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मिली आलस की सजा : मनोहर चमोली ‘मनु’

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ये उन दिनों की बात है, जब बिल्ली खूब मेहनत करती थी। खेती किसानी से अपना पेट भरती थी। वहीं विशालकाय चूहे दिन-रात खर्राटें लिया करते थे। एक दिन बिल्ली ने चूहों से कहा, ‘‘पेटूओं, कुछ काम क्यों नहीं करते?’’ चूहों का सरदार बोला, ‘‘हमारे पास काम ही नहीं हैं। तुम ही कोई काम दिला दो।’’

बिल्ली सोचने लगी। कहने लगी, ‘‘तुम तो जानते हो, मेरे खेत जंगल के उस पार हैं। मैं बगीचे की देखभाल करती हूं तो मेरे खेतों की फसलें बरबाद होती हैं। ये अखरोट का बगीचा यहां है। तुम सब मिलकर मेरे बगीचे की रखवाली करो। तुम्हें रोजाना भरपेट भोजन बगीचे में ही भिजवा दूंगी। याद रहे, अखरोट पक जाने पर उन्हें बोरों में रखकर मुझे देने होंगे।’’ चूहों के सरदार ने हामी भर दी। चूहे खुश हो गए। बिल्ली चूहों को बगीचे में ही खाना भिजवाती। वहीं चूहे भरपेट भोजन करते और चादर तानकर सो जाते। वे और भी आलसी हो गए थे।

दिन बीतते गए। पेड़ों पर अखरोट के फूल आए। पत्तियां आईं। अखरोट के फल लगे। पकने लगे। पककर खोल से बाहर आकर नीचे गिरने लगे। बगीचे में चूहों के खर्राटें ही सुनाई दे रहे थे। फिर एक दिन बिल्ली ने संदेशा भिजवाया, ‘‘सर्दियां आने से पहले अखरोट पक जाते हैं। बोरों के ढेर एक कोने में इकट्ठा कर दिए?’’

बंदर जैसे नींद से जागे हों। उछलकर खड़े हो गए। सरदार जम्हाई लेते हुए बोला, ‘‘चिंता न करें। अखरोट अपने खोल से बाहर आ गए हैं। पेड़ों के नीचे अखरोटों का अंबार लगा हुआ होगा। कल से उन्हें बोरों में भर देंगे। फिलहाल चादर ओढ़कर सो जाओ।’’ चूहों ने ऐसा ही किया।

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सुबह हुई। चूहों को देर से उठने की आदत थी। वे सोते ही रह गए। बगीचे में बंदरों का झुण्ड आ गया। गिलहरियां और खरगोश भी आ गए। बंदरों को मनपंसद भोजन जो मिल गया था। दोपहर हो गई। चूहे हड़बड़ाकर उठ बैठे। तभी बिल्ली भी आ पहुंची। बगीचा तहस-नहस हो चुका था। सारा नजारा देखकर बिल्ली आग बबूला हो गई। बिल्ली चिल्लाई, ‘‘आलसियो। तुम्हारा यह विशालकाय शरीर पिद्दीभर का हो जाए। तुम चैन से न रहोगे। दिन-रात खाते-कुतरते रहोगे। यदि ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारे दांत बढ़ते ही चले जाएंगे। दूर हो जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊंगी।’’

ऐसा ही हुआ। पलक झपकते ही विशालकाय चूहे नन्हे से हो गए। सींग के बदले उनकी मूंछें उग आईं। चूहों में अफरा-तफरी मच गई। बेचारे चूहे डर के मारे खरगोशों के बिलों में दुबक गए। कहते हैं, तभी से चूहे बिल में रहने लगे। चूहों को देखते ही बिल्ली उन पर झपट पड़ती है।

 

(नंदन, अक्टूबर 2016 से साभार)

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र

मनोहर चमोली ‘मनु’ की डायरी

Manohar Chamoli 'manu'

1 अगस्‍त 1973 को पलाम, टिहरी गढ़वाल, उत्‍तराखंड में जन्‍मे मनोहर चमोली ‘मनु’ की रचनाएं देश भर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्‍होंने उत्‍तराखंड की विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम से जुड़ी कई पुस्‍तकों के लेखन-संपादन में योगदान दिया है। वह नियमित रूप से डायरी लिखते हैं। इसमें उन्‍होंने शिक्षा और बच्‍चों से जुड़े हुए कई गंभीर सवाल खडे़ किए हैं। उनकी डायरी के कुछ अंश-

3 जुलाई 2010 :  जुलाई का महीना पढ़ाई का महीना माना जाता है। बच्चों पर काम का दबाव बढ़ जाता है। पर बच्चों की सुध किसे है? हर कोई काम-पर-काम देने पर आमादा है। क्या जरूरी है कि बच्चे प्रश्‍न-अभ्यास करके कल ही लाएं। आज जो पाठ पढ़ाया गया है तो आज ही वे हर विषय के पाठों का अभ्यास कैसे कर लें? ये तो कोई बात नहीं। मगर शिक्षक भी क्या करें। अधिकारी या जांच मुआयना वाले भी तो बच्चों की कॉपी ही देखते हैं। काम ठीक-ठाक है तो बढ़िया, काम कॉपी पर नहीं है तो बच्चा भी नकारा है और शिक्षक भी नकारा। मेरी राय में तो पढ़ाया गया पाठ बच्चे के समझ में आ जाना चाहिए। बच्चे ने पाठ से क्या सीखा। बच्चे को अनुभव क्या हुआ। ये महत्वपूर्ण है, न कि बच्चे ने कॉपी पर सारे प्रश्‍नों का हल किया है या नहीं, ये जांचना।

10 जुलाई 2010 :  ये हास्यास्पद है। नई शिक्षण विधियों में और नए तौर-तरीकों में भी अब ये माना जाता है कि आप बच्चे को लेख सुंदर बनाने पर अनावश्यक जोर न दें। हर बच्चे का लेख मोती जैसा आकर्षक और सुंदर हो ही नहीं सकता। चाहे कितना जोर लगा लें। पर ये क्या जरूरी है कि जिसका लेख बहुत सुंदर हो, वह शैक्षिक स्तर पर पर भी बेहद अच्छा होगा। क्या जिसका लेख अच्छा नहीं है, वो पिछड़ा होगा? लेख स्पष्ट पढ़ा जा रहा है, तो ठीक है न। बच्चों की कॉपी पर बार-बार लेख सुधारने की चेतावनी देने से क्या होगा। क्या बच्चा सिर पर पांव रखकर लेख सुधारेगा? कॉपी को लाल-काला करने से क्या होगा? क्या हर शिक्षक का लेख सुंदर है?

 17 जुलाई 2010 :  कक्षा-कक्ष में बैठक व्यवस्था के भी कई मायने हैं। बुनियादी शिक्षा से ही बच्चों को लड़का-लड़की के भेद के साथ बिठाया जाता है। क्या जरूरी है कि हम उन्हें अलग-अलग बिठाएं। छात्र-छात्राओं में बहुत सारी अनर्गल बातें इसलिए भी होती हैं कि उन्हें दूर-दूर बिठाया जाता है। यदि वे मिल-जुल कर बैठते हैं तो क्या भद्दी बातें वे कर पाएंगे। हम क्यों नहीं समझते जिस परिवार में सिर्फ दो ही लड़के हों, या दोनों ही लड़कियां हों या एक लड़का-एक लड़की हों तो बेहतर विकास किसका होगा। जाहिर है, जहां एक लड़का-एक लड़की है। तो फिर हम स्कूल की बैठक व्यवस्था को क्यों नहीं ठीक रखते। प्रार्थना सभा में भी ऐसा ही होता है। आखिर क्यों?

24 जुलाई 2010 :  मैंने कक्षा 9 की बैठक व्यवस्था में मेधावी, कम मेधावी और साधारण छात्रों को मिला-जुला कर बिठाया ताकि समूह में वे आपस में सहयोग से तेजी से सीखें। लेकिन दो दिन बाद वे अपनी इच्छानुसार पहले की स्थिति में बैठ गए। मैंने समझाया कि आखिर कुछ कारण ही रहा होगा कि मैंने ऐसा किया। मुझे अच्छा नहीं लगा कि आप लोगों ने अपनी दोस्ती, पसंद-नापसंद के हिसाब से अपनी सीटें बदल लीं। जबकि कक्षा में हम सब एक-दूसरे के दोस्त हैं, भाई हैं, बहिन हैं। यहां तक कि हम एक-दूसरे के शिक्षक भी हैं। हम एक-दूसरे से सीखते हैं और एक-दूसरे को सीखाते भी हैं।

31 जुलाई 2010 : आज अचानक कुछ पन्ने उलटे। कुछ अंश पढ़कर अच्छा लगा। लेकिन कुछ अंश पढ़कर मुझे यह भी लगा कि मैं आत्ममुग्धता में आकर अपने बारे में ही लिखने लगा हूं। पहले ही दिन तो यह सोचा था कि स्कूल बाल जीवन और बच्चों से जुड़कर जो कुछ अनुभव होंगे, उन्हें ही साझा करूंगा। लेकिन यह क्या? मैं तो अपना ही विवरण लिखने लगा। सोचा कि टाइप करते हटा दूं। फिर सोचा यह तो अपनी कमजोरी छिपाना भी तो होगा? अब आगे से ध्यान रखूंगा। यहां तक पढ़ते-पढ़ते पाठक को भी तो पता चले कि मेरी मनःस्थिति में अपने लिए क्या सोच है। मेरी समझ क्या है। आज इतना ही। विद्यालय से जुड़ी गतिविधियां बहुत कुछ सिखाती हैं। लेकिन जो कुछ सिखाती है, हम उसका उपयोग रोजमर्रा की कक्षा में क्यों नहीं कर पाते?

30 जुलाई 2010 : आज अपराह्न हमारे प्रधानाचार्य कार्यमुक्त हो गए। पाबौ स्थित बिडौली कॉलेज के लिए। मुक्त रूप से उनका विश्लेषण किया जाए तो अनुशासन प्रिय थे। मगर ऐसा अनुशासन जिससे वे खुद न बंधे हों तो? कक्षा-कक्ष में पढ़ाई होनी चाहिए। मगर जब उन्हें किसी शिक्षक से बात करनी हो या गप्पे लड़ाने का मन हो तो फिर कोई वादन क्या कोई क्लास क्या। दरअसल मैंने महसूस किया है कि बी.एड. की योग्यता एक अलग महत्व रखती है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक राज्य सभा और लोक सभा सांसद में अंतर हो जाता है। यहां मैंने महसूस किया है कि जो अच्छा शिक्षक है, उसे किसी डिग्री की क्या आवश्यकता? जो अच्छा शिक्षक नहीं है, वह चाहे कितने प्रशिक्षण ले ले, कक्षा में बेहतर नवाचार नहीं कर सकता।

01 अगस्त 2010 : मैं परंपरागत शिक्षण को आज के संदर्भ में खारिज करता हूं। शु़द्ध उच्चारण की अनिवार्यता बुनियादी विद्यालयों में तो कतई नहीं होनी चाहिए। बच्चे स्थानीयता को छोड़ कर एकल स्वर लेकर आगे बढ़ेंगे तो सांस्कृतिक विविधता कहां रह जाएगी। हम आज किसी भी व्यक्ति को उसकी बोली-भाषा से ही पहचान पाते हैं कि ये जरूर उस क्षेत्र का है। इसके पीछे कारण है कि उसके संवाद में क्षेत्र की बोली-भाषा का पुट साफ झलकता है। मातृभाषा की उपेक्षा करना, उसे नजर अंदाज करने का कार्य हमारे स्कूल कर रहे हैं। हम ज्यादा जोर शुद्ध उच्चारण पर देते हैं। स्थानीय बोली-भाषा का कोई शब्द किसी बच्चे ने कह दिया तो उसका उपहास उड़ाते हैं। हम शिक्षकों को गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

3 अगस्त 2010 : कक्षा 9 में एक बालक बहुत शरारती था। अधिकांश शिक्षक उसे कक्षा 9 में रोकने के लिए सहमत थे। मैंने कहा भी कि यदि वो अपनी मेहनत से पास हो रहा है तो हम भला उसे कैसे रोक सकते हैं। बहरहाल सालाना परीक्षा में अपनी उदण्डता और शरारत के चलते भी उसने मेहनत की और अच्छे अंकों से पास हुआ। मैंने पूर्व में भी उसे कई बार समझाया। शिक्षा का महत्व बताया। एक दिन तो प्रार्थना स्थल पर ही वो साथी शिक्षक से उलझ पड़ा। शिक्षक ने उसे भगा दिया। गाली-गलोज करता हुआ वह फिर कभी स्कूल नहीं आया। प्रधानाचार्य भी उसे ढीठ की संज्ञा दे चुके थे। बहरहाल कक्षा दस में प्रवेश के बाद भी वो कई दिनों तक स्कूल नहीं आया। कक्षाध्यापक ने उसका नाम काट दिया। कई दिनों बाद पुनःप्रवेश की बाबत उसके अभिभावक आए। सभी शिक्षक इस पक्ष में नहीं थे कि उसे प्रवेश दिया जाए। अनुशासनहीनता के चलते उसकी टी.सी. काट दी गई। मैं कक्षा में था। अजीब सा लगा। पर क्या करता। एक दिन वही छात्र पौड़ी मिला। उसने पौड़ी के कॉलेज में प्रवेश ले लिया। अब स्कूल आते-जाते वह मिल जाता है। मुझे तो वह नमस्ते करता है पर बाकि शिक्षकों को वह नमस्ते नहीं करता। मैंने महसूस किया है कि बच्चे हमारे व्यवहार को याद रखते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते। वे समझदार होने पर आपका आकलन कर ही लेते हैं। हम शिक्षक हैं, कोई तानाशाह नहीं।

20 अगस्त 2010  : बागेश्वर में स्कूल के पीछे मलबा आ जाने से 18 बच्चे काल कवलित हो गए। यह हादसा 17 अगस्त को हुआ। यह हादसा कहीं भी हो सकता है। किसी के साथ भी हो सकता है। अब सरकार चेती है कि विद्यालयी भवनों के लिए इतनी राशि उपलब्ध करायी जाएगी। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ ये राज्य के दायित्व होते हैं। मगर आज की सरकारें ये तीनों चीजे़ मुहैया कराने में असमर्थ हैं। कुछ जागरूक संस्थाओं और शिक्षाविदों ने भूखरहित भोजन का अधिकार आंदोलन चलाया। आज बुनियादी स्कूलों में मीड डे मील चल रहा है। इसे हाई स्कूल स्तर नहीं, इण्टर स्तर तक चलाया जाना चाहिए। बहरहाल, बच्चों की मौत पर तीन दिन का राज्य शोक मनाया गया। कई शिक्षकों को संवेदनाओं की चिंता नहीं, उन्हें तो यूं ही बैठे-ठाले अवकाश मिल गया। श्रद्धांजलि के छूटते ही छुट्टी की खुशी मास्टरों के चेहरे में साफ दिख रही थी। बच्चों की क्या कहें, बच्चे तो बच्चे हैं, छुट्टी का घंटा बजते ही बच्चे तो खुश होंगे ही।

25 अगस्त 2010 :  स्कूल हो या घर। शिक्षक, अभिभावक और समाज भी बच्चों में प्रतियोगिता की होड़ जगा रहे हैं। ऐसी प्रतियोगिता, जिससे हर बच्चा अव्वल आना चाहता है। प्रथम तो एक ही रहेगा। फिर पीछे रहने वालों के हाथ में लगती है,  मायूसी। ऐसी मायूसी जो उन्हें कुण्ठित करती है। गलत मनोभाव जगाती है। इससे यही बच्चे समाज में असामाजिक काम करने लगते हैं। ‘मैं’ का भाव जो बच्चों में तेजी से गहराता जा रहा है, उसके लिए हम शिक्षक भी तो जिम्मेदार हैं। हर कोई सौ फीसदी अंक क्यों लाए? हर कोई प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्यों आए। तीसरा खुद को दूसरे से और दूसरा खुद को पहले से कमतर आंकता है। शीर्ष पर न रहने का दुख उसे लंबे समय तक व्यथित करता है।

26 अगस्त 2010 : हम शिक्षक ऐसा क्यों करते हैं कि जो बच्चे हमारी कक्षा पास कर बड़ी कक्षा में चले जाते हैं तो हम उन्हें नजरअंदाज करने लग जाते हैं। हमारा व्यवहार ऐसा हो जाता है कि अब हमारा आप लोगों से कोई मतलब नहीं। बच्चे इस व्यवहार को बड़ी हैरानी से महसूस करते हैं। हमारी उदासीनता अच्छी नहीं। ये क्या बात हुई कि हम जिन कक्षाओं को नहीं पढ़ाते तो उन कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे हमारे नहीं हैं। ये व्यवहार हमें कहां ले जाएगा, यह बात दूसरी है। मगर बच्चे ऐसे व्यवहार से कहां पहुंचेंगे,  इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

28 अगस्त 2010 : जजों को नकल करते पकड़ा गया। क्या होगा इनका, जिनके हाथ पर न्याय करने की जिम्मेदारी दी गई है, वे ही नकल करके अव्वल आना चाहते हैं। अब बताइए, हम स्कूलों में बच्चों को परीक्षा में, कक्षा में अपना-अपना करने की घुट्टी पिलाते हैं। बच्चे नकल की प्रवृत्ति कहां से सीखते हैं? नकल करने का भाव ही क्यों आता है? क्या ऐसा तो नहीं कि परीक्षा और मूल्यांकन ही दोषपूर्ण है। या परीक्षार्थी का आत्मविश्वास कमजोर है। पर ये जज जिनका आत्मविश्वास बड़े-बड़े अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए होना चाहिए, बेकसूर को बाइज्जत बरी का निर्णय देने का विश्वास इन जजों में होना चाहिए, ये नकलची हैं। उफ क्या होगा। भावी पीढ़ी क्या करेगी। क्या दिशा लेकर ये नौनिहाल नागरिक बनेंगे?

29 अगस्त 2010 : कक्षा में बच्चे नजरें झुकाएं रहते हैं। शिक्षकों से नजरें नहीं मिलाते। क्या यह ठीक है? सब जगह नहीं होता तो बहुत जगह होता ही है। उस पर शिक्षकों का तुर्रा यह है कि यह संस्कार है। बच्चे हैं शिक्षकों से कैसे नजर मिलाएंगे।

30 अगस्त 2010 : संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए खण्ड विकास स्तरीय प्रतियोगिता में निणार्यकों में मैं भी रहा। आशुभाषण, वाद-विवाद प्रतियोगिता, समूह गान, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, नृत्य एवं नाटक प्रतियोगिता आदि। पौड़ी नगर और उसके आस-पास के विद्यालयों ने प्रतिभाग किया। मैंने साफ महसूस किया कि नगर के विद्यालयों के बच्चों के पास संसाधनों की कमी नहीं थी। वे हर चीज से खुद को परिपूर्ण किये हुए थे। वहीं ग्रामीण विद्यालयों के बच्चे स्कूली गणवेश में ही अपनी प्रस्तुतियां दे रहे थे। उनके चेहरे में पूर्व से ही झिझक, अपने को कमतर समझ लेने का भाव पहले से ही था। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश निर्णायक भी प्रदर्शन में बच्चों की आत्माभिव्यक्ति को कम और बाहरी दिखावे को ही महत्वपूर्ण मान रहे थे। एक शिक्षक तो नृत्य नाटिका और नृत्य गीत को एक ही चीज बताने पर तुले हुए थे। कुल मिलाकर इन प्रतियोगिताओं का मकसद भी बच्चों में और हीन भावना जगाने के साथ अव्वल आने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद की भावना को जमाने का रहता है। पूर्व से चली आ रही इस प्रकार की अस्वस्थ प्रतियोगिताओं को बंद किया जाना चाहिए। आखिर 15-20 विद्यालयों को बुलाकर उनमें से अव्वल टीमों को छांटने का जो तरीका है यह बच्चों में प्रतिस्पर्धा की जगह नकल, हथकण्डे और दूसरों को कमतर आंकने का भाव ज्यादा जगाता है।

31 अगस्त 2010 : आज राजकीय बालिका इंटर कालेज में संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता के आयोजन में निर्णायक की भूमिका में था। वाद-विवाद, आशुभाषण, सामान्य ज्ञान, नृत्य, समूह गान और नाटक गतिविधियों में थे। ठीक है, कुछ अव्वल आते हैं। कुछ को छोड़कर बाकि पीछे ही रह जाते हैं। उनमें मायूसी, हताशा, निराशा, कुण्ठा नहीं रह जाती। आखिर श्रेष्ठ को सर्वश्रेष्ठ बनाने की दौड़ में ही तो इन प्रतियोगिताओं को देखा जाता है। हम स्कूल में मेधावी छात्रों को ही इन प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करवाते हैं। वे अन्य विद्यालयों से होड़ करते हैं। ऐसे खण्ड स्तर पर, जनपद स्तर पर, राज्य स्तर पर और अखिल भारतीय स्तर पर होड़ मची रहती है। अंत में प्रथम, द्वितीय, और तृतीय का चयन होता है। कुछ सांत्वना पुरस्कार। आखिर इन सबका क्या मतलब है। यह कहना कि जो पीछे रह गए वो कल आगे आएंगे। जो सिर्फ दर्शक रहे, वे कल प्रतिभाग करेंगे। आखिर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है? नहीं। मुझे तो लगता है कि ऐसी प्रतियोगिताएं हों, जो हमें सहभागिता, सामुदायिकता, सहयोग, प्रेरणा और प्रेम का पाठ पढ़ाए। जरा टटोलिए खुद को क्या ऐसा होता है?

3 सितंबर : 5 सितंबर को शिक्षक दिवस है। मैं तो संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में जीजीआईसी में व्यस्त रहा। कल पांच दिन बाद स्कूल जाना है। लेकिन सुना है कि 5 को संडे है तो 4 को ही शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। ये क्या बात हुई ?

4 सितंबर 2010 : कल रात से बारिश लगी है। आज सुबह का ही स्कूल रहा। बहरहाल। बच्चों को शिक्षक दिवस मनाने की बात कही तो वे 10 मिनट की तैयारी में ही शुरू हो गए। आज कई शिक्षक नहीं थे। मगर जो भी थे, बच्चों ने हर किसी शिक्षक की नकल की। हमारे आचरण, आदत की नकल की। अन्य बच्चों ने पहचाना कि अमुक शिक्षक की नकल की जा रही है। बच्चों ने हमारे हाव-भाव को, हमारी आदतों को और हमारे द्वारा अक्सर दोहराए जाने वाले वक्तव्यों को अभिनय में शामिल किया। जिससे अन्यों ने पहचाना कि अमुक की नकल की जा रही है। अच्छा लगा और एक बात समझ में आई कि बच्चे कक्षा-कक्ष में छोटी-छोटी बातों को बड़ी गंभीरता से सुनते-समझते हैं। हमें बच्चों को हलके ढंग से नहीं लेना चाहिए।

9 सितंबर 2010 : आज राजकीय बालिका इंटर कॉलेज पौड़ी संस्कृत अकादमी हरिद्वार द्वारा आयोजित जनपदीय संस्कृत छात्र प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। अत्यधिक बारिश और भूस्खलन के कारण कई ब्लॉक तो आ ही नहीं पाए। खैर 1 बजे शुरू हुआ। मैं निर्णायक सदस्य के रूप में था। आशु भाषण में। बच्चों ने अच्छा किया। एक बालिका अपने विचार दिए गए विषय पर नहीं रख सकी। रो पड़ी। मैंने उसका हौसला बढ़ाया। फिर भी वह संयत नहीं हो पाई। बाद में मैंने उसे बुलाया। समझाया। कहा-‘‘ये प्रतियोगिताएं हर किसी को अव्वल नहीं बनाती। तुमने प्रतिभाग किया यह बड़ी बात है। मगर जीवन के संघर्ष और प्रतियोगिता में तुम अव्वल रहोगी। मेरा विश्वास है।’’ यह कहने पर वो फफक-फफक कर रो पड़ी। फिर जाकर उसे कुछ आराम-सा मिला। ये प्रतियोगिता मेधावी छात्रों को ओर अलग-थलग कर देती है, सामान्य बच्चों से। ऐसी प्रतियोगिता क्यों नहीं हो सकती, जिसमें अधिक से अधिक बच्चों का प्रतिभाग हो सके।

25 सितंबर 2010 : आजकल गढ़देवा के 60 वर्ष पूर्ण हो जाने के अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन पर काम कर रहे हैं। राजकीय बालिका इंटर कालेज में। आज एक बालिका मेरे पास आई। कहने लगी-‘‘सर। मैं भाषण प्रतियोगिता में थी। मैं जनपद स्तर की प्रतियोगिता में कोई स्थान प्राप्त नहीं कर सकी। मुझे मैडम ने डांटा-भला बुरा कहा। अब मैं आगे से कभी कोई प्रतियोगिता में शामिल नहीं होंगी।’’ मैंने समझाया। मगर वह रोने लगी। हालांकि बाद में वह समझ गई और मान गई कि प्रतियोगिताओं में शिरकत करना भी एक तरह से बड़ी उपलब्धि है। पर क्या ऐसा मैडम को करना चाहिए था। हम शिक्षक ही बच्चों में अव्वल आने की दौड़ करवाते हैं। पिछड़ने पर उन्हें डांटते हैं। वे हमारी बातों को गहराई से लेते हैं। शायद जीवन भर भूलते भी नहीं। हमें ऐसा करना चाहिए? नहीं न?

खेलें कहाँ : मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

शि‍क्षा जगत से जुडे़ युवा लेखक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने वि‍द्यालयी शिक्षा के लि‍ए प्रचुर मात्रा में लेखन और संपादन कि‍या है। इसके अलावा उनकी कहानी, कविता, नाटक, व्यंग्य, समीक्षा आदि‍ वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हुए हैं। उनकी बाल कहानि‍यों का मराठी में अनुवाद हुआ है। उनकी बाल कहानी-

दिव्या ने स्कूल बैग कंधे से उतारा और सीधे दरवाजे की ओर जाने लगी। उसकी मम्मी ने पीछे से टोकते हुए पूछा, ‘‘दिव्या ! कहां जा रही हो। पहले कपड़े बदलो। मुंह हाथ धो लो। कुछ खा-पी लो। तब जाना।’’

लेकिन दिव्या ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। दिव्या की मम्मी भी पीछे-पीछे चल दी। नजदीक ही कॉलोनी का पार्क था। कॉलोनी के कुछ बच्चे पार्क के बाहर खड़े थे। दिव्या उन बच्चों के साथ खड़ी थी। दिव्या की मम्मी हैरान थी कि आखिर बात क्या है। दिव्या ने आज से पहले कभी ऐसा नहीं किया था। वह स्कूल से आती है तो सबसे पहले अपने बैग से वो सारी कॉपी-किताबें निकालती है, जिनमें उसे होमवर्क करना होता है। फिर वह कपड़े बदलती है। मुंह-हाथ धोकर इत्मीनान से कुछ खाती है। स्कूल की रोचक बातें भी बताती है। होमवर्क निपटाने के बाद ही खेलने जाती है, लेकिन आज तो उसने घर आते ही बैग पटका और सीधे पार्क की ओर आ गई।

‘‘जरा सुनूं तो आखिर ये बच्चे आपस में क्या बात कर रहे हैं?’’ दिव्या की मम्मी पार्क के कोने में चुपचाप खड़ी हो गई और सावधानी से बच्चों की बातें सुनने लगीं। दिव्या के अलावा कॉलोनी के बच्चों में श्रेया, आकांक्षा, चिक्की, अभय, अनुभव और आदित्य भी खड़े थे। अभय जोर से बोला, ‘‘घर के अंदर तो खेलने का सवाल ही नहीं होता। कॉलानी में भी सब हमें टोकते रहते हैं। एक पार्क ही तो है जहां हम खेलते हैं।’’ अब दिव्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘पार्क का ताला तोड़ देते हैं।’’

श्रेया ने कहा, ‘‘उससे क्या होगा? ताला तो दूसरा आ जाएगा।’’

चिक्की ने पूछा, ‘‘फिर क्या करें? यूं ही खड़े रहें क्या?’’ तभी किसी की नजर दिव्या की मम्मी पर पड़ गई। वे सब चुप हो गए। दिव्या की मम्मी भी उनके झुण्ड में शामिल हो गई।

‘‘ये सब क्या है? दिव्या क्या हुआ?’’ दिव्या की मम्मी ने नाराज़गी से पूछा। तब तक श्रेया और अनुभव की मम्मी भी वहां आ गईं। दिव्या को छोड़कर बाकी सभी अपने स्कूल बैग के साथ वहां खड़े थे। श्रेया की मम्मी दूर से ही चिल्लाई, ‘‘श्रेया। स्कूल की छुट्टी हुए आधा घंटा हो गया है। तू यहां क्या कर रही है?’’

श्रेया ने जैसे कुछ सुना ही नहीं था। वह दिव्या की मम्मी से बोली-‘‘आंटी। ये पार्क में ताला किसने लगाया? सुबह तो नहीं था। हम सब ताला देखकर यहां रुके हैं।’’

श्रेया की बात पर ध्यान न देते हुए अनुभव की मम्मी लगभग चीखी, ‘‘ताला लग गया तो कौन-सा आफत आ गई। तुम बच्चों को सीधे पहले घर आना चाहिए। मैं तो घबरा ही गई कि आज बच्चे अब तक घर क्यों नहीं आए। चल अनुभव। तू घर चल पहले। तूझे घर में बताती हूं।’’

दिव्या की मम्मी ने हस्तक्षेप किया, ‘‘एक मिनट भाभी। ज़रा मैं भी तो सुनूं ये बच्चे आपस में खुसर-पुसर कर क्यों रहे हैं। वाकई! पार्क में ताला तो लगा है।’’

अब तक चिक्की की मम्मी भी आ गई थी। चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘मैं बताती हूं। आज सुबह ही कॉलोनी के शर्मा अंकल ने यहां ताला लगाया है। अब कॉलोनी वाले जगह-जगह पर अपनी गाडि़यां खड़ी कर देते हैं। सड़क तक गाडि़या निकालने में सभी को दिक्कत होती है। शर्मा अंकल कह रहे थे कि सन्डे को सभी कालोनी वालों की मीटिंग होगी। अब सब अपनी गाडि़या पार्क के अंदर खड़ी करेंगे।’’

दिव्या बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘तो आंटी फिर हम खेलेंगे कहां? पार्क तो खेलने के लिए है।’’

अभय बोला, ‘‘घर में खेलने की मनाही है। सड़क में जाने नहीं देते। कॉलोनी में खेलो तो सब कहते हैं शोर मत करो। ले-दे कर एक पार्क बचा था तो उसमें ताला लगा दिया। किसी ने हमसे पूछा भी नहीं। आज तो मन्डे है। सन्डे तो दूर है। तब तक हम खेलेंगे नहीं क्या? अब हम कहां जाएंगे?’’

चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘तो जरूरी है कि तुम खेलो। घर में रहो। घर के अंदर खेलने वाले खेल खेलो। पढ़ाई करो।’’

चिक्की मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘क्या मम्मी। आपको तो हमे सपोर्ट करना चाहिए। महीने में आपकी एक किटी पार्टी घर में क्या होती है आप कितनी परेशान हो जाती हो। चार दिन से तैयारी में लग जाती हो। घर के अंदर कौन से खेल खेलूंगी मैं। किसके साथ? आप मेरे दोस्तों को तो घर में आने भी नहीं देती।’’

यह सुनकर चिक्की की मम्मी सकपका गई। दिव्या भी चुप नही रही। वह बोली, ‘‘शर्मा अंकल अपने आप को क्या समझते हैं। हम यहां से तब तक नहीं जाएंगे जब तक पार्क का ताला नहीं खुलता है।’’

दिव्या की मम्मी ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘चुप! ऐसा नहीं कहते।’’

‘‘जब बड़ों ने फैसला ले ही लिया है। तो तुम कौन होते हो उस पर बाते बनाने वाले। चल आकांक्षा यहां से।’’ आकांक्षा की मम्मी ने कहा।

आकांक्षा ने कहा, ‘‘मम्मी एक मिनट। हम बच्चों की स्कूल बस सड़क के बाहर खड़ी रहती है। कॉलोनी के अंदर नहीं आती। गाडि़यां भी तो सड़क पर खड़ी हो सकती हैं। पार्क के अंदर क्यों? हम बच्चों की तो कोई गाड़ी नहीं है। बड़ों की समस्या है तो बड़े जानें। हमें हमारा पार्क खाली चाहिए।’’

दादा-दादी जैसे कई हैं, जो सुबह-शाम इस पार्क में टहलते हैं। उनका क्या होगा। क्या वे हर रोज शर्मा अंकल से ताला खुलवाएंगे?’’ अब आदित्य ने जोर से कहा।

तभी शर्मा अंकल वहां आ गए। वह मुस्कराते हुए बोले, ‘‘क्या हो रहा है यहां? मेरे खिलाफ क्या-क्या बोल रहे हो तुम बच्चे लोग? ज़रा मैं भी तो सुनूं।’’

दिव्या की मम्मी बोली, ‘‘नमस्ते भाई साहब। ये बच्चे पार्क को लेकर परेशान हैं? इनका कहना है कि हम कहां खेलेंगे?’’

शर्मा अंकल पार्क के गेट की ओर बढ़ चुके थे। उन्होंने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘ये लो। मेरे बच्चों ने अपने प्रिंसिपल सर से मेरे आफिस फोन तक कर दिया। यही नहीं, आज जब मैं उन्हें लेने स्कूल गया तो वे मेरे साथ मेरी कार में आए ही नहीं। उनका कहना है कि वे आज के बाद मेरी कार पर ही नहीं बैठेंगे। सॉरी बच्चों। हम बड़े भी कई बार बच्चों जैसी हरकत कर डालते हैं। पार्किंग के लिए हम कुछ ओर सोचेंगे। पार्क में ताला कभी नहीं लगेगा। बस।’’

बच्चे ताली बजाने लगे। लेकिन दिव्या ने कहा, ‘‘बच्चों जैसी हरकत से आप क्या कहना चाहते हैं अंकल?’’

शर्मा अंकल झेंप गए। फिर मुस्कराते हुए बोले, ‘‘यही कि जैसे आप सब अपना सारा काम छोड़कर भरी दुपहरी में यहां खड़े हैं। यह बातें तो शाम को भी हो सकती थी। मुझे भी तो ऑफिस से यहां आना पड़ा। मुझे भी तो मेरे बच्चों ने यही कहा कि जब तक पार्क का ताला नहीं खुलेगा, वे न खाना खाएंगे न ही होमवर्क करेंगे। अब तुम सबसे पहले एक काम करो। मेरे घर जाओ और मेरे बच्चों को बताओ कि ताला खुल गया है। ये लो ताला और चाबी।’’

दिव्या ताला-चाबी पर झपटी और सारे के सारे बच्चे शर्मा अंकल के घर की ओर दौड़ पड़े। बच्चों की मम्मी एक-दूसरे के मुंह ताक रही थीं।