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दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं : दिनेश कर्नाटक

shekshik dakhal

इस बार मई माह में देहरादून में प्राथमिक शि‍क्षकों के मॉड्यूल निर्माण हेतु आयोजित एक कार्यशाला में प्रतिभाग किया। वहां एस. सी. आर. टी., उत्तराखंड की प्रवक्ता हेमलता तिवारी हमारे समूह की संयोजक थीं। हेमलता दीदी उत्साही शि‍क्षक प्रशि‍क्षिका हैं। उनकी शि‍क्षण प्रक्रिया तथा बाल मनोविज्ञान को लेकर समझ साफ है। जब समझ साफ होती है तो आत्मविश्वास होना स्वाभाविक है। हेमलता दीदी समूह के समक्ष हंसते-मुस्कराते हुए आतीं। खुलकर बातें करती। इसका असर यह होता कि प्रतिभागी जबरदस्ती ओढ़ी जाने वाली गंभीरता से मुक्त होकर सहज हो जाते और अपनी बात खुलकर कहने लगते। अपने इस अंदाज से हेमलता दीदी कटे-कटे रहने वाले प्रतिभागियों को भी बगैर कुछ कहे कार्य करने के लिए प्रेरित करतीं। एक ओर जहां वे माहौल को बिलकुल सहज बना देती थीं, वहीं अपनी कार्ययोजना पर दृढ़ता तथा गंभीरता से काम करतीं। इस प्रकार वे अपने शैक्षणिक उद्देश्‍य की ओर तेजी से बढ़ती जातीं।

इस उदाहरण से एक बात स्पष्‍ट है कि सीखना-सिखाना भयमुक्त, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल में ही अच्छा हो सकता है। भयभीत तथा तनावग्रस्त शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं अपने विद्यार्थियों को प्रेरित नहीं कर सकते। वे उन्हें भय और तनाव ही दे सकते हैं। परिवार तथा शि‍क्षा से जुड़े लोगों का यह दायित्व है कि वे अपने आस-पास सहज, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल की रचना करें। अच्छा शि‍क्षण; अच्छी कहानी, अच्छी कविता तथा अच्छे गीत की तरह विद्यार्थी में आत्मविश्‍वास पैदा करता है। उसे बोलने, भागीदारी तथा प्रश्‍न करने के लिए प्रेरित करता है। बच्चों के मूल्यांकन की एक बड़ी कसौटी उनका मौलिक प्रश्‍न करना है। पढ़े हुए को उगल देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि पढ़े हुए से प्रश्‍नों का जन्म लेना। अगर एक शि‍क्षक के पढ़ाने के बाद बच्चे सवाल करने लगते हैं तो यह शि‍क्षक की सफलता है।

बच्चे जन्म के साथ अपार ऊर्जा, उत्साह तथा जिज्ञासा लेकर जन्म लेते हैं। यह गुण हर बच्चे में जन्मजात होता है। अगर इन गुणों को सही दिशा मिल जाती है तो ये बच्चे अपने घर-परिवार, समाज-देश को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी ऊर्जा, उत्साह और जिज्ञासा क्षीण पड़ने लगती है। इसके कारण हमारे परिवार तथा समाज में विद्यमान हैं। कम बच्चे ही होते हैं, जो अपने शि‍क्षकों, अभिभावकों की सहायता से अपने रास्ते को पहचानकर पूरी तन्मयता से उस दिशा की ओर बढ़ चलते हैं। शेष बच्चों को उनकी राह खोजने में सहायता करने वाला न तो घर में होता है, न स्कूल में और न समाज में। ऐसे दिशाविहीन नागरिकों से घर, समाज तथा देश भी दिशाहीनता का शि‍कार हो जाता है।

बच्चों के साथ कैसा बर्ताव किया जाए ? इस बारे में हमारे वहां न तो घर-परिवार और न ही देश-समाज की कोई स्पष्‍ट समझ है। अधिकांश लोग मौका मिलने पर स्त्रियों और बच्चों से अच्छा व्यवहार नहीं करते। हमारे वहां विवाह लोगों के लिए स्त्री-पुरुष मिलन की स्वीकृत संस्था भर होती है। लोग इसके साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियों से परिचित नहीं होते। उनके पास अपने घर तथा बच्चों के लिए कोई योजना नहीं होती। जैसे ही जिम्मेदारियों का बोझ पड़ना शुरू होता है, वे मैदान छोड़कर भागने लगते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में बच्चों का आगमन अनामंत्रित अतिथि की तरह होता है। वे उनके आगमन को स्वीकार नहीं कर पाते और बच्चों को मां-बाप का सहज प्रेम तथा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। वे जन्म के बाद से ही बच्चों का उत्पीड़न करने लगते हैं। उत्पीड़ित बच्चे उत्पीड़ित समाज की रचना करते हैं। वे जहां भी जाते हैं, आधे-अधूरे मन के साथ जाते हैं। न वे स्कूल में रम पाते हैं और न समाज में। आत्मकेन्द्रित समाज के लिए बच्चों की जिज्ञासा, उनके सवालों का कोई अर्थ नहीं होता। उनके सवालों को वे परेशान करने की चीज समझते हैं। अतः डांटकर या मारकर चुप करा देते हैं।

घर के बाद बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की दूसरी महत्वपूर्ण संस्था स्कूल है। स्कूल तथा वहां के शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं बच्चों के प्रति सकारात्मक होंगे तो बच्चे खुलकर उनसे सवाल कर सकेंगे। उनकी जिज्ञासा को पंख लगेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बहुत दिन हुए सोशल मीडिया में किसी प्रतिष्‍ठि‍त स्कूल के हॉस्टल में रह रहे बच्चों के साथ वहां के वार्डन द्वारा की जा रही मारपीट का एक वीडियो देखा था। वार्डन सामने खड़े प्राइमरी स्तर के बच्चों को एक-एक कर सामने लाता, उन्हें बेंत से पीटता, फिर उठाकर फैंक देता। बच्चों के साथ मारपीट का वह वीडियो दिल दहला देने वाला था। लोगों ने अपने बच्चों को अच्छी शि‍क्षा के लिए उस तथाकथित नामीगिरामी स्कूल में भेजा होगा और वहां उनके साथ इस तरह का अमानवीय बर्ताव हो रहा है। वह वार्डन बच्चों को भयभीत करके नियंत्रण में रखना चाहता है। वही नहीं हम सब भी यही करते हैं। हम सब को यही तरीका सबसे आसान लगता है। बच्चे से बात करने, उसकी समस्या को ध्यान से सुनकर समाधान निकालने के लिए न तो हमारे पास, न हमारी शि‍क्षा व्यवस्था में और न ही हमारे पाठ्यक्रम में समय है, न ही धैर्य है और न ही इस पद्धति पर हमें यकीन है। परिणाम यह है कि हम अपने निजी तथा सार्वजनिक जीवन में भय के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

बच्चे के जीवन में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं का महत्व माता-पिता के बराबर है। जितना समय वे घर में रहते हैं, लगभग उतना ही समय वे स्कूल में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं तथा अपने साथियों के साथ बिताते हैं। स्कूल न सिर्फ बच्चों के शैक्षिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, मानसिक तथा कलात्मक उन्नयन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उनके सामाजीकरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि बच्चों के प्रति इतनी तरह से जिम्मेदार स्कूल इन भूमिकाओं को निभाने के लिए तैयार है ? क्या स्कूल को अपनी इन जिम्मेदारियों का एहसास है ? जवाब में यही कहा जा सकता है कि अपने देश में स्कूल की अवधारणा कई तरह के उद्देश्‍यों में उलझकर रह गई है। कहीं इसका उद्देश्‍य पैसा कमाना है। कहीं अपने धर्म या मत का प्रचार करना। कहीं किसी खास उद्देश्‍य के लिए दीक्षित करना, जैसे सैनिक स्कूल, धार्मिक शि‍क्षा आदि-आदि। कहीं शि‍क्षा दिए जाने का दिखावा भर किया जाता है।

शि‍क्षा से जुड़े लोग;  मुख्यतः शि‍क्षक या प्रशासक भी क्या शि‍क्षा की अवधारणा को समझते हुए इस क्षेत्र में हैं या केवल नौकरी या आजीविका के लिए ? सच तो यह है कि हमारे समाज का मूल ध्येय किसी भी तरह पैसा कमाना हो चुका है। उसमें भी शार्टकट से कमाने का प्रचलन अधिक होता जा रहा है। यानी मेहनत,  उद्यमशीलता तथा रचनात्मकता का कोई महत्व नहीं है। हमारे समाज में अभी भी लोग केवल इंजीनियर, डॉक्टर, व्यापारी, क्रिकेट का खिलाड़ी, अभिनेता, आईएएस, पीसीएस, मैनेजर ही बनना चाहते हैं। बहुत कम लोग हैं जो शि‍क्षा, कृषि‍, उद्यमीता आदि क्षेत्रों में जाना चाहते हैं। शि‍क्षा में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है जो जाना तो कहीं और चाहते थे, लेकिन वहां नहीं पहुंच पाने के कारण यहां आ गए। यहां आने में कोई बुराई नहीं है। जब आ ही गए हैं तो यहीं का हो जाना चाहिए। लेकिन अधिकांश लोग यहां के नहीं हो पाते। वे इस पेशे को आजीविका के रूप में निभाते चले जाते हैं।

नौकरी करना और किसी पेशे को जीना दो अलग बातें हैं। नौकरी करने वाला किसी काम से आत्मिक रूप से नहीं जुड़ता। वह निर्लिप्त भाव से दिया गया काम कर देता है। शि‍क्षा का कार्य केवल शरीर ही नहीं आत्मा की भी संलिप्तता की मांग करता है। जब शि‍क्षक अपनी कक्षा के बच्चों से जुड़ने की कोशि‍श करता है तो बच्चे भी उससे जुड़ने लगते हैं। तब सीखना-सीखाना मिला-जुला कार्य हो जाता है। जब अपने विद्यार्थियों से जुड़ने की इच्छा न हो तो शि‍क्षण की प्रक्रिया नीरस हो जाती है। एक शि‍क्षक को अपने आप से हमेशा पूछना चाहिए कि क्या वह अपने विद्यार्थियों से अपने बच्चों की तरह पेश आता है ? क्या वह जब अपने विद्यार्थियों के पास जाता है तो उसी तरह से आह्लादित होता है, जैसे वह अपने बच्चों से मिलने के समय होता है ? अगर वह अपने शि‍क्षण को इस तरह करता है तो वह शि‍क्षण का आनंद उठाता है। जब शि‍क्षक आनंद में होता है तो उसके विद्यार्थियों को भी पढ़ने-लिखने में आनंद आता है। तब बच्चे सीखने लगते हैं और प्रश्‍न करने लगते हैं। दोनों के बीच आत्मीयता उत्पन्न होती है।

हिन्दी से एम.ए. करने के दौरान प्रोफेसर ओमप्रकाश गंगोला से मेरा कुछ ऐसा आत्मीय संबंध बना, जो आज 22-23 साल बाद भी कायम है। बात इतनी थी कि वे अपने विषय भारतीय तथा पश्‍चि‍मी काव्यशास्त्र से प्रेम करते थे और मुझे उस विषय को जानने-समझने की ललक थी। उनके लैक्चर के दौरान मैं उनसे तमाम सवाल करता और वे बड़े उत्साह से मेरी जिज्ञासाओं को शांत करते। मैं उनके जैसा गुरु पाकर आनंदित था और वे शायद एक जिज्ञासु छात्र को पाकर प्रसन्न थे। कई बार तो पूरी क्लास हम दोनों के प्रश्‍नोत्तर को सुनते रहती थी। प्राध्यापक और भी थे, मगर उनसे वह आत्मीयता नहीं बनी। कारण साफ है, उनमें से अधिकांश लोग सिर्फ नौकरी करते थे। वे क्लास में आते और अपना लैक्चर देकर चलते बनते। उन्हें किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं थी। उनकी पाठ योजना पहले से तय होती थी। वे संवाद से बचना चाहते थे। उनका सारा ध्यान कोर्स को पूरा करने में होता था। ऐसे में स्वाभाविक है कि वे प्रश्‍न और संवाद को पसंद नहीं करते। शायद तभी उनमें से अधिकांश को मैं भूल चुका हूं।

बच्चे प्रश्‍न नहीं करते क्योंकि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्‍न नहीं करते। हम प्रश्‍न करते तो बच्चे भी प्रश्‍न करते।

(शैक्षि‍क दखल, जुलाई 2016 से साभार)  

प्रेमचंद के बहाने

premchand

31 जुलाई को कालजयी कथाकार प्रेमचंद का जन्‍मदि‍न है। आज जि‍स तरह से साम्प्रदायि‍कता, जाति‍वाद, अमानवीयता, सामाजि‍क असमानता, संवेदनहीनता बढ़ रही है, ऐसे में प्रेमचंद हमें रास्ता दि‍खा सकते हैं। सरल, सहज और मानवीय सरोकारों से परि‍पूर्ण लेखन के कारण आज भी प्रेमचंद सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

हमारी योजना है कि‍ प्रेमचंद जयंती पर पठन–पाठन को लेकर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाएं। जैसे— उनकी कहानि‍यां का पाठ हो, मंचन हो और उन पर चर्चा हो। पुस्तक मेले, पोस्टर प्रदर्शनी, काव्य पाठ जैसे आयोजन भी कि‍ए जाएं। यह जरूरी है कि‍ इन कार्यक्रमों में बच्चों की सक्रि‍य भागेदारी हो।

इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए जाने इसलि‍ए जरूरी हैं कि‍ अच्छा साहि‍त्य बच्चों में रचनाशीलता का वि‍कास करता है। आज रवीन्द्रनाथ टैगोर देश और दुनि‍या में जाने जाते हैं, तो इसका श्रेय रवीन्द्र जयंती के अवसर पर ऐसे साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों को ही जाता है। न केवल प्रेमचंद, बल्कि अन्य साहि‍त्यकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और दूसरे महापुरुषों की जयंती पर इस तरह के आयोजन कि‍ए जाएं। इसका फायदा आने वाली पीढ़ी को भी मि‍लेगा।

संचार माध्यमों की दूसरी प्राथमि‍कताओं, कैरि‍यर की आपाधापी और समाज में गैर–साहि‍त्यि‍क माहौल के कारण बडे और बच्चे सभी साहि‍त्य से दूर होते जा रहे हैं। यह बेहद भयानक स्थि‍ति‍ है।

दोस्तो, अनुरोध है कि‍ आप सभी अपने–अपने स्तर पर इस तरह के कार्यक्रम आयोजि‍त करें। देशभर के अलावा वि‍देशों में रह रहे साथी भी इसमें सहयोग दें। अगर सार्वजनि‍क स्तर पर कोई कार्यक्रम नहीं कर पा रहे हैं, तो कम–से–कम अपने आसपास के बच्चों या अपने परि‍जनों के साथ बैठकर प्रेमचंद की कि‍सी कहानी का पाठ या उनके जीवन प्रसंग की चर्चा तो कर ही सकते हैं।

लेखक मंच के लि‍ए आपके कार्यक्रम की रि‍पोर्ट का इंतजार रहेगा।

धन्यवाद सहि‍त
अनुराग
9871344533
anuraglekhak@gmail.com

हिंसक होते बच्चे : अनुराग

child-crime

फर्रुखाबाद के एक गांव में प्राइमरी स्कूल की तीसरी और पहली क्लास के बच्चों में किसी बात को लेकर मारपीट हो गई। तीसरी के छात्र ने पहली के छात्र को प्लास्टिक की बोरी में बंदकर लात-घूंसों से जमकर पीटा। इससे उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। वहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। दिल्ली के जामिया नगर में रहने वाली 15 वर्षीय किशोरी घर से 38 लाख रुपये चोरी कर देहरादून घूमने-फिरने के लिए तीन सहेलियों के साथ रफूचक्कर हो गई। दिल्ली के ही एक स्कूल छात्रों के बीच झगड़ा होने पर छठी कक्षा के एक छात्र के साथ उसके छह सहपाठियों ने कुकर्म किया।

पहले इस तरह की घटनाएं कभी-कभी सुनाई देती थीं, लेकिन अब आए दिन समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं। बच्चों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय है। आने वाला समय इन्हीं बच्चों का होगा, तो हम भला कैसे समाज का निर्माण कर रहे है। बच्चों में बढ़ रही इस हिंसक प्रवृत्ति को क्या केवल कठोर सजा देकर रोका जा सकेगा? बिल्कुल नहीं।

बच्चा सबसे अधिक अपने चारों ओर चल रही गतिविधियों और जो बार-बार देख व सुन रहा है, उनसे सीखता है। बच्चे के सबसे नजदीक है, परिवार। जिन परिवारों में पति-पत्नी में आए दिन बात-बात पर तू-तू मैं-मैं होती है या उनमें से किसी में भी चारित्रिक दुर्बलताएं हैं, उनके बच्चों में दुष्प्रवृत्तियां पनपने की आशंकाएं बहुत अधिक रहती हैं। बच्चे के पहले आदर्श उसके मां-बाप होते हैं और वह सबसे अधिक उन्हीं के निकट रहता है। फिर उनका प्रभाव बच्चे पर न पड़े, यह कैसे हो सकता है।

टेलीविजन घर के सदस्य की तरह हो गया है, जिससे बच्चों का सीधा संपर्क रहता है। टेलीविजन पर जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश में पारिवारिकता, सामाजिकता, राजनीतिक विमर्श, मानवीय सरोकार जैसे गुणों का अभाव है। इनकी जगह पारिवारिक षड्यंत्र, अनैतिक संबंध, विवाहेतर संबंध, हिंसा का बोलबाला है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि बच्चों के नाम पर प्रसारित होने वाले अधि‍कांश कार्यक्रम भी स्तरीय नहीं हैं। इन कार्यक्रमों में बाल प्रवृत्तियों को विकृत रूप में पेश किया जा रहा है। दिन-रात टेलीविजन देख रहे बच्चों के मनमस्तिष्क पर नि‍श्‍चि‍तरूप से इनका कोई प्रभाव पड़ेगा।

फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्‍या करोड़ों में है, जिनमें बच्चों की भी अच्छी-खासी संख्‍या है। आजकल की फिल्मों में सेक्स और हिंसा का मसाला बहुत अधिक पड़ता है। द्विअर्थी संवाद तो फिल्म के लिए जरूरी जैसे हो गए हैं। कलात्मकता का स्थान हिंसा और नग्नता ने ले लिया है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कुछ तथाकथित कला समीक्षक इस हिंसा और नग्नता का सिनेमा के विकास और प्रगति‍शीलता के रूप में पेश कर रहे हैं। कुछ साल पहले तक शहरों में मुख्‍यधारा की फिल्मों के अलावा सी-ग्रेड फिल्में लगती थीं, जिन्हें लोग चोरी-छिपे देखने जाते थे। उन फिल्मों में बीच-बीच में मिनट-दो मिनट के सेक्स के दृश्य होते थे और इनमें मुख्‍यधारा के कलाकार काम नहीं करते थे। अब उन सी-ग्रेड फि‍ल्‍मों से ज्‍यादा फूहड़ता, अश्‍लीलता और हिंसा तो धारावाहि‍कों में दि‍खाई जा रही है, फि‍ल्‍मों की क्‍या बात करें। आज की फिल्मों के सफल नायक का डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, पत्रकार या वैज्ञानिक न बन पाने का अफसोस नहीं होता, उसकी इच्छा पोर्न फिल्मों में काम करने की होती है। पोर्न फिल्मों के कलाकारों पर चर्चा होती है।

पहले फिल्मों एक खलनायक और दूसरा नायक होता था, लेकिन अब नायक ही खलनायक है। वह वर्षों पहले फख्र से घोषणा कर चुका है- नायक नहीं खलनायक हूं मैं। वह हिंसक है, छिछोरा है, लंपट है, फूहड़ है, द्विअर्थी संवाद बोलता है, लेकिन फिर भी नायक है। वह हर हाल में अपनी मंजिल (नायिका) पाना चाहता है। वह इसके लिए नायिका को परेशान करता है तथा हर गलत-सही तरीके अपनाता है। और फिर ना-ना करके प्यार तुम्‍हीं से कर बैठे की तर्ज पर नायिका मान जाती है। अब तो आधुनिकता के नाम फिल्मों में नायिका की भूमिका भी सड़क-छाप मवाली जैसे गढ़ी जा रही है।

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विभिन्न उत्पादों के विज्ञापनों की हाल भी जुदा नहीं है। जूते-जुराब से लेकर कंघी तक और पेन से लेकर कार देकर हर विज्ञापन का मकसद है- लड़की या लड़के को रिझाना। क्या दुनिया में यही एक गम बचा है।

राजनीति‍ का हाल भी कोई अच्‍छा नहीं है। हर बार लोकसभा और वि‍धानसभाओं में बड़ी संख्‍या में दागी जनप्रति‍नि‍धि‍ चुनकर आते हैं। इनमें आथिर्क अपराध से लेकर खूनी तथा बलात्‍कार तक के आरोपी होती हैं। लोकसभा और वि‍धानसभाओं में हंगामे आए दि‍न देखने को मि‍लते हैं। नेताओं के बेहूदे बयान और एक-दूसरे के प्रति‍ हलके शब्‍दों को प्रयोग भी उनकी छवि‍ को दागदार ही बनाते हैं।

बच्चों में बड़ रही हिंसक प्रवृत्ति के लिए उन्हें दोष देने के बजाय हमें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे नायक हम उनके लिए गढेंगे, वैसा ही वह खुद को ढाल लेंगे।

बच्‍चों का विज्ञान-बोध : विवेक भटनागर

apne bachche ko den vigyan drishti

आमतौर पर विज्ञान के बारे में धारणा है कि यह बड़ा ही कठिन विषय होता है। यह सिर्फ एक भ्रामक धारणा है। जो ज्ञान हमारी जिंदगी से जुड़ा हो, वह कठिन कैसे हो सकता है? उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते यानी हर वक्‍त, हर गतिविधि में हम विज्ञान को ही जीते हैं। विज्ञान के कठिन होने की धारणा बनने के पीछे हमारी शिक्षा पद्धति की भूमिका हो सकती है, जो बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना उसे विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करती है। बच्चा शुरू से ही कुछ-न-कुछ सीखना शुरू कर देता है। वह जो कुछ भी देखता है, उसे जानने की कोशिश करता है। उसकी उत्सुकता ही उसका वह ज्ञान-बोध है, जो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसके सवाल भी बढ़ते जाते हैं। कुछ का मतलब वह स्वयं समझता है, लेकिन कुछ बातों में जब उसे संशय होता है, तो वह सवाल करता है। इसी में उसके विज्ञान को समझने की दृष्टि छिपी होती है। ऐसे में बच्चे को, उसके सवालों को सुलझाने में अभिभावकों को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा, तभी बच्चे की विज्ञान-दृष्टि बन पाएगी। हाल ही में नैन्सी पाउलू और मोर्गेरी मार्टिन की पुस्तक हिंदी में अनूदित होकर आई है- अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि। आशुतोष उपाध्याय ने इस पुस्तक का बड़ा ही सरल और सुबोध अनुवाद किया है।

आज के बच्चे अलग हैं। हम कह सकते हैं कि उनमें विज्ञान एवं तकनीक का सहज-ज्ञान इन्बिल्ट होता है। लेकिन हम गलती यह करते हैं कि उन्हें अपने बचपन की तरह ट्रीट करते हैं। पुस्तक में लिखा है- ‘माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना है, जो हमारे अपने बचपन से बिल्कुल अलग है। इकीसवीं सदी में इस देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें प्राथमिक कक्षाओं में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का हमसे ज्यादा प्रशिक्षण मिला होगा।’

पुस्तक कहती है कि विज्ञान महज तथ्यों का अंबार नहीं है। तथ्य महज उसका एक हिस्सा हैं। विज्ञान में चार चीजें शामिल हैं। पहली, जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना। दूसरा- घटना की वजह का अंदाजा लगाना। तीसरा, अपने अंदाजे को सही या गलत सिद्ध करने के लिए जांच करना। चौथा, जांच में आए परिणाम का मतलब निकालना। पुस्तक में बच्चों के लिए छोटे-छोटे कई प्रयोग दिए गए हैं, जो घर में ही किए जा सकते हैं और जिनसे विज्ञान के बड़े-बड़े सिद्धांतों को समझा जा सकता है। इन प्रयोगों में अभिभावकों को क्‍या करना चाहिए और बच्चों को क्‍या करना चाहिए, विस्तार से बताया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बच्चों में विज्ञान-दृष्टि और विज्ञान-बोध को बढ़ाने का बेहद सरल प्रयास है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि
लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन
अनुवाद: आशुतोष उपाध्‍याय

मूल्‍य (अजिल्‍द) : 40 रुपये
(सजिल्‍द) : 75 रुपये

प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण, 11 जनवरी 2014 से साभार)

अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि : नैन्सी पाउलू

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‘लेखक मंच’ प्रकाशन की चौथी पुस्‍तक ‘अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि’ अंग्रेजी पुस्‍तक का अनुवाद है। इसके लेखक नैन्सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन हैं। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्याय ने किया है। बच्‍चों को विज्ञान को लेकर जिज्ञासू बनाने की दिशा में यह महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक की भूमिका यहां दी जा रही है-

‘क्यों?’

एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब देने का प्रयास हम माता-पिता हमेशा से करते आए हैं। यह अच्छी बात है कि बच्चे सवाल पूछते हैं– सीखने का इससे बढिय़ा कोई और तरीका नहीं हो सकता। सभी बच्चों के पास सीखने के दो आश्चर्यजनक स्रोत होते हैं– कल्पनाशीलता और उत्सुकता। माता-पिता के रूप में आप अपने बच्चे की कल्पनाशीलता व उत्सुकता को बढ़ावा देकर उसे सीखने के आनन्द से सराबोर कर सकते हैं।

‘अपने बच्चे को दें वैज्ञानिक दृष्टि’ विभिन्न शैक्षिक विषयों पर अभिभावकों के लिए लिखी गई पुस्तक शृंखला की एक कड़ी है, ताकि वे बच्चों की सहज उत्सुकता का जवाब दे सकें। शिक्षण और सीखना महज स्कूल की चारदीवारी के भीतर सम्पन्न होने वाली रहस्यमय गतिविधियाँ नहीं हैं। वे तब भी होती हैं, जब माता-पिता और बच्चे बेहद आसान चीजों को साथ-साथ करते हैं।

उदाहरण के लिए–आप और आपका बच्चा सीखने के लिए किस तरह की गतिविधियाँ कर सकते हैं– धुलने वाले कपड़ों के ढेर से मोजों को उनके जोड़ों के हिसाब से छाँटकर गणित और विज्ञान की गुत्थियाँ सुलझा सकते हैं। साथ मिलकर खाना बना सकते हैं, क्योंकि खाना बनाने से गणित और विज्ञान के अलावा अच्छी सेहत की भी सीख मिलती है। एक-दूसरे को कहानियाँ सुना सकते हैं। कहानी सुनाना पढऩे और लिखने का आधार है (इसके अलावा बीते दिनों की कहानियों को ही तो इतिहास कहते हैं)। आप अपने बच्चे के साथ स्टापू खेल सकते हैं। उछल-कूद वाले इन खेलों से बच्चे गिनती सीखते हैं और जीवनपर्यंत अच्छी सेहत का पाठ भी पढ़ते हैं।

बच्चों के साथ मिलकर कुछ करने से आप समझ जाएँगे कि सीखना मनोरंजक और बेहद महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। ऐसा करके आप अपने बच्चे को पढऩे, सीखने और स्कूल में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि

लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन

अनुवाद : आशुतोष उपाध्‍याय

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

मूल्‍य(अजिल्‍द) : 40 रुपये

(सजिल्‍द) : 75  रुपये

मेरी जिंदगी में बच्चे : सुधीर सुमन

छुटकू बच्चे की शक्ल से मिलती तस्वीर।

लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन को हाल ही में दो बच्चे मि‍ले। ये बच्‍चे जिस तरह से मिले, उसे याद करते हुए लिखा गया लेख-

बच्चे मेरी जिंदगी की ऊर्जा रहे हैं। हमेशा बच्चों के बीच घिरा रहा हूँ। कुछ पढ़ाकू छवि होने के कारण और ज्यादा बच्चों से लगाव होने के कारण अक्सर माता-पिता मुझसे ही उनका नाम रखने की गुजारिश करते थे। करीब 20-25 बच्चों का नामकरण मैंने किया ही होगा। आज भी कोई न कोई ऐसा आग्रह कर ही देता है। कितने शिशु मेरी बाहों में झुलते हुए, मेरे कंधे पर सैर करते हुए बड़े हुए। हमारे यहाँ एक गीत जो बच्चों को झुलाते हुए अक्सर गाया जाता था- तोरा मइया न डोलावे, तोरा बप्पा न डोलावे तोरा हमहीं डोलाईं, वह तो जैसे पूरी तरह से हकीकत रहा है।

किशोर उम्र में मैंने ‘बच्चों के बारह उपन्यास’ नामक एक किताब पढ़ा था, जिसमें एक उपन्यास की कथा पराग नाम के एक बच्चे के बारे में थी। कहानी तो काल्पनिक थी, पर कल्पना ऐसी थी, जिसने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था। पराग की उम्र बढ़ती नहीं, वह अमर है। और यह अमरता ही उसके लिये गहरे दुख और अवसाद की वजह बन जाती है। उसके साथी बच्चे बड़े होते हैं, बूढे़ होते हैं, फिर मर जाते हैं। जो नये बच्चे आते हैं, वे उसके दोस्त बनते हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा आता है, जब वह अपनी अमरता को अभिशाप समझने लगता है और जिस लड़की से वह गहरा स्नेह करता है, उसके मरने के बाद वह भीषण पीड़ा से भर उठता है और अमरता से मुक्ति चाहता है। शायद हू ब हू कथा इसी रूप में न हो, पर इसी रूप में मेरी स्मृति में बची हुई है। कभी-कभी लगता है कि वह पराग मेरे भीतर बैठा हुआ है। फिर भी मैं उसकी तरह मुक्ति नहीं चाहता। मैं बच्चों की आँखों से इस दुनिया को लाखों बार देखना चाहता हूँ। उनके साथ उनकी भाषा में बात करना चाहता हूँ।

मैं शुक्रगुजार हूँ उन मां-बापों का जिन्होंने मेरे वात्सल्य पर यकीन किया और उन बच्चों का जिन्होंने मुझे बेहद प्यार किया। आज तो बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये ऐसे रेस में झोंक दिये जा रहे हैं, कि उनका बचपन समय से पहले ही खत्म हो जाता है। ऐसे माहौल में हाल में दो बच्चे मुझे कुछ इस तरह मिले कि मैं भूल नहीं पाया। एक तो बिल्कुल नन्हा-सा शायद साल-डेढ़ साल का होगा, गोरा-चिट्टा, मुस्कुराता हुआ, आँखों में अजीब सी शरारत भरी थी जिसकी। मेट्रो की लाइन में खड़ा था तो पीछे से किसी ने मेरी शर्ट खींची। मैंने पीछे मुड़के देखा  तो पाया महाशय मेरी शर्ट पर अपनी उंगलियों की जबर्दस्त पकड़ बनाये हुए हैं। मैंने पकड़ बनाये रहने दी। मेट्रो के अंदर घुसने तक उन्होंने शर्ट नहीं छोड़ा। लेकिन उनकी माता जी को सीट मिल गई  तो उन्हें मेरी शर्ट छोड़नी पड़ी। फिर भी उनकी आँखें मेरा पीछा करती रहीं। जब मैं अपने स्टेशन पर उतरा तो देखा महाशय शीशे से मुझे देख रहे हैं। मैंने गर्मजोशी से बाय किया, मेट्रो चली गई, पर उन्होंने हमेशा के लिये स्मृति में जगह बना ली। ठीक वैसे ही बच्चे की शक्ल मेरी एक फेसबुक फ्रेंड के वॉल पर जाने पर दिखती है।

मनमोहक मुस्कान के साथ जाह्नवी।

दूसरी दिलचस्प मुलाकात सात साल की एक बच्ची से लखनऊ जाते वक्त गोमती एक्सप्रेस में हुई। मैं अपनी सीट पर बैठ चुका था। ट्रेन खुलने से पहले मेरी सीट की बगल में एक दंपत्ति अपनी दो बच्चियों के साथ आये। मेरी सीट खिड़की के पास थी। मेरे ठीक विपरीत साइड की खिड़की पर वे दोनों बच्चियां बैठ गईं। अचानक मेरे आगे की सीट पर एक और बच्ची का सिर उभरा, उसने मुझे देखा, मैंने उसे देखा। मैं मुस्कुराया, वह भी मुस्कुराई। मगर कहीं थोड़ी सी हिचक थी। पहले तो उसने मेरे बगल वाले दंपत्ति को दूसरे साइड की सीट पर भेजा, वहाँ से उनकी बच्चियों को अधिकारपूर्वक बुलाया और फिर लगे खेलने। एक खेल था- पिकाचू, जिसमें हारने वाले का गाल पकड़कर खींचा जाता है। हमारी चंचल, चपल सहयात्री ने अपना नाम जाह्नवी बताया, उसके साथ यह सूचना जोड़ते हुए कि यह नाम उनकी दादी माँ ने रखा था। मेरे पूछने पर उन्होंने जाह्नवी का अर्थ भी बताया, फिर से इस सूचना के साथ कि उनकी दादी माँ ने बताया है कि जाह्नवी का अर्थ गंगा होता है। खैर, जाह्नवी अद्भुत ऊर्जा से भरी थीं। थकान का नामोनिशान उनके चेहरे पर नहीं आ रहा था। उन्होंने जो नये दोस्त बनाए थे, वे थोड़ी देर रुकना चाहते थे, पर उनका खेल- पिकाचू थम ही नहीं रहा था। तेज गति से हथेलियों का टकराना, फिर कैंची और पत्थर की शक्ल में मुद्राएं और हारने वाले के गालों को खींचना। और साथ ही यह भी बताना कि अंकल गाल खींचने में कितना मजा आता है न! खेल से थोड़ा डायवर्ट हुईं तो अंत्याक्षरी शुरू कर दी और साबित कर दिया कि उनका अंग्रेजी के शब्दों का ज्ञान सबसे अधिक है, अपने बड़े गोल मटोल भाई से कहीं अधिक, जो खेल में उनका साथ देने को मजबूर थे। उनके पिता बस एकाध बार उन पर निगाह डाल ले रहे थे। उनकी माँ दूसरी साइड की चेयर पर अपने ही ख्यालों में खोई हुई थीं। बाकी गोमती के चेयर कार डिब्बे का मेरे ठीक सामने का चेयर तो मानो जाह्नवी का घोड़ा था, जिसकी लगाम हाथ में लिये वह उसे दौड़ाए लिये जा रही थीं।

गोमती एक्सप्रेस अपने नियत समय से देर होती जा रही थीं, लेकिन हमारी जाह्नवी तो समय को अपने हिसाब से नचा रही थीं। हमारी बातचीत शुरू हो चुकी थी। अचानक उन्होंने मेरी ओर पाँच-छह पॉपकार्न बढ़ाए, मैंने कहा- तुम खाओ। वह कहाँ मानने वाली थीं। उन्होंने मेरे हाथों में मौजूद किताब को बंद किया और उस पर पॉपकार्न रख दिये। अब मैं क्या करता, मैंने तो खा लिये। फिर कुछ देर बाद मैंने आलू भुजिया देना चाहा, पर उन्होंने मना कर दिया। लेकिन कुछ देर बाद ही उनकी बंधी हुई मुट्ठी हल्की सी ढीली हुई, गोकि उनका चेहरा कोई देखता तो उसे लगता कि उनका ध्यान कहीं और हैं, पर मैंने संकेत समझ लिया। मैंने सबकी आँख बचाकर आलू भूजिया उनकी नन्हीं हथेलियों में रख दी। उन्होंने कनखियों से अपने पिता की ओर देखा, उनका ध्यान कहीं और था। और वह इस तरह अपनी हथेलियों को अपने मुँह तक ले गईं, मानो बस यूँ ही हथेलियाँ उधर चली गई हों। और किसी को पता नहीं चल पाया। बल्कि भाई ने ताड़ने की कोशिश की, पर उन्होंने उसे डॉज दे दिया। कमाल यह था कि यह मुद्रा उन्होंने चार-पाँच बार दुहराई और किसी को पता नहीं चला कि हम दोनों अपने खाने की वस्तुएं शेयर कर रहे हैं।

मुझे अगले दिन साथी मदन मोहन के उपन्यास पर कार्यक्रम का संचालन करना था। मैं दुबारा उनके उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ को पढ़ लेना चाहता था। लेकिन जाह्नवी के थपेड़े न केवल कभी-कभी मेरे माथे पर लग रहे थे, बल्कि वे किताब के पन्नों को भी गड्डमड्ड कर दे रहे थे। अचानक किताब ही उनके कब्जे में चली गईं और उन्होंने उसके अंदर के आखिरी कवर पर अपने मां-पिता का मोबाइल नम्‍बर लिखा। यह भी लिखा कि माई नेम इज जाह्नवी। मुझे लगा कि यह नटखट कहीं अपने माँ-बाप के लिये मुश्किल न पैदा कर दे। मैंने तुरत उन्हें अपना परिचय दिया और बताया कि जब मैं लखनऊ फिल्म फेस्टिवल में आऊँगा तो आपको फोन करूँगा। बच्चों के लिये जब फिल्में दिखाई जायेंगी तो आपलोग जाह्नवी को लेकर आइयेगा। फिल्मों का नाम सुनते ही जाह्नवी अपने सवालों के साथ तैयार हो गईं। लेकिन ट्रेन लखनऊ में दाखिल हो चुकी थी। मुझे लग रहा था कि मेरी अगली ट्रेन छूट न जाये। मैं अपना सामान व्यवस्थित करने लगा। जाह्नवी इसे लेकर परेशान थीं कि अंकल कहाँ ठहरेंगे। मैंने चुटकी ली- आपके यहाँ ठहर जाऊँगा। वे बोलीं- नहींऽऽ। स्टेशन पर ट्रेन के लगते ही मुझे तेजी से भागना पड़ा। एक हड़बड़ी की विदाई ली, इस उम्मीद के साथ कि हम फिर मिलेंगे।

सीख

मैंने बिस्किट का पैकेट दिया तो दोनों भाई आपस में लडऩे लगे।
‘आपसे में नहीं लड़ते। सब चीज मिल बांटकर खाते हैं’, मैंने समझाया।
दोनों भाइयों ने सहमति में सिर हिलाया और पैकेट खोलकर आपस में बिस्किट बांटने लगे। तभी पड़ोस का बच्चा आता दिखाई दिया।
‘चींटू आ रहा है। बिस्किट बाद में खाना’, मैंने पैकेट झपट लिया और अलमारी में रख दिया।
मेरा तीन वर्षीय बेटा बिस्किट का टुकड़ा चींटू की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘ले बइया, बित्कित थाले।’
मुझे शर्मिंदगी महसूस  हुई।

रीत

मैं रेलवे स्टेशन पर मधु को लेने गया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। मैंने छेड़ा, ‘भैया-भाभी की याद आ रही है?’
वह तुनक गई, ‘मैं वहां नहीं जाऊंगी। वे लोग बुलाएंगे, तब भी नहीं जाऊंगी।’
‘परंतु तुम तो जिद करके गई थी।’
‘हां, पर अब मैं पछता रही हूं। हमारी वहां कोई इज्जत नहीं है। भाभी ने तो हमें देखते ही ऐसे मुंंह बना लिया, जैसे कोई मुसीबत आ गई हो। बात-बात पर सुनाना मेरे से सहा नहीं गया।’
‘राकेश भैया ने कुछ नहीं कहा’, मैंने और कुरेदा।
‘भैया क्या दोष? वह तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन भाभी ही….’
‘खैर, अच्छा हुआ तुम लोग जल्दी आ गए। दीदी का पत्र आया है। वे लोग अगले सप्ताह आ रहे हैं।’
बच्चे तो खुश हुए, लेकिन मधु ने गहरी सांस ली। मानो उस पर घोर विपत्ति आने वाली हो।
मैं मन-ही-मन मुस्करा दिया।