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बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र

एक बादल एक बूँद एक नाव  : रजनी गुसाईं

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गड-गड-गरड़… आकाश में बादल गरज रहे थे। चमकती धूप गायब हो गई थी। काले बादलों ने सूरज को ढक दिया था। दोपहर में ही अँधेरा छा गया। “मम्मी, लगता है, बारिश होने वाली है। बड़ा मजा आएगा।” नन्हीं हिमी ने अपना होमवर्क करते हुए कहा।

“पता नहीं ये बादल कब बरसेंगे! इतनी देर से तो बस गरज ही रहे हैं! यह उमस भरी गर्मी और बिजली भी चली गई हैं।” मम्मी हाथ का पंखा हिलाते हुए बोली और किचन में चली गई।

हिमी पहली तीन में पढ़ती हैं और अपने मम्‍मी–पापा के साथ बहुमंजिला इमारत की पंद्रहवी मंजिल के फ्लैट में रहती है। हिमी ने अपने कमरे की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका कमरे में ठंडक भर गया। हिमी खिड़की के पास खड़ी हो गई। उसने बाहर झांककर देखा। आकाश में बादल-ही-बादल दि‍खाई दे रहे थे। वे हवा के झोंको से इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। तभी हिमी की खिड़की के पास से एक बड़ा-सा काला बादल गुजरा। हिमी उसे आवाज लगाते हुए बोली, “सुनो बादल राजा, बस गरज ही रहे हो! बरसोगे कब?”

हिमी की आवाज सुनकर काला बादल रुक गया। वह बहुत उदास लग रहा था। वह बोला “मेरा मन बरसने को नहीं करता।” बादल के अंदर बैठी नन्हीं-नन्हीं बूँदें भी बादल की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाती हुई बोलीं “हमें भी रिमझिम-रिमझिम बारिश बनकर नहीं बरसना।”

हिमी को उनकी बातें सुनकर आश्‍चर्य हुआ। अपनी आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए वह बोली, “लेकिन तुम लोग धरती पर बरसना क्यों नहीं चाहते?”

काला बादल बोला “पहले जब में बरसता था तो बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर आ जाते थे। गलियों में, घरों की छतों में बारिश में भीगते थे। धमाचौकड़ी मचाते थे।”

नन्ही बूँदें बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, “हम जब बरसती थीं, तो हमारे पानी में बच्चे पैरों से छप-छपकर खेलते थे! रुके हुए पानी में कागज की रंग-बिरंगी नाव बनाकर तैराते थे। बच्चों की यह चुलबुली शरारतें देखकर बड़ा मजा आता था। लेकिन अब वो बात नहीं हैं।” कहते-कहते नन्हीं बूँदें उदास हो गईं।

काला बादल बोला, “अब बच्चे बारिश में घर से बाहर नहीं निकलते। बच्चों की शरारतों के बिना हमें भी बरसना अच्छा नहीं लगता।”

काले बादल और बूंदों की बात सुनकर हिमी सोच में पड़ गई। फिर धीरे से बोली, “ओ काले बादल सुन। हम बच्चे बारिश में भीगना चाहते हैं। खेलना चाहते हैं, लेकिन मम्मी-पापा हमें खेलने नहीं देते। वे कहते हैं, ‘बारिश में भीगने से जुखाम हो जाएगा। बीमार पड़ जाओगे।”

हिमी की बात सुनकर अब काला बादल सोच में पड़ गया।

“हिमी, हिमी उठो। होमवर्क करते-करते ही सो गई।” हिमी को नींद से जगाते हुए मम्मी बोली।

मम्मी की आवाज सुनकर हिमी एकदम से उठकर बैठ गई। आँखों को मींचते हुए बोली, “मम्मी, काला बादल कहाँ गया?”

“कैसा काला बादल? हिमी लगता हैं, तुमने कोई सपना देखा होगा।” कहते हुए मम्मी कमरे से बाहर चली गई!

हिमी ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश हो रही थी। हिमी ने मम्मी को आवाज लगाई, “मम्मी मुझे कागज की नाव तैरानी है।”

मम्मी कमरे में आई! हँसते हुए बोली, “यहाँ कागज की नाव कहाँ तैराओगी?”

“मम्मी नीचे सोसाइटी के कंपाउंड में चलते हैं। वहां पानी भर गया है।” हिमी जिद करने लगी। आखिर मम्मी को हिमी की जिद के आगे झुकना पड़ा, “ठीक हैं चलते हैं, लेकिन ज्यादा देर बारिश में नहीं भीगना।” मम्मी ने हिमी से कहा। यह सुनकर ख़ुशी से उछलते हुए हिमी ने टेबल के नीचे से पुराना अखबार निकाला और मम्मी के साथ बैठकर जल्दी-जल्दी नाव बनाने लगी। नाव बनकर तैयार थी। इसके बाद दोनों सोसाइटी के कंपाउंड में आ गए! हिमी पानी में छपाक-छपाक करते हुए बारिश में भीगने लगी। कागज की नाव उसने बारिश के बहते पानी में छोड़ दी। नाव पानी में डगमग-डगमग करते हुए आगे बढ़ने लगी। यह देखकर हिमी ख़ुशी से उछलते हुए ताली बजाने लगी। हिमी को बारिश के पानी में खेलते देख सोसाइटी में रहने वाले दूसरे बच्चे भी कागज की नाव लेकर कंपाउंड में आ गए। अब बारिश के पानी में कागज की बहुत सारी नाव तैरने लगीं। नन्हीं-नन्हीं बूँदें रिमझिम-रिमझिम बरस रही थीं। सारे बच्चे पानी में छपाक-छपाक करते और ख़ुशी से चिल्लाते। हिमी आसमान की तरफ देखकर बोली, “ओ बादल राजा, ओ नन्हीं बूंदों, अब तो खुश हो।”

उसकी सहेली दि‍व्या ने पूछा, “हि‍मी कि‍ससे बात कर रही हो।”

“कि‍सी से नहीं।” कहकर हि‍मी मुस्‍कराई और पानी में छप-छप करने लगी।

खेलें कहाँ : मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

शि‍क्षा जगत से जुडे़ युवा लेखक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने वि‍द्यालयी शिक्षा के लि‍ए प्रचुर मात्रा में लेखन और संपादन कि‍या है। इसके अलावा उनकी कहानी, कविता, नाटक, व्यंग्य, समीक्षा आदि‍ वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हुए हैं। उनकी बाल कहानि‍यों का मराठी में अनुवाद हुआ है। उनकी बाल कहानी-

दिव्या ने स्कूल बैग कंधे से उतारा और सीधे दरवाजे की ओर जाने लगी। उसकी मम्मी ने पीछे से टोकते हुए पूछा, ‘‘दिव्या ! कहां जा रही हो। पहले कपड़े बदलो। मुंह हाथ धो लो। कुछ खा-पी लो। तब जाना।’’

लेकिन दिव्या ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। दिव्या की मम्मी भी पीछे-पीछे चल दी। नजदीक ही कॉलोनी का पार्क था। कॉलोनी के कुछ बच्चे पार्क के बाहर खड़े थे। दिव्या उन बच्चों के साथ खड़ी थी। दिव्या की मम्मी हैरान थी कि आखिर बात क्या है। दिव्या ने आज से पहले कभी ऐसा नहीं किया था। वह स्कूल से आती है तो सबसे पहले अपने बैग से वो सारी कॉपी-किताबें निकालती है, जिनमें उसे होमवर्क करना होता है। फिर वह कपड़े बदलती है। मुंह-हाथ धोकर इत्मीनान से कुछ खाती है। स्कूल की रोचक बातें भी बताती है। होमवर्क निपटाने के बाद ही खेलने जाती है, लेकिन आज तो उसने घर आते ही बैग पटका और सीधे पार्क की ओर आ गई।

‘‘जरा सुनूं तो आखिर ये बच्चे आपस में क्या बात कर रहे हैं?’’ दिव्या की मम्मी पार्क के कोने में चुपचाप खड़ी हो गई और सावधानी से बच्चों की बातें सुनने लगीं। दिव्या के अलावा कॉलोनी के बच्चों में श्रेया, आकांक्षा, चिक्की, अभय, अनुभव और आदित्य भी खड़े थे। अभय जोर से बोला, ‘‘घर के अंदर तो खेलने का सवाल ही नहीं होता। कॉलानी में भी सब हमें टोकते रहते हैं। एक पार्क ही तो है जहां हम खेलते हैं।’’ अब दिव्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘पार्क का ताला तोड़ देते हैं।’’

श्रेया ने कहा, ‘‘उससे क्या होगा? ताला तो दूसरा आ जाएगा।’’

चिक्की ने पूछा, ‘‘फिर क्या करें? यूं ही खड़े रहें क्या?’’ तभी किसी की नजर दिव्या की मम्मी पर पड़ गई। वे सब चुप हो गए। दिव्या की मम्मी भी उनके झुण्ड में शामिल हो गई।

‘‘ये सब क्या है? दिव्या क्या हुआ?’’ दिव्या की मम्मी ने नाराज़गी से पूछा। तब तक श्रेया और अनुभव की मम्मी भी वहां आ गईं। दिव्या को छोड़कर बाकी सभी अपने स्कूल बैग के साथ वहां खड़े थे। श्रेया की मम्मी दूर से ही चिल्लाई, ‘‘श्रेया। स्कूल की छुट्टी हुए आधा घंटा हो गया है। तू यहां क्या कर रही है?’’

श्रेया ने जैसे कुछ सुना ही नहीं था। वह दिव्या की मम्मी से बोली-‘‘आंटी। ये पार्क में ताला किसने लगाया? सुबह तो नहीं था। हम सब ताला देखकर यहां रुके हैं।’’

श्रेया की बात पर ध्यान न देते हुए अनुभव की मम्मी लगभग चीखी, ‘‘ताला लग गया तो कौन-सा आफत आ गई। तुम बच्चों को सीधे पहले घर आना चाहिए। मैं तो घबरा ही गई कि आज बच्चे अब तक घर क्यों नहीं आए। चल अनुभव। तू घर चल पहले। तूझे घर में बताती हूं।’’

दिव्या की मम्मी ने हस्तक्षेप किया, ‘‘एक मिनट भाभी। ज़रा मैं भी तो सुनूं ये बच्चे आपस में खुसर-पुसर कर क्यों रहे हैं। वाकई! पार्क में ताला तो लगा है।’’

अब तक चिक्की की मम्मी भी आ गई थी। चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘मैं बताती हूं। आज सुबह ही कॉलोनी के शर्मा अंकल ने यहां ताला लगाया है। अब कॉलोनी वाले जगह-जगह पर अपनी गाडि़यां खड़ी कर देते हैं। सड़क तक गाडि़या निकालने में सभी को दिक्कत होती है। शर्मा अंकल कह रहे थे कि सन्डे को सभी कालोनी वालों की मीटिंग होगी। अब सब अपनी गाडि़या पार्क के अंदर खड़ी करेंगे।’’

दिव्या बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘तो आंटी फिर हम खेलेंगे कहां? पार्क तो खेलने के लिए है।’’

अभय बोला, ‘‘घर में खेलने की मनाही है। सड़क में जाने नहीं देते। कॉलोनी में खेलो तो सब कहते हैं शोर मत करो। ले-दे कर एक पार्क बचा था तो उसमें ताला लगा दिया। किसी ने हमसे पूछा भी नहीं। आज तो मन्डे है। सन्डे तो दूर है। तब तक हम खेलेंगे नहीं क्या? अब हम कहां जाएंगे?’’

चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘तो जरूरी है कि तुम खेलो। घर में रहो। घर के अंदर खेलने वाले खेल खेलो। पढ़ाई करो।’’

चिक्की मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘क्या मम्मी। आपको तो हमे सपोर्ट करना चाहिए। महीने में आपकी एक किटी पार्टी घर में क्या होती है आप कितनी परेशान हो जाती हो। चार दिन से तैयारी में लग जाती हो। घर के अंदर कौन से खेल खेलूंगी मैं। किसके साथ? आप मेरे दोस्तों को तो घर में आने भी नहीं देती।’’

यह सुनकर चिक्की की मम्मी सकपका गई। दिव्या भी चुप नही रही। वह बोली, ‘‘शर्मा अंकल अपने आप को क्या समझते हैं। हम यहां से तब तक नहीं जाएंगे जब तक पार्क का ताला नहीं खुलता है।’’

दिव्या की मम्मी ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘चुप! ऐसा नहीं कहते।’’

‘‘जब बड़ों ने फैसला ले ही लिया है। तो तुम कौन होते हो उस पर बाते बनाने वाले। चल आकांक्षा यहां से।’’ आकांक्षा की मम्मी ने कहा।

आकांक्षा ने कहा, ‘‘मम्मी एक मिनट। हम बच्चों की स्कूल बस सड़क के बाहर खड़ी रहती है। कॉलोनी के अंदर नहीं आती। गाडि़यां भी तो सड़क पर खड़ी हो सकती हैं। पार्क के अंदर क्यों? हम बच्चों की तो कोई गाड़ी नहीं है। बड़ों की समस्या है तो बड़े जानें। हमें हमारा पार्क खाली चाहिए।’’

दादा-दादी जैसे कई हैं, जो सुबह-शाम इस पार्क में टहलते हैं। उनका क्या होगा। क्या वे हर रोज शर्मा अंकल से ताला खुलवाएंगे?’’ अब आदित्य ने जोर से कहा।

तभी शर्मा अंकल वहां आ गए। वह मुस्कराते हुए बोले, ‘‘क्या हो रहा है यहां? मेरे खिलाफ क्या-क्या बोल रहे हो तुम बच्चे लोग? ज़रा मैं भी तो सुनूं।’’

दिव्या की मम्मी बोली, ‘‘नमस्ते भाई साहब। ये बच्चे पार्क को लेकर परेशान हैं? इनका कहना है कि हम कहां खेलेंगे?’’

शर्मा अंकल पार्क के गेट की ओर बढ़ चुके थे। उन्होंने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘ये लो। मेरे बच्चों ने अपने प्रिंसिपल सर से मेरे आफिस फोन तक कर दिया। यही नहीं, आज जब मैं उन्हें लेने स्कूल गया तो वे मेरे साथ मेरी कार में आए ही नहीं। उनका कहना है कि वे आज के बाद मेरी कार पर ही नहीं बैठेंगे। सॉरी बच्चों। हम बड़े भी कई बार बच्चों जैसी हरकत कर डालते हैं। पार्किंग के लिए हम कुछ ओर सोचेंगे। पार्क में ताला कभी नहीं लगेगा। बस।’’

बच्चे ताली बजाने लगे। लेकिन दिव्या ने कहा, ‘‘बच्चों जैसी हरकत से आप क्या कहना चाहते हैं अंकल?’’

शर्मा अंकल झेंप गए। फिर मुस्कराते हुए बोले, ‘‘यही कि जैसे आप सब अपना सारा काम छोड़कर भरी दुपहरी में यहां खड़े हैं। यह बातें तो शाम को भी हो सकती थी। मुझे भी तो ऑफिस से यहां आना पड़ा। मुझे भी तो मेरे बच्चों ने यही कहा कि जब तक पार्क का ताला नहीं खुलेगा, वे न खाना खाएंगे न ही होमवर्क करेंगे। अब तुम सबसे पहले एक काम करो। मेरे घर जाओ और मेरे बच्चों को बताओ कि ताला खुल गया है। ये लो ताला और चाबी।’’

दिव्या ताला-चाबी पर झपटी और सारे के सारे बच्चे शर्मा अंकल के घर की ओर दौड़ पड़े। बच्चों की मम्मी एक-दूसरे के मुंह ताक रही थीं।

रिंकू और टिंकू: उमेश कुमार

युवा लेखक और पत्रकार उमेश कुमार की बाल कहानी-

छोटा-सा ही था रिंकू, पर था बड़ा नटखट। एक दिन वह स्कूल से घर आ रहा था। रास्ते में उसे एक पिल्ला मिल गया। गोल-मटोल पिल्ले को देखकर रिंकू रुक गया। पिल्ला बहुत ही प्यार था। उसने सोचा कि सभी का नाम होता है। इसका नाम भी जरूर होना चाहिए।
उसने कहा, ‘‘शेरू।’’
पिल्ला चुपचाप रहा।
‘‘टाइगर।’’
पिल्ले ने अब भी कोई हरकत नहीं की।
‘‘टिंकू।’’
पिल्ले ने मुँह उठाकर पूँछ हिला दी।
रिंकू खुशी से चिल्ला उठा, ”मिल गया…मिल गया। इसका नाम मिल गया। इसका नाम टिंकू है।’’
रिंकू ने प्यार से बुलाया, ”टिंकू…टिंकू…।’’
टिंकू पूँछ हिलाते हुए रिंकू के पास आ गया।
रिंकू मजे से टिंकू के साथ खेलने लगा। टिंकू भागता तो रिंकू उसे पकड़ता और रिंकू भागता तो टिंकू उसे पकड़ता। दोनों पकड़म पकडा़ई का खेल बहुत देर तक खेलते रहे। रिंकू को ध्यान आया कि उसे देर हो रही है। वह बोला, ”बाप रे, देर हो गई। मम्मी गुस्सा होगी। अच्छा टिंकू मैं घर जाता हूं। कल फिर
आऊँगा।’’
वह चल दिया। कुछ दूर जाकर उसने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू उसके पीछे-पीछे आ रहा है। तब उसने टिंकू से पूछा, ”तुम कहाँ आ रहे हो? अपने घर जाओ।’’ पर टिंकू अपनी जगह खड़ा चुपचाप पूँछ हिलाता रहा।
”मैं अपनी मम्मी के पास जा रहा हूँ। तुम भी अपनी मम्मी के पास जाओ।’’ रिंकू ने बड़े प्यार उसकी पीठ सहलाते हुए कहा।
लेकिन टिंकू चुपचाप खड़ा रहा।
रिंकू ने पूछा, ”क्या तुम्हारा घर नहीं है?’’
टिंकू ने चुपचाप पूँछ हिला दी।
रिंकू ने सोचा, ”लगता तो यही है कि इसका घर नहीं है। इसे अपने साथ ही ले जाता हूँ।’’
रिंकू ने टिंकू से कहा, ”चलो टिंकू तुम मेरे घर चलो।’’ वह उसे अपने घर ले गया।
टिंकू को देखते ही मम्मी ने उसे डाँटा, ”इस पिल्ले को कहाँ से उठा लाया?’’
रिंकू ने कहा, ”मम्मी यह मेरा दोस्त टिंकू है। इसका कोई नहीं है- न मम्मी न पापा। इसका घर भी नहीं है। आज से यह हमारे घर में ही रहेगा, हमारे साथ!’’
मम्मी झुँझलाकर बोली, ”जा…जा…इसे बाहर छोड़ आ। सारे घर को गंदा कर देगा।’’
रिंकू टिंकू को अपने से अलग नहीं करना चाहता था। वह जब से यहाँ आया था, चुपचाप एक कोने में बैठा था। वह उसे हरहाल में अपने साथ रखना चाहता था। उसने मम्मी से बार-बार टिंकू को रखने के लिए कहा लेकिन वह तैयार नहीं हुईं।
अब रिंकू क्या करें? वह देर तक सोचता रहा। उसने टिंकू से कहा, ”मम्मी ने तुम्हें घर में रखने से मना कर दिया है। अब क्या करें?’’
टिंकू क्या जवाब देता। वह रिंकू की ओर देखकर आँखें टिमटिमाता रहा।
रिंकू को आइडिया आया कि घर के पिछवाड़े टिंकू के लिए घर बनाया जाए।
रिंकू और टिंकू घर के पिछवाड़े चले गए। रिंकू ईंटे और लकड़ी के दो फट्टे ले आया। उसने ईंटों से दीवार खडी कर दी। छत के लिए एक फट़टा लगा दिया और
दूसरे को दरवाजे की जगह लगा दिया। टिंकू के लिए घर तैयार हो गया। रिंकू ने टिंकू से कहता है, ”आज से तुम इस घर में रहोगे। मैं तुम्हारे लिए खाना ले आया करूंगा। अब मैं पढ़ने जा रहा हूं।’’
रिंकू जाने के लिए उठने लगा तो टिंकू ने उसके हाथ चाट लिए। रिंकू ने उसे समझाया, ”कुछ दिन की बात है। मैं मम्मी  को मना लूंगा। फिर तुम साथ मेरे कमरे में ही रहना।’’
रिंकू मम्मी से छिप-छिपकर टिंकू के लिए घर से खाना ले जाता था। रिंकू और टिंकू में काफी प्यार था। दोनों हमेशा साथ-साथ रहते। रिंकू स्कूल जाता
तो वह पीछे-पीछे चल देता। जब स्कूल की छुट्टी होती तो वह गेट पर पहुंच जाता।

अचानक एक दिन गांव के लोगों में बदहवासी दिखाई दी। एक पागल बिल्ली ने गांव में आतंक मचा दिया था। वह रात को लोगों पर सोते समय हमला कर काट लेती। गांव में सभी लोग काफी परेशान थे। गांव वाले बिल्ली से छुटकारा पाना चाहते थे, लेकिन उसे कोई पकड़ नहीं पाता था।
रिंकू और टिंकू को जब इस बात का पता चला तो दोनों ने गांव वालों को उस पागल बिल्ली से छुटकारा दिलाने की ठानी।
दोनों रात को बिल्ली की ताक में लगे रहते। एक रात बिल्ली रिंकू के पड़ोस में सो रहे एक बच्चे पर हमला कर दिया। बच्चे का शोर सुनकर रिंकू और टिंकू
जाग गए।
रिंकू ने टिंकू से कहा, ”कमॉन टिंकू।’’ टिंकू ने तेजी से बिल्ली का पीछा किया। भागते-भागते गांव से काफी दूर जंगल तक चले गए। बिल्ली डर गई। फिर
दोबारा गांव में नहीं आई।
गांव वालों ने रिंकू और टिंकू की बहादुरी पर दोनों को बधाई दी। मम्मी ने टिंकू को घर में रखने की इजाजत दे दी। उसके बाद रिंकू और टिंकू
साथ-साथ रहते। उनकी दोस्ती देखकर गांव वाले कहते, ”दोस्ती हो तो रिंकू और टिंकू जैसी।’’

रजत की क्यारी में पिल्ले : डा. सुनीता

चर्चित लेखिका डा. सुनीता की  बाल कहानी-

पिछले दो दिनों से भूरे रंग की एक कुतिया आकर रजत के घर के बाहर बनी क्यारी में, जब देखो तब बैठी दिखाई देती थी। रजत और उसके दोस्तों ने उसका नाम भूरी रख दिया था। उन्हें भूरी का इस तरह दिन भर एक ही जगह बैठे रहना अजीब लगता था।
एक दिन रजत ने मम्मी से पूछा, ’’मम्मी, क्या यह बीमार है? यह कल से यहीं बैठी है। कहीं और क्यों नहीं जाती?’’
रजत की मम्मी अंजली जी उसे देखकर समझ गईं कि यह पिल्लों को जन्म देने वाली है। उन्होंने रजत से कहा, ‘‘बेटे, इसे मारना नहीं। शायद इसकी तबीयत ठीक नहीं है। ठीक होते ही अपने आप चली जाएगी।’’
रजत ने देखा, भूरी बहुत उदास आँखों से उसे देख रही थी। वह भीतर जाकर एक रोटी ले आया और उसे खिलाने की कोशिश करने लगा। भूरी ने धीरे से एकाध टुकड़ा खाया, बाकी रोटी वहीं पड़ी रही।
अगले दिन इतवार था। उस दिन रजत को स्कूल नहीं जाना था, इसलिए वह देर से उठा। उठते ही उसने मम्मी से पूछा, ‘‘मम्मी, वो चली गई?’’
‘‘कौन?’’ मम्मी समझ नहीं पाईं, रजत किसके बारे में पूछ रहा है।
‘‘वही जो कल से हमारी क्यारी में बैठी थी?’’
‘‘अरे, मैंने तो देखा ही नहीं। चलो, देखते हैं।’’
रजत और उसकी मम्मी गेट का ताला खोलकर ज्यों ही क्यारी के पास आए, तो रजत खुशी से चीख पड़ा, ‘‘मम्मी, देखो-देखो, वन-टू-थ्री-फोर… चार-चार पिल्ले! एक काला, एक भूरा, एक धब्बे वाला और चौथा काला और सफेद।’’ वह खुशी से तालियाँ बजाने लगा और तुरंत दौड़कर अपने दोस्त अमित और साबिर को बुला लाया।
तीनों क्यारी के भीतर पिल्ले उठाने जा रहे थे, तो अंजली ने बड़ी मुश्किल से उन्हें रोका,  ‘‘नहीं बेटे, अभी उनके पास मत जाओ। वे बहुत छोटे हैं। उनकी अभी आँखें भी नहीं खुली हैं। और उनकी माँ को देखा है? इस समय वह अपने बच्चों को हाथ भी नहीं लगाने देगी। काट लेगी, इसलिए दूर से देखो।’’
रजत ठिन-ठिन करने लगा और पिल्ले लेने के लिए मचलने लगा। अपनी आँखों के ठीक सामने बिल्कुल रेशम की तरह चमकते चार-चार सुंदर पिल्लों को देखकर वह किसी भी तरह अपने पर काबू नहीं रख पा रहा था।
अंजली जी ने कहा, ‘‘अच्छा बेटे, ठीक है! पहले इसे कुछ खाने के लिए देते हैं। फिर इसे लगेगा कि हम इसके दोस्त हैं, तो यह हमें अपने पास आने देगी। तभी हम इसके पिल्लों को छू सकेंगे।’’
रजत और उसके दोस्त मान गए और गेट के पास ही बनी सीढिय़ों पर बैठ गए। अंजली ने फटाफट लपसी बनाई और उसे एक खुली-सी प्लेट में डाल दिया। फिर वह बाहर ले आईं। कुछ देर बाद अंजली जी हाथ में लपसी की प्लेट लिए क्यारी के अंदर गईं।
पहले तो पिल्लों की माँ अंजली को चौकन्नी होकर देखती रही। फिर विश्वास हो जाने पर, उसने धीरे-धीरे लपसी खाना शुरू किया! अंजली ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो उसकी आँखों में कृतज्ञता उभर आई। फिर धीरे से अंजली ने पिल्लों को भी छुआ। इतने में ही जैसे ही रजत और उसके दोस्त क्यारी के अंदर आने लगे, तो वह जोर से गुर्राई। अंजली ने फिर धीरे-से उसे पुचकारा तो उसे अहसास हो गया कि ये मेरे दोस्त ही हैं, दुश्मन नहीं।
अब रजत, अमित और साबिर ने भी उन्हें डरते-डरते छुआ। पर जैसे ही रजत ने एक पिल्ले को उठाने की कोशिश की, तो उनकी माँ फिर गुर्राई। रजत फौरन क्यारी से बाहर हो गया।
खैर, अगले दिन से पिल्लों और उनकी माँ से रजत और उसके दोस्तों की जान-पहचान हो गई। अब वे उन्हें गोद में उठा सकते थे। रजत तो जितना समय मिलता, पिल्लों के आसपास ही बिताता। अब स्कूल जाना भी उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे लगता था, सारे खिलौने एक तरफ और ये पिल्ले एक तरफ। यही उसके सबसे अच्छे खिलौने हैं।
कुछ दिन बाद पिल्लों की आँखें खुल गईं और वे घर के अंदर भी आने लगे। अंजली उन्हें दिन में तीन बार एक खुली प्लेट में दूध देती थीं जिसे वे पिल्ले अपनी पूँछ हिलाते हुए और एक-दूसरे से होड़ लगाते हुए, पाँच-सात मिनट में ही सफाचट कर जाते। रजत इस सीन में इतना तन्मय और खुश होता कि ऐसे समय उसे कोई वहाँ से हिला नहीं सकता था। जितनी तेजी से वे दूध पीते, उतनी तेजी से उनकी पूँछ हिलती थी। कभी-कभी तो यह देख, रजत की मम्मी को जोर से हँसी आ जाती थी।
पिल्ले कुछ और बड़े हुए तो उन्होंने दौडऩा-भागना शुरू किया। रजत या उसके मम्मी-पापा में से कोई भी घर से बाहर जाता, तो वे थोड़ी दूर तक उसके साथ-साथ जरूर जाते- एक-दूसरे से कुश्तियाँ लड़ते हुए, और फिर वापस क्यारी के आसपास ही बने रहते।
पिछले दो दिन से रजत को एक नया खेल मिल गया है। वह पिल्ले की पूँछ पकड़ता है, तो पिल्ले की दोनों पिछली टाँगें उठ जाती हैं। फिर वह अगली दो टाँगों से चलता है। पूँछ जोर से पकड़े जाने पर पिल्ले को जोर से दर्द होता है, तो वह ‘कैं-कैं, कैं-कैं’ करके चिल्लता है। इस पर रजत खुश होकर ताली पीटता है। यह खेल वह अपने दोस्तों को भी दिखाने लगा है।
कल जब रजत की मम्मी ने उसे ऐसा करते देखा, तो उसे पहले डाँटा और फिर प्यार से समझाया, ‘‘बेटे, अगर कोई तुम्हारी एक टाँग पकड़कर ऊपर उठा दे, तो तुम्हें कितना दर्द होगा? बस, वैसे ही समझ लो, इन पिल्लों को भी दर्द होता है। तभी तो ये दर्द से चिल्लाते हैं। ये बोल नहीं सकते, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम इन्हें अपने मजे के लिए बेवजह परेशान करते रहें। मेरी बात समझ रहे हो न रजत? आगे से ऐसा नहीं करोगे न?’’
‘‘नहीं!’’ रजत ने धीरे से कहा। पर उसका मन कुछ और कह रहा था।
इसके थोड़े ही दिन बाद की घटना है। रजत अब घर के अंदर पिल्लों की पूँछ नहीं पकड़ता था। पर स्कूल जाते हुए जब पिल्ले बस स्टॉप तक उसके पीछे-पीछे चलते तो उसका मन बेकाबू हो जाता। उसके हाथ उनकी पूँछ पकडऩे को मचलने लगते।
आज सुबह ऐसा ही हुआ। रजत स्कूल की बस पकडऩे जा रहा था। आदतन पिल्ले भी खूब उछलते-कूदते उसके पीछे चल पड़े। रजत ने फौरन एक पिल्ले की पूँछ पकड़ी और उसे जमीन से ऊपर उठा दिया। पिल्ला जोर-जोर से कैं-कैं करके चिल्लाने लगा। तभी उसकी माँ झटपट कहीं से भागती हुई आई और जिस हाथ से रजत ने पूँछ पकड़ी थी, वहीं काट लिया। बस आ चुकी थीं, पर रजत के हाथ से खून टपकता देख और उसे रोते देख, कंडक्टर उसे घर छोड़ गया।
रोते हुए रजत ने मम्मी को बताया कि उसे पिल्ले की माँ ने काट लिया है।
मम्मी घाव धोते हुए बोलीं, ‘‘मना किया था न तुम्हें, पर तुम नहीं माने। अब देख लिया न, किसी को बेवजह परेशान करने का क्या नतीजा होता है!’’
अंजली उसे तुरंत डॉ. वर्मा के यहाँ ले गईं। डाक्टर ने ऐंटी-रैबीज के पाँच इंजेक्शन एक दिन छोड़कर लगने की बात कही। सुनकर रजत की हालत खराब हो गई। उसकी मम्मी अलग परेशान!
अब रजत के घाव पर पट्टी बँधी है। एक दिन छोड़कर इंजेक्शन भी लग रहे हैं। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है। पिल्ले तो पिल्ले हैं। वे अब भी उसके आगे-पीछे घूमते हैं। कभी उसका पैर चाट लेते हैं, कभी हाथ! पर अब रजत ने सोच लिया है कि वह नाहक किसी को परेशान नहीं करेगा। वैसे भी ये पिल्ले तो उसके सबसे खूबसूरत और जानदार खिलौने हैं। फिर उन्हें तंग करने और रुलाने से फायदा ?

चाँदनी रात में नाचा भालू : प्रकाश मनु

कथाकार प्रकाश मनु को हिंदी के लिए साहित्‍य अकादमी के पहले बाल साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा रहा है। उन्‍हें यह पुरस्‍कार एक था ठुनठुनिया के लिए दिया जा रहा है। उपन्‍यास का अंश-

एक दिन ठुनठुनिया जंगल में घूम रहा था कि उसे एक अनोखी चीज दिखाई दी। पास जाकर देखा, वह काले रंग का एक मुखौटा था, जिस पर काले-काले डरावने बाल थे।

ठुनठुनिया को हैरानी हुई, जंगल में भला यह मुखौटा कौन छोड़ गया? क्या किसी नाटक-कंपनी के लोग यहाँ से गुजरे थे और गलती से इसे यहाँ छोड़ गए। या फिर जंगल का कोई जानवर इसे शहर से उठा लाया और यहाँ छोड़कर चला गया? जो भी हो, चीज तो बड़ी मजेदार है ! ठुनठुनिया ने उस मुखौटे को उठाया और अपने चेहरे पर पहनकर देखा। मारे खुशी के चिल्ला उठा, ”अरे रे, यह तो मुझे बिल्कुल फिट आ गया!’’

ठुनठुनिया का मन हो रहा था, अभी दौड़कर घर जाए और शीशे के आगे खड़े होकर देखे कि यह अनोखा मुखौटा पहनकर वह कैसा लगता है? पर उसे तो उतावली थी, सो दौड़ा-दौड़ा गया नदी के किनारे। वहाँ पानी के पास सिर झुकाकर देखने लगा और सचमुच खुद अपनी शक्ल देखकर वह डर गया कि ‘अरे, यह भालू कहाँ से आ गया!’ चौंककर वह दो कदम पीछे हट गया। फिर खुद-ब-खुद अपने इस रूप पर ठठाकर हँस पड़ा।

सिर्फ ठुनठुनिया की आँखें ही थीं, जिनसे वह थोड़ा-बहुत पहचान में आता था। वरना तो, एकदम ऐसे बदल गया था, जैसे वह ठुनठुनिया न होकर अभी-अभी जंगल से भागकर आया कोई जंगली भालू हो। कोई एकदम जंगली भालू!

अचानक ठुनठुनिया के मन में एक आयडिया आया और वह खुद अपनी सोच पर खुश होकर उछल पड़ा। उसने सोचा, अभी नहीं, मैं रात में यह मुखौटा पहनकर गाँव वालों के पास जाऊँगा, तब आएगा मजा!

यह सोचकर ठुनठुनिया ने वह मुखौटा जतन से एक पुराने कपड़े में लपेटकर गाँव के पास वाले बरगद की डाल में छिपा दिया।

रात के समय ठुनठुनिया ने पेड़ की डाली से वह मुखौटा उतारा और पहन लिया। वह एक दोस्त से काले रंग के कपड़े भी माँग लाया था। उन्हें पहनकर वह चुपके से चलता हुआ गाँव की चौपाल तक आ गया। और झूमते हुए आगे बढ़ा। वहाँ दो-चार लोग बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे थे। उन्होंने एक भालू को झूमते-झामते पास आते देखा, तो चिल्लाते हुए सिर पर पैर रखकर भागे।

फिर ठुनठुनिया आगे बढ़ा तो रामदीन चाचा नजर आ गए। वे घर के बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे। ठुनठुनिया ने जाते ही हाथ से हिलाकर उन्हें जगाया। नींद खुलते ही काले रंग के विशालकाय भालू पर उनकी नजर पड़ी, तो वे भी चीखते-चिल्लाते हुए भाग खड़े हुए। अब तो पूरे गाँव में जगार हो गई। लोग चिल्लाकर एक-दूसरे से कह रहे थे, ”पकडिय़ो रे, भागियो रे, पकडिय़ो रे, भागियो रे, भालू आ गया, भालू! सब हाथ में एक-एक लाठी पकड़ लो और मिलकर चलो। जरा एक आदमी आग जलाकर जलती मशाल पकड़ ले। आग देखकर भालू भागेगा, तब उसे दबोचना।’’

ठुनठुनिया समझ गया, अब तो वह जरूर पकड़ा जाएगा। इसलिए उसने मुखौटा उतारकर झटपट कहीं छिपा दिया और फिर घूमता-घामता घर आकर सो गया।

सुबह ठुनठुनिया उठा तो गोमती ने कहा, ”अच्छा हुआ बेटा, तू जल्दी आ गया और सो गया, वरना गाँव वालों पर तो कल बहुत बुरी बीती। सब रात-भर जागते रहे। एक बड़ा-सा जंगली भालू न जाने कहाँ से आ गया! गाँव में कितने ही लोगों ने उसे देखा, पर कोई पकड़ नहीं पाया। अच्छा हुआ कि गाँव में जगार हो गई, नहीं तो क्या पता, एक-दो बच्चों को वह पकड़कर ही ले जाता और…!’’

”ठीक है माँ, पर तेरे ठुनठुनिया का तो वह बाल बाँका नहीं कर सकता था।’’ ठुनठुनिया ने मंद-मंद हँसते हुए कहा।

”क्यों, ऐसा क्यों कह रहा है बेटा?’’ गोमती ने चौंककर कहा, ”क्या तू जंगली भालू से भी बढ़कर है?’’

”हाँ-हाँ, क्यों नहीं?’’ ठुनठुनिया हँसा, ”मैं ठुनठुनिया जो हूँ, ठुनठुनिया! माँ का लाड़ला बेटा। ऐसे बहादुर लड़के पर हमला करने की हिम्मत है भला किसी भालू या चीते की! मेरा तो कोई बड़े से बड़ा दुश्मन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।… फिर भालू तो बेचारा आलू माँगने लगता! मैं उसे आलू खिलाता और झट से पकड़कर पिंजरे में बंद कर लेता।’’

गोमती ने सुना, तो बलैयाँ लेते हुए बोली, ”अच्छा बेटा, अगर वह भालू आता तो क्या तू उससे लड़ लेता?’’

”क्यों नहीं माँ, क्यों नहीं! मैं तो एक झटके में उसका मुखौटा…!’’ कहते-कहते ठुनठुनिया रुक गया।

”कैसा मुखौटा बेटा?’’ गोमती की कुछ समझ में नहीं आया।

”मुखौटा मतलब…मुँह!’’ ठुनठुनिया ने समझाया, ”माँ, तेरे कहने का मतलब यह था कि जैसे ही वह भालू आता, मैं तो सबसे पहले उसका मुँह रस्सी से बाँध देता। फिर उसे पर ठाट से वो सवारी करता, वो…कि बच्चू याद रखता जिंदगी-भर!’’ फिर हँसता हुआ बोला, ”और हाँ, माँ, मैं उस भालू पर बैठकर तेरी सात परिक्रमा करता, पूरी सात!’’

”चुप…!’’ गोमती हँसकर बोली, ”ज्यादा बढ़-चढ़कर बातें नहीं किया करते।’’

और ठुनठुनिया अंगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा हुआ, ताकि अब चलकर गाँव वालों से रात भालू के आने की गरमागरम खबरें सुनकर पूरा मजा ले सके।

जाने कितने दिनों तक गुलजारपुर में उस जंगली भालू की चर्चा चलती रही, जो लपकते-झपकते हुए गाँव की चौपाल पर आया था और वहाँ से रामदीन चाचा के घर की ओर गया। आखिर में सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम करता हुआ, वह गायब हो गया।

”गायब होने से पहले उसने बड़ा जबरदस्त नाच दिखाया था और उसके पैरों में चाँदी के बड़े-बड़े और खूबसूरत छल्ले भी थे, जो बिजली की तरह चम-चम-चम चमक रहे थे! अजीब-सी डरावनी छन-छन-छन और टंकार हो रही थी…!’’ मुखिया ने कसम खाकर यह बात कही थी। यों किसी-किसी का यह भी कहना था कि वह भालू नहीं, कोई राक्षस था जो जादू से भालू की शक्ल धारण करके आया था। किसी को उसमें भगवान् राम और हनुमान के बूढ़े मित्र जाबावान की छाया दिखाई दी। जबकि गंगी ताई का कहना था, ”यह रावण था, रावण जो कलियुग में रूप बदलकर आया है। बड़ा भीषण संकट आ गया गुलजारपुर गाँव पर तो!’’

किसी को लगा कि वह भालू नहीं, सिर्फ भालू की डरावनी छाया थी। जरूर पड़ोसी गाँव के लोगों ने गुलजारपुर गाँव के लोगों को डराने के लिए कोई जादू-मंतर किया है! किसी-किसी को इसके पीछे गाँव के मोटेराम पंडित जी का भी हाथ लगा।

एक-दो ने कहा, ”नहीं भाई, हमें तो लगता है, यह वही भालू है जो कुछ महीने पहले पड़ोसी गाँव के दो बच्चों को उठाकर ले गया। यहाँ भी आया तो इसी इरादे से था, पर अच्छा हुआ कि राम जी की कृपा से जगार हो गई। तो एक बड़ी दुर्घटना होते-होते टल गई, वरना तो गाँव में किसी-न-किसी पर आफत आनी ही थी!’’

ठुनठुनिया गौर से सबकी बातें सुनता और कभी इसकी, कभी उसकी बात पर हाँ-हूँ कर देता। असली बात बताकर क्या उसे लोगों से मार खानी थी!

मगर…आखिर एक दिन उस भालू-कांड की पोल खुल ही गई और उसे किसी और न नहीं, खुद ठुनठुनिया ने ही खोला।

असल में गुलजारपुर में हर साल सर्दियों में चाँदनी रात में गाने-बजाने का प्रोग्राम होता था। उसमें गाँव के जमींदार गजराज बाबू भी आते थे, साथ ही शहर के बड़े-बड़े लोग भी आते थे। इनमें अफसर, वकील, लेखक, कलाकार, प्रोफेसर, पत्रकार, नेता सभी होते थे। अच्छी रौनक लगती थी। तरह-तरह के मजेदार कार्यक्रम होते। कोई गाने-बजाने का कार्यक्रम पेश करता तो कोई अनोखा नाच नाचकर दिखाता। पुराने लोकगीत और राग-रागिनियाँ गाई जातीं। नए-नए गीत भी खुद बनाकर पेश किए जाते। छोटे-छोटे मजेदार नाटक भी होते थे। कोई बाँसुरी, कोई ढोल, कोई तुरही बजाकर अपनी कला पेश करता। सबसे बढिय़ा प्रोग्राम दिखाने वाले को इनाम भी दिया जाता।

ठुनठुनिया बोला, ”माँ-माँ, मैं भी इस बार चाँदनी रात वाले मेले में भाग लूँगा।’’

”ठीक है बेटा।’’ गोमती ने कहा।

पर ठुनठुनिया कुछ ज्यादा ही उत्साह में था। बोला, ”सिर्फ ठीक कहने से काम नहीं चलेगा माँ! आशीर्वाद दे कि इस साल मुझे ही पहला इनाम मिले।’’

इस पर ठुनठुनिया की माँ ने हैरान होकर कहा, ”अरे, चाँदनी मेले का पहला इनाम तुझे कैसे मिल सकता है बेटे? तुझे तो इतना अच्छा नाच-गाना आता नहीं है। वहाँ तो एक से बढ़कर एक नचैया और धुरंधर कलाकार आएँगे। एक-से-एक अच्छे कार्यक्रम होंगे। लोगों के पास बहुत पैसा, बहुत साधन हैं, जबकि तेरे पास तो एक ढंग की पोशाक तक नहीं है, तो फिर…?’’

”चिंता न कर माँ, मैं इस बार ऐसा नाच दिखाऊँगा और ऐसी बढिय़ा पोशाक पहनकर दिखाऊँगा कि तू खुद चकरा जाएगी। हो सकता है, तू मुझे पहचान भी न पाए।’’ ठुनठुनिया ने हँसते हुए कहा।

”अच्छा, चल-चल, ज्यादा बातें न बना। भला ऐसा भी हो सकता है कि माँ अपने बेटे को ही न पहचान पाए!’’ गोमती ने हँसते हुए कहा।

”हो सकता है माँ, हो सकता है!’’ कहकर ठुनठुनिया नाचा। खूब मस्ती में नाचा और देर तक नाचता ही रहा। माँ हैरानी से उसे देख रही थी।

शाम के समय ठुनठुनिया घर से बाहर आकर खुले मैदान में टहलने लगा। फिर टहलते-टहलते उसके कदम गाँव के तालाब की ओर बढ़ गए। अचानक उसका ध्यान बरगद के उस पेड़ की ओर गया जिसमें ऊपर की घनी डालियों के बीच उसने भालू का मुखौटा छिपाकर रखा था।

”देखूँ, कहीं कोई उसे ले तो नहीं गया?’’ कहकर ठुनठुनिया एक मैले कपड़े में लिपटे उस मुखौटे को तलाशने लगा। एक पल, दो पल, तीन…और आश्‍चर्य कि वह वहाँ था! सचमुच बरगद की ऊँची डाली पर वह ज्यों-का-त्यों लिपटा पड़ा था।

ठुनठुनिया को अचंभा हुआ, ‘क्या गजब है, भला किसी का ध्यान इधर गया ही नहीं! पर चलो, अब यही मेरे काम आएगा। समझो कि मेरा पहला इनाम पक्का!’

ठुनठुनिया ने उसी समय वह मुखौटा बगल में दबाया और अपने दोस्त मीतू के घर की ओर चल पड़ा। मीतू से उसे काली पोशाक और काले जूते लेने थे, वरना उसके बगैर खेल में पूरा मजा कैसे आता! भालू वाला काला मुखौटा ले जाकर भी उसे मीतू के पास रख दिया।

मीतू का बंगलानुमा बड़ा-सा तिमंजिला घर था। खुद मीतू का अपना कमरा भी बहुत बड़ा था। वहाँ से तैयार होकर आसानी से मेले में पहुँचा जा सकता था।

और सचमुच उस रात ठुनठुनिया ने जब भालू का मुखौटा, काले कपड़े और काले जूते पहनकर अपनी कला दिखाई, तो वह कोई छोटा-मोटा नहीं, पूरा विशालकाय जंगली भालू ही लग रहा था।

पहले तो मीतू के कमरे में ही ठुनठुनिया दोस्तों के बीच अपनी नृत्य-कला का प्रदर्शन करता रहा। फिर दोस्तों के साथ ही अजब अंदाज में नाचता-कूदता, उछलता और किलकारियाँ भरता मेले में पहुँचा। सभी यह अनोखा भालू देखकर सहम गए और एक ओर छिटक गए।

इसके बाद ठुनठुनिया ने मंच पर अपना अनोखा नाच दिखाना शुरू किया। वह इतनी मस्ती से नाच रहा था कि सचमुच का भालू ही लगता था। उसका पैर उठाने, मटकने, गरदन हिलाने का अंदाज, सबमें ऐसी प्यारी कला थी कि लगता था, जंगल से अभी-अभी आकर कोई सचमुच का भालू अपना रंग बिखरा रहा है। उसकी हर अदा पर देखने वाले झूम-झूम उठते थे। गजराज बाबू और उनके दोस्त तो बार-बार ‘वाह! वाह!’ कर रहे थे।

इसके बाद ठुनठुनिया ने ठुमके लगा-लगाकर यह अनोखा गाना भी सुनाया :

भालू रे भालू!

अम्माँ, मैं तेरा भालू!

अभी-अभी चलकर जंगल से आया भालू,

ला खिला दे, ला खिला दे, दो-चार आलू!

अम्माँ, मैं नहीं टालू,

अम्माँ, मैं नहीं कालू,

अम्माँ, मैं तेरा भालू…!

जब ठुनठुनिया का नाच बंद हुआ तो देर तक चारों तरफ तालियाँ बजती रहीं। इसके बाद पूरी की पूरी भीड़ ने बिल्कुल ठुनठुनिया के भालू वाले अंदाज में ही नाचना और थिरकना शुरू कर दिया। सब मिलाकर गा रहे थे—

”भालू रे भालू! अम्माँ, मैं तेरा भालू!/अभी-अभी चलकर जंगल से आया भालू,/ला खिला दे, ला खिला दे दो-चार आलू!/अम्माँ, मैं नहीं टालू,/अम्माँ, मैं नहीं कालू,/अम्माँ, मैं तेरा भालू!’’ बड़ी देर तक सभी में यही नाच-रंग चला। आयोजकों की बहुत प्रार्थना के बाद लोग थमे।

इसके बाद और भी कार्यक्रम हुए। कई लोग तरह-तरह के रंग-बिरंगे कपड़े और गहने पहनकर नाच दिखाने आए। अजीबोगरीब मुखौटों वाले नाच हुए। हँसी-मजाक से भरपूर नाटक भी हुए। पर ठुनठुनिया ने भालू बनकर जो मजा बाँध दिया था, उसका मुकाबला कोई और नहीं कर पाया।

और सचमुच भालू बनकर ठुनठुनिया इतना बदल गया था कि और तो और, खुद गोमती भी उसे नहीं पहचान पाई थी। पर बाद में जब ठुनठुनिया का नाम लेकर इनाम की घोषणा हुई और खुद गजराज बाबू ने अपने हाथ से उसे चाँदी की थाली और एक मैडल इनाम में दिया, तो गोमती ने पहचाना—अरे, तो यह ठुनठुनिया ही था जो भालू बना हुआ था!

ठुनठुनिया को जो मैडल दिया गया, वह भी चाँदी का था। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था—’गुलजारपुर का रत्न’। उस मैडल को एक सुंदर-से काले धागे में पिरोया गया था। गजराज बाबू के कहने पर ठुनठुनिया ने उस मैडल को गले में हार की तरह पहना, तो खूब जोर से तालियाँ बजी।

फिर ठुनठुनिया से गजराज बाबू ने कहा, ”भई, ठुनठुनिया, तुम भी कुछ कहो!’’

इस पर ठुनठुनिया ने कहा, ”पुरस्कार पाकर मैं खुश हूँ। पर…मुझसे बढ़कर खुशी मेरी माँ को होगी। मैंने कल उससे कहा तो उसे यकीन नहीं हो रहा था। माँ का कहना था—’रे ठुनठुनिया, तेरे पास तो ढंग की पोशाक तक नहीं है! तू भला कैसे इनाम जीतेगा?’पर अब उसने देख लिया होगा कि उसके बेटे की जो पोशाक है, उसका मुकाबला तो बेशकीमती रंग-बिरंगी पोशाकें भी नहीं कर सकतीं।’’

लोग हैरानी से ठुनठुनिया की बातें सुन रहे थे।

इसके बाद ठुनठुनिया ने कहा, ”अगली बार अपनी कला और निखार सकूँ, आप सब इसका आशीर्वाद दीजिए। हाँ, अपने एक अपराध की क्षमा आप सब लोगों से माँगता हूँ। अभी कुछ रोज पहले गाँव की चौपाल पर जो भालू आया था और जिसने गाँव के बहुत से लोगों के साथ-साथ चाचा रामदीन को भी डरा दिया था, वह सचमुच का भालू नहीं, मैं ही था। और मैंने यही पोशाक पहनी थी, जिसे देखकर सभी को भालू नजर आने लगा। मगर यह पोशाक मुझे मिली कहाँ से, इसका भी एक किस्सा है। यह पोशाक मुझे जंगल में एक पेड़ के नीचे मिली थी और मैंने सोचा, जरा देखूँ, इसे पहनकर मैं कैसा लगता हूँ? आप सबको मेरे कारण परेशानी हुई, इसके लिए माफी चाहता हूँ। पर सच तो यह है कि उसी दिन मेरे मन में आया कि अगर इस मुखौटे को पहनकर मैं ‘भालू-नाच’ नाचूँ तो इनाम जीत सकता हूँ। और आज सचमुच मेरा सपना पूरा हो गया…’’

”हाँ, और एक बात गजराज बाबू जी से भी कहनी है। उनके हाथों से इनाम पाकर मुझे अच्छा लगा, पर उनसे पहली दफा मुझे यह इनाम नहीं मिला है। कई बरस पहले होली मेले में उन्होंने मुझे दस रुपये का एक खरखरा नोट इनाम में दिया था, जिससे मैंने में खूब सारी चीजें ली थीं और पहली बार चरखी वाले झूले पर झूला था। वह इनाम मुझे गजराज बाबू ने क्यों दिया, इसकी याद नहीं दिलाऊँगा, क्योंकि आपमें से बहुत से लोग जानते ही हैं। गजराज बाबू को भी अब याद आ गया होगा कि मजाक-मजाक में उनका नाम ‘हाथी बाबू’ कैसे पड़ गया! अगर उन्हें बुरा लगा हो, तो उनसे भी मैं माफी माँगता हूँ।’’

ठुनठुनिया जब बोलकर मंच से उतरा, तो देर तक पंडाल में तालियाँ बजती रहीं। गजराज बाबू ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और खूब जोरों से पीठ थपथपाई। इतने में गोमती भी वहाँ आ गई। ठुनठुनिया ने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए तो मारे खुशी के उसकी आँखों में आँसू छलछला आए।

चुन्नू की फौज : उमेश कुमार

तमालपुर गांव बहुत सुंदर था। गांव के चारों तरफ खूब हरियाली थी। यहां सब लोग मिल-जुलकर रहते थे। तुषार के पिता रामप्रसाद खेती करते थे। वह सीधे-साधे इनसान थे। जो कुछ खेती से बचता, उसी से गुजारा कर लेते थे। तुषार पढऩे में होशियार था। पढ़ाई के साथ-साथ वह पिता के काम में जब-तब मदद करता रहता।

तुषार के घर में चूहे बहुत हो गए थे। चूहे थे भी बहुत शरारती। दिनभर इधर-उधर उछल-कूद करते रहते। जो भी सामान मिलता कुतर देते। कोई जा रहा हो तो उसके ऊपर कूद जाते। वह डर के मारे चिल्‍लाता तो सारे के सारे छिप जाते। घर के सभी लोग चूहों से परेशान थे। उन्‍होंने तुषार की नई किताब ही काट डाली। इससे तुषार को बहुत गुस्‍सा आया।

‘चूहों का कुछ न कुछ तो करना होगा।‘ तुषार ने सोचा। अगले दिन से वह चूहों के लिए रोटी के छोटे-छोटे टुकडे़ करके रखने लगा।

आश्‍चर्य ! अब चूहों ने तुषार के घर में नुकसान करना बंद कर दिया। वह दिनभर भाग-दौड़ करते रहते, लेकिन कोई सामान कुतरते नहीं।

तुषार रोज स्कूल जाने से पहले चूहों के लिए रोटी रख्‍ देता। स्कूल से आकर जब वह देखता तो चूहे रोटी खा चुके होते थे। उसे यह सोचकर खुशी होती कि चूहे उसके मन की बात समझ गए हैं।

एक दिन तुषार आंगन में बैठा होमवर्क कर रहा था। उसे अचानक कुट-कुट की आवाज सुनाई दी। उसने देखा कि  एक गोलमटोल चूहा रोटी का टुकड़ा कुतर-कुतर कर खा रहा है। बीच-बीच में वह तुषार की तरफ आंखें मटका कर देखता। थोड़े ही दिन में उस चूहे की तुषार से दोस्ती हो गई।

शुरू-शुरू में तो वह तुषार से थोड़ा डरता भी था। धीरे-धीरे वह उससे अच्छी तरह घुल-मिल गया। चूहा तुषार के साथ खूब खेलता। तुषार पढ़ाई करता तो वह आकर उसकी मेज पर बैठ जाता।

तुषार ने सोचा कि हर किसी का नाम होता है। क्यों ने चूहे का भी एक अच्छा सा नाम रखा जाए। बहुत सोचने के बाद तुषार ने चूहे का नाम रखा- चुन्नू।

शाम को चूहा उसके पास आया। तुषार ने उससे कहा, ”मैंने तुम्हारा नाम रखा है चुन्नू। क्या तुमको पसंद है?’’

चूहे ने अपनी आंखें टिमटिमाईं और नाचने लगा। तुषार समझ गया कि उसे यह नाम पसंद है।

उसने चुन्नू से कहा, ”अब मैं तुम्हें इसी नाम से पुकारा करूँगा।’’

चुन्नू ने मुंह मटकाया और भाग गया। तुषार भी अपना होमवर्क पूरा करने में जुट गया।

अब तो तुषार और चुन्नू की दोस्ती खासी पक्की हो गई थी। तुषार चुन्नू कहकर पुकारता तो वह आकर नाचने लगता। स्कूल से आकर तुषार काफी देर तक चुन्नू के साथ खेलता।

इस बार बरसात न होने के कारण गांव में भयंकर सूखा पड़ा। फसल बरबाद हो गई। लोगों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई। किसानों के पास जो अनाज था, वह थोड़े ही दिन में खत्म हो गया।

ऐसे में धनीराम की मौज आ गई। धनीराम जमींदार था। उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। गांव के लोग मुसीबत में उसी से कर्जा लिया करते थे। कर्जा देते समय धनीराम किसान से जमीन गिरवी रखवा लिया करता था। वह शर्त रखता कि अगर एक वर्ष में पैसे वापस नहीं दिए तो जमीन उसकी हो जाएगी। वह एक वर्ष में ही मूल से ज्यादा ब्याज कर देता। इस कारण अधिकतर किसान कर्जा नहीं चुका पाते थे। कर्जा न चुकाने पर वह लोगों की जमीन हड़प लेता। उसने इसी तरह से गांव के कई लोगों की जमीन हड़प ली थी। इस बार रामप्रसाद को भी मजबूरी में उससे कर्जा लेना पड़ा गया। हालात कुछ ऐसे बने कि एक साल बीत जाने पर रामप्रसाद कर्जा नहीं चुका पाए।

धनीराम ने शर्त के मुताबिक उनसे जमीन देने का कहा। रामप्रसाद ने कुछ समय की मोहलत मांगी, लेकिन धनीराम नहीं माना। उसने रामप्रसाद की जमीन पर कब्जा कर लिया। रामप्रसाद बहुत उदास थे। रोहित ने उनसे दुखी होने का कारण पूछा। रामप्रसाद बताना नहीं चाहते थे, लेकिन तुषार के जिद करने पर उसे बता दिया।

तुषार किताब लेकर बैठा तो था, लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लग रहा था। चुन्नू थोड़ी देर में उसके पास आ गया। वह तुषार की मेज के चारों तरफ चक्कर लगाने लगा। तुषार कुछ नहीं बोला। वैसे ही उदास बैठा रहा। चुन्‍नू उसके कंधे पर चढ़ गया और पंजे मारने लगा। तुषार ने उसे प्‍यार से सहलाया और कहा, ‘‘दोस्‍त, बड़ी मुश्किल हो गई है। धनीराम ने जमीन के कागज लेकर कब्‍जा कर लिया है। समझ में नहीं आ रहा कि क्‍या किया जाए।’’

यह सुनकर चुन्‍नू भी उदास हो गया। वह थोड़ी देर मुंह लटकाए बैठा रहा। अचानक उसने मेज पर छलांग लगाई और एक कागज को पंजों से उठा लिया। वह उसे लेकर इधर-उधर दौड़ने लगा। तुषार समझ गया कि चुन्नू क्या पूछ रहा है। तुषार ने चुन्नू को कंधे पर बैठाया और धनीराम का घर दिखा दिया।

और तब तमालपुर में वह दृश्य दिखाई दिया, जिसे पहले किसी ने न देखा और न सुना था। इसकी किसी ने कल्‍पना भी नहीं की थी। अंधेरा होते ही चुन्नू अपनी फौज के साथ धनीराम के घर जा पहुंचा। धनीराम सो चुका था। चुन्‍नू उसके मुंह के पास गया और अपनी पूंछ उसकी नाक में डाल दी। धनीराम को जोरदार छींक आई। वह करवट बदलकर सो गया। चुन्‍नू ने अपनी फौज को इशारा कर दिया। कुछ सिपाही उसके साथ पलंग पर चढ़ गए और बाकी काम पर लग गए। कोई उसकी पेंट में घूस गया तो कोई कमीज के नीचे। धनीराम की नींद खुल गई। उसने देखा कि पलंग पर बहुत सारे चूहे हैं। वह डर के मारे चीख उठा। वह एक चूहे को कमीज से निकालता तो दूसरा पेंट में घूस जाता। वह चूहों से बचने के लिए कुर्सी पर चढ़ तो चुन्‍नू की फौज वहां भी पहुंच जाती। धनीराम कमरे के इस कोने से उस कोने तक भाग-भाग कर परेशान हो गया। चुन्‍नू की फौज के बाकी सिपाहियों ने धनीराम के घर में रखे सारे कागजात कुतर दिए। इनमें किसानों की जमीन के कागजात भी थे।

सुबह हो गई थी। धनीराम ने रो-पीटकर गांव वालों की इसकी सूचना दी। सभी यह सुनकर हैरान थे। तुषार भी वहां खड़ा था और धनीराम की हालत देख, मन ही मन मुसकरा रहा था।

चुन्नू को अभी चैन कहा हुआ। वह अपनी फौज के साथ दूसरी रात भी धनीराम के घर पर जा पहुंचा। धनीराम तोंद फुलाकर तेज-तेज खर्राटे ले रहा था। चुन्नू उसकी छाती पर बैठ गया, उसने अपनी पूंछ धनीराम की नाक में फि‍र घुसा दी। मानो भूचाल आ गया हो। धनीराम को इतनी तेज छींक आई कि चुन्नू जमीन पर जाकर पड़ा। वह जैसे-तैसे संभल पाया। चुन्नू के सिपाही धनीराम की पेंट में घुस गए। धनीराम इधर से उधर उछलता-कूदता फिरता रहा। बहुत देर तक धनीराम को तंग करने के बाद चुन्नू फौज के साथ वापस घर चला गया।

चुन्नू की फौज ने लगातार एक सप्ताह तक धनीराम के घर जाकर धमाल मचाया। धनीराम इतना परेशान हो गया कि उसने गांव छोडऩे का निर्णय कर लिया। एक दिन गांव वाले सुबह सोकर उठे तो देखा धनीराम अपने परिवार के साथ गांव छोड़कर जा चुका था।

तुषार चुन्नू की तरफ देखकर मुसकराया। चुन्नू ने नाच-नाचकर तुषार को खूब हंसाया।