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अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

अनुप्रिया की बाल कवि‍ताएं

anupriya-picबचपन

बचपन कच्ची पगडण्डी
मानो उड़ती धूल
घने अँधेरे जंगल में
ये उजास के फूल

बादल काला दौड़  लगाये
आसमान के पार
ताक -झाँक के  देख रहा है
धरती  का संसार

नए परिंदे ढूँढ़ रहे  हैं
असमानी वो रंग
छोड़ कहाँ  आये वो सपने
जाने किसके संग

नन्हे-मुन्ने बना रहे हैं
एक नयी पहचान
फ़ैल रही है हर  होठों पर
मीठी सी  मुस्कान।

एक कहानी प्यारी

सोच रहा हूँ लिख ही  डालूं
एक कहानी प्यारी
होंगे  उसमे भालू ,बन्दर
और गोरैया न्यारी

एक छोटा बागीचा होगा
होंगे उसमें फूल
मीठे फल और सुन्दर तितली
अरे! गया मैं भूल

एक नदी बहती होगी
और होगा उसमें  पानी
नन्हें बन्दर करते होंगे
फिर कोई शैतानी

भालू और गोरैया की
होगी पक्की यारी
भेदभाव ये नहीं जानते
ना ही दुनियादारी

गर्मी के दिन

ऊँघ रहा है सूरज ओढ़े
नीला आसमान
तितली के होठों पर आयी
मीठी सी मुस्कान

करे  ठिठोली  बादल प्यारा
हवा झूमकर गाए
कानाफूसी करे परिन्दे
गर्मी के दिन आये

घर की हर मुंडेर पर
लगी धूप सुस्ताने
धमाचौकड़ी करने बच्चे
ढूँढे़ नए ठिकाने

अरे  गिलहरी भागी देखो
कौवे करते शोर
जाग गए हैं सपने सारे
गर्मी की एक भोर।

हो गयी अब तो भोर

ब से बन्दर चढ़ा डाल पर
क से कोयल गाए
भ से भालू रहा देखता
म से मछली खाए

च से चमचा लेकर भागी
ग से गुड़िया रानी
घ से घोड़ा रहा हाँफता
दे दो  प से पानी

फ से सुन्दर फूल खिले
त से तितली मुस्काये
छ से छतरी पीली लेकर
ल से लड़की जाए

ख से खरहा झट से दौड़ा
ज से जंगल की ओर
न से नींद से जागो तुम सब
हो गयी अब तो भोर।

बरखा रानी

बरखा रानी अब तो आओ
गर्मी बहुत सताए
सबका अब है हाल बुरा
ये पल -पल बढती जाए

आकर अपनी रिमझिम बूंदें
हम पर तुम बरसाओ
काले बादल के कंधे पर
चढ़कर बस आ जाओ

झुलस रहे हैं पंछी ,पेड़
है उदास जग सारा
अपने हाथों से इनमे
भर दो जीवन दोबारा …..

बचपन

ढूँढा बहुत सलोना बचपन
लगता खेल खिलौना बचपन
सख्त हुई इस दुनिया में है
नरम -नरम बिछौना बचपन
उम्मीदों की पगडंडी पर
पीछे -पीछे छौना बचपन
घर की दीवारों के भीतर
प्यारा सा हर कोना  बचपन
मेरे -तेरे सबके भीतर
थोड़ा सा तो हो ना बन
कंप्यूटर की इस नगरी में
है पत्ते का  दोना  बचपन

बादल प्यारे

बादल प्यारे आसमान के
क्या तुम भी सुस्ताते हो
पंख नहीं है लेकिन फिर भी
कैसे तुम उड़ जाते हो

कोई परिंदा आकर तुमसे
करता भी है बात
या फिर यूँ ही अकेले ही
कट जाती है रात

काले बादल कहो जरा
है भीतर कितना पानी
तुम भी नटखट मेरे जैसे
करते हो शैतानी

डाँट  तुम्हें भी पड़ती क्या
अपनी अम्मा से बोलो
हम तो हैं अब दोस्त बने
मुझसे तो राज ये खोलो

सच कहता हूँ अम्मा

जब भी देखूं मुझको यह

संसार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
हर बार नया लगता है

रोज नया लगता है सूरज
और रात भी नयी-नयी
रोज चमकते तारों का
अंबार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

लगती नयी किताबें अपनी
जूते  और जुराबें अपनी
लगता है स्कूल नया
हर यार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

पापा की मुस्कान नयी
और दीदी का झुंझलाना
दादा -दादी का मीठा
दुलार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

संजीव ठाकुर  की बाल कवि‍ताएं

रोते रहते

रोंदूमल जी रोंदूमल
रोते रहते रोंदूमल
बात कोई हो या न हो
बस रोएँगे रोंदूमल !

मम्मी ने कॉफी न दी
पापा ने टॉफी न दी
फिर तो बात बतंगड़ कर
रोएँगे ही रोंदूमल !

किसी से मुँह की खाएँगे
चाहे खुद धकियाएंगे
अपने मन की न कर पाए
तो रोएँगे रोंदूमल !

जा छुपते

चोर एक न उनसे भागे
भौंक –भौंक कर कुत्ते हारे
बच्चों को तो खूब डरा दें
क्योंकि वे होते बेचारे !

गली–मुहल्ले के कुत्ते
होते हैं बीमार
सड़ी-गली चीजें ही हरदम
वो खाते हैं यार !

घर में पलने वाले कुत्ते
ऐयाशी करते
ए सी में सोते हैं
नाज़ों –नखरों में पलते !

चोर देखकर उनकी भी
सिट्टी होती गुम
जा छुपते मालिक के पीछे
नीचे करके दुम !

बहुत मजा आता है

जाड़े की गुनगुनी धूप में
पैर पसारे लेटे
या फिर खाते मूँगफली के
दाने बैठे–बैठे
बहुत मजा आता है भाई 
बहुत मजा आता है !

मक्के की रोटी पर थोड़ा
साग सरसों का लेकर
या फिर गज़क करारे वाले
थोड़ा–थोड़ा खाकर
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

औ अलाव के चारों ओर
बैठे गप–शप करते
बुद्धन काका के किस्से
लंबे–लंबे सुनते
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

गधे का गाना

गधे ने गाया गाना
उल्लू ने पहचाना
बंदर ने उसे माना
मेंढक हुआ दीवाना ।

कोयल ने मारा ताना–
‘तुझे न म्यूजिक आना ‘
गधे को फर्क पड़ा न
गाता रह गया गाना !

चलो चलें हम मॉल

हम जाएंगे शिप्रा मॉल
कोकू ! रख दो अपनी बॉल

रिक्शे से हम जाएंगे
मैक्डोनल्ड में खाएंगेचलने वाली सीढ़ी पर
हम तुम चढ़ते जाएंगे
अंदर मिलती आइसक्रीम
दोनों जमकर खाएंगे ।चम-चम करती दुकानों से
मैं ले लूँगी सुंदर ड्रेस
ले लेना तुम दो–एक गाड़ी
खूब लगाना फिर तुम रेस ।कोकू ! जल्द सँवारो बाल
हम चल रहे शिप्रा मॉल !

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा
अब कैसे नहलाओगी ?
क्या चावल धो पाओगी ?
दाल कहाँ से लाओगी ?
झाड़ू–पोंछा, बर्तन कपड़े
तुम कैसे कर पाओगी ?
सूख रहे जो पौधे बाहर
उनका क्या कर पाओगी ?
कहीं आ गया कोई घर पर
उनको क्या दे पाओगी ?
कितनी बार कहा पापा ने
बात कभी न मानोगी
हो जाएगी खाली टंकी
तब जाकर पछताओगी !

बाहर जाकर खेलो

खेल रहा है बाहर पिंटू
तुम भी घर से निकलो चिंटू !बाहर जाओ, दौड़ो, कूदो
क्या टी॰ वी से चिपके हो ?
कंप्यूटर से खेल रहे तुम
पके आम से पिचके हो !
बाहर खेल रहे हैं बच्चे
तुम उन सबसे छिपके हो ?बाहर जाकर खेलो चिंटू
बाहर खेल रहा है पिंटू !

मुझे सुहाता

मुझे सुहाता मेरी अम्मा
दीपों का त्योहार
अंधकार का दुश्मन होता
दीपों का त्योहार ।

लोग जलाते हैं दीये
घर में और गली में
तरह–तरह बल्ब लगते
घर में और गली में

‘दीपावली मुबारक हो ‘
सब कहते हैं सबको
‘आओ एक मिठाई खा लो ‘
सब कहते हैं सबको !

बस फट–फट आवाज़ पटाखों की
न सुहाती मुझको
बारूद की दुर्गंध ज़रा भी
नहीं सुहाती मुझको !

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें

अनुप्रि‍या

अनुप्रि‍या

सुपौल, बिहार में जन्‍मीं अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें नंदन, स्नेह, बाल भारती, जनसत्ता, नन्हे सम्राट, जनसंदेह टाइम्स, नेशनल दुनिया, बाल भास्कर, साहित्य अमृत, बाल वाटिका, द्वीप लहरी, बाल बिगुल आदि‍ पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी चार बाल कवि‍तायें-

मुस्कान पुरानी

होठों पर आ जाये फिर से
वो मुस्कान पुरानी
भीगा मन बहता जाए
वो बचपन की  शैतानी

पगडंडी की दौड़ हो
या छुक-छुक वो रेल
झगड़ा छोटी बात पर
मीठी-मीठी   मेल

झूला आम की डाल का
नीम की ठंडी छाँव
नटखट सी  नादानियाँ
अपनेपन सा गाँव

कच्चे-पक्के  बेर की
खट्टी -मीठी चाह
थाम के वो परछाईयाँ
चल दूँ फिर उस राह।

नींद

चँदा बादल संग खेलता
शोर मचाते तारे
तू भी सो जा कहती मम्मा
सो गए अब तो सारे

आसमान ने ओढ़ लिया है
काला सा क्यूँ रंग
नींद बाँटती सबको देखो
सपने रंग-बिरंग

ऊँघ रहे हैं परदे-खिड़की
तकिया और रजाई
सोने चला मैं भी अब तो
नींद मुझे भी आई।

जन्मदिन

आजा चंदा तू  संग मेरे
खा ले हलवा पूरी
करनी है तुमसे मुझको
बातें बहुत जरूरी

पापा लाए कई किताबें
मम्मी गुड़िया प्यारी
और भैया ने जन्मदिन की
कर ली हर तैयारी

आकर देखो जरा यहाँ
है कितना हंगामा
अब न देर करो तुम बस
आ जाओ न मामा।

किस्सा

मुनिया सुना रही है किस्सा
मुन्ना सुनता ध्यान से
एक कबूतर उड़कर आया
बनिए की दुकान से

उसके पंजे में था थैला
और थैले में दाने
रखकर थैला भूल गया वो
किसके घर में जाने

चल मम्मी से लेकर चावल
उसको दे दें थोड़े
हाथ पकड़ कर एक दूजे का
मुनिया मुन्ना  दौड़े।

जिसका काम उसी को साजे : वि‍वेक भटनागर

युवा कवि‍-पत्रकार वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

एक गधा था चंपक वन में
ढेंचू जिसका नाम
सीधा-सादा, भोला-भाला
करता था सब काम।

एक बार वह लगा सोचने
मैं भी गाना गाऊँ
जंगल के सब जानवरों पर
अपनी धाक जमाऊँ
लेकिन गधा अकेले कैसे
अपना राग अलापे
यही सोचकर गधा बेचारा
मन ही मन में झेंपे
कालू कौए को जब उसने
मन की बात बताई
कालू बोला- ढेंचू भाई
इसमें कौन बुराई
हम दोनों मिलकर गाएँगे
अपना नाम करेंगे
कोयल-मैना के गाने की
हम छुट्टी कर देंगे
मैं काँव-काँव का राग गढ़ूँ
तुम ढेंचू राग बनाना
डूब मरेगा चुल्लू भर में
तानसेन का नाना।

इतने में आ गई लोमड़ी
फिर उनको बहकाने
बोली- तुम तो गा सकते हो
अच्छे-अच्छे गाने
शेर सिंह राजा को जाकर
अपना राग सुनाओ
उनको खुश कर राजसभा में
मंत्रीपद पा जाओ।

अगले दिन था राजसभा में
उन दोनों का गाना
ढेंचू-ढेंचू-काँव-काँव का
बजने लगा तराना
वहाँ उपस्थित सब लोगों ने
कान में उंगली डाली
गाना खत्म हो गया लेकिन
बजी न एक भी ताली
निर्णय दिया शेरसिंह ने तब
कर्कश है यह गान
इससे हो सकता है प्रदूषित
हरा-भरा उद्यान
जाकर इस जंगल के बाहर
तुमको गाना होगा
वरना इस गाने पर तुमको
टैक्स चुकाना होगा।

सुनकर शेरसिंह का निर्णय
हो गये दोनों दंग
जैसे भरी सभा में दोनों
हो गये नंग-धड़ंग।
शेर सिंह की बातें सुनकर
सपने से वे जागे
जिसका काम उसी को साजे
और करे तो डंडा बाजे।

चि‍त्र: अंजलि‍ कुमारी

हिदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की बाल कविताएँ

हिंदी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सुखराम चौबे गुणाकर, कामता प्रसाद गुरु, प. सुदर्शनाचार्य और राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन की बाल कवि‍ताएं-

देल छे आए : श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी-पिज्जी कुछ ना लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए?
का है मेला बला खिलौना,
कलाकद लड्डू का दोना।
चू चू गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुइया,
चुनिया मुनिया मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना मेली गैया,
का मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ का से आए,
आ-आ चिज्जी क्यों न लाए?

कोकिल : महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

हिम्मत : बालमुकुंद गुप्त

‘कर नहीं सकते हैं’ कभी मुँह से कहो न यार,
क्यों नहीं कर सकते उसे, यह सोचो एक बार।
कर सकते हैं दूसरे पाँच जने जो कार,
उसके करने में भला तुम हो क्यों लाचार।
हो, मत हो, पर दीजिए हिम्मत कभी न हार,
नहीं बने एक बार तो कीजे सौ-सौ बार।
‘कर नहीं सकते’ कहके अपना मुँह न फुलाओ,
ऐसी हलकी बात कभी जी पर मत लाओ।
सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलस के मारे,
वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे।
देखो उनके लच्छन जो ऐसा बकते हैं,
फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं?
जो जल में नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे,
जो गिरने से हिचके उसको चलना कौन सिखावे।
जल में उतर तैरना सीखो दौड़ो, सीखो चाल,
‘निश्चय कर सकते हैं’ कहकर सदा रहो खुशहाल।

बनावटी सिंह : सुखराम चौबे गुणाकर

गधा एक था मोटा ताजा
बन बैठा वह वन का राजा!
कहीं सिंह का चमड़ा पाया,
चट वैसा ही रूप बनाया!
सबको खूब डराता वन में,
फिरता आप निडर हो मन में,
एक रोज जो जी में आई,
लगा गरजने धूम मचाई!
सबके आगे ज्यों ही बोला,
भेद गधेपन का सब खोला!
फिर तो झट सबने आ पकड़ा,
खूब मार छीना वह चमड़ा!
देता गधा न धोखा भाई,
तो उसकी होती न ठुकाई!

छड़ी हमारी : कामता प्रसाद ‘गुरु’

यह सुदर छड़ी हमारी,
है हमें बहुत ही प्यारी।
यह खेल समय हर्षाती,
मन में है साहस लाती,
तन में अति जोर जगाती,
उपयोगी है यह भारी।
हम घोड़ी इसे बनाएँ,
कम घेरे में दौड़ाएँ,
कुछ ऐब न इसमें पाएँ
है इसकी तेज सवारी।
यह जीन लगाम न चाहे,
कुछ काम न दाने का है,
गति में यह तेज हवा है,
यह घोड़ी जग से न्यारी।
यह टेक छलाँग लगाएँ,
उँगली पर इसे नचाएँ,
हम इससे चक्कर खाएँ,
हम हल्के हैं यह भारी।
हम केवट हैं बन जाते,
इसकी पतवार बनाते,
नैया को पार लगाते,
लेते हैं कर सरकारी।
इसको बंदूक बनाकर,
हम रख लेते कधे पर,
फिर छोड़ इसे गोली भर,
है कितनी भरकम भारी।
अधे को बाट बताए,
लगड़े का पैर बढ़ाए,
बूढ़े का भार उठाए,
वह छड़ी परम उपकारी।
लकड़ी यह बन से आई,
इसमें है भरी भलाई,
है इसकी सत्य बड़ाई,
इससे हमने यह धारी।

हाऊ और बिलाऊ : प. सुदर्शनाचार्य

किसी गाँव में थे दो भाई–
हाऊ और बिलाऊ,
दोनों में था बडा़ बिलाऊ
छोटा भाई हाऊ,
था धनवान बिलाऊ पर था
वह स्वभाव का खोटा,
था गरीब, पर चतुर बहुत था
हाऊ भाई छोटा।
गाय-बैल थे बहुत
बिलाऊ के घर रुपया-पैसा,
पर गरीब हाऊ के केवल
था एक बूढ़ा भैंसा।

बंदर सभा : राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन

हियॉं की बातें हियनै रह गईं अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!
सौ जोजन लबा अरु चौड़ा अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!
जब सगिरा मैदनवा भरिगा पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले हाथ-पाँव से ताल बजाय!
इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली थामे मल्लू-सा को हाथ!
ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात!

(नीरजा स्‍मृति‍ बाल साहि‍त्‍य न्‍यास, सहारनपुर से प्रकाशि‍त और बाल साहि‍त्‍यकार कृष्‍ण शलभ द्वारा संपादि‍त पुस्‍तक बचपन एक समंदर से साभार)

अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की चार बाल कवि‍ताएं

खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास’ के रचि‍यता अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’(15 अप्रैल, 1965-16 मार्च, 1947) का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग तक है। उन्‍होंने पर्याप्‍त मात्रा में बाल साहि‍त्‍य का भी सृजन कि‍या-

एक तिनका

मैं घमडों में भरा ऐंठा हुआ
एक दिन जब था मुडेरे पर खड़ा,
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आख में मेरी पड़ा।
मैं झिझक उट्ठा, हुआ बेचैन-सा
लाल होकर आख भी दुखने लगी,
मूठ देने लोग कपड़े की लगे
ऐंठ बेचारी दबे पावों भागी।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया
तब समझ ने यों मुझे ताने दिए,
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

एक बूंद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में,
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में।
बह गई उस काल एक ऐसी हवा
वो समदर ओर आई अनमनी,
एक सुदर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती बनी।
लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
कितु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो।
बीती रात कमल-दल फूले,
उनके ऊपर भौंरे झूले।
चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर,
बहने लगी हवा अति सुदर।
नभ में न्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।
भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
ऐसा सुदर समय न खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

चंदा मामा

चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।
मैं तैरा मृग छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।
उसकी उछल कूछ देखूँगा,
उसको चाटूँगा चूमूँगा।

दामोदर अग्रवाल की कुछ प्रसिद्ध बाल कविताएँ

प्रसिद्ध कवि‍ दामोदर अग्रवाल (4 जनवरी, 1932, वाराणसी, उत्तर प्रदेश – 1 जनवरी, 2009, बंगलौर) का हिंदी बाल कविता की समृद्धि‍ में महत्ववपूर्ण योगदान है। उन‍की बालकोचि‍त भाव-मुद्राओं में लि‍खीं बाल कवि‍ताएं बेहद मनमोहक हैं-

कोई लाके मुझे दे

कुछ रंग भरे फूल
कुछ खट्ठे-मीठे फल,
थोड़ी बाँसुरी की धुन
थोड़ा जमुना का जल—
कोई लाके मुझे दे!
एक सोना जड़ा दिन
एक रूपों भरी रात,
एक फूलों भरा गीत
एक गीतों भरी बात—
कोई लाके मुझे दे!
एक छाता छाँव का
एक धूप की घड़ी,
एक बादलों का कोट
एक दूब की छड़ी—
कोई लाके मुझे दे!
एक छुट्टी वाला दिन
एक अच्छी सी किताब,
एक मीठा सा सवाल
एक नन्हा सा जवाब—
कोई लाके मुझे दे!

बस्ते में गुलमोहर

जाने कौन रख गया मेरे
बस्ते में गुलमोहर?
छुट्टी का जो घंटा बोला
मैंने अपना बस्ता खोला,
मह-मह, मह-मह महक रहा
बस्ते में गुलमोहर!
गुलमोहर अंदर से झाँका
लगा मुझे वह इतना बाँका,
जी चाहा, मैं भी बन जाऊँ
बस्ते में गुलमोहर!
गुलमोहर जो चिडिय़ा होते
चाहे वो नीड़ों में सोते,
पर वे दाना खाने आते
बस्ते में गुलमोहर!
सब संगी, सब साथी आओ
अपने-अपने बस्ते लाओ
ले जाओ सब भर-भर अपने
बस्ते में गुलमोहर!

गागरी में क्या है?

मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है?
गागरी में बिजुरिया, गागरी में पानी,
गागरी में हरियाली, खेल धानी-धानी।
गागरी में सात रंग, इंद्र की सभा है
मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है?
गागरी में कुहु-कुहु, गागरी में कोयल
गागरी में छमा-छम मोरनी की पायल।
गागरी में मिसरी का घुला ज्यों डला है,
मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है?
गागरी में मेघ राग, गागरी में मलहार,
गागरी में चंपा-जूही फूलों की भरमार।
मेघों की गागरी में क्या नहीं भरा है?
मेघ राजा, मेघ राजा, गागरी में क्या है।

जादू की एक गठरी

जादू की एक गठरी लाऊँ
बच्चों में बच्चा बन जाऊँ!
एक जेब से शेर निकालूँ
एक जेब से भालू,
शेर बहुत भोला-भाला हो
भालू हो झगड़ालू।
दोनों को झटपट खा जाऊँ,
जादू की जो गठरी लाऊँ।
चूहा एक निकल गठरी से
हाथी को दौड़ाए,
हाथी डर से थर-थर काँपे
बिल में जा छुप जाए।
चूहे का फोटो छपवाऊँ,
जादू की जो गठरी लाऊँ।
एक जेब से पिज्जा निकले
एक जेब से डोसा,
परियाँ पिज्जा खाएँ, तोता
माँगे गरम समोसा।

टीचर जी

टीचर जी, ओ टीचर जी
गिनती खूब सिखाओ जी,
लेकिन पहले बल्बों में
बिजली तो ले आओ जी!
सूरज जी, ओ सूरज जी
कभी देर से आओ जी,
रोज पहुँचकर, सुबह सुबह
यों ना मुझे जगाओ जी!
छुट्टी जी, ओ छुट्टी जी
लो यह टॉफी खाओ जी,
बस, इतनी सी विनती है
जल्दी-जल्दी आओ जी।
पापा जी, ओ पापा जी
बहुत न रोब जमाओ जी,
दूध कटोरी में पीकर
चम्मच से खिलाओ जी।

एक था तोता

एक था तोता, एक था तीतर,
टाँय टूँ, टाँय टूँ दोनों आए भीतर।
टाँय टूँ, टाँय टूँ दे दो एक दाना,
मैंने कहा, पहले सुनाओ एक गाना।
टाँय टूँ, टाँय टूँ दोनों लगे गाने,
गाने क्या लगे, मेरे कान लगे खाने।
दाने कुछ फेंक दिए मैंने उनके आगे,
टाँय टूँ, टाँय टूँ करते हुए भागे।

सुपरमैन हैं मेरे पापा : विवेक भटनागर

युवा कवि‍ वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
अक्सर चीतों से भिड़ जाते
शेरों से न तनिक घबराते
भालू से कुश्ती में जीते
हाथी तक का दिल दहलाते
मगरमच्छ का जबड़ा नापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

भूत-प्रेत भी उनसे डरते
सारे उनकी सेवा करते
सभी चुड़ैलें झाड़ू देतीं
सारे राक्षस पानी भरते
उनमें पापा का डर व्यापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।

आसमान तक सीढ़ी रखते
खूब दूर तक चढ़ते जाते
इंद्रलोक में जाकर वह तो
इंद्रदेव से हाथ मिलाते
उनसे डर इंद्रासन कांपा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।