविता उसके मन में बहुत सारे प्रश्न पैदा करती है, जिनका उत्तर खुद पाठक तलाशता है और खुद ही देता है। इस तरह अपने भीतर एक कविता बुनता जाता है और उस कविता की उलझनों को सुलझाता जाता है, बिलकुल इसी तरह जैसे अलेक्सेई तोल्स्तोय का यह कथन कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्‍खन को काटना है। इस कथन का हर पाठक अलग-अलग अर्थ लेगा। हरेक अपनी-अपनी तरह से देखेगा। कोई जरूरी नहीं है कि वह आशय वही हो जो कवि व्यक्त करना चाहता हो। यही है शब्दों और पंक्तियों के बाद कविता शुरू होने से मेरा आशय।

कविता और एक्टिविज्म।

कविता और एक्टिविज्म, दोनों बहुत जरूरी हैं। एक्टिविज्म के बिना कविता का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। मैं इस बात का कट्टर समर्थक हूँ कि कविता लिखे जाने से पहले उसे जिया जाना जरूरी है। एक्टिविज्म कविता को जीने का एक तरीका है। हमारे आसपास कविता लिखने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जीने वाले बहुत कम इसलिए उसका प्रभाव बहुत दूर तक नहीं जाता है। फिर ऐसी कविता लिखने का क्या मतलब जो खुद को ही न बदले। कम ज्यादा जितना भी हो, हमें इस दिशा में प्रयासरत रहना चाहिए। एक्टिविज्म हमें नये-नये जीवनानुभव भी देता है, जो लिखने के लिए बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि कविता कविता के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए होनी चाहिए। यश प्राप्ति इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

आपकी सबसे प्रिय कविता जिसे आप खुद का प्रतिबिम्ब कह सकते है। उसकी चार पंक्तिया अगर संभव हो?

बहुत सारी कविताएं प्रिय हैं। किसी एक का उल्लेख करें मैं दूसरों को कम नहीं करना चाहता हूँ। फिर प्रिय होना और खुद का प्रतिबिम्ब होना, दो अलग-अलग बातें हैं। एक साथ नहीं मिलाई जा सकती हैं। कोई जरूरी नहीं कि जो मुझे प्रिय हो, वह मेरे जीवन का प्रतिबिम्ब भी हो। बहुत सारी कवितायें हमें एक साथ अलग-अलग कारणों से प्रिय होती हैं बिल्कुल लोगों की तरह, क्या हम एक समय में एक से अधिक लोगों से प्रेम नहीं करते हैं? इसलिए यह बहुत कठिन प्रश्न है।

कविता अपने किस रूप में असरदार होती है?

कोई अपने कहन में असरदार होती है तो कोई कथन में। इसी तरह एक भावबोध में तो दूसरी विचारबोध और तीसरी इन्द्रियबोध में। फिर यह पाठक की रुचि और दृष्टि पर भी निर्भर करता है।

वही जानना चाह रहा हूँ कि‍ इन सब में किस रूप में सबसे ज्यादा असरदार होती है?

सबसे असरदार तो वही होगी जिसमें भावबोध, विचारबोध और इन्द्रियबोध तीनों का सही संतुलन हो।

आप ‘दीवार पत्रिका’ पर सालों से काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से आपके जीवन में क्या परिवर्तन आए- एक साहित्यकार एक शिक्षक, और एक आम आदमी के रूप में।

परिवर्तन जैसा तो कुछ नहीं आया। हाँ, एक जिम्मेदारी का अहसास हुआ, लगा बच्चों के बीच उनकी रचनात्मकता के विकास के लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत है। यह पूरा क्षेत्र एक तरह से खाली पड़ा है। यह बहुत बुनियादी काम भी है। यदि हम एक विवेकशील, लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो नीवं से ही शुरुआत करनी होगी। बच्चों को रचनात्मक लेखन-अध्ययन का चस्का लगा देना होगा। ‘दीवार पत्रिका’ इस दिशा में मुझे सबसे कारगर माध्यम नजर आती है। इसमें बहुत अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं। ‘दीवार पत्रिका’ अपने-आप में एक स्कूल है। एक ऐसा स्कूल, जिसमें बच्चों ‘हेड-हार्ट और हैण्ड’के संतुलित विकास का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही इसे पुस्तकालय के साथ जोड़कर पढ़ने की संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है। बच्चों के साथ ‘दीवार पत्रिका’ पर काम करते हुए मेरी यह धारणा और पुख्ता हुई कि बच्चों के भीतर अपार क्षमता होती है, बस उन्हें अवसर देने और विश्वास करने मात्र की जरूरत होती है। वे ऐसा करके दिखा देंगे जैसा आप सोच भी नहीं सकते हैं। ‘दीवार पत्रिका एक अभियान’में काम करते हुए बच्चों को जानने-समझने का और अधिक मौका मिला। यह समझ में आया कि बच्चों के भीतर अपार है। बस, हमेशा उन्हें अपने अनुसार चलाने की कोशिश की जाती है। सब उन्हें अपना जैसा बना देना चाहते हैं। वे जैसा बनना चाहते हैं, वैसा कोई उनको बनने ही नहीं देता है। बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार है।

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आया कहां से?

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आने का किस्सा बहुत लम्बा है। इस बारे में मैंने अपनी किताब ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’में विस्तार से लिखा है। हाँ, यहाँ यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि यह मेरा कोई मौलिक विचार नहीं है। ‘दीवार पत्रिका’ का इतिहास बहुत पुराना है। कहीं पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी अपनी बात कहने के लिए कुछ लोगों ने इस तरह के माध्यम का इस्तेमाल किया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के समूह ‘दीवार पत्रिका’ प्रकाशन करते रहे हैं। मैंने कुछ शिक्षक मित्रों के साथ मिलकर इसे एक अभियान का रूप देने तथा पाठ्यक्रम से जोड़कर शिक्षण का माध्यम बनाने का प्रयास अवश्य किया, जो आगे भी जारी रहेगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए हमने इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। साथी शिक्षकों को इसके लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों के भीतर जिज्ञासा पैदा की। शिक्षकों और बच्चों के साथ दीवार पत्रिका निर्माण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज प्राथमिक स्कूलों तक में भी यह व्यापक पैमाने पर निकाली जाने लगी है। शिक्षण का एक सशक्त और सस्ता माध्यम बनकर सामने आया है। अच्छे परिणाम आ सामने आ रहे हैं। बच्चों को अपनी बात कहने का एक मंच मिला है। उनकी भाषायी दक्षता और अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास हो रहा है। यह पाठ्यचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आशा करते हैं कि‍ आने वाले समय में एक ऐसी पीढ़ी सामने दिखेगी, जिसकी रचनात्मकता को उभारने में ‘दीवार पत्रिका’ की अहम भूमिका रही होगी।

फिर मैं कविता की ओर लौटता हूँ। अधिकतर देखा जाता है कि‍ विद्रोह कविता का मूल कारण होता है। कविता का विद्रोही होना या कवि का विद्रोही होना इस पर आप क्या कहेंगे?

प्रतिरोध एक जरूरी जीवन मूल्य है। उसे जीवन में भी होना चाहिए और कविता में भी। यदि प्रतिरोध जीवन में नहीं होगा तो कविता में भी नहीं आ पाएगा। केवल दिखाने के लिए लाने की कोशिश की जाएगी तो वह भौंथरा प्रतीत होगा। पाठक जल्दी ही समझ जाएगा कि वह केवल कविता में कहने भर  के लिए प्रतिरोध है। ऐसी कविता पाठक के मन में प्रतिरोध के मूल्य को पैदा भी नहीं कर पाएगी। पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत,  सारोवीवा से लेकर नागार्जुन, पाश,  गिर्दा, वीरेन डंगवाल, वरवर राव सरीखे तमाम कवियों की कविताओं में हम जो प्रतिरोध देखते हैं, वह उनके जीवन में भी दिखाई देता है। मेरा मानना है कि कवि के विद्रोही हुए बिना कविता विद्रोही हो ही नहीं सकती है। ऊपर जिन कवियों का मैंने जिक्र किया उनके जीवन में पहले विद्रोह था, तब उनकी कविताओं में उतरा। एक बात और सच्चा होगा जो कवि उसके जीवन में विद्रोह होगा ही होगा। बिना विद्रोह के एक बड़ी कविता जन्म ले ही नहीं सकती है। वह कवि खाक कविता लिखेगा, जो संतोषी होगा। कविता तो असंतोष की ही उपज होती है। जब कवि अपने चारों-ओर से असंतुष्ट होता है और उसे बदलना चाहता है, तब उस बदलाव की पहली अभिव्यक्ति कविता के रूप में ही होती है। आदि कवि बाल्मीकि की कविता भी विद्रोह स्वरूप ही निकली, चाहे वो करुणा के रूप में हो। एक कवि जिस तरह का समाज बनाना या देखना चाहता है, उसी तरह की अभिव्यक्ति अपनी कविता में करता है। वह शिकारी के प्रति कवि का विद्रोह ही तो था, जिसके चलते उसके मुंह से वह श्राप फूटा।

जी जी…वो श्राप किसी भी संवेदनशील के मुँह से निकलता। हाँ, वह अलग बात है कि‍ उसे छंद का रूप दे दिया गया।

वह छंद में नहीं भी होता, तब भी कविता होती। हाँ, छंद ने उसे अधिक प्रभावशाली बना दिया। इसलिए मुझे बार-बार लगता है कि कविता रूप में नहीं, बल्कि कथ्य में होती है। बहुत सारे लोग कविता नहीं लिखते हैं, लेकिन कवि होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति किसी कविता से कम नहीं होती है। हमारे लोकगायक इसी तरह के तो थे। वे कवि कहलाने के लिए कविता नहीं करते थे। अपने आसपास के हर्ष-विषाद, दुःख-सुख, दर्द-आनंद को महसूस कर उनके भीतर से शब्द फूट पड़ते थे।

ऐसा क्या कारण है कि गेय पद ही सामान्य पाठक को अपनी ओर ज्यादा आकर्षित करते हैं?

स्वर जब संगीत के साथ मिल जाते हैं, अपना अधिक प्रभाव तो पैदा करते ही है। इसके पीछे एक कारण मुझे यह भी लगता है कि आदमी का स्वर से पहले सुर-संगीत से परिचय होता है। संगीत से आदमी का पहला लगाव होता है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की कविता पंक्ति भी है- शिशु लोरी के शब्द नहीं/संगीत समझता है।

मैंने आज तक एक सरल और सहज महेश पुनेठा को देखा है, क्या कभी महेश पुनेठा को भी क्रोध आता है? अगर आता है तो घर, शिक्षण और साहित्य के माहौल में उसे किस तरह नियंत्रित करते हैं?

आपने आधे महेश पुनेठा को ही देखा है। बाहर कोई भी पूरा दि‍खता कहाँ है? घर में ही किसी को पूरा देखा जा सकता है। क्रोध प्राणी मात्र का मूल संवेग है, तब महेश पुनेठा भला उसका अपवाद कैसे हो सकता है? हाँ, उसे नियंत्रित करने की जरूरत पड़ती है। बादल बनेंगे तो बरसेंगे जरूर और बरस जाना ही ठीक भी होता है, फटना नहीं चाहिए। ‘बादल फटने’का क्या हश्र होता है? इसे हम पहाड़ियों से अधिक अच्छी तरह कौन समझ सकता है? क्रोध आता है तो व्यक्त कर देता हूँ। लेकिन हमेशा खुद को चैक भी करता रहता हूँ कि क्या मेरे व्यक्त करने का तरीका सही था और क्या उससे बचा नहीं जा सकता था? दूसरे को ही दोषी न मान खुद के दोष को स्वीकार करता हूँ इसलिए दूसरी बार क्रोध करने से बच जाता हूँ। मेरा मानना है कि दूसरे को भी क्रोध करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि हम यह मान लें कि क्रोध करने का अधिकार छोटों और कमजोरों का भी उतना ही है, जितना बड़ों और ताकतवरों का, तो हम अपने क्रोध पर भी नियन्त्रण कर सकते हैं।

कविता और प्रेम इसको आज लिखे जा रही कविताओं में किस स्तर पर पाते हैं?

प्रेम जीवन का सनातन भाव है और कविता का सनातन विषय भी। जब तक जीवन रहेगा, प्रेम भी रहेगा और कविता में व्यक्त भी होगा और खूब हो रहा है।

क्या आपने कविता में प्रेम को जिया है?

क्या प्रेम को जिए बिना कविता रच पाना संभव है? मेरा छोटा अनुभव तो यही कहता है, असम्भव है। तब मैं बिना प्रेम का कविता कैसे लिख सकता हूँ, मित्रवर। वह तो केवल रोबोट के लिए ही संभव है।

आप पतली गली से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी अपनी कोई प्रेम पगी पंक्तियां?

सारी ही कवितायेँ प्रेम में पगी हैं। कहा न, प्रेम के बिना तो कविता लिखना ही असंभव है। आप मानवीय मूल्यों से प्रेम करते हैं,  कमजोर,  दमित, शोषित, पीड़ित से प्रेम करते हैं,  इसीलिए कविता लिखते हैं और लिख पाते हैं। यदि आप इनके प्रेम में पगे न हों तो इनके पक्ष में एक पंक्ति भी नहीं लिख पायेंगे और जो लिखेंगे भी तो भले वह कुछ भी हो, लेकिन कविता नहीं होगी।

आजकल लिखी जा रही प्रेम कविताओं की गहराई और उनका फैंटेसी पर कुछ बोलना चाहेंगे?

गहराई किसी काल की मुहताज नहीं होती हैं। उथली प्रेम कवितायेँ हर काल में लिखी गयी हैं, आज भी लिखी जा रही हैं। उसमें से मोती चुनने का काम तो सहृदय का है। फैंटेसी का इस्तेमाल कविताओं में खूब होता रहा है, पर इसके साथ खतरा यह है कि यह अक्सर यथार्थ से पलायन का बहाना बन जाती हैं। फैंटेसी की सर्थाकता तो तभी है, जब वह यथार्थ से साक्षात्कार का माध्यम बने। जैसा कि हम मुक्तिबोध के यहाँ पाते हैं।

बात मुक्तिबोध की आ ही गयी। मुक्तिबोध की कविता सामान्य पाठक के लिए तो समझना बहुत मुश्किल होता ही है। मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं, उनकी कविता के भंवर में। इसे मुक्तिबोध की कमजोरी कहेंगे या विद्वता?

बिलकुल आप ठीक कह रहे हैं, मुक्तिबोध की कविता में सामान्य पाठक ही नहीं, मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, विजेंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार भी उनकी कविता में जटिलता और दुर्बोधता की शिकायत करते हैं। इसलिए उन्हें ‘कवियों का कवि’भी कहा जाता है। लगभग सभी साहित्यिक मानते हैं कि उनकी कविता को समझना बहुत आसान नहीं है। उनका भावबोध और रचना प्रक्रिया दोनों जटिल हैं। फंतासी का इस्तेमाल भी उनकी कविता को दुरूह बना देता है। संस्कृत, तत्सम और अप्रचलित शब्दों की प्रधानता भी उनकी भाषा को कठिन बना देती है। मैं इसे मुक्तिबोध की कविता की एक सीमा मानता हूँ। लेकिन जब हम उनकी आलोचनात्मक लेखों, डायरी के पन्नों और पत्रों को पढ़ते हैं, तो उनकी कवितायें खुलने लगती हैं। एक ताना हाथ आने की देर होती है, बस। दरअसल, मुक्तिबोध की कविता की जटिलता जानबूझकर पैदा की गई, जटिलता नहीं है। जैसा कि बहुत सारे कवि करते हुए पाए जाते हैं। अपनी बात को जलेबी की तरह घुमाकर एक प्रभाव पैदा रकने की कोशिश करते हैं, जबकि कथ्य के स्तर में उसमें कुछ खास होता नहीं है। केवल वाग्जाल फैलाते हैं। लेकिन मुक्तिबोध की जटिलता जीवनानुभवों और नवीनता से पैदा जटिलता है। जिनका मंथन करने पर मक्खन निकलता है। वह हमें मनुष्य के भीतर और बाहर दोनों ओर चल रहे संघर्षों की अनुभूति से परिचित कराते हैं। चेतन और अवचेतन की बात करते हैं। कभी-कभी इतनी गहराई में चले जाते हैं कि उनको पकड़ना कठिन हो जाता है, लेकिन जब धैर्य रखते हुए उनके साथ उतरते हैं, तो नायाब मोती भी हाथ लगते हैं। मुक्तिबोध के दुरूह लगने का एक कारण उनका मराठी भाषा से हिंदी में आना भी रहा। हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं थी, बल्कि अर्जित भाषा थी। मुक्तिबोध ने जिंदगी के जिन सवालों को उठाया और जिस विचार व भावभूमि का निर्माण किया,  वैसा हिंदी के बहुत कम कवि कर पाए।

कहीं किसी का लिखा हुआ पढ़ रहा था,कविता को छंदों की ओर लौटना होगा, अगर उसे पाठक से जुड़ना है तो ।’ क्या आप इससे सहमत हैं?

सवाल छंद का नहीं है। यह कहना कि छंद में न होने के कारण आज कविता से पाठक दूर हो रहे हैं, यह स्थिति का सामान्यीकरण है। कारण बहुत सारे हैं। यदि छंद जुड़ाव का एकमात्र कारण होता, तो वे सारी कवितायें जो आज भी छंद में लिखी जा रही हैं, उनके बहुत सारे पाठक होने चाहिए थे या वे बहुत पढ़ी जानी चाहिए थीं,  क्या ऐसा है ? आज कविता छंदबद्ध हो या छंदमुक्त उसके पाठक कम ही हैं, बल्कि हमेशा ही गम्भीर साहित्य के पाठक कम ही रहे हैं। मेरे राय में कविता के छंदबद्ध होने से अधिक जरूरी है- कविता का जीवन से जुडा होना। जीवन के ज्वलंत सवालों को उठाना,  उनसे जूझना, पाठकों को नए जीवनानुभवों से परिचित कराना, जो कविता इस रूप में हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है और उससे जुडती है,  उन कविताओं से पाठक अवश्य जुड़ता है। उन्हें पढ़ता है। बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें इस बात का प्रमाण हैं। ऐसी बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें हैं, जो बहुत सारे पाठकों द्वारा पसंद की जाती हैं। इस सबको थोड़ी देर के लिए अलग भी कर दें तो फिर भी पीछे नहीं लौटा जा सकता। कविता छंद से बहुत आगे आ चुकी है,  यह केवल हिंदी में ही नहीं, दुनियाभर के साहित्य में हो रहा है। मुक्तछंद में कविता लिखी जा रही हैं। इसका कारण छंद की अपनी कुछ सीमायें रही हैं। आज जीवन की जटिलता को छंदों में बांधकर पूरी तरह से कहना संभव नहीं लगता है। छंद बहुत बार भाव और विचार का गला घोंट देते हैं। हाँ, यह जरूरी है कि कवि को छंद की परम्परा का ज्ञान होना चाहिए। उससे ताकत ग्रहण करनी चाहिए। यदि छंद में आज का यथार्थ व्यक्त हो पाता है, तो व्यक्त भी किया जाना चाहिए। छंद से किसी को कोई परहेज नहीं है, लेकिन केवल छंदबद्ध रूप में ही कविता मान्य होगी, यह अब नहीं चलने वाला है। मुक्तछंद अब बहुत आगे निकल आया है।

आपने कविता और समीक्षा के साथ-साथ क्या कभी किसी कहानी पर भी काम किया?

एक दौर में लघुकथाएं लिखी थीं। उससे अधिक नहीं।

पहली लघुकथा कौन सी थी?

अपराधिनी।

लघुकथा कथा में परिवर्तित क्यों नहीं हो पायी?

कोई कोशिश नहीं की।

कहानी और कविता के सृजन में मूलभूत अंतर आप क्या पाते हैं?

कहानी विस्तार की अधिक आजादी देती है, जबकि कविता में कम शब्दों में अधिक कहने की जरूरत पड़ती है। कविता में बिम्बों, प्रतीकों, रूपकों आदि का प्रयोग एक तरह से विधागत आवश्यकता होती है। कविता किसी अन्न को पोटली में रखना है, तो कहानी उसे बिछा देना। कहानी सृजन अधिक समय की मांग भी करती है। फिर विषयवस्तु की अपनी मांग का भी सवाल होता है। मुक्तिबोध ने तो एक ही विषय पर कविता भी लिखी है और कहानी भी।

जी, वही अंतर जानना चाह रहा था ।

उन्हें लगा होगा कि‍ शायद कविता में वह अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाए इसलिए उन्होंने कहानी द्वारा कहने की कोशिश की होगी।

कहानी और नाटक की भारतीय परंपरा में सुखान्त को तरजीह देते आए हैं। लेखक पर वेस्टर्न लेखक इस का अनुपालन नहीं करते ऐसा क्यों?

यह जीवन दृष्टि का अंतर है। भारतीय जीवन दृष्टि संतोषम परम सुखम पर विश्वास करती है। जो है, अच्छा ही है। जो होगा, अच्छा ही होगा। जो तय है, वही होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता है। हमारा अधिकांश साहित्य इसी दृष्टि को ही स्थापित करता है। इसको अंत भले का भला वाली दृष्टि भी कह सकते हैं। जबकि ऐसा हो, कोई जरूरी नहीं। अक्सर देखा गया है कि‍ भला तो ताकतवर का ही होता है। ताकत की भला-बुरा तय करती है। इतना ही नहीं, भारतीय दृष्टि यह भी है कि यदि कहीं कोई बुरा है तो उसमें कोई बदलाव भी करेगा तो वह कोई अवतारी पुरुष ही करेगा। जनशक्ति की उसमें कोई भूमिका नहीं। यह दृष्टि यथास्थितिवादी दृष्टि है।

क्या आपने कभी किसी कहानी को भी एक समीक्षक की दृष्टि से देखा?

बहुत अधिक तो नहीं। कुछ कहानी संग्रहों और उपन्यासों की भी समीक्षा लिखी है, मैंने।

कहानी की समीक्षा के वो तथ्य और कथ्य जिन्हें आप मानते हैं कि कहानी उनके बिना कहानी नहीं होती है?

कहानी में सबसे पहली बात है- उसमें कहानीपन का होना, वह निबंध की तरह न हो। शेष किसी भी रचना की समीक्षा करते हुए चाहे वह कविता हो या कहानी, सबसे पहले यही देखता हूँ कि उस रचना के माध्यम से रचनाकार ने जीवन की किस बुनियादी बात को उठाया है, जिसे अब तक किसी और ने न उठाया हो? क्या रचना में वही दिखाया गया है, जो सब देख रहे हैं या उसे दिखाया गया है,जिसे सामान्यतः लोग देख नहीं पाते हैं? उस रचनाकार की अपने जन, समाज और प्रकृति को देखने की दृष्टि क्या है? वह अपनी रचना में किसके पक्ष में खड़ा है? रचना में जिस समाधान की ओर संकेत किया गया है, वह कितना तर्कसंगत और मानवीय है? रचना पाठक की संवेदनाओं का विस्तार करने में कितनी सक्षम है?  क्या उसे पढ़ने के बाद पाठक वही रह जाता है, जो उसे पढ़ने से पहले था या कुछ परिवर्तन आता है? आदि-आदि।

हम कहानी की बात कर रहे थे, बहुत सारे लोग कहानी लिख रहे हैं। कहानी गढ़ने में काल्पनाशीलता की कितनी आवश्यक्ता होती है?

कल्पना तो सृजन का एक आवश्यक तत्व है। इसके बिना कोई भी रचना अनुभववाद की शिकार होकर रह जाती है। कल्पनाशीलता के बिना कोई भी रचना बड़ी नहीं हो सकती है। इसके अभाव में कोई भी रचनाकार केवल एक दर्पण बनकर रह जाता है। उसके सामने जो घट रहा है, उतना ही वह अपनी रचना में दिखायेगा, उससे अधिक कुछ नहीं। जबकि रचनाकार का काम वह दिखाना भी होता है, जो उसके सामने नहीं घट रहा है। दूसरे शब्दों में जिसे एक सामान्य आदमी नहीं देख पाता है। वह जिस नये समाज को अपनी रचना में दिखाता है, वह कल्पनाशीलता से ही संभव होता है। लेखन ही नहीं, बल्कि कोई भी सृजन हो वह कल्पनाशीलता के बिना संभव नहीं होता है। शिक्षण को भी में इसी रूप में देखता हूँ।

क्या आपने किसी पाश्चात्य कहानीकार को भी पढ़ा है?

थोडा़ बहुत मैक्सिम गोर्की और ताल्स्तॉय को।

पाश्चात्य लेखन और भारतीय लेखन शैली में क्या अंतर पाते हैं?

ज्यादा पढ़ा ही नहीं है, क्या अंतर बताऊंगा भला।

अपने लेखन के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

कुछ नही।

क्यों?

अपने लेखन पर भला खुद क्या कहा जा सकता है? जो लिख दिया, लिख दिया। अब वह मेरा कहाँ रहा।

आपके लेखन को मजबूती देने में आपकी धर्मपत्नी शीला जी के योगदान को आप किस रूप में रेखांेकित करना चाहेंगे?

मैं तो पूरा उनका ही योगदान मानता हूँ। वह यदि सहयोग नहीं करतीं तो शायद में न पढ़ पाता और न लिख। कभी भी उन्होंने मेरे पढ़ने-लिखने को लेकर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। उसे कभी भी फालतू या बैठे-ठाले का काम नहीं कहा। जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है। मेरे लिखे की पहली पाठक वह ही रहीं हैं। मैं सुनाता हूँ और वह सुनती रहती हैं। बहुत बार तो पहला प्रूफ वह ही देखती हैं। व्याकरण और वर्तनी की गलतियों को पकड़ती हैं।घर की पूरी जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेकर मुझे पढ़ने-लिखने के लिए छोड़ा है। मेरे बैंक-पोस्ट ऑफिस वाले काम भी वह निपटा देती हैं। पहले जब हाथ से लिखना होता था, तो मेरी कविताओं को फेयर करने का काम भी बहुत बार वहीं करती थीं। शुरू-शुरू में वापस आई रचनाओं के लिफाफों को छुपाने का काम भी। जब मैं नाश्‍ता-पानी कर लेता था, तब वह उन लिफाफों को मुझे दिखाती थीं। उन्हें इस बात का अहसास रहता था कि मुझे रचनाओं के लौटने पर कितना दुःख होता है। मेरा मानना है कि पत्नी के सहयोग के बिना कोई भी लेखक लम्बा लेखन नहीं कर सकता है।आपको तो पता है कि मैं जितने समय भी घर में रहता हूँ, लिखने या पढ़ने का काम ही करता रहता हूँ, लेकिन शीला ने कभी इस पर कोई नाराजगी व्यक्त नहीं की, बल्कि जब उनको घरेलू कामों से फुर्सत हो जाती है तो अपनी बुनाई लेकर या किताब लेकर मेरे बगल में आकर बैठ जाती हैं। बीच-बीच में घर-गृहस्थी और आसपडो़स की बातें मुझे बताती रहती हैं। कभी-कभी पढ़ने-लिखने में डूबे रहने के कारण सुन नहीं पाता हूँ, तो हल्की नाराजगी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आपके पास मेरी बात सुनने के लिए समय कहाँ ? लेकिन यह नाराजगी क्षणिक ही होती है। फिर थोड़ी देर में अदरक का पानी बनाकर ले आती है। वह खुद भी बहुत अच्छी पाठक हैं। घर में आनेवाली साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानियां तो शायद ही कोई उनसे अपठित रही हो। घर में आने वाली कोई भी कहानी संग्रह या उपन्यास सबसे पहले वही पढ़ती हैं। अच्छा हुआ तो मुझे भी पढ़ने का सुझाव देती हैं।

मनाने का समय ही नहीं होता होगा, कभी यह वाक्‍य नहीं निकला- ये किताबें मेरी सौतन हैं?

यह वाक्‍य तो सुनने को नहीं मिला अब तक।

अच्छी बात है।

इतना ही नहीं, हमारे घर में पढ़ने-लिखने वाले लोगों का हमेशा आना-जाना लगा रहा है। घंटों तक बैठा रहना और बहस सामान्य बात रही है। हमारी बहस चलती रहती है और शीला बहुत प्रेम से चाय-पानी पिलाती रही हैं। खाना खिलाती रही हैं। खुद भी हमारे बातचीत में शामिल होती रही हैं। बाहर से आये साहित्यकारों का रुकना भी होता रहा है।उनकी सेवा-सुश्रुषा में भी कभी कोई कमी नहीं आने दी होगी। गंगोलीहाट में हमने अपने आवास में एक पुस्तकालय स्थापित किया था, उसकी साफ-सफाई और देख-रेख का काम भी शीला ही देखती थीं। यहाँ भी मेरे द्वारा अपने पुस्तकालय को सार्वजनिक करने पर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। पुस्तकालय से पाठकों को किताब देने के साथ-साथ चाय भी पिला देती हैं। ‘शैक्षिक दखल’ शुरू की उसके प्रकाशक की भूमिका में भी उन्होंने पूरी सक्रियता दिखाई। पंजीकरण का पूरा काम उन्होंने अपने हाथ में लिया। बैंक में खाता खोलना और लेन-देन करना सभी काम वही देखती थीं।

आपकी कविताओं को जब पढ़ता हूँ तो आंचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत कम ही होता है, फिर भी आपकी कविताएं आंचलिकता को पूर्णतया उभार पाती हैं। यह कैसे संभव हो पाता है?

आंचलिक शब्दों के प्रयोग के बारे में मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि इन शब्दों का इस्तेमाल जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। ये शब्द सहज रूप से कथ्य की जरूरत के मुताबिक ही आने चाहिए। वहीं आने चाहिए, जहाँ भाव-विचार या प्रसंग की सटीक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी हों। जब उनका कोई और विकल्प न हो। किसी दूसरे शब्द के माध्यम से वह गहराती, तीव्रता और व्यापकता नहीं आ पा रही हो। देश-काल-परिस्थिति और पात्र की प्रमाणिकता के लिए अति आवश्यक हो। किसी रचना को आंचलिक रंग देने मात्र के लिए मैंने कभी बोली के शब्दों का प्रयोग नहीं किया। आंचलिक शब्दों के अतिशय प्रयोग से रचना के बोझिल और दुरूह होने का उसी तरह खतरा पैदा हो जाता है, जैसे तत्सम और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से। केवल बोली के शब्दों से ही कोई रचना आंचलिक नहीं हो जाती है। जीवन की घटनाएँ, प्रकृति, समाज और उसमें आये चरित्र भी रचना को आंचलिक बनाते हैं।

यह कह सकते हैं लेखकों को आंचलिक शब्दों के प्रयोग सतर्कता बरतनी चाहिए।

बिलकुल। बोली के शब्दों के प्रयोग में यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि वे सहज रूप से आयें, कहीं भी जबरदस्ती ठूंसे नहीं लगने चाहिए। पाठक को उन्हें समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पढ़नी चाहिए, सन्दर्भ से ही उनके आशय खुल जाने चाहिए। बेहद सतर्कता की जरूरत है।

साहित्य के केंद्रीकरण पर आप क्या कहना चाहेंगे?

केन्द्रीकरण से आपका क्या आशय है ? प्रश्न को थोडा और खोलें।

साहित्य का कुछ गिने-चुने लोगों के इर्द-गिर्द होना।

पाठकों के या साहित्यकारों के?

साहित्यकारों के।

मुझे लगता है कि‍ आज ऐसा नहीं है। छोटी-छोटी जगह से निकलने वाली ‘बाखली’जैसी सैकड़ों लघु पत्रिकाओं और सोशल मीडि‍या ने इसे तोडा़ है।

यानी ये आज केवल भ्रम रह गया है।

वस्तुस्थिति में काफी बदलाव आया है और आता जा रहा है। गढ़ और मठ टूट रहे हैं। अब दूर-दराज से लिखने वाले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। कुछ महानगरों या साहित्य के केन्दों की बपोती नहीं रहा। सोशल मीडिया साहित्य को आम पाठक तक ले जाने और साहित्यकारों के आपसे संवाद का एक प्रभावशाली और सशक्त माध्यम है। इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया के प्रचलन बढ़ने से साहित्यकार और पाठक के बीच से संपादक और आलोचक की भूमिका कम हो गयी है। अब साहित्यकार इनका मुहताज नहीं रह गया है।

वेदप्रकाश जी के जाने पर लुग्दी साहित्य पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। आप लुग्दी साहित्य को किस स्तर पर देखते हैं?

लुगदी साहित्य को मैं साहित्य के क्षेत्र में प्राथमिक स्कूल के रूप में देखता हूँ। पढ़ने की लत लगाने में इसकी भूमिका हमेशा से असंदिग्ध रही है। उससे अधिक मैं इसके कोई सार्थकता नहीं देख पाता हूँ।

जो शास्त्रीय साहित्य अलमारियों और पुस्तकालयों में डम्प है, उसको किस श्रेणी में रखेंगे?

उच्च शिक्षा।

थोड़ा विस्तार से।

शास्त्रीय साहित्य हमें जीवन की गहराई और व्यापकता में ले जाता है। जीवन के विविध रूप-रंग-गंधों का दर्शन कराता है। अधिक मानवीय बनाता है। संवेदना का विस्तार करता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो अंतरात्मा के आयतन का विस्तार करता है। जीवन के ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। और एक बदलाव की दिशा बताता है। उसके लिए एक बेचैनी पैदा करता है। उसे पढ़ने के बाद पाठक वैसा नहीं रह जाता है, जैसा उससे पहले था। वह अपने को अधिक समृद्ध पाता है। केवल वस्तुस्थिति का चित्रण ही नहीं करता है, बल्कि उसके कारणों की पड़ताल भी करता है। कार्य और कारणों के संबंधों की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत करता है। कुल मिलकर विवेकशीलता, संवेदनशीलता,  भाषाई संस्कार और वैज्ञानिक सोच पैदा करतस है।

सामन्तवाद और उदारवाद दोनों के साहित्य पर पर प्रभाव को आप किस रूप में देखते हैं?

समाज में मौजूद हर विचारधारा का प्रभाव साहित्य में दिखाई देना स्वाभाविक है। साहित्य के मूल में तो विचार ही होता है। हर विचारधारा साहित्य के माध्यम से ही प्रचार-प्रसार और मान्यता प्राप्त करती है। समाज में जितनी तरह की विचारधाराएँ होंगी, उतने तरह का साहित्य मिलेगा।

दोनों के कुप्रभावों को इंगित करने की भी तो आवश्यकता है?

वह तो हर नयी विचारधारा करती ही है।

मेरे कहने का आशय नयी पीढ़ी को उसके कुप्रभावों से आगाह किन शब्दों किया जाए,  हतोत्साहित भी न हों और कार्य में मौलिकता और प्रगतिशीलता भी आए?

उदारवाद एक तरह से सामन्तवाद के कुप्रभावों की उपज है। उसके लिए तो नई पीढ़ी को अपने समय और समाज को गहराई से समझना होगा। आर्थिक-सामजिक तथा राजनीतिक हर पहलू पर विचार करना होगा। मानव समाज के पूरे विकासक्रम को जानना होगा। उसका अन्वेषण-विश्‍लेषण करना होगा।यह एक लम्बी प्रक्रिया है। एक या दो दिन में किसी के दृष्टिकोण को नहीं बदला जा सकता है। या किसी विचारधारा की सीमाओं को नहीं बताया जा सकता है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि यदि कोई बदलने के लिए तैयार न हो तो आप उसे नहीं बदल सकते हो।

मैं फिर समीक्षा में लौटता हूँ।आजकल समीक्षा और आलोचना में हो रहे घालमेल पर आपका मन्तव्य क्या है?

किस तरह की घालमेल ?

मेरा आशय गिराने-उठाने से है।

उठाने-गिराने का यह खेल हमेशा ही रहा है। इधर सोशल मीडिया के आने से कुछ बढ़ गया है। यह साहित्य और साहित्यकार दोनों के हित में नहीं है और अंतत समाज के हित में भी नहीं है।

आपको नहीं लगता कि हिंदी साहित्य में जो तथाकथित बड़े आलोचक, लेखक,  समीक्षक हैं,  वही उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते?

ऐसा कहना तो ठीक नहीं होगा।

क्या कारण है कि हिंदी साहित्य आज भी अंग्रेजी साहित्य से पीछे दिखता है?

किस रूप में पीछे मानते हैं, आप?

पाठक तक पहुँच और उसकी विषयवस्तु, उसकी लोकप्रियता, उसकी व्यवसायिकता।

यदि आप केवल भारत के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता है कि अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या हिंदी साहित्य पढ़ने वालों से अधिक है। अंग्रेजी अन्तरराष्‍ट्रीय भाषा है, उसकी लोकप्रियता और व्यवसायिकता का अधिक होना स्वाभाविक है। इसके पीछे बाजार की शक्तियों का भी हाथ है। विषयवस्तु में मुझे हिंदी का साहित्य कहीं से भी कम नहीं लगता।

आपकी मातृभाषा कुमाउंनी ही है। क्या आपने कुमाउंनी में भी कभी कुछ लिखने की कोशिश की?

नहीं।

नहीं लिखने के क्या कारण रहे?

लम्बी कहानी है, कुमांउनी में न लिख पाने की।

बचपन में पढने के लिए पिताजी के साथ लोहाघाट जाना हुआ। मैं अपनी सोर्याली में बोलता था, वहां भी उसी में बोलने लगा जिसमें काली कुमांउनी से कुछ अंतर है। इन दोनों बोलियों के शब्दों में अंतर है। वहां साथी बच्चों के द्वारा मेरी बोली के शब्दों की मजाक बनाया जाने लगी। मैंने हिंदी में बोलना शुरू किया फिर वहां से घर लौटने के बाद हिंदी में ही बोलने लगा। गांव में, लोगों के बीच हिंदी में बोलने के चलते तारीफ होने लगी। बस फिर वही सिलसिला चल पड़ा। कुमाउंनी का अभ्यास छूटता ही गया। जब बोलने का ही अभ्यास छूट गया तो लिखना तो दूर की बात रही। हिंदी में ही मौखिक-लिखित अभियव्यक्ति का अभ्यास अधिक रहा। उस समय अपनी बोली-बानी के प्रति कोई अतिरिक्त चेतना भी नहीं थी। शहर के नजदीकी गांव में रहने के चलते कुछ ऐसा माहौल भी था कि कुमाउंनी में बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाता था। हर माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी में बोलने के लिए ही प्रोत्साहित करते थे, बल्कि कुमांउनी में बोलने पर टोकते थे। इस तरह छूटती ही चली गयी, अपनी दुधबोली। जब तक अपनी बोली-बानी के महत्व को समझने लगा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हिंदी में लिखना और छपना अधिक हो गया। उसी में सहज भी लगने लगा। हिंदी में लिखकर अधिक पाठकों तक पहुंचना संभव था। कभी यह भी नहीं लगा कि जो बात हिंदी में कह रहा हूँ, उसे कुमाउंनी में बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। जहाँ लोक की संवेदना को अधिक गहराई से व्यक्त करने हेतु इसकी जरूरत लगी, हिंदी में ही लोक बोली के शब्दों का इस्तेमाल कर लिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोक बोली को लेकर किसी तरह का कोई हीनताबोध हो मन में। कुमांउनी से मुझे उतना ही लगाव है, जितना हिंदी से। कभी फुर्सत मिलेगी तो जरूर कुमांउनी में भी लिखना चाहूँगा। कुछ कवितायें और समीक्षाएं लिखी भी हैं।

बुद्धिजीवियों, दलितों, पिछड़ों पर हो रहे हमलों के पीछे क्या कारण पाते हैं, आप?

यह अपनी सत्ताओं को संरक्षित रखने का कुप्रयास है। एक वर्ग विभाजित समाज में सत्ताएं किसी तरह के प्रतिरोध को बर्दास्त नहीं कर पाती है। उनको किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं। वे हमेशा अपना एकाधिकार चाहती हैं। शासक वर्ग कभी नहीं चाहता है कि शासित वर्ग किसी रूप में भी सर उठाये। उसकी बराबरी में खड़ा हो। वह समाज में लगातार विभाजन को बनाये रखना चाहता है ताकि उसका वर्चस्व बना रहे और वह ऐशो आराम की जिंदगी जी सके। इसलिए दलितों और पिछड़ों पर हमलों का इतिहास बहुत पुराना है। उनको कमजोर बनाये रखने और भयग्रस्त करने के लिए शारीरिक और मानसिक हमले हमेशा से होते रहे हैं और जब तक वर्ग विभाजित समाज रहेगा, इनका खत्म होना संभव भी नहीं दिखाई देता है। सत्ता में जितनी अधिक सामन्ती और पूंजीवादी ताकतें हावी होंगी, उतना अधिक यह दमन तेज होगा। इन ताकतों द्वारा कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए शारीरिक बल और मानसिक गुलाम बनाने के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हमेशा कोशिश रहती है कि शासित वर्ग की चेतना को कुंद कर दिया जाय। उसे धर्म, जाति, लिंग, रंग, क्षेत्र आदि की संकीर्णताओं में जकड़ दिया जाय। इसके लिए पूरा शिक्षाशास्त्र तैयार किया जाता है। लेकिन बुद्धिजीवी इस सबके खिलाफ चेतना के प्रसार का काम करते हैं, शासक वर्ग के कुचक्रों को उघाड़ते हैं, जनता को उनकी काली करतूतों से सचेत करते हैं। इस तरह प्रतिरोध को संगठित और धारदार करने का काम करते हैं। ऐसे में भला सत्ताएं उन्हें कैसे सहन कर सकती हैं? उनकी पहली कोशिश होती है कि वे बुद्धिजीवियों को लालच देकर अपने साथ मिला लें, न मानें तो उन्हें किसी भी तरह बदनाम किया जाय। उनकी छवि को संदिग्ध कर दिया जाय। इसके बावजूद न मानें तो उनको किसी तरह से कानूनी पचड़े में फांस लिया जाय या फिर उनका काम तमाम कर दिया जाय। दाभोलकर, पानसारे, कुलबुर्गी आदि इसके ताजे उदहारण हैं।

उभरते साहित्यकारों और कवियों के लिए उनके लेखन के विकास और भविष्य के लिए भी कुछ कहना तो बनता ही है?

अभी ऐसी न उम्र हुई और न अनुभव। मैं तो अभी खुद समाज और साहित्य को समझने की कोशिश में लगा हूँ। अपने भीतर के इंसान को बचाने की जद्दोजहद कर रहा हूँ। आज के दौर में कितना कठिन है- अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखना। बस उसी दिशा में संघर्षरत हूँ। संवेदनशीलता को खत्म करने के लिए चारों ओर से सुनियोजित हमले हो रहे हैं। एक इंसान का इंसान बने रहना कठिन हो गया है। उसके ऊपर शारीरिक और मानसिक हमले किए जा रहे हैं। उससे कहा जा रहा है कि तुम कुछ भी बन जाओ, लेकिन तुम्हारा इंसान बने रहना हमें मंजूर नहीं है। सांप बन जाओ, केंचुए बन जाओ, सियार बन जाओ, गिद्द या चील बन जाओ, मकड़ी या जोंक बन जाओ, सब चलेगा लेकिन अपनी रीढ़ पर सीधा खड़ा इंसान उन्हें पसंद नहीं।

 

स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास : महेश पुनेठा

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने एक प्रश्न पोस्ट किया कि आप अपना कोई भी कार्य किन परिस्थितियों में सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं? इसके उत्तर में लगभग दो दर्जन लोगों ने अपनी राय व्यक्त की, जिन्हें मोटे रूप में हम दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला वर्ग- जिनका कहना था कि वे दबाव, विपरीत परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण और विरोध के माहौल में अपना कार्य सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जिनका कहना था कि वे जब मनचाहा काम हो और मनचाहे ढंग से करने की आजादी हो, अनुकूल परिस्थितियां हों, समय-समय पर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिल रहा हो, किसी तरह का कोई दबाव न हो और भयमुक्त वातावरण हो, ऐसे में बेहतरीन रूप में कार्य कर पाते हैं। दूसरे वर्ग के लोगों की संख्या अधिक थी। पहले वर्ग की बातें मुझे आदर्शवादी अधिक लगीं। कहने-सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता से काफी दूर हैं। ऐसे व्यक्ति अपवाद ही होंगे, जो भय-दबाव-अविश्‍वास और विपरीत परिस्थितियों में अपना बेहतरीन या सर्वश्रेष्‍ठ दे पाएं। कम से कम रचनात्मक कार्य तो बिल्कुल ही नहीं। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सारे बेहतरीन काम गुलामों के खाते में होते। वास्तविकता यह है कि हम किसी भी कार्य को उन्हीं परिस्थितियों में बेहतरीन रूप में कर सकते हैं, जब हमें उस काम को करने के लिए पूरी स्वतंत्रता प्रदान की जाय, किसी तरह का कोई शारीरिक और मानसिक दबाव न डाला जाय, जहां भी उस कार्य को संपादित करने के लिए हमें कुछ जानने-समझने की जरूरत महसूस हो, उसके लिए हमें आवश्‍यक संवाद करने के पूर्ण अवसर दिए जायें। हम पर इस बात का विश्‍वास किया जाय कि हम उस कार्य को करने की क्षमता रखते हैं अर्थात हम उस कार्य को कर सकते हैं। बात-बात पर यदि हमारी ईमानदारी और निष्‍ठा पर शक किया जाता है, तो उसका प्रभाव हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है।

जैसा कि हमारा सरोकार शि‍क्षा से है और जब हम सीखने-सिखाने के संदर्भ में उक्त प्रश्‍न को देखते हैं, तो यहां भी दूसरे वर्ग के लोगों के उत्तर ही सटीक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता, विश्‍वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शि‍क्षक और शि‍क्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शि‍क्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास चाहता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में। एक शि‍क्षक अपने शि‍क्षण और स्कूल प्रबंधन के दौरान तमाम तरह के प्रयोग तभी कर सकता है, जब उसे ऐसा करने की आजादी दी जाय, उस पर विश्‍वास व्यक्त किया जाय। साथ ही शि‍क्षक को खुद पर भी विश्‍वास हो तथा एक ओर उच्च अधिकारियों तो दूसरी ओर बच्चों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करने के उसे अवसर प्रदान किए जायें। आज सरकारी शि‍क्षा का सबसे बड़ा संकट यही विश्‍वास का संकट है, जिसे एक सोची-समझी चाल के तहत पैदा किया गया है। इसी के बलबूते शि‍क्षा का बाजार फल-फूल रहा है।

शि‍क्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो। इधर ‘जबावदेही’के नाम पर शि‍क्षक पर जिस तरह के नियंत्रण लगाए जा रहे हैं, वे उस पर दबाव ही अधिक बनाते हैं। बच्चों के परीक्षा-परिणामों को तो पहले से ही उसकी वेतन-वृद्धि और पदोन्नति से जोड़ा जा चुका था, अब उसकी कक्षा-शि‍क्षण प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने तक की बात की जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों ने इन उपायों पर अमल करके भी देख लिया है। इसके नाकारात्मक परिणाम ही देखने में आए। फिर भी इसका अनुकरण किया जा रहा है। दरअसल, इस तरह के उपाय शि‍क्षक की रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। उसे दायरे से बाहर जाकर कुछ नया करने से रोकते हैं। उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते हैं। यह समझा जा सकता है कि अपनी वेतन वृद्धि-पदोन्नति और नौकरी बचाने के भय से ग्रस्त अध्यापक कभी भी बच्चों को भयमुक्त वातावरण नहीं दे सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भय हमेशा कमजोर की ओर संक्रमित होता है।

दुनियाभर के शि‍क्षाविद् इस बात पर बल देते हैं कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण दिया जाय। इसके पीछे यह तर्क है कि सीखने के लिए जिस अवलोकन, चिंतन और विश्‍लेषण की आवश्‍यकता होती है, वह दबावमुक्त वातावरण में ही हो संभव है। यदि बच्चों का मन-मस्तिष्‍क किसी भी प्रकार के दबाव में होता है तो वह एक तरह से व्यस्त होता है।ऐसे में बच्चे अवलोकन और विश्‍लेषण नहीं कर सकते हैं। अवलोकन और विश्‍लेषण के लिए मन का अवकाश में होना जरूरी है। साथ ही बच्चों की क्षमताओं पर विश्‍वास किया जाय, यह कतई न कहा जाय- ‘वे बच्चे हैं यह उनके वश की बात नहीं है।’ उनसे खुला संवाद किया जाय।लेकिन खाली स्वतंत्रता और विश्‍वास तब तक कारगर साबित नहीं होंगे, जब तक उनसे सार्थक संवाद न हो और उन्हें प्रश्न करने को प्रोत्साहित न किया जाय। साथ ही जहां उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है, वहां प्रोत्साहन और जहां मार्गदर्शन की जरूरत है, वहां मार्गदर्शन दिया जाय। दूसरे शब्दों में जब बच्चे जिस तरह की मदद चाहें,  उन्हें उस तरह की मदद देने के लिए तैयार रहा जाए। बच्चों की जिज्ञासा को जागृत किया जाय। अब यहां पर सवाल उठता है कि तमाम तरह के दबावों से दबा शि‍क्षक क्या ऐसा कर सकता है?

कतिपय शि‍क्षक-अभिभावक बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करने की बात पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि अब बच्चों को रोकना-टोकना नहीं है, वे जो चाहे उन्हें करने देना है, उनसे अब कुछ कहना नहीं है क्योंकि अब तो भयमुक्त वातावरण बनाना है। दरअसल, यह बात का सरलीकरण करना है। स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाय, वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वत्रंतता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है। ध्यातव्य है, ‘संवादहीन स्वतंत्रता’को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शि‍क्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे पहले से अधिक रचनात्मक और कल्पनाशील होना पड़ता है। उसे संवाद के माध्यम से एक बड़ी दुनिया से बच्चों का परिचय कराना होता है। उनके हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशि‍श करनी होती है। बच्चों के भीतर यह आत्मविश्‍वास पैदा करना पड़ता है कि वे चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके भीतर अपार क्षमता है और वे अपनी क्षमताओं को पहचानें और खुद पर विश्‍वास करें। इस जिम्मेदारी को शि‍क्षक-अभिभावक तभी अच्छी तरह से निभा सकते हैं, जब बच्चों से अधिक से अधिक दोस्ताना संवाद स्थापित करें।

इस अंक को हमने कुछ ऐसे विद्यालयों पर केंद्रित किया है, जिनका कार्य अन्य विद्यालयों से हटकर है। जहां सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। आप पाएंगे कि इन सभी विद्यालयों के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि सभी के मूल में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास निहित है, जिनके अभाव में इस तरह के विद्यालयों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इन्हें इस सिद्धांत के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्यालयों में बच्चों को दबाव मुक्त रखने और स्वतंत्रता देने के उद्देश्‍य से कक्षा-परीक्षा और स्कूल आने-जाने के समय तक में भी छूट दिखाई देती है।

इस अंक में हमारी कोशि‍श थी कि हम अधिक से अधिक ऐसे स्कूलों के बारे में जानकारी दें, जिनकी कार्यप्रणाली और शि‍क्षण प्रक्रिया परम्परागत पद्धति से हटकर है, जिन्हें ‘नवाचारी स्कूल’कहा जा सकता है। लेकिन हमें सरकार द्वारा तय मानकों के हिसाब से बहुत अच्छा कार्य कर रहे ‘अच्छे स्कूल’ तो बहुत सारे  मिले पर ‘नवाचारी स्कूल’ गिने-चुने ही। इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर शि‍क्षा जैसे रचनात्मक क्षेत्र में भी नवाचार का इतना अभाव क्यों? क्यों नहीं हम लीक से हटकर सोच पा रहे हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ‘क्या सख्ती से पेश आओ’नीति पर चलकर यह संभव है?

(शैक्षि‍क दखल, अंक-10, जुलाई 2017 से साभार)

सरकारी शिक्षा का भस्मासुर :  महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 आने के बाद देश भर से लगातार सरकारी स्कूलों के बंद होने की खबर आ रही हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में अब तक हजारों सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं। सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या साल दर साल घटती जा रही है। सरकारी स्कूलों के प्रति विश्‍वास लगातार कम होता जा रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले पांच-सात सालों के भीतर सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या अँगुलियों में गिने जाने लायक रह जाएगी।

इसके पीछे सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण है- शिक्षा अधिकार अधिनियम-09 के अंतर्गत 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश देने सम्बन्धी प्रावधान है। इसने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में जनता के रहे-सहे विश्वास को भी ख़त्म करने का काम किया है। यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि इस क़ानून के अंतर्गत व्यवस्था है कि प्रत्येक निजी विद्यालय अपनी कुल छात्र संख्या के 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देगा, जिनका शुल्क राज्य सरकार द्वारा उस विद्यालय के खाते में जमा कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था। पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है। लेकिन उक्‍त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है। जब सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही हो तो भला कोई क्यों अपने बच्चों को कमतर स्कूलों में डालना चाहेगा और जब सरकार निजी स्कूल में पढ़ाने का खर्चा देने को तैयार हो तो फिर भला कोई क्यों अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालेगा। सरकार ने बहुत चालाकी से शिक्षा के निजीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। बहुत जल्दी ही सरकार गरीब बच्चों को वाउचर थमाकर सार्वजनिक शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी। वह दिन दूर नहीं जब दूर-दराज के गांवों में ऐसे निजी स्कूल खुल जाएंगे, जहाँ 75 प्रतिशत बच्चों से भारी-भरकम शुल्क वसूल किया जाएगा और 25 प्रतिशत बच्चों का सरकार से वाउचर प्राप्त किया जाएगा। निजी स्कूलों की पाँचों अंगुलियाँ घी में होंगी। इसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव वंचित/दलित वर्ग के बच्चों पर पड़ना है, क्योंकि वर्तमान में सरकारी स्कूलों में सबसे अधिक बच्चे इसी वर्ग के पढ़ रहे हैं। आज जहाँ इसके शत-प्रतिशत बच्चे निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहां सरकारी स्कूल बंद होने के बाद केवल 25 प्रतिशत ही निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। उनके साथ भी भेदभाव होने की आशंका अलग से रहेगी। जैसा कि जो बच्चे अभी सरकारी खर्चे से निजी स्कूलों में जा रहे हैं, उनके बारे में समय-समय पर भेदभाव की ख़बरें सुनने को मिलती रहती हैं। बताया जाता है कि बहुत सारे निजी स्कूलों ने उनकी एक अलग कैटेगरी बना दी है। एक आशंका और है- वंचित/दलित वर्ग के बच्चों का शिक्षण शुल्क तो सरकार देगी, लेकिन निजी स्कूलों द्वारा शिक्षण शुल्क के अलावा आए दिन लिए जाने वाले शुल्कों का क्या होगा? ये ऐसे शुल्क हैं, जिन्होंने मध्यवर्ग के नाक पर ही दम किया है, गरीब वर्ग इनको कैसे वहन करेगा? जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, सच कहा जाए तो निजी स्कूलों में भी भाषा-गणित और विज्ञान जैसे विषयों को मात्र रटाया जा रहा है। सच्चे अर्थों में जिसे शिक्षा कहा जाता है, जो एक संवेदनशील, विवेकवान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है, उससे निजी स्कूल कोसों दूर हैं। बावजूद इसके उन्हें ही मानक माना जा रहा है।

कैसी विडंबना है कि एक ओर वाउचर देकर बच्चों को निजी स्‍कूलों में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा दूसरी ओर सरकारी स्कूल के शिक्षकों से पूछा जा रहा है कि उनके स्कूलों में छात्र संख्या कम क्यों हो रही है ? प्रकारांतर से उन्हें  इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि शिक्षक से सारे काम खूब करवा जा रहे हैं और उसके मूल काम से उसको दूर किया जा रहा है। गलत सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के प्रति इतना अधिक अविश्‍वास पैदा कर दिया है कि जिन सरकारी स्कूलों में बहुत अच्छी पढा़ई भी हो रही है, वहां भी आज अभिभावक अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। उक्त प्रावधान के आने से पहले तक गरीब परिवार के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में आते थे, लेकिन अब उन्हें भी निंजी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने के झूठे गौरव में डुबाया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार निजी स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी सरकारी स्कूलों में आने के लिए प्रोत्साहित करती। उन कमियों को दूर किया जाता, जिनके चलते सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में कमी आ रही है, लेकिन हो उसका उल्टा रहा है।

वरिष्ठ शिक्षाविद योगेश बहुगुणा का यह कहना सही है कि  सरकारी स्कूलों की जो दुर्दशा है, उन्हें देखकर तो गरीब से गरीब आदमी भी वहां अपने बच्चों को भर्ती नहीं करना चाहेगा। अपवादस्वरूप कुछ अच्छे स्कूल हो सकते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दुर्दशा के मूल कारणों को दूर करने के ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं किए गए। सुधार के नाम पर जड़ का इलाज करने के बजाय उसके तनों को काटने-छांटने और सींचने की नौटंकी ही अधिक की जाती रही है। शिक्षा अधिनियम-2009 में कुछ अच्छे प्रावधान भी हैं। जैसे- हर स्कूल में पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल का मैदान, पर्याप्त कक्षा-कक्ष आदि, लेकिन आठ साल गुजरने को हैं इनकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। आज भी कमोबेश वही स्थित है जो इस अधिनियम के आने से पहले थी। छात्र-शिक्षक मानक के आधार और शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्यों से मुक्त करने की मांग हमेशा से की जाती रही है, पर इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

आश्चर्य होता है कि‍ सरकारी शिक्षा को ख़त्म करने की इतनी गहरी चाल चली गयी है, लेकिन कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं सुनाई दे रही है। औरों की तो छोडिये शिक्षक संगठन भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनके अधिवेशनों में भी इस पर कोई खास चर्चा नहीं होती है। और यदि कोई शिक्षक इस पर बात करता है, तो उसे अजीब सी नज़रों से देखा जाता है। कह दिया जाता है कि‍ यह हमेशा ऐसी ही नकारात्मक बात करता है। वरिष्ठ शिक्षाविद अनिल सदगोपाल के नेतृत्व में ‘अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच’ इस मुद्दे पर लगातार मुखर विरोध करता रहा है। इस बारे में अनिल सदगोपाल ने खूब लिखा भी है लेकिन बहुसंख्यक लोग उसे अनसुना करते रहे हैं। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। इसे देखकर तो लगता है कि आज अगर सरकार एक झटके में सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण की घोषणा भी कर दे तो कहीं कोई ख़ास हलचल नहीं होने वाली है। इस स्थिति के लिए देशी-विदेशी बाजारवादी शक्तियां पिछले पच्चीस वर्षों से वातावरण बनाने में लगी हुई हैं क्योंकि शिक्षा आज मुनाफे का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण से न केवल गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर संकट आएगा, बल्कि स्थायी रोजगार का एक बड़ा क्षेत्र भी समाप्त हो जाएगा।

पढ़ने की आदत को आंदोलन बनाने की जरूरत : महेश पुनेठा

 

shekshik-dakhal

हमारे समाज में आप पढ़ने की स्थिति का अनुमान इसी बात से लगा सकते हैं कि आपके आस-पड़ोस और जानने-पहचानने वाले लोगों में से कितने लोग ऐसे हैं, जिनके घर में किताबों का एक  शेल्फ है? ऐसे लोगों के नाम लेने के लिए आपको अपनी याददाश्त पर अतिरिक्त जोर देना पड़ेगा। उसके बाद भी आपको ऐसे लोग अंगुलियों में गिने जाने लायक मिलेंगे। उनमें से भी अधिकांश ऐसे होंगे, जिनके शेल्फ में पुस्तकों के नाम पर आपको केवल पाठ्य पुस्तकें, प्रतियोगिता पुस्तकें या धार्मिक पुस्तकें ही मिलेंगी। ‘शैक्षिक दखल’ ने हिंदी समाज में पढ़ने की स्थिति का आकलन करने के लिए पिछले दिनों एक अध्ययन किया तो पाया कि एक हजार पढ़े-लिखे लोगों में से पचास लोग भी ऐसे नहीं हैं, जिनके भीतर स्वाध्याय की प्रवृत्ति हो। इसका पता इस बात से चलता है कि महानगरों और जिला मुख्यालयों को छोड़ छोटे शहरों में सार्वजनिक पुस्तकालयों का नितांत अभाव है। आधे से भी कम स्कूल हैं, जहां पुस्तकालय या वाचनालय हैं। इनमें से भी लगभग 25 प्रतिशत स्कूल ही हैं, जहां नियमित रूप से पुस्तकों का लेन-देन होता है। ये पुस्तकें भी अधिकांशतः पाठ्यक्रम से या प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुडी हुई रहती हैं। ऐसे पुस्तकालय कम हैं, जहां से बच्चे अपनी मन-पसंद किताबें लेकर पढ़ सकें। निजी पुस्तकालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। पढने-लिखने की प्रवृत्ति रखने वालों में से भी केवल पचास प्रतिशत लोगों के घरों में ही निजी पुस्तकालय हैं। स्वाध्याय की प्रवृति रखने वाले अधिकांश लोग अध्ययन, अध्यापन और लेखन के क्षेत्र से ही जुड़े हैं। इससे बाहर के दो प्रतिशत लोग भी नहीं हैं।

जब न पर्याप्त संख्या में सार्वजनिक पुस्तकालय हों, न स्कूलों में पुस्तकालय और न निजी पुस्तकालय, ऐसे में भला पढ़ने की संस्कृति कैसे विकसित हो सकती है? चारों ओर नकारात्मक माहौल है। पढ़ना या तो परीक्षा पास करने या रोजगार प्राप्त करने या फिर समय व्यतीत करने तक सीमित होकर रह गया है। कुछ नया जानने-समझने और उसको बदलने, विश्‍वदृष्‍टि‍ और संवेदनशीलता को विस्तार देने के लिए पढ़ने वालों की संख्या कम ही देखी जाती है। लेखन और अध्यापन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों में भी बहुत कम हैं, जो पढ़ने से संबंध रखते हैं। वे भी बिना पढ़े ही काम चला ले जाते हैं। पढ़ने के लिए किसी के पास समय न होने का बहाना है, तो किसी के पास संसाधनों के अभाव का। जबकि एक चेतनाशील समाज अर्थात ऐसा समाज जो सही-गलत का निर्णय सोच-समझ कर ले सके, बनाना है तो पढ़ने का संस्कार डालना जरूरी है। आहार-निद्रा की तरह पढ़ने को जरूरी कर्म बनाना। इसकी शुरुआत बचपन से करने की जरूरत है। बचपन में यदि पढ़ने की आदत लग गयी तो समझिए वह जीवनभर नहीं जाती। इसके लिए घर में माता-पिता को भी पढ़ने को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।

पढ़ने की आदत विकसित करने की दिशा में हिंदी समाज में कोई बहुत बड़ा आंदोलन तो नहीं दिखाई देता है, पर छोटे-छोटे कुछ प्रयास अवश्‍य जारी हैं। भले ही ये मरुद्यानों की तरह हैं। लेकिन इन प्रयासों से कुछ राह निकलती सी दिखती है। पता चलता है कि बेहतर समाज बनाने की चाह हो तो शुरुआत कहीं से भी की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप मध्यप्रदेश के युवा कवि मोहन कुमार नागर की इस पहल को ही देखा जा सकता है। मोहन पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने-पढ़ाने का शौक है तो उन्होंने अपने अस्पताल की गैलरी को ही वाचनालय में बदल दिया है। उनके पास जो भी पत्र-पत्रिकाएं और किताबें आती हैं, उन्हें वह अपने अस्पताल की गैलरी में रख देते हैं। जहां से वहां आने वाले जो भी चाहें किताबें उठाकर पढ़ सकते हैं। मोहन को इस बात की कसक है कि किताबें जरा कम हैं, लेकिन जब करीब सात-आठ लाख की आबादी वाले शहर में एक भी पुस्तकालय न हो और न साहित्यिक माहौल तब उनकी यह छोटी-सी पहल भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी तरह गुरिया-बौंसी, बांका, बिहार में राजेश झा हैं जिन्होंने अपने पुश्तैनी घर के एक तल को पुस्तकालय में तब्दील कर दिया है। 300 पुस्तकें हैं, 27 बच्चे नियमित और कुल 50 बच्चे अनियमित रूप से उसमें शाम 5 से 8 बजे तक पढ़ाई करते हैं। ऐसे प्रयासों के लिए दृढ-संकल्प और गहरे सरोकारों की आवश्यकता होती है, जैसा हमें उत्तराखंड के सीमांत जिले बागेश्वर के शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत में दिखाई देती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत रुचि के चलते जिले के अनेक सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों को काफी समृद्ध कर दिया है। इसके लिए उन्होंने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का सहयोग लिया। अपने क्षेत्र के विधायकों और पंचायत प्रतिनिधियों को विद्यालयों को पुस्तकालय हेतु धनराशि‍ देने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से जनप्रतिनिधियों ने अनेक विद्यालयों को धनराशि‍ प्रदान की। उनका संकल्प है कि जिले के प्रत्येक सरकारी स्कूल में एक समृद्ध पुस्तकालय हो और नियमित रूप से उसका संचालन हो। वह स्कूल प्रशासन को भी इस बात के लिए प्रेरित करते हैं। नयी-नयी पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं से बच्चों और शिक्षकों को परिचित कराते हैं। स्वयं अच्छा साहित्य उन तक पहुंचाते हैं। यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यदि शिक्षा से जुड़े अधिकारी इस तरह पुस्तकालयों के संचालन के प्रति गंभीर हो जायें तो समाज का परिदृश्य बदलने में देर नहीं लगेगी।

साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध लोगों ने अपने-अपने तरीके निकाले हैं। देहरादून में साहित्यकार शशि‍भूषण बडोनी रहते हैं। वह देशभर से निकलने वाली छोटी-बड़ी तमाम पत्रिकाएं अपने पढ़ने के लिए मंगाते हैं और खुद पढ़ने के बाद अपने परिचितों को दे देते हैं। न केवल आसपास के परिचितों को बल्कि दूर-दूर तक डाक द्वारा भेजते हैं। हिमाचल प्रदेश के सुंदरगांव में रहने वाले हिंदी के चर्चित कवि सुरेश सेन निशांत विभिन्न लघु पत्रिकाओं को झोले में डालकर सुधी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं। बांदा में यही कार्य प्रमोद दीक्षित भी कर रहे हैं। शि‍क्षा में नवाचारों को आगे बढ़ाने और पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने शि‍क्षक मित्रों के साथ मिलकर ‘शैक्षिक संवाद मंच’ का गठन किया है। प्रमोद जी देशभर से शि‍क्षा संबंधी साहित्य मंगाकर उसे वितरित करते हैं और उस पर चर्चा आयोजित करवाते हैं। गाजियाबाद के अनुराग ‘लेखक मंच प्रकाशन’ के माध्यम से सस्ती पुस्तकें प्रकाशि‍त कर इस तरह के प्रयासों को अपने तरीके से बल प्रदान कर रहे हैं। उनकी हमेशा कोशि‍श रहती है कि बच्चों के बीच कुछ ऐसी गतिविधियों का आयोजन किया जाय जिससे उनके भीतर पढ़ने-लिखने के प्रति रुचि पैदा हो। व्यक्तिगत स्तर पर और भी इस तरह के प्रयास हो रहे होंगे, जिसकी जानकारी अभी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है।

एकलव्य, रूम टू रीड, ए.पी.एफ. जैसे कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की पहल कदमी को छोड़ दें तो इस दिशा में सामूहिक रूप से भी कुछ प्रयास हो रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये किसी सरकारी या बड़ी संस्था से प्राप्त आर्थिक सहायता से न होकर कुछ लोगों या समुदाय के सहयोग से संचालित हैं। इसी तरह के प्रयास हैं जो किसी आंदोलन को जन्म दे सकते हैं। जैसे उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘क्रिएटिव उत्तराखण्ड’ नाम से सक्रिय है। इस संस्था ने शहर के बीच स्थित एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के बेकार पड़े कमरों को शहर के समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों की मदद से बेहतरीन पुस्तकालय में बदल दिया। अब स्कूल के समय पर इस स्कूल के बच्चे और शाम को शहर के अन्य लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। इसी तरह चमोली जनपद के सुदूर चोपता क्षेत्र के युवाओं ने मिलकर कड़ाकोट शिक्षा मंच का गठन कर पुस्तकालय और गतिविधि केन्द्र स्थापित किया है। अब तक जन सहयोग से इस केन्द्र में 1500 से अधिक किताबें, दैनिक हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों के साथ ही कम्प्यूटर और एक प्रिं‍टर है। गांव के युवाओं ने मिलकर पुस्तकालय में कम्प्यूटर और किताबों को रखने के लिये फर्नीचर तैयार किया है। इसके पीछे ग्रामीणों की सोच है कि अगर हमें अपने बच्चों को खुशहाल भविष्य देना है तो हमें अपने गांव को और बेहतर करने के लिए लगातार काम करना होगा।

यह देखने में आया है कि पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए पुस्तकालय का होना ही पर्याप्त नहीं है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों और पुस्तकालय से जुड़ें इसके लिए कुछ गतिविधियों का होना भी जरूरी लगता है। इस दृष्‍टि‍ से कुछ प्रयासों का उल्लेख भी यहां करना चाहेंगे। कवि मित्र अजेय से पता चला कि लिखने-पढ़ने की गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हिमाचल के कुल्लू में तकरीबन 10 सालों से एक समूह काम कर रहा है। ग्रुप का नाम है संवाद कुल्लू। पहले नवलेखन कार्यशाला के रूप में शुरू हुए इस ग्रुप ने अब हर उम्र के साहित्य प्रेमियों के दोतरफा संवाद का रूप ग्रहण कर लिया है। लगभग हर सप्ताह सदस्य मिलते हैं। किसी तय लेखक या किताब पर चर्चा होती है। लाइब्रेरी के कान्फ्रेंस हाल में ही सब लोग चर्चा करते हैं। हर तरह की रुचि और विचारधारा वाले लोग इस में सम्मिलित होते हैं। छात्रों और युवाओं को अपनी बात कहने के लिए प्रेरित किया जाता है।

पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में डॉ. डी. डी. पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रही है। जहां विज्ञान के साथ-साथ साहित्य और अन्य चीजों पर बच्चों के लिए बेहतर वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही है। विज्ञान की कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा अनेक साहित्यिक गतिविधियां जैसे दीवार पत्रिका का निर्माण, बच्चों में पढ़ने की रुचियां उत्पन्न करने के लिये उनको पत्रिकाएं देना, बच्चों के बीच बाल फिल्में दिखाना आदि, संचालि‍त होती हैं। इसी तरह का पिथौरागढ़ शहर में युवाओं का एक समूह है- आरंभ स्टडी सर्किल। इस समूह से जुड़े अधिकांश युवा स्थानीय डिग्री कालेज में अध्ययनरत हैं। नयी पीढ़ी में पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने की दिशा में पिछले तीन सालों से महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। ये न केवल स्वयं अध्ययन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। हर शाम घूमने के लिए निकलते हैं तो इनके हाथ में कोई न कोई नयी किताब होती है, जिसका न केवल पाठ करते हैं बल्कि किसी स्थान पर बैठ चर्चा भी करते हैं। इतना ही नहीं इनके द्वारा पढ़ने के इच्छुक लोगों को पुस्तकें उपलब्ध करवाने हेतु एक बुक क्लब बनाया गया है। समूह के साथियों के पास उपलब्ध किताबों की सूची बनाकर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकाई गयी हैं और उसमें संपर्क नंबर दिए गए हैं। इच्छुक व्यक्ति फोन से संपर्क करते हैं और उन्हें उनके बताए स्थान पर पुस्तक उपलब्ध करवा दी जाती है। दूसरे पुस्तकालयों से पुस्तकें लेकर भी समूह से जुड़े युवा अपने मुहल्ले के बच्चों को पढ़ने को देते हैं। यह अपने तरह का एकदम नया प्रयोग है। इस समूह द्वारा स्थानीय महाविद्यालय में ‘आरंभ’ नाम से एक दीवार पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता है। समय-समय पर गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। पिछले दिनों कविता पोस्टर बनाकर महाविद्यालय की दीवारों पर लगाए गए। साहित्य के प्रति नयी पीढ़ी में लगाव पैदा करने का उनका यह प्रयास अनूठा है। इस तरह के प्रयासों को संगठित करने और गति देने की आवश्यकता है। देशभर में हो रहे ऐसे और प्रयासों को भी चिह्नित करने और सामने लाने की जरूरत है। केवल पढ़ने की संस्कृति के अभाव का रोना-रोने से कुछ नहीं होगा। अपने दायरे से बाहर निकल कर कुछ करने की आवश्यकता है। हमारी सरकारें इस दिशा में कुछ ठोस करेंगी, ऐसी आशा करना भोलापन होगा। हमें खुद ही पहलकदमी लेनी होगी।

पढ़ने की जब बात आती है तो एक सवाल यह भी उठता है कि क्या पढ़ा जाये? पढ़ने के लिए हमारे चारों ओर इतनी सामग्री बिखरी पड़ी है कि यह तय करना जरूरी है। यह देखा जाता है कि हम अपना बहुत सारा समय ऐसा कुछ पढ़ने में गंवा देते हैं जो न हमारे व्यक्तित्व को समृ़द्ध करता है, न सूचना-जानकारी को और न ही विश्‍वदृष्‍टि‍ को व्यापक करता है। बस हम पढ़ते ही जाते हैं। इस तरह बहुत कुछ ऐसा छूट जाता है, जो जरूरी होता है। अतः हमें चयन करने की आवश्‍यकता पड़ती है। उपलब्ध समय और जरूरत के बीच सही तालमेल स्थापित करना पड़ता है। एक शि‍क्षक के रूप में हमें क्या पढ़ना चाहिए, इस पर विस्तार से लिखने की यहां पर गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इतना सारा है कि उसे हम एक आलेख में नहीं समेट सकते हैं। लेकिन यहां पिछले दिनों वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर द्वारा प्रकाशि‍त वरिष्‍ठ शि‍क्षाविद् शि‍वरतन थानवी की पुस्तक ‘भारत में सुकरात’ का उल्लेख अवश्‍य करना चाहेंगे। इस पुस्तक में लेखक द्वारा उन तमाम पत्र-पत्रिकाओं, लेखों, निबंधों और पुस्तकों का उल्लेख किया है जो एक शि‍क्षक के लिए उपयोगी हैं। साथ ही उनका पढ़ा जाना क्यों जरूरी है, उन कारणों को भी रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के तरीकों के बारे में हमें बहुत कुछ सुझाती है। इस संदर्भ में उनका मानना है कि पाठ्येतर साहित्य का पढ़ना वस्तुतः प्रतिबंध नहीं, प्रोत्साहन का विषय होना चाहिए। जो मन में आए और जब मन में आए पढ़ने की स्वतंत्रता और साधन हम देते रह सकें तो बच्चे हल्की-फुल्की रहस्य-रूमान की सामग्री पढ़ते-पढ़ते चित्रकला, फोटोग्राफी और डाक टिकट संग्रह संबंधी लेख-स्तम्भ की पुस्तकें भी पढ़ने लग सकते हैं। पढ़ने के लिए वातावरण तभी सक्रिय होगा, जब यह मानें कि‍ बिना किसी वर्जना के बच्चे पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें पढ़ने को स्वतंत्र हैं। शि‍वरतन थानवी जगह-जगह अपने जीवन के पढ़ने से जुड़े अनुभव बताते चलते हैं, जिससे पुस्तक रोचक, आत्मीय और विश्‍वसनीय हो गई है। इस पुस्तक में संकलित आलेख- झोले में पुस्तकालय-मास्टर मोतीलाल जी, पोथी का सुख, शि‍क्षक क्या पढ़े-क्यों पढ़ें, आपके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं?, पढ़ने की आदतें :पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें और बच्चे, किताब कैमरा है कि आंख आदि विशेष उपयोगी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह किताब न केवल उन किताबों की जानकारी देती है, जो हमें पढ़नी चाहिए बल्कि पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती है।

‘शैक्षिक दखल’ के इस अंक में हम पढ़ने की संस्कृति की स्थिति और कारणों की एक पड़ताल कर रहे हैं। इसका उद्देष्य उन तरीकों को जानना-समझना है, जो बच्चों में स्वाध्याय की आदत विकसित करते हैं, ताकि एक शि‍क्षक या अभिभावक के रूप में हम भी उन्हें अपना सकें। यह उस दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है। हम चाहते हैं कि यह क्रम आगे बढ़े और पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए एक रचनात्मक आंदोलन उठ खड़ा हो।

(शैक्षि‍क दखल, वर्ष-6, अंक-9, जनवरी 2017 से साभार)

दीवार पर किताब, सोशल मीडिया में धूम

Deewar Patrika Aur Rachnatmakta

 

चंडीगढ़, 20 जुलाई (ट्रिन्यू)

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का एक समूह अभियान चला रहा है। इसमें बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने की कोशिश की गयी है। यह मुहिम इन दिनों सोशल मीडिया पर छायी हुई है। ‘दीवार पत्रिका : एक अभियान’ नाम से फेसबुक समूह और ब्लॉग भी बनाया गया है। इससे जुड़े लोगों का कहना है कि यह अभियान का ही असर है कि आज प्राथमिक विद्यालयों से लेकर डिग्री कालेज की दीवारों तक में यह हस्तलिखित पत्रिका लटकी देखी जा सकती है।

उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से प्रारम्भ हुए इस अभियान की गूंज वहां के तीन सौ से अधिक विद्यालयों सहित उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पं.बंगाल आदि प्रदेशों के विभिन्न स्कूलों में दीवार पत्रिका निकलने लगी है।

अभियान से जुड़े महेश पुनेठा कहते हैं, ‘बच्चों में रचनात्मक विकास और भाषाई दक्षता को बढ़ावा देने के लिए ‘दीवार पत्रिका’ अपने आप में अनोखा, प्रभावशाली और बेहद कम खर्चीला है। यह एक हस्तलिखित पत्रिका है, जो दीवार पर कलैंडर की तरह लटकायी जाती है।’

उन्होंने बताया कि पिछले दिनों लेखक मंच प्रकाशन से ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’ नाम से एक किताब का प्रकाशन भी किया है। इसमें बच्चों और इससे जुड़े तमाम लोगों के अनुभव सहेजे गये हैं।

Posted On July – 20 – 2015

 

जन से नहीं, धन सरोकारों से जुड़ी है नि‍जी शि‍क्षा : महेश पुनेठा

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आजादी के पैंसठ साल गुजर गए हैं अभी तक हम न समान, न समावेशी, न मूल्यपरक और न ही सबको शिक्षा दे पाए हैं। ये लक्ष्य सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करके ही प्राप्त करने संभव थे लेकिन लगातार शिक्षा का व्यवसायीकरण और निजीकरण बढ़ने से ये लक्ष्य शिक्षा संबंधी दस्तावेजों की शोभा मात्र बनकर रह गए हैं। सरकार की नीतियाँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। एक ओर सबको शिक्षा की बात और दूसरी ओर शिक्षा के व्यवसायीकरण और निजीकरण को खुली छूट, यह कैसा अंतर्विरोध है?

आज शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अच्छा इंसान बनना नहीं बल्कि अच्छा वेतन पाना मात्र रह गया है। ज्ञान और उत्पादक कार्य के बीच गहरी खाई बनी हुई है। शिक्षा पूँजी के हित हो गयी है और एक ऐसे वर्ग को जन्म दे रही है जो विचार और कार्य में पूँजी का मददगार हो। बाजार ने शिक्षा को मुनाफे का माध्यम बना लिया है। शिक्षा जन सरोकारों की अपेक्षा धन सरोकारों से जुड़ गई। स्कूल शिक्षा की दुकान और विद्यार्थी उपभोक्‍ता में बदल गए हैं जिसके पास जैसे आर्थिक संसाधन हैं वह वैसी शिक्षा खरीद रहा है। विभिन्न उपभोक्‍ता वस्तुओं की तरह बाजार अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा को लेकर उपस्थित हो रहा है। कम पैसे वालों के लिए एक तरह की शिक्षा है और अधिक पैसों वालों के लिए दूसरे तरह की। ‘जिसकी आर्थिक हैसियत जैसी है वैसी शिक्षा खरीद ले’, यह बाजार का अघोषित ऐलान है। ट्यूशन या कोचिंग नए धंधे के रूप में अस्तित्व में आए हैं । अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इनसे जुड़े संस्थान विद्यार्थियों और अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। ‘कुंजी’ और ‘गाइड’ छापने वालों का धंधा खूब फल-फूल रहा है। सभी का जोर एक ही बिंदु पर है कि कैसे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्‍त किए जा सकते हैं? सभी यही तरकीब बताने में लगे हुए हैं। बच्चों को साँस लेने की फुरसत नहीं है। एक अंधी दौड़ में सभी दौड़ रहे हैं। जो सफल हो गए वे अपने आप को सिकंदर समझ रहे हैं और जो पीछे रह जा रहे हैं वे कुंठा, तनाव तथा अवसाद से ग्रस्त हो आत्महत्या कर रहे हैं या मानसिक संतुलन खो रहे हैं।

कारपोरेट जगत की गिद्ध दृष्टि शिक्षा के व्यवसाय पर लगी हुई है। हो भी क्यों ना ! इससे उसे दोहरा लाभ है- पहला, शिक्षा में बार-बार निवेश किए बिना दीर्घकाल तक धन की प्राप्ति। दूसरा,  शिक्षा में नियंत्रण के द्वारा नई पीढ़ी की मानसिकता को बाजार के अनुकूल कर अपने बाजार का निर्बाध रूप से विस्तार करना। शिक्षा में बाजार का ऐजेंडा संस्थानों के निजीकरण और व्यावसायीकरण से कहीं बड़ा है। भूमंडलीकरण का लोगों के ज्ञान को विकृत करने और औपनिवेशिक रूपाकारों के अनुकूल बनाने के रूप में इस्तेमाल किया गया है। विश्‍व बैंक जैसी आर्थिक संस्थाएं शिक्षा की नीतियाँ तय कर रही हैं। यह समझा जा सकता है जब एक आर्थिक संस्था शिक्षा की नीतियों का निर्धारण करने लगेगी तो उसकी प्राथमिकता में कौन-सी बातें होंगी। आज शिक्षा में मूल्यों की बात केवल कहने भर के लिए रह गई है। मानवी मूल्य हाथी के दाँत हो चुके हैं। सामाजिक न्याय जैसे शब्द सजावट के शब्द बन गए हैं।      बाजार में बिक रही शिक्षा का मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल शिक्षा है। इसका उद्देश्य अर्थ मानव तथा व्यवस्था की मशीन में फिट होने वाले पुर्जे तैयार करना है। शिक्षा की दुकानों में वही शिक्षा बेची जा रही है जिसकी कॉरपोरेट जगत को जरूरत है। बाजार को ऐसा मानव संसाधन चाहिए जो उसकी कंपनियों में लगी अत्याधुनिक तकनीक की मशीनों को सही ढंग से परिचालित कर सके। उसके उत्पादों को खरीदने वाले उपभोक्ताओं को मानसिक रूप से तैयार कर सके। ऐसे उत्पादों को भी बेच सके जो उपभोक्ता की आवश्यकता न हो। बाजार सोचने-समझने वाला संवेदनशील मानव नहीं चाहता। ऐसा मानव उसके किसी काम का नहीं। इसलिए आज की शिक्षा एक कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या प्रशासक तो तैयार कर रही है पर उसे एक संवेदनशील इंसान नहीं बना रही है। न ही यह शिक्षा सृजनशीलता को बढ़ाने में सफल हो पा रही है। सृजनशीलता के अवसर इस बाजारवादी शिक्षा ने निगल दिए हैं। इस शिक्षा में ऐसी क्षमता नहीं है कि यह किसी को साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक या चिंतक बना सके। यह उसकी न मंशा है और न ही जरूरत। यदि शिक्षाक्रम बाजार की जरूरतों से निर्धारित होगा तो वह बाजार की जरूरतों के अनुरूप क्षमताओं और कौशलों को विकसित करने वाला ही होगा। इसका परिणाम शिक्षा के व्यापक सामाजिक आधारों, शिक्षा में चिंतन की भूमिका और संवेदनात्मक पहलुओं से दूर ले जाएगा। शिक्षा में निहित मानवीय और समाजिक तत्वों जैसे कि समाजिक न्याय, समता और जेंडर जैसे मुद्दों, जिनकी शिक्षा में वैसे भी कम ही सराहना होती है, शिक्षा प्रक्रियाओं में पीछे चले जाएंगे। इंसान की बुनियादी आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों- शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन या मानवीय समता या स्वतंत्रता को किसी भी देश में निजीकरण की प्रक्रियाएं बराबरी की तरफ नहीं ले गई हैं।

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शिक्षा आर्थिक उदारीकरण के ऐजेंडे को लागू करने का माध्यम बन चुकी है। उसके द्वारा आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में माहौल तैयार करने का काम किया जा रहा है। ऐसा ही करने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित हैं। आज उच्च शिक्षा में विदेशी विश्‍वविद्यालय को आने की अनुमति दे दी गई है और वह दिन दूर नहीं जब कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी पूरे देश में शिक्षा देने का काम अपने हाथ में ले लेगी। तब देश की संप्रभुता और संस्कृति का क्या हाल होगा समझा जा सकता है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी लोककल्याणकारी, समाजवादी तथा लोकतांत्रिक सरकारें इसी शिक्षा की पैरोकार हैं। आजादी के बाद से लेकर आज तक चल रही दोहरी शिक्षा जो आज बहुपरती शिक्षा में बदल गयी है, इसी का परिणाम है। योजना आयोग की जनता के पैसों से विद्यालयों का आधारभूत ढाँचा विकसित कर प्रबंधन के नाम पर उन्हें निजी हाथों को देने की योजना बन चुकी है। प्रथम चरण में देश भर में स्थापित होने वाले छः हजार मॉडल स्कूलों में से दो हजार पाँच सौ स्कूलों को ‘सार्वजनिक-निजी साझेदारी’ के अंतर्गत किसी कॉरपोरेट, स्वयंसेवी संगठन, स्वयं सहायता समूह, व्यक्ति और समुदाय आधारित संगठनों को सौंपा जाएगा। भविष्य में इस भागीदारी का बढ़ना निश्‍चि‍त है। कई राज्यों में तो यह प्रक्रिया प्रारम्भ भी हो चुकी है।

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी है। इस अधिनियम में ऐसे कुछ प्रावधान हैं जो शिक्षा के निजीकरण को खुला प्रोत्साहन देते हैं। निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब-वंचित तबके के बच्चों को वाउचर प्रदान कर भेजने की योजना इसका एक उदाहरण है। इस प्रावधान से आने वाले समय में सरकारें नये विद्यालय खोलने के अपने दायित्व से बच जाएंगी। साथ ही इस मान्यता को भी अधिक बल मिलेगा कि निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से बेहतर होते हैं। कैसी विडंबना है कि सरकार को अपने ही विद्यालयों पर विश्‍वास नहीं रह गया है। सरकार सरकारी स्कूलों की शैक्षिक गुणवत्ता को बढ़ाने की अपेक्षा जनता को निजी विद्यालयों की ओर जाने को प्रोत्साहित कर रही है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार अपने बीमार विद्यालयों का इलाज कर निजी विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों को उस ओर आकर्षित करे। उनकी गुणवत्ता को इस स्तर तक उठाए कि सम्पन्न वर्ग के बच्चे भी उन विद्यालयों में प्रवेश लेने को उत्सुक हों। भले ही सरकार उस वर्ग के बच्चों से शुल्क वसूल करे। ऐसा करने से दोहरा लाभ हो सकता था- पहला, हर वर्ग के बच्चे एक समान स्कूल में पढ़ते जो समाज में वर्ग भेद को समाप्त करता। दूसरा, सरकारी विद्यालयों को चलाने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए जा सकते। यह कोई जरूरी नहीं है कि अमीर या उच्च मध्यवर्ग के बच्चों को भी निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाए। एक तरह से वाउचर योजना निजी क्षेत्र को लाभ पहुँचाने की योजना है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार धीरे-धीरे शिक्षा को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। आज सरकारी विद्यालयों में गरीब वर्ग के बच्चे ही आ रहे हैं और जिस दिन ये बच्चे भी वाउचर लेकर निजी स्कूलों में चले जाएंगे तब फिर सरकारी स्कूलों को बंद करने के सिवाय कोई अन्य उपाय नहीं रहेगा। जैसा कि यह सिलसिला शुरू भी हो गया है। इस तरह एक दिन  शिक्षा पूरी तरह निजी हाथों में चली जाएगी और देशी-विदेशी व्यापारी शुद्ध लाभ के लिए शिक्षण संस्थाएं संचालित करने लगेंगे। सोचा जा सकता है तब शिक्षा का उद्देश्य क्या रह जाएगा, शिक्षा में कितनी मूल्यों की बात रह जाएगी और कितनी जीवन की, तब शिक्षा का संबंध चेतना से नहीं रह जाएगा। शिक्षा जकड़न को तोड़े इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं की जाएगी। बच्चों में विवेकशीलता का विकास शिक्षा का कोई सरोकार नहीं रह जाएगा क्योंकि बाजार की दृष्टि से इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। जैसा कि हम अभी भी देख रहे हैं निजी स्वामित्व वाले शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के नाम पर पाठ्चर्या में उन्हीं विषयों को शामिल किया जा रहा है जो उद्योगों के विस्तार और संचालन के लिए जरूरी हैं। वहाँ भाषा व मानविकी जैसे चेतना विकसित करने व समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले विषयों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। उनके स्थान पर प्रबंधन व तकनीकी विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बच्चा जो पढ़ना चाह रहा है उसे वह नहीं पढ़ने दिया जा रहा है बल्कि बाजार उसे जो पढ़ाना चाह रहा है उसे वह पढ़ना है। बच्चे की सृजनात्कमता और रुचि का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा छात्र-अभिभावकों का मन तैयार किया जा रहा है। उन्हें हसीन सपने दिखाए जा रहे हैं। इतने बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं कि उन्हें लगता है कि अमुक पाठ्यक्रम पढ़ने से उनकी किस्मत ही बदल जाएगी।

कुछ लोग तर्क देते हैं कि निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान निर्धन और वंचित बच्चों के लिए आरक्षित हो जाने के प्रावधान से अमीर और गरीब वर्ग के बीच खाई पाटने में सहायता मिलेगी। अब रिक्शा चालकों, सफाई कर्मियों, ठेले वालों, मजदूरों आदि के बच्चे साहबों और सेठ-साहूकारों के बच्चों के साथ बैठकर पढ़ेंगे लेकिन पिछले तीन वर्ष के अनुभव बताते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। ऐसा होने के स्थान पर बच्चों की एक कैटेगरी(बाउचर वाले बच्चे) बनने की अधिक संभावना है। निजी विद्यालयों ने वाउचर वाले बच्चों के लिए एक तोड़ निकाल लिया है, उन्होंने ऐसे बच्चों की एक अलग कक्षा बना दी है। यहाँ ये बच्चे केवल हीनता ग्रंथि के शिकार होंगे उससे अधिक उनको कुछ मिलने वाला नहीं है।  किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सबको शिक्षा और बराबरी का लक्ष्य निजी स्कूलों के भरोसे प्राप्त किया जा सकता है। बल्कि इनसे एक खतरा और बढ़ा है संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की निजी क्षेत्र की अनेक शिक्षण संस्थाओं ने खूब धज्जियाँ उड़ायी हैं। शिक्षा को कट्टरता, धर्मान्धता, जातिवाद, भाषाई दुराग्रह एवं क्षेत्रवाद फैलाने का माध्यम बनाया गया है। विशेष रूप से सांप्रदायिक मानसिकता को बोया और विकसित किया गया है। जैसा कि प्रख्यात शिक्षाविद अनिल सदगोपाल का मानना भी है, ‘‘शिक्षा के जरिए वर्ग-भेद, जाति-भेद, धार्मिक कट्टता, नस्लवाद, पितृसत्ता, सामंती व गैर-तार्किक सोच, पिछडेपन आदि विकृतियों के खिलाफ लड़ाई आगे बढ़ाने के सरोकार गौण हो रहे हैं। शिक्षा, वैश्विक बाजार की ताकतों के हाथ में वर्चस्ववाद, शोषण, सांप्रादियकता व विषमता फैलाने का हथियार बनती जा रही है।’’

एक ओर शिक्षा का निजीकरण और व्यवसायीकरण अपना ऐसा रंग दिखा रहा है दूसरी ओर अभी भी सरकार सबको शिक्षा देने के नाम पर संसाधनों के अभाव का रोना रोती रहती है और वही तर्क देती है जो 1835 में औपनिवैशिक सरकार देती थी। सरकारी स्कूल व्यवस्था को वैश्‍वि‍क पूँजी के दबाव में ध्वस्त करने का उपक्रम किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में चलाई जा रही तमाम परियोजनाएं इसी का हिस्सा हैं जिनको 1990 के जोमतियन सम्मेलन से गति प्राप्त हुई है। इससे पूर्व भारत की शिक्षानीतियों में किसी न किसी रूप में यह कोशिश होती थी कि वह देश के संविधान के अनुरूप काम करे। संविधान में शिक्षा और सामाजिक विकास के जो मूल उद्देश्य हैं उनको पूरा करे। पर उत्तर-जोमितियन सम्मेलन के बाद संविधान के आधार की जगह वैश्‍वीकरण की बाजार-आधारित नीतियों ने ले ली तथा भारत सरकार का स्थान अंतराष्ट्रीय मुद्रकोष और विश्‍वबैंक ने। एक परिवर्तन और हुआ- इससे पहले शिक्षा नीतियों या कार्यक्रम की रूपरेखा में संसद से पूछे बगैर कोई भी परिवर्तन नहीं किया जाता था। लेकिन इसके बाद उसे पूछे बिना और बिना चर्चा के अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगे। यह इसलिए हुआ कि हम पहले से खर्च किए जा रहे 100 पैसे मे 4 पैसे और जोड़ने में समर्थ नहीं हो पाए। एक नई प्रवृत्ति और उभरी अब अंतराष्ट्रीय वित्त ऐंजेंसियाँ सीधे राज्य सरकारों के साथ समझौते करने लगी हैं जैसे केंद्र का कोई महत्व ही न हो। विश्‍व बैंक की यह प्रक्रिया राज्य की भूमिका को समाप्त करने की उसकी स्थापित नीति के अनुरूप है- राज्य की भूमिका को कमजोर करके ही सीधे बाजार पर कब्जा किया जा सकता है। उक्त सम्मेलन में तीसरी दुनिया के अनेक देशों के साथ-साथ भारत ने भी दस्तावेजों पर हस्‍ताक्षर किए जिनमें बच्चों को शिक्षा देने के लिए ‘सबके लिए शिक्षा’ कार्यक्रम के तहत अंतर्राष्ट्रीय मदद लेने की स्वीकारोक्ति की गई थी। बतौर नीति यह पहली बार हुआ। यह सब शिक्षा के निजीकरण के उद्देश्य से किया गया। इस प्रकार राज्य एक तरफ अपने संवैधानिक दायित्वों से मुँह मोड़ता जा रहा है और साथ ही साथ एक छोटे उर्ध्वगामी वर्ग के लाभ के लिए स्कूली शिक्षा के निजीकरण और व्यावसायीकरण को भी प्रश्रय दे रहा है।

education

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि न तो परियोजनाओं से और न ही पी.पी.पी. मोड से शिक्षा का भला हो सकता है इसके लिए तो एक स्थाई और मजबूत सार्वजनिक ढाँचा खड़ा करने की जरूरत है। अन्यथा सबको शिक्षा और समान शिक्षा केवल स्वप्न मात्र बनकर रह जाएंगे। कितने अफसोस की बात है कि समान शिक्षा के लिए आजादी से अब तक संसद से लेकर शिक्षा संबंधी विभिन्न दस्तावेजों में अनेकानेक बार संकल्प व्यक्त किया जा चुका है लेकिन धरातल में कहीं समान शिक्षा नहीं दिखाई देती है। वर्ष 1966 में कोठारी शिक्षा आयोग ने पड़ोसी स्कूल की अवधारण पर आधारित समान स्कूल प्रणाली की अनुशंसा करते हुए कहा था कि इसके बगैर एक समतामूलक व समरस समाज का निर्माण नहीं हो सकता है। यदि ऐसा न हो सका तो विषमता और आपसी दूरियाँ बढ़ती जाएंगी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि- स्कूलों और कालेजों के प्रतिमानों में भेद शैक्षिक असमानता के अत्यंत दुःसाध्य रूप उत्पन्न करते हैं। उसका मानना था कि…. निजी उद्यम के कुछ रूपों ने शिक्षा पर सकारात्मक के बजाए नकारात्मक योगदान ही किया है। आयोग की स्पष्ट मान्यता थी कि..आधुनिक समाज के लिए बढ़ती शिक्षा की जरूरतों को केवल राज्य ही पूरा कर सकता है और निजी उद्यम पर अतिरिक्त निर्भरता दिखाना बहुत बड़ी गड़बड़ी होगी। 1986 की शिक्षा नीति में कहा गया कि कोठारी शिक्षा आयोग द्वारा अनुशंसित पड़ोसी स्कूल की अवधारणा पर आधारित समान स्कूल प्रणाली की ओर बढ़ने के लिए कारगर कदम उठाए जाएंगे। पर इसी अधिनियम में अनौपचारिक स्कूलों की व्यवस्था कर इस अवधारणा की धज्जी उड़ाई गई। इसी तरह शिक्षा अधिनियम 2009 में ‘साम्यपूर्ण शिक्षा’ शब्द को बड़ी कोशिशों के बाद स्वीकार तो किया गया लेकिन इस दिशा में कोई कारगर कदम उठाने के बजाय अधिनियम में ही चार तरह के विद्यालयों को स्वीकृति प्रदान की गई-1-सरकारी विद्यालय  2-सरकार से सहायता प्राप्त निजी विद्यालय 3-गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूल 4-विशेष श्रेणी के सरकारी विद्यालय जैसे- केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूल । इनके स्तर में काफी भिन्नता है। इनमें भी प्रत्येक स्तर के विद्यालयों में भी आंतरिक स्तर पर भी अंतर दिखाई देता है- नवोदय विद्यालय केंद्रीय विद्यालयों का मुकाबला नहीं कर पाते हैं, राज्यों द्वारा संचालित ग्रामीण विद्यालय गुणवत्ता में शहरी स्कूलों से काफी नीचे हैं। साथ ही शिक्षा गारंटी केंद्रों जैसी व्यवस्था भी है जो गुणवत्ता में अन्य सरकारी स्कूलों से काफी नीचे है। यही हाल निजी स्कूलों का भी है। पब्लिक स्कूलों की भी अनेक परतें हैं। एक ओर इंग्लैंड या अमेरिका के पब्लिक स्कूलों से होड़ लेते स्कूलों हैं तो दूसरी ओर शिक्षा की दरिद्र दुकानें जिनके पास बच्चों के बैठने तक के लिए उचित हवादार कमरे भी नहीं हैं, जहाँ हाईस्कूल-इंटर पास अध्‍यापक बिना प्रशिक्षण के शिक्षण कार्य कर रहे हैं।  शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी इस असमानता को और अधिक बढ़ा रहा है। इससे एक और स्तर बन रहा है। साथ ही सूचना विस्फोट और कंप्यूटर-तकनीक ने भी शैक्षिक क्षेत्र के दो फाड़ कर दिए हैं। इसे यूँ कह सकते हैं कि एक ओर तो कंप्यूटर से काम ले सकने वाले यानी कंप्यूटर साक्षर लोग हैं जो ज्ञान और सूचना की वैश्‍वि‍क संचरण-प्रक्रिया से जुड़े हैं, दूसरी ओर इस संचरण से असंबद्ध अथवा इस संप्रेषण प्रक्रिया से बाहर रह गए लोग हैं जो कि अपनी तादाद में बहुसंख्यक हैं। ऐसे में कैसे समानता स्थापित हो सकती है? कैसे संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक विकास और सभी को विकास के समान अवसर(अनुच्छेद-15) देने का दायित्व सरकारें पूरा कर सकती हैं?

इसके लिए जरूरी है कि सरकारी शिक्षा को मजबूत किया जाए। विश्‍व के विकसित देश जो निजीकरण के बड़े पैरोकार हैं वहाँ अभी भी शिक्षा सार्वजनिक क्षेत्र में है। फिनलैंड जैसे देशों से हमें सीखना चाहिए। फिनलैंड उन देशों में से है जिसकी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता विश्‍व में सबसे अव्वल है। इसका कारण शिक्षा में समानता, प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग पर जोर तथा शिक्षा में खर्च की पूरी जिम्मेदारी सरकार द्वारा लेना है। वहाँ पर कोई भी निजी स्कूल नहीं है। किसी भी स्कूल को फीस लेने की इजाजत नहीं है। हर स्कूल में निःशुल्क भोजन, इलाज तथा मनोवैज्ञानिक परामर्श और मार्गदर्शन दिया जाता है।

सबको शिक्षा और समानतामूलक शिक्षा का मसला गुणवत्ता से भी जुड़ा हुआ है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दी जाती है तो ऐसी शिक्षा का दिया जाना किसी मतलब का नहीं है। शिक्षक-छात्र का जो मौजूदा अनुपात(1:30) तय किया गया है उससे कितनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त की जा सकती है यह समझा जा सकता है। एक शिक्षक द्वारा एक समय में एक से अधिक कक्षाओं और स्तरों के बच्चों को पढ़ाने से बच्चों को शिक्षा नहीं सरकारी प्रमाणपत्र ही दिया जा सकता है। सरकारी स्कूलों की इसी कमजोरी के चलते आज हर अभिवावक अपनी हैसियत के अनुकूल अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाह रहा है। इसके लिए कहीं न कहीं सरकार की नीतियाँ जिम्मेदार नहीं हैं? आज एक बड़ा वर्ग अभाव वाली शिक्षा प्राप्त करने के लिए विवश क्यों है? क्या सरकार को इस अभाव को दूर नहीं करना चाहिए? शिक्षाविदों का मानना है कि शिक्षा मानव को बौद्धिक और भावनात्मक रूप से इतना मजबूत और दृष्टिवान बनाती है कि वह स्वयं ही आगे बढ़ने का रास्ता, ज्ञान के सृजन का रास्ता और उसके सहारे अपने और अपने समाज के विकास का रास्ता ढूँढने योग्य हो जाता है। क्या हमारी शिक्षा ऐसा कर पा रही है? इस दिशा में गम्भीरता पूर्वक विचार कर ईमानदारी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

बच्चे और होम वर्क : महेश पुनेठा

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बच्‍चों को दि‍ए जाने वाले होम वर्क पर महेश पुनेठा की कवि‍ताएं-

1

क्या-क्या नहीं बुन रहे होते हैं बच्चे
छुट्टियों को लेकर
पढ़ेंगे ढेर सारी
नई-नई कहानियाँ
चुटकुले/पहेलियाँ
बनाऐंगे बहुत सारे चित्र
इकट्ठा करेंगे
तरह-तरह की चीजें
खेलेंगे खेल ही खेल
अपने साथियों के साथ
जाएँगे दादा-दादी के पास गाँव
सुनेंगे पुराने किस्से-कहानियाँ
घूमेंगे खेतों-खलिहानों में
जंगल और दुकानों में
देखेंगे तरह-तरह के पेड़
तरह-तरह की पत्तियाँ
तरह-तरह के फूल
तरह-तरह की चिड़ियाँ
वाह! कितना आनंद आएगा पर
खेल रहे होते हैं जब वे
अपने दोस्तों के साथ
या घूम रहे होते हैं
दादा जी के साथ
या पढ़ रहे होते हैं
मनपसंद कहानियाँ/कविताएं
पूछ लेती है मम्मी-
बेटा!पूरा हो गया क्या गृह कार्य
या फिर देख रहे होते हैं जब
अपना कोई पसंदीदा सीरियल
घन-घना उठती है फोन की घंटी
पूछते हैं पापा-
बेटा!कैसे हो?
होम वर्क कर रहे हो ना !
सिहर उठते हैं बच्चे
फिर लग जाते हैं
होम वर्क पूरा करने में
हो जाता है जब एक विषय का काम पूरा पूछो मत,
कितना राहत महसूस करते हैं बच्चे
जैसे स्कूल में आए
अधिकारी के लौटने पर गुरुजी
पर जल्दी ही याद आती है उन्हें

अभी तो बचा है ढेर सारा काम
अन्य विषयों का फिर से लग जाते हैं

होम वर्क पूरा करने में अनिच्छा से
बीत जाती हैं उनकी छुट्टियाँ
यूँ ही काम के बोझ से दबे-दबे
स्कूली दिनों की तरह
और फिर एक दिन
बीत जाता है बचपन यूँ ही ।

2

ऐसा नहीं कि‍ बच्चे होते हों कामचोर
या उन्हें न लगता हो काम करना अच्छा
सबसे अधिक क्रियाशील होते हैं बच्चे
पर कुछ काम जैसा काम हो ना

जिसमें कुछ जोड़ने को हो कुछ तोड़ने को
कुछ नया करने को हो
वही अभ्यास कार्य नहीं
जिसे कर चुके हों वे बार-बार स्कूल में
वही रटना ही रटना
ऊब चुके हैं वे जिससे
कुछ ऐसा काम
जिसमें कुछ मस्ती हो कुछ चुनौती हो
कुछ ढूँढ़ना हो, कुछ बूझना हो
कुछ जाना, कुछ अनजाना हो
कुछ अंकों का,  कुछ शब्दों का खेल हो
कुछ रंगों का, कुछ रेखाओं का मेल हो
जिसमें कुछ रचना हो
कुछ कल्पना हो
कुछ अपना हो, कुछ सपना हो
सबसे बढ़कर
बचपन सा चुलबलापन हो।

आपराधिक प्रवृत्तियाँ गलत परवरिश का परिणाम: महेश पुनेठा

shekshik dakhal

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों की साझी पत्रिका ‘शैक्षिक दखल‘ (जून 2013) का सम्पादकीय-

समाज में बढ़ती जा रही आपराधिक प्रवृत्तियों-छल-छद्म, क्रूरता, बेईमानी, चोरी, हत्या, बलात्कार आदि पर सभी अपनी चिंता व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। अब तो यह हमारी रोजमर्रा की बातचीत में शामिल हो गया है। इस बात पर बल दिया जाता है कि कठोर से कठोर कानून बनाकर ही इन पर अंकुश लगाया जा सकता है। कानून का भय ही इनको रोक सकता है। पर अनुभव बताता है कि दुनिया में मृत्युदंड जैसे कानून भी आपराधिक गतिविधियों को रोक पाने में असमर्थ सिद्ध हुए हैं। भय से किसी व्यक्ति को एक अच्छा इंसान नहीं बनाया जा सकता है। यह दूसरी बात है कि उसे कुछ देर के लिए रोक भले ही लें। अवसर मिलते ही वह अपराध कर डालेगा। जैसे ही कानून का तोड़ मिलेगा उसका भय जाता रहेगा। हिटलर जैसी प्रवृत्ति रखने वाले लोगों को क्या कोई काननू अपराध करने से रोक सकता है- कोई भी कानून अपराधों को तो कम कर सकता है पर आपराधिक मानसिकता को समाप्त नहीं कर सकता।

दरअसल किसी भी समस्या को दूर करने के लिए उसके कारणों को जानना जरूरी होता है। हमें आपराधिक मानसिकता के कारणों को भी जानना होगा। इनकी जड़ कहाँ है, हम इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि आपराधिक प्रवृत्तियों वाले लोग मानसिक रूप से बीमार लोग हैं। इनकी बीमारी के कारण कहीं-न-कहीं उनके बचपन में छुपे होते हैं जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ बाहर प्रकट होने लगते हैं।

बच्चा बड़ा होकर कैसा नागरिक बनेगा, इस पर दो बातों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है- पहला, बच्चे का परिवेश और दूसरा, उसके साथ बड़ों द्वारा किया जाने वाला व्यवहार। परिवेश को लेकर सभी एकमत हैं कि बच्चा अपने आसपास जो देखता है या जिस तरह के परिवेश में रहता है उसका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उसके भीतर कम या ज्यादा जितनी भी हों वही प्रवृत्तियाँ या गुण जन्म लेते हैं जो उसके आसपास रहने वाले लोगों में मौजूद होती हैं। पर बच्चे के साथ बड़ों के द्वारा किए जाने वाले व्यवहार का प्रभाव उससे अधिक गहरा और दीर्घकालीन होता है। उसके निशान बच्चे के व्यक्तित्व पर स्थायी होते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चा जन्म से अच्छा या बुरा पैदा नहीं होता है। अच्छा-बुरा वह इस दुनिया में आकर बनता है। उसमें दोनों प्रवृत्तियाँ होती हैं। घृणा और दमन से अपराध पैदा होता है तथा प्रेम और स्वतंत्रता से रचनात्मकता। बच्चों की पिटाई-फटकार और उनकी इच्छाओं का दमन उन्हें क्रूर बना देता है। उनके भीतर बदले की भावना पैदा कर देता है। बच्चा कमजोर होने के कारण भले तुरंत बदला न ले सके पर उसके अचेतन में यह भाव बैठ जाता है। जब भी मौका मिलता है वह बाहर फूट पड़ता है। माता-पिता या शि‍क्षक का बुरा व्यवहार बच्चे को बहुत नुकसान पहुँचाता है। उनकी फब्तियाँ बच्चे के संवेदनशील मन पर गहरी चोटें करती हैं। तिरस्कार व ताने बच्चे को क्रूर और अपराधिक और विकृत मानसिकता वाला बनाते हैं। जब हम बच्चे की पिटाई करते हैं या उस पर फब्तियाँ कसते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि बच्चे की भी अपनी गरिमा होती है। हम यह सोचते हैं कि हम बच्चे को पीटकर या फटकार लगाकर उसकी गलत आदतों को ठीक कर रहे हैं। उसका भला कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि हम उसके भीतर हीनता बोध पैदा कर देते हैं। बच्चे के प्रति हमारा यह व्यवहार दूसरों की नजर में तो बच्चे का मान-सम्मान तो घटा ही देते हैं, खुद अपनी नजर में भी बच्चा गिर जाता है। उसको लगने लगता है कि शायद मैं हूँ ही ऐसा जैसा मेरे बड़े मेरे बारे में कह रहे हैं। वह खुद से घृणा करने लगता है। खुद से घृणा करने वाला भला दूसरों से प्रेम कैसे कर सकता है? बच्चे पर ताने मारना उसे मानसिक आघात पहुँचाता है। उसके भीतर आपराधिक प्रवृत्तियाँ पैदा करने का कारण बनता है। गलत संगत या परिवेश पाकर इनमें तेजी से वृद्धि होने लगती है। यह धारणा गलत है कि आपराधिक प्रवृत्ति जन्मजात होती है। यह औपनिवेशि‍क धारणा है जिसके तहत कुछ जातियों को हमेशा के लिए आपराधिक जाति घोषि‍त कर दिया गया। प्रेम, प्रशंसा और आजादी से वंचित बच्चे आपराधिक प्रवृत्तियों के शि‍कार हो जाते हैं। इसीलिए प्रसिद्ध शि‍क्षाविद जे. कृष्‍णमूर्ति कहते हैं, ‘‘हमारे स्कूलों में किसी तरह के बल-प्रयोग जोर-जबरदस्ती धमकी और क्रोध को समग्रतः और पूर्णतः दूर रखा जाना चाहिए क्योंकि ये सभी चीजें हृदय और मन को कठोर बना देती हैं। क्रूरता के साथ स्नेह का सहअस्तित्व नहीं हो सकता है।’’

दरअसल जब हम किसी भी कारण से बच्चे के साथ डाँट-डपट या उसकी पिटाई करते हैं तो केवल उसके साथ दुव्र्यवहार नहीं कर रहे होते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से एक गलत संदेश भी दे देते हैं कि यदि कोई गलती करता है तो उसके साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए। जबकि यह व्यवहार पूरी तरह अलोकतांत्रिक है। फलस्वरूप बच्चा भी इसी तरह का व्यवहार न केवल दूसरों के साथ करने लगता है बल्कि उसको जस्टीफाई भी करता है। इसलिए बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार बहुत खतरनाक है। जो न केवल बच्चे को नुकसान पहुँचाता है बल्कि एक अलोकतांत्रिक व्यवहार को समाज में स्थापित करता है।

प्रेम और आजादी प्रदान कर हम बच्चे को अपराध करने से रोक कर सकते हैं। बचपन में बच्चे के साथ किया जाने वाला व्यवहार उसके भविष्‍य को तय करता है। बच्चे की गलत परिवरिश उसको बरबाद कर सकती है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि यदि बच्चे के ऊपर किसी प्रकार का भय या नियंत्रण नहीं होगा तो बच्चा बिगड़ जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि भय बच्चे को बिगाड़ देता है। उसके भीतर कुंठा, दब्बूपन, नैराष्य और विकृतियाँ पैदा कर देता है। बच्चों को अनुशासित करने का यह तरीका जहाँ बड़ों के लिए जितना आसान है वहीं बच्चे के भविष्‍य के लिए उतना ही खतरनाक । हम अपने काम को सरल करने के लिए भय का सहारा लेते हैं और भूल जाते हैं कि इससे बच्चे और अंततः समाज को कितना नुकसान पहुँचा रहे हैं। अति अनुशासन मानवता के भविष्‍य के लिए घातक है । बच्चा मनोरोगी हो जाता है। अकेलापन और उपेक्षा भी बच्चों में तनाव, कुंठा और संवादहीनता पैदा कर उन्हें आपराधिकता की ओर धकेलती है। अकेलापन बच्चों के अंदर गुस्सा पैदा करता है और उन्हें क्रूर बनाता है। बच्चे को दुनिया शुष्‍क और फीकी प्रतीत होती है। उनका स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होने लगता है। ऐसे बच्चों में नशा करने की आदत और यौन विकृतियों की संभावना बढ़ जाती है। या फिर वे आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने लगते हैं। यौन विकृतियाँ बच्चों को यौन अपराधों के लिए भी प्रेरित करती हैं। पहली नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट बताती है कि नाबालिग किशोरों द्वारा अंजाम दी जाने वाली बलात्कार की घटनाओं में 188 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके पीछे कहीं ना कहीं उक्त कारण ही जिम्मेदार हैं।

बच्चों की आपस में तुलना करना भी उन्हें क्रूर बना देता है। जब हम किसी एक बच्चे की तुलना दूसरे से करते हैं तो ऐसा करते हुए बच्चे के भीतर हम दो तरह की ग्रंथियाँ पैदा कर देते हैं- पहला, उसके भीतर हीनता का भाव और दूसरा, दूसरे बच्चे के प्रति ईर्ष्‍या का भाव। संतुलित व्यक्तित्व के लिए ये दोनों भाव ही घातक हैं।

यदि सुंदर अपराधमुक्त समाज बनाना है तो हमें प्रत्येक बच्चे को सुंदर और गरिमामयी बचपन देना होगा। उसे घृणा, सजा और दमन से बचाना होगा। उसे उपेक्षा और एकाकीपन से बचाना होगा। बड़ों को अपने व्यवहार को संतुलित बनाना होगा। अपने छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए मानवीय मूल्यों की उपेक्षा नहीं करनी होगी।

कुछ लोग यह मानते हैं कि नैतिक शि‍क्षा या उपदेश देकर बच्चे को आपराधिक प्रवृत्तियों से बचाया जा सकता है। पर ऐसा नहीं है। शायद ही कोई परिवार या स्कूल ऐसा होता होगा जहाँ नैतिक प्रवचन बच्चों को न दिए जाते हों। हमारे समाज में हर बड़ा बच्चों को उपदेश देने में कहाँ पीछे रहता है। पर कितना असर है उसका, दिखाई दे रहा है। दरअसल हम यह भूल जाते हैं कि- जहाँ शब्द नहीं पहुँचते वहाँ कर्म पहुँचता है। बच्चा शब्दों को नहीं, कर्म को देखता है। अपने माता-पिता-शि‍क्षक और आसपास के वातावरण को देख बच्चा स्वयं मूल्यों को आत्मसात करता है। बच्चे को दिए जाने वाले उपदेशों की अपेक्षा उसके साथ किए जाने वाला व्यवहार और उसका परिवेश उसके व्यक्तित्व निर्माण में अधिक कारगर भूमिका का निर्वहन करता है। इसमें परिवार की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह माना जाता है कि बच्चा प्रारंभिक वर्षों में सबसे अधिक सीखता है। जैसा कि अपने एक निबंध ‘शि‍क्षा का नया आदर्श’ में प्रेमचंद भी लिखते हैं, ‘‘शि‍शु के पहले पाँच-छः साल मनुष्‍य को जैसा बना देते हैं, वैसा ही वह बन जाता है।….इसी उम्र में बच्चे हमारे अज्ञान के कारण झूठ बोलना, झूठे बहाने करना और चोरी करना सीखते हैं। इसी उम्र में आलस्य की और आरोग्य के विरुद्ध आचरण करने की आदत पड़ती है। इसी उम्र में वे जिद्दी, स्वार्थी और कायर होते हैं।’’

बच्चों को अच्छी परवरिश वे ही माता-पिता दे सकते हैं जो कुंठाओं और तनावों से मुक्त हों। अब यहाँ एक यक्ष प्रश्‍न है कि ऐसे माता-पिता जो गरीबी-शोषण-उत्पीड़न में जीवन जी रहे हैं, जिनका जीवन अस्थिर-अनिश्‍चि‍त-असुरक्षित और तमाम भय-आशंकाओं से भरा हो, उनसे कैसे आशा की जा सकती है कि वे अपने बच्चे को स्वस्थ, सुंदर एवं भयमुक्त बचपन दे पाएंगे?

सम्पादकीय सम्पर्क-
दिनेश कर्नाटक
ग्राम व पोस्ट रानीबाग
नैनीताल, उत्तराखंड
पिन- 263126

Email-dineshkarnatak12@gmail.com, punetha.mahesh@gmail.com

एक प्रतिः  20 रुपये, पांच प्रति: 100 रुपये, दस प्रति: 200 रुपये, आजीवन: 1000 रुपये

‘दीवार पत्रिका’ को एक अभियान बनाए जाने की आवश्यकता है : महेश पुनेठा

school magazine

स्‍कूलों में नि‍कलने वाली पत्रि‍काओं को वि‍शेष महत्‍व है। ये पत्रि‍काएं बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक होती हैं। पेश से शि‍क्षक और कवि‍-आलोचक महेश पुनेठा अपने ऐसे ही अनुभव को साझा कर रहे हैं-

बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने और उसे प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हमने पिछले कुछ समय से ‘दीवार पत्रिका’ के प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ किया है। यह विद्यालय के विद्यार्थियों के द्वारा किया जाने वाला पाक्षिक आयोजन है। इस पत्रिका को जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है विद्यालय की दीवार में लगाया जाता है। इसमें बच्चों द्वारा तैयार की गई कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, चुटकलों, पहेलियों, समाचार, वर्ग पहेली, सामान्य ज्ञान संबंधी तथ्य, चित्र, कार्टून आदि को एक कागज में सुलेख में लिखकर एक लंबे आदमकद चार्ट में चिपकाया जाता है। इस पत्रिका के संपादन को कार्य पूरी तरह बच्चों द्वारा किया जाता है। बच्चों का एक संपादक मंडल बनाया गया है जो विधावार विषय सामग्री का संकलन और चयन करता है। इस काम को सहज-सरल बनाने के लिए बच्चों को पढ़ने के लिए देश भर से निकलने वाली विभिन्न बाल पत्रिकाएं दी जाती हैं ताकि वे नए अनुभव ग्रहण कर उन्हें अपने तरीके से अपनी दीवार पत्रिका को तैयार करने में उपयोग कर सकें। बच्चे बहुत रुचि से पत्रिका पढ़ते हैं क्योकि उनका पढ़ना सोद्देश्य हो जाता है। उन पत्रिकाओं से भी अपनी दीवार पत्रिका के लिए उपयोगी सामग्री लेते हैं। पत्रिका में एक दूसरे को सहयोग करते हैं। अपने साथियों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। विद्यालय के बच्चों को दीवार पत्रिका की प्रतीक्षा रहती है। धीरे-धीरे यह स्थिति आने लगी है कि इस दीवार पत्रिका में छपने के लिए बच्चों में उत्सुकता बढ़ने लगी है। बच्चे पत्रिका में प्रकाशित सामग्री को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं और पत्रकारिता की बारीकियों को जानने-समझने लगे हैं।

इस दीवार पत्रिका को प्रारम्भ करते हुए कुछ कठिनाइयाँ अवश्य आयीं। बार-बार कहने पर भी बच्चों ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई। बच्चों के लिए यह एकदम नया विचार था। बच्चों को  स्वयं रचना तैयार करना बहुत कठिन काम लगता था। परंतु उन्हें निरंतर प्रोत्साहित किया जाता रहा। उनसे बातचीत जारी रखी गई। उन्हें पढ़ने के लिए बाल साहित्य दिया गया। उसके महत्व से उन्हें अवगत कराया गया। एक-दो अंक तैयार कर उनके सामने प्रस्तुत किए गए। हिंदी शिक्षण के दौरान ही उन्हें अपने विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया गया। छोटी-छोटी कविताएं, कहानियाँ, निबंध, लेख, यात्रा वृतांत, जीवन-प्रसंग आदि तैयार करवाए गए। समय-समय पर विद्यालय में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों और आसपास की घटनाओं की रिपोर्टिंग करवाई गई। उनमें से बेहतर रचनाओं को दीवार पत्रिका में लगाया जाने लगा। इसके लिए मासिक परीक्षाओं तक का भी उपयोग किया गया। हिंदी की परीक्षा में बच्चों को ऐसे विषयों पर लिखने के लिए कहा गया जिसमें बच्चे अपने अनुभव से बहुत कुछ लिख सकते हैं। जैसे- एक बार कक्षा नौ के बच्चों से कहा गया कि अपने जीवन के किसी ऐसे प्रसंग को लिखें ‘जब उन्हें बहुत खुशी हुई या रोना आया हो’। बच्चों ने बेहद रोचक प्रसंग लिखे। इन प्रसंगों से न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता का ही पता चला बल्कि बच्चे के भीतर झाँकने का अवसर भी मिला। यह भी जानने को मिला कि बच्चे अपने आसपास को कैसे देखते हैं ? अपने बड़ों के प्रति क्या सोचते हैं? उन्हें जीवन में कौन-सी घटना प्रसन्नता देती है और कौनसी दुःख पहुँचाती है? आदि….आदि। इसमें एक सबसे रोचक तथ्य जो सामने आया कि जो बच्चे आमतौर से कक्षा में दो-चार पंक्तियाँ भी नहीं लिख पाते थे उन्होंने दो-दो, तीन-तीन पृष्ठों में अपने संस्मरण लिख डाले। बच्चों द्वारा लिखे गए इन संस्मरणों को भी दीवार पत्रिका में स्थान दिया गया। इस घटना से हमारा भी विश्वास बढ़ा कि यदि बच्चों को अवसर प्रदान किए जाएं तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। आवश्यकता है उनकी अभिव्यक्ति को सम्मान और अवसर प्रदान करने की।

इसकी शुरुआत में एक बात और हुई। दीवार पत्रिका तो बनने लगी परंतु उसमें गिने-चुने दो-चार बच्चों की ही भागीदारी होती थी। यह सामूहिक प्रयास न होकर व्यक्तिगत जैसा ही अधिक बना रहा। कुछ बच्चे इसको समय की बर्बादी तथा फालतू का काम समझते थे। इस पर विचार कर निर्णय लिया गया कि इसके लिए बच्चों का एक समूह तैयार किया जाए। इस उद्देश्य से 6 से 12 तक की प्रत्येक कक्षा से ऐसे बच्चों का चयन किया गया जो अपनी कक्षा में सबसे बेहतर माने जाते हैं। जो पढ़ने-लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। उसमें कुछ ऐसे बच्चों को भी चुना गया जिनका हस्तलेख बहुत सुंदर है या चित्रकला में अच्छा दखल है। पूरे विद्यालय के लगभग 30-35 बच्चों का ऐसा एक समूह गठित किया गया जिसे ‘बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ’ नाम दिया गया। इनकी बैठकें आयोजित की गईं जिसका संचालन बच्चों द्वारा ही किया गया। इस समूह के बच्चों ने आपस में बातचीत कर आम सहमति और रुचि के अनुकूल दीवार पत्रिका के लिए दस सदस्यीय संपादक मंडल का चयन किया। आपस में भूमिकाओं का वितरण किया गया। अब सामगी संकलन-चयन से लेकर चार्ट में चिपका कर उसे पत्रिका का स्वरूप प्रदान करने की सारी जिम्मेदारी यही संपादक मंडल करता है। बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ की भूमिका केवल दीवार पत्रिका तैयार करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस समूह के बच्चे जब कभी भी उन्हें अवकाश मिलता है आपस में बैठकर अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अपनी समस्याओं को एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं । भविष्य के लिए रणनीति बनाते हैं। आपस में पढ़ने-लिखने के कार्यो में एक-दूसरे की मदद करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अध्यापकों से मिलते हैं। इनकी योजना में है कि भविष्य में विद्यालय में साहित्यिक व बौद्धिक क्षमताओं के विकास के लिए समय-समय पर विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जाए, जैसे- भाषण, निबंध, वाद-विवाद, कविता, कहानी, चित्रकला, सामान्य-ज्ञान प्रतियोगिता, बाल रचनात्मक कार्यशाला, गोष्ठी आदि। इसके प्रकोष्ठ का लक्ष्य है कि विद्यालय तथा अपने गाँव-पड़ोस का वातावरण शैक्षिक तथा रचनात्मक बनाया जाए। इस तरह से यह प्रकोष्ठ विद्यालय में एक संदर्भ समूह के रूप में काम करता है।

जैसा कि बच्चों में रचनात्मक लेखक के विकास के लिए विभिन्न विद्यालयों में विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है जो एक अच्छा प्रयास है पर हमारा मानना है कि उसकी कुछ सीमाएं हैं। अधिक खर्चीली होने के कारण उसका वर्ष में एक से अधिक अंक निकालना संभव नहीं है। जहाँ छात्र संख्या कम है वहाँ एक बार निकाल पाना भी संभव नहीं हो पाता। इसमें संपादन से लेकर प्रकाशन में बच्चों की अपेक्षा अध्यापकों की सक्रियता और भागीदारी ही अधिक रहती है जिससे बच्चों को बहुत अधिक कुछ कर पाने तथा सीखने का अवसर नहीं मिल पाता है। लिखने का अवसर भी वर्ष में एक ही बार मिल पाता है। अतः लेखन कौशल के विकास एवं बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करने की दृष्टि से इसे बहुत उपयोगी नहीं कहा जा सकता है। विद्यालय पत्रिका के साथ-साथ निरंतर दीवार पत्रिका भी निकाली जाए तो इससे दोनों का महत्व बढ़ जाएगा। विद्यालय पत्रिका के लिए स्तरीय एवं मौलिक सामग्री भी मिल पाएगी। वास्तव में विद्यालय पत्रिका निकालने का उद्देश्य भी पूरा हो पाएगा।

यहाँ पर मैं यह भी बताना चाहूँगा कि दीवार पत्रिका का यह अभिनव प्रयोग केवल राजकीय इंटर कॉलेज, देवलथल में ही नहीं पिथौरागढ़ जनपद के एक दूरस्थ विद्यालय क.पू.मा.वि., नाचनी में रचनात्मक शिक्षक मंडल के राज्य सचिव राजीव जोशी द्वारा भी किया जा रहा है। उन्होंने इस प्रयोग को प्रारंभ करने से पूर्व एक पाँच दिवसीय रचनात्मक बाल कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें बच्चों को दीवार पत्रिका को तैयार करने के बारे में आवश्यक जानकारी देने के साथ ही बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ाने के उद्देश्य से रोचक गतिविधियाँ करवाई गईं। यह प्रसन्नता की बात है कि वहाँ भी यह प्रयोग सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है । बच्चे उत्तरोत्तर बेहतर करते जा रहे हैं।

हमारा मानना है कि इस प्रयोग को हर विद्यालय में शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक है बल्कि विद्यालयों में अनुशासन की समस्या को सुलझाने में भी एक हद तक मददगार है। रचनात्मक शिक्षक मंडल के सदस्यों को इसे एक अभियान की तरह लेना चाहिए। इससे प्राप्त अनुभवों को रचनात्मक शिक्षक मंडल के आगामी सम्मेलनों में आपस में बाँटा जाना चाहिए ताकि इसको अधिक उपयोगी और प्रभावकारी बनाया जा सके।

पाठ्यपुस्तकों के बोझ तले सिसकती रचनात्मकता : महेश चंद्र पुनेठा

रचनात्मकता के विकास के लिये कार्य करने की स्वतंत्रता और अवसर की उपलब्धता तथा चुनौती का होना आवश्यक है। अनेक अध्ययनों में पाया गया है कि जब-जब बच्चों को स्वतंत्रता मिली है, उन्हें करने के अवसर प्रदान किये गये तथा उनके सामने चुनौती प्रस्तुत की गई तब-तब उनमें रचनात्मकता का विकास अधिक हुआ। समरहिल हो चाहे नीलबाग या सुखोक्लीन्स्की के खुशियों का स्कूल इसके बड़े उदाहरण हैं। दबाब में रचनात्मकता सम्‍भव नहीं है। दबाब भय की परिणति होता है और भय की स्थिति में मनुष्‍य का मस्तिष्‍क स्वाभाविक ढंग से काम नहीं कर पाता है। मन विकृत हो जाता है। किसी नवाचार की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता है। भयग्रस्त मन कभी भी सृजनशील नहीं हो सकता है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि जब मनुष्‍य तनाव में होता है तब मस्तिष्‍क तक जाने वाला रक्त का संचार मेरूदंड के ऊपरी छोर तक ही प्रोपर रहता है इस कारण मस्तिष्‍क न ठीक तरीके से सोच पाता है और न शरीर के अन्य भागों तक संकेत भेज पाता है। रचनात्मकता के लिये चिंतन का होना जरूरी है और चिंतन दबाब मुक्त परिवेश में ही गति प्राप्त करता है। यदि बच्चा तनाव में है और किसी बोझ से दबा है तो वह नया सोच ही नहीं सकता है और जब सोच ही नहीं सकता है तब रचने की बात तो दूर की कौड़ी है। यह जितना बच्चों के संदर्भ में सही है उतना ही बड़ों के भी। आज हमारी शिक्षा व्यवस्था में स्वतंत्रता, अवसर और चुनौती का घोर अभाव देखा जाता है। बात बच्चे की हो या फिर शिक्षक की वे तमाम तरह के प्रतिबंधों और बोझ से दबे हुए हैं। पाठ्यपुस्तक उनमें से एक है।

पाठ्यपुस्तक का दबाब इतना जबरदस्त है कि न बच्चे और न ही शिक्षक उससे बाहर निकल पाते हैं। पाठ्यपुस्तक में निहित विषयवस्तु को पढ़ना और पढ़ाना ही उनके लिये अभीष्‍ट बन चुका है। पाठ्यपुस्तकों का अनुकरण करना ही शिक्षा का अंतिम लक्ष्य बन गया है। मुक्त करने वाली कहलाने वाली शिक्षा बाँधने वाली बन गई है। शिक्षक की कोशिश रहती है कि निर्धारित समय में पाठ्यपुस्तक में संकलित विषयवस्तु को बच्चों तक पहुँचा दे और बच्चों का लक्ष्य रहता है उसे ज्यों का त्यों रट कर परीक्षा में उगल दे। अधिक अंक पाने का इतना जबरदस्त दबाब है कि बच्चे के पास न खाने का समय है और न खेलने का। यह दबाब तब आतंक में बदल जाता है जब शिक्षक निश्चित समयावधि में पाठ्यक्रम पूरा करने के दबाब में बच्चे की रुचि और आनंद का भी ध्यान नहीं रखते। बोझिल शिक्षण विधियों का इस्तेमाल करते हैं। विज्ञान जैसे विषयों में भी प्रयोग नहीं करवाते हैं। बिना प्रयोगशाला में गये प्रयोग-विधि लिखा दी जाती है और बच्चों से याद करने के लिये कह दिया जाता है।

पाठ्यपुस्तक पर अतिनिर्भरता के चलते दोनों के पास पाठ्यपुस्तक से बाहर निकल पाने का न अवसर है और न ही स्वतंत्रता। लगता है कि दोनों पाठ्यपुस्तक रूपी किले से बँधे हुए हैं। रस्सी की लम्‍बाई के अनुपात में उसके चारों ओर ही चक्कर लगाने के लिये मजबूर हैं। कभी कोई उसे तोड़कर कुछ देर के लिये इधर-उधर चक्कर लगाना चाहता भी है तो अंततः परीक्षा का भय उसे फिर उसी किले के पास लौटा ले आता है। बच्चे का मन बहुत करता है कि खुले में विचरण करे। कल्पनाओं की उड़ान भरे। अपनी तरह से दुनिया को देखे-सुने-समझे। कुछ नया करे। पर अध्यापक-अभिभावकों द्वारा उसे हाँक-हूँक कर फिर से पाठ्यपुस्तक रूपी किले से बाँध दिया जाता है। उसे समझाया जाता है कि उसकी सफलता इस किले से बँधे रहने में ही निहित है। जो भी करना है इस किले के इर्द-गिर्द ही करना है। खूब उछलो-कूदो पर यहीं। बच्चा सुबह से शाम तक उसी के चक्कर लगाने में पिला रहता है। बच्चा स्कूल से घर तक पाठ्यपुस्तकों को साधने में लगा रहता है। जितनी पाठ्यपुस्तकें उतनी ट्यूशन कक्षाएं। उससे बाहर निकलने की न उसको फुर्सत है और न ही छूट। हद तो तब हो जाती है कि जब पाठ्पुस्तकों में कहीं-कहीं रचनात्मकता के लिये दिये गये अवसरों को भी शिक्षकों द्वारा परीक्षा की दृष्टि से अनुपयोगी करार देकर समाप्त कर दिया जाता है। ऐसे में नीलबाग स्कूल के संचालक डेविड ऑसबरा का यह कथन पूरी तरह सत्य प्रतीत होता है- ‘बच्चे जब अपनी रचनात्मक ऊर्जा के चरम पर होते हैं, बारह-तेरह साल की उम्र में परीक्षा के दबाब में उन्हें रचनात्मकता के उन रास्तों को बंद करना पड़ता है क्योंकि परीक्षा को बहुत अनिवार्य माना जाता है।’ अध्यापक हों चाहे अभिभावक उनकी चाह रहती है कि बच्चा पाठ्यपुस्तक को रट डाले। पाठ्यपुस्तक से बाहर जाना जैसे बच्चे के कुफ्र हो। उससे बाहर का न तो वह लिख सकता है और न पढ़। वह ऐसा उत्तर नहीं दे सकता है जो पाठ्यपुस्तक से बाहर हो। जो पाठ्यपुस्तक की इस सीमा को नहीं मानता वह बिगड़ा या आवारा घोषित कर दिया जाता है। घोर अनुशासनहीन। ऐसे अनेक चिंतकों, दार्शनिकों, लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के उदाहरण मिल जायेंगे जिन्हें यह उपाधि उनके विद्यार्थी जीवन में मिल चुकी है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे दुनिया बस पाठ्यपुस्तक तक ही सीमित है। कितनी विडम्‍बना है कि पाठ्यपुस्तक से रटी सूचना के अंक होते हैं पर रचनात्मकता के नहीं। एक बच्चा पाठ्यपुस्तक से ग्रहण जानकारी को ज्यों का त्यों उतार देता है वह अधिक अंक प्राप्त कर लेता है बनिस्पत उस बच्चे के जो अपनी समझ के आधार पर प्रश्‍न का उत्तर देता है। हमारे स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों पर कितनी निर्भरता है यह इस बात से देखा जा सकता है कि यदि सत्र के प्रारम्भ में पाठ्यपुस्तक उपलब्ध नहीं है तो शिक्षण कार्य प्रारम्भ ही नहीं होता है। एक आम तर्क होता है कि जब पाठ्यपुस्तक ही नहीं है तो पढ़ाई कैसे शुरू होगी, यह प्रवृत्ति बच्चे की रचनात्मकता को कुंद करती है। बच्चा ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाता है। यह भ्रम भी पैदा हो जाता है कि पाठ्यपुस्तक में संकलित सूचना ही अंतिम ज्ञान है। एन.सी.एफ.- 2005 भी पाठ्यपुस्तक पर अतिशय जोर देने के दुष्‍प्रभावों की ओर हमारा ध्यान खींचता है-‘अगर अपने विकास की दौड़ में विद्यार्थी अधिक समय यथार्थ विश्‍व के अलावा किताबों की दुनिया में बिताते हैं तो बहुत सम्‍भावना उनके टूट जाने की रहती है। शिक्षा का उद्देश्य नकारात्मक बन जाता है। यह विद्यार्थियों के दिमाग को दो टुकड़ों में बाँट देता है। वह एक ऐसी किताबी दुनिया को याद करने में लगा रहता है जिस पर उसका कोई वश नहीं होता।’

पाठ्यपुस्तकों की यह रूढ़ दुनिया रचनात्मकता की दुश्मन है। पाठ्यपुस्तक की इस जकड़बंदी के चलते न अध्यापक की और न बच्चे की कल्पनाशीलता और सूझबूझ उभर पाती है। पाठ्यपुस्तक पर अतिनिर्भरता कल्पनाशीलता के रास्ते अवरूद्ध कर देती है। जबकि रचनात्मकता के लिए कल्पनाशीलता का होना आवश्यक है। जो जितना अधिक कल्पनाशील होगा उतना अधिक रचनात्मक। इस बात को महसूस करते हुए ही गाँधी सरीखे अनेक शिक्षाविद् पाठ्यपुस्तक मुक्त शिक्षा प्रणाली की बात करते हैं। गाँधी जी ने ‘हरिजन’ के एक लेख में लिखा: ‘पाठ्यपुस्तकों से पढ़ाने वाला शिक्षक अपने छात्रों को मौलिकता नहीं सिखा सकता । वह स्वयं पाठ्यपुस्तकों का गुलाम हो जाता है और मौलिक होने का कोई अवसर नहीं ढूँढ पाता ।’ रही-सही कसर पाठ्यपुस्तकों की भाषा पूरी कर देती है। पाठ्यपुस्तकों की भाषा बच्चों की सृजनशीलता को नुकसान पहुँचा रही है। अंग्रेजी माध्यम के चलते बच्चे की चिंतन-मनन की प्रक्रिया बाधित हुई है। बच्चा पाठ्यवस्तु को रट तो लेता है पर नया कुछ नहीं जोड़ पाता है। एक ऐसी भाषा जो अपनी मातृभाषा से इतर है बच्चे के लिये उसमें चिंतन और कल्पना करना स्वाभाविक नहीं है। इससे बच्चे की कल्पनाशीलता बाधित हो जाती है। नया करने की शुरूआत तो हमेशा चिंतन और कल्पना से ही होती है। चिंतन और कल्पना के बिना भला रचनात्मकता कैसे सम्‍भव है?

चुनौती के अवसरों का अभाव भी रचनात्मकता विकास में एक बड़ी  बाधा है। आज बच्चों के सामने अध्ययन से जुड़ी चुनौतियाँ कम होती जा रही हैं। अध्ययन के दौरान उनको ऐसी चुनौतियों का सामना कम ही करना पड़ता है जिससे उन्हें जूझना पड़ता हो। अधिक चिंतन-मनन की जरूरत पड़ती हो। पाठ्यपुस्तक में आने वाले कठिन स्थलों का समाधान पाने के लिये उनके पास ट्यूशन से लेकर रेफ्रेशर और इंटरनेट जैसे साधन उपलब्ध हैं जहाँ उन्हें सबकुछ तैयार मिल जाता है। गलती कर सीखने के अवसर तो उनके पास रहते ही नहीं। छोटी सी भी कठिनाई आने पर बच्चे स्वयं कोशिश करने के बजाय उक्त माध्यमों की शरण में चले जाते हैं और अपने कठिन प्रश्नों के उत्तर पा लेते हैं। ऐसे में खोजी प्रवृत्ति समाप्त होती जा रही है। जबकि खोज ही है जो बच्चे की सृजनशीलता को बढ़ाती है। गाइड या रेफ्रेशर रचनात्मकता की कातिल तो हैं ही साथ ही दकियानूसी, अलोकतांत्रिक एवं अप्रमाणिक सूचनाओं व तथ्यों को भी बढ़ावा दे रही हैं। बच्चे ‘परिजीवी’ बनते जा रहे हैं।

सृजनशीलता के विकास के लिए अवलोकन-खोज-विश्‍लेषण के अधिकाधिक अवसर जरूरी हैं। बच्चा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जितना अधिक दुनिया को देख-समझ पाता है उसमें उतनी अधिक सृजनशीलता के विकास की सम्‍भावना होती है। दुनिया को जानने-समझने का एक तरीका अध्ययन है पर आज पाठ्यपुस्तकों से दबे बच्चों को उससे बाहर की पुस्तकों को पढ़ने का बिल्कुल भी अवसर नहीं मिल पाता है फलस्वरूप बाहरी दुनिया के बारे में उसकी जानकारी बहुत ही कम होती है। इसलिए बच्चों को अपनी बाहर की दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। उन्हें स्वयं करने के अधिक से अधिक अवसर प्रदान करने होंगे। उनके सामने चुनौती प्रस्तुत करनी होगी। रचनात्मकता के लिए तनाव मुक्त परिवेश का निर्माण करना होगा। घर में भी, स्कूल में भी, पाठ्यपुस्तकों में भी और उनसे बाहर भी। ताकि बच्चा स्वयं नया करने के लिये प्रेरित हो। बड़ों को समझना होगा कि उनकी भूमिका केवल वातावरण सृजन की है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि नया करना मनुष्‍य की मूलप्रवृत्ति है। साथ ही शिक्षकों को भी स्वायत्तता प्रदान करनी होगी। शिक्षण के अतिरिक्त उन्हें किसी तरह के अन्य कार्यों में नहीं लगाना होगा। ताकि वे अपने शिक्षण को रचनात्मक बना सकें। मौजूदा परीक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा। पाठ्यपुस्तकों को बच्चों के रुचि के अनुकूल और रचनात्मक गतिविधियों के अवसर प्रदान करने वाली बनाना होगा।  पाठ्यचर्या-2005 में स्वागत योग्य कदम उठाया गया है जिसमें बच्चे को किताबों और स्कूल की दुनिया से बाहर निकालने की बात कही है। साथ ही शिक्षकों को स्वायत्तता प्रदान करने का समर्थन किया गया है। हम समझते हैं कि इससे स्थिति में कुछ परिवर्तन आयेंगे। पर देखना यह है कि शिक्षा के दस्तावेज में लिखी इस बात को दस्तावेज से बाहर कितना महत्व दिया जाता है। मौजूदा व्यवस्था के कर्त्‍ता-धर्ताओं को सृजनशीलता कितनी पच पाती है।

(‘शैक्षिक दखल’ वर्ष-1, अंक-1 का सम्‍पादकीय)

सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
सहयोग राशि‍ : 20 रुपये(प्रति‍ अंक), 100 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 1000 रुपये(आजीवन)