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मनुष्यता के पक्ष में है वजाहत का लेखन : प्रो बेनिवाल

अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाते असग़र वजाहत।

नई दिल्ली : लेखक का सम्मान करना अकादमिकी का प्राथमिक कर्तव्य है। बड़े लेखक भाषाओं के दायरे में नहीं देखे जाते। असग़र वजाहत का लेखन उन्हें भारत के संदर्भ में सचमुच बड़ा लेखक बनाता है।  गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ वि‍श्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘बनास जन’ के लोकार्पण समारोह में मीडिया संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर अनूप बेनिवाल ने कहा कि बहुत कम लेखक होते हैं जिन्हें पढ़कर सचमुच जीवन भर प्रेरणा मिलती हो। असग़र वजाहत ऐसे बड़े लेखक हैं जिन्होंने भारत विभाजन पर ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ को मार्मिक कृति लिखकर मनुष्यता के पक्ष में एक महान कृति की रचना की है। आयोजन में मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर आशुतोष मोहन ने असग़र वजाहत के साथ अपने रंगमंच के अनुभव सुनाए और कहा कि उनके साथ रहकर ही जाना जा सकता है कि बड़ा लेखक जीवन में कितना सहज और सरल होता है। प्रोफेसर मोहन ने असग़र वजाहत के आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद’ को इधर लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया। विश्वविद्यालय में रंगमंच के सलाहाकार अनूप त्रिवेदी ने ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ के मंचन में प्रयुक्‍त दो गीत सुनाए तथा हबीब तनवीर के प्रसिद्ध तराने ‘अब रहिये बैठ इस जंगल में’ की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

‘बनास जन’ के सम्पादक पल्लव ने असग़र वजाहत पर विशेषांक निकालने के कारण रखते हुए कहा कि वे हमारी भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति के भी बड़े लेखक हैं, जिन्होंने चार विधाओं में प्रथम श्रेणी की रचनाएं लिखी हैं। उन्होंने कहा कि एक सच्‍चा लेखक असल में अपने समय और समाज से अभिन्न होता है और यह अभिन्नता उसे बेचैन बनाती है। असग़र वजाहत की बेचैनी हमारे भारतीय समाज की बेचैन आवाज़ ही तो है। अंगरेजी विभाग के प्रोफेसर विवेक सचदेव ने असग़र वजाहत के लेखन के महत्त्व पर कहा कि उनका लेखन पढ़ना भारत को सही अर्थों में जानना है।

इससे पहले उदयपुर से आए प्रोफेसर प्रदीप त्रिखा, रोहतक से आए प्रोफेसर जयवीर हुड्डा, प्रोफेसर अनूप बेनिवाल, शिक्षा अधिष्ठाता प्रोफेसर संगीता चौहान, अरबिंदो कालेज के प्रो राजकुमार वर्मा सहित अतिथियों ने अंक का विधिवत लोकार्पण किया। लेखकीय वक्तव्य देते हुए असग़र वजाहत ने अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाए। अंगरेजी विभाग के डॉ समी अहमद खान ने असग़र वजाहत पर इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया एक स्लाइड शो दिखाया। आयोजन में डॉ नरेश वत्स, डॉ राजीव रंजन, डॉ शुभांकु कोचर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी तथा अध्यापक उपस्थित थे।

फोटो एवं रिपोर्ट – रोहित कुमार

साहित्य के पथ पर ‘बनास जन’ : राजेश कुमार

Banaas Jan 7

भारत के पश्‍चिमी भाग के मरूस्थल प्रान्त में बहने वाली एक नदी का नाम है ‘बनास’। और इसी नाम से साहित्य-संस्कृति की बूँद-बूँद का संचयन करती चलती है पत्रिाका ‘बनास-जन’। इसके अंक-7, जनवरी-मार्च, 2014 में 16 शीर्षकों के अन्तर्गत- आत्मकथ्य, कविताएँ, शोध लेख, पुस्तक समीक्षा, कहानियाँ, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, साक्षात्कार आदि प्रस्तुत किये गए है। कुल मिलाकर साहित्य की प्रत्येक विधा के ऊपर इसमें उनके चाहने वालों के लिए कुछ-न-कुछ है।

‘हमसफरनामा’ में संस्मरण रखा गया है। ‘हमसफर’ का अर्थ है ‘जो साथ चले’ यानी जीवन पथ पर साथ निभाने वाले, इसमें अजित कुमार का निर्मला जैन पर संस्मरण है। ‘समीक्षायन’ शीर्षक के अन्तर्गत ग्यारह पुस्तक समीक्षाएं हैं।

‘बनास जन’ के इस अंक में लाल्टू द्वारा लिखित पहला ही लेख ‘आत्मकथ्य एवं कविताएँ’ पढ़ते-पढ़ते जब उनकी कविताओं से गुजरते हैं, तो ‘कितने भरपूर सायादार पेड़, कितनी शोर मचाती नदियाँ, अंधेरी रातों के कितने चाँद-सितारे, कितनी खुशबू भरे रंगीन-सादा फूलों’ से होकर पाठक गुजरता है, कहना कठिन है। इन कविताओं में ‘थोड़ी देर ईश्वर’ नामक कविता में भावनाएँ अपने श्रेष्ठ रूप में उठती चलती है- ‘‘सूक्ष्म कविता बन तुम्हारे खून में घुलता/अंततः तुम्हारे दिल को छूता… यह तुमसे दूर होने की थकान है… यह ब्राह्मांड की तकलीफ है।’’ इसी प्रकार पत्रिका के इस अंक में छपी दोनों कहानियाँ- प्रज्ञा की ‘बरबाद’ नहीं आबाद’ ओर पुंज प्रकाश की ‘फूलचन बाबू सोना हगेंगे।’ अपने कथ्य को व्यंजित करती कहानियाँ हैं। जहाँ पहली कहानी में मेहनती सुनीता का जीवन संघर्ष बयाँ किया गया है, जिसमें कमाल की हिम्मत, जीजिविषा और मानवीयता से भरा मन है, यह एक दलित जाति की स्त्री का विमर्श भी है। तो दूसरी कहानी में फूलचन बाबू का अवसाद में रूपान्तरित होता जीवन बयान है।

सरिता शर्मा का यात्रा-वृतांत ‘मुखर पत्थरों और गूँजते मंदिरों में भटकता मन’ ओडिसा प्रान्त की सैर पाठक को घर बैठे ही करा देता है। भुवनेश्‍वर, पुरी, कोणार्क आदि के बारे में ऐसे स्पन्दन युक्त चित्र यहाँ लेखिका द्वारा खींच दिये गए हैं कि राहे निगाह हर बिम्ब मानों उतर आया हो स्वयं के अनुभव के भू-भाग पर। इस यात्रा वृतान्त के शीर्षक में ही लेखिका का कवि और यायावर होना हमें प्राप्त हो जाता है, ‘मुखर पत्थरों’ पत्थर कब बोलें होंगे, जब लेखिका ने उनसे बात की होगी- के उनका गुफ्रतगू ए अंदाज है वो, के हर संगे दर भी उससे बात करता है।’ ‘गूँजते मंदिरों’ और ‘भटकता मन’ इन तीन शब्द युग्मों से बुना गया शीर्षक ही अपने आप में एक हायकू कविता है। लेख के भीतर जाने का दरवाजा खोले तो ओडिसा के मंदिर उनका शिल्प, मूर्तियों का निर्माण कौशल, उनका इतिहास सबका एक बॉयस्कोप दिखता है। और साथ ही लेखिका का वो भटकता मन भी जो पूरे लेख में मशाल थामे चल रहा है।

‘बनास जन’ के इस अंक में अक्षय कुमार का लेख सूक्ष्म सम्वेदनाओं के शाब्दिक मूर्तिकार और शब्दों को वैचारिकता में जड़ कर कविता के असर में बल उत्पन्न करने वाले ए.के. रामानुजन (1929-1993) आधुनिक भारतीय अंग्रेज़ी कवि के बारे में है जिसमें उनकी छः कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है। इस अंक में अजेय, विवेक निराला, देवयानी, स्नेहमयी चौधरी, श्याम कश्यप की कविताएँ ली गई हैं। देवयानी की ‘उम्मीद’ कविता छोटी और असरदार लगी- ‘उम्मीद की आखिरी बूंद कहीं न थी/तभी मेंने देखा/बच्चे की आँख में।’

‘हम अहले सफा मर्दूदे हरम’ नामक लेख में हिमांशु पंड्या आलमशाह खान की कहानियों की एक अच्छी आलोचना पाठक के सामने प्रस्तुत करते हैं। लेख में उसकी चौकन्नी नज़र आलमशाह की कहानियों में खिंची उस सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को दिखती चलती है जिसके चलते उन कहानियों का मनुष्य सामाजिक पददलितता की ढलान पर लुढकता जाता है और किस तरह एक पूरे आदमी को खरोंच-खरोंचकर आध कर दिया गया है। दिलीप शाक्य की ग़ज़लें पढ़ते हुए मन को अपने पास ठहरा लेती है। हबीब कैफी की भी तीन ग़ज़ले अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।

कृष्णदत्त शर्मा का ‘काव्य की रचना प्रक्रिया एक ज्ञानवर्धक लेख है और इसी प्रकार शंभुनाथ का ‘साम्राज्यवाद, वैश्वीकरण और राष्ट्रीय पुनर्जागरण तथा गरिमा श्रीवास्तव का ‘सीमोन द बोउवार’ अथवा ध्वल जयसवाल का ‘जनक्षेत्र की अवधरणा, कृष्ण कुमार पासवान का ‘फोर्ट विलियम कालेज और अमिता पाण्डेय का ‘रघुवीर सहाय की कहानियों में शिल्प प्रविधियाँ के ऊपर लिखे तीनों शोध लेख भी इसी ज्ञानवर्धन के क्षेत्र में रख सकते हैं।

बनास विशेष में बसंत त्रिपाठी द्वारा लिखित ‘मेरे पिता एक प्रवासी उडि़या मज़दूर की जीवन गाथा है। और सबसे अन्त में ‘पेनड्राइव समय कविता पर रमाकान्त राय की टिप्पणी है। समीक्षायन में पुस्तक समीक्षाएँ है। इन ग्यारह लेखों की समीक्षित पुस्तकों में हर विधा की पुस्तके है। इनमें निरंजन देव शर्मा के लेख में कविता संग्रह केन्‍द्र में है, तो वहीं राम विनय शर्मा के लेख में विस्थापन की समस्या पर शैलेय का लघु उपन्यास ‘हलफनामा। ‘यात्राओं का आनन्द’ नामक लेख में राधेश्‍याम ने यात्राओं से संबंधित चार पुस्तकों की समीक्षाएं की हैं। इसी प्रकार अन्य लेखों का भी चाहे वह इंदु कुमारी का कथाकार अमरकान्त केन्‍द्रि‍त पुस्तक की समीक्षा ‘ठेठ ढंग का सिद्ध कथाकार हो, दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा लिखा लेख हो या पफर गणपत तेली, अम्‍बि‍का, निशांत, रामविनय शर्मा, प्रतीक सिंह व गजेन्‍द्र मीणा आदि के लेख सब अपना महत्त्व रखते हैं। पत्रिका के अंक में कहीं-कहीं प्रूफ की गुंजाइश अब भी शेष है।

समीक्षित पत्रिका- बनास जन
जनवरी-मार्च, 2014,  अंक-7, वर्ष-3
सम्पादक– पल्लव
75रुपये, 100रुपये (डाक से मंगाने के लि‍ए)

पता : 393, डी.डी.ए., ब्लॉ‍क सी एण्‍ड डी
कनि‍ष्क अपार्टमेंट, शालीमार बाग, दि‍ल्ली-110088
दूरभाष : 011-27498876
ईमेल- banaasjan@gmail.com