Tag: बाल साहि‍त्‍य

आकर्षित कर रहीं हैं नई बाल-पुस्तकें : रमेश तैलंग

वर्ष 2010 में प्रकाशि‍त बाल साहि‍त्‍य पर सुप्रसि‍द्ध कवि‍ रमेश तैलंग का आलेख-

हर वर्ष की तरह, इस वर्ष भी सैंकड़ों बहुरंगी बाल पुस्तकों ने हिंदी बाल-साहित्य को अपनी नव्यता एवं भव्यता के साथ समृद्ध किया है। चाहे विषयों की विविधता हो या सामग्री की उत्कृष्टता, चित्रों की साज-सज्जा हो या मुद्रण की कुशालता, हर दृष्टि से हिंदी की बाल-पुस्तकें अब अंग्रेजी बाल-पुस्तकों के बरक्स विश्‍वस्तरीय मानदंडों को छू रही हैं। पर, जैसा कि हर बार लगता है, पुस्तकों की कीमत पर एक हद तक नियंत्रण होना अवश्‍य लाजमी है। यदि 48 पृष्ठों की पुस्तक के लिए आपको 150 रुपये खर्च करने पड़ें तो कम से कम हिंदी बाल-पाठकों की जेब पर यह भारी ही पड़ता है।

लेकिन इस बहस में पड़ेंगे तो हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। अतएव हियां की बातें हियनै छोड़ो अब आगे का सुनो हवाल… की डोर पकड़ें तो,  हाल-फ़िलहाल पचास के लगभग नई बाल-पुस्तकें मेरे सामने हैं और उनमें बहुत सी ऐसी हैं जो विस्तृत चर्चा की हक़दार हैं। पर हर पत्रिका की अपनी पृष्ठ-सीमा होती है और इस सीमा के चलते यदि इन बाल पुस्तकों पर मैं परिचयात्मक टिप्पणी ही कर सकूं तो आशा है सहृदय पाठक-लेखक-प्रकाशक अन्यथा नहीं लेंगे।

तो सबसे पहले दो बाल-उपन्यास, जो मुझे हाल ही में मिले हैं। पहला है डॉ. श्री निवास वत्स का गुल्लू और एक सतरंगी ( किताबघर, दिल्ली) और दूसरा है राजीव सक्सेना का मैं ईशान ( बाल शिक्षा पुस्तक संस्थान, दिल्ली)।

श्रीनिवास वत्स एक सक्षम बाल कथाकार हैं और काफी समय से बाल-साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। मां का सपना के बाद गुल्लू और एक सतरंगी उनका नया बाल-उपन्यास आया है जिसका मुख्य पात्र यूं तो गुल्लू नाम का बालक है पर उपन्यास की पूरी कथा और घटनाएं सतरंगी नाम के एक अद्भुत पक्षी के चारों ओर घूमती हैं। यह पक्षी मनुष्य की भाषा समझ और बोल सकता है इसीलिए गुल्लू और सतरंगी की युगल-कथा पाठकों को अंत तक बांधे रखती है। 159 पृष्ठों में फैले इस उपन्यास का अभी पहला खंड ही प्रकाशिात हुआ है जो आगे जारी रहेगा। देखना यह है कि आगे के खंड एक श्रंखला के रूप में कितने लोकप्रिय होते हैं। वैसे लेखक ने इसे किसी भारतीय भाषा में लिखा गया प्रथम वृहद् बाल एवं किशोरोपयोगी उपन्यास माना है।

दूसरा उपन्यास- ‘मैं ईशान’ राजीव सक्सेना का प्रयोगात्मक बाल-उपन्यास है। उपन्यास क्या है, ईशान नाम के एक बालक की आत्मकथा है जिसमें उसी की जुबानी उसकी शैतानियां, उसकी उपलब्धियां, उसकी कमजोरियां, और उसकी परेशानियां बखानी गई हैं। संभव है, इसे पढ़ते समय ईशान के रूप में बाल-पाठक अपना स्वयं का चेहरा तलाशने लगें क्योंकि बच्चे तो सभी जगह लगभग एक से ही होते हैं।

कथा-साहित्य के फलक पर ही आगे नजर डालें तो मदन बुक हाउस, नई दिल्ली द्वारा आरंभ की गई मेरी प्रिय बाल कहानियां श्रंखला में पांच सुपरिचित लेखकों की कहानियों के संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। ये लेखक हैं- मनोहर वर्मा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र,  देवेन्द्र कुमार, भगवती प्रसाद द्विवेदी एवं प्रकाशा मनु। इससे पूर्व डॉ. श्रीप्रसाद की प्रिय कहानियों का संग्रह भी यहां से प्रकाशिात हो चुका है। मेरी समझ में ऐसे संग्रहों का महत्व इसलिए अधिक है कि इनमें लेखकों के शुरुआती दौर से लेकर अब तक की लिखी गई प्रतिनिधि कहानियों का संपूर्ण परिदृशय एक जगह पर मिल जाता है।

इन संग्रहों की यादगार कहानियों में मनोहर वर्मा की नन्हा जासूस, मां का विश्‍वास, चाल पर चाल, लीना और उसका बस्ता, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की समुद्र खारा हो गया, एक छोटा राजपूत, टप-टप मोती, साहसी शोभा, भगवती प्रसाद द्विवेदी की फिसलन, भटकाव, गलती का अहसास, छोटा कद-बड़ा पद, देवेन्द्र कुमार की बाबा की छड़ी, मास्टर जी, डाक्टर रिक्शा, पुराना दोस्त, धूप और छाया, प्रकाश मनु की गुलगुल का चांद, आईं-माईं आईं-माईं मां की आंखें, मैं जीत गया पापा के नाम लिए जा सकते हैं।

भगवती प्रसाद द्विवेदी ने फिसलन और भटकाव जैसी कहानियों में किशोरावस्था के ऐसे अनछुए बिंदुओं (योनाकर्षण एवं फिल्मी दुनिया के मायाजाल) को छुआ है जिन्हें बाल-साहित्य में ‘टेबू’ समझ कर छोड़ दिया जाता है।

ऐसा ही एक और कहानी संग्रह डॉ. नागेश पाण्डेय संजय का यस सर-नो सर (लहर प्रकाशन, इलाहाबाद ) है जिसमें उनकी 14 किशोरोपयोगी कहानियां संकलित हैं। नागेश पांडेय ने लीक से हटकर कहानियां/कविताएं लिखी हैं। यही कारण है कि उनकी बाल-कहानियां आधुनिक संदर्भों से जुड़कर पाठकों को बहुत कुछ नया देती हैं।

यहां मैं डॉ. सुनीता के बाल-कहानी संग्रह ‘दादी की मुस्कान’ ( सदाचार प्रकाशन, दिल्ली) की चर्चा भी करना चाहूंगा जिसमें उनकी छोटी-बड़ी 21 मनभावन कहानियां संकलित हैं। गौर से देखें तो सुनीता की कहानियों में जगह-जगह एक गंवई सुगंध या कहें,  एक अनगढ़ सौंदर्य देखने को मिलता है। सुनीता देवेन्द्र सत्यार्थी की तरह अपनी कहानियों में पत्र-शौली, यात्रा-कथा, सामाजिक, ऐतिहासिक जीवन-प्रसंग तथा पारिवारिक संबंधों की जानी-पहचानी मिठास…. सभी कुछ रचाए-बसाए चलती हैं जो पाठकों को एक अलग ही तरह का सुख देता है।

मेरी प्रिय बाल कहानियां के अलावा धुनी बाल-साहित्य लेखक और चिंतक प्रकाश मनु के इधर और भी अनेक कहानी संग्रह इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं। यथा- रंग बिरंगी हास्य कथाएं ( शशांक पब्लिकेशन्स, दिल्ली), तेनालीराम की चतुराई के किस्से, बच्चों की 51 हास्य कथाएं, ज्ञान विज्ञान की आशचर्यजनक कहानियां ( तीनों के प्रकाशक डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली ), अद्भुत कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( कैटरपिलर पब्लिशर्स, दिल्ली), जंगल की कहानियां, ( स्टेप वाई स्टेप पब्लिशर्स, दिल्ली),  चुनमुन की अजब-अनोखी कहानियां ( एवरेस्ट पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  सुनो कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( ग्लोरियस पब्लिशर्स, दिल्ली),  रोचक कहानियां ज्ञान-विज्ञान की ( बुक क्राफ्ट पब्लिशर्स, दिल्ली)  । ज़ाहिर है कि प्रकाश मनु न केवल अपने लेखन में गति और नियंत्रण बनाए हुए हैं, बल्कि समकालीन बाल-साहित्य के समूचे परिदृश्‍य पर भी एक पैनी नजर रखे हुए हैं। मैं नहीं जानता, इतने विविध और महत्वपूर्ण बाल कहानी-संग्रह एक साथ एक ही वर्ष में किसी और लेखक के प्रकाशित हुए हैं।

जाने-माने कथाकार अमर गोस्वामी  की 51 बाल कहानियों का एक नया संग्रह ‘किस्सों का गुलदस्ता’ (चेतना प्रकाशन, दिल्ली) भी इधर आया है जिसमें बाज की सीख, घमंडी गुलाब, चुनमुन चींटे की सैर, लौट के बुद्धु के अलावा उनकी मशहूर बाल कहानी शोरसिंह का चशमा भी शामिल है। पाठक इन सभी कहानियों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

लोक-परक, पौराणिक एवं प्रेरक बाल-कथा साहित्य के अंतर्गत आनंद कुमार की ‘जीवन की झांकिया, ( ट्रांसग्लोबल पब्लिशिंग कंपनी, दिल्ली),  मनमोहन सरल एवं योगेन्द्र कुमार लल्ला द्वारा संपादित भारतीय गौरव की कहानियां, ( बुक ट्री पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली),  हरिमोहन लाल श्रीवास्तव तथा ब्रजभूषण गोस्वामी द्वारा संपादित मूर्ख की सूझ, विष्णु दत्त ‘विकल’ की इंसान बनो, दो खंडों में प्रकाशिात राज बहादुर सिंह की चरित्र निर्माण की कहानियां (सभी के प्रकाशाक एम.एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली),  सावित्री देवी वर्मा रचित इन्सान कभी नहीं हारा,  प्यारे लाल की गंगा तेली, ( दोनों के प्रकाशक-सावित्री प्रकाशन, दिल्ली), राम स्वरूप कौशल की पाप का फल, ( स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली )  तथा डॉ. रामस्वरूप वशिष्ठ की एक अभिमानी राजा (ओरिएंट क्राफ्ट पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली)  के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं।

कथा-साहित्य की तरह ही बाल कविताएं भी अपनी सहजता, मधुरता और सामूहिक गेयता के कारण हमेशा से बच्चों को प्रिय रही हैं।

यह हर्ष की बात है कि इस वर्ष हमारे समय के पुरोधा बालकवि डॉ. श्रीप्रसाद के तीन संग्रह क्रमश: मेरे प्रिय शिशु गीत ( हिमाचल बुक सेंटर, दिल्ली), मेरी प्रिय बाल कविताएं ( विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)   और मेरी प्रिय गीत पहेलियां ( सुधा बुक मार्ट, दिल्ली),   एक साथ प्रकाशिात हुए हैं। इन काव्य-संग्रहों में श्रीप्रसाद जी की लंबी बाल-काव्य यात्रा का विस्तृत परिदृश्य अपनी पूरी वैविध्यता के साथ देखा जा सकता है। श्रीप्रसाद जी के अलावा डॉ. प्रकाशा मनु के भी 101 शिशु गीत इधर चेतना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुए हैं जिनका मजा नन्हे-मुन्ने़ पाठक ले सकते हैं।

शिशु गीतों की बात चली है तो संदर्भवश मैं यहां यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि अंग्रेजी में रेन रेन गो अवे,  ब बा ब्लेकशीप, हिकरी-डिकरी,  जैसे बहुत से ऐसे नरसरी राइम्स हैं जिनके पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक, सामाजिक घटना जुड़ी है। जिज्ञासु पाठक यदि चाहें तो,  इन घटनाओं का संक्षिप्त ब्‍योरा www.rhymes.org.uk वेबसाइट पर देख सकते है। हिंदी शिशु गीतों, खासकर जो लोक में प्रचलित हैं, में ऐसे संदर्भों को ढूंढना श्रम-साध्य होने के बावजूद रोचक होगा। क्योंकि कोई भी लेखक या शिशु गीत रचयिता अपने समय से कटकर कुछ नहीं रच सकता।

इस वर्ष जिन अन्य बाल-कविता संग्रहों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है उनमें डॉ. शकुंतला कालरा का हंसते-महकते फूल ( चेतना प्रकाशन, दिल्ली ),   डॉ. बलजीत सिंह का गाओ गीत सुनाओ गीत, डा. शंभुनाथ तिवारी का धरती पर चांद  ( दोनों के प्रकाशक हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर), प्रत्यूष गुलेरी का बाल गीत ( नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली),   डॉ. आर.पी. सारस्वत के दो संग्रह- नानी का गांव और चटोरी चिड़िया ( दोनों के प्रकाशक नीरजा स्मृति‍ बाल साहित्य न्यास, सहारनपुर),    राजा चौरसिया का अपने हाथ सफलता है ( बाल वाटिका प्रकाशन, भीलवाड़़ा), अजय गुप्त का जंगल में मोबाइल ( श्री गांधी पुस्तकालय प्रकाशन, शाहजहांपुर ), चक्रधर नलिन का विज्ञान कविताएं( लहर प्रकाशन, इलाहाबाद),   और गया प्रसाद श्रीवास्तव श्रीष का वीथिका ( कवि निलय,  रायबरेली) प्रमुख हैं।

डॉ. आर पी सारस्वत अपेक्षाकृत नए बाल कवि हैं पर उनकी बाल-कविता चटोरी चिड़िया की गेयता और उसका चलबुलापन सचमुच चकित करता है। सच कहूं तो बाल-कविता के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं जिनमें सबसे बड़ी चुनौती लोकलय एवं पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता को बचाए रखने की है।

कवि‍ता के बाद नाटक विधा की बात करें तो बाल नाटकों की इधर दो किताबें मुझे मिली हैं। ये हैं डॉ. प्रकाश पुरोहित की ‘तीन बाल नाटक’ ( राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर) तथा भगवती प्रसाद द्विवेदी की आदमी की खोज ( कृतिका बुक्स इंटरनेशनल, इलाहाबाद),  जिसमें उनके सात बाल एकांकी संग्रहीत हैं।

अन्य विधाओं में मनोहर वर्मा की भारतीय जयन्तियां एवं दिवस ( साहित्य भारती, दिल्ली) महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें लेखक ने भारतीय महापुरुषों के संक्षिप्त जीवन परिचय के साथ उनकी जयंतियां मनाने का सही तरीका तथा आवश्‍यक उपदानों का रोचक ढंग से वर्णन किया है। जिन पाठकों को महापुरूषों के प्रेरणादयी वचनों के संग्रह में रुचि है उन्हें गंगाप्रसाद शर्मा की पुस्तक 1001 अनमोल वचन (स्वास्तिक प्रकाशन, दिल्ली) सहेजने योग्य लग सकती है। इनके अलावा, जैसा कि सब जानते हैं,  हर वर्ष भारत के कुछ बच्चों को उनके साहस और वीरता भरे कारनामों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है। रजनीकांत शुक्ल ने ऐसे ही राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित सोलह बहादुर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं जो छोटे-बड़े सभी पाठकों को प्रेरणादायी एवं रोमांचकारी लगेंगी।

आध्यात्मिक गुरु, चिंतक एवं वक्ता ओशो ने एक बार कहा था कि जब हम ईश्‍वर से बात कर रहे होते हैं तो वह प्रार्थना कहलाती है और जब हम ईश्‍वर की बात सुन रहे होते हैं तो वह साधना बन जाती हैं। सच कुछ भी हो पर यह तो मानना पड़ेगा कि प्रार्थना हर मनुष्य को आंतरिक शक्ति प्रदान करती है और शायद यही कारण है कि लगभग हर घर, संस्थान, विद्यालय में अलग-अलग समय पर प्रार्थनाएं गाई जाती हैं। ऐसी ही शक्तिदायी प्रार्थनाओं और राष्ट्रीय वंदनाओं का एक रुचिकर संग्रह शान्ति कुमार स्याल का विनय हमारी सुन लीजिए (विद्यार्थी प्रकाशन, दिल्ली)  है जिसमें एक सौ के लगभग प्रार्थनाएं संग्रहीत हैं।

बाल-साहित्य में रुचि रखने वाले बहुत से पाठकों को साहित्यकारों के बचपन और उनके जीवन के बारे में भी जानने की उत्सुकता रहती है। इस संदर्भ में दो पुस्तकों का उल्लेख मैं यहां करना चाहूंगा। पहली पुस्तक है बचपन भास्कर का (साहित्य भारती,  दिल्ली) जिसमें प्रख्यात साहित्यकार रामदरश मिश्र के बचपन के प्रसंग हैं और दूसरी पुस्तक है ‘वह अभी सफ़र में हैं’ ( प्रवाल प्रकाशन, गाजियाबाद) जिसमें जाने-माने बाल-साहित्यकार योगेन्द्र दत्त शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर मार्मिक लेख हैं। ज्ञातव्य है कि योगेन्द्र दत्त शर्मा के दो बालगीत संग्रह आए दिन छुट्टी के और अब आएगा मजा पहले ही काफी चर्चित हो चुके हैं।

और अंत में चलते-चलते प्रकाशान विभाग नयी दिल्ली से प्रकाशित देवेन्द्र मेवाड़ी की पुस्तक- विज्ञान बारहमासा का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें लेखक ने प्रकृति से जुड़े अनेक सवालों के जवाब सीधे, सरल और सटीक ढंग से दिए हैं। निस्संदेह, देवेन्द्र मेवाड़ी की यह पुस्तक विज्ञान पर लिखी गई महत्वपूर्ण बाल पुस्तकों में अपना यथोचित स्थान बनाएगी।

(आजकल, नवंबर, 2010 में प्रकाशि‍त आलेख के संपादि‍त अंश)

हिदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की बाल कविताएँ

हिंदी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सुखराम चौबे गुणाकर, कामता प्रसाद गुरु, प. सुदर्शनाचार्य और राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन की बाल कवि‍ताएं-

देल छे आए : श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी-पिज्जी कुछ ना लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए?
का है मेला बला खिलौना,
कलाकद लड्डू का दोना।
चू चू गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुइया,
चुनिया मुनिया मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना मेली गैया,
का मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ का से आए,
आ-आ चिज्जी क्यों न लाए?

कोकिल : महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

हिम्मत : बालमुकुंद गुप्त

‘कर नहीं सकते हैं’ कभी मुँह से कहो न यार,
क्यों नहीं कर सकते उसे, यह सोचो एक बार।
कर सकते हैं दूसरे पाँच जने जो कार,
उसके करने में भला तुम हो क्यों लाचार।
हो, मत हो, पर दीजिए हिम्मत कभी न हार,
नहीं बने एक बार तो कीजे सौ-सौ बार।
‘कर नहीं सकते’ कहके अपना मुँह न फुलाओ,
ऐसी हलकी बात कभी जी पर मत लाओ।
सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलस के मारे,
वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे।
देखो उनके लच्छन जो ऐसा बकते हैं,
फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं?
जो जल में नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे,
जो गिरने से हिचके उसको चलना कौन सिखावे।
जल में उतर तैरना सीखो दौड़ो, सीखो चाल,
‘निश्चय कर सकते हैं’ कहकर सदा रहो खुशहाल।

बनावटी सिंह : सुखराम चौबे गुणाकर

गधा एक था मोटा ताजा
बन बैठा वह वन का राजा!
कहीं सिंह का चमड़ा पाया,
चट वैसा ही रूप बनाया!
सबको खूब डराता वन में,
फिरता आप निडर हो मन में,
एक रोज जो जी में आई,
लगा गरजने धूम मचाई!
सबके आगे ज्यों ही बोला,
भेद गधेपन का सब खोला!
फिर तो झट सबने आ पकड़ा,
खूब मार छीना वह चमड़ा!
देता गधा न धोखा भाई,
तो उसकी होती न ठुकाई!

छड़ी हमारी : कामता प्रसाद ‘गुरु’

यह सुदर छड़ी हमारी,
है हमें बहुत ही प्यारी।
यह खेल समय हर्षाती,
मन में है साहस लाती,
तन में अति जोर जगाती,
उपयोगी है यह भारी।
हम घोड़ी इसे बनाएँ,
कम घेरे में दौड़ाएँ,
कुछ ऐब न इसमें पाएँ
है इसकी तेज सवारी।
यह जीन लगाम न चाहे,
कुछ काम न दाने का है,
गति में यह तेज हवा है,
यह घोड़ी जग से न्यारी।
यह टेक छलाँग लगाएँ,
उँगली पर इसे नचाएँ,
हम इससे चक्कर खाएँ,
हम हल्के हैं यह भारी।
हम केवट हैं बन जाते,
इसकी पतवार बनाते,
नैया को पार लगाते,
लेते हैं कर सरकारी।
इसको बंदूक बनाकर,
हम रख लेते कधे पर,
फिर छोड़ इसे गोली भर,
है कितनी भरकम भारी।
अधे को बाट बताए,
लगड़े का पैर बढ़ाए,
बूढ़े का भार उठाए,
वह छड़ी परम उपकारी।
लकड़ी यह बन से आई,
इसमें है भरी भलाई,
है इसकी सत्य बड़ाई,
इससे हमने यह धारी।

हाऊ और बिलाऊ : प. सुदर्शनाचार्य

किसी गाँव में थे दो भाई–
हाऊ और बिलाऊ,
दोनों में था बडा़ बिलाऊ
छोटा भाई हाऊ,
था धनवान बिलाऊ पर था
वह स्वभाव का खोटा,
था गरीब, पर चतुर बहुत था
हाऊ भाई छोटा।
गाय-बैल थे बहुत
बिलाऊ के घर रुपया-पैसा,
पर गरीब हाऊ के केवल
था एक बूढ़ा भैंसा।

बंदर सभा : राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन

हियॉं की बातें हियनै रह गईं अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!
सौ जोजन लबा अरु चौड़ा अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!
जब सगिरा मैदनवा भरिगा पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले हाथ-पाँव से ताल बजाय!
इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली थामे मल्लू-सा को हाथ!
ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात!

(नीरजा स्‍मृति‍ बाल साहि‍त्‍य न्‍यास, सहारनपुर से प्रकाशि‍त और बाल साहि‍त्‍यकार कृष्‍ण शलभ द्वारा संपादि‍त पुस्‍तक बचपन एक समंदर से साभार)

अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की चार बाल कवि‍ताएं

खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास’ के रचि‍यता अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’(15 अप्रैल, 1965-16 मार्च, 1947) का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग तक है। उन्‍होंने पर्याप्‍त मात्रा में बाल साहि‍त्‍य का भी सृजन कि‍या-

एक तिनका

मैं घमडों में भरा ऐंठा हुआ
एक दिन जब था मुडेरे पर खड़ा,
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आख में मेरी पड़ा।
मैं झिझक उट्ठा, हुआ बेचैन-सा
लाल होकर आख भी दुखने लगी,
मूठ देने लोग कपड़े की लगे
ऐंठ बेचारी दबे पावों भागी।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया
तब समझ ने यों मुझे ताने दिए,
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

एक बूंद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में,
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में।
बह गई उस काल एक ऐसी हवा
वो समदर ओर आई अनमनी,
एक सुदर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती बनी।
लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
कितु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो।
बीती रात कमल-दल फूले,
उनके ऊपर भौंरे झूले।
चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर,
बहने लगी हवा अति सुदर।
नभ में न्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।
भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
ऐसा सुदर समय न खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

चंदा मामा

चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।
मैं तैरा मृग छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।
उसकी उछल कूछ देखूँगा,
उसको चाटूँगा चूमूँगा।

माँ-बेटे के कोमलतम रिश्ते की विरल अनुभूतियों का बयान : रमेश तैलंग

साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित कथाकार प्रकाश मनु के बाल उपन्‍यास एक था ठुनठुनिया का अवलोकन कर रहे हैं चर्चित लेखक रमेश तैलंग-

कथा-पुरुष देवेन्द्र सत्यार्थी अक्सर कहा करते थे कि पाठक (आलोचक) को किसी भी कृति का मूल्याँकन लेखक की ज़मीन पर बैठ कर करना चाहिए। सत्यार्थीजी की यह उक्‍ति‍ मुझे इसलिए भी याद आ रही है कि ‘एक था ठुनठुनिया’ को पढ़ते हुए मैं कई बार कई जगह पर फिसला हूँ। शायद यही कारण है कि रचना कई बार पुनर्पाठ की अनिवार्यतः माँग करती है।

सरसरी तौर पर देखें तो एक था ठुनठुनिया एक पितृहीन पाँच साल के बच्चे की साधारण-सी कथा है जो अपनी चंचलता और विनोदप्रियता से अपनी माँ के साथ-साथ पूरे गांव वालों का प्रिय बन जाता है और किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते अपनी सूझ-बूझ, कला-प्रवीणता और मेहनत से एक दिन अपनी माँ का सहारा बनकर सफलता की ऊँचाइयाँ हासिल करता है। पर इस साधारण-सी दिखने वाली कथा में कई असाधारण बिंदु गुंफित हैं।

मसलन, पहला बिंदु तो ठुनठुनिया की माँ के ममता भरे उस सपने से जुड़ा है जिसमें वह ठुनठुनिया के बड़े तथा सक्षम होने पर परिवार के भरण-पोषण की समस्या का निदान खोज रही है। पुत्रजन्म के एक साल बाद ही पति का देहावसान किसी भी माँ के लिए बज्राधात से कम नहीं होता खासकर उस गरीब परिवार में जहाँ जीवनयापन का अर्थ सतत संघर्ष के सिवा कुछ और नहीं है- ‘‘बस यही तो मेरा सहारा है, नहीं तो भला किसके लिए जी रही हूँ मैं। ……अब जरूर मेरे कष्ट भरे दिन कट जाएँगे।…… मेरा तो यही अकेला बेटा है ….. लाड़ला! इसी के सहारे शायद बुढ़ापा पार हो जाए।’’

दूसरा बिंदु,  ठुनठुनिया की माँ के मन में पल रहे उस अज्ञात डर का है जो उसे सदैव इस आशंका से आतंकित किए रहता है कि उसका इकलोता बेटा और एकमात्र सहारा ठुनठुनिया अगर किसी कारणवश उससे दूर चला गया तो उसका क्या होगा। क्या वह उसका वियोग सह पाएगी? और एक दिन जब मानिक लाल कठपुतली वाले के साथ ठुनठुनिया सचमुच गाँव छोड़ कर चला जाता है और काफी दिनों तक माँ की सुध नहीं लेता तो माँ का यही डर प्रत्यक्ष हो कर उसके सामने आ खड़ा होता है। पूर्वअध्यापक अयोध्याप्रसाद जब ठुनठुनिया को अपने साथ लेकर गाँव लौटते हैं तो कई दिनों से बीमार पड़ी माँ का अकुलाता हृदय ठुनठुनिया के सामने उपालंभ भरे स्वर में फट पड़ता है- ‘‘बेटा ठुनठुनिया, तूने अपनी माँ का अच्छा ख्याल रखा। कहा करता था-‘माँ, माँ, तुझे मैं कोई कष्ट न होने दूँगा। पर देख, तूने क्या किया?’’

तीसरा बिंदु शैशव और किशोरावस्था के बीच झूलते ठुनठुनिया के उस निश्छल, विनोदप्रिय एवं निर्भीक स्वभाव का है जिसके तहत वह अपने गाँव गुलजारपुर के भारीभरकम सेहत वाले जमींदार गजराज बाबू को हाथी पर सवार देखकर विनोद करता है- ‘‘माँ! माँ! देखो, हाथी के ऊपर हाथी…, देखो माँ,  हाथी के ऊपर हाथी।’’ ठुनठुनिया के विनोदी एवं निर्भीक स्वभाव का वहाँ भी परिचय मिलता है जहाँ वह भालू का मुखौटा लगा कर रात को रामदीन काका सहित बहुत से गाँव वालों को पहले डराता है और कुछ दिनों बाद गाँव के ही एक उत्सव में भालू नाच दिखाने के बाद इस रहस्य का पर्दा भी खोल देता है,  बिना इस भय के कि उसकी इस शरारत के लिए उसे सजा भी मिल सकती है। यह और बात है कि उसे सजा तो नहीं मिलती, गजराज बाबू द्वारा गुलजारपुर के रत्न का खिताब अवश्य मिल जाता है।

यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि आमतौर पर बहुत से बच्चों में पढ़ाई से हट कर कंचे खेलने, पतंग उड़ाने, पेंच लड़ाने या कुछ ऐसा कर गुजरने की इच्छा बलवती होती है जो दूसरे न कर सके। ठुनठुनिया इसका अपवाद नहीं। वह भी इन सभी कामों में अपनी महारत सिद्ध करना चाहता है और ऐसा कर भी लेता है । यही नहीं उसकी एक दबी हुई इच्छा यह भी है कि वह पढ़ाई की जगह खिलौने बनाकर या कठपुतली का नाच दिखा कर अपने तथा अपनी माँ के लिए खूब पैसा कमाए। उसकी यही इच्छा उसे पहले रग्घु काका के खिलौने बनाने तथा बाद में मानिक लाल के कठपुतली नचाने की कला के प्रति आकर्षित करती है और अचानक माँ से दूर एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ थोड़ा पैसा और शोहरत तो है पर वह माँ नहीं है जिसकी जिंदगी का हर पल उसी के सहारे टिका हुआ है।

स्कूली शिक्षा से विचलन और कम से कम समय में येन-केन प्रकारेण ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह अंकुरण के बाद पल्लवित होती आज की नई पीढ़ी को किस तरह उनके सही लक्ष्‍य तथा अपने प्रियजनों से दूर भटका रही है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण ठुनठुनिया के चरित्र में देखने को मिलता है।

पर वो कहते हैं न कि अंत भला सो सब भला।

अपने पूर्व अध्यापक अयोध्या प्रसाद के साथ जब ठुनठुनिया आगरा से वापस अपने गाँव गुलजारपुर लौटता है तो उसके जीवन की राह ही बदल जाती है। अब वह दोबारा स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ाई में पूरी तरह जुट जाता है और हाईस्‍कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। पढ़ाई के साथ-साथ उसकी क्रियात्मक कलाओं में अभिरुचि तथा प्रवीणता उसे एक दिन कपड़ा फैक्टरी के मालिक कुमार साहब तक पहुँचा देती है जो इंटर पास करने के बाद ठुनठुनिया को उसकी कुशलता तथा विश्वास पात्रता के चलते अपने डिजाइनिंग विभाग में असिस्टेंट मेनेजर की नौकरी दे देते हैं। इस तरह ठुनठुनिया जहाँ अपनी मां गोमती का वर्षों से पाला हुआ सपना पूरा करता है, वहीं गोमती अपने बेटे के लिए उसके अनुरूप बहू भी ढूंढ़ लेती है।

एक था ठुनठुनिया का एक और बेहद मनोरंजक प्रसंग वह है जहाँ ठुनठुनिया अपने दोस्तों के उपहास से तंग आकर अपनी माँ के सामने अपना नाम बदलने की पेशकश रखता है। उत्तर में जब माँ उसे शहर जा कर कोई नया नाम खोज लेने के लिए कहती है तो ठुनठुनिया की कशमकश देखते बनती है। जब वह अशर्फीलाल को भीख माँगते, हरिश्चंद्र को जेब काटते और छदामीमल को सेठ की जिंदगी जीते हुए देखता है तो उसको समझ आ जाती है कि उसे और किसी दूसरे नाम की जरूरत नहीं, वह तो ठुनठुनिया ही भला।

आह वे फुंदने वाले प्रसंग को पढ़कर मुझे राम नरेश त्रिपाठी की कहानी सात पूंछों वाला चूहा स्मरण हो आई। लोक में ऐसी कथाएं अनेक रूपों में प्रचलित होकर लेखकों को प्रेरित करती है जहाँ कहीं-कहीं साम्य भी नजर आ जाता है।

एक था ठुनठुनिया की एक प्रमुख विशेषता है प्रकाश मनु की बाल-सुलभ चुलबुली भाषा और कथा कहने का खिलंदड़ा अंदाज जो उन्हें कथा लेखक से कहीं ज्यादा कुशल कथावाचक के रूप में स्थापित करते हैं।

पुस्तक- एक था ठुनठुनिया (2007),  पृष्ठ-95
प्रकाशक- शब्दकलश,  एस-55 प्रताप नगर, दिल्ली-110007
मूल्य- 100 रुपये

बाल साहित्य की दुनिया में बहुत बेशकीमती नगीने है : प्रकाश मनु

साहि‍त्‍य से पहली मुलाकात, उसके जादुई असर और बाल साहि‍त्‍य की स्‍थि‍ति‍ पर कथाकार प्रकाश मनु का आलेख-

सच कहूँ तो ये ऐसे क्षण हैं जब मैं अपने आपको थोड़ी अजब सी स्थिति में पा रहा हूँ और क्या कहूँ, कैसे कहूँ, कुछ ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा। कभी लगता है, बहुत कुछ है कहने को और मुझे कह ही डालना चाहिए। या कुछ तो जरूर कहना चाहिए जो मुझे अरसे से भीतर इतना मथता रहा और अब भी मथ रहा है। पर फिर अगले ही क्षण लगने लगता है कि नहीं, कुछ कहा न जाएगा। कुछ न कहूँ, चुप ही रहूँ—यह अच्छा है।

इस दुविधा से बचने का एक तरीका शायद यह समझ में आया कि बचपन में जाकर थोड़ा उन लम्हों को टटोलूँ, जब साहित्य या किताब की दुनिया से पहला-पहला परिचय हुआ था। और तभी मैंने थोड़ा-थोड़ा जाना था कि एक छोटी सी सौ-डेढ़ सौ सफे की किताब यह करिश्मा कैसे करती है कि वह हर इनसान के भीतर झाँक लेती है और पत्थर को भी थोड़ा मुलायम, थोड़ा इनसान बना देती है।

और मुझे लगता है कि यह सब जो जादू है, एक अजब सी मायानगरी का जादू यानी लिखना, लिखने का आनंद या कि किताब पढऩा, पढऩे का आनंद…यहाँ तक कि किताब के नजदीक जाने का रोमांच और कोई रचना, कोई बढिय़ा रचना जो आपको आत्मिक तृप्ति दे और आपके अबूझ सवालों का जवाब दे, आपको निराशा से बचाकर राह सुझाए, एक नई मंजिल की ओर इशारा करे,  उसे पढऩे का एक निराला सा आनंद—इसकी शुरुआत तो शायद बचपन से ही हो जाती है, चाहे वह कितने ही अबोध और नौसिखिए रूप में हो। मगर किताब का उजाला नन्हे हाथों में आता है और फिर कैसे उसके दिल-दिमाग में फैलता है, यह मैंने जाना है। सभी लोगों ने इसे किसी न किसी रूप में महसूस किया होगा।

मुझे याद है, बचपन में एक बार ‘मनमोहन’ पत्रिका मेरे हाथ में आ गई थी। उस पत्रिका का एक अंक पढ़ लेना मुझे किस कदर रोमांच दे गया है, उसे बता पाना लगभग असंभव है। वह आज भी मेरे लिए एक तिलिस्म, एक जादू की तरह है। अभी तक किताब का मतलब मैं पाठ्य पुस्तक ही समझता था। मगर पाठ्य पुस्तकों की स्पष्ट ही सीमाएँ थीं। वे अच्छी लगती थीं, पर मन उनके साथ खुलकर बहता नहीं था। एक दूरी, एक परायापन सा था। पर मनमोहन को देखा तो लगा, और पहली बार लगा, कि अखबारी कागज पर छपी एक साधारण सी छपाई वाली पत्रिका भी मन पर जादू कर सकती है! उसमें बहुत सी कहानियाँ थीं, कविताएँ थीं, लेख थे, पहेलियाँ थीं। और वे सब के सब मैं इस कदर चाट गया, जैसे एक भुक्खड़ को बहुत दिनों बाद बढिय़ा भोजन मिला हो, मन और तबीयत के व्यंजन खाने को मिले हों। एक बच्चे की बाल साहित्य से यह पहली मुलाकात थी और वह इस कदर प्रेममयी और रोमांचक थी कि दुनिया की किसी भी बड़ी से बड़ी प्रेमकथा को उस पर निछावर किया जा सकता है। एक छोटा सा अबोध बच्चा था और वह पहली बार अपने हाथ-पैर हिलाते हुए मुक्त हवा में तैर रहा था, आसमान में उड़ रहा था और उसे लग रहा था कि यह सारी दुनिया मेरी है, यह आसमान मेरा है। ओह! मेरे घर के दरवाजे-खिड़कियाँ अभी तक बंद थीं। मैंने कभी इस नए जादू और रोमांच को जाना ही नहीं। आज एक छोटी सी पत्रिका, जो कि शायद उन दिनों चवन्नी या अठन्नी की रही होगी, एकाएक उसने वे सारी खिड़कियाँ-दरवाजे खोल दिए कि मैं उडऩे लगा, उड़ता रहा, उड़ता रहा बहुत देर तक। और मैंने महसूस किया मेरे अंदर बहुत सारे आसमान हैं, बहुत सारी सृष्टियाँ हैं, बहुत सारी कल्पनाओं और जिज्ञासाओं का ब्रह्मांड व्याप्त है, उनका आनंद है, और बहुत गहरी संवेदना है जिसे मैं छू सकता हूँ, देख सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ।

मुझे अब भी याद है कि उस मनमोहन में एक राजकुमारी थी जिसकी नाक किसी वजह से लंबी, लंबी, बहुत लंबी होती जा रही थी। यहाँ तक कि वह जंगलों, झाडिय़ों तक चली गई और काँटों से लहूलुहान हो गई। तब उसकी पीड़ा से मैं किस कदर तड़पा और छटपटाया था आपको बता नहीं सकता। फिर उस कहानी का नायक, पता नहीं वह कौन था, उसने कुछ ऐसा किया कि वह नाक छोटी हुई और राजकुमारी फिर राजकुमारी बन गई। वैसी ही राजकुमारी जिसे मैं पहले से जानता था और पसंद करता था। तब मुझे कुछ चैन पड़ा। वरना अब तक तो मेरी साँस ही रुकी हुई थी।

उसके बाद फिर एक और अनुभव। बच्चों की एक और पत्रिका ‘चंदा मामा’ कहीं से हाथ आ गई और उस पूरे अंक में एक रहस्य और रोमांच भरा बाल उपन्यास छपा था। मैंने उसे आधा पढ़ा और फिर आधा वहीं रुक गया, क्योंकि मुझे अपने बड़े भाईसाहब की दुकान पर जाकर उनकी मदद करनी थी। शाम को उन्होंने किसी काम से भेजा,  तो मुझे मुक्ति मिली। मैं दुकान से छूटा तो वह पत्रिका जेब में ही थी और मुझमें इतना धैर्य नहीं था कि कहीं बैठकर उसे पढ़ लूँ। मैं दुकान से निकला और रास्ते में चलते हुए उस किताब को पढऩे लगा। आस-पास रिक्शे-ताँगे, लोगों की भीड़-भाड़, पौं-पौं, पैं-पैं। लेकिन एक बच्चे की अपनी प्रिय पत्रिका से मुलाकात अबाध जारी थी। अब भी याद है, पूरे रास्ते भर मैं उस उपन्यास को पढ़ता गया था। आज सोचकर काँप उठता हूँ कि अगर मेरा एक भी कदम गलत पड़ गया होता तो…? कुछ भी हो सकता था, कुछ भी।

लेकिन बच्चे और बाल साहित्य का जो रिश्ता होता है, वह कुछ अजब सी दीवानगी वाला रिश्ता है। उसमें ये सारी चीजें नहीं चलतीं। और यह दीवानगी न होती, तो दुनिया के हजारों लेखक और लाखों पाठक बार-बार तकलीफें झेलकर भी, यों दौड़-दौड़कर किताबों की दुनिया के नजदीक न जाते। और बच्चों में—मैंने महसूस किया है—यह दीवानगी कहीं अधिक होती है। मैं विनम्रता से कहना चाहूँगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तमाम आतंक के बावजूद आज भी वह है और बनी रहने वाली है।

अब हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में दो बातें। मुझे लगता है, हिंदी के बाल साहित्य पर बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ खानापूर्ति वाली ढेरों चीजें हैं, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएँ भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। निरंकारदेव सेवक, सर्वेश्वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएँ लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्‍व कविता में पांक्तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्रकुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले, दिलीप एम. सालवी और देवेंद्र मेवाड़ी सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। रेखा जैन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और केशवचंद्र वर्मा ने बच्चों के लिए ऐसे दिलचस्प नाटक लिखे जिन्होंने बाल नाटकों की धारा ही बदल दी। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी अद्भुत और रोमांचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से एक मूर्धन्य कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ.जाकिर हुसैन ने बच्चों के लिए बड़ी अद्भुत कहानियाँ लिखीं हैं और वे उपलब्ध हैं। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि कोई उस पर तरस खाए।

एक दूसरी चीज जो मुझे बहुत विचलित करती है वह यह कि आज के बच्चे से जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टँगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके मानो उसे असमय प्रौढ़ बना दिया गया है। सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएँ पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं काँप उठता हूँ।

अब ‘एक था ठुनठुनिया’…! दो-एक बातें इसके बारे में भी कहने का मन है। सच कहूँ तो इस पर प्रथम साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने का पत्र मिला, तो मुझे एक सुखद और अकल्पनीय आश्‍चर्य सा हुआ था। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें,  उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हाँ,  कुछ बाल पाठकों की बहुत उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मुझे याद हैं और उनमें से एक चेहरा भी, जिसने बड़े अटपटे ढंग से लेकिन असाधारण उत्साह से ठुनठुनिया के बारे में अपनी राय बताई थी। ठुनठुनिया उसे भा गया था, और इसे बताते हुए अति उत्साह में वह कुछ हकलाने लगा था। कुल मिलाकर तो बस इतना ही था जिसे मैंने सँजोकर रख लिया और जो मेरे साथ रहेगा। अब उस पर बाल साहित्य के मर्मज्ञों का भी ध्यान गया तो लगा, चलो, इस उपन्यास में कुछ तो है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और वह मेरी तरह उनके साथ भी रह गया। इससे एक तरह की खुशी तो होती ही है।

यों ठुनठुनिया थोड़ा अजीब पात्र है, जिसका परिवेश थोड़ा गँवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ सा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह परिस्थितियों से कतई हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हँसी की फुरफुरियां फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में भी वह पस्त नहीं होता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे न सही, मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आँखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा, इसलिए उसकी समझ बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिलों को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है, इसीलिए चाहे रग्घू खिलौने वाला हो, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला मानिकलाल या फिर गाँव का भारी-भरकम शख्सियत वाला जमींदार, हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की माँ! इसके बारे में तो सिर्फ इतना ही कि उपन्यास में कई प्रसंग हैं, जिन्हें लिख रहा था तो ममता से झुक आई डाली की तरह मेरी माँ सामने थी और ठुनठुनिया मैं था, मैं खुद। बस, अब कुछ और कहना शायद फिजूल है। हाँ, ठुनठुनिया की एक बात शायत सभी पाठकों को अच्छी लगी कि वह जिंदगी में आगे बढ़ता है, मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भुत दुनिया रच डालता है, जिसमें कला-संगीत, नाटक और हँसी-खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूँ तो खुद मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।

अंत में बस इतना और कि मैं जो ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ सरीखे उपन्यासों और आलोचनात्मक लेखों में डूबा हुआ था, बाल साहित्य में शायद कुछ देर से आया। पर आया तो इसका श्रेय सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका और वहाँ के बहुत अच्छे मित्रों और स्नेहिल सहयात्रियों को ही जाता है। हम लोग शायद एक कारवाँ की तरह थे और बुरे वक्तों में भी एक अलग तरह की अबोधता का पूरा आनंद ले रहे थे। ‘नंदन’ में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा, अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तभी जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। पिछले आठ-दस वर्षों से हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने में जुटा हूँ और वह अब लगभग पूरा होने वाला है। वह सामने आए तो लगेगा कि यह जीवन एकदम निरर्थक तो नहीं गया। इसलिए कि उसमें ऐसे अनेक लोगों का जिक्र है जो अनाम मर गए, लेकिन घोर अभावों के बावजूद बाल साहित्य को बेशकीमती नगीने दे गए। यह इतिहास पूरा हो तो लगेगा कि मुझे उन सभी का आशीर्वाद मिल गया है।

(मनुजी को उनके बाल उपन्‍यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर हि‍दी के लि‍ए साहि‍त्‍य अकादमी के पहले बाल साहि‍त्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानि‍त कि‍या गया है। उन्‍होंने यह व्‍याख्‍यान सम्‍मान समारोह में दि‍या था।)